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जानिये ! वीर क्यों हैं.. विनायक दामोदर सावरकर - अवनीश त्रिपाठी, सोशल मीडिया ।

नयी दिल्ली / महाराष्ट्र | 26 Dec ,Thursday 73

साभार अविनाश त्रिपाठी जी दो दिन पहले मैंने जीवन में पहली बार समुद्र देखा। किनारे से खड़े होकर देखने में समुद्र जितना खूबसूरत लगता है अंदर से उतना ही भयानक, तब आपका जहाज ही आपकी जमीन है और एक बार वो छूट गया तो पूरा समुद्र ही आपका कब्रिस्तान फिर भी एक आदमी है जिसने जानते बूझते बीच समुद्र में अपने जहाज से छलांग लगा दी, बिना किनारे तक पहुंचने की परवाह किए। ये 8 जुलाई 1910 था जब ब्रिटिश जहाज मोरिया फ्रांस के मार्सेल बंदरगाह पहुंचने वाला था। तब सख्त निगरानी में भारत ले जाए जा रहे 27 साल के सावरकर ने जहाज से छलांग लगा दी। लिखने वालों ने इसकी तुलना छत्रपति शिवाजी के औरंगजेब के कैद से निकल कर भागने से की। शौच के बहाने अंग्रेज पुलिस को चकमा देकर सावरकर बीच समुद्र में कूद गए। अंग्रेज पुलिस ने जहाज से उनपर गोलियां चलानी शुरू कर दी। बाद में नाव से उनका पीछा किया गया। कुछ घंटे तैरकर आखिरकार सावरकर को फ्रांस का किनारा मिल गया। कई असफल प्रयास करने के बाद 9 फीट ऊंची चट्टान चढ़कर सावरकर फ्रांस की जमीन पर थे। उन्होंने मौका पाते ही खुद को फ्रंच पुलिस के जवान को सौंप दिया लेकिन उनके पीछा करते हुए पहुंची ब्रिटिश पुलिस के दबाव में आकर फ्रंच सिपाही ने उन्हें वापस अंग्रेज पुलिस के हवाले कर दिया। इधर सावरकर भारत पहुंचे उधर उनकी गिरफ्तारी को लेकर ब्रिटेन और फ्रांस की सरकार हेग के इंटरनेशनल कोर्ट पहुंच गई। फ्रांस को इस केस में हार का मुंह देखना पड़ा। फ्रंच प्रधानमंत्री की विपक्ष ने जमकर लानत-मलातन की लेकिन किसी गुलाम भारतीय के लिए फ्रंच सरकार ज्यादा दर्द लेती भी क्यों। जिस कोर्ट में सावरकर को 50 साल काला पानी की सजा हुई उस कोर्ट में सावरकर को अपने पक्ष में बोलने तक का अधिकार नहीं था। बिना आरोपी का पक्ष जाने ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 50 साल के लिए कालापानी भेज दिया। यूरोप के बर्फीले पानी में अपने जहाज से कूदने वाले सावरकर को वीर लिखने पर आज मजाक बनाया जाता है अंग्रेजों की गोलियां से बचते हुए सागर पार करने वाले सावरकर की दया याचिकाओं पर सवाल किया जाता है। अपनी वर्दी पर D (dangerous)का बिल्ला टांगे काला पानी के अंदर 6-6 महीनों के लिए Solitary confinement (जेल के अंदर जेल) पाने वाले सावरकर को अंग्रेजों का दलाल कहा जाता है और ये उस देश की कहानी है जिसके राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को Boer War में अंग्रेज सरकार की वफादारी के लिए gold medal for loyalty और केसरी हिन्द की उपाधी दी गई और दो दिन पहले राहुल गांधी ने दिल्ली में अपना धरना इसलिए दो घंटे पहले समाप्त कर दिया क्योंकि ठंड बहुत थी या फेनमिषें हससि निर्दया कैसा का वचन भंगिसी ऐसा त्वत्स्वामित्वा सांप्रत जी मिरवीते भिनि का आंग्लभूमीते मन्मातेला अबला म्हणुनि फसवीसी मज विवासनाते देशी तरि आंग्लभूमी भयभीता रे अबला न माझि ही माता रे कथिल हे अगस्तिस आता रे जो आचमनी एक क्षणी तुज प्याला ॥ सागरा प्राण तळमळला You are laughing at me (in the form of the foam in your waves), but why did you break your promise of taking me back to my mother ? You have always claimed to be strong, but you are in fact afraid of the British rule. You try to call my mother weak and coward, but it applies to you. My mother is not weak, Agasthi, one of her sons had swallowed you in an instant (from the story of Agasthi Rishi) Take an oath that even if I get the throne of ‘Deity Indra’, I will decline the same and die as the last Hindu !’ Vinayak Damodar Savarkar


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श्रीनिवास रामानुजम ; एक गणितज्ञ की अध्यात्मिकता सृजनात्मकता

नयी दिल्ली /मद्रास | 23 Dec ,Monday 112

अनंत से अनंत तक का यात्री रामानुजन की जयंती पर... (यह आलेख मेरे शीघ्र प्रकाश्य गद्य संकलन आवारा बादल में समाहित है) यह बड़ी अजीब सी बात है कि साहित्यिक अभिरुचि का आदमी होकर भी मैं किसी कवि या लेखक की जीवनगाथा पढ़ते हुए उतना द्रवित कभी न हो सका जितना कि श्रीनिवास रामानुजन के बारे में पढ़ते हुए हुआ । रामानुजन का छोटा सा जीवन शीत की कुहेलिका में डूबे किसी दिव्य सरोवर सा है जो क्षण क्षण अपना रूप खोलता है । उसमें जितनी काव्यात्मकता,करुणा और आनंद है उतना कथा-कहानियों में नहीं । उसमें उतरना तो हम जैसी अगणितीय आत्माओं से कोसों दूर है, उसकी दिव्यता को छू भर लेना ही हमारे लिए परमाद्भुत रत्न को पाने जैसा है । उनके जन्म की कहानी। उनकी बचपन की विचित्रता। बहुत छोटी उम्र में उनके द्वारा पूछे गए विस्मयकारी प्रश्न और धीरे-धीरे गणित में धंसते हुए कुछ विलक्षण सोचना या करना, यह सब अपवादातात्मक या प्रतीयमान ही है । रामानुजन की दिव्यता का आभास यों तो बचपन से होने लगता है तथापि उनकी अपूर्व प्रतिभा का प्राकट्य तेरह-चौदह वर्ष की उम्र से होता है जब वे लोनी की त्रिकोणमिति की पुस्तक को समाप्त करते हुए उसके कुछ प्रमेयों का विस्तार कर जाते हैं । यद्यपि वे अनभिज्ञ हैं कि दुनिया उन प्रमेयों पर काम कर चुकी है । इस समय तक तो रामानुजन किसी अनजान गिरिगेह के शून्य में बैठे थे, जहां से कुछ प्रकाशित होना या विश्व में गणित पर होने वाले कार्यों को जानना असंभव ही था । रामानुजन की एकाधिक चिट्ठियां मेरे मन को विकल करती हैं । जब वे रामास्वामी अय्यर से अरज करते हैं या कैंब्रिज के प्रख्यात गणितज्ञ जी एच हार्डी को अपने प्रमेय भेजते हुए किसी दैवीय विश्वास से भरे हुए दीखते हैं । हार्डी को एक पत्र में तो वे यहां तक कहते हैं कि उन्हें अपने मस्तिष्क या बुद्धि को बचाए रखने के लिए फिलहाल भोजन की आवश्यकता है । क्योंकि वे अधभुखमरी की हालत में जी रहे हैं ।उऩके द्वारा भेजे गए प्रमेयों पर हार्डी की मुहर उन्हें मद्रास यूनिवर्सिटी या सरकार द्वारा छात्रवृत्ति दिलाने में कारगर होगी। बीसवीं सदी में भारत और विश्व के संपूर्ण बौद्धिक पटल पर रामानुजन सा विचित्र मनुष्य दूसरा नहीं हो सका । विचित्र इसलिए कि वे, तर्क और अध्यात्म के तत्व का जो अंतर्दृष्टिमूलक विपर्यय है, उसे एक साथ साधते हैं । एक ओर उनकी विलक्षण मति है जो प्रतिपल कुछ नवीन और प्रातिभ तेज से सामने वाले को हैरान करती है । दूसरी तरफ़ उनका अध्यात्म है जो उनकी मेधा को उर्जस्विता प्रदान करता है । बल्कि वह मेधा उसी आध्यात्मिक आभा, अंत:प्रज्ञा से मंडित है । उन्होंने अपने कई प्रमेयों पर बात करते हुए कहा था कि यह देवी नामगिरी ने स्वप्न में आकर बतला दिया था । यह बात भी दीगर है कि रामानुजन कई बार अर्द्धरात्रि में नींद से उठकर गणित के प्रमेय लिखने लगते थे । गणित जैसे गूढ़ विषय पर आधुनिक विश्व में ऐसा कोई दूसरा धुरंधर नहीं दीखता जो अपने प्रमेयों को कुलदेवी का प्रसाद कहता रहा हो । जर्मनी के रीमान एक और महान गणितज्ञ थे जो आध्यात्मिक प्रभा से दीप्त थे । रामानुजन कहा करते थे; “यदि कोई गणितीय समीकरण या सूत्र किसी भगवत विचार से मुझे नहीं भर देता तो वह मेरे लिए निरर्थक है ।” रामानुजन और उऩकी माता का जीवन एक अदृष्टपूर्व आध्यात्मिक चिंतन से अंतर्गुंफित है। माना जाता है कि रामानुजन की माता ने एक स्वप्न देखा था कि उनका पुत्र यूरोपीय लोगों से घिरा हुआ है और देवी नामगिरी उन्हें आदेश दे रही हैं कि वह अपने पुत्र की यूरोप यात्रा में बाधा न बनें । एक कथा यह भी है कि रामानुजन अपनी कुलदेवी के मंदिर में तीन रातों तक सोते रहे । दो दिनों तक तो कुछ भी नहीं हुआ लेकिन तीसरी रात को वे नींद से जागे और उन्होंने नारायण अय्यर को यह कह कर जगाया कि देवी ने उन्हें विदेश जाने का आदेश दिया है। रामानुजन की माता बहुत महत्वाकांक्षी थीं । उन्होंने अपने पुत्र के गणित प्रेम को उनकी जीवन सहचरी पर प्रश्रय दिया । पत्नी, जानकी अम्माल रामानुजन के लिए कुछ विशेष नहीं कर सकीं । विवाह के बाद के कुछ वर्षों तक वे वीतरागी ही रहे । बाद में इंग्लैंड प्रवास के कारण पत्नी से दूर ही हो गए । जब बीमार होकर भारत लौटे तो कुछ महीनों तक पत्नी के साथ रहे । तब जानकी अम्माल ने उनकी बहुत सेवा की । उन दिनों में वे विह्वल होकर कहते थे कि अगर तुम मेरे साथ रही होतीं तो मैं बीमार न होता ! इंग्लैंड में उनके साथ काम करते हुए प्रख्यात गणितज्ञ प्रोफेसर हार्डी ने कहा था, ‘’सबसे आश्चर्यचकित करने वाली बात उसकी वह अंतर्दृष्टि है जो सूत्रों और अऩंत श्रेणियों के रूपांतरण आदि में दिखती है। मैं आजतक उसके समान किसी व्यक्ति से नहीं मिला और मैं उसकी तुलना आयलर तथा जैकोबी से ही कर सकता हूं।‘’ महान गणितज्ञ लिटलवुड भी उन्हें जैकोबी मानते थे । प्रोफेसर हार्डी ने अन्यत्र लिखा है: ‘’ उसके ज्ञान की कमी भी उतनी ही विस्मय कर देने वाली थी जितनी कि उसके विचार की गहनता।वह एक ऐसा व्यक्ति था जो उस स्तर के मौड्यूलर समीकरण पर कार्य कर सकता था या कॉम्प्लेक्स गुणा कर सकता था जिसके बारे में किसी ने सुना तक न हो । निरंतर लंगड़ीभिन्न पर उसका इतना अधिकार था जितना विश्व में कदाचित किसी भी गणितज्ञ को नहीं था । उसने स्वयं ज़ीटा फंक्शऩ के समीकरण का पता लगा लिया था। उसने कभी डबल पीरी आइडिक फंक्शन या कॉची थ्योरम का नाम भी नहीं सुना था परंतु एनैलीटिकल नंबर थ्योरी की विशाल राशियों से से वह खेलता रहता था ।’’ प्रोफेसर हार्डी ने अन्यत्र कहा था कि उन्हें खुद को, महान गणितज्ञ लिट्लवुड और रामानुजन को आंकना हो तो वे खुद को सौ में पच्चीस, लिट्लवुड को पैंतीस और रामानुजन को सौ में से सौ अंक देंगे । महान दार्शनिक बर्टरेंड रसल हंस कर मजाक करते थे कि हार्डी और लिट्लवुड को लगता है कि उन्होंने पच्चीस पाउंड के खर्च में भारत से किसी नए न्यूटन को खोज लिया है । भारत लौट आने के बाद अपनी असाध्य रुग्णता के दिनों में उन्होंने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य किया । उन्होंने हार्डी को लिखे अपने पत्र में मॉकथीटा फंक्शन का जिक्र किया है। अमेरिकी गणितज्ञ प्रोफेसर जॉर्ज एंड्रूज़ रामानुजन के कार्यों पर शोध करने वाले अधिकारी गणितज्ञ माने जाते हैं । उन्होंने रामानुजन के इस सूत्र पर विचार करते हुए पचास वर्ष के बाद लिखा था.. ‘’इनको समझना किसी अच्छे गणितज्ञ तक के लिए कठिन है। एक वर्ग के पांच सूत्रों में से पहला मैंने पंद्रह मिनट में सिद्ध कर लिया था, परंतु दूसरे को सिद्ध करने में एक घंटा लगा चौथा दूसरे से निकल आया और तीसरे तथा पांचवें को सिद्ध करने में मुझे तीन महीने लगे “’ आज दुनिया के सभी महान गणितज्ञ इस बात से सहमत हैं कि आधुनिक विश्व की नैसर्गिक प्रतिभाओं में रामानुजन की तुलना संभवत: किसी और से हो ही नहीं सकती, जैकोबी और आयलर को छोड़कर । रामानुजन का पूरा जीवन ही इस बात का शाश्वत प्रमाण है कि अध्यात्म से सिंचित भारतीय मेधा और चिंतन परंपरा साक्षात ईश्वरीय संकेतों से चालित होती है। सिर्फ बत्तीस वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन जब वे विदा हुए तो पश्चिम का रंगभेदी दर्प ध्वस्त हो चुका था । रामानुजन पहले भारतीय थे जिन्होंने यह सिद्ध कर दिया था कि प्रतिभा रंग की मोहताज नहीं होती । एक साधारण कद काठी के काले मद्रासी ने बिना किसी विदेशी शिक्षा या पारंपरिक पठन पाठन के पश्चिमी गोरी चमड़ी के श्रेष्ठताबोध को तोड़ डाला था ।उनकी मृत्यु के बाद रामचंद्र राव ने लिखा था: “उसका नाम भारत को यश देता है और उसका जीवनवृत्त प्रचलित विदेशी शिक्षा प्रणाली की कटु निंदा का द्योतक है । उसका नाम उस व्यक्ति के लिए ऐसा स्तंभ है जो भारतीय अतीत के बौद्धिक सामर्थ्य से अनभिज्ञ है ।जब दो महाद्वीप उनके खोजे गणित के नए सूत्र प्रकाशित कर रहे थे तब भी रामानुजन वही बालोचित, दयालु और सरल व्यक्ति बना रहा, जिसको न ढंग के कपड़े पहनने का ध्यान था, न ही औपचारिकता की परवाह। इससे उनके कक्ष में मिलने आने वाले आश्चर्य के साथ कह उठते थे कि क्या यही वह हैं.. यदि मैं एक शब्द में रामानुजन को समाना चाहूं तो कहूंगा, भारतीयता ” अंत में श्रीनिवास रामानुजन के लिए लिखी अपनी ही एक कविता से उन्हें श्रद्धांजलि देता हूं.. जब तुम्हारे सहपाठी अंकों के आवागमन में दिमाग के विश्राम का द्वार टटोलते थे तब तुम शून्य से शून्य तक की यात्रा कर रहे थे ! तुम अनंत में पहले उतर आए वहां से अंत के सभी छोरों को कितनी सहजता से छू लिया तुमने संख्याएं तुम्हारी सहचरी बनीं दुकान पर हिसाब में जुड़ने वाली नहीं अनादि से अब तक गणितज्ञों के गूढ़ ब्रह्मांड में उड़ने वालीं अगणित तारिकाओं की तरह टिमकने वालीं तुमने अंकों की अनंताध्यायी रची जैसे एकल अंकों का वर्ण-विचार उनकी संधियों और सामासिकता का स्वरूप उनकी संज्ञा, विशेषण और सर्वनाम काल के सतत प्रवाह में उनकी नई पहचान संख्याओं का शाब्दिक संसार और उनका विचित्र विन्यास भी यह सब तुमने कहां से सीखा? तुम्हारी चमकती आंखों के पीछे क्या उसी देवी का सरोवर था! जो अकसर तुम्हारे स्वप्न में आती रहीं और खुद ही तोड़कर तुम्हें सौंपती रहीं सूत्रों के शतदल !


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छात्र ,छात्रावास की राजनीति में हिंसा कोई नयी परिघटना है क्या !

नयी दिल्ली /प्रयागराज | 08 Jan ,Wednesday 24

अब हम तो ठहरे इलाहाबादी छात्र!कल की जे एन यू की घटना की मीडिया सोशल मीडिया कवरेज देखकर हमारा मन भयंकर कुंठा में है।हॉलैंड हॉल ,एस एस एल,जी इन झा और के पी यू सी होस्टलों की दीवारों और छात्रसंघ भवन से सटी दीवारों पर कितने बम तो खाली इस टेस्टिंग में फोड़ दिए गए होंगे कि गुरु! आवाज किसकी दमदार थी।कर्नलगंज थाने से तो हम छात्रों का का गजब का रिश्ता था।अक्सर यहाँ का थानेदार विश्वविद्यालय के किसी छात्रावास का पुरा अन्तःवासी होता ही है इस लिहाज से हम उन्हें अपना सीनियर ही मानते थे।लेकिन विरोध की स्थिति में हम अपना फ़र्ज़ पूरी शिद्दत से निभाते थे हम छात्र धर्म पुलिस वाले कानून का धर्म।हम उन्हें धिक्कारते थे,ललकारते थे पुलिस वाले फटकारते थे,कूटते थे पुचकारते थे।कुछ चिर युवा छात्र नेता ही हमारे पंच परमेश्वर थे।हर लड़ाई के बाद कॉफी हॉउस में बैठकर सर्वमान्य समझौता वही करा देते थे।कभी किसी बड़े नेता विधायक की जरूरत ही नहीं पड़ी आज तक। किसी भी आंदोलन में यहाँ के नारे गज़ब होते थे।जैसे , जीतेंगे तो रम चलेगा,हारेंगे तो कट्टा बम चलेगा। मरिहै कम हड़कइहीं ज्यादा,......... दादा ......दादा। सारे हॉस्टल्स में तनातनी बनी ही रहती थी।हर हॉस्टल का दूसरे हॉस्टल कुछ यूनिक से नाम रखते आते थे ।बम कट्टा की टेस्टिंग अपने हॉस्टल के पिछवाड़े में भी कर लेते थे तब के वारियर छात्र।आये दिन एक दूसरे ग्रुप की थुराइ चलती रहती थी।हॉस्टल के भीतर abvp, nsui, आइसा, sfi, युवजन सभा,बहुजन छात्र संघ के छात्रों का एकसाथ रहना होता था।लेकिन क्या मज़ाल जो कोई हॉस्टल के भीतर घुस के किसी को पीट दे।हॉस्टल के सभी छात्र एक परिवार के सदस्य होते थे।पीसीएस के एग्जाम,डिग्री के एग्जाम में एक दूसरे को डिस्टर्ब नहीं होने देने का अघोषित प्रण लिए होते थे।लल्ला चुंगी से यूनिवर्सिटी चौराहा, लक्ष्मी चौराहे से कटरा नेतराम तक,साइंस फैकल्टी के गेट से हिन्दू हॉस्टल चौराहे तक हमारी अपनी रियासत थी।साला इतना कूटे या कुटाई खाये कभी मीडिया ने इतना महत्त्व दिया ही नहीं।रवीश जी हो चाहे अंजना जी ,सरदाना जी हो चाहे अवस्थी थी या वाजपेयी जी किसी पत्रकार ने न हमे पीड़ित बताया न हमने उन्हें बताने की जरूरत ही समझी। हॉस्टल्स की तनातनी के बीच एक दूसरे से हमारे मधुर सम्बन्ध भी खूब रहते थे।एक दूसरे के राष्ट्रीय नेताओं का एक साथ बन्द मख्खन खाते हुए मजाक उड़ाना हमारी परंपरा सी थी ।हम भावुक से या यूं कहें चूतिया हिंदी माध्यम के छात्र इतने आधुनिक कभी नहीं हो पाए कि कभी बाहरी लड़कों को बुलाकर अपने भाइयों जो कि विरोधी विचारधारा के हो पिटवा सकें।हम ग़रीब घरों से ,मध्यम वर्गीय छात्र कभी अपनी गऱीबी को बेच नहीं पाए।न हम देश को गरिया पाए न किसी बाहरी को कैंपस में घुस कर गरियाने का मौका दिया हमने।हम तो दूसरे छात्रों के धर्म विश्वास आस्था का हनन न होने पाए इस ख्याल से अपनी आस्था,अपने शौक को थोड़ा दबा ही लेते थे। पहले लगता था कि हम कम प्रगतिशील हैं लेकिन कल रात के बाद लगा कि हम ही ठीक थे यार।अपने मे निपट लेंते थे लेकिन क्या मज़ाल जो कोई दूसरा हमारे हॉस्टल हमारे घर मे घुस पाए।जे एन यू सहित सभी विश्वविद्यालयों के छात्रों को हमारी हॉस्टल परम्परा से सीखने की जरूरत है। एक नारा आज गढ़ रहा हूँ फिर से और इसी के साथ बात समाप्त करूँगा::::; चाहे कितनी बढ़े आबादी,सबले बढ़िया इलाहाबादी।।। सादर दिवाकर Diwakar Dubey



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श्रीनिवास रामानुजम ; एक गणितज्ञ की अध्यात्मिकता सृजनात्मकता

नयी दिल्ली /मद्रास | 23 Dec ,Monday 112

अनंत से अनंत तक का यात्री रामानुजन की जयंती पर... (यह आलेख मेरे शीघ्र प्रकाश्य गद्य संकलन आवारा बादल में समाहित है) यह बड़ी अजीब सी बात है कि साहित्यिक अभिरुचि का आदमी होकर भी मैं किसी कवि या लेखक की जीवनगाथा पढ़ते हुए उतना द्रवित कभी न हो सका जितना कि श्रीनिवास रामानुजन के बारे में पढ़ते हुए हुआ । रामानुजन का छोटा सा जीवन शीत की कुहेलिका में डूबे किसी दिव्य सरोवर सा है जो क्षण क्षण अपना रूप खोलता है । उसमें जितनी काव्यात्मकता,करुणा और आनंद है उतना कथा-कहानियों में नहीं । उसमें उतरना तो हम जैसी अगणितीय आत्माओं से कोसों दूर है, उसकी दिव्यता को छू भर लेना ही हमारे लिए परमाद्भुत रत्न को पाने जैसा है । उनके जन्म की कहानी। उनकी बचपन की विचित्रता। बहुत छोटी उम्र में उनके द्वारा पूछे गए विस्मयकारी प्रश्न और धीरे-धीरे गणित में धंसते हुए कुछ विलक्षण सोचना या करना, यह सब अपवादातात्मक या प्रतीयमान ही है । रामानुजन की दिव्यता का आभास यों तो बचपन से होने लगता है तथापि उनकी अपूर्व प्रतिभा का प्राकट्य तेरह-चौदह वर्ष की उम्र से होता है जब वे लोनी की त्रिकोणमिति की पुस्तक को समाप्त करते हुए उसके कुछ प्रमेयों का विस्तार कर जाते हैं । यद्यपि वे अनभिज्ञ हैं कि दुनिया उन प्रमेयों पर काम कर चुकी है । इस समय तक तो रामानुजन किसी अनजान गिरिगेह के शून्य में बैठे थे, जहां से कुछ प्रकाशित होना या विश्व में गणित पर होने वाले कार्यों को जानना असंभव ही था । रामानुजन की एकाधिक चिट्ठियां मेरे मन को विकल करती हैं । जब वे रामास्वामी अय्यर से अरज करते हैं या कैंब्रिज के प्रख्यात गणितज्ञ जी एच हार्डी को अपने प्रमेय भेजते हुए किसी दैवीय विश्वास से भरे हुए दीखते हैं । हार्डी को एक पत्र में तो वे यहां तक कहते हैं कि उन्हें अपने मस्तिष्क या बुद्धि को बचाए रखने के लिए फिलहाल भोजन की आवश्यकता है । क्योंकि वे अधभुखमरी की हालत में जी रहे हैं ।उऩके द्वारा भेजे गए प्रमेयों पर हार्डी की मुहर उन्हें मद्रास यूनिवर्सिटी या सरकार द्वारा छात्रवृत्ति दिलाने में कारगर होगी। बीसवीं सदी में भारत और विश्व के संपूर्ण बौद्धिक पटल पर रामानुजन सा विचित्र मनुष्य दूसरा नहीं हो सका । विचित्र इसलिए कि वे, तर्क और अध्यात्म के तत्व का जो अंतर्दृष्टिमूलक विपर्यय है, उसे एक साथ साधते हैं । एक ओर उनकी विलक्षण मति है जो प्रतिपल कुछ नवीन और प्रातिभ तेज से सामने वाले को हैरान करती है । दूसरी तरफ़ उनका अध्यात्म है जो उनकी मेधा को उर्जस्विता प्रदान करता है । बल्कि वह मेधा उसी आध्यात्मिक आभा, अंत:प्रज्ञा से मंडित है । उन्होंने अपने कई प्रमेयों पर बात करते हुए कहा था कि यह देवी नामगिरी ने स्वप्न में आकर बतला दिया था । यह बात भी दीगर है कि रामानुजन कई बार अर्द्धरात्रि में नींद से उठकर गणित के प्रमेय लिखने लगते थे । गणित जैसे गूढ़ विषय पर आधुनिक विश्व में ऐसा कोई दूसरा धुरंधर नहीं दीखता जो अपने प्रमेयों को कुलदेवी का प्रसाद कहता रहा हो । जर्मनी के रीमान एक और महान गणितज्ञ थे जो आध्यात्मिक प्रभा से दीप्त थे । रामानुजन कहा करते थे; “यदि कोई गणितीय समीकरण या सूत्र किसी भगवत विचार से मुझे नहीं भर देता तो वह मेरे लिए निरर्थक है ।” रामानुजन और उऩकी माता का जीवन एक अदृष्टपूर्व आध्यात्मिक चिंतन से अंतर्गुंफित है। माना जाता है कि रामानुजन की माता ने एक स्वप्न देखा था कि उनका पुत्र यूरोपीय लोगों से घिरा हुआ है और देवी नामगिरी उन्हें आदेश दे रही हैं कि वह अपने पुत्र की यूरोप यात्रा में बाधा न बनें । एक कथा यह भी है कि रामानुजन अपनी कुलदेवी के मंदिर में तीन रातों तक सोते रहे । दो दिनों तक तो कुछ भी नहीं हुआ लेकिन तीसरी रात को वे नींद से जागे और उन्होंने नारायण अय्यर को यह कह कर जगाया कि देवी ने उन्हें विदेश जाने का आदेश दिया है। रामानुजन की माता बहुत महत्वाकांक्षी थीं । उन्होंने अपने पुत्र के गणित प्रेम को उनकी जीवन सहचरी पर प्रश्रय दिया । पत्नी, जानकी अम्माल रामानुजन के लिए कुछ विशेष नहीं कर सकीं । विवाह के बाद के कुछ वर्षों तक वे वीतरागी ही रहे । बाद में इंग्लैंड प्रवास के कारण पत्नी से दूर ही हो गए । जब बीमार होकर भारत लौटे तो कुछ महीनों तक पत्नी के साथ रहे । तब जानकी अम्माल ने उनकी बहुत सेवा की । उन दिनों में वे विह्वल होकर कहते थे कि अगर तुम मेरे साथ रही होतीं तो मैं बीमार न होता ! इंग्लैंड में उनके साथ काम करते हुए प्रख्यात गणितज्ञ प्रोफेसर हार्डी ने कहा था, ‘’सबसे आश्चर्यचकित करने वाली बात उसकी वह अंतर्दृष्टि है जो सूत्रों और अऩंत श्रेणियों के रूपांतरण आदि में दिखती है। मैं आजतक उसके समान किसी व्यक्ति से नहीं मिला और मैं उसकी तुलना आयलर तथा जैकोबी से ही कर सकता हूं।‘’ महान गणितज्ञ लिटलवुड भी उन्हें जैकोबी मानते थे । प्रोफेसर हार्डी ने अन्यत्र लिखा है: ‘’ उसके ज्ञान की कमी भी उतनी ही विस्मय कर देने वाली थी जितनी कि उसके विचार की गहनता।वह एक ऐसा व्यक्ति था जो उस स्तर के मौड्यूलर समीकरण पर कार्य कर सकता था या कॉम्प्लेक्स गुणा कर सकता था जिसके बारे में किसी ने सुना तक न हो । निरंतर लंगड़ीभिन्न पर उसका इतना अधिकार था जितना विश्व में कदाचित किसी भी गणितज्ञ को नहीं था । उसने स्वयं ज़ीटा फंक्शऩ के समीकरण का पता लगा लिया था। उसने कभी डबल पीरी आइडिक फंक्शन या कॉची थ्योरम का नाम भी नहीं सुना था परंतु एनैलीटिकल नंबर थ्योरी की विशाल राशियों से से वह खेलता रहता था ।’’ प्रोफेसर हार्डी ने अन्यत्र कहा था कि उन्हें खुद को, महान गणितज्ञ लिट्लवुड और रामानुजन को आंकना हो तो वे खुद को सौ में पच्चीस, लिट्लवुड को पैंतीस और रामानुजन को सौ में से सौ अंक देंगे । महान दार्शनिक बर्टरेंड रसल हंस कर मजाक करते थे कि हार्डी और लिट्लवुड को लगता है कि उन्होंने पच्चीस पाउंड के खर्च में भारत से किसी नए न्यूटन को खोज लिया है । भारत लौट आने के बाद अपनी असाध्य रुग्णता के दिनों में उन्होंने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य किया । उन्होंने हार्डी को लिखे अपने पत्र में मॉकथीटा फंक्शन का जिक्र किया है। अमेरिकी गणितज्ञ प्रोफेसर जॉर्ज एंड्रूज़ रामानुजन के कार्यों पर शोध करने वाले अधिकारी गणितज्ञ माने जाते हैं । उन्होंने रामानुजन के इस सूत्र पर विचार करते हुए पचास वर्ष के बाद लिखा था.. ‘’इनको समझना किसी अच्छे गणितज्ञ तक के लिए कठिन है। एक वर्ग के पांच सूत्रों में से पहला मैंने पंद्रह मिनट में सिद्ध कर लिया था, परंतु दूसरे को सिद्ध करने में एक घंटा लगा चौथा दूसरे से निकल आया और तीसरे तथा पांचवें को सिद्ध करने में मुझे तीन महीने लगे “’ आज दुनिया के सभी महान गणितज्ञ इस बात से सहमत हैं कि आधुनिक विश्व की नैसर्गिक प्रतिभाओं में रामानुजन की तुलना संभवत: किसी और से हो ही नहीं सकती, जैकोबी और आयलर को छोड़कर । रामानुजन का पूरा जीवन ही इस बात का शाश्वत प्रमाण है कि अध्यात्म से सिंचित भारतीय मेधा और चिंतन परंपरा साक्षात ईश्वरीय संकेतों से चालित होती है। सिर्फ बत्तीस वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन जब वे विदा हुए तो पश्चिम का रंगभेदी दर्प ध्वस्त हो चुका था । रामानुजन पहले भारतीय थे जिन्होंने यह सिद्ध कर दिया था कि प्रतिभा रंग की मोहताज नहीं होती । एक साधारण कद काठी के काले मद्रासी ने बिना किसी विदेशी शिक्षा या पारंपरिक पठन पाठन के पश्चिमी गोरी चमड़ी के श्रेष्ठताबोध को तोड़ डाला था ।उनकी मृत्यु के बाद रामचंद्र राव ने लिखा था: “उसका नाम भारत को यश देता है और उसका जीवनवृत्त प्रचलित विदेशी शिक्षा प्रणाली की कटु निंदा का द्योतक है । उसका नाम उस व्यक्ति के लिए ऐसा स्तंभ है जो भारतीय अतीत के बौद्धिक सामर्थ्य से अनभिज्ञ है ।जब दो महाद्वीप उनके खोजे गणित के नए सूत्र प्रकाशित कर रहे थे तब भी रामानुजन वही बालोचित, दयालु और सरल व्यक्ति बना रहा, जिसको न ढंग के कपड़े पहनने का ध्यान था, न ही औपचारिकता की परवाह। इससे उनके कक्ष में मिलने आने वाले आश्चर्य के साथ कह उठते थे कि क्या यही वह हैं.. यदि मैं एक शब्द में रामानुजन को समाना चाहूं तो कहूंगा, भारतीयता ” अंत में श्रीनिवास रामानुजन के लिए लिखी अपनी ही एक कविता से उन्हें श्रद्धांजलि देता हूं.. जब तुम्हारे सहपाठी अंकों के आवागमन में दिमाग के विश्राम का द्वार टटोलते थे तब तुम शून्य से शून्य तक की यात्रा कर रहे थे ! तुम अनंत में पहले उतर आए वहां से अंत के सभी छोरों को कितनी सहजता से छू लिया तुमने संख्याएं तुम्हारी सहचरी बनीं दुकान पर हिसाब में जुड़ने वाली नहीं अनादि से अब तक गणितज्ञों के गूढ़ ब्रह्मांड में उड़ने वालीं अगणित तारिकाओं की तरह टिमकने वालीं तुमने अंकों की अनंताध्यायी रची जैसे एकल अंकों का वर्ण-विचार उनकी संधियों और सामासिकता का स्वरूप उनकी संज्ञा, विशेषण और सर्वनाम काल के सतत प्रवाह में उनकी नई पहचान संख्याओं का शाब्दिक संसार और उनका विचित्र विन्यास भी यह सब तुमने कहां से सीखा? तुम्हारी चमकती आंखों के पीछे क्या उसी देवी का सरोवर था! जो अकसर तुम्हारे स्वप्न में आती रहीं और खुद ही तोड़कर तुम्हें सौंपती रहीं सूत्रों के शतदल !



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