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गोविंदाचार्य : स्वदेशी विचारक से 'प्रकृतिपुरुष' तक; रूपेश पांडेय,स्वदेशी चिंतक एवं लेखक

उत्तराखंड/उत्तरप्रदेश/काशी | 24 Sep ,Thursday 7466

प्रकृति पुरुष गोविंदाचार्य  प्रकृति केंद्रित समाजनीति, राजनीति और अर्थनीति के सिद्धांतकार के. एन. गोविंदाचार्य क्या अब प्रकृति पुरुष की भूमिका में आगये हैं | प्रकृति पुरुष के लक्षण और पहचान क्या हैं | क्या गोविन्द जी में लक्षण विद्यमान हैं | यह कोई सवाल नहीं है | पड़ताल है |  प्रकृति पुरुष, प्रकृति का नियंता नहीं होता | वह सिर्फ प्रकृति संवाद का संवाहक और व्याख्याकार होता है | या कहें कि प्रकृति केंद्रित जीवन का प्रेरणा पुरुष होता है | वह प्रकृति के जिवों और जिवेत्तर रचनाओं के बीच तालमेल का पोषक होता है | जो यह बताता है कि समस्त प्रकृति सिर्फ मानव ही नहीं, मानवेत्तर जिवों के जीवन से परिपूर्ण है |  प्रकृति पुरुष, लोकनायक नहीं होता | वह सिर्फ लोक की संवेदनाओं को सम्प्रेषित करता हुआ स्पंदित करता है | यह स्पंदन ही उसे लोकग्राही और लोकव्यापी बनाता है | जब समाज, राजनीति और अर्थ सत्ता सिर्फ मानव केंद्रित होकर प्रकृति के शोषण और विनाश की रचना करते हैं, तब प्रकृति पुरुष मानवेत्तर जिवों को लोकापेक्षी बना कर प्रकृति संरक्षण की योजना बनाता है |  अपने अध्ययन अवकाश के पिछले दो दशकों की यात्रा में गोविंदाचार्य कुछ ऐसी ही भूमिका में नज़र आ रहे हैं | वे वे जन की बात कर रहे हैं | जल की बात कर रहे हैं | जंगल की, ज़मीन और जानवर की बात कर रहे हैं | वे जन, जल, जंगल, ज़मीन और जानवर को एक-दूसरे का पूरक और पोषक बता रहे हैं | जब वे ऐसा कह रहे होते हैं तो पद और प्रतिष्ठा की तमाम विप्लवी अपेक्षाओं से मुक्त दिखाई देते हैं |  संभव है कि हममे से बहुतों ने कभी गोविंदाचार्य को एक पौध रोपते हुए न देखा हो लेकिन उनकी प्रेरणा से देश भर में हज़ारों लोगों ने लाखों पौधे रोपे हैं | उनका संरक्षण किया है | वे पौध रोपण के लिए जन को जंगलमुखी बनाते हैं | वे स्वयं कोई गाय या पशु नहीं पालते लेकिन उनकी प्रेरणा से सैकड़ों लोगों ने खुद को गौ सेवा के लिए समर्पित कर दिया | ऐसा जान पड़ता है जैसे गोविंदाचार्य करोड़ों गऊ माताओं के आशीर्वाद की शक्ति से अभिसिंचित हो प्रकृति केंद्रित राजनीति के लिए देश को मथ डालने हेतु बेचैन हैं | गोविंदाचार्य के पास अपनी एक इंच भूमि नहीं है लेकिन वे धरती माता के ऐसे वरदपुत्र दिखाई देते हैं जिनके खेती के विचारों को सुनकर हजारों किसानों ने स्वदेशी, अहिंसक और कर्ज मुक्त-खर्च मुक्त खेती को ही अपने जीवन का आधार बना लिया है | जल संरक्षण के लिए गोविंदाचार्य ने किसी नदी, तालाब या पोखर को बचाने के लिए कभी प्रोजेक्ट का धंधा नहीं किया लेकिन वे गंगा के धवल पुत्र की तरह पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक लोक मानस में प्रतिष्ठित हैं |  जन, जल, जंगल, ज़मीन और जानवर के अस्तित्व की बात करते हुए गोविंदाचार्य देश की राजनीति को मानव केंद्रित की बजाय प्रकृति केंद्रित बनाने की सदिच्छा से भ्रमण कर रहे हैं | वे प्रकृति केंद्रित राजनीति की प्रेरणा से कार्य कर रहे देशभर के तमाम आंदोलनकारी समूहों के बीच सेतु-समन्वय के अनुगामी बने हुए हैं | वे अपनी समझ और संसाधन के बल पर कार्य करने वाली उन तमाम संस्थाओं को "भारत विकास संगम" के रूप में मंच प्रदान करते हैं जिन्हे सरकार के नहीं समाज के संरक्षण की जरूरत होती है | वे गांव और गाय को केंद्र में रखकर देश के आधार को मजबूत करने वाले किसानों-कारीगरों को सभ्यता की नींव का पत्थर बनाने में सक्रीय हैं |  77 की अवस्था में जब एक साधारण मनुष्य राम नाम की माला जपकर जीवन पूरा करने की कल्पना करता है तो उसी अवस्था में बेहद सामान्य सी काया के गोविंदाचार्य राम नाम को सभ्यता का हथियार बनाकर लोक को राममय बनाने की प्रेरणा से देशभर में भ्रमण कर रहे हैं | ऐसी साधारण काया के प्रकृति पुरुष गोविंदाचार्य को गंगा माता, गऊ माता, गायत्री माता और धरती माता का आशीर्वाद मिले इसी कामना के साथ उन्हें प्रणाम करता हूं |  (रुपेश पाण्डेय )



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पुण्यतिथि पर अटल जी की स्मृति : मनमोहन शर्मा ,वरिष्ठ पत्रकार एवं अटल जी के साथी

नई दिल्ली/भारत | 16 Aug ,Sunday 7489

यादों के झरोखे से part-1 जब अटल जी दिल्ली परिवहन की बसों में धक्का खाते हुए सफर दिया करते थे! आज की पीढ़ी को शायद इस बात पर विश्वास नहीं होगा कि पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी पांच वर्षों तक दिल्ली परिवहन की आम बसों में साधारण यात्रियों की तरह धक्के खाते हुए सफर किया करते थे। सन् 1957 के चुनाव में अटल जी उत्तर प्रदेश के बलरामपुर क्षेत्र से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए थे। एक सांसद के रूप में उन्हें साउथ एवेन्यू में फ्लैट नम्बर-110 पहली बार अलाॅट हुआ था। इस फ्लैट में तब अटल जी अकेले ही रहा करते थे। उन दिनों साउथ एवेन्यू में ही भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी भी रहते थे। उनके घर में उनके साथ कई संघ प्रचारक भी रहते थे। इनमें से पांचजन्य के यशस्वी सम्पादक यादवराव देशमुख, रमिन्द्र बनर्जी आदि का नाम उल्लेखनीय है। उन दिनों मैं भी साउथ एवेन्यू में ही रहा करता था। तब मैं कुंवारा था। इसलिए अटल जी एवं दत्तोपंत ठेंगड़ी आदि के साथ हम लोग साउथ एवेन्यू की कैंटीन में ही भोजन किया करते थे। तब इस कैंटीन में भोजन की एक थाली 60 पैसे में मिलती थी। उन दिनों जनसंघ पार्टी की आर्थिक स्थिति बहुत जर्जर थी। इसलिए पार्टी के सभी सांसद अपना सम्पूर्ण वेतन और भत्ता पार्टी फंड में दे दिया करते थे। उन्हें भोजन आदि के लिए पार्टी द्वारा एक सौ रुपये मासि भत्ता दिया जाता था। यही धनराशि अटल जी और ठेंगड़ी जी को भी प्राप्त होती थी। इसलिए यह दोनों हमेशा आर्थिक संकट से जूझा करते थे। तब अटल जी के पास अपना कोई निजी वाहन नहीं था। टैक्सी या स्कूटर किराये पर लेना आर्थिक संकट के कारण सम्भव नहीं था। इसलिए अटल जी दिल्ली परिवहन की बसों में आम यात्री की तरह धक्के खाते हुए सफर किया करते थे। अटल जी ने पहली कार वर्ष 1967 में ली थी। उन दिनों जनसंघ का मुख्य कार्यालय अजमेरी गेट के समीप एक कमरे में हुआ करता था। एक अन्य प्रचारक जगदीश माथुर मीडिया प्रभारी थे। दत्तोपंत ठेंगड़ी को खाने-पीने का कोई खास शौक नहीं था। मगर अटल जी और जगदीश माथुर मिष्ठान और चाट प्रेमी थे। इसलिए इन दोनों को जब मौका मिलता यह दोनों चावड़ी बाजार, बाजार सीताराम और हौज काजी आदि के चक्कर लगाते और तरह-तरह की मिष्ठान की दुकानों और चाट भंडारों को तलाशते। अटल जी को सड़क पर खड़े होकर खाना-पीना पसंद नहीं था इसलिए वह इन दुकानों से भांति-भांति के मिष्ठान साथ बांधकर ले आते। अगर ऐसे मौकों पर हम भाजपा के दफ्तर में मौजूद होते तो फिर हमारी ईद होती और खूब डटकर मिष्ठानों और चाट पर हाथ साफ किया करते थे। अटल जी इसके साथ-साथ ठंडई के भी बेहद शौकीन थे। अब इनमें से हमारे अधिकांश साथी इस दुनिया से कूच करके वहां चले गए हैं जहां से कोई वापस नहीं लौट पाता। उनकी सिर्फ स्मृति ही शेष रह गई है।



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