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राखीगढ़ी में मिला एक और प्रमाण :आर्य विशुद्ध भारतीय थे --फेसबुक वॉल से

नई दिल्ली/भारत | 14 Jun ,Sunday 37

अक्सर आपने लोगों को कहते सुना होगा। “सच को आंच नहीं” !भारतवर्ष में सालों से जो झूठ मडा गया। भारतीयों को Arya (आर्य) और द्रविड़ की झूठी कहानियां बता कर उन्हें सत्य से भ्रमित रखा गया। आज तक भारत में सभी ने एक ही बात किताबों में पड़ी और एक ही बात किताबों में सुनी। Arya बाहर से आये थे। उन्होंने भारत के मूलनिवासियों पर हमला किया और यही बस गए। यही नहीं फैलाया तो यह भी गया कि आर्यो ने मूलनिवासियों को अपना हज़ारों सालों से दास बना कर रखा। भारत का इतिहास दोबारा लिखा जायेगा ? भारत का अब इतिहास बदलने जा रहा है। अब भारत के इतिहास को दोबारा से लिखने की आवश्यकता है। सन 2015 में अरमेन्द्र नाथ के निर्देशन में खुदाई हुई थी। हरियाणा राज्य के राखीगढ़ी के अंदर एक नरकंकाल मिला था। नर कंकाल एक खेत के अंदर खुदाई करते समय मिला था। यह नर कंकाल लगभग 2500 BCE पुराना बताया जा रहा है। यानी आज से 4500 वर्ष पुराना है। हज़ार से ज़्यादा लेब में भेजा गया सैंपल यह नर कंकाल जो पुरातत्त्व विशेषज्ञ को मिला था, वो किसी स्री का कंकाल था। जब पुरातत्त्व विशेषज्ञों ने इसपर लगातार शोध किया और इसके डीएनए सैंपल को दुनिया भर की 1000+ लिबोरिटी में भेजा गया डीएनए जाँच के हेतु। लगभग तीन सालों तक चले इस शोध और डीएनए रिपोर्ट से यह सामने निकलकर आया। उस प्राप्त नरकंकाल का डीएनए, प्राचीन आर्यन डीएनए रिपोर्ट से मेल नहीं खाता है। खुदाई से प्राप्त नरकंकाल में भारतीय जीन मौजूद है। नाकि प्राचीन Arya जीन। 10,000 सालों से भारतीयों का एक ही जीन 10,000- 12,000 सालों से भारतीय लोगो का मूलभूत एक ही जीन है। वो बात अलग है भारत में विदेशियों के आते रहने की वजह से जीन में कुछ बदलाव ज़रूर आये है, किन्तु जीन का आंकलन मूलभूत जीन से ही किया जाता है। इसके अलावा 120 सैंपल लिए गए। हर एक सैंपल को 1000+ लैब में भेजा गया। 2,65,000 मार्कअप मिला जिसमे पाया गया समय-समय पर जीन में मिलावट हुई। इस मिलावट की मात्रा कम है। लेकिन भारतीयों का मूलभूत जीन एक ही पाया गया है। भारत में बहुत ज़्यादा डाइवर्सिटी थी। जो की यूरोप, अमेरिका, साउथ अफ्रीका से भी ज़्यादा है। भारत में Arya (आर्य) कभी आये ही नहीं इस रिपोर्ट के बाद एक और बड़ा खुलासा हो गया है कि, अफगानिस्तान से लेकर अंडमान निकोबार तक सबका जीन एक ही है। कोई Arya (आर्य) नहीं है कोई द्रविड़ नहीं है और ना ही कोई आदिवासी है। इन सभी का जीन एक ही है। द्रविड़ ही आर्य है और आर्य ही द्रविड़ है। यानी कि, भारत पर आज से 2500 BCE पहले किसी ने हमला नहीं किया था और उस वक़्त तक कोई भी भारत नहीं आया था। नरकंकाल पर किसी भी तरह के चोट के निशान नहीं है। पुरातत्त्व विशेषज्ञों का मानना है, इस स्त्री की मौत बाढ़ की वजह से हुई होगी। पुरातत्व विशेषज्ञ बसंत शिंदे ने कहा है अध्ययन के लिए जेनेटिक डाटा और पुरातात्विक डाटा को मिलकर अध्ययन किया गया है। – भारत के लोगो ने खुद ही खेती करना, शिकार करना एवं पशुपालन करना सीखा था। साथ ही भारत के लोगो ने अपनी सभ्यता को खुद ही विकसित किया है। भारत में बाहर से आकर भारतीयों को किसी ने कुछ नहीं सिखाया। प्राचीन भारत के विषय में कहा गया कि, भारत में लोग ईस्ट, वेस्ट एवं नार्थ एशिया से आकर भारत में बस गए थे और उन्ही लोगो ने उन्नत सभ्यता का विकास किया जो कि गलत है। जीवन के शुरुआत से लेकर पहले शहरी निर्माण तक की उन्नति व विकास भारतीयों ने खुद किया है। जीवन जीने के बेहतरीन तरीके की खोज भारतीयों की देन है ना कि विदेशियों की। साउथ एशिया का भारतीय समूह पूरी तरह से स्वतंत्र था। यह किसी भी देश के लोगो पर निर्भर नहीं था। इन्होने 7000 BCE से लेकर उन्नत हड़प्पन सभ्यता तक तरक्की की। भारत में बाहर से कोई आता तो अपनी सभ्यता और कल्चर लेकर साथ में ज़रूर आता जैसा की अक्सर होता रहा है। लेकिन भारतीय कल्चर सभ्यता में बाहरी प्रभाव देखने को नहीं मिलता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया पुरातत्व विशेषज्ञ मानते है, प्राचीन भारत में पहले लोग नक्शा बनाते थे, नक़्शे के अनुसार ही शहर बसाते थे। नक़्शे में बनाई गयी गलिया हवा के समान्तर और सटीक होती थी। आज के समय में बिना जीपीएस सिस्टम उपयोग किये ऐसी सटीक गलिया नहीं बनाई जा सकती है । माना जा रहा है राखीगढ़ी के नीचे पूरा का पूरा शहर होने की सम्भावना है। खुदाई के दौरान मिले सामान कई नरकंकाल के अलावा भी खुदाई में प्राचीन भारत की सभ्यता के बहुत सारे सामान मिले है। जो आज के समय में लोगो को अचंभित करके रख देंगे। रॉक और पिल्लर, पाल्म लीव्स, प्लेट्स, पत्थरो की दीवारे, मिट्टी की टेबल, हथियार, पॉटरीज,गहने, मूर्ति, प्राचीन पेंटिंग इत्यादि। नुकिले हथियार, तलवार एवं पुराने ज़माने के पत्थर इत्यादि। खुदाई के दौरान मिटटी के बर्तन, मिटटी के पॉट भी मिले जिसको बजने पर मेटल के बर्तनो जैसी ध्वनि सुनाई देती है। राखीगढ़ी में खुदाई करते समय आगी जलने वाले भट्टे भी मिले है जो अत्याधुनिक है। ऐसे भट्टे भारत में आज तक कभी नहीं देखे गए। इन्ही भट्टों पर मिटटी को तपाकर इतने शानदार मजबूत बर्तन बनाये जाते थे। जिनसे मेटल के बर्तनो जैसी आवाज़े आती थी। यह भट्टे बहुत ही आधुनिक थे, उसके अंदर चैम्बर बने हुए है, अलग अलग चैम्बर में अलग-अलग तापमान पर बर्तन पकाते थे। जिससे मिटटी के बर्तनो को सही आकार एवं मजबूती मिलती थी। इन भट्टियों को नाम दिया है प्रिस्कत भट्टी। अन्टोलॉजिस्ट केनेज़िंड ने बताया की अभी तक जितने भी भारत में कंकाल मिले है, और जो अभी के सारे भारतीय है उनके जीन में कोई फर्क नहीं है। अब सोचने वाली बात यह है कि, ऐसी बातें समाज में बिना सबूत और आधार के क्यों फैलाई गयी। आर्य बाहर से आये थे। ऐसा करने के पीछे कारण क्या रहा होगा ? कई सालों से भारत में जो नफरत का बीज बोया गया था। उसकी फसल का फायदा अंग्रेजो से लेकर भारत के नेताओं एवं बुद्धिजीवियों ने खूब उठाया। इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने पर बहुत लोगो की रोजी रोटी आने वाले समय में बंद हो जायेगी। आईये हम विस्तार से इसके बारे में बताते है फ़्रिएद्रिच मैक्स मुल्लर का जन्म जर्मनी में हुआ था, बाद में इंग्लैंड जा बसे। ऑक्सफ़ोर्ड में इंग्लिश भाषा के स्कॉलर होने की वजह से उन्होंने 1884 में आर्यन शब्द की एक थ्योरी दी। जिसमे उन्होंने आर्यन वंश, भाषा, और आर्यन रेस के बारे में बताया। उनकी इस बात पर पहले जर्मन ने फिर अंग्रेजो ने भी हवा देना शुरू कर दिया। यही सब बातें भारत में भी फैलाई गयी बिना सत्य जाने कि, किन सबूतों के आधार पर उन्होंने ऐसी विचार धारा फैलाई। सबसे मजेदार बात इसमें यह थी कि, एक अंग्रेजी भाषा के स्कॉलर ने इतिहास के बारे में इतना सब कहा कैसे ? यानी रोमांटिक नॉवेल लिखने वाला इतना ज्ञान दे गया। लेखकों की कल्पना शक्ति भी कमाल की होती है न ? यानी हम ऑक्सफ़ोर्ड से इंग्लिश पढ़ेंगे तो, शायद हम भी इतिहास के फिलोस्पर हो जाएंगे और शायद लोग हमे भी परमज्ञानी मान ले क्योंकि कभी कभी काल्पनिक बातें भी सच लगने लगती है । भारत में Arya (आर्य) शब्द का उपयोग भारत के प्राचीन इतिहास पर नज़र डाले तो, भारत के वैदिक काल से ही Arya (आर्य) शब्द का उपयोग किया जा रहा है। आर्य एक संस्कृत शब्द है। जिसका वास्तविक अर्थ होता है- ‘श्रेष्ठ, सच्चा, प्रिय, सज्जन इत्यादि’। वेदों में Arya किसे कहा गया है ? ऋग्वेद के अनुसार आर्य वो होते है। “आर्य सर्वा समाससेवा सदैवा प्रियदर्शिनः” जो समाज में समानता से सेवा करते है, वो सदैव ही समाज के लिए प्रिये होते है। इन्ही को वेदों में आर्य कहा गया है। अर्थात वेदों में आर्य का अर्थ जाति सूचक बिलकुल भी नहीं है। “प्रजा आर्य ज्योतिरागृह” (ऋग्वेद VII. 33.17) अर्थात आर्यों के बच्चें सदैव प्रकाश की राह पर चलते है। ऐसे ही Arya (आर्य) शब्द का उपयोग 66 बार ऋग्वेद में किया गया है, किन्तु किसी श्लोक में आर्य रेस जैसी बातों का उपयोग नहीं किया गया। भारत में हड़प्पा सभ्यता की खोज भारत में हड़प्पा सभ्यता की खोज 1921 में हुई। इसके ठीक एक साल बाद 1922 में मोहनजोदड़ो को भी खोज लिया गया। अब ध्यान देने की बात यह है। मैक्स मुल्लर ने भारत को लेकर आर्यन invasion थ्योरी 1884 में दी थी। और इसके बाद से मैक्स मुल्लर की थ्योरी को ख़त्म नहीं किया गया। इसके विपरीत और भी तरह की भ्रांतिया समाज में फैलाई गयी। निराधार तर्क पेश किये गए। आर्यों को लेकर भारत में फैलाई गई गलत जानकारी भारत में लोगों को बाँटने हेतु जितने प्रयास किये जाने थे। वो सभी किये गए। जात, नसल, क्षेत्र, धर्म, भाषा, रंग-रूप के नाम पर हर तरीके से देश के लोगो को आपस में बांटा गया फिर लड़वाया गया। लेकिन सत्य नहीं बताया गया। बिना ठोस जानकारी और प्रमाण के यह अनुमान लगा लिया गया कि, Arya बाहर से आये थे और इतिहास की किताबों में बहुत गर्व से लिखा गया। अगर सत्य पता नहीं था तो इसका यह अर्थ था कि, आप झूठ को जनता के सामने परोसोगे। उनसे यह सारी बातें छिपाओगे कि, मैक्स मुल्लर जैसे लोग पुरातत्त्ववेत्ता, इतिहास कार नहीं थे। यह केवल नावेल लिखने वाले राइटर थे। जो ऑक्सफ़ोर्ड से इंग्लिश स्कॉलर मात्र थे। भारत में अधिकतर लोगो को यह बात भी नहीं पता होगी। क्योंकि भारतीयों लोगो को इतिहास के बारे में कुछ भी सही नहीं बताया गया था। अब भी कुछ लोग सत्य को मानना नहीं चाहते दुःख इस बात का है कि, आज भी लोग इन स्वार्थी लोगो के प्रपंच समझ नहीं पाते है। उनका ब्रैनवॉश इस हद तक किया गया है कि, अगर आज आप पुरे सबूतों और तथ्यों के आधार पर इतिहास बताने की कोशिश करेंगे । वो लोग यह बात नहीं मानेंगे। उनके लिए सत्य वही है। जो एक इंग्लिश स्कॉलर ने इनको इतिहास के रूप में बताया था। ना कि वो जो आज के दुनियाभर के पुरातत्व विशेषज्ञ कह रहे है। यह ठीक वैसा ही है एक ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी का इंग्लिश टीचर एमबीबीएस का पाठ पढ़ा रहा हो, और एमबीबीएस डॉक्टर बोल रहे हो यह गलत बता रहा है, लोग एमबीबीएस से कह रहे हो तुम कुछ नहीं जानते हो वो ऑक्सफ़ोर्ड का स्कॉलर है उसे ज़्यादा पता है। द्वेष भावना ही सर्वोपरी जब किसी के प्रति द्वेष मन में घर कर जाता है फिर उसे कितना भी समझा लो, हज़ारों सबूत दे दो। उनके लिए यह सब माईने नहीं रखते । इसके बहुत से निजी कारण हो सकते है। इसलिए सत्य उनके लिए वही होगा जिसको वो स्वीकार करेंगे । राखीगढ़ी के डीएनए टेस्ट पर अध्ययन करने में विश्व की सहायक संस्थाए Department of Archaeology, Deccan College Post-Graduate and Research Institute, Pune 411006, India Department of Genetics, and Harvard Medical School, Boston, MA 02115, USA Howard Hughes Medical Institute, Harvard Medical School, Boston, MA 02115, USA Broad Institute of Harvard and MIT, Cambridge, MA 02142, USA Birbal Sahni Institute of Palaeosciences, Lucknow 226007, India Amity Institute of Biotechnology, Amity University, Noida 201313, India CSIR-Centre for Cellular and Molecular Biology, Hyderabad 500 007, India Max Planck Institute for Evolutionary Anthropology, Leipzig 04103, Germany Department of Human Evolutionary Biology, Harvard University, Cambridge, MA 02138, USA Present address: Department of Anthropology, University of California, Santa Cruz, Santa Cruz, CA 95064, USA Department of Human Evolutionary Biology, Harvard University, Cambridge, MA 02138, USA Max Planck-Harvard Research Center for the Archaeoscience of the Ancient Mediterranean, Cambridge, MA 02138, USA Department of Biomolecular Engineering, University of California and Santa Cruz, Santa Cruz, CA 95064, USA । साभार :- गूगल बाबा


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चीन की दुनिया टिकाऊ नहीं है..;- भीमसेन सैनी ,सोशल मीडिया लेखक।

नई दिल्ली / चीन | 05 Jun ,Friday 239

सोवियत संघ के पतन के बाद पेंटागन के एक उच्चाधिकारी ने कहा था कि अब हमारे स्तर का कोई शत्रु दुनिया मे नहीं रहा। लगता है, उस अधिकारी की यह अहंकार भरी बात किसी मुस्कुराते शैतान ने सुन ली थी, जिसने आज अमेरिका के सामने चीन के रूप में एक दुर्धर्ष शत्रु को खड़ा कर दिया है। चीन को इतना शक्तिशाली बनाने के पीछे भी अमेरिका ही है। जुलाई 1971 में अमेरिका के नेशनल सिक्युरिटी एडवाइजर हेनरी किसिंजर ने चीन से कूटनीति स्तर के सम्बंध स्थापित करने के लिए चोरी से चीन की यात्रा की थी, जिसके फल स्वरूप फरवरी 1972 में अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने चीन की यात्रा की थी। उस समय चाइना कम्युनिस्ट पार्टी के चैयरमेन मायो देजोंग थे। यह किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की पहली चीन यात्रा थी। सप्ताहभर चली उस यात्रा ने दुनिया के सभी देशों को चकित किया था, क्योंकि कुछ साल पहले वियतनाम ने चीन की सहायता से अमेरिका को हराया था जिसमें 50,000 अमेरिकन सैनिक मारे गए थे। कुछ भी हो इस यात्रा के बाद चीन के भाग्य के द्वार खुल गए थे। मायो ने निक्सन से कहा था कि हमारे पास सस्ते मजदूर है, और आपके पास टेक्नॉलॉजी, दोनों इसका लाभ उठा सकते है। इन दो धुरविरोधी विचारधाराओं के नेताओं के बीच इस मीटिंग को कराने के पीछे पाकिस्तान का हाथ था। इस सफल यात्रा के बाद अमेरिकन और यूरोपियन देश बहुत खुश थे। उनकी सोच थी कि उन्होंने सोवियतसंघ के सबसे तगड़े कम्युनिस्ट मित्र को अपने पाले में कर लिया है। अमेरिका से सम्बंध स्थापित होते ही चीन को यूरोप से व्यापार के दरवाजे खुलवाने में देर न लगी। पश्चिमी देशों के साथ चीन ने बड़ी सावधानी से व्यापार करना शुरू किया। व्यापार के अलावा उसने बड़ी संख्या में अपने विद्यार्थी वहाँ की यूनिवर्सिटीयों में भेजे। उनकी मशीनों की रिवर्स इंजीनयरिंग करके उस जैसी मशीने तैयार करके बेचनी शुरू की। जैसे-जैसे चीन अमीर होता गया उसने अपने देश में सड़क, रेल, बंदरगाहों का विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करता गया। मायो के बाद देश में जो भी शासक आया ली झियानियान, यांग शांगकुन, झिआंग जेमिन, हू जिंताओ या शी जिनपिंग सबने अपने एक बड़े नेता डेंग झियाओपिंग के दिए गए सूत्र पर काम किया- Hide your capabilities and bide your time. इधर चीन चुपचाप तरक्की करता जा रहा था, दूसरी ओर अमेरिका और यूरोपियन देश सोवियत संघ के पीछे पड़े थे। 1990 में उन्होंने उसका विघटन भी कर दिया। रूस को तोड़ने के बाद भी अमेरिका और उसके साथी देश नही रूके, वे इराक, अफगानिस्तान, सीरिया, लीबिया के साथ युद्धों में फँसकर अपना पैसा, सैन्य संसाधन, सैनिक बरबाद करते रहे। जबकि चीन चुपचाप उनके उच्च कोटि के संस्थानों में सेंध लगाकर उनकी टेक्नोलॉजी चुराता रहा था तथा उनसे व्यापार करके अरबों डॉलर कमाता रहा। उन दिनों चीन का एक नारा था peaceful rise of china. चीन अपनी नीति में पूरी तरह सफल रहा। उसने अपनी उन्नति के लिए कठोर परिश्रम के अलावा चालाकी, धूर्तता, दमन-प्रलोभन, तिकड़म हर नीति का सहारा लिया। कम्युनिस्टो में नैतिकता नहीं होती अतः उनके लिए वैध-अवैध कोई मायने नही रखता। दूसरे कम्युनिस्ट देश होने से चीन ने हमेशा विदेशी जर्नलिस्टों, पत्रकारों को अपने देश में एक सीमा से आगे घुसने नही दिया, जबकि प्रजातांत्रिक देशों में उसके पत्रकार, जर्नलिस्ट हर जगह घूमते रहे। इसका लाभ यह हुआ पश्चिमी देशों के पास जो भी अच्छा और सर्वश्रेष्ठ था, वह चीन के पास पहुँचता रहा। प्रजातंत्र के कारण पिछले चालीस सालों में लाखों चीनी यूरोप, अमेरिका, आस्ट्रेलिया में जा बसे, जिसमें बहुत सारे जासूस भी होंगे। इस बीच शायद ही कोई विदेशी चीन में जाकर बसा हो। चीन की उन्नति के पीछे एक राज और है, और वह है चीनीयों की जटिल सामाजिक संरचना। वे अति आत्मकेंद्रित (घूने) होते है। आप उनसे घुल-मिल नहीं सकते। उनसे कोई राज निकलवाना बड़ा मुश्किल काम है। इतिहास गवाह है, रेशम बनाने की कला चीन ने दो सौ साल छुपा कर रखी थी, जो बाद में कुछ बौद्ध भिक्षुओं द्वारा छुपाकर लाए गए रेशम के कीड़ों से दुनिया को पता चली। उनकी वृत्ति आपराधिक भी होती है, मौका मिलने पर पैसा कमाने के लिए उन्हें अपराध से गुरेज नही होता। जिस-जिस देश में चीनी पहुँचे आपराधिक गतिविधयों में भी लिप्त हुए। आज बर्मा, थाईलैंड, मलेशिया, नेपाल, कम्बोडिया केे जुआघरों, वेश्यावृति के अड्डों, ड्रग व्यापार पर चीनी अपराधियों का कब्जा है। अपराध करने में चीनी बेजोड़ होते है, अपने गैंग में वे किसी बाहरी को घुसने नही देते। कुछ दिन पहले एक रिपोर्ट पढ़ी थी जिसमें कहा गया था कि रूस के चीन सीमा से सटे शहरों में चीनी अपराधियों का दबदबा बढ़ता जा रहा है। ब्लादिवोस्टक जो पूर्वी रूस का सबसे बड़ा शहर है, उसके अपराध जगत पर पहले रूसी माफियाओं का कब्जा था। बीते कुछ सालों में चीनी अपराधियों ने अधिकतर रूसी माफियाओं को मार दिया है, बाकी भाग गए है। अब शहर के सभी अवैध धंधों पर चीनीयों का कब्जा है। इसी तरह चीनी सीमा के निकट बर्मा के कई शहर चीनीयों ने जुआघरों में बदल दिए है। बर्मा का सारा स्टोन मार्केट उनके कब्जे में है। वे अफ्रीकी देशों में चोरी से सोना निकाल रहे है। वहाँ के वन्य जीवों की तस्करी कर रहे है। इस समय चीन दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली देशो में से एक है। दुनिया के लगभग 14% व्यापार पर उसका कब्जा है तथा उसकी फैक्ट्रियाँ दुनिया का लगभग 28% समान बनाती है। दुनिया में कोई ऐसा प्रोडक्ट नही है, जो वह न बनाता हो। कुछ आंकड़ो के अनुसार यदि चीन इसी गति से निर्बाध चलता रहा तो इस सदी के अंत तक उसका दुनिया के 50 प्रतिशत व्यापार पर कब्जा हो जाएगा। आज उसके पास दुनिया की सबसे बड़ी आधुनिक सेना है, अति विशाल इंफ्रास्ट्रक्टर है। उसके नगरों की इमारतें दुनिया में सबसे चमचमाती हुई और भव्य है। उसके बैंक पैसों से लबालब भरे है, उसका फोरेक्स रिजर्व सबसे अधिक 3399 बिलियन अमेरिकन डॉलर के लगभग है। साथ ही वह दुनिया का सबसे बड़ा महाजन है। उसने 150 से अधिक देशों को 1500 बिलियन से अधिक कर्ज बाँट रखा है, जो दुनिया के सबसे बड़े वित्तीय संस्थानों वर्ल्ड बैंक और आई एम एफ के बाँटे गए कर्ज से अधिक है। जिनमें दर्जनों देश ऐसे है, जो इस कर्ज को लौटा नही पाएँगे। देर-सवेर उन्हें अपने देश की प्रभुसत्ता का सौदा चीन के साथ करना पड़ेगा। पिछले चालीस सालों में चीन ने विराट इंफ्रास्ट्रक्टर खड़ा कर लिया है। अब उसकी मंशा पूरी दुनिया में फैलने की है, जिसकी झलक उसकी सबसे महत्वाकांशी योजना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव(BRI) में दिखाई देती है। यह योजना दुनिया की सबसे बड़ी योजना है जिस पर 8 ट्रिलियन अमेरिकन डॉलर खर्च होने का अनुमान है।(भारत की GDP अभी 3 ट्रिलियन डॉलर से कम है) BRI योजना से एशिया, अफ्रीका, यूरोप, मिडिल ईस्ट और अमेरिका के 130 देश सीधे चीन से जुड़ जाएँगे। । यह योजना 2013 में शुरू हुई थी और इसे 2049 तक पूरा होना है। CPEK भी इसी योजना का हिस्सा है। कुछ देशों में जहाँ से यह सड़क गुजरी है उसके किनारे चीनी अपनी कॉलोनी भी बसाते जा रहे है। अमेरिका को यह योजना खटक रही है कहने को चीन इसे द्विपक्षीय व्यापारिक योजना बताता है पर वास्तव में वह इसे अपना माल बेचने के लिए तैयार कर रहा है। अतः दिन दूनी, रात चौगुनी गति से बढ़ते जा रहे चीन को पहला झटका डोनाल्ड ट्रम्प ने दिया। चार साल पहले डोनाल्ड ट्रम्प ने सरकार बनने के बाद चीन की संदिग्ध गतिविधियों पर ध्यान देना शुरू किया। उन्होंने पाया कि चीन और अमेरिका के टेक्निकल गैप लगभग खत्म होने के कगार पर है, इसका मतलब था कुछ सालों के बाद अमेरिका के पास कोई ऐसी टेक्नॉलॉजी नही बचेगी जो चीन के पास न हो। कई क्षेत्रों में तो चीन अमेरिका से आगे निकल गया था। अब चीन को रोकना लाजिमी था, यदि नही रोका गया तो एक दो दशक बाद चीन का सुपरपावर बनना निश्चित था। इसके लिए ट्रम्प ने दो काम किए एक तो उसने अमेरिका के संवेदनशील उच्च संस्थानों से चीनीयों को भगाना शुरू किया, जहाँ वे अमेरिका की कटिंग एज टेक्नॉलॉजी की चोरी कर चीन भेज रहे थे। दूसरे चीन से आयात किए जा रहे सामानों पर भारी-भरकम टेक्स लगाकर अपनी कमाई बढ़ाई और चीन की कम की। अभी दोनों देशों के बीच ट्रेडवार चल ही रह था कि दुनिया के सामने कोरोना वायरस का संकट आ गया। यह वायरस प्राकृतिक है या कृत्रिम यह बाद का प्रश्न है, पर यह निर्विवाद सत्य है कि इसका उद्गम चीन है। करोना वायरस ने दुनिया में जान-माल की भारी तबाही मचाई है। 195 देशों के चार लाख के लगभग लोग मर चुके है, जिनमें सबसे अधिक अमेरिकी है। सभी देशों की अर्थव्यवस्थाएँ चरमरा गई और काम-धंधे ठप्प हो गए है। कुछ अर्थ शास्त्रियों का अनुमान है कि कोरोना से दुनियाभर में 200 करोड़ लोगो का वापस गरीबी में जाना तय है, यें वे लोग है जो कुछ साल पहले गरीबी रेखा से बाहर निकले थे। इस वक्त सारे देश चीन से नाराज है, कुछ गुस्से में उबल रहे है। ऊपर से इस संकट की घड़ी में चीन का व्यवहार असंवेदनशील, मौकापरस्त, हठधर्मिता वाला रहा है। कोरोना के फैलने में उसकी गतिविधियाँ संदिग्ध है। जब अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया जैसे देशों ने उससे कोरोना की संदिग्ध जन्मस्थली वुहान लेब की जाँच करने की माँग की तो उसने साफ मना कर दिया। इस नकारात्मक उत्तर से सबको लगा कि चीन ने कोरोना को जानबूझकर फैलाया है। चीन के असहयोग भरे रवैये से अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने उसे सबक सिखाने की ठान ली। आपने किसी स्टेज वन वाले कैंसर के मरीज को देखा होगा, वह पूर्ण स्वस्थ दिखाई देता है, पर उसे नही पता होता कि वह मृत्यु की ओर उन्मुख हो चुकी है। इस समय चीन की स्थिति स्टेज वन के मरीज जैसी है। वह रोज खोखला होता जा रहा है। पिछले तीन महीनो में उसकी बहुत अर्थ हानि हो चुकी है। मार्च के प्रथम सप्ताह में उसका फोरेक्स रिजर्व 3399 बिलियनअमेरिकन डॉलर था, जो अप्रैल के अंत तक 3091 बिलियन डॉलर रह गया था। उसके बाद चीन नेआंकड़े देने बन्द कर दिए है। अनुमान है, उसका फोरेक्स रिजर्व 15 बिलियन प्रति सप्ताह की दर से गिर रहा है। दूसरे पिछले महीने यू एस सीनेट ने अमेरिकन स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टिड चीन की लगभग 800 कम्पनियों को डीलिस्टड करने का बिल पास किया है। इन्हें डीलिस्ट करने की प्रक्रिया में बहुत सारी कानूनी अड़चने आएँगी पर शुरुआत हो चुकी है। इसी प्रकार भारत और कई यूरोपीय देशों ने भी अपने स्टॉक एक्सचेंजों में चीन की FDI रोकने के लिए नियम सख्त कर दिए है। कुछ दिन पहले ही अमेरिका ने हांगकांग के साथ विशिष्ट व्यापार वाला दर्जा समाप्त कर दिया है। अकेले हांगकांग से ही चीन को सालाना चार सौ से अधिक बिलियन अमेरिकन डॉलर की कमाई होती थी। कोरोना संकट के बाद कई एजेंसी चीन की आर्थिक हानि का अनुमान लगा रही है, सबके आंकड़े अलग है। यदि सबका औसत निकाला जाए तो चीन को अब तक 1600 बिलियन अमेरिकन डॉलर का नुकसान हो चुका है। ऊपर से एक्सपोर्ट ओरिएंटेड इकोनॉमी होने और ऑर्डर न होने से उसकी बहुत सारी फैक्ट्रियाँ बन्द पड़ी है। रिसकर आती खबरों के अनुसार चीन के 8 करोड़ मजदूर बेरोजगार हो चुके है। कोढ़ में खुजली यह कि चीन से हजारों कम्पनियाँ शिफ्ट होकर अपने या दूसरे देशों में जाने की सोच रही है। कोरोना से उसकी BRI योजना भी खटाई में जाती दीख रही है। यह सब चीन के लिए बुरे सपने जैसा है। मुझे लगता है यह देश शापित है। जब भी यह अपने स्वर्णकाल तक पहुँचने को होता है, तो ऐसी गलती कर बैठता है कि इसका पतन शुरू हो जाता है। सन 1400 में चीन के पास दुनिया का सबसे बड़ा जहाजी बेड़ा था जिसे 'ट्रेजर फ्लीट' कहा जाता था। ट्रेजर फ्लीट में 3500 जहाज थे। उनमें कुछ उस समय यूरोप में बने जहाजो से पाँच गुना बड़े थे। उन जहाजो की विशालता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उनमें कुछ की लम्बाई 120 मीटर होती थी(वास्कोडिगामा के जहाज की लंबाई 19 मीटर थी) और एक जहाज में 1500 जहाजी चलते थे। जब चीन का जहाजी बेड़ा अफ्रीका में व्यापार के लिए निकलता था तो तीन सौ से अधिक जहाज एक साथ जाते थे। विशालता चीनीयों को सदैव प्रिय रही है, इतनी प्रिय की यें एक दिन चीनी इसके बोझ में दब जाते है। चीन की दीवार भी इसका उदाहरण है। इतने सारे जहाजो का खर्च और रखरखाव उनसे किए व्यापार की कमाई से आधी पड़ रहा था। यह घाटा धीरे-धीरे बढ़ता गया। परेशान होकर सन 1525 में उस समय के मिंग वंश के राजा ने पूरे बेड़े को आग लगाकर नष्ट कर दिया। यदि उस समय चीन अपनी नौ सेना का प्रयोग किसी दूसरे रूप में करता तो हो सकता है उस समय विश्व का सबसे शक्तिशाली देश बन जाता। अपनी बेवकूफी भरी हरकतों से कोरोना को पूरी दुनिया में फैलने देकर चीन ने एक बार फिर वही गलती कर दी और सुपर पावर बनने का मौका गवाँ दिया। विश्व समुदाय में उसकी छवि ध्वस्त हो गयी है। विदेशों में उसके नागरिकों को पीटा जा रहा है। दो, तीन देशो को छोड़ दे तो असज चीन अकेला खड़ा है। आश्चर्य यह कि इतनी बुरी स्थिति में भी वह पड़ोसियों से झगड़ रहा है। भारत, जापान, वियतनाम इसके उदाहरण है। लद्दाख, सिक्किम पर हमारी सेना से टकराव पैदा करके वह भारत को धमकाना चाहता है कि अमेरिका के अधिक पास न जाए जबकि अमेरिका भारत के लिए फूल मालाएँ लिए खड़ा है, दूसरे चीन देश में अस्थिरता फैलाना चाहता है, ताकि चीन छोड़ने वाली कम्पनियाँ भारत न आ पाए। वह हमसे युद्ध नही चाहता, यदि चाहता तो उसके पास डोकलाम विवाद अच्छा मौका था। तब उसका व्यापार ठीक चल रहा था, और भारत भी आज की अपेक्षा कम शक्तिशाली था। चीन को आभास चुका है कि उसके स्वर्णकाल का उत्स जा चुका है, अब उसके सामने ढलान ही ढलान है। अमेरिका और यूरोपीय देश उसके पीछे पड़ चुके है। इन देशों का व्यवहार भेड़ियों के झुंड की तरह होता है जो शिकार को थकाकर मारते है। इनके हमलें तो शुरू हो चुके है चीन के मर्मस्थलों की टोह लेना बाकी है। यदि चीन इनके सामने नही झुका तो कुछ सालों तक ही अपने को बचा पाएगा, यें चीन का शिकार करके ही दम लेंगे। सोवियत संघ के विघटन के समय सबने इन देशों का व्यवहार देखा है। यें देश अफ्रीकी देशों की तरह नही जहाँ राजनीतिज्ञों को रिश्वत देकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है। यें सब देश अपनी जनता के प्रति जवाबदेह है, देर-सवेर इस कम्युनिस्ट देश से हिसाब और वसूली करके ही मानेंगे।


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"संस्मरण"-केशरी हिन्द मंगला राय पहलवान : तारकेश्वर राय ,मंगला राय के भतीजे एवं सेवानिवृत्त कर्मचारी।

गाज़ीपुर/उत्तर प्रदेश | 03 Jun ,Wednesday 128

अब न रहे वो पीने वाले अब न रही वो मधुशाला... मल्ल शिरोमणि स्व मंगला राय के कुछ संस्मरण। मैंने सुना था कि उनके पास दारा सिंह का फिल्मो में काम करने हेतू प्रस्ताव आया था उस समय पहलवानी से सेवानिवृत्त होने के बाद की आर्थिक कठिनाईयों से बचने हेतु किन्तु उसे अपने अभिभावकों (प्रमुख रूप से अपने चाचा स्व राधा राय जी )के नाराजगी के भय से ठुकरा दिया क्योंकि सिनेमा और पहलवान एक नदी के दो किनारे मानें जाते थे उस समय ।तस्वीरो को देख के नई पीढ़ी शायद आश्चर्य करें कि ऐसे भी इंसान सही में होते थे क्या? आगे पढें मंगला राय के भतीजे श्री तारकेश्वर राय जी के शब्दों में- मेरा यह संस्मरण पिछले साल काका की मूर्ति अनावरण के अवसर पर प्रकाशित स्मारिका में छपा था ! मूर्ति का अनावरण मेरे गाँव में माननीय सांसद वीरेन्द्र सिंह मस्त ने माननीय मनोज सिन्हा जी सांसद और माननीया अलका राय विधायक की उपस्थिति में किया था ! - - - मंगला काका - - मुझसे अनुरोध किया गया है कि काका के बारे में कुछ लिखूं ! उनके बारे में इतना कुछ लिखा जा चुका है कि सब विकिपीडिया पर उपलब्ध है ! नहीं उपलब्ध है तो उनके व्यक्तिगत संस्मरण जो मात्र हम लोगों की ही अमूल्य निधियां हैं ! उनकी मल्ल कला के बारे में भी मुझे बहुत कुछ ज्ञात था परन्तु वह सब पिताजी द्वारा बताया हुआ था ! इस बारे में मैंने सन 1950 में ही जब मैं दर्जा छह का विद्यार्थी था तो अपने पिताजी ( जो उनकी प्रत्येक बड़ी कुश्ती के प्रत्यक्षदर्शी थे ) द्वारा सुनकर एक बड़ा लेख भूमिहार ब्राह्मण स्कूल ( अब झारखंडे महादेव स्कूल ) की पत्रिका में लिखा था ! उसमें उनकी सभी कुश्तियों का प्रथम्दृश्या वर्णन था ! परन्तु अब उसकी याद नहीं है ! हाँ उनके साथ बिताये अमूल्य समय की स्मृतियाँ हैं सो भी उम्र के साथ धुंधली पड़ती जा रही हैं ! मैं दर्जा नौ में था ( सन 1953 )! काका की प्रसिद्द पहलवान ग़ुलाम गौस पर विजय वाली अंतिम कुश्ती बनारस में ईश्वरगंगी के पोखरे पर हो चुकी थी और वे सदा के लिए गाँव आ गए थे ! गर्मी की छुट्टियों में प्रत्येक दोपहर और शाम को मेरी उनके साथ शतरंज की बाजी होती थी ! दोपहर में उनके दुवार की खम्भिया में और शाम को काशी के बेदा पर ! मैं उस समय नौसिखुवा ही ( काका ने ही सिखाया था ) परन्तु कुछ दिन बाद ही इतना सीख गया था कि उनको चुनौती तो नहीं पर खेल का आनंद देने लगा था ! बाद में जब मैं काशी विश्वविद्यालय गया और छात्रावास में भी शतरंज खेलने लगा तो गाँव आने पर उनको कड़ी टक्कर देने लगा ! परन्तु मुझे यह कहते हुए किचित भी संकोच नही कि मैं उनसे कभी भी जीत नहीं सका ! पुराने लोग जो कहते हैं कि स्वस्थ देह में ही स्वस्थ मष्तिष्क होता है सो झूठ नहीं! ऐसे ही उनका संगीत प्रेम भी था ! खेलते समय वे कुछ न कुछ गुनगुनाया करते थे ! उनकी एक ठुमरी मुझे आज तक याद है ! “ मुरलिया कौने गुमान भरी ! रूख तोर जानत जड़ पहिचानत, जंगल की लकड़ी ” ! गला भी कमाल का ! अनेक कलावन्तों से भी उनका व्यक्तिगत परिचय था ! मुझे याद है प्रसिद्द पद्मश्री ( कालांतर में पद्मविभूषण ) सिद्धेश्वरी देवी उनके गदा की पूजा में जोगा आई थीं ! उनके साथ प्रसिद्द तबलावादक पंडित अनोखे लाल मिश्र संगत कर रहे थे ! ऐसे ही शिवमूर्ती बहन की शादी हुई तो प्रसिद्ध नर्तक पद्मश्री शंभू महाराज नेवता पर आये थे ! हाँ, एक बात और ! उनका भतीजा होने का लाभ अपने सेवाकाल में मैंने अक्सर लिया ! आजमगढ़ में सुखदेव पहलवान और गोरखपुर में ब्रह्मदेव पहलवान के अखाड़े पर मैं जाया करता था और कर्मचारियों में मेरी प्रतिष्ठा बढ़ती थी ! ये दोनों प्रसिद्द पहलवान मेरे गाँव पर महीनों रह कर रियाज़ कर चुके थे ! स्मृतियाँ समाप्त नहीं होंगी ! धीरे धीरे याद आती हैं ! इसलिए विदा (यह उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन से सेवानिवृत्त सहायक महाप्रबंधक आदरणीय Tarkeshwar Rai के संस्मरण हैं)



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इंडियन कॉफी हाउस की कहानी ; स्मृतियां शेष हैं-- रवींद्र बाजपेयी,वरिष्ठ पत्रकार।

नई दिल्ली / मध्यप्रदेश/जबलपुर | 25 May ,Monday 203

उस दौर में कॉफ़ी हॉउस शहर का मूड तय किया करता था अब न वे बुद्धिजीवी रहे और न वह सेंटर टेबिल -आलेख : रवीन्द्र वाजपेयी दो - तीन दिन पहले व्हाट्स एप पर मेरे द्वारा चलाए जा रहे स्वच्छता अभियान के दौरान कागज पर टाईप किये हुए एक चार्ट को देखकर उसे पढ़ने का प्रयास किया तो आश्चर्य हुआ कि उसमें जबलपुर शहर के विभिन्न क्षेत्रों में चल रहे इंडियन कॉफी हॉउस के मोबाईल नम्बर के साथ सूचना थी कि 19 मई से उनके द्वारा पार्सल की होम डिलीवरी शुरू की जा रही है | शायद लम्बे लॉक डाउन के कारण हो रहे नुकसान की भरपाई के लिए उन्हें होम डिलीवरी शुरू करने पर मजबूर होना पड़ा | अभी कुछ दिन पहले ही मित्रवर Lakshmikant Sharma के एक फेसबुक पोस्ट में उन्होंने कॉफी हॉउस प्रबन्धन के मुखिया ओ.के. राजगोपाल का दर्द बयाँ करते हुए बताया कि इस सहकारी संस्था द्वारा मप्र और छत्तीसगढ में संचालित 81 और देश भर में 142 कॉफ़ी हॉउस बंद रहने से भारी नुकसान हो रहा है | इंडियन कॉफ़ी हॉउस का नाम आते ही एक पूरा अतीत मानस पटल पर उभर आता है | सत्तर - अस्सी के हलचलों से भरे हुए उन दशकों में जब जबलपुर की राजनीति के समानांतर छात्र राजनीति ने भी अपने पाँव मजबूती से जमा लिए थे , इंडियन कॉफ़ी हॉउस में ही शहर और जिले का मूड तय होता था | छात्र नेताओं के साथ राजनीतिक पार्टियों के लोग , प्राध्यापक , लेखक , पत्रकार , श्रमिक नेता और इन सबके अलावा कुछ अघोरी किस्म के लोग सुबह से रात तक इसकी कुर्सियों पर नजर आया करते थे | शहर के बीचों - बीच वाले करमचन्द चौक के कॉफ़ी हॉउस में घुसते ही जो सेंटर टेबिल थी वह बुद्धिजीवियों के उच्च सदन जैसी थी जिसकी बगल से गुजरते हम जैसे नए - नवेले वहां आसीन अनजाने व्यक्ति को भी अभिवादन करते हुए किसी दूर वाली टेबिल पर जाकर बैठते थे | वह सेंटर टेबिल थी ही ऐसी जगह जिस पर बैठे वरिष्ठजन संयुक्त परिवारों के बुजुर्गों की तरह हर आने - जाने वाले पर नजर रखते थे | उस टेबिल पर रखीं एश ट्रे से धुंआ भी बिना रुके निकलता रहता था | कॉफ़ी हॉउस से मेरा भावनात्मक लगाव इसलिए था क्योंकि मैंने छुरी - कांटे का प्रयोग करते हुए डोसा खाने और फिल्टर कॉफ़ी की शुरुवात यहीं से की थी | उस समय करमचन्द चौक के अलावा कैंट (सदर) में दूसरा कॉफ़ी हाउस था जिसका हॉल किसी राजमहल के भोजन कक्ष का एहसास करवाता है | कालान्तर में शहर के विभिन्न हिस्सों में उसकी शाखाएं खुलती चली गईं और अच्छा व्यवसाय भी कर रही हैं | लेकिन मैं जिस दौर के इंडियन कॉफ़ी हॉउस की बात कर रहा हूँ उसमें सही मायनों में भारत के बहुलतावादी समाज का असली रूप नजर आता था | कोलकाता के जिस भद्रलोक की बात करते हुए दुनिया भर में कहीं भी रहने वाला आम बंगाली आत्मगौरव की अनुभूति से भर उठता है , वही एहसास बेरोजगारी के उन दिनों में दो - तीन मित्रों को महज 4 - 5 रूपये खर्च करने के बाद हो जाता था | और यदि केवल कॉफ़ी में निबट आये तो पैसे बच भी जाते थे | दरअसल वहां चारों तरफ जो विभूतयां बैठा करती थीं उनके सामने आना - जाना ही अपने आप में महत्वपूर्ण था | उस दौर में बुद्धिजीवी ही नहीं सार्वजानिक संपर्कों में रूचि रखने वाले अनेक रईस लोग भी वहां आया करते थे | पुलिस के गुप्तचर विभाग का भी कोई न कोई करमचन्द चौक कॉफ़ी हॉउस में किसी कोने में हर समय बैठा होता था क्योंकि शहर का माहौल तो वहीं से बनता - बिगड़ता था | कुछ दूर स्थित मालवीय चौक छात्र नेता से राष्ट्रीय स्तर के नेता बने शरद यादव का अड्डा था | इसलिए भी उस कॉफ़ी हॉउस में चैतन्यता महसूस होती थी | वैसे दक्षिण भारतीय व्यंजनों के कुछ और छोटे कैफे भी शहर में थे लेकिन कॉफ़ी हॉउस का माहौल ही उसकी ख़ूबसूरती थी | उसका आकर्षण इतना जबरदस्त था कि जबलपुर से बाहर जाने पर यदि कहीं कॉफ़ी हॉउस का बोर्ड दिख जाता तो बिना कॉफ़ी पीने की इच्छा के भी वहां जाए बिना नहीं रहते | 1977 में मैं अपने दो मित्रों के साथ कश्मीर गया | श्रीनगर का लाल चौक उन दिनों देर रात तक गुलजार रहता था | वहां शर्मा जी के वैष्णों होटल में हम लोग रात का भोजन करते क्योंकि दिन तो घूमने में गुजरता था | लेकिन जिस गेस्ट हॉउस में ठहरे उसमें नाश्ता घिसा - पिटा बटर टोस्ट और चाय ही थी | एक रात लौटते समय लालचौक पर पहली मंजिल में इंडियन कॉफ़ी हॉउस का साइन बोर्ड दिख गया | उसे देखकर मानों मन की मुराद पूरी हो गई और जब तक श्रीनगर में रुके सुबह का नाश्ता कॉफ़ी हॉउस में ही हुआ | उस दौर के नेता भी किसी सितारा होटल के बजाय कॉफ़ी हॉउस में बैठना पसंद करते थे | मैंने सुन रखा था कि दिल्ली के कनाट प्लेस के कॉफ़ी हॉउस में दिग्गज नेताओं की बैठक थी | मैं भी एक दो बार वहां गया किन्तु संयोगवश नेताओं में से कोई नजर नहीं आया | एक दौर था जब देश की वामपंथी और समाजवादी राजनीतिक धारा इंडियन कॉफ़ी हॉउस से ही बहती थी | यहाँ बैठने वाले साधारण व्यक्ति या मुझ जैसे छात्र में भी बौद्धिक श्रेष्ठता का भाव सहज रूप से उत्पन्न हो जाता था | इस संस्थान के छोटे- बड़े कर्मचारी ही इसके मालिक होते हैं क्योंकि यह सहकारिता के आधार पर संचालित है | हर जगह एक सा फर्नीचर , साधारण किस्म के कप प्लेट , वेटर्स का अत्यंत मृदु व्यवहार , ताजी खाद्य सामग्री , हमेशा एक सा स्वाद और सबसे बड़ी बात उस ज़माने में ये थी कि जेब खाली होने पर भी वहां घंटों बैठा जा सकता था | एक टेबिल यूँ तो चार व्यक्तियों के लिए थी लेकिन संख्या बढ़ने पर टेबिल से टेबिल सटाकर क्षमता बढ़ाने की स्थायी सुविधा होती थी | एक तरह से इंडियन कॉफ़ी हॉउस उस समय एक अड्डा हुआ करता था लोगों से मिलने - जुलने , बतियाने और सामाजिक निकटता बढ़ाने का | कुछ ऐसे भी लोग उसमें आया करते थे जो अकेले ही होते और एक कॉफ़ी पीकर चले जाते | वहीं कुछ का समय तय होता जब वे मित्रमंडली सहित वहां आते और निश्चित समय तक बैठकर लौट जाते | जबकि कुछ ऐसे कॉफ़ी हॉउस प्रेमी भी रहे जो सुबह उसका दरवाजा खुलने से पहले ही आकर बाहर खड़े हो जाते | शहर के अनेक लोगों का पता ठिकाना c/o कॉफ़ी हाउस होता था | नियमित आने वालों के लिए लोग वहां सन्देश भी छोड़ जाते थे | इस प्रकार उस दौर का इंडियन कॉफ़ी हॉउस साधारण और असाधारण दोनों किस्म के लोगों के लिए प्रतिष्ठा का प्रतीक चिन्ह हुआ करता था | उसकी सादगी में ही उसकी संपन्नता झलकती थी | फर्श पर साधारण जूट मैट और बेहद सादी क्रॉकरी तथा फर्नीचर उसकी प्रतिष्ठा में आड़े नहीं आये क्योंकि उनका उपयोग करने वालों में नामी - गिरामी हस्तियाँ जो होती थीं | लेकिन बीते एक डेढ़ दशक में कॉफ़ी हॉउस अपने उस परम्परागत स्वरूप और पहिचान को बरक़रार नहीं रख सके | कुछ में होटल भी साथ जुड़ गये | दक्षिण भारतीय के अलावा भी वहां अन्य व्यंजन उपलब्ध हैं , थाली सिस्टम भी आ गया | अधिकतर कॉफ़ी हाउसों में अब पहले जैसा बौद्धिक समागम कभी - कभार ही दिखता है | हालांकि ऐसे अनेक मित्र हैं जो आज भी कॉफ़ी हॉउस जाये बिना नहीं रह सकते | मैं भी करमचंद चौक वाले कॉफ़ी हॉउस में यदा - कदा चला जाता हूँ लेकिन उसका पूरा आकार - प्रकार ही उलट - पुलट हो गया | यद्यपि अब वहाँ परिवार सहित आने वाले बेतहाशा बढ़ गये हैं लेकिन जिस सेंटर टेबिल का जिक्र मैंने किया वह इतिहास बन गयी है | कैंट ( सदर ) वाले कॉफी हॉउस में भले ही ज्यादा बदलाव नहीं हुआ लेकिन अब वह रेस्टारेंट ज्यादा लगने लगा है | जिस वजह से वहां होने वाला एहसास भी गुम होकर रह गया | शायद बदलते समय की जरूरतों और व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा के कारण कॉफ़ी हॉउस में भी बदलाव हुए , लेकिन जिस तरह बीते जमाने की सुपर हिट ब्लैक एंड व्हाईट क्लासिक फिल्म को रंगीन बनाकर दोबारा प्रदर्शित किये जाने पर भी वह अपने दौर के दर्शकों तक को नहीं खींच सकीं , वही मुझे कॉफ़ी हॉउस के मौजदा स्वरूप को देखकर प्रतीत होता है | यद्यपि आज भी वहां का स्वाद और कर्मचारियों का संस्कार अपरिवर्तित है किन्तु अड्डेबाजी वाला वातावारण और उसकी रौनक बने रहने वाली शख्सियतें उस ज़माने जैसी तो नहीं दिखतीं | बावजूद इसके अनेक बुद्धिजीवी आज भी वहां जाने का मोह नहीं छोड़ सके लेकिन अब इन्डियन कॉफ़ी हॉउस शहर की हवा का रुख तय नहीं करता | और यही कमी कम से कम मैं तो महसूस करता हूँ।



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