बड़ी खबरें
>> #प्रियंकारेड्डीकोन्यायदो>> महाराष्ट्र देवेंद्र पवार की हार,महा गठजोङ की बनेगी सरकार>> 491 वर्षों बाद रामजन्म भूमि मंदिर विवाद पर आया अंततः आया निर्णायक निर्णय :रामलला विराजमान को मिला विवादित स्थल का मालिकाना हक। >> प्रदूषण से हुयी उत्तर भारत की हालत खराब>> कश्मीर:धारा370/35ए का उन्मूलन और नये कश्मीर का विमर्श- अग्निशेखर,कवि एवं साहित्यकार>> आखिर प्रीति माथुर पर भाजपा समेत सारे प्रगतिशील दल चुप क्यों हैं? -शंभूनाथ ,लेखक एवं पत्रकार>> ऋषिकेश मे मां गंगा के घाटों की स्वच्छता के लिए एक पुलिस अधिकारी ने बनायी 'खोमचा पुलिस'>> एक्जिट पोल्स की माने तो फिर एक बार मोदी सरकार के संकेत-भाजपा को अकले मिल सकता है बहुमत>> अपने ही 'गढ़' रायबरेली में सोनिया की डगर मुश्किल, प्रियंका को भी भाव नहीं ​दे रही जनता>> सरकार ने डीएम पर दबाव बना कर रद्द करवाया मेरा नामांकन: तेज बहादुर      

ताज़ा लेख

कश्मीर:धारा370/35ए का उन्मूलन और नये कश्मीर का विमर्श- अग्निशेखर,कवि एवं साहित्यकार

नई दिल्ली/जम्मू कश्मीर | 03 Sep ,Tuesday 323

अनुच्छेद 370 हटने के बाद कर्मेन्दु शिशिर और अशोक कुमार पाण्डेय की बिन्दुवार बहस : कौन कितना सही -अग्निशेखर आज मैंने एक मित्र के यहाँ वाइ-फाइ की सुविधा का लाभ उठाते अनुच्छेद 370 हटाए जाने के दूसरे दिन यानी 6 अगस्त 2019 को लिखी कर्मेन्दु शिशिर की पोस्ट और उसे बिन्दुवार नकारती हुई अशोक कुमार पाण्डेय की प्रतिक्रिया पढ़ी। यह एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है और आज से नहीं, 26 अक्तूबर 1947 के दिन हुए भारत के साथ हुए विलय से ही चर्चा में रहा है । बल्कि इस मुद्दे से बेशुमार राजनीतिक रोटियाँ सेंकी जाती रही हैं । यहाँ चूंकि कर्मेन्दु शिशिर की बातों को अशोक कुमार पाण्डेय ने व्हाट्सेप आधारित जानकारी कहकर उनको ख़ारिज करने की उतावली और अपना CUT PASTE ज्ञान बघारने की रस्म निभाई है इसलिए मुझे जम्मू-कश्मीर के मूल निवासी और उसकी लोकवार्ता , उसके इतिहास-भूगोल सहित उसकी आधुनिक राजनीति का विनम्र किंतु जागरूक विद्यार्थी होने के नाते बिन्दुवार हस्तक्षेप करना ज़रूरी लगा । कर्मेन्दु शिशिर लिखते हैं : (1) " यह बात विचित्र है कि कश्मीर की कोई लड़की गैर कश्मीरी से शादी करें तो उसके सारे अधिकार खत्म और पुरुष गैरकश्मीरी लड़की लाये तो उसे सारे अधिकार हासिल।इस अन्यायपूर्ण कानून पर कोई बहस चाहिए क्या? इसे कश्मीरी नेताओं ने खुद क्यों नहीं बदल लिया? " # # अशोक कुमार पाण्डेय का खंडन : ____________________ " 2002 में आया था जम्मू और कश्मीर हाईकोर्ट का फैसला।उसके बाद से कश्मीरी लडकी किसी से शादी करे उसकी नागरिकता पर असर नहीं पड़ता।मेरी किताब में भी है और भी हर जगह ।आपने व्हाट्सेप पर भरोसा किया।" # # मेरा हस्तक्षेप : -कर्मेन्दु शिशिर ने सही सवाल उठाया है और अशोक कुमार पाण्डेय ने अधूरा जवाब देकर गुमराह करने का कुत्सित खेल रचा है । वास्तव में 7 अक्तूबर 2002 को हाईकोर्ट की Full Bench का जो निर्णय आया जिसमें न्यायाधीश झांजी(Jhanji) और दोआबिया (Doabia) ने स्पष्ट किया- " The daughter of a permanent resident marrying a non-permanent resident will not lose the status of permanent resident in the state of Jammu and Kashmir." अशोक कुमार पाण्डेय ने कर्मेन्दु शिशिर को यह नहीं बताया कि तत्कालीन केंद्र सरकार की रज़ामंदी और नेशनल कान्फ्रेंस और पीडीपी राजनीति और राज्य सरकार ने इसे कैसे अर्धसत्य अथवा अपंग न्याय ( "Half Judgement " ) में बदला और इसे कभी लागू नहीं होने दिया। इस ऐतिहासिक निर्णय की वाहवाही तो हुई,जो कि होनी ही चाहिए थी, इसे राज्य से बाहर किसी गैर राज्यीय नागरिक से विवाह करने वाली मेरी नागपुर निवासी अपनी छोटी बहन और मुम्बई निवासी बेटी जैसी हज़ारों स्त्रियों की नागरिकता तक ही सीमित कर दिया गया। अर्थात् मेरी छोटी बहन और मेरी बेटी की नागरिकता पंगु कर दी गयी।उनका पैतृक संपत्ति का अधिकार उनतक ही सीमित माना गया।यानी मेरी बहन और मेरी बेटी इस निर्णायक जजमेंट के बावजूद अपनी पैतृक संपत्ति का कुछ नहीं कर सकतीं ।न अपने बच्चों/ संतति को ही अग्रेषित कर सकती हैं और न उनके बच्चे ही अपनी माँ की पैतृक संपत्ति के उत्तराधिकारी हो सकते हैं ।क्योंकि जजमेंट को पंगु बना दिए जाने के बाद जम्मू-कश्मीरराज्य की ऐसी बेटियों की नागरिकता को उन तक ही सीमित कर दिया गया । इस जजमेंट के बाद कभी नेशनल कान्फ्रेंस और कभी पीडीपी ने इसे विधान सभा में कभी एक कानून भी नहीं बनने दिया। तत्पश्चात सन् 2004 और सन् 2010 में Permanent Resident Disqualification Bill (PRC Bill) को राजनीतिक नौटंकी के तहत कभी पटल पर नेशनल कान्फ्रेंस ने तो कभी पीडीपी ने रखा।इसे विवादित बनाकर विधान परिषद तक पहुँचने ही नहीं दिया गया।इसे तत्कालीन केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के कारण कानून बनाने में अडंगे डाले गए । अंततः इस विधायक को कानून बनने से रोकने के आशय से 5 अप्रैल 2010 में तकनीकी त्रुटि ( "technical flaw" ) के नाम पर सदा के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और विधान परिषद ( upper House ) जाने का इसका रास्ता बंद किया गया । इसलिए कश्मीर पर श्रीमान् Cut Paste Writer और स्वयंभू विशेषज्ञ अशोक कुमार पाण्डेय ने जानबूझकर अर्धसत्य कहा है। यह तो अब इधर अगस्त 2019 के constitutional Order no 272 के तहत 35-A के गिर जाने से जम्मू-कश्मीर की ऐसी बेटियों को पूर्ण नागरिकता के अधिकारों की बहाली हुई है । उनके साथ अब कोई लैंगिक भेदभाव नहीं होगा । वे अब लगभग सात दशकों के बाद संविधान प्रदत्त उन सभी मूल अधिकारों की हकदार हैं जो किसी भी भारतीय नागरिक को धारा 14,15,16,19,20 और 21 के अंतर्गत प्राप्त हैं । यह कश्मीर की मुस्लिम राजनीति से प्रेरित एक खास पितृसत्तात्मक मानसिकता(typical patriarchal mindset) और श्रीमान् अशोक कुमार पाण्डेय जैसे उसके अंध समर्थकों के गिरोह के लिए एक बड़ा धक्का है। # # कर्मेन्दु शिशिर लिखते हैं : (2) "पंजाब से दलित सफाई मजदूरों को गंदगी साफ करने के लिए लाकर बसाया गया उनकी तीन पीढ़ियाँ गुजर गई।आपने क्यों नहीं उनको वोट का अधिकार दिये?आप दे दिये होते।" अशोक कुमार पाण्डेय का खंडन : _____________________ " 2,3 प्वाइंट इतने सीधे नहीं जितना आप सोचते हैं। 35ए के तहत नागरिकता नहीं संभव थी,उसके लिए किसी ने पहल नहीं की ।आप वालों ने भी नहीं ।शरणार्थियों को नागरिकता दी गई।जम्मू में सब के सब वोटर्स हैं ।जाकर देख आइए।" ## मेरा हस्तक्षेप : -" कर्मेन्दु शिशिर के दूसरे बिन्दु के साथ उनके उठाए तीसरे बिन्दु (पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर और पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों की नागरिकता) को मिलाकर दोनों पर अशोक कुमार पाण्डेय ने जो चलताऊ और गैर -ज़िम्मेदाराना प्रतिक्रिया दी है उससे उन्होंने यहाँ भी अपने 'कट पेस्ट विशेषज्ञ' होने का ही सबूत दिया है । यह लाल बुझक्कड़ कैसा ज्ञान बघार रहा है हिंदी जगत को ! जिन दलित सफाई मज़दूर भाई बहनों को पंजाब से गंदगी साफ करने के लिए लगभग सौ साल पहले जम्मू लाकर बसाया गया ,उनको कौन सा वोट का अधिकार है ? वे पीढ़ी- दर-पीढ़ी मैला ढोने वाले ही रखे गए। अशोक कुमार पाण्डेय से कोई कहे कि जम्मू आकर मेरे साथ चलकर उनकी बस्ती में आकर देखें ।उनसे मिलें । जम्मू में पश्चिम पाकिस्तानी शरणार्थियों की नागरिकता बहाली के लिए, मानवाधिकारों के घोर हनन अर्थात् एक प्रकार का नस्लभेद (Apartheid) के सवाल पर समय समय पर आवाज़ उठती रही है।अपनी सीमाओं में संघर्ष चलता रहा है । इन शरणार्थियों को कब और किसने नागरिकता दी ? इन देशभक्तों के साथ दशकों से अन्याय होता आ रहा है । क्या वो किसी सरकारी नौकरी अथवा कल्याणकारी योजना के लिए आवेदन कर सकते थे ,नहीं ! यह तो अब अनुच्छेद 370 हटने के बाद वे लोग अन्य सामान्य नागरिकों की तरह बराबर की योग्यता वाले हो गये। लंबे संघर्ष के इतिहास बाद आखिर अब उनका सपना साकार हुआ है। उनके नाम के साथ "पश्चिमी पाकिस्तान रिफ्यूजी" का टैग समाप्त हो गया । शरणार्थी लोकसभा चुनाव में मतदान तो कर सकते थे , विधानसभा चुनाव में कदापि नहीं ।क्या ये सरासर नाइंसाफ़ी नहीं थी? क्या अशोक कुमार पाण्डेय कर्मेन्दु शिशिर के उठाए मुद्दे के जवाब में यह तथ्य भी बताने की ज़ेहमत उठाएंगे कि कैसे कश्मीर के तथाकथित कद्दावर सेक्युलर नेता शेरे कश्मीर शेख़ मुहम्मद अब्दुल्ला ने कैसे तकरीबन साठ साल पहले तिब्बत और चीन के मुस्लिम शरणार्थियों को कश्मीर में शरण दी जिनकी बस्ती को श्रीनगर में 'ब्वटॅ सराय' (भोट सराय) कहते हैं और पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर से आए हिंदू शरणार्थियों को घाटी में न रहने देकर जम्मू भगा दिया। झूठ बोल रहे हैं अशोक कुमार पाण्डेय । नागरिकता आदि को लेकर उनका यह तर्क कि ये मुद्दे 'इतने सीधे नहीं' का क्या मतलब हुआ कि लगभग एक शताब्दी से उनके हवा में लटके रहने को जायज़ ठहराओगे क्योंकि आप यहाँ मुस्लिम अलगाववादी राजनीति के वर्चस्व के पक्षधर हो ? ## कर्मेन्दु शिशिर लिखते हैं : (4) "आपने गैरमुस्लिम आबादी के लिए पोस्टर चिपकाये जवान बेटियों,बहुओं को छोड़कर बूढ़ी औरतों के साथ सारे गैरमुस्लिम घाटी छोड़ दो।उनके साथ बलात्कार हुए,नंगी कर बीच से आरे से चीर दिये? तब मानवाधिकार कहाँ था? यह स्पेस नहीं देता है? भाजपा को स्पेस हवा में नहीं मिला है।सोचिए और गलत है तो बताइये न? ## अशोक कुमार पाण्डेय का खंडन : _____________________ "आपने"? कौन से आपने ? सारे कश्मीरी मुसलमानों ने ? मौलाना मदूदी और मीरवायज़ ने जो मार दिए गए उसी दौरान ? नेशनल कान्फ्रेंस के कोई दो सौ लोगों ने जो मार दिए गए उसी दौरान? मेरे पास एक इंटरव्यू है जिसमें एक कश्मीरी पंडित ,जो अब भी रह रहा है कश्मीर में,उसने बताया कि स्थानीय नेशनल कान्फ्रेंस के नेता ने कहा था जब तक वह है किसी को जाने की ज़रूरत नहीं ।उसे मार दिया आतंकवादियों ने।कुछ के किए का सब पर लाद देंगे और ऐसी थियरी देंगे ? तो देव हर लिंचिंग के लिए आप और मैं भी ज़िम्मेदार हैं ।" ## मेरा हस्तक्षेप : -" यों तो हत्याएँ हत्याएँ होती हैं और उनके आंकड़ों से तर्क वितर्क करना अपराध होता है,यहाँ जिहादियों द्वारा हत्याओं के पीछे के आशय जानना आवश्यक है। जिहाद का इतिहास है कि यह अपने लक्ष्य को छल बल से टार्गेट तो करता ही है, अपने रास्ते में आने वाले स्वधर्मियों को भी निर्ममता खत्म करता है। यहाँ कर्मेन्दु शिशिर ने कश्मीरी हिंदुओं की बर्बर हत्याओं का जो मुद्दा उठाया है उसपर उसपर सहानुभूति का एक औपचारिक शब्द न कहकर अशोक कुमार पाण्डेय उसे गौण करने का कुत्सित प्रयास करते हैं । इस जिहादी आतंक की भेंट चढ़े सभी मृतकों के प्रति अफसोस प्रकट करते हुए मैं इन महाशय के जवाब में कहना चाहूँगा कि एक ओर तो कश्मीर में चल रहे पाकिस्तान समर्थित अलगाववादी हिंसाचार को आप कश्मीरियों की अवामी तहरीक कहते हैं तो कश्मीरी मुसलमानों के 'मेहमान मुजाहिद्दीनों' को आप जनता से अलग कर के भी दिखाना चाहते हैं । जब नब्बे के दशक में आए दिन घाटी भर में लाखों लाख मुसलमान सड़कों पर निकलते थे,वो कौन सी अवाम थी ?क्या वे पाकिस्तान, अफगानिस्तान,सऊदी अरब अमीरात या ईरान के मुसलमान थे ? क्या आम लोगों ने पाकिस्तानी दहशतगर्दों को " मेहमान मुजाहिद्दीन " कहकर अपने घरों में शरण नहीं थी? जहाँ तक मौलाना मसूदी ( मदूदी नहीं जैसा कि अशोक कुमार पाण्डेय ने उनका नाम लिखा है) की नृशंस हत्या का प्रश्न है,उसके पीछे एकाधिक कारण रहे होंगे । एक ज़माने में शेख मुहम्मद अब्दुल्ला के साथी रहे मौलाना मसूदी जनता पार्टी में भी शामिल हुए थे ।ऐसा लगता है बुजुर्ग मौलाना मसूदी सहित मौलवी फारूक और गनी लोन( एक ज़माने में कांग्रेसी तथा शिक्षा मंत्री)आदि को पाकिस्तानी आलाकमान शक की नज़र से देखते रहे। रही बात नैशनल कान्फ्रेंस के कोई दो सौ लोगों की आतंकवादियों द्वारा हत्याओं की , 'निज़ामे मुस्तफा' ( कट्टरपंथी इस्लामी राज्य) कायम करने के लिए जिहादी, जिसे भी या जिन्हें भी चाहें, वे उनके अपने ही मुसलमान क्यों न हों ,वे रणनीति के तहत मार डाल दिए जाते हैं । अशोक कुमार पाण्डेय कश्मीर घाटी में रहे रहे किसी एक विरले कश्मीरी पंडित से लिए इंटरव्यू का हवाला देते हैं कि उन्हें आतंकवादियों के हाथों मारे गए ऐसे किसी नेशनल कान्फ्रेंस के नेता ने आश्वासन दिया था कि किसीके भागने की ज़रूरत नहीं । वह ज़रूर कोई नेकदिल इंसान रहा होगा।ऐसे अपवाद हर कहीं और हर दौर में होते हैं । ऐसा अपवाद इतने बड़े कश्मीरी पंडित 'जीनोसाइड'( genocide) और धर्म आधारित जातीय सफाए ( religious cleansing) को झुठलाना नहीं सकता। ## कर्मेन्दु शिशिर लिखते हैं : (5) "पाकिस्तान तो खैर पाकिस्तान है ही।मुफ्ती महबूबा कह रही है कि यह जरूरी इसलिए है कि यहाँ हर हाल में मुस्लिम समुदाय का बहुमत और वर्चस्व बना रहे।आप सोचिए ठीक इसी सोच की तो भाजपाई रट लगाये हैं कि हिन्दू का बहुमत और वर्चस्व बना रहे।मुझको हिन्दू मुस्लिम से कुछ नहीं लेना-देना है लेकिन एक बुद्धिजीवी के नाते कहियेगा कि मुस्लिम बहुमत और वर्चस्व के पक्ष में खड़े होइये और हिन्दू बहुमत और वर्चस्व के विपक्ष में ?तो मैं हर हाल में किसी भी तरह के बहुमत की नृशंसता का विरोध करूँगा ही करूँगा।भले अकेले पड़ जाऊँ।" ## अशोक कुमार पाण्डेय का खंडन : ______________________ " ....कश्मीर भारत का इकलौता मुस्लिम बहुल प्रदेश था,उसकी संस्कृति और धार्मिक स्वरूप की रक्षा का वचन दिया था भारत ने। 99 फीसद राज्य हिन्दु बहुल हो तो सेकुलरिज्म है और कोई समस्या नहीं, एक राज्य मुस्लिम हो तो सारी समस्या वहीं हैं ।गज़ब है एकदम।" ## मेरा हस्तक्षेप : - " यहाँ बात किसी राज्य के मुस्लिम बहुल होने की नहीं है ।जम्मू और कश्मीर राज्य धर्मनिरपेक्ष भारत की धरती पर मुस्लिम राज्य के रूप में a state within state की है जिसे धीरे धीरे एक Semi-Muslim Nation के रूप में पनपने दिया जाता रहा ।यह लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष भारतीय संविधान का जीता जागता अंतर्विरोध था जो विगत दशकों से अब परोक्ष रूप से भारत विरोधी जिहादी सोच का सहायक ( Collaborator) था। याद करें पूर्व विधायक और पेंशनयाफ्ता अलगाववादी हुर्रियत नेता का बयान ( यूट्यूब पर उपलब्ध) : " यहाँ सेक्युलरइज्म नहीं चलेगा! यहाँ सोशलइज्म नहीं चलेगा ! यहाँ नैशनलइज्म नहीं चलेगा ! यहाँ सिर्फ और सिर्फ इस्लाम चलेगा ! हम पाकिस्तानी हैं पाकिस्तान हमारा है!" इन्ही सबसे बड़े अलगाववादी नेता के शब्दों में यह आज़ादी की लडाई इस्लाम के लिए आज़ादी की तहरीक थी : " आज़ादी बराए इस्लाम!" इसी जिहाद का घोषित एजेंडा था : - बटन हिंज़ कबर कशीरि न्यबर (अर्थात् कश्मीरी पंडितों की कब्रें घाटी से बाहर खोदी जाएँ यानी कश्मीरियों पंडित कश्मीर से बाहर जा मरें।) - असि छु बनावुन पाॅकिसतान बटल रोसतुय बटव सान ( हमें यहाँ पंडित की स्त्रियों सहित और पंडित पुरुषों को छोड़कर पाकिस्तान बनाना है। -ऐ काफिरो ! ऐ ज़ाबिरो ! कश्मीर हमारा छोड़ दो ! या -यहाँ क्या चलेगा? निज़ामे मुस्तफा! - पाकिस्तान से रिश्ता क्या ? लाइल्लाह इल्लाह! यह होता है धर्मनिरपेक्ष भारत की धरती पर अलगाववादी मुस्लिम साम्प्रदायिक वर्चस्ववादी राज्य के बनने देने का नतीजा।इसे ही कानून की भाषा में अनुच्छेद 370 और 35 -ए तथा विलयोत्तर कालखंड में गुमराहकुन " कश्मीरियत " की संज्ञा दी गयी जिसे लाखों कश्मीरी पंडितों के सामूहिक देशनिकाला, जीनोसाइड तथा सांस्कृतिक संहार (cultural genocide) से तार तार किया गया। ## कर्मेन्दु शिशिर लिखते हैं : (6) "आप कश्मीरियत कश्मीरियत चिल्लाते खूब हैं लेकिन आनंदवर्धन से लेकर नंदु ऋषि के सैकड़ों ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक प्रतीकों का इस्लामीकरण क्यों करते रहे? आपने यह सब किया और भाजपा के लिए यह सब शानदार खुराक बनती गई । # # अशोक कुमार पाण्डेय का खंडन : ______________________ (6) "ग़ज़ब है कर्मेंदु जी. इतना अज्ञानी आपको नहीं जानता था. नन्द ऋषि जानते हैं कौन थे? दो पीढ़ी पहले उनके पितामह ने धर्म परिवर्तन करके इस्लाम अपना लिया था. नाम था उनका शेख़ नुरूद्द्दीन. नुन्द का अर्थ किसी कश्मीरी से पूछ लीजियेगा. बता दूं कि कश्मीर में ऋषि (असल में रेष) परम्परा मुस्लिम सूफी परम्परा है. आप इतना कम जानते हैं कश्मीर के बारे में! लाल द्यद याद आईं? उन्हें शैव योगिनी की तरह याद किया जाता है. मटन का सूर्य मंदिर उसी रूप में है. श्रीनगर का शंकराचारी भी. गणेश मंदिर भी. खीर भवानी भी. कम से कम साहित्य अकादमी से छपा शेख़ नुरूद्द्दीन पर मोनोग्राफ पढ़ लिया होता यहाँ ज्ञान देने से पहले." ## मेरा हस्तक्षेप : - इस स्वयंभू कश्मीर विशेषज्ञ अशोक कुमार पाण्डेय को कौन बताए कि नुन्दॠषि के पितामह ग्रज़ संज़ नहीं,बल्कि उनके पिता सलर संज़ कश्मीर में मुसलमान हो गये थे और सोद्र माॅज ( संस्कृत साद्रा ) उनकी माँ थीं जो कवयित्री भी बतायी जाती हैं । चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जन्मे नुंदॠषि खुद अपना नाम बताते हैं- सलर का पुत्र नुन्द संज़,मैं हूँ ।मेरे माता पिता दोनों संज़ राजाओं के कुल से हैं,याद रखो मेरा कुल संज़ ही है। शेख नुरुद्दीन वली नूरानी कहलाया जाना बाद की बाद है। नुन्द का अर्थ होता है सुन्दर ।और नुन्दॠषि ने अपने श्रुखों में अर्थात् श्लोकों में अपना नाम कहीं नुरुद्दीन नहीं लिखा है। नन्द ही लिखा है । लोगों के लिए वह सहजानंद और नुन्दॠषि ही रहे । नुन्दॠषि की सात पीढ़ियों की उपलब्ध वंशावली के अनुसार उनके पूर्वज किश्तवाड के राजपूत वंशी क्षत्रिय थे। अशोक कुमार पाण्डेय को यह नहीं मालूम कि कश्मीर में " मुस्लिम ऋषि परंपरा " और " सूफी परंपरा " दो अलग समांतर धाराएं रही हैं जिन्हें बाद में सूफियों की ईरानी और तुर्की मूल के नक्शबन्दी, सुहारवर्दी,नूरबख्शी,कुब्रवी और कादिरी सम्प्रदायों के प्रचार प्रसार के तहत सूफियों के 'वहदत्-उल-वजूद' की अवधारणा के साथ एक करने की कोशिश की गयी लगती है । कश्मीर में ऋषि परंपरा का क्रम बहुत पुराना है ।लोगों के धर्म परिवर्तन के बाद भी यह ऋषि परंपरा अक्षुण्ण बनी रही। इन मुसलमान ऋषियों के विचार चिंतन पर निश्चित रूप से वेदांत,शैव तथा बौध दर्शनों की प्रतिच्छाया है(शशिशेखर तोषखानी,कश्मीरी साहित्य का इतिहास,पृ 47)। प्रोफेसर मोहीउद्दीन हाजिनी के अनुसार "सामान्यतः कश्मीरी ब्राह्मणों के विश्वास और विशेषतः बौद्धों के विश्वास के अनुसार इन्द्रिय दमन ही आध्यात्मिकता प्राप्त करने की प्रथम आवश्यकता है ।या यह भी कहा जा सकता है कि कश्मीरी ब्राह्मण और बौद्ध एकांत सेवन अथवा पुरोहितत्व को ही ज्ञान प्राप्त करने की नींव जानते थे और इसके बिना वे मुसलमान प्रचारकों के प्रचार से किसी भांति प्रभावित नहीं होते थे।"(हमारा साहित्य 1984,पृ 27)। इसलिए कश्मीरी मुस्लिम ॠषि परंपरा के तीन चरण हैं ।एक, इस्लाम आगमन से पूर्व यानी नुन्दॠषि से पहले, नुन्दॠषि के समकालीन और उनके बाद। पता नहीं, कश्मीर के ''मटन का सूर्य मंदिर उसी रूप में है,श्रीनगर का शंकराचार्य भी।गणेश मंदिर भी।खीर भवानी भी " कहकर क्या कहना चाहते हैं विशेषज्ञ महोदय? क्या यही कि कश्मीर के मंदिरों के तोड़े जाने, क्षतिग्रस्त किए जाने, उनकी ज़मीनें,और शमशान भूमियां तक हड़पे जाने की बातें झूठी हैं ? यह यथार्थ को जानबूझकर झुठलाने (Policy of Denial ) के अभियान का हिस्सा है । ## कर्मेन्दु शिशिर लिखते हैं : (7) दुनिया के आज तक के इतिहास में कोई भी हुकूमत क्यों न हो, वह सशस्त्र विरोध को बर्दाश्त नहीं कर सकती।किसी कश्मीरी नेता ने आजतक महात्मा गाँधी के रास्तों पर चलते हुए विरोध दर्ज नहीं किया।सत्याग्रह सरीखा आंदोलन नहीं किया।अगर 72 साल इस शैली का आंदोलन चला होता तो बात कहाँ से कहाँ गई होती।उस पर आप पाकिस्तानियों का खुलेआम साथ लीजिएगा।आईएसआई के झंडे फहराइयेगा।मसलन मसल पावर से, थ्री नट थ्री से समस्या सुलझाइयेगा तो लीजिए सुलझाइये।मसल पावर के मामले में कर्मेन्दु शिशिर क्या कर सकते हैं -- घेवड़ा?दोनों पक्ष सिर्फ और सिर्फ अन्याय करता रहा है।बस मौके -मौके की बात है!" ## अशोक कुमार पाण्डेय का खंडन : _______________________ -"आपसे यह उम्मीद नहीं थी. जब आप जैसा हिन्दी का विद्वान कश्मीर का क जाने बिना ज्ञान देने का अधिकारी समझे खुद को तो वाकई हिन्दी पर शर्म आनी चाहिए." # # मेरा हस्तक्षेप : " खामोशी गुफ्तगू है बेज़ुबानी है ज़ुबां मेरी !" 0


पूरा लेख पढ़ें
आखिर प्रीति माथुर पर भाजपा समेत सारे प्रगतिशील दल चुप क्यों हैं? -शंभूनाथ ,लेखक एवं पत्रकार

नई दिल्ली | 28 Jul ,Sunday 238

दक्षिणपंथियों की यही सबसे बड़ी दिक्कत है कि वो अपने वास्तविक मसलों को भी नहीं उठा पाते, वहीं जिनकी कोई विश्वसनीयता नहीं है वे 40-50 लोग भी झूठी बातों को इतना फैला देते हैं कि सभी जगह उसी पर चर्चा होने लग जाती है। ओवैसी जैसा एक नंबर का मुस्लिम कट्टरपंथी अकेला होते हुए भी अपने समाज के झूठे, सच्चे सभी मसले संसद में उठा लेता है, फिर क्या वजह है कि दक्षिणपंथी BJP की 303 सांसद हिंदुओं के एक भी मुद्दे को संसद में नहीं उठा पाते। वो कौन सी बुनियादी दिक्कत है जो ऐसा नहीं हो पा रहा है। इसी तरह दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन होने का दावा करने वाला RSS भी वास्तविक मुद्दों को उठा पाने में बहुत पीछे है। RSS के संबद्ध कई ऐसे संगठन हैं जिन्हें हिंदुओं की आवाज़ उठाने के लिए बनाया गया था, ऐसा लगता है वे भी अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। बदली हुई परिस्थितियों में ये संगठन खुद को अपडेट नहीं कर पाए हैं। तभी तो ताकत होने के बावजूद मुद्दों में उबाल नहीं ला पाते। पिछले 4-5 सालों में हिंदुओं को बदनाम करने के सैकड़ों कामयाब बड़े प्रयास किए गए, कहीं भी ये मोर्चे पर मजबूती से खड़े नहीं दिखे। इसे एक उदाहरण से समझने की कोशिश कीजिए- दिल्ली के भोगल में एक मुसलमान ने सरे बाज़ार एक हिंदू लड़की को चाकुओं से गोदकर मार डाला, स्थानीय बहादुर लोगों ने उसे किसी तरह काबू करके पुलिस के हवाले कर दिया। काबू करने के दौरान उस जेहादी की ठीक-ठाक ठुकाई कर दी गई, शुरू में मीडिया ने इसे भी मुसलमान की मॉब लिंचिंग नाम देने की पूरी कोशिश की। अब इस मुद्दे को संसद के चलते हुए भी बीजेपी के एक सांसद ने भी नहीं उठाया। तो ऐसे फिर ऐसे में इन 303 ऐसे लोगों की हिंदुओं के लिए कोई उपयोगिता बचती है? आप ये सोचकर देखो दिल्ली के भोगल की घटना में अगर लड़की मुसलमान होती और लड़का हिंदू होता तो क्या भारत का राजनीतिक वातावरण ऐसे ही शांत बना रहता? तब क्या मीडिया ऐसे ही एक सिरफिरे आशिक जैसे टाइटल से न्यूज़ चलाता? ये मैंने सिर्फ बात समझने के लिए एक मिसाल दी है, घटनाएं तो न जाने कितनी हो रही हैं, हो रही हैं। 5 साल में BJP बुरी तरह नाकाम रही है बड़े मुद्दों को उठाने में। हिदुओं को बदनाम करने की बात तो छोड़ो, BJP तो अपने मारे जा रहे कार्यकर्ताओं का मुद्दा भी नहीं उठा पा रही है। वहीं ममता ने हिंदुओं को बदनाम करने के लिए 49 बिकाऊ खरीद ही लिए। अब बात करते हैं मेरे जैसे साइबर सिपाहियों की, जिन्होंने कई बार हालात को पलटकर रख दिया है, वो भी बिना किसी आधिकारिक ताक़त के, याद है न क़ुरान बांटने वाला कोर्ट का फैसला, वो फैसला केवल सायबर वर्ल्ड पर चले आक्रामक अभियान की वजह से कोर्ट को मजबूर होकर वापस लेना पड़ा। क्या वजह है ? हमें मिलकर मंथन करने की जरूरत है। BJP प्रतिनिधियों को भी अहंकार के सातवें आसमान पर खुद को जाने से रोकना होगा।


पूरा लेख पढ़ें
इस्लाम के पूर्व का अरब एवं भारत :भगवान सिंह,लेखक एवं चिंतक

नई दिल्ली | 28 Jul ,Sunday 176

ः#इस्लामपूर्व_अरब_और_भारत मुहम्मद साहब अब्दुल्ला की पत्नी अमीना के पुत्र थे। पिता की मृत्यु उनके जन्म से पहले ही हो गई थी। अपने पीछे एक मकान, कुछ ऊंट, और एक गुलाम लड़की छोड़ गए थे। उनका जन्म 20 अगस्त 570 को हुआ। इसकी सूचना उनके दादा अब्दुल मुत्तलिब को मिली तो वह उन्हें काबा में देवताओं को धन्यवाद के लिए ले गए और उनका नाम वहीं पर मुहम्मद रखा। उन दिनों शरीफ घरों की महिलाएं अपने बच्चों को दूध नहीं पिलाती थीं, इसके लिए दाई का इंतजाम किया जाता था। उनको बानी सईद कबीले की हलीमा नाम की दाई ने पाला पोसा। दो साल की उम्र के बाद जब मुहम्मद को वह उनकी मां के पास लेकर गई तो उनके स्वास्थ्य को देखते हुए मां को इतनी प्रसन्नता हुई कि उन्होंने आगे के पालन पोषण के लिए उसी के हवाले कर दिया। दो साल और गुजरने के बाद हलीमा बच्चे को लेकर फिर मक्का आई। मां ने उसे फिर रेगिस्तानी जिंदगी के लिए उसके हवाले कर दिया। 1 साल और बीत जाने के बाद वह तीसरी बार बच्चे को लेकर मक्का, अमीना के पास आई। छह साल की उम्र होने पर मां के साथ अपने ननिहाल, मदीना आए और उस मकान में जिसमें उनके पिता की मृत्यु हुई थी, 1 माह का समय बिताया। वहां से लौटते समय उनकी माता की रास्ते में ही अबवा में मौत हो गई। उनके पिताजी का दासी उन्हें लेकर अब्दुल मुत्तलिब के पास आई जिनकी उम्र इस समय तक 80 हो गई थी। 2 साल तक उनकी देख रेख में वही दासी देखभाल करती रही। इसके बाद दादाजी का भी इंतकाल हो गया। मौत से पहले उन्होंने मुहम्मद की देखभाल की जिम्मेदारी उनके चाचा अबू तालिब को सौंप दी थी जिसे उन्होंने पूरी ईमानदारी से निभाया। बारह साल की उम्र में वह अपने चाचा के साथ एक सौदागरी पर सीरिया गए। जैसा कि सभी अवतारी पुरुषों के साथ होता है मुहम्मद साहब के जीवन में भी बचपन से लेकर अंततक चमत्कारपूर्ण किंबदंतियाँ जुड़ी हुई है। एक बार कुरैश कबीले और बानी हवाजीन कबीले के बीच 4 साल तक खूनी जंगे फिज्र भी चली जिसमें अपने चाचा के साथ मुहम्मद साहब भी पहुंचे तो पर किसी ओर से भाग नहीं लिया। [ कुरेशी बानी किनान के ही खानदान के थे। बानी किनान की छह संतानों में एक का नाम फिह्र था जिनकी सौदागरी में रुचि थी इसलिए उनका उपनाम कुरेश (करश का अर्थ है आवागमन, चलन्तू। सं. भाषियों के उत्तरी अरब में प्रभाव के कारण अरबी शब्दभंडार पर संस्कृत का काफी गहरा प्रभाव पड़ा है। चर>कर, कार> फा. कारवांां> कारूं का खजाना )।] इसी कुरैशी वंश में जो मक्का का स्थाई निवासी था, जिसकी माली हालत काफी अच्छी थी, मुहम्मद साहब का जन्म हुआ था, यद्यपि उनके परिवार की माली हालत बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। तकरार के खत्म होने के बाद आपसी झगड़े फसाद निपटाने, बेकसूर को बचाने और अन्याय करने वाले को दंडित करने तथा शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए हिल्फुल-फुजूल नाम का एक संगठन बना। यह जानना उपयोगी हो सकता है कि इस समय तक जब मुहम्मद साहब ने अपने लिए किसी नई भूमिका की कल्पना भी नहीं की थी, मक्का की, और पूरे अरब की, जिसे बाद में जाहिलिया से ग्रस्त बताया जाता रहा, क्या दशा थी। मक्का में कई तरह के व्यापार चलते थे, आयात पर कर वसूल किया जाता था और व्यापारियों के काफिले दूर-दूर तक यात्रा करते थे। मुहम्मद साहब ऐसी यात्राओं पर समय-समय पर जाते रहे और औपचारिक शिक्षा के बिना भी तरह तरह के लोगों के संपर्क में आने के कारण उनको बहुत सी ऐसी जानकारियां सुलभ थीं जो पढ़े लिखे लोगों को प्राप्त नहीं हो पातीं। [उनके आरंभिक जीवन की परिस्थितियों और उपलब्ध विवरणों से लगता है, वह सचमुच निरक्षर थे। काफिलों के साथ जुड़े रहने के कारण अनेक देशों और समुदायों के सभी स्तरों के लोगों से और उनकी विविध गतिविधियों परिचय ने उनको तत्वज्ञानी बना दिया था।] कहें, वह भले कागज के कोरे रहे हों पर लोकानुभव और व्यवहार बुद्धि में प्रखर थे। पुरानी पीढी के भारतीय व्यापारी गिनती, जोड़, गुणा और अक्षरज्ञान से आगे की शिक्षा को अधिक महत्व नहीं दिया करते थे और व्यवहार बुद्धि का हाल यह कि वे राजतंत्र के समानांतर अर्थतंत्र चलाते थे। यह नियम अरबों पर भी लागू माना जा सकता है। व्यापारियों की हालत अच्छी थी और मक्का के लोग खुशहाल थे । लोग भूत-प्रेत में विश्वास करते थे। भूत-प्रेत और देवी-देवताओं से ऊपर एक परमेश्वर की अवधारणा थी, जिसे वे अल्लाह कहते थे। परंतु वे पैगंबरों के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते थे। मूर्ति पूजा करने वाले मूर्ति में किसी देवता की प्रतिष्ठा मानते थे, फिर भी यह मानते थे कि समस्त सृष्टि का कर्ता एक है। इस्लाम से पहले की अरब की धार्मिक मान्यताएं और नीतियां भारत से कितनी समानता रखती थीं इसके विस्तार में स्वयं न जाकर हम अपने पाठकों का ध्यान नीचे की टिप्पणी की ओर दिलाना और इनसे मिलते जुलते भारतीय प्रतिरूपों से इनका मिलान करने का अनुरोध करेंगे। लोगों को किसी भी मजहब को अपनाने, किसी भी देवता-देवी को मानने की आजादी थी। ईसाइयों और यहूदियों को अपने मजहब और रीति रिवाज का पालन करने की पूरी छूट थी और किसी को, किसी मत और मान्यता से शिकायत नहीं थी। [The Arabs adored many gods. The belief in the influence of jinn was common, yet call above the jinn, above all the gods in the Kaaba, there was the Supreme One, Allah, the God. Masudi tells us that in the days of Ignorance, as the pre-Islamic times are called, some of the Quraish also proclaimed the unity of God, affirmed the existence of one Creator, and believed in the resurrection, whilst others denied the existence of Prophets and were attached to idolatry. Many of the people Look upon the idols as intercessors with one God. Still the doctrine of unity of God was not altogether unknown to the Arabs. Cannon Sell, 1913, The Life of Muhammad, www. muhammadism.org. 2003] हम कह सकते हैं अरब समाज भारत से इतना मिलता जुलता था कि यदि कोई सोचना चाहे कि यह समानता भारतीय प्रभाव के कारण थी तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता। कारण, जैसे सुमेरी सभ्यता की प्रेरणा से बेबिलोनिया/ मेसोपोटामिया, मिस्र, लघु एशिया, ग्रीस, रोम और आज की सभ्यताओं का जन्म हुआ था उसी तरह सुमेरी सभ्यता का उत्थान ही भारतीय पहल से हुआ था। इसमें भारतीय परंपरा के अनुसार, जिसकी पुष्टि पश्चिमी परंपरा से भी होती है, प्रमुख भूमिका देवों (आर्यों) की नहीं, असुरों की थी, जो तकनीकी दृष्टि से कृषिकर्मियों से बहुत आगे बढ़े हुए थे और उनके कारण ही देवों के भी अपने नगर बसें। सबसे पहले नगर सभ्यता का आरंभ आर्य भूमि से निष्कासित हुए असुरों ने किया था, और उसके बाद उनकी ही सहायता से देवों (आर्यों) ने अपने नगर बसाए थे, परंतु उत्पादक श्रम से परहेज करने के कारण, असुर स्वयं कृषि और वाणिज्यिक गतिविधियों में आगे नहीं बढ़ सके। भारत में भी भूत-प्रेत में विश्वास, जादू टोने में विश्वास, बालवध उन्हीं में प्रचलित था। सुमेर में पहुंचने के बाद भी वे स्थानीय आबादी को भ्रमित और नियंत्रित करके खेती बागवानी आदि का सारा काम उनसे कराते रहे और स्वयं अपने जादू टोने के बल पर पुरोधा बनकर उन पर शासन करते रहे। उनके अत्याचार की कहानियां दहलाने वाली हैं। हमने एक अन्य प्रसंग में यह कहा है इन असुरों के देव समाज में प्रवेश करने के बाद ब्राह्मणवाद का वह रूप सामने आया जिसकी विकृतियों की आलोचना होती है और यही ब्राह्मणवाद के सबसे प्रबल समर्थक भी बने रहे, यद्यपि इनको उच्च कोटि का ब्राम्हण नहीं स्वीकार किया गया। सुमेर में अपनी विशेष सुरक्षा की दृष्टि से उन्होंने ऊंचे मंदिर और निवास (जिगुरात/ जिग्गुरात) बनाए । भारतीय व्यापारियों ने असुरों की सहायता से ही उद्योग, शिल्प और नगर निर्माण के क्षेत्र में प्रगति की और भारत से बाहर भी अपने लिए सुरक्षित प्राकारयुक्त बस्तियों का निर्माण किया। हम यहां इसके विस्तार में नहीं जा सकते, परंतु इस तथ्य को रेखांकित कर सकते हैं अन्य सभ्यताओं की उन्नत अवस्था में भी भारत का बहुत गहरा प्रभाव था। इसका सही आकलन करने में कृपणता और कपट से काम लिया गया। सुमेरी काल से लेकर 18 वीं शताब्दी तक यूरोप से लेकर बीच के सभी प्रदेशों का अर्थतंत्र भारतीय व्यापार से इस तरह जुड़ा था कि उन्हे भारतीय सभ्यता का आश्रित कहा जा सकता है। प्राचीनतम सुमेरी अभिलेखों से पता चलता है कि जिन स्थानों के जहाज वहां अपना माल लेकर पहुंचते थे, वे थे: 1. मेलुक्खा (Meluḫḫa ) [Meluḫḫa or Melukhkha ((Me-luh-haKI 𒈨𒈛𒄩𒆠) is the Sumerian name of a prominent trading partner of Sumer during the Middle Bronze Age. Its identification remains an open question, but most scholars associate it with the Indus Valley Civilization. Wikipedia,Meluḫḫa.] 2. माकन (Magan, Makkan) [Trade between the Indus Valley and Sumer took place through Magan, although that trade appears to have been interrupted.Wikipedia, Magan.] 3. दिलमुन (Dilmun/ Tilmun)[ it was located in the Persian Gulf, on a trade route between Mesopotamia and the Indus Valley Civilisation, close to the sea and to artesian springs 4. पंत (Punt), /पुंत [The exact location of Punt is still debated by historians. Most scholars today believe Punt was situated to the southeast of Egypt, most likely in the coastal region of modern Djibouti, Somalia, northeast Ethiopia, Eritrea, and the Red Sea littoral of Sudan]. 5. सुतकागेन दोर (Sutkagan Dor) [Sokhta Koh is a Harappan site on the Makran coast, near the city of Pasni, in the Balochistan ... A similar site at Sutkagen-dor (also spelt Sutkagan Dor) lies about 48 km (30 mi) inland, astride Dasht River, north of Jiwan]i. महत्वपूर्ण बात केवल यह नहीं है कि इन सभी अड्डों से सुमेरियन सभ्यता का संपर्क था, बल्कि यह कि इन सभी से भारतीय माल या भारत-विशिष्ट पशुओं, पक्षियों, वन्य और कृषिलभ्य उत्पादों की ही नहीं, यदा-कदा शिल्पियों की आपूर्ति की जाती थी, और सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है ये अड्डे भारतीय क्षेत्र से आरंभ होकर खाड़ी क्षेत्र, पूर्वी अरब, और इथियोपिया तक फैले थे, अर्थात प्राचीन सभ्यताओं का सीधा और परोक्ष संबंध केवल भारत से था। प्राचीन सभ्य संसार का मतलब था भारत और इसका संपर्क क्षेत्र जिस पर भारतीय व्यापारियों का लगभग एकाधिकार 4000 साल तक बना रहा। इसने अपने प्रभाव क्षेत्र की भाषा, संस्कृति और समाजव्यवस्था को प्रभावित न किया होता तो ही विस्मय की बात थी। ऐसी स्थिति में जब प्रमाण भी उपलब्ध हों तो इस सचाई को नकारना दुसाहस की बात होगी।



पूरा लेख पढ़ें
कुरान का कौन सा इस्लाम सच्चा है -मक्का वाला या मदीना वाला?-लेखक भगवान सिंह वरिष्ठ चिंतक व लेखक।

नई दिल्ली | 20 Jul ,Saturday 184

कितना मुश्किल है मुसलमाँ का मुसलमाँ होना इस्लाम के सभी अध्येता बद्र की जंग को एक निर्णायक मोड़ मानते हैं। मुसलमानों द्वारा इसके लिए प्रयुक्त यौम अल फुरकान, निर्णय का दिन, भी इसी बात की पुष्टि करता है। यदि यह यह मोड़ है तो किससे मुड़ा या मुकरा जा रहा है? जो कुरान मक्का में उतरा था वह यदि कुरान है तो जो मदीना में और खास कर हिजरी 2 के 17वें रमजान के बाद उतरता रहा वह क्या था और वह किस आसमान पर रखा गया था कि पहले का सब कुछ उलट गया, सिर्फ नाम नहीं उलटा। एक को मानने वाला दूसरे को नहीं मान सकता। यदि मानता है तो खंडित चेतना से ग्रस्त, दोहरे व्यक्तित्व और विरोधी आचरण के जैकिल और हाइड की जिंदगी जीने को मजबूर होगा। मुस्लिम समाज की समस्या यही से आरंभ होती है। मुल्लों, इमामों, और मदरसों द्वारा अपने पूरे समाज को बीमार बना कर रखना, उनके साथ भेड़ बकरियों जैसा व्यवहार करना, उनके हित में तो है परंतु उस समाज के हित में नहीं। इनके द्वारा समाज के दिमाग का नियंत्रण बुद्धिजीवियों का अपमान है। जिस देश में मुल्लों की चलती हो, महंतों की चलती हो उसमें बुद्धिजीवियों की नहीं चल सकती। उसका बुद्धिजीवी भी गुलाम की तरह काम करेगा। अदाओं से रिझाएगा, परंतु रास्ता नहीं दिखा पाएगा,न स्वयं रास्ता ढूंढ पाएगा। मुस्लिम समाज बंधुआ समाज है। उसे उद्धारक की प्रतीक्षा है। उद्धारक उसका बुद्धिजीवी वर्ग ही हो सकता हे जो नजाकत को बौद्धिक दायित्व का निर्वाह मानता है। आतंकवादियों के साथ कोई समस्या नहीं है। उन्होंने मक्का में उतरी आयतों को अपनी किताब से निकाल दिया है। फाड़ कर फेंक दिया है, परंतु यदि अफवाह भी उठ जाए कि किसी ने उन फेंके हुए पन्नों को फाड़ दिया है, तो इस अपमान का बदला लेने के लिए, यह जानने से पहले कुछ ऐसा करेंगे जिससे लगेगा मक्का और मदीना दोनों की रखवाली वे ही करते हैं। परंतु उनके कुरान में मक्का गायब है मदीना ही मक्का तक सैलाब की तरह फैला है, और मक्का उसमें डूब गया है। बाढ़ रेगिस्तान में भी आती है। रेत के तूफान भी वही काम करते हैं, जो रेत की परत के नीचे दब गया वह दबा भले रहे, है तो। मक्का की आयतें तालिबानी कुरान इसी तरह दफ्न हैं, पर है और फसाद के लिए जरूरी होने पर खोद कर सतह पर लाई जा सकती हैं। अमल वे मदीना की आयतों पर ही करते हैं और इसके कारण लोग उनसे डरते भी हैं, नफरत भी करते हैं। उनके विषय में बनी हुई धारणा पूरे मुस्लिम समाज के विषय में न बन जाए इसलिए सभी देशों को उनके कारनामों के बाद अपने समाज की शांति और व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए क्षुब्ध जनों को शांत करने के लिए यह ज्ञापित करना होता है कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं, जो सही है। []यदि हो जाएं तो दुनिया का नक्शा ही बदल जाए। एक के रहते हैं दूसरों का अस्तित्व संकट में पड़ जाए और यह इतने बड़े दमन चक्र का रूप ले ले कि यह सामाजिक समस्या न रह कर सर्वराष्ट्रीय राजनीतिक समस्या बन जाए। उस विभीषिका की हम कल्पना तक नहीं कर सकते।[] मुस्लिम आतंकवाद मानवता के हित में नहीं है, स्वयं आतंक का रास्ता अपनाने वालों के हित में नहीं है, इसका विस्तार मुसलमानों के हित में नहीं है। मैंने ‘मुस्लिम आतंकवाद’ शब्द का प्रयोग किया है। इस प्रयोग पर समझदार लोगों को आपत्ति होगी। वे कहेंगे, कहते भी हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। मुस्लिम आतंकवाद हिंदू आतंकवाद जैसे प्रयोग गलत हैं। मजहब का प्रयोग उसी दशा में गलत जहाँ मजहब आतंकवाद न सिखाता हो। हिंदू आतंकवाद इसलिए गलत है कि कोई भी हिंदू ग्रंथ आतंक का समर्थन नहीं करता। मक्का का इस्लाम शांति और सद्भाव का मजहब है वह आतंकवाद का समर्थन नहीं करता। मुसलमान (शांति और सद्भाव के पक्षधर) हैं जो अपने जीवन व्यवहार में मक्का थे कुरान को अपना कुरान मानते हैं। परन्तु वे भी मदीने के कुरान का विरोध नहीं करते। जब तक विरोध नहीं करते हैं तब तक मुस्लिम आतंकवाद के प्रयोग का विरोध नहीं करना चाहिए, क्योंकि मुसलमान बात-बात पर कुरान की दुहाई देते हैं। कुरान न केवल आतंकवाद का समर्थन करता है बल्कि इसे जरूरी कर्तव्य भी बताता हैः Fighting is ordained for you, though it is hateful unto you; but it may happen that ye hate a thing which is good for you, and it mayhappen that ye love a thing which is bad for you. Allah knoweth, ye knownot. 2.216 मोहम्मद को भी पता था, लड़ाई झगड़े से बचना मनुष्य के स्वभाव में। कलह-प्रिय व्यक्ति से लोग नफरत करते हैं, इसके बावजूद वह इसी को संभावित अच्छाई बता कर मुस्लिम समाज को अल्पकालिक लाभ के लिए, मनुष्यता से दूर ले जा रहे थे और और अल्लाह का इस्तेमाल सोचने विचारने से विरत करने के लिए कर रहे थे। दुर्भाग्य से इसमें उन्हें सफलता भी मिली। इसलिए जो लोग मुस्लिम आतंकवाद को बुरा मानते हैं, उन्हें अल्ला के दिए हुए दिमाग का इस्तेमाल करते हुए, आतंकवादी अंशों को इस्लाम विरोधी मानना चाहिए। मानसिक द्वंद की लड़ाई बाहर जाकर नहीं लड़ी जाती, इसे अपने भीतर लड़ना होता है। हाइड को जैकिल से लड़ना और उसे परास्त करना होता है। यहाँ भीतर से हमारा आशय अपने भीतर और अपने समाज के भीतर, और उस पर कब्जा जमाने वालों के विरुद्ध तीनों से है। बाहर के लोग तो उनके भुक्तभोगी हैं। जेकिल किल करता है, हाइड उस पर परदा डालता है, जब किलिंग इतना बड़ा आकार ले लेती है कि परदा भी लिथड़ जाए तो उस पर चर्चा करने से बचता है और उस ओर ध्यान दिलाने वालों को ही उपद्रवी करार दे देता है या स्वयं असुरक्षित होने का इजहार करने लगता है। मुस्लिम बुद्धिजीवियों को चुनना होगा कि कुरान पर भरोसा करें या अपने विवेक पर। यदि कुरान पर भरोसा जरूरी है तो तय करें कौन सा कुरान। मक्के वाला या मदीने वाला। एक ही जिल्द में बँधे होने के कारण या एक ही व्यक्ति की रचना होने के कारण, ये दोनों परस्पर विरोधी पुस्तकें एक नहीं मानी जा सकतीं। एक के फैसले अल्लाह करता है, दूसरे का फैसला तलवार करती है, एक का अल्लाह सिरजनने वाला है, दूसरे का अल्लाह सत्यानाश करने वाला है। ऐसा ही चुनाव उन्हें मोहम्मद के दो रूपों में करना होगा। एक कुछ सीमाओं के बाद भी साधक, सत्याग्रही और मर्यादित आचरण वाला, दूसरा बद्र के जंग के बाद का जो किसी मर्यादा को नहीं मानता। अपने गलत कामों को सही सिद्ध करने के लिए अल्ला को भी अपना सहयोगी बना लेता है, और बचाव के लिए अल्ला की जगह शैतान पर दोष मढ़ देता है। चुनाव इसलिए भी जरूरी है कि कुरान की आयतों की तरह मुसलमानों को मोहम्मद साहब के कथनों और कामों को प्रमाण बनाने की बाध्यता बनी रहती है। जिस सिद्धांत पर मोहम्मद बद्र से पहले अमल करते रहे, वह यदि वह इस्लाम था, तो उसे नकार कर दूसरे रास्ते पर चलने को इस्लाम नहीं कहा जा सकता। दूसरा नाम आतंकवाद ही रह जाता है। बद्र के बाद अल्लाह के हुक्म से या शैतान के हस्तक्षेप से आतंक का दौर आरंभ हुआ जिसका पालन आज के आतंकवादी करते हैं । इसके कारण ही वे पूरी दुनिया से और पूरी दुनिया में लोग उनसे नफरत करते हैं। बद्र इस्लाम का अंत है जो विफलताओं के बीच भी, विरोध के होते हुए भी, उदात्त लक्ष्य के लिए, बिना किसी दुर्भावना के, संघर्ष करने का, और इसलिए जो असहमत हैं उनसे भी सद्भाव बनाए रखने का अभियान था। सभी उत्पादन और निर्माण धैर्य, आध्यवसाय, और सतर्कता की अपेक्षा रखते हैं। त्वरित सफलता चाहने वाले अनैतिक और प्रायः गर्हित तरीके अपनाते हैं जैसे जुआडी, लुटेरे, तस्कर, अपराध के अंधलोक, या अंडर-वर्ल्ड के लोग करते हैं। त्वरित सफलता या बड़े भूभाग पर अधिकार किसी उपक्रम के सही होने की कसौटी नहीं हो सकता। यह काम जंगी खान और हलाकू ने मुहम्मद से भी अधिक सफलता से किया था। यदि सफलता अल्ला के रहमो करम से आता है तो अल्ला का रहमो-करम सदा सभ्यता के विरुद्ध और दरिंदों के साथ रहा है। हलाकू ने मुस्लिम जगत को रौंद कर रख दिया था, फिर उसकी समझ में आया यही तो हमारा धर्म है, बौद्ध मत जहां रोकता है, वहां इस्लाम पूरी छूट देता है और उसने इस्लाम के पूरे क्षेत्र को जीतने के बाद, यह समझने के बाद यही तो हमें रास आता है, इस्लाम कबूल कर लिया। इस्लाम की सफलता थी या वहशत की यह तय करने के लिए बहस जरूरी है, परंतु इस पर किसी बहस की जरूरत नहीं कि जितने बड़े साम्राज्य पर जंगी खाँ या हलाकू का अधिकार अपने बल पर हुआ था उतने पर अल्लाह की मदद से भी मोहम्मद को हासिल नहीं हुआ था।[] []२९ जनवरी १२५८ में मंगोलों ने बग़दाद को घेरा डाला और ५ फ़रवरी तक वह शहर की रक्षक दीवार के एक हिस्से पर क़ब्ज़ा जमा चुके थे। अब ख़लीफ़ा ने हथियार डालने की सोची लेकिन मंगोलों ने बात करने से इनकार कर दिया और १३ फ़रवरी को बग़दाद शहर में घुस आये। उसके बाद एक हफ़्ते तक उन्होंने वहाँ क़त्ल, बलात्कार और लूट की। जिन नागरिकों ने भागने की कोशिश की उन्हें भी रोककर मारा गया या उनका बलात्कार किया गया। उस समय बग़दाद में एक महान पुस्तकालय था जिसमें खगोलशास्त्र से लेकर चिकित्साशास्त्र तक हर विषय पर अनगिनत दस्तावेज़ और किताबें थीं। मंगोलों ने सभी उठाकर नदी में फेंक दिये। जो शरणार्थी बचकर वहाँ से निकले उन्होंने कहा कि किताबों से बहती हुई स्याही से दजला का पानी काला हो गया था। महल, मस्जिदें, हस्पताल और अन्य महान इमारतें जला दी गई। यहाँ मरने वालों की संख्या कम-से-कम ९०,००० अनुमानित की जाती है। ख़लीफ़ा पर क्या बीती, इसपर दो अलग वर्णन मिलते हैं। यूरोप से बाद में आने वाले यात्री मार्को पोलो के अनुसार उसे भूखा मारा गया। लेकिन उस से अधिक विश्वसनीय मंगोल और मुस्लिम स्रोतों के अनुसार उसे एक क़ालीन में लपेट दिया गया और उसके ऊपर से तब तक घोड़े दौड़ाए गए जब तक उसने दम नहीं तोड़ दिया। (विकीपीडिया)[] [][]कहते हैं कि मुसलमानों के लिए तो चंगेज खान और हलाकू खान अल्लाह का कहर था। कहा जाता है कि उसके पास इतना पैसा और जमीन थी कि वह अपने जीवनकाल में भी न तो इसका उपयोग कर पाया और न ही कभी हिसाब-किताब लगा सका। चंगेज खान पर लिखी एक प्रसिद्ध किताब के लेखक जैक वेदरफोर्ड का कहना है कि जीवनभर लूटकर सारी दुनिया से पैसा इकट्‍ठा करने वाले चंगेज खान ने कभी खुद या परिजनों पर खर्च नहीं किया। मरने के बाद भी उसे साधारण तरीके से दफनाया गया था।… समझा जाता है कि उसके हमलों में तकरीबन 4 करोड़ लोग मारे गए। उसने अपने विजय अभियान के बाद धरती की 22 फीसदी जमीन तक अपने साम्राज्य का विस्तार कर लिया था।[][]



पूरा लेख पढ़ें