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" पग बढा रही है धरती " कविता संग्रह से ;- देवांशु झा,पत्रकार एवं लेखक

नयी दिल्ली/लखनऊ | 31 Dec ,Tuesday 86

दो कविताएं मेरे संकलन से...(पग बढ़ा रही है धरती) विरह शरद के अंतिम फूल झर गए नग्न गाछ गा रहा है... जल रही है प्रिय ऋतु जो आया था वह जा रहा है... मैंने उससे कहा थाम लो मेरे हाथ ! वह बोली, देखो... अपनी दृष्टि से ! मैंने देखा...उसके पीछे-पीछे चला गया है मेरा चाहना भी टंगा है उसका चेहरा मेरी आंख में जैसे टंगा रहता है पहर समय की रेख पर जैसा टंगा होता है कोई कंदील अमावस की छत पर... ------------------------------ प्रद्युम्न ठाकुर (गुड़गांव में जिस मासूम की नृशंस हत्या हुई) मां जब कहती है कि उसे ईश्वर ने आंखें ही क्यों दीं तब मुझे अचानक सुनाई पड़ता है.. जैसे कह रही हो, हो इसी कर्म पर वज्रपात ! और तब मैं किसी अंधी दुनिया में रोशन जिन्दगी का झूठा सच भी देखता हूं मां जब कहती है कि तोड़ डालते उसके हाथ-पांव गला क्यों रेत डाला तब मैं हत्या के घिसेपिटे बाइस्कोप में सिनेमाई बदलाव के रील पलटता हूं जब मैं सोचता हूं कि उसी एक क्षण भला प्रद्युम्न को क्यों जाना था बाथरूम तब मैं ऐसी ही स्तब्धकारी हत्याओं के काल से असंभव छेड़छाड़ करता हूं इससे अधिक तो मैं सोच नहीं पाता फिर मैं सोचता हूं कि मां का क्या होगा प्रद्युम्न तो एक द्युति है उसकी आंख और आत्मा में जलती हुई एक स्पर्श है हर हवा पर सवार एक धोखा है किसी कोने से धप्पा करता हुआ कभी सोता हुआ, कभी जागता, बतियाता कभी दीदी के बाल खींचता कभी खाने में हील हुज्जत करता कभी दोपहर के ढाई बजे का चीन्हा हुआ पदचाप सा बजता हुआ और आलिंगनबद्ध तो हर क्षण वह भला कैसे पार पा सकेगी इन भुतहा स्वरों, रूप, रस और आभासी स्पर्श से उसे तो न जाने कितने दिवस मास तक मरना होगा निरंतर ही मरती रहेगी वह जीवन की हर छटा में कौन जाने उसे कब मिलेगी मुक्ति इस मृत्यु से या मिल भी सकेगी कि नहीं...


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सरकार द्वारा आयोजित कवि सम्मेलनो के संदर्भ मे यूपी के सीएम को एक राष्ट्रवादी कवि ने लिखा ओजस्वी पत

नयी दिल्ली/लखनऊ | 31 Dec ,Tuesday 122

सेवा में माननीय योगी आदित्यनाथ जी, मुख्यमंत्री – उत्तर प्रदेश सरकार,लखनऊ विषय : संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित कवि – सम्मेलनों से वैचारिक प्रदूषण महोदय, उत्तर प्रदेश का संस्कृति मंत्रालय समय – समय पर कवि – सम्मेलनों का आयोजन करता आ रहा है | कवि – सम्मलेन, समाज के वैचारिक एवं चारित्रिक निर्माण का एक सशक्त माध्यम हैं | आपकी सरकार बनने के बाद से ही इस माध्यम द्वारा परोसे जाने वाले वैचारिक आहार की गुणवत्ता में अतिशय सुधार की आशा थी जो कि दुर्भाग्यवश नहीं हुई | संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित कवि – सम्मेलन भारतीय संस्कृति का पोषण तो दूर; भारतीय संस्कृति, राष्ट्रधर्म एवं राष्ट्रवाद का क्षरण करने वालों को संरक्षण देने का मंच बन चुके हैं | जहाँ, समय – समय पर देशद्रोही जेहादी मानसिकता वाले शायरों को ससम्मान आमंत्रित किया जाता रहा है | अभी हाल ही में पूज्य अटल जी के जन्मोत्सव के अवसर पर, २५ दिसंबर को संगीत नाटक अकादमी के सभागार में संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित कवि- सम्मेलन में घुसपैठियों की वकालत करने वाली उग्र और कट्टर मानसिकता की शायरा लता “हया” को आमंत्रित किया गया था | हम स्वयंसेवकों एवं सोशल मीडिया के राष्ट्रवादियों के भारी विरोध के पश्चात ही माननीय मंत्री डा. नीलकंठ तिवारी जी के हस्तक्षेप द्वारा ही उनका आमंत्रण निरस्त हो सका था | उग्रता और साम्प्रदायिक मानसिकता के राहत इंदौरी, मुनव्वर राणा जैसे अन्य शायरों जिनके शेरों को उद्धृत करके आम जनमानस को सोशल मीडिया पर दिग्भ्रमित करने की बहस चलाई जाती है, को भी संस्कृति मंत्रालय अपने कार्यक्रमों का अभिन्न हिस्सा लगातार बनाता रहा है | अतः स्पष्ट है कि संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित कवि सम्मेलनों से भारतीय संस्कृति और विचारधारा का पोषण नहीं अपितु क्षरण ही हो रहा है | आदरणीय, इन सबके मूल में इन सभी कार्यकर्मो के प्रत्यक्ष/ परोक्ष संयोजक सर्वेश अस्थाना जी की महती भूमिका रही है | जो स्वयं तथाकथित समाजवादी विचारधारा के घनघोर समर्थक रहे हैं | २५ दिसंबर को आयोजित हुए कवि – सम्मेलन में इन्होने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के “ध्वज प्रणाम” पर भी स्तरहीन एवं अभद्रतापूर्ण मसखरी की थी | उस पूरे कार्यक्रम में अटल जी के विचार मंच से पूर्णतया नदारद थे | यदि वैचारिक युद्ध में सेनापति ही विरोधी विचारधारा से चुन लिया जाएगा तो विचारधारा को प्रदूषित एवं क्षरित होने से कौन बचा सकेगा ? आज उत्तर प्रदेश के संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित कवि – सम्मेलनों में यही हो रहा है | एक राष्ट्रवादी कवि एवं स्वयंसेवक होने के नाते इस विषय की जानकारी आप तक पहुँचाना मेरा कर्तव्य ही नहीं धर्म भी था | इस वैचारिक युद्ध में सेनापति का दायित्व साहित्य के क्षेत्र में कार्यरत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुसांगिक संगठन “ अखिल भारतीय साहित्य परिषद” या किसी राष्ट्रवादी कवि/ साहित्यकार को मिलना चाहिए न की विरोधी खेमे के किसी मसखरे बहुरूपिये को | श्रीमान जी से करवद्ध प्रार्थना है कि इस विषय पर संज्ञान लेते हुए संस्कृति मंत्रालय के कार्यक्रमों को विचारधारा से विमुख लोगों की चंगुल से बचाने की अविलम्ब कृपा करें | धन्यवाद भवदीय (जनार्दन पाण्डेय “प्रचंड” ) राष्ट्रवादी ओज कवि एवं स्वयंसेवक pjanardanp@gmail.com प्रतिलिपि : निम्नलिखित को सूचनार्थ एवं आवश्यक संज्ञान हेतु प्रेषित १. डा. कृष्ण गोपाल जी, सह – सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ २. श्री अरुण कुमार जी, अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ३. श्री स्वांत रंजन जी , अखिल भारतीय वौद्धिक प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ४. श्री अनिल जी, क्षेत्र प्रचारक, पूर्वी क्षेत्र – उत्तर प्रदेश, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ५. डा. अशोक दुबे जी, प्रान्त प्रचार प्रमुख, अवध प्रान्त, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ६. माननीय डा. नीलकंठ तिवारी जी, मंत्री संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार ७. श्री उमेश शुक्ला जी– महामंत्री अखिल भारतीय साहित्य परिषद, अवध प्रांत, लखनऊ Janardan Pandey Prachand


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छात्र ,छात्रावास की राजनीति में हिंसा कोई नयी परिघटना है क्या !

नयी दिल्ली /प्रयागराज | 08 Jan ,Wednesday 92

अब हम तो ठहरे इलाहाबादी छात्र!कल की जे एन यू की घटना की मीडिया सोशल मीडिया कवरेज देखकर हमारा मन भयंकर कुंठा में है।हॉलैंड हॉल ,एस एस एल,जी इन झा और के पी यू सी होस्टलों की दीवारों और छात्रसंघ भवन से सटी दीवारों पर कितने बम तो खाली इस टेस्टिंग में फोड़ दिए गए होंगे कि गुरु! आवाज किसकी दमदार थी।कर्नलगंज थाने से तो हम छात्रों का का गजब का रिश्ता था।अक्सर यहाँ का थानेदार विश्वविद्यालय के किसी छात्रावास का पुरा अन्तःवासी होता ही है इस लिहाज से हम उन्हें अपना सीनियर ही मानते थे।लेकिन विरोध की स्थिति में हम अपना फ़र्ज़ पूरी शिद्दत से निभाते थे हम छात्र धर्म पुलिस वाले कानून का धर्म।हम उन्हें धिक्कारते थे,ललकारते थे पुलिस वाले फटकारते थे,कूटते थे पुचकारते थे।कुछ चिर युवा छात्र नेता ही हमारे पंच परमेश्वर थे।हर लड़ाई के बाद कॉफी हॉउस में बैठकर सर्वमान्य समझौता वही करा देते थे।कभी किसी बड़े नेता विधायक की जरूरत ही नहीं पड़ी आज तक। किसी भी आंदोलन में यहाँ के नारे गज़ब होते थे।जैसे , जीतेंगे तो रम चलेगा,हारेंगे तो कट्टा बम चलेगा। मरिहै कम हड़कइहीं ज्यादा,......... दादा ......दादा। सारे हॉस्टल्स में तनातनी बनी ही रहती थी।हर हॉस्टल का दूसरे हॉस्टल कुछ यूनिक से नाम रखते आते थे ।बम कट्टा की टेस्टिंग अपने हॉस्टल के पिछवाड़े में भी कर लेते थे तब के वारियर छात्र।आये दिन एक दूसरे ग्रुप की थुराइ चलती रहती थी।हॉस्टल के भीतर abvp, nsui, आइसा, sfi, युवजन सभा,बहुजन छात्र संघ के छात्रों का एकसाथ रहना होता था।लेकिन क्या मज़ाल जो कोई हॉस्टल के भीतर घुस के किसी को पीट दे।हॉस्टल के सभी छात्र एक परिवार के सदस्य होते थे।पीसीएस के एग्जाम,डिग्री के एग्जाम में एक दूसरे को डिस्टर्ब नहीं होने देने का अघोषित प्रण लिए होते थे।लल्ला चुंगी से यूनिवर्सिटी चौराहा, लक्ष्मी चौराहे से कटरा नेतराम तक,साइंस फैकल्टी के गेट से हिन्दू हॉस्टल चौराहे तक हमारी अपनी रियासत थी।साला इतना कूटे या कुटाई खाये कभी मीडिया ने इतना महत्त्व दिया ही नहीं।रवीश जी हो चाहे अंजना जी ,सरदाना जी हो चाहे अवस्थी थी या वाजपेयी जी किसी पत्रकार ने न हमे पीड़ित बताया न हमने उन्हें बताने की जरूरत ही समझी। हॉस्टल्स की तनातनी के बीच एक दूसरे से हमारे मधुर सम्बन्ध भी खूब रहते थे।एक दूसरे के राष्ट्रीय नेताओं का एक साथ बन्द मख्खन खाते हुए मजाक उड़ाना हमारी परंपरा सी थी ।हम भावुक से या यूं कहें चूतिया हिंदी माध्यम के छात्र इतने आधुनिक कभी नहीं हो पाए कि कभी बाहरी लड़कों को बुलाकर अपने भाइयों जो कि विरोधी विचारधारा के हो पिटवा सकें।हम ग़रीब घरों से ,मध्यम वर्गीय छात्र कभी अपनी गऱीबी को बेच नहीं पाए।न हम देश को गरिया पाए न किसी बाहरी को कैंपस में घुस कर गरियाने का मौका दिया हमने।हम तो दूसरे छात्रों के धर्म विश्वास आस्था का हनन न होने पाए इस ख्याल से अपनी आस्था,अपने शौक को थोड़ा दबा ही लेते थे। पहले लगता था कि हम कम प्रगतिशील हैं लेकिन कल रात के बाद लगा कि हम ही ठीक थे यार।अपने मे निपट लेंते थे लेकिन क्या मज़ाल जो कोई दूसरा हमारे हॉस्टल हमारे घर मे घुस पाए।जे एन यू सहित सभी विश्वविद्यालयों के छात्रों को हमारी हॉस्टल परम्परा से सीखने की जरूरत है। एक नारा आज गढ़ रहा हूँ फिर से और इसी के साथ बात समाप्त करूँगा::::; चाहे कितनी बढ़े आबादी,सबले बढ़िया इलाहाबादी।।। सादर दिवाकर Diwakar Dubey



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श्रीनिवास रामानुजम ; एक गणितज्ञ की अध्यात्मिकता सृजनात्मकता

नयी दिल्ली /मद्रास | 23 Dec ,Monday 201

अनंत से अनंत तक का यात्री रामानुजन की जयंती पर... (यह आलेख मेरे शीघ्र प्रकाश्य गद्य संकलन आवारा बादल में समाहित है) यह बड़ी अजीब सी बात है कि साहित्यिक अभिरुचि का आदमी होकर भी मैं किसी कवि या लेखक की जीवनगाथा पढ़ते हुए उतना द्रवित कभी न हो सका जितना कि श्रीनिवास रामानुजन के बारे में पढ़ते हुए हुआ । रामानुजन का छोटा सा जीवन शीत की कुहेलिका में डूबे किसी दिव्य सरोवर सा है जो क्षण क्षण अपना रूप खोलता है । उसमें जितनी काव्यात्मकता,करुणा और आनंद है उतना कथा-कहानियों में नहीं । उसमें उतरना तो हम जैसी अगणितीय आत्माओं से कोसों दूर है, उसकी दिव्यता को छू भर लेना ही हमारे लिए परमाद्भुत रत्न को पाने जैसा है । उनके जन्म की कहानी। उनकी बचपन की विचित्रता। बहुत छोटी उम्र में उनके द्वारा पूछे गए विस्मयकारी प्रश्न और धीरे-धीरे गणित में धंसते हुए कुछ विलक्षण सोचना या करना, यह सब अपवादातात्मक या प्रतीयमान ही है । रामानुजन की दिव्यता का आभास यों तो बचपन से होने लगता है तथापि उनकी अपूर्व प्रतिभा का प्राकट्य तेरह-चौदह वर्ष की उम्र से होता है जब वे लोनी की त्रिकोणमिति की पुस्तक को समाप्त करते हुए उसके कुछ प्रमेयों का विस्तार कर जाते हैं । यद्यपि वे अनभिज्ञ हैं कि दुनिया उन प्रमेयों पर काम कर चुकी है । इस समय तक तो रामानुजन किसी अनजान गिरिगेह के शून्य में बैठे थे, जहां से कुछ प्रकाशित होना या विश्व में गणित पर होने वाले कार्यों को जानना असंभव ही था । रामानुजन की एकाधिक चिट्ठियां मेरे मन को विकल करती हैं । जब वे रामास्वामी अय्यर से अरज करते हैं या कैंब्रिज के प्रख्यात गणितज्ञ जी एच हार्डी को अपने प्रमेय भेजते हुए किसी दैवीय विश्वास से भरे हुए दीखते हैं । हार्डी को एक पत्र में तो वे यहां तक कहते हैं कि उन्हें अपने मस्तिष्क या बुद्धि को बचाए रखने के लिए फिलहाल भोजन की आवश्यकता है । क्योंकि वे अधभुखमरी की हालत में जी रहे हैं ।उऩके द्वारा भेजे गए प्रमेयों पर हार्डी की मुहर उन्हें मद्रास यूनिवर्सिटी या सरकार द्वारा छात्रवृत्ति दिलाने में कारगर होगी। बीसवीं सदी में भारत और विश्व के संपूर्ण बौद्धिक पटल पर रामानुजन सा विचित्र मनुष्य दूसरा नहीं हो सका । विचित्र इसलिए कि वे, तर्क और अध्यात्म के तत्व का जो अंतर्दृष्टिमूलक विपर्यय है, उसे एक साथ साधते हैं । एक ओर उनकी विलक्षण मति है जो प्रतिपल कुछ नवीन और प्रातिभ तेज से सामने वाले को हैरान करती है । दूसरी तरफ़ उनका अध्यात्म है जो उनकी मेधा को उर्जस्विता प्रदान करता है । बल्कि वह मेधा उसी आध्यात्मिक आभा, अंत:प्रज्ञा से मंडित है । उन्होंने अपने कई प्रमेयों पर बात करते हुए कहा था कि यह देवी नामगिरी ने स्वप्न में आकर बतला दिया था । यह बात भी दीगर है कि रामानुजन कई बार अर्द्धरात्रि में नींद से उठकर गणित के प्रमेय लिखने लगते थे । गणित जैसे गूढ़ विषय पर आधुनिक विश्व में ऐसा कोई दूसरा धुरंधर नहीं दीखता जो अपने प्रमेयों को कुलदेवी का प्रसाद कहता रहा हो । जर्मनी के रीमान एक और महान गणितज्ञ थे जो आध्यात्मिक प्रभा से दीप्त थे । रामानुजन कहा करते थे; “यदि कोई गणितीय समीकरण या सूत्र किसी भगवत विचार से मुझे नहीं भर देता तो वह मेरे लिए निरर्थक है ।” रामानुजन और उऩकी माता का जीवन एक अदृष्टपूर्व आध्यात्मिक चिंतन से अंतर्गुंफित है। माना जाता है कि रामानुजन की माता ने एक स्वप्न देखा था कि उनका पुत्र यूरोपीय लोगों से घिरा हुआ है और देवी नामगिरी उन्हें आदेश दे रही हैं कि वह अपने पुत्र की यूरोप यात्रा में बाधा न बनें । एक कथा यह भी है कि रामानुजन अपनी कुलदेवी के मंदिर में तीन रातों तक सोते रहे । दो दिनों तक तो कुछ भी नहीं हुआ लेकिन तीसरी रात को वे नींद से जागे और उन्होंने नारायण अय्यर को यह कह कर जगाया कि देवी ने उन्हें विदेश जाने का आदेश दिया है। रामानुजन की माता बहुत महत्वाकांक्षी थीं । उन्होंने अपने पुत्र के गणित प्रेम को उनकी जीवन सहचरी पर प्रश्रय दिया । पत्नी, जानकी अम्माल रामानुजन के लिए कुछ विशेष नहीं कर सकीं । विवाह के बाद के कुछ वर्षों तक वे वीतरागी ही रहे । बाद में इंग्लैंड प्रवास के कारण पत्नी से दूर ही हो गए । जब बीमार होकर भारत लौटे तो कुछ महीनों तक पत्नी के साथ रहे । तब जानकी अम्माल ने उनकी बहुत सेवा की । उन दिनों में वे विह्वल होकर कहते थे कि अगर तुम मेरे साथ रही होतीं तो मैं बीमार न होता ! इंग्लैंड में उनके साथ काम करते हुए प्रख्यात गणितज्ञ प्रोफेसर हार्डी ने कहा था, ‘’सबसे आश्चर्यचकित करने वाली बात उसकी वह अंतर्दृष्टि है जो सूत्रों और अऩंत श्रेणियों के रूपांतरण आदि में दिखती है। मैं आजतक उसके समान किसी व्यक्ति से नहीं मिला और मैं उसकी तुलना आयलर तथा जैकोबी से ही कर सकता हूं।‘’ महान गणितज्ञ लिटलवुड भी उन्हें जैकोबी मानते थे । प्रोफेसर हार्डी ने अन्यत्र लिखा है: ‘’ उसके ज्ञान की कमी भी उतनी ही विस्मय कर देने वाली थी जितनी कि उसके विचार की गहनता।वह एक ऐसा व्यक्ति था जो उस स्तर के मौड्यूलर समीकरण पर कार्य कर सकता था या कॉम्प्लेक्स गुणा कर सकता था जिसके बारे में किसी ने सुना तक न हो । निरंतर लंगड़ीभिन्न पर उसका इतना अधिकार था जितना विश्व में कदाचित किसी भी गणितज्ञ को नहीं था । उसने स्वयं ज़ीटा फंक्शऩ के समीकरण का पता लगा लिया था। उसने कभी डबल पीरी आइडिक फंक्शन या कॉची थ्योरम का नाम भी नहीं सुना था परंतु एनैलीटिकल नंबर थ्योरी की विशाल राशियों से से वह खेलता रहता था ।’’ प्रोफेसर हार्डी ने अन्यत्र कहा था कि उन्हें खुद को, महान गणितज्ञ लिट्लवुड और रामानुजन को आंकना हो तो वे खुद को सौ में पच्चीस, लिट्लवुड को पैंतीस और रामानुजन को सौ में से सौ अंक देंगे । महान दार्शनिक बर्टरेंड रसल हंस कर मजाक करते थे कि हार्डी और लिट्लवुड को लगता है कि उन्होंने पच्चीस पाउंड के खर्च में भारत से किसी नए न्यूटन को खोज लिया है । भारत लौट आने के बाद अपनी असाध्य रुग्णता के दिनों में उन्होंने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य किया । उन्होंने हार्डी को लिखे अपने पत्र में मॉकथीटा फंक्शन का जिक्र किया है। अमेरिकी गणितज्ञ प्रोफेसर जॉर्ज एंड्रूज़ रामानुजन के कार्यों पर शोध करने वाले अधिकारी गणितज्ञ माने जाते हैं । उन्होंने रामानुजन के इस सूत्र पर विचार करते हुए पचास वर्ष के बाद लिखा था.. ‘’इनको समझना किसी अच्छे गणितज्ञ तक के लिए कठिन है। एक वर्ग के पांच सूत्रों में से पहला मैंने पंद्रह मिनट में सिद्ध कर लिया था, परंतु दूसरे को सिद्ध करने में एक घंटा लगा चौथा दूसरे से निकल आया और तीसरे तथा पांचवें को सिद्ध करने में मुझे तीन महीने लगे “’ आज दुनिया के सभी महान गणितज्ञ इस बात से सहमत हैं कि आधुनिक विश्व की नैसर्गिक प्रतिभाओं में रामानुजन की तुलना संभवत: किसी और से हो ही नहीं सकती, जैकोबी और आयलर को छोड़कर । रामानुजन का पूरा जीवन ही इस बात का शाश्वत प्रमाण है कि अध्यात्म से सिंचित भारतीय मेधा और चिंतन परंपरा साक्षात ईश्वरीय संकेतों से चालित होती है। सिर्फ बत्तीस वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन जब वे विदा हुए तो पश्चिम का रंगभेदी दर्प ध्वस्त हो चुका था । रामानुजन पहले भारतीय थे जिन्होंने यह सिद्ध कर दिया था कि प्रतिभा रंग की मोहताज नहीं होती । एक साधारण कद काठी के काले मद्रासी ने बिना किसी विदेशी शिक्षा या पारंपरिक पठन पाठन के पश्चिमी गोरी चमड़ी के श्रेष्ठताबोध को तोड़ डाला था ।उनकी मृत्यु के बाद रामचंद्र राव ने लिखा था: “उसका नाम भारत को यश देता है और उसका जीवनवृत्त प्रचलित विदेशी शिक्षा प्रणाली की कटु निंदा का द्योतक है । उसका नाम उस व्यक्ति के लिए ऐसा स्तंभ है जो भारतीय अतीत के बौद्धिक सामर्थ्य से अनभिज्ञ है ।जब दो महाद्वीप उनके खोजे गणित के नए सूत्र प्रकाशित कर रहे थे तब भी रामानुजन वही बालोचित, दयालु और सरल व्यक्ति बना रहा, जिसको न ढंग के कपड़े पहनने का ध्यान था, न ही औपचारिकता की परवाह। इससे उनके कक्ष में मिलने आने वाले आश्चर्य के साथ कह उठते थे कि क्या यही वह हैं.. यदि मैं एक शब्द में रामानुजन को समाना चाहूं तो कहूंगा, भारतीयता ” अंत में श्रीनिवास रामानुजन के लिए लिखी अपनी ही एक कविता से उन्हें श्रद्धांजलि देता हूं.. जब तुम्हारे सहपाठी अंकों के आवागमन में दिमाग के विश्राम का द्वार टटोलते थे तब तुम शून्य से शून्य तक की यात्रा कर रहे थे ! तुम अनंत में पहले उतर आए वहां से अंत के सभी छोरों को कितनी सहजता से छू लिया तुमने संख्याएं तुम्हारी सहचरी बनीं दुकान पर हिसाब में जुड़ने वाली नहीं अनादि से अब तक गणितज्ञों के गूढ़ ब्रह्मांड में उड़ने वालीं अगणित तारिकाओं की तरह टिमकने वालीं तुमने अंकों की अनंताध्यायी रची जैसे एकल अंकों का वर्ण-विचार उनकी संधियों और सामासिकता का स्वरूप उनकी संज्ञा, विशेषण और सर्वनाम काल के सतत प्रवाह में उनकी नई पहचान संख्याओं का शाब्दिक संसार और उनका विचित्र विन्यास भी यह सब तुमने कहां से सीखा? तुम्हारी चमकती आंखों के पीछे क्या उसी देवी का सरोवर था! जो अकसर तुम्हारे स्वप्न में आती रहीं और खुद ही तोड़कर तुम्हें सौंपती रहीं सूत्रों के शतदल !



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