बड़ी खबरें
>> वर्तमान सांसद लल्लू सिंह ही हैं भाजपा के सबसे सूटेबल प्रत्याशी>> भारत-पाक बॉर्डर पर तनाव के बीच पीएम मोदी कर रहे हैं हाई लेवल मीटिंग>> सनातन धर्म के प्रति युवाओं में बढ़ रही भ्रांतियों को दूर कर रहा भगवान परशुराम अखाड़ा : सुदर्शन जी महाराज>> दिव्य ज्योति जागृति संस्थान में महाबुद्ध अवतरण समाधि ज्ञान का अद्भुत संगम >> सीबीआई बनाम ममता बनर्जी में सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार को दिया झटका ।कमिश्नर सीबीआई के सामने हाज़िर हों।>> समकालीन समाजवादी धारा का सबसे बङा व्यक्तित्व जार्ज फर्नांडीज का हुआ निधन>> नही रहे जार्ज फर्नांडीज, पर यादों मे हमेशा रहेंगे: दयानंद पांडेय>> वंदेमातरम पर कीचङ से निकली कमलनाथ सरकार>> प्रधानमंत्री मोदी के आज के इंटरव्यू से 2019 की राजनीति का हुआ आगाज>> दलाल मिशेल के बयान मे अगस्ता वेस्टलैंड कि ड्राइंविंग फोर्स कौन है?      

ताज़ा लेख

सनातन धर्म के प्रति युवाओं में बढ़ रही भ्रांतियों को दूर कर रहा भगवान परशुराम अखाड़ा : सुदर्शन जी महाराज

प्रयागराज | 25 Feb ,Monday 21

कुम्भ नगर: सुदर्शन महराज राधा कृष्ण सेवा संस्थान(न्यास) चंदौली के चाणक्य पीठाधीश्वर सुदर्शन महराज ने देश के युवाओं में सामाजिक समरसता बनाये रखने हेतु भगवान परशुराम अखाड़े का निर्माण किया है। इस अखाड़े का उद्देश्य युवाओ में बढ़ रही धर्म और समाज के प्रति भ्रंतियों को दूर करना है और साथ ही सामाजिक समरसता का प्रादुर्भाव करना है। महराज श्री ने अपने शिविर में जगदगुरु शंकराचार्य नरेन्द्रानन्द और जगदगुरु शंकराचार्य वशुदेवानंद सरस्वती के सानिध्य में इस अखाड़े की नींव रखी। महराज अपने शिविर में विगत कई वर्षों से समाज के बुद्धजीवियों और समाजसेवियों के साथ संगोष्ठी करते आये है।इसी क्रम में आज संस्थान के शिविर में अभिनन्दन समारोह का आयोजन किया गया। संस्थान के शिविर में अनेकों धर्म संगत कार्य किये जाते हैं शिविर में विगत 13 जनवरी से 23 फरवरी तक अन्य क्षेत्र चलाया गया जिसमें लगभग 5000 श्रद्धालुओं ने प्रतिदिन भोजन प्रसाद ग्रहण किया ।


पूरा लेख पढ़ें
दिव्य ज्योति जागृति संस्थान में महाबुद्ध अवतरण समाधि ज्ञान का अद्भुत संगम

प्रयागराज | 15 Feb ,Friday 18

प्रयागराज। उपेक्षा, उपहास, विरोध और अंततः स्वीकृति ,सत्य को सदैव चार चरणों से गुज़रना पड़ता है । उसे स्थापित होने के लिए एक लम्बे संघर्ष का सामना करना ही पड़ता है। उक्त कथन कथन गुरुदेव आशुतोष महाराज अपने प्रवचनों में कहा करते है। इसी मंतव्य को भगवान बुद्ध के जीवन चरित्र के माध्यम से कुम्भ मेला, प्रयागराज में डीजेजेएस द्वारा प्रस्तुत किया गया। जिसे स्कूल एवं कॉलेज के छात्र- छात्रों द्वारा विशेष रूप से सराहा गया। महात्मा बुद्ध के सामने सत्य के प्रचार प्रसार में आयी चुनौतियों को बहुत प्रभावशाली तरीके से नाटिका के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। उनके मार्ग की सबसे बड़ी रूकावट कोई और नहीं अपितु स्वयं उनका चचेरा भाई देवदत्त था। एक समय जब महात्मा बुद्ध कुछ समय के लिए संघ से बाहर गए उस समय उसने संघ के भिक्षुओं को बहला फ़ुसला कर संघ विभाजन का असफल प्रयास किया था। केवल इतना ही नहीं उसने एक आक्रामक हाथी भेजकर बुद्ध को मारने का प्रयास किया तथापि बुद्ध के निकट पहुंच उनके प्रभाव के आगे वो हाथी बिल्कुल शांत हो गया। अंत में जाके देवदत्त ने महात्मा बुद्ध को गुरु स्वीकार करते हुए आध्यात्म का मार्ग अपनाया। इस नाटिका को सार रूप में साध्वी परमा भारती ने बताया कि वर्तमान समय में आशुतोष महाराज एवं उनके शिष्यगण ठीक इसी तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। आज डीजेजेएस ने भगवान बुद्ध की ही भांति इस अनमोल निधि ब्रह्मज्ञान का प्रचार प्रसार के साथ अज्ञानता के विरूद्ध एक आध्यात्मिक क्रांति का बिगुल बजाया है। अथाह विरोध के उपरांत भी महाराज की ये गहन समाधि इस महान लक्ष्य के प्रति उनके समपर्ण का प्रमाण है। उनका सम्पूर्ण जीवन समर्पित है धूं- धूं जलते इस विश्व को आध्यात्म की शीतल फुहारों से सींचने में। आज के समय में जहाँ व्यक्तिगत स्वार्थ पूर्ति के लिए हर कार्य किये जा रहे हैं यह कथन अतिश्योक्ति के समान प्रतीत होता है। केवल एक ब्रह्मनिष्ठ गुरु के जीवन में आने के बाद इंसान का दिव्य चक्षु जब खुलता है तभी वहजीवन की वास्तविकता को समझ आत्म उन्नति की ओर अग्रसर हो पाता है। साध्वी ने आह्वान किया उन सभी जिज्ञासुओं का जो इस ब्रह्मज्ञान को प्राप्त कर आध्यात्म की ओर अग्रसर होना चाहते है।


पूरा लेख पढ़ें
जनसत्ता और पत्रकारिता की प्रारंभिक कथा; आलोक शर्मा,वरिष्ठ पत्रकार।

नई दिल्ली/जयपुर | 14 Mar ,Thursday 13

# पत्रकारिता का एक अनुभव यह भी एक मित्र लेखिका ने अपना एक आलेख अपनी वाल पर शेयर किया। वहां एक विद्वान वामी साथी की प्रतिक्रिया थी - "बढ़िया आलेख है, पर क्या जम्मू-काश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों विशेषकर मणिपुर और असम की जनता से कोई बातचीत की थी आपने? इन्टरनेट पर सर्च किया था कि कहां-कहां सेना ने दया दिखाई महिलाओं पर? इस तरह के आलेख भावुक होकर नहीं शोध करके लिखे जाएं, तो ज्यादा प्रमाणिक होंगे।" (विद्वान वामी ने कश्मीर को 'काश्मीर' और प्रामाणिक को 'प्रमाणिक' ही लिखा था, अतः इसे कृपया मेरा अज्ञान नहीं मान लें। मैंने बस, जस का तस रहने दिया है।) बात पते की है, लेकिन आलेख एक बचकाने भाषण के प्रतिवाद में लिखा गया था, अतः जो सबके सामने है, वही वर्णन उसमें था। प्रतिक्रिया की भी प्रतिक्रिया में पूछा जा सकता है कि भाषणबाज़ ने क्या सीमाओं को कभी देखा है, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों विशेषकर मणिपुर और असम में तैनात सैनिकों से बात की है। वे वहां किन परिस्थितियों में रहते हैं, कभी यह जानने की कोशिश की है? लेकिन जाने दीजिए, इसलिए कि भाषण का मंतव्य जो था, उसके लिए इस गहन शोध की नहीं, एक विशेष नज़रिए की आवश्यकता है। ठीक उसी तरह एक अख़बारी आलेख और एकेडमिक शोध में भी अंतर है। मेरे ख़याल से विद्वान साथी से समझने में यही चूक हुई और यह चूक कोई नादानी में नहीं हुई थी, एक सोची-समझी शातिराना चाल के साथ जान-बूझ कर की गई थी, इस पर मैं सुनिश्चित हूं। ख़ैर, लेकिन इससे मुझे एक बहुत पुरानी घटना स्मरण हो आई। 'जनसत्ता' शुरू होने वाला था। विज्ञापन देख कर मैंने भी उप संपादक पद के लिए आवेदन भेज दिया। आवेदन के साथ एक से डेढ़ हज़ार शब्दों का एक आलेख किसी भी करेंट टॉपिक पर मांगा गया था। तब 'असम समस्या' चरम पर थी, अतः इसी विषय पर तक़रीबन चौदह सौ शब्दों का एक आलेख लिख कर मैंने अपने परिचय के साथ संलग्न कर दिया था। कुछ समय बाद साक्षात्कार के लिए बुलावा आ गया। मैं दिल्ली पहुंचा। गेट पर ही एक सरदार जी के दर्शन हुए। मैंने उनसे पूछ लिया कि इंटरव्यू किस तरफ़ चल रहे हैं। बस, ग़ज़ब हो गया। अब मेरे सामने अज़ब तमाशा था। उनका श्रीमुख ऐसे खुला, जैसे किसी बोलने वाली मशीन का बटन दब गया हो और गलती से उसकी स्पीड कई गुना कर दी गई हो। उनके दोनों हाथ बोलने की गति के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे, सारा शरीर थिरक रहा था या कहें कि वे उछल-कूद रहे थे और मैं हक्का-बक्का उन्हें देख रहा था। संभवतः वे मुझे अपना अंग्रेज़ी ज्ञान जता रहे थे, लेकिन मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था। इस तरह तो अगर कोई हिन्दी बोले, तो वह भी समझी न जाए। मैंने कुछ देर सहन किया, फिर जोर से कहा - 'हप्प', और बिना यह देखे कि उनकी गति क्या हुई, आगे बढ़ गया। निश्चय ही वे भी मेरी तरह ही हक्का-बक्का हुए कुछ देर तो खड़े रहे ही होंगे, क्योंकि सभी हमारी ओर ही देख रहे थे। उनमें से कुछ बेसाख़्ता हंस दिए और कुछ मुस्करा उठे। कुछ ही देर में मैं ठिकाने पर पहुंच गया और बुलावा आने पर साक्षात्कार कक्ष में प्रवेश किया। यह दूसरा मौक़ा था, जब एक बार फिर हक्का-बक्का होना पड़ा। लगा जैसे गलती से मैं बॉलीवुड के किसी विलेन के अड्डे पर आ गया हूं। कमरे में घुप्प अन्धेरा था। दिखाई दिया कि लगभग दस फीट दूर एक धीमी रोशनी का बल्ब काफी नीचे लटका हुआ था। उसके ठीक नीचे एक कुर्सी रखी थी। बाक़ी क्या है, कुछ है भी या नहीं, यह अंधेरे में खोया हुआ था। किसी कुएं से आती लगी एक आवाज़ ने कुर्सी पर बैठने का हुक्म दिया और इंटरव्यू शुरू हुआ। आवाज़ों के अंतर से स्पष्ट हो गया कि वहां कई लोग मौजूद थे। बाक़ी सब तो जाने दें, क्योंकि मुझे अनुमान हो गया था कि अपना सलेक्शन होगा नहीं, अतः मैं खीझ में था और उस घुटन से शीघ्र बाहर आना चाहता था। उनमें से एक सज्जन ने मुझे यह मौक़ा दे दिया। पूछा - "आपने आलेख अच्छा लिखा है? क्या कभी असम गए थे। कैसे लिखा?" मैंने कहा - "यह तो रेफ़रेंसेज से लिखा गया है।" अब वे व्यंग्यात्मक स्वर में बोले - "ओह, तो आप रेफ़रेंसेज से लिखते हैं।" मैंने अंधेरे में आंखें गढ़ा दीं और ठीक उसी सुर में बोला - "आप जो दुनियाभर, उसके लोगों और उनकी समस्याओं पर लिखते हैं, क्या सभी जगह गए हैं? सब से मिले हैं?" "सवाल नहीं, सवाल हम पूछेंगे," उधर से आवाज़ आई। मैं उठ खड़ा हुआ। दोनों हाथ जोड़े। कहा - "नमस्कार," ... और चला आया। मेरे बाहर निकलने तक अंधेरे से खुसर-पुसर की ध्वनि शुरू हो चुकी थी। आज मैं सोचता हूं कि अच्छा हुआ कि मेरी नियुक्ति वहां नहीं हुई, वरना संभव है कि मैं भी इन दिनों सोशल मीडिया में सक्रिय वहां के कुख्यात 'ब्लॉकबाज़ दलाल' के प्रतिरूप में तब्दील हो चुका होता। 🤔 --------------------------------- यह स्मृति लगभग तीन वर्ष पूर्व लिखी गई थी। तब इसमें महिला मित्र और विद्वान साथी के शुभनाम भी थे, लेकिन अब दोनों ही मुझे अनफ्रेंड कर गए हैं, अतः इस टिप्पणी को उसी रूप में पुनर्प्रस्तुत करना मुझे उचित नहीं लगा। इसलिए मैंने इसे कुछ संशोधित कर दिया और शेयर करने के बजाय यह एक नए रूप में आपके सामने है। रसास्वादन कीजिए।



पूरा लेख पढ़ें
भारत मे मुसलमान ;वैचारिकता व व्यावहारिक रणनीति की पङताल-- वरिष्ठ व वयोवृद्ध लेखक भगवान सिंह

भारत/नई दिल्ली | 30 Dec ,Sunday 49

देश, धर्म और राष्ट्र आप मुसलमानों के साथ प्रेम से नहीं रह सकते। मित्र बनकर भी नहीं रह सकते। वह अपनी सदाशयता दिखाते हुए मनोवैज्ञानिक रूप से आप पर हावी होने का, अपनी सोच, अपने विचार, अपनी रुचि के अनुसार आप को ढालने का प्रयत्न करेगा। यदि दो हैं तो एक को दब कर रहना या दबाकर रखना ही पड़ेगा। यदि प्रकृति में भिन्नता है तो दो या अधिक, बराबरी पर नहीं रह सकते। ऐसा करते हैं, तो नुकसान में रहेंगे। यह मेरा कहना नहीं है। मुसलमानों में वे लोग जिन्होंने अपने समाज को दिशा दी उनका कहना है: It is necessary that one of them should conquer the other and thrust it down. To hope that both could remain equal is to desire the impossible and the inconceivable. (सर सैयद. मेरठ, 1888) .. if the Muslims want to live in this country, they must understand religion to be a merely private affair which should be confined to individuals alone. Politically they should not regard themselves as a separate nation: they should rather lose themselves in the majority. इकबाल. पू., 305 "Hindus and Muslims belong to two different religious philosophies, social customs and literary traditions. They neither intermarry nor eat together, and indeed they belong to two different civilisations which are based mainly on conflicting ideas and conceptions." ( जिन्ना. लाहौर, 1940) मोहम्मद अली जिन्ना ने एक दूसरे अवसर पर यह भी कहा था कि “हिंदुओं के नायक हमारे खलनायक हैं और हमारे नायक उनके खलनायक।” यह मात्र लफ्फाजी नहीं है, कठोर सच है। इसे आज भी काम करते देख सकते हैं। पहल भले ही किसी ने की हो, पर्दे के पीछे प्राम्प्ट करने वाला कौन था, यह जानते हुए भी, इस सचाई को मुस्लिम नेताओं ने ही नहीं माना, हिंदू नेताओं - भाई परमानंद, सावरकर, गोलवलकर - ने भी इसे स्वीकार किया। अंग्रेजी कूटनीतिज्ञों की चाल को भांपते हुए इस जाल से निकलने और आपसी भाईचारा कायम करने की वकालत करने वालों को पाखंडी, कांइया और अविश्वसनीय ठहराया जाता रहा। दोनों की दृष्टि में अंतर यह नहीं था इनमें से कोई हिंदू और मुसलमान के भेद को नहीं मानता था या उनकी निजता का सम्मान नहीं करता था। परंतु दार्शनिक समझे जाने वाले शब्दजीवी अपने ही समुदाय को गुमराह करने के लिए, वाक्यों को तोड़-मरोड़ कर यही समझा रहे थे: The Maulana has not realised that by offering his interpretation he has put before the Muslims two wrong and dangerous views. First, that the Muslims as a nation can be other than what they are as a millat. Secondly, because as a nation they happen to be Indian, they should, leaving aside their faith, lose their identity in the nationality of other Indian nations or in "Indianism". It is merely quibbling on the words qaum and millat. इकबाल,305 **** He (Nehru) thinks wrongly in my opinion, that the only way to Indian Nationalism lies in a total suppression of the cultural entities of the country through the inter-action of which India can evolve a rich and enduring culture. वही, 215 अंतर केवल यह था की एक का मानना था कि मजहबी और सांस्कृतिक भिन्नताएं होते हुए भी साथ साथ रहा जा सकता है। जबकि दूसरे कहते थे ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि वे मजहब को राजनीति से अलग नहीं कर सकते। ...the majority community in this country and its leaders are every day persuading the Indian Muslims to adopt, viz. that religion and politics are entirely separate, and if the Muslims want to live in this country, they must understand religion to be a merely private affair which should be confined to individuals alone. Politically they should not regard themselves as a separate nation: they should rather lose themselves in the majority. व्यक्तित्व को मिटा कर, मतों को मिटा कर एक करने और झुंड में बदल जाने का आग्रह स्वयं इकबाल करते है: 1. मिटा दे अपनी हस्ती को अगर तू मर्तबा चाहे। 2. तू बचा बचा के न रख इसे तेरा आईना है वह आईना। कि शिकस्ता हो ताे अजीजतर है निगाहे आईनासाज में।। 3.The second evil from which the Muslims of India are suffering is that the community is fast losing what is called the herd instinct. पू. 27 अपने ही समाज को भीड़ में बदलने वालों से उसका क्या भला हो सकता है? वास्तविकता यह है कि जो मुस्लिम नेता अलगाव की बात पर अडे़ थे वे भी इस सच्चाई को अस्वीकार नहीं कर सकते थे कि दोनों का एक साथ रहना संभव है। उदाहरण के लिए सर सैयद अहमद दो कौमों की बात करते हुए, केवल अपनी कौम की तरक्की की बात सोचते थे। जिस रईस वर्ग की चिंता उनको थी, वह अपनी जमीन जायदाद छोड़ कर किसी पराए देश में जाने को तैयार नहीं हो सकता था, इसलिए उसके लिए देश को बांट कर रहना कल्पनातीत था। मुस्लिम लीग ऐसे ही रईसों के हित की चिंता करते हुए स्थापित हुई थी इसलिए उसकी कार्य योजना में भी बंटवारे की बात नहीं आ सकती थी। चिंता अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के कारण अवश्य थी। जब मोहम्मद इकबाल भारतीय संघ में ही मुस्लिम बहुल राज्यों को स्वायत्तता देने की बात करते थे, तो उसमें यह निहित था कि वहां अल्पसंख्यक हिंदुओं को उसी तरह की असुविधा का सामना करना पड़ेगा, जिसका अंदेशा उन्हें अविभाजित देश में था, और शेष हिंदुस्तान में अल्पसंख्यक होने के बावजूद मुसलमानों को बहुसंख्यक हिंदुओं के साथ रहना ही था। जिन्ना ने पाकिस्तान बनने के बाद अपने भाषण में जब कहा था, आप सभी यहां स्वतंत्र हैं। जिस को मंदिर जाना है वह मंदिर जाए, जिसे मस्जिद जाना है मस्जिद में जाए। किसी पर कोई रोक नहीं है। अर्थात् हिंदू मुसलमान एक साथ अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक होने के बाद भी शांति और सम्मान से रह सकते हैं। इसलिए यह दावा ही मूर्खतापूर्ण था कि अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक, या हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते। ऐसी दशा में विभाजन के लिए जिद पालने वाले सिरफिरे लोग थे, यह भी उन्होंने ही सिद्ध किया। उनके ही प्रयोग से यह सिद्ध हुआ कि मुसलमानों के बहुमत के बाद, किसी दूसरे धर्म का व्यक्ति ही नहीं, दूसरे मत का मुसलमान भी शांति और सम्मान से नहीं रह सकता। दूसरी भाषा बोलने वाला शांति से नहीं रह सकता। मुस्लिम समाज में, अंत:कलह की प्रवृत्ति इसकी बुनियाद में ही पड़ी हुई है, इसलिए अल्पसंख्यक होते हुए भी, वह केवल मुसलमान के होने के कारण एक राष्ट्र नहीं हो सकता। इसके विपरीत हिंदुस्तानी होने के कारण, सभी मिलकर अपने भेदभाव को दरकिनार करते हुए, राष्ट्र के रूप में संगठित हो सकते हैं और पूरी स्वतंत्रता के साथ, ससम्मान रह सकते हैं , उसी प्रयोग से सिद्ध हुआ। केवल कांग्रेस के साथ जुड़ा हुआ राष्ट्रीय विशेषण राष्ट्रीयता का सूचक हो सकता था, और उन संकीर्णताओं से भी मुक्त रह सकता था, जो धर्म या नस्ल की एकता को आधार बनाने के कारण यूरोपीय राष्ट्रवाद में अपरिहार्य हो जाती हैं। मुस्लिम राष्ट्रवाद और हिंदू राष्ट्रवाद, दोनों राष्ट्र विरोधी संकल्पनाएं हैं और इसलिए सच्ची राष्ट्रीयता हासिल करने में बाधक हैं। राष्ट्रीयता एक नई संकल्पना है, परंतु यह भावना अनंत काल से चलती आ रही है। इसको पूंजीवाद ने अपने लिए सबसे सस्ती दर पर, अधिकतम निष्ठा के साथ, अपनी प्रतिभा, शक्ति, यहां तक कि जीवन समर्पित करते हुए काम करने के लिए काम में लाया । इसका जातक ही कुटिलता पूर्ण था और इसकी परिणति भी पूंजीवादी, विस्तारवादी, साम्राज्यवादी आकांक्षाओं की प्रतिस्पर्धा के कारण विध्वंसकारी रही। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत करके किसी देश की बिखरी हुई ऊर्जा को एकजुट करते हुए उच्चतम संभावनाओं और लक्ष्यों को प्राप्त करने में लगाई जाए। कांग्रेस के नाम के साथ राष्ट्रीय शब्द जुड़ा हुआ था, परंतु वह शिक्षित मध्यवर्ग की लालसाओं की पूर्ति के लिए प्रयोग में लाया जा रहा था और यद्यपि इसने स्वतंत्रता को भी अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान लिया था, पर बिखरी शक्तियों को जोड़ने का और इसे एक जनआंदोलन में बदलने का काम गांधी ने ही किया। भारत में राष्ट्र की चेतना पैदा करने वाले को, राष्ट्रपिता की संज्ञा देने वाला उसके लिए सही शब्द का प्रयोग कर रहा था। शायद इसका प्रयोग सुभाष चंद्र बोस ने किया था जैसे महात्मा का विरुद गुरुदेव ने दिया था। राष्ट्र की गलत समझ रखने वालों ने तो उन्हें केवल गालियां दी हैं, वे मुस्लिम राष्ट्रवादी हों, या हिंदू राष्ट्रवादी। संकीर्णता विराटता को नहीं समेट सकती। राष्ट्रीयता किसी भूभाग में बिखरे हुए शक्ति पुंजको जोड़ती है, बिखराव पैदा नहीं करती। अलगाव और बिखराव पैदा करने वाले, शक्तिपुंजों को किसी लक्ष्य की सिद्धि के लिए एकाग्र करती है । यह लक्ष्य ऐसा होता है जिससे सभी को किसी न किसी रूप में राहत मिलती है, या सभी किसी दूसरे रूप में लाभान्वित होते हैं। यही उन्हें उस त्याग और बलिदान के लिए मानसिक रूप में तैयार करता है। भारत के सामने लक्ष्य था विदेशी दासता से मुक्ति, जिससे सबका लाभ था, क्योंकि इसके कारण ही कारीगरों और मजदूरों को कामकाज और लाभ के अवसर से वंचित होना पड़ा था। इसके कारण ही मुसलमानों को दुर्गति का सामना करना पड़ा था और हिंदुओं को धार्मिक आधार पर पहले के भेदभाव से मुक्ति तो मिली थी, परंतु पूरे देश का आर्थिक दोहन हो रहा है इसकी समझ केवल उनके पास थी। इसे न समझ पाने के कारण तात्कालिक लाभ के लिए चिरकाल तक अंग्रेजों का गुलाम बने रहने का विकल्प चुनने वाले भावातुर मूर्ख थे, यह कहना सही तो होगा पर इसके परिणाम सही नहीं होंगे। राष्ट्रीयता का आधार मजहब नहीं हो सकता। यदि होता तो पूरा यूरोप एक राष्ट्र होता। भाषा नहीं हो सकती। होती तो ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका, आस्ट्रेलिया एक राष्ट्र होते। एक शासन तो हो ही नहीं सकता , अन्यथा ब्रिटिश साम्राज्य का एक राष्ट्र होता। विकलन पद्धति से, जो ही वैज्ञानिक पद्धति है, हम अंततः जिस एक तत्व पर पहुंचते हैं, वह है देश। यह देश की सभी समस्याओं का समाधान नहीं है, अपितु ऐसे लक्ष्य की प्राप्ति है जिससे तात्कालिक रूप में सभी को किसी न किसी रूप में लाभ होगा और बाकी समस्याएं साधनों के अपने हाथ में आ जाने के बाद अधिक आसानी से सलटा सकेंगे। अपनी समस्याओं का हल दुश्मनों के हाथ में सौंपना उनके हाथ का खिलौना बनना है। गांधी की यह समझ थी और इस कसौटी पर गांधी सही सिद्ध हुए। धार्मिक भावनाएं भड़का कर, भावना को दिमाग समझने वाले बुनियादी समस्याओं और अनुषंगिक समस्याओं के बीच भेद करने की योग्यता नहीं रखते थे। उन्होंने राष्ट्रीयता के सबसे महत्वपूर्ण घटक देश को ही दिमाग से ओझल कर दिया। जिनके पास, ठोस जमीन थी, वे होश हवास खो कर हवा में किले बनाने लगे: मुस्लिम हैें हम वतन है सारा जहां हमारा। और मुस्लिम देशों में भी उनको हिंदी के रूप में पहचाना जाता है। हिंदी थे तुम वतन था हिंदोस्तां तुम्हारा। आखिर दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश आज भी हिंदुस्तान ही है जिसे तुम्हारे विश्वासघात के कारण हिंदुस्थान कहने वालों से तुम्हें डर लगता है।



पूरा लेख पढ़ें