बड़ी खबरें
>> मंदिरों को खोलने के लिए अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने लिखा राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और यूपी के मुख्यमंत्री को लिखा खत >> सपा नेता के शोषण से पीड़ित युवा पत्रकार रिजवाना ने की आत्महत्या ; शमीम को बताया मौत का जिम्मेदार>> लॉकडाउन के बीच बीएचयू से यौन हिंसा की बड़ी ख़बर :कांग्रेस एवं वाम छात्र संगठन से जुड़े हैं आरोपी >> कोरोना योद्धा को सलाम :हॉटस्पॉट क्षेत्र शंकरघाट की सफाई कर रहे अनिल,मनोज और बाबू --(धर्मेंद्र कुमार श्रीवास्तव, वरिष्ठ सह सम्पादक))>> लॉकडाउन के दौरान आईआईटी बीएचयू में हुयी लापरवाही ; करोना संकट के मध्य रजिस्ट्रार द्वारा बुलायी गयी ‘अर्जेंट’ मीटिंग >> कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी उर्फ एंटनीया माइनो के विरुद्ध फर्जी नाम के उपयोग के मामले में उनके संसदीय क्षेत्र रायबरेली के थाने में शिकायत दर्ज >> ग्रामीण जीवन ; सभ्यता और हमारी समझ - लेखक :रूपेश पांडेय ,पत्रकार एवं चिंतक >> कोरोना:जिहाद और कम्युनिटी स्प्रेड के वास्तविक खतरे से अभी भी दूर है भर>> निर्भया के चार गुनहगारों को आज हुयी फांसी।>> सरकार द्वारा आयोजित कवि सम्मेलनो के संदर्भ मे यूपी के सीएम को एक राष्ट्रवादी कवि ने लिखा ओजस्वी पत      

ताज़ा लेख

सपा नेता के शोषण से पीड़ित युवा पत्रकार रिजवाना ने की आत्महत्या ; शमीम को बताया मौत का जिम्मेदार

उत्तरप्रदेश /वाराणसी | 05 May ,Tuesday 179

#रिज़वाना की मौत और गिद्धों का मौन #शमीम_नोमानी प्रगतिशील नारीवादी पत्रकार रिज़वाना तबस्सुम अब नहीं रहीं। सोमवार को उनके आत्महत्या की खबर से लोग स्तब्ध रह गए। एक जिम्मेदार शहरी के साथ प्रगतिशील विचार की होने के बावजूद रिज़वाना का यूं आत्महत्या करना समझ से परे है। आत्महत्या जैसी कोशिशें बेहद तकलीफदेह और अकेलेपन की स्थिति का नतीज़ा होती हैं। रिज़वाना किसी तकलीफ से गुज़र रही थी यह किसी को खबर भी नहीं हुईं। दुःखद यह कि वह अपनी निजी जिंदगी में इतनी अकेली थीं कि किसी से अपना दुःख भी साझा नहीं कर पायीं। उनके सुसाइड नोट से साफ है कि रिज़वाना को छेड़ने और परेशान करने वाला सपा का स्थानीय नेता शमीम नोमानी था। पुलिस ने रिजवाना के पिता की तहरीर पर आरोपी को गिरप्तार कर लिया है।हालांकि आरोपी इसे अपने खिलाफ साजिश बता रहा है ,परन्तु 25 वर्षीय युवा पत्रकार रिजवाना की आत्महत्या एक बड़ा सवाल खड़े कर रही है कि मीडिया और खासकर द प्रिंट वायर जैसी वामपंथी वेबसाइट व न्यूज एजेंसी के लिए काम करने वाली रिजवाना के साथ ऐसा क्या हुआ जो वे अपनी जिंदगी गंवाने के निर्णय ले बैठीं ! आज की पत्रकारिता औऱ राजनीति का घालमेल इतना जानलेवा क्यों होता जा रहा है और सबसे बढ़कर सेकुलर पत्रकार चैनल व बुद्धिजीवियों का वामी धड़ा अपने लोगों के मामलों में चुप्पी क्यों साध लेता है। जबकि वास्तव में पत्रकारिता जगत को इसे संज्ञान में लेना चाहिए कि एक युवा पत्रकार एक छुटभैये सपाई शमीम नोमानी जैसों के हाथ का शिकार कैसे बन गयी ? उसे न्याय दिलाने के लिए प्रगतिशील समूह को चुप रहने की जगह आगे आना चाहिए।


पूरा लेख पढ़ें
लॉकडाउन के बीच बीएचयू से यौन हिंसा की बड़ी ख़बर :कांग्रेस एवं वाम छात्र संगठन से जुड़े हैं आरोपी

वाराणसी / उत्तरप्रदेश | 02 May ,Saturday 49

- लॉक डाउन के बीच बीएचयू से यौन हिंसा की बड़ी खबर - कांग्रेस और वाम समर्थित ज्वाइंट एक्शन कमेटी की पूर्व सदस्य ने लगाए आरोप - सोशल मीडिया पर छात्रा का आरोप,संगठन यौन अपराधियों का गिरोह - आरोपियों को बचाने की हो रही कोशिश - सीएए विरोधी आंदोलन के दौरान प्रियंका गांधी ने की थी इस संगठन के लोगों से मुलाकात - इंटरमीडिएट कॉलेज का एक अध्यापक है पूरे समूह का मास्टरमाइंड वाराणसी | कोरोना संकट के कारण किये गए लॉकडाउन के बीच काशी हिंदू विश्वविद्यालय से यौन अत्याचार की एक खबर सामने आयी है | घटना को लेकर सोशल मीडिया पर खासा हंगामा मचा हुआ है | परिसर में काम करने वाले कांग्रेस और वाम समर्थित छात्र समूह, ज्वाइंट एक्शन कमेटी की पूर्व सदस्य ने समूह के तीन सदस्यों पर यौन अत्याचार एवं लैंगिक भेदभाव का आरोप लगाया है | यही नहीं आरोप लगाने वाली सदस्य ने संगठन पर दोषियों को बचाने का भी आरोप लगाया है | साथ ही आरोपिता ने विश्वविद्यालय के छात्र-छात्रों से इस समूह के बहिष्कार के साथ समूह में शामिल यौन भेड़ियों को बेनकाब करने का भी आह्वान किया है | क्या है घटना क्रम ज्वाइंट एक्शन कमेटी की एक पूर्व सदस्य शिवांगी चौबे ( यौन अपराध के मामलों में पीड़िता का नाम लिखना कानूनन अपराध है, लेकिन पीड़िता ने स्वयं अपना नाम उजागर इसलिए इस नियम का औचित्य ख़त्म हो जाता है ) ने 27 अप्रैल को अपने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखा | जिसमें उक्त सदस्या ने 2017 और 2018 की सर्दियों में अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न की घटनाओं का जिक्र किया | उसी पोस्ट में शिवानी ने लिखा कि जब देश में ''मी टू" कैम्पेन का दौर चल रहा था तो मैं लगभग दस महीने बाद अपने ऊपर हुए अत्याचार को कहने का साहस जुटा पायी | 28 अप्रैल को शिवांगी ने फिर एक लम्बा पोस्ट लिखा और विस्तार से बताया कि दिसंबर 2017 में कमेटी के सदस्य राज अभिषेक सिंह द्वारा दो बार और सितम्बर 2018 में शांतनु सिंह द्वारा एक बार मेरा प्रत्यक्ष यौन शोषण किया गया | जबकि दीपक राजगुरु ने मेरे चरित्र पर हमला करते हुए सार्वजनिक रूप कि मैं कितनी आसानी उपलब्ध हूँ | शिवांगी यहीं नहीं रुकती हैं | वो अपने पोस्ट में लिखती हैं कि मैं कोई अकेली लड़की नहीं हूँ जो इस समूह के पुरुषों का शिकार हुई हूँ | वो लिखती हैं कि मेरी जानकारी में ऐसी 7 महिलाएं हैं जो यौन हिंसा का शिकार हुई हैं | कुछ इसी राजनैतिक समूह की सदस्य हैं और कुछ बाहर की | जिन पुरुषों ने शोषण किया वे हैं राज अभिषेक, शांतनु सिंह, दीपक राजगुरु अनंत शुक्ला | वे यह भी कहती हैं कि यौन शोषण करने वाले समूह के ये वो पुरुष हैं जिनकी जानकारी है | शिवांगी का आरोप है कि मेरे द्वारा शिकायत के बाद कमेटी की केवल एक मीटिंग बुलाई गयी जिसमें राज अभिषेक ने मेरे साथ किये गए किसी भी यौन अत्याचार से इनकार कर दिया गया | अलबत्ता मेरे ऊपर ही कीचड़ उछाला गया कि मैंने जब घटना हुई तब क्यों नहीं शिकायत की | यह वाकया मेरे लिए दुःखद था | मैं इस समूह से पिछले दो वर्षों से जुड़ी थी | मुझे लगता था कि जैसा यहां कहा जाता है कि कमेटी महिलाओं के साथ समानता का व्यवहार करती है | लैंगिक न्याय की बात होती है तो मुझे भी न्याय मिलेगा | मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ | मै ही दोषी ठहराई गयी और मेरे साथ यौन हिंसा करने वाले पाक-साफ बने रहे और समूह में सक्रीय रहे जबकि मुझे समूह छोड़ना पड़ा | ये वो लोग हैं जो गांधी का नाम लेते हैं | सत्य-अहिंसा की बात करते हैं | ज्वाइंट एक्शन कमेटी की सफाई 28 अप्रैल के शिवांगी की पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर कमेटी की जमकर आलोचना हुई | उसे यौन अपराधियों का गिरोह तक कहा गया | सोशल मीडिया पर चल रही आलोचनाओं से घबराई ज्वाइंट एक्शन कमेटी ने 29 अप्रैल की शाम अपने फेसबुक पेज पर एक लम्बा पोस्ट लिखा जिसमें यह बताने की कोशिश की गयी कि 1- कमेटी महिलाओं के साथ हिंसा के मामलों में संवेदनशील है | लैंगिक न्याय कमेटी के प्रमुख एजेंडों में एक है | 2- शिवांगी प्रकरण में मामला संज्ञान में आने के बाद एक मीटिंग बुलाकर विस्तृत चर्चा की गयी जिसमें शिवांगी ने खुद ही मामले में किसी प्रकार की कानूनी कार्यवाही से इनकार कर दिया और राज अभिषेक को पूरे मामले से बरी करते हुए खुद को ज्वाइंट एक्शन कमेटी से अलग कर लिया | 3- इस प्रकरण के बाद यह आवश्यकता महसूस की गयी कि संगठन से जुड़ी या किसी भी महिला के साथ लैंगिक न्याय के लिए एक आतंरिक अनुशासन एवं शिकायत कमेटी का गठन किया गया | जिसकी सदस्य हैं-विजन संस्था की जागृति राही, क्लाइमेट एजेंडा की एकता शेखर और रिदम संस्था के अनूप श्रमिक | 4- ज्वाइंट एक्शन कमेटी ने समूह में कार्य करने वाली महिला सदस्यों से किसी प्रकार की शिकायत के लिए 30 दिन का समय दिया और तब तक के लिए राज अभिषेक, शांतनु सिंह अनंत शुक्ला को समूह से निष्कासित कर दिया गया | अपने इस पोस्ट के तुरंत बाद ही ज्वाइंट एक्शन कमेटी ने अपने समूह की महिला सदस्यों की तरफ से भी पूरे प्रकरण में एक पोस्ट लिख कर सफाई देने और महिलाओं से शिकायत की अपील की गयी | लेकिन उस पुरे पोस्ट में किसी महिला सदस्य का नाम नहीं था जिनकी तरफ से ये पोस्ट लिखी गयी थी | उसी रात कमेटी ने शाम को लिखे अपने सफाइनामे के बाद एक और स्पष्टीकरण जारी किया | शिवांगी का पलटवार ज्वाइंट एक्शन कमेटी के सफाइनामे और उसके महिला सदस्यों की पोस्ट के बाद शिवांगी ने पुनः उसी रात एक बेहद कठोर पोस्ट लिखा | शिवांगी ने लिखा कि..."ज्वाइंट एक्शन कमेटी ने आज झूठा स्टेटमेंट जारी कर के ये साबित कर दिया कि उस ग्रुप के कुछ लोग ही abusers नहीं है बल्कि उसका एक-एक सदस्य सेक्सुअल abuser के साथ खड़ा है | उन्होंने किसी भी abuser से बिना सवाल किए अपने स्टेटमेंट में हम पर निजी वार किया और लगभग हर बात झूठ ही लिखी। किसी और औरत की स्टोरी को तो संज्ञान में भी नहीं लिया गया। एक सीरियल abuser को महज़ 30 दिन के लिए ग्रुप से निकाला गया। वैसे भी लॉकडाउन है। ऐसे मर्द जिन्होंने न जाने कितनी औरतों के साथ यौन उत्पीड़न किया है, उन्हें जीवन भर का ट्रॉमा दिया है, उसकी कीमत 30 दिन लगाई गई है। बाज़ारीकरण ये लोग बहुत अच्छी कर लेते हैं। महिला सदस्यों का बयान जारी किया गया। वो महिला सदस्य जिन्होंने मीटिंग में मेरे चरित्र पर सवाल उठाए और जो सेक्सुअल abusers के साथ लगातार खड़ी रहीं। मेरी जानकारी में जिन महिला सदस्यों ने ये बयान लिखा है, उसमें से एक महिला के यौन उत्पीड़न की बात हमने ही सबके सामने रखी थी और उनकी पहचान छुपाई। वो भी इस बयान में शामिल है। अपने ऊपर थोड़ी हँसी आ रही है। राज, अनंत, दीपक किसी की तरफ़ से न कोई सफ़ाई आयी, न माफ़ी और ना ही इनसे सवाल किया गया। ख़ुद ही उत्पीड़ित कर के ख़ुद को बरी कर देना सिर्फ़ इस देश के सुप्रीम कोर्ट की फ़ितरत ही नहीं है। ये काफ़ी शर्मनाक है कि जिन लोगों के मुँह से औरत की आज़ादी की बात सुनी थी, वो लोग यौन हिंसा करने वालों को बचा रहे हैं और यौन उत्पीड़न को एक मज़ाक बना कर उसकी 30 दिन की कीमत लगा रहे हैं। ऐसे लोग जो M J अकबर पर सवाल करते नहीं थकते, S K चौबे पर सवाल करते नहीं थकते, आज अपने ऊपर लगे इल्ज़ामों से भाग रहे हैं और उसको जस्टिफाई कर रहे हैं।शर्म की बात है कि हम इस ग्रुप का कभी हिस्सा थे। हम एक बार फिर उनके स्टेटमेंट के सच होने से इनकार करते हैं। और अभी भी अपनी बात पर खड़े हैं कि कोई कार्रवाई नहीं हुई। इन मर्दों को पोस्टर बॉय बनाया गया, औरतों के मुद्दों पर इन्हें माइक थमाया गया, और इनको इनकी राजनीति चमकाने का पूरा मौका दिया गया। पर अब वक़्त आ गया है कि ऐसे लोगों को पहचाना जाए और इनसे बचा जाए। हमने इसलिए ये बात शुरू ही नहीं की ताकि JAC हमको न्याय दे सके, उसकी हमको उम्मीद होती तो हमने उसी मीटिंग में ये ग्रुप न छोड़ा होता। हमने ये बात शुरू की क्योंकि हैं देख रहे थे कि बहुत सी नई औरतें इनसे जुड़ रही थीं और वो इनके इरादों से बिल्कुल बेख़बर थीं।....ये लड़ाई ख़तम नहीं हुई है, शुरू हुई है। ऐसे लोग जो safe space claim करते हैं, इनसे बचें और इनके झाँसे में न आयें।जॉइंट एक्शन कमिटी यौन उत्पीड़न करने वालों को पनाह देती है, और इसका पूरी तरह बहिष्कार होना चाहिए।" इस गंभीर और संवेदनशील प्रकरण के अनेक दुःखद पहलू हैं जो ज्वाइंट एक्शन कमेटी को संदिग्ध बनाते हैं | इसे समझने की जरूरत है - 1- ज्वाइंट एक्शन कमेटी के किसी भी बयान में किसी सदस्य का कोई जिक्र नहीं है | न ही इस बात का कहीं कोई जिक्र है कि प्रकरण के संज्ञान में आने के बाद कमेटी ने कोई मीटिंग की जिसमें उक्त बयान जारी करने का निर्णय किया गया | उस मीटिंग में कौन-कौन लोग उपस्थित थे इसका भी जिक्र नहीं है क्योंकि मीटिंग का ही कोई जिक्र नहीं है | इससे पूरा मामला संदिग्ध प्रतीत होता है और बयान किसी एक सदस्य द्वारा लिखा गया जान पड़ता है | 2- प्रकरण के सन्दर्भ में समूह की महिला सदस्यों की तरफ से जारी बयां में भी किसी महिला सदस्य का न तो उल्लेख है और न ही बयान पर हस्ताक्षर | कमेटी का आचरण इससे भी संदिग्ध दिखाई देता है | 3- कमेटी ने ऐसे प्रकरणों के लिए जो आतंरिक शिकायत कमेटी का गठन किया है उसके सदस्य पूर्व से ही समूह की गतिविधियों से जुड़ी या जुड़े रहे हैं | इसलिए उनसे इस या ऐसे किसी प्रकरण में ज्वाइंट एक्शन कमेटी के हितों के विरुद्ध जाकर कार्यवाही की कोई उम्मीद करना बेमानी ही होगा | अच्छा तो ये होता कि वास्तव में कमेटी अगर न्याय की पक्षधर थी या है तो उसे पीड़िता के द्वारा नामित व्यक्तियों को सदस्य बनाया जाना चाहिए था ताकि इस या किसी भी पीड़िता को न्याय की उम्मीद रहे | यह तो वैसी ही बात लगती है कि हम ही चोर-हम ही कोतवाल | 4- इस पुरे प्रकरण का सबसे शर्मनाक और असंवैधानिक पहलू ये है कि पूरे प्रकरण में कमेटी ने खुद को ही न्यायाधीश घोषित कर लिया है | शिवांगी जिस बात का प्रतिकार कर रही हैं कि जो लोग बीएचयू के प्रो. एस.के. चौबे या एमजे अकबर के प्रकरण में एक प्रकार की कार्यवाही की बात करते हैं उसके लिए आंदोलन करते हैं वही लोग अपने समूह की महिला सदस्य के साथ समूह के ही एक पुरुष सदस्य द्वारा किये गए यौन उत्पीड़न के मामले में दूसरा रुख अख्तियार करते हैं जो इनका दोहरा चरित्र है | 5- कमेटी अपने स्पष्टीकरण में बार-बार इस बात का तो हवाला देती है कि पीड़ित सदस्य के लिए न्यायालय का दरवाजा खुला है लेकिन कमेटी स्वयं उस सदस्या को न्याय दिलाने के लिए किसी सक्षम संवैधानिक पीठ के सम्मुख बात रखने या यौन उत्पीड़कों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराने की कोशिश नहीं करती | जिससे ज्वाइंट एक्शन कमेटी की लैंगिक समानता और सामाजिक निष्ठा जैसी बातें केवल कहानी ही लगती हैं | बहरहाल शिवांगी चौबे का ज्वाइंट एक्शन कमेटी के ऊपर लगाए गए आरोपों से एक बात तो साफ है कि बीएचयू परिसर में काम कर रहे स्वघोषित छात्र समूहों के अंदरखाने व्यापक भ्रष्टाचार पल रहा है जिसकी खबर न तो बीएचयू प्रशासन को है और न ही जिला प्रशासन को | क्या है ज्वाइंट एक्शन कमेटी ज्वाइंट एक्शन कमेटी पहली बार तब चर्चा में आयी थी जब पूर्व कुलपति प्रो. गिरीश चंद्र त्रिपाठी के कार्यकाल में छात्राओं ने आंदोलन किया था | तब, यह माना जा रहा था कि आंदोलन के पीछे आईआईटी बीएचयू से निष्कासित मार्क्सवादी विचारधारा के कार्यकर्ता मैग्सेसे विजेता संदीप पांडेय का हाथ है | जिन्होंने विश्वविद्यालय में काम करने वाले विभिन्न छात्र समूहों को मिलाकर ज्वाइंट एक्शन कमेटी बनायी है | परिसर के बाहर इस समूह को पांडेय के पूर्व संगठन आशा ट्रस्ट से भी मदद मिलते रहने की चर्चा है | कमेटी को रहा है कांग्रेस का समर्थन कमेटी का संचालन करने वाला धन्नजय त्रिपाठी उर्फ़ धन्नजय शुग्गु कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई से जुड़ा हुआ है| पिछले दिनों सीएए विरोधी आंदोलन में गिरफ्तार इस समूह से जुड़े लोगों से मुलाकात करने कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी विशेषरूप से बनारस आयी थीं | प्रियंका को बनारस लाने की पहल पूर्व विधायक अजय राय ने की थी | एनएसयूआई से जुड़े तमाम छात्र इस समूह में सक्रिय हैं | वामपंथी संगठनों,एनजीओ और ईसाई मिशनरियों का भी कमेटी को है समर्थन बीएचयू को केंद्र बनाकर काम करने वाले इस समूह को परिसर के बाहर उन तमाम संगठनों का भी समर्थन प्राप्त होता रहा है जिनका रुख सरकार विरोधी है | इन सहयोगियों में ईसाई मिशनरी से लेकर देश में प्रतिबंधित ग्रीन पीस संस्था से जुड़े रहे वर्तमान में पर्यावरण का एजेंडा चलने वाले विदेशी फंडेड क्लाइमेट एजेंडा, विजन,रिदम जैसे कांग्रेस समर्थित एनजीओ, आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता योगेंद्र यादव के स्वराज इंडिया और जिले में ऐसे तमाम समूहों को जोड़ने वाले साझा संस्कृति मंच शामिल है जिनका कमेटी को समर्थन हासिल रहा है | इंटरमीडिएट कॉलेज का एक अध्यापक है पूरे समूह का मास्टरमाइंड यूं तो ज्वाइंट एक्शन कमेटी अनेक समूहों का एक ज्वाइंट संगठन है लेकिन प्राप्त जानकारी के अनुसार इसका संचालन इंटरमीडिएट कॉलेज में अध्यापन करने वाला एक अध्यापक है | पूर्व में यह मुजफ्फरनगर में पोस्टेड रहा है और पिछले वर्ष ट्रांसफर करा कर बनारस आया है | माना जा रहा है कि प्रकरण के सन्दर्भ में की समस्त लिखा-पढ़ी उसी अध्यापक की कारस्तानी है | संदीप पाण्डेय के साथ और उनसे जुड़े आशा ट्रस्ट से उसके गहरे ताल्लुकात बताये जाते हैं |


पूरा लेख पढ़ें
ईसाइयत है अंधविस्वास और मतांतरण की जन्मस्थली : रवि प्रकाश मिश्रा एवं राम शुक्ला

नई दिल्ली / प्रयागराज | 23 May ,Saturday 45

चर्च में फ़ादर के साथ #क्रिश्चियनिटी_और_हिंदुत्व पर धार्मिक बहस... क्रिश्चियनिटी के गाल पर हिंदुत्व का थपेड़ा...जरूर पढ़ें...🙏 अभी कुछ महीने पहले ही नई यूनिट में ट्रान्सफर आया हूँ, चूँकि पिछली यूनिट में कई लोगों ने मेरी छवि एक साम्प्रदायिक कट्टर हिन्दू की बना दी थी और कुछ लोगों ने मुझे इस्लाम और क्रिश्चियनिटी विरोधी बता दिया था...सो इस यूनिट में मैं काफ़ी शांत रहता था, किसी भी धर्म पर मैं कोई भी बात नहीं करता था। मेरे साथ एक सीनियर हैं, जो 4 साल पहले हिंदू से क्रिश्चियन में कन्वर्ट हुए हैं, वो दिन-रात क्रिश्चियनिटी की प्रशंसा करते रहते और हिंदुत्व को गालियाँ देते रहते थे, चूँकि उन्हें मेरे बारे में कोई जानकारी नहीं थी और ना ही उन्होंने मेरी हिस्ट्री पढ़ी थी। सो कल रविवार को बातों ही बातों में उन्होंने मुझे क्रिश्चियनिटी में कन्वर्ट होने का ऑफ़र दे दिया और क्रिश्चियनिटी के फ़ायदे बताने लगे। मैं कई दिनों से ऐसे मौके की तलाश में था, क्योंकि मेरे दिमाग में क्रिश्चियन कन्वर्जन वाले मुद्दे को लेकर बड़ा फ़ितूर चल रहा था, मैं उसके ज्ञान का लेवल जानता था, मैं जानता था कि उसे क्रिश्चियनिटी और बाईबल में कुछ भी नहीं आता है, इसलिए मैंने उससे बहस करना जायज़ नहीं समझा। मैं बाईबल को लेकर बड़े क्रिश्चियन फादर से बहस करना चाहता था, सो मैंने उनका ऑफ़र स्वीकार कर लिया। अगले दिन शाम को मैं अपने आठ जूनियर और उस सीनियर के साथ चर्च पहुँच गया.. वहाँ कुछ परिवार भी हिन्दू से क्रिश्चियन कन्वर्जन के लिए आये हुए थे.. और धर्म परिवर्तन कराने के लिए गोवा के किसी चर्च के फादर बुलाये गए थे। चर्च में प्रेयर हुई, फिर उन्होंने क्रिश्चियनिटी और परमेश्वर पर लेक्चर दिया और होली वाटर के साथ धर्मान्तरण की प्रक्रिया शुरू की। मैंने अपने सीनियर से कहा कि वो फ़ादर से रिक्वेस्ट करें कि सबसे पहले मुझे कन्वर्ट करें। फिर फ़ादर ने मुझे बुलाया और बोला.. "जीसस ने अशोक को अपनी शरण में बुलाया है, मैं अशोक का क्रिश्चियनिटी में स्वागत करता हूँ"... मैंने फ़ादर से कहा कि मुझे कन्वर्ट करने से पहले क्रिश्चियन और हिन्दू को कम्पेयर करते हुए उसके मेरिट और डिमेरिट बतायें। मैं कन्वर्ट होने से पहले बाईबल पर आपके साथ चर्चा करना चाहता हूँ, कृपया मुझे आधे घण्टे का समय दें और मेरे कुछ प्रश्नों का उत्तर दें। फ़ादर को मेरे बारे में कोई जानकारी नहीं थी और उन्हें अंदाजा भी नही था कि मैं यहाँ अपना लक्ष्य पूरा करने आया हूँ और उन्हें पता ही नहीं था कि मैं अपना काम, अपने प्लान के मुताबिक़ कर रहा हूँ। उस फ़ादर को इस बात का अंदेशा भी नही था कि आज वो कितनी बड़ी आफ़त में फ़ंसने वाले हैं, सो फ़ादर बाईबल पर चर्चा करने के लिए तैयार हो गए। मैंने पूंंछा- फ़ादर क्रिश्चियनिटी हिंदुत्व से किस तरह बेहतर है.. परमेश्वर और बाइबिल में से कौन सत्य है.. अगर बाइबिल और यीशु में से एक चुनना हो तो किसको चुनें ?? अब फ़ादर ने क्रिश्चियनिटी की प्रसंशा और हिंदुत्व की बुराइयाँ करनी शुरू की और कहा:- 1. यीशु ही एक मात्र परमेश्वर है और होली बाईबल ही दुनिया में मात्र एक पवित्र क़िताब है। बाईबल में लिखा एक-एक वाक्य सत्य है, वह परमेश्वर का आदेश है। परमेश्वर ने ही पृथ्वी बनाई है। 2. क्रिश्चियनिटी में ज्ञान है, जबकि हिन्दुओं की किताबों में केवल अंधविश्वास है। 3. क्रिश्चियनिटी में समानता है..जातिगत-भेदभाव नहीं है, जबकि हिंदुओं में जाति-प्रथा है। 4. क्रिश्चियनिटी में महिलाओं को पुरुषों के बराबर सम्मान है, जबकि हिन्दुओं में लेडीज़ का रेस्पेक्ट नहीं है, हिन्दू धर्म में लेडीज़ के साथ सेक्सुअल हरासमेंट ज़्यादा है। 5. क्रिश्चियन कभी भी किसी को धर्म के नाम पर नहीं मारते, जबकि हिन्दू धर्म के नाम पर लोगों को मारते हैं, बलात्कार करते हैं, हिन्दू बहुत अत्याचारी होते हैं। 6. हिंदुओ में नंगे बाबा घूमते हैं, सबसे बेशर्म धर्म है हिन्दू। अब मैंने बोलना शुरू किया कि फ़ादर मैं आपको बताना चाहता हूँ कि.... 1. जैसा आपने कहा कि परमेश्वर ने पृथ्वी बनाई है और बाईबल में एक-एक वाक्य सत्य लिखा है और वह पवित्र है... तो बाईबल के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति ईसा मसीह के जन्म से 4004 वर्ष पहले हुई, अर्थात बाइबिल के अनुसार अभी तक पृथ्वी की उम्र 6024 वर्ष हुई... जबकि साइंस के अनुसार (कॉस्मोलॉजी) पृथ्वी 4.8 बिलियन वर्ष की है, जो बाइबिल में बताये हुए वर्ष से बहुत ज़्यादा है। आप भी जानते हो कि साइंस ही सत्य है... अर्थात बाईबल का पहला अध्याय ही बाईबल को झूंठा घोषित कर रहा है, मतलब बाईबल एक फ़िक्शन बुक है... जो मात्र झूंठी कहानियों का संकलन है... जब बाइबिल ही असत्य है तो आपके परमेश्वर का कोई अस्तित्व ही नहीं बचता। 2. आपने कहा कि क्रिश्चियनिटी में ज्ञान है... तो आपको बता दूँ कि क्रिश्चियनिटी में ज्ञान नाम का कोई शब्द नहीं है, याद करो.. जब #ब्रूनो ने कहा था कि "पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा लगाती है" तो चर्च ने ब्रूनो को, "बाईबल को झूंठा" साबित करने के आरोप में जिन्दा जला दिया था और #गैलीलियो को इसलिए अंधा कर दिया गया.. क्योंकि उसने कहा था "पृथ्वी के आलावा और भी ग्रह हैं" जो बाईबल के विरुद्ध था। अब आता हूँ हिंदुत्व पर.... तो फ़ादर हिंदुत्व के अनुसार, पृथ्वी की उम्र ब्रह्मा के एक दिन और एक रात के बराबर है, जो लगभग 1.97 बिलियन वर्ष है, जो साइंस के बताये हुए समय के बराबर है और साइंस के अनुसार ग्रह-नक्षत्र-तारे और उनका परिभ्रमण हिन्दुओं के ज्योतिष-विज्ञान पर आधारित है, हिन्दू ग्रंथो के अनुसार 9 ग्रहों की जीवन-गाथा वैदिक काल में ही बता दी गयी थी। ऐसे ज्ञान देने वाले संतो को हिन्दुओं ने भगवान के समान पूजा है, ना कि जिन्दा जलाया या अंधा किया... केवल हिन्दू धर्म ही ऐसा है, जो ज्ञान और गुरू को भगवान से भी ज़्यादा पूज्य मानता है, जैसे... "गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवोमहेश्वरः गुरुर्साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्रीगुरूवे नमः।। और फ़ादर दुनिया में केवल हिन्दू ही ऐसा है, जो कण-कण में ईश्वर देखता है और ख़ुद को #अह्म_ब्रह्मस्मि बोल सकता है, इतनी आज़ादी केवल हिन्दू धर्म में ही हैं। 3. आपने कहा कि 'क्रिश्चियनिटी में समानता है जातिगत भेदभाव नहीं है... तो आपको बता दूँ कि क्रिश्चियनिटी पहली शताब्दी में तीन भागों में बंटी हुई थी.... जैसे:- Jewish Christianity, Pauline Christianity, Gnostic Christianity... जो एक दूसरे के घोर विरोधी थे, उनके मत भी अलग अलग थे। फिर क्रिश्चियनिटी Protestant, Catholic Eastern Orthodoxy, Lutherans में विभाजित हुई.. जो एक दूसरे के दुश्मन थे, जिनमें कुछ लोगों को मानना था कि "यीशु" फिर जिन्दा हुए थे.. तो कुछ का मानना है कि यीशु फिर जिन्दा नहीं हुए... और कुछ ईसाई मतों का मानना है कि "यीशु को सूली पर लटकाया ही नहीं गया" आज ईसाईयत हज़ार से ज़्यादा भागों में बटी हुई है, जो पूर्णतः रंग-भेद (श्वेत-अश्वेत ) और जातिगत आधारित है... आज भी पूरे विश्व में कनवर्टेड क्रिश्चियन की सिर्फ़ कनवर्टेड से ही शादी होती है। आज भी अश्वेत क्रिश्चियन को ग़ुलाम समझा जाता है। भेद-भाव में ईसाई सबसे आगे हैं... हैम के वंशज के नाम पर अश्वेतों को ग़ुलाम बना रखा है। 4. आपने कहा कि क्रिश्चियनिटी में महिलाओं को पुरुष के बराबर अधिकार है... तो बाईबल के प्रथम अध्याय में एक ही अपराध के लिये परमेश्वर ने ईव को आदम से ज्यादा दण्ड क्यों दिया ?? ईव के पेट को दर्द और बच्चे जनने का श्राप क्यों दिया, आदम को ये दर्द क्यों नही दिया ?? अर्थात आपका परमेश्वर भी महिलाओं को पुरुषों के समान नहीं समझता... आपके ही बाईबल में #लूत ने अपनी ही दोनों बेटियों का बलात्कार किया और #इब्राहीम ने अपनी पत्नी को, अपनी बहन बनाकर मिस्र के फिरौन (राजा) को सैक्स के लिए दिया। आपकी ही क्रिश्चियनिटी ने, पोप के कहने पर अब तक 50 लाख से ज़्यादा बेक़सूर महिलाओं को जिन्दा जला दिया। ये सारी रिपोर्ट आपकी ही बीबीसी न्यूज़ में दी हुई हैं। आपकी ही ईसाईयत में 17वीं शताब्दी तक महिलाओं को चर्च में बोलने का अधिकार नहीं था, महिलाओं की जगह प्रेयर गाने के लिए भी 15 साल से छोटे लड़को को नपुंसक बना दिया जाता था, उनके अंडकोष निकाल दिए जाते थे, महिलाओं की जगह उन बच्चों से प्रेयर करायी जाती थी। बीबीसी के सर्वे के अनुसार, सभी धर्मों के धार्मिक गुरुओं में सेक्सुअल केस में सबसे ज़्यादा "पोप और नन" ही एड्स से मरे हैं, जो ईसाई ही हैं। फ़ादर क्या यही क्रिश्चियनिटी में नारी सम्मान है ?? अब आपको हिंदुत्व में बताऊँ.... दुनियाँ में केवल हिन्दू ही है, जो कहता है:- "यत्र नारियन्ति पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता" अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है, वहीं देवताओं का निवास होता है। 5. फ़ादर आपने कहा कि क्रिश्चियन धर्म के नाम पर किसी को नहीं मारते... तो आपको बता दूँ ... एक लड़का #हिटलर जो कैथोलिक परिवार में जन्मा, उसने जीवन भर चर्च को फॉलो किया... उसने अपनी आत्मकथा "MEIN KAMPF" में लिखा... "वो परमेश्वर को मानता है और परमेश्वर के आदेश से ही उसने 10 लाख यहूदियों को मारा है" हिटलर ने हर बार कहा कि वो क्रिश्चियन है। चूँकि हिटलर द्वितीय विश्वयुद्ध का कारण था, जिसमें सारे ईसाई देश एक-दूसरे के विरुद्ध थे, इसलिए आपके चर्च और पादरियों ने उसे कैथोलिक से निकाल कर Atheist (नास्तिक) में डाल दिया। फ़ादर मैं इस्लाम का हितैषी नही हूँ... लेकिन आपको बता दूँ, क्रिश्चियनों ने सन् 1096 में #Crusade_War धर्म के आधार पर ही शुरू किया था, जिसमें पहला हमला क्रिश्चियन समुदाय ने मुसलमानों पर किया, जिसमें लाखों मासूम मारे गए। फ़ादर #आयरिश_आर्मी का इतिहास पढ़ो.. किस तरह कैथोलिकों ने धर्म के नाम पर क़त्ले-आम किया, जो आज के ISIS से भी ज़्यादा भयानक था। धर्म के नाम पर क़त्ले-आम करने में क्रिश्चियन मुसलमानों के समान ही हैं... वहीं आपने हिन्दुओं को बदनाम किया, तो आपको बता दूँ कि.. "हिन्दुओं ने कभी भी दूसरे धर्म वालों को मारने के लिए पहले हथियार नहीं उठाया है, बल्कि अपनी रक्षा के लिए हथियार उठाया है। 6. फ़ादर आपने कहा कि हिन्दुओं में नंगे बाबा घूमते हैं "हिन्दू बेशर्म" हैं... तो फ़ादर आपको याद दिला दूँ कि बाइबिल के अनुसार यीशु ने प्रकाशित वाक्य (Revelation) में कहा है कि "Nudity is Best Purity" अर्थात नग्नता सबसे शुद्ध है... यीशु कहता है कि मेरे प्रेरितों, अगर मुझसे मिलना है तो एक छोटे बच्चे की तरह नग्न होकर मुझसे मिलो, क्योंकि नग्नता में कोई लालच नहीं होता। फ़ादर याद करो... #यूहन्ना का वचन 20:11-25 और #लूका के वचन 24:13-43 क्या कहते हो, इस नग्नता के बारे में ?? फ़ादर ईसाईयत में सबसे बड़ी प्रथा #Bapistism है, जो बाईबल के अनुसार येरूसलम की "यरदन नदी" में नग्न होकर ली जाती थी। अभी इस वर्ष फ़रवरी में ही न्यूजीलैंड के 1800 लोगों ने, जिसमे 1000 महिलाएं थी, ने पूर्णतः नग्न होकर बपिस्टिसम लिया और आप कहते हो कि हिन्दू बेशर्म है। अब चर्च के सभी लोग मुझ पर भड़क चुके थे और ग़ुस्से में कह रहे थे... आप यहाँ क्रिश्चियनिटी में कन्वर्ट होने नहीं आये हो, आप फ़ादर से बहस करने आये हो, परमेश्वर आपको माफ नहीं करेगा। 😁 मैंने फ़ादर से कहा कि यीशु ने कहा है "मेरे प्रेरितों, मेरा प्रचार-प्रसार करो" अब जब आप यीशु का प्रचार करोगे तो आपसे प्रश्न भी पूछे जाएँगे... आपको ज़बाब देना होगा, मैं यीशु के सामने बैठा हुआ हूँ और वालंटियर क्रिश्चियन बनने आया हूँ । मुझे आप सिर्फ़ ज्ञान के सामर्थ्य पर क्रिश्चियन बना सकते है, धन के लालच में नहीं... अब फ़ादर ख़ामोश बैठा हुआ था, शायद सोच रहा होगा कि आज किससे पाला पड़ गया... मैंने फिर कहा... फ़ादर आप यीशु के साथ गद्दारी नहीं कर सकते "आप यहाँ सिद्ध करके दिखाओ कि ईसाईयत हिंदुत्व से बेहतर कैसे है" ?? मैंने फिर फ़ादर से कहा कि फ़ादर ज़वाब दो... आज आपसे ही ज़वाब चाहिए, क्योंकि आपके ये 30 ईसाई इतने सामर्थ्यवान नहीं है कि ये हिन्दू के प्रश्नों का ज़वाब दे सकें। फ़ादर अभी भी शांत था, मैंने कहा... फ़ादर अभी तो मैंने #शास्त्र खोले भी नहीं है, शास्त्रों के ज्ञान के सामने आपकी बाइबिल कहीं टिकती भी नहीं है। अब फ़ादर ने काफ़ी सोच समझकर रवीश स्टाइल में मुझसे पूंछा.. "आप किस #जाति से हो" ?? मैंने भी #चाणक्य स्टाइल में ज़वाब दे दिया... "मैं सेवार्थ शुद्र, आर्थिक वैश्य, रक्षण में क्षत्रिय और ज्ञान में ब्राह्मण हूँ। और हाँ फ़ादर मैं कर्मणा "फ़ौजी" हूँ और जाति से "हिन्दू" !!! अब चर्च में बहुत शोर हो चुका था, मेरे जूनियर बहुत खुश थे, बाकी सभी ईसाई मुझ पर नाराज़ थे, लेकिन करते भी क्या ?? मैनें उनकी ही हर बात को काटने के लिए बाईबल को आधार बना रखा था और हर बात पर बाईबल को ही ख़ारिज कर रहा था। मैंने फ़ादर से कहा... मेरे ऊपर ये जाति वाला मंत्र ना फूँके, आप सिर्फ़ मेरे सवालों का ज़वाब दें। अब मैंने उन परिवारों को जो कन्वर्ट होने के लिए आये थे, से कहा... "क्या आप लोगों को पता है कि #वेटिकन_सिटी एक हिन्दू से क्रिश्चियन कन्वर्ट करने के लिए मिनिमम 2 लाख रुपये देती है, जिसमें से आपको 1 लाख या 50 हज़ार दिया जाता है, बाकी में 20 से 30 हज़ार तक आपको कन्वर्ट करने के लिए चर्च लेकर आने वाले आदमी को दिया जाता है, बाकी का 1 लाख चर्च रखता है। जब आप कन्वर्ट हो जाते हो, तब आपको परमेश्वर के नाम से डराया जाता है, फिर आपको हर संडे चर्च आना पड़ता है और हर महीने अपनी पॉकेट मनी या फिक्स डिपाजिट चर्च को डिपॉजिट करना पड़ता है... आपको 1 लाख देकर चर्च आपसे कम से कम, दस लाख वसूल करता है, अगर आपके पास पैसा नहीं होता तो आपको #परमेश्वर के नाम से डराकर आपकी जमीन किसी क्रिस्चियन ट्रस्ट के नाम पर डोनेट (दान) करा ली जाती है! अब आप मेरे सीनियर को ही देख लो, इन्होंने कन्वर्ट होने के लिए 1 लाख लिया था, लेकिन 4 साल से हर महीने 15 हज़ार चर्च को डिपाजिट कर रहे हैं, अभी भी वक्त है सोंच लो... आप सभी को बता दूँ कि एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में धार्मिक आधार पर सबसे ज़्यादा जमीन क्रिश्चियन ट्रस्टों पर हैं, जिन्हें आप जैसे मासूम कन्वर्ट होने वालों से परमेश्वर के नाम पर डराकर हड़प लिया गया है। अब मेरा इतना कहते ही सारे क्रिश्चियन भड़क चुके थे, तभी यहाँ के पादरी ने गोवा वाले फ़ादर से कहा कि 11बज चुके हैं, चर्च को बन्द करने का टाइम है... मैंने फ़ादर से कहा कि आपने मेरे सवालों का ज़वाब नहीं दिया, मैं आपसे बाईबल पर चर्चा करने आया था.. आप जो पैसे लेकर कन्वर्ट करते हो, वो बाईबल में सख्त मना है... याद करो गेहजी, यहूदा इस्तविकों का हस्र.. जिसनें धर्म में लालच किया। जिस तरह परमेश्वर ने उन्हें मारा, ठीक उसी तरह आपका ही परमेश्वर आपको मारेगा, आप में से किसी भी क्रिश्चियन को, जो पैसे लेकर कन्वर्ट हुआ, फ़िरदौस (यीशु का राज्य) में प्रवेश नहीं मिलेगा। अब चर्च बंद होने का समय हो चुका था, मैंने जाते-जाते फ़ादर को "थ्री इडियट" स्टाइल में कहा... फ़ादर फिर से बाईबल पढ़ो-समझों और जहाँ समझ ना आये तो मुझे फ़ोन करके पूंछ लेना, क्योंकि मैं अपने कमज़ोर स्टूडेंट का हाथ कभी नहीं छोड़ता! और आते-आते मैं सारे क्रिश्चियनों को बोल आया ककि "मेरे क्रिश्चियन भाइयों, अपने वेटिकन वाले चचाओं को बता दो कि भारत से ईसाईयत का बोरिया-बिस्तर उठाने का समय आ गया है, उन्हें बोल दो, अब भारत में हिन्दू जाग चुका है, अब हिन्दू ने भी शस्त्र के साथ, शास्त्र उठा लिया है, जितना जल्दी हो यहाँ से कट लो"......💪 जय हिन्द जय भारत...🇮🇳 जय श्री राम🚩 रवि प्रकाश मिश्रा जी



पूरा लेख पढ़ें
कोरोना संकट,स्वदेशी और आज़ादी बचाओ आंदोलन ; संत समीर, वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक

नई दिल्ली / प्रयागराज | 15 May ,Friday 124

उस विचारधारा को याद करने का समय एक बार फिर आ गया है, जिसे पूरी दुनिया प्रकृति के कहर के आगे आज मजबूरी में अपना रही है। इस विचारधारा की नींव आज़ादी बचाओ आन्दोलन (पूर्व नाम—लोक स्वराज्य अभियान) ने 5 जून, 1989 को इलाहाबाद की धरती पर रखी थी। मूलमन्त्र था—स्वदेशी और स्वावलम्बन। फेसबुक पर कई मित्र उस दौर की यादें ताज़ा कर रहे हैं तो अच्छा लग रहा है। उत्कर्ष मालवीय ने तब का नारा याद दिलाया—‘बाटा, लिप्टन, पेप्सीकोला...सब पहने हैं ख़ूनी चोला।’ वे कई नारे याद आ रहे हैं, जो तब हमने गढ़े थे और बाद में पूरे देश में गूँजने लगे थे। मसलन... ‘देश हमारा माल विदेशी, नहीं चलेगा नहीं चलेगा’, ‘जागो फिर एक बार, विदेशी का बहिष्कार’, अभी तो ये अँगड़ाई है, आगे और लड़ाई है’ आदि-आदि। शुरू में हम बस कुछ गिनती के लोग थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गणित विभाग के तब के अध्यक्ष प्रो. बनवारीलाल शर्मा हमारे अगुआ थे। विश्वविद्यालय के ही एक विभाग ‘गान्धी शान्ति एवं अध्ययन संस्थान’ (गान्धी भवन) को हमने अपना ठीया बनाया हुआ था। ‘स्वदेशी बनाम बहुराष्ट्रीय निगमें परियोजना’ नाम देकर हमने एक शोध करना शुरू किया। जो जानकारियाँ बाहर आईं, वे अजब-ग़ज़ब और चौंकाने वाली थीं। मज़ेदार कि जिस ईस्ट इण्डिया कम्पनी को खदेड़ने के लिए आज़ादी की लड़ाई लड़ी गई, वह रूप बदल कर इस देश में दवा बेचने का धन्धा कर रही थी। लोगों को ज़रा भी अन्दाज़ा नहीं था कि हिन्दुस्तान लीवर नाम की कम्पनी हिन्दुस्तान की नहीं है। डालडा वनस्पति, सनलाइट, लाइफबॉय, कोलगेट घरों में इस्तेमाल होने वाले सबसे लोकप्रिय उत्पाद थे और देश के ही लगते थे। बहरहाल, इलाहाबाद के नौजवानों ने बहुराष्टीय विदेशी कम्पनियों के ख़िलाफ़ स्वदेशी के आन्दोलन का बिगुल बजा दिया। बात बढ़ने लगी और चीज़ों को ठीक से सँभालने की ज़रूरत लगी तो हमने अपनी-अपनी रुचि के हिसाब से काम का बँटवारा कर लिया। कुछ लोग भाषण देने निकले, कुछ जनसम्पर्क पर, तो कुछ साहित्य और पत्रिकाएँ सँभालने लगे। दुर्भाग्य से आजकल के ज़्यादातर युवा उस आन्दोलन के सिर्फ़ राजीव दीक्षित को ही जान पा रहे हैं, जबकि एक बड़ी सङ्ख्या ऐसे कार्यकर्ताओं की है, जिनकी भूमिकाएँ कई मामलों में और भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण रही हैं। वे भाषण नहीं देते थे, तो उनके चेहरे आमजन के सामने नहीं होते थे। दुर्भाग्य यह भी है कि अपने देहावसान के आख़िरी दिनों में राजीव जी ने वाग्भट के आयुर्वेद पक्ष पर जो कुछ बोला, तो स्वास्थ्य के मुद्दे के नाते कुछ लोगों ने यूट्यूब पर उसे ही ज़्यादा प्रचारित कर दिया। नतीजतन, आजकल ज़्यादातर लोग राजीव दीक्षित को डॉक्टर, वैद्य जैसा कुछ समझने लगे हैं, जबकि अर्थव्यवस्था और समाज-व्यवस्था के सवालों पर उनके भाषणों को सुना जाना चाहिए। शुरू के दिनों का हाल यह था कि ग्लोबल होने की पिनक में सत्ता के कर्ताधर्ता और राजनीति के खिलाड़ी इस विचारधारा का मज़ाक़ उड़ा रहे थे कि देश को देश के संसाधनों से आत्मनिर्भर भला कैसे बनाया जा सकता है? बावजूद इसके, आज़ादी बचाओ आन्दोलन के कार्यकर्ताओं ने अपना जुनून और धुन बनाए रखा। धीरे-धीरे आन्दोलन की धमक यहाँ तक पहुँची कि पेप्सी जैसी कम्पनी बहुत समय तक इलाहाबाद में प्रवेश करने की हिम्मत नहीं कर पाई। युवाओं की एक बड़ी सङ्ख्या थी, जिसने दिन-रात एक कर दिया था। मैंने इतने निश्छल कार्यकर्ता किसी और आन्दोलन या सङ्गठन में आज तक नहीं देखे। जाने कितने लोगों ने पढ़ाई-लिखाई की चिन्ता छोड़ दी थी। मेरी तरह तमाम नौजवानों ने देश के लिए घर-परिवार तक से नाता तोड़ने का मन बना लिया था। आईएएस, पीसीएस का मोह छोड़कर छात्र इसमें शामिल हो रहे थे। इक्का-दुक्का नाम देना उचित नहीं समझ रहा हूँ। इन सबके नाम बड़े तरतीब से याद करने पड़ेंगे, वरना अन्याय होगा। ये ऐसे नाम हैं, जिनमें आज़ादी की लड़ाई के क्रान्तिवीरों की छवियाँ मुझे दिखाई देती रही हैं। काश, कुछ लोगों की बेवकूफ़ियों से आन्दोलन खण्डित न हुआ होता, तो आज देश का चेहरा शायद कुछ और दिखाई देता। यह जो अन्ना आन्दोलन और केजरीवाल एण्ड कम्पनी की जलवानुमाई आपने पिछले कुछ वर्षों में देखी...यह पूरा भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन उसी आज़ादी बचाओ आन्दोलन के टूटते-बिखरते खण्डहर से निकली धारा थी। मुझे वह समय याद आ रहा है, जब हमने मॉरीशस के रास्ते बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा हर साल की जा रही देश के क़रीब सत्तर हज़ार करोड़ रुपये की लूट के ख़िलाफ़ मुक़दमा दायर किया तो अरविन्द केजरीवाल ने बड़ी मेहनत से ज़रूरी दस्तावेज़ जुटाने का काम किया था। आज की तारीख़ में आज़ादी बचाओ आन्दोलन को ज़्यादा लोग नहीं जानते। नई पीढ़ी को नहीं पता कि यही वह सङ्गठन है, जिसने बहुराष्ट्रीय शब्द दिया ही नहीं, बल्कि इस पूरे मुद्दे को देश की सीमाओं के पार वैश्विक स्तर पर चर्चा के केन्द्र में लाने का काम किया। वे दिन मुझे याद हैं जब इलाहाबाद में आन्दोलन का जलवा अजब ही हो गया था। एक बार हमने घोषणा कर दी कि हम लखनऊ में रैली करेंगे। यह सिर्फ़ घोषणा भर थी, काम कुछ नहीं किया गया था। लखनऊ पहुँचने वाले गिनती के सिर्फ़ कुछ सौ लोग थे, पर तब के मुख्यमन्त्री मुलायम सिंह यादव ने हमारी सुरक्षा में हज़ारों पुलिसकर्मी लगा दिए। बाद में वे मिले और उन्होंने कहा कि यह मेरा दायित्व है, आप लोग अच्छा काम कर रहे हैं मैं आपके समर्थन में हूँ। हमने विचारधारा की कोई ज़िद नहीं पाली थी। हमारे दरवाज़े खुले थे कि जो भी देश-समाज का भला चाहता हो, इस काम में सहयोगी बन सकता है। मार्क्सवादी छात्र सङ्गठन ‘आइसा’ वग़ैरह हमारे साथ थे। समाजवादी धारा के जार्ज फर्नाण्डीज, रविराय, सुरेन्द्र मोहन जैसे लोग एक समय में पूरी तरह से राजनीति छोड़कर आज़ादी बचाओ आन्दोलन में शामिल हो गए थे; पर थे अन्ततः राजनीति के कीड़े, इसलिए चोर चोरी से जाए, पर हेराफेरी कैसे छोड़े...तो बाद में हम लोगों ने मजबूरन राजनीतिक लोगों के लिए आन्दोलन में शामिल होने पर पाबन्दी लगाई। शुरू में विद्यार्थी परिषद के लोग हमारे साथ शामिल होते थे। बाद के दिनों में उन्हीं के ज़रिये यह मुद्दा आरएसएस तक पहुँचा और हम लोगों ने उनका स्वदेशी जागरण मञ्च बनवाने में काफ़ी सहयोग किया। हमारा जितना शोध था, पर्चे-पोस्टर थे, सब उनको उपलब्ध कराया। स्वदेशी जागरण मञ्च के शुरू के जितने भी पर्चे-पोस्टर थे, वे सब आज़ादी बचाओ आन्दोलन या कहें, लोक स्वराज्य आभियान के पर्चे-पोस्टर थे। उन पर बस हमारा नाम हटाकर स्वदेशी जागरण मञ्च का नाम चस्पाँ कर दिया गया था। हमारा उद्देश्य बस इतना था कि जैसे भी हो, स्वदेशी का मुद्दा देश में प्रचारित होना चाहिए। हमें हर संस्था-सङ्गठन में प्यारे लोग मिले। स्वदेशी जागरण मञ्च में भी कई प्यारे लोग थे, पर उनकी दिक़्क़त यह थी वे भाजपा की रीति-नीति पर ही निर्भर थे और कई बार उन्हें अपनी इच्छा के विपरीत चलना पड़ता था। ख़ैर, बातें यादें बड़ी-बड़ी हैं, पर असली बात है कि मुद्दा महत्त्वपूर्ण है, जिसे आज क़ुदरत के करिश्मे ने प्रासङ्गिक बना दिया है। मजबूरी में ही सही, इन राजनीतिक घोषणाओं का स्वागत किया जाना चाहिए, पर सिर्फ़ घोषणाओं से बात नहीं बनती। आज़ादी बचाओ आन्दोलन जिस समाज-व्यवस्था की बात करता रहा है, उस पर गम्भीरता से सोचा जाना चाहिए। अभी वक़्त है, शायद इस दिशा में कुछ काम आगे बढ़ जाय, वरना आदमी कुत्ते की पूँछ से कहाँ कम है! जैसे ही कोरोना का डर ख़त्म होगा, हम फिर वही प्रकृति-विरोधी रङ्ग-ढङ्ग अपनाना शुरू कर देंगे, जिसके ख़ामियाज़े के तौर पर इस हस्र तक पहुँचे। तीन दशक पहले की गई आज़ादी बचाओ आन्दोलन की भविष्यवाणियाँ हूबहू सच साबित हो रही हैं। स्वदेशी-स्वावलम्बन की पटरी से देश के उतरने के नतीजे का परावलम्बन इससे बड़ा क्या हो सकता है? यह रोज़गार की कैसी अवधारणा, जो करोड़ों लोगों को पलायन पर मजबूर कर दे और एक अदना-से कोरोना का आतङ्क आते ही विकास के पहियों तले कुचल दे। हज़ार-हज़ार किलोमीटर दूर से इस मुश्किल की घड़ी में किसी भी तरह से अपनी चौखट छू लेने की चाहत लिए लोग पैदल निकल पड़ें और आधी दूरी नापते-नापते दम तोड़ने लगें, तो देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है? स्वदेशी के सहारे स्वावलम्बन का मर्म समझा गया होता तो आज ये दिन देखने की नौबत नहीं आती। विदेशी यात्राएँ भी हम ज़रूरत भर को करते और इस तरह वहाँ से कोरोना की सौगात लेकर नहीं आते। अगर यह वायरस किसी प्रयोगशाला में विकसित किया गया है, तो भी यही समझिए कि इसके पीछे दुनिया पर व्यापारिक क़ब्ज़े की ही मानसिकता ही काम कर रही है, जो स्वदेशी की अवधारणा में सम्भव नहीं हो सकती थी। स्वदेशी का मतलब सिर्फ़ यह नहीं है कि विदेशी के बजाय देशी सामान ख़रीद लिया जाय। स्वदेशी एक पूरी विचारधारा है, जो हर तरह के शोषण के विरुद्ध समाज को आत्मनिर्भर बनाती है। स्वदेशी की समझ हमारे सत्ताधीशों को हो जाए तो बेरोज़गारी की समस्या का समाधान आसान हो जाएगा। स्वदेशी समाज के रिश्ते मजबूत करती है और ख़ुद की अस्मिता से गुज़रते हुए ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को सही मायने में चरितार्थ करती है। मैं यही कह सकता हूँ कि हर सोचने-समझने वाले व्यक्ति को अपनी चिन्तनधारा में इसे शामिल करना चाहिए और आवाज़ उठानी चाहिए कि आख़िर इस देश को हमें किस रास्ते पर आगे ले जाने की ज़रूरत है। शिद्दत से याद करना चाहिए कि देश की आबादी वही है, पर लॉकडाउन के इस कोरोना-काल में सिर्फ़ हमारी हरकतें बदलीं कि नदियाँ, हवा, आसमान... सब मुस्कराने लगे। इतना साफ़-सुथरा प्रदूषणमुक्त पर्यावरण तथाकथित विकास-काल में इसके पहले कभी नहीं देखा गया था। मैं महानगर की इस घनी आबादी में कई दिनों से देर शाम कोयल की कूँक सुन रहा हूँ। साफ़-सुथरे आसमान में तारे गिनने के दिन जैसे फिर लौट आए हैं। मतलब साफ़ है, समस्या आदमी की आबादी से नहीं, उसकी हरकतों से है। हरकतें राह पर हों तो प्रकृति जीवन के रास्ते में कभी बाधा नहीं खड़ी करती, क्योंकि प्रकृति की प्रकृति बुनियादी रूप से जीवनोन्मुखी है। चिकित्साविज्ञानी भी कहते हैं कि साफ़ हवा और सूरज की रोशनी संसार के सबसे बड़े एण्टीवायरल उपादान हैं। इनका संयोग सही रहे तो कोई भी वायरस जीवन के लिए ख़तरनाक नहीं हो सकता। आहार-विहार के साथ प्रदूषण रोग-प्रतिरोधक शक्ति में पलीता लगाने का सबसे बड़ा कारक है। याद रखने की बात है कि अगर आदमी ने अपनी हरकतों से ज़हरीला न बना दिया हो तो, जङ्गल के साफ़ पर्यावरण में किसी जीव-जन्तु को कभी डॉक्टर और अस्पताल की ज़रूरत नहीं पड़ती। कुल बात यह कि क्या हमारे रहनुमा कोरोना को सचमुच प्रकृति का सबक़ मान पाएँगे और देश को विकास के सही रास्ते पर ले जाने का काम कर पाएँगे...या कुछ दिनों बाद हम फिर उसी भेड़चाल में शामिल होने को अभिषप्त होंगे? महाबली अमेरिका के घुटने टेक देने के बाद भी प्रकृति को जीत लेने का हमारा दम्भ अगर कम न हो तो क्या किया जा सकता है! प्रकृति का क्या, वह ख़ुद को सन्तुलित करना जानती है। कहीं ऐसा न हो कि एक दिन कोरोना से हज़ार गुना ख़तरनाक वायरस आए और सूरज, चाँद, सितारों की तमाम दूरियाँ नापते रहने के बावजूद हमारा सारा हिसाब-किताब बराबर कर जाए। लोकल पर वोकल होइए और इसे ग्लोबल बनाइए...यह अच्छा है, पर महज़ नारा न हो तो। बीस लाख करोड़ का पैकेज भी लोगों का सहारा बन सकता है, पर इसका भी सही इस्तेमाल हो तो। अभी का हाल यह है कि हरेक कोरेण्टाइन व्यक्ति पर हर दिन के लिए छह हज़ार रुपये की रक़म तय की गई है, पर कई इलाक़ों में मरीज़ के माँगने पर पीने का साफ़ पानी तक नहीं दिया जा रहा। मौतों की बिना पर अफ़सर अपनी जेबें भरना ज़्यादा ज़रूरी समझ रहे हैं। बीस लाख करोड़ के पैकेज का ज़्यादा हिस्सा नेताओं, अफ़सरों की मौज-मस्ती में काम आएगा या आमजन का सहारा बनेगा...इस बात को ठीक से सोचते-विचारते हुए हमारे प्रधानमन्त्री आगे बढ़ेंगे तो सचमुच देश का भला हो सकता है; अन्यथा आम आदमी की नियति में बदहाली और मौत लिखने के लिए सत्ता की कुर्सी पर ब्रह्मा बैठे ही हैं।



पूरा लेख पढ़ें