allahabad
इलाहाबाद 29 जनवरी। देशभर के मान्य पत्रकारों सम्पादकों व पत्रकार संगठनो का साझा मंच भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार महासंघ का अठारहवां वर्षिक सम्मेलन रविवार केा सूचना एंव जन सम्पर्क विभाग इलाहाबाद उ0 प्र0 के परेड मैदान माघमेला शिविर में महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुनेश्वर मिश्र की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ जिसमें मुख्य अतिथि मा0 न्यायमूर्ति कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के सदस्य सुधीर नारायण जी रहे। कार्यक्रम का संचालन जगदम्बा प्रसाद शुक्ल ने किया और अभ्यागत अतिथियांें का स्वागत महासंघ के राष्ट्रीय संयोंजक डा0 भगवान प्रसाद उपाध्याय ने किया। इस अवसर पर मूल्यपरक पत्रकार्ता के विविध आयाम विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसका विषय प्रवर्तन सब लोग पत्रिका व्यूूरो चीफ शिवा शंकर पाण्डेय ने किया। मुख्य अतिथि मा0 न्यायमूर्ति सुधीर नरायण जी ने पत्रकारों की आचारसंहिता की समीक्षा पर बल देते हुए मूल्य परक पत्रकारिता के ब्यहारिक पक्ष को उजागर किया। अध्यक्षीय उदबोधन में मुनेश्वर मिश्र ने आजादी के दिनो मे की गयी मूुल्यपरक पत्रकारिता के सिद्धांतो कीे विवेचना की। पूर्व जिला सूुचना अधिकारी जे0एन0 यादव, पत्रकार महासंघ के संरक्षक डा0 बाल कृष्ण पाण्डेय डा0 हीरामणि त्रिपाठी, सुधीर सिंह राठौर, सरदार दिलावर सिंह, अशोक प्रसाद कुणाल, पुरूषोत्तम मिश्र, डा0 अवधेश अग्निहोत्री, मथुरा प्रसाद धुरिया , प्रभाशंकर ओझा, उमापति राही, ड0 जगदीश प्रसाद यादव, वृजेश कुमार गुप्ता आदि ने भी अपने सार गर्भित बिचारो से संगोष्ठी को पूर्णता प्रदान की। इस अवसर पर महासंघ की ब्लाक, तहसील, जिला, मण्डल, प्रदेश व राष्ट्रीय इकाई में उल्लेखनीय योगदान और उत्कृष्ट कार्यो के लिए स्वर्ण पदक, रजत पदक, व कांस्य पदक प्रदान किये गये। महासंघ द्वारा अपने सभी सदस्यों केा सामूहिक दुर्घटना बीमा योजना से सम्पृक्त करने का सूभारम्भ किया। अपने सहयोगी बेव पोर्टल स्टार इण्डिया न्यूज 24 का लोकापर्ण भी किया। मुख्य अतिथि द्वारा 31 पत्रकारों को सम्मान पत्र अंगवस्त्रम व प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया गया साथ ही 101 सक्रिय पदाधिकार्रियों को प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। झासी से आये साहित्यकार डा0 ओम प्रकाश हयारण, दर्द की पुष्तक प्रकाश की ओर का विमोचन हुआ। इलाहाबाद, प्रतापगढ़, कौशाम्बी फतेहपुर, जौनपुर, सुल्तानपुर, आजमगढ़, देवरिया, गोण्डा फैजाबाद, रायबरेली, लखनऊ चित्रकूट झांसी, मुरैना, रीवां, सतना, पन्ना, वाराणसी, भोजपुर, पटना, मिर्जापुर, भदोहीं, आदि जिलो के पत्रकारो साहित्यकारो व कवियों की भागीदारी रही। विशेष व्यवस्था में कुलदीप शुक्ल शिवशंकर पाण्डेय आलोक त्रिपाठी अखिलेश मिश्र, राजेन्द्र सिंह, गामा दुबे, राम कुमार शर्मा सुशील कुमार पाण्डेय, श्याम सुन्दर सिहं पटेल, अनन्त राम पाण्डेय अरूण कुमार पाण्डेय, सूर्य प्रकाश मिश्रा, अरूण सोनकर प्रवीण श्रीवास्तव कमलेश मिश्रा बलराम दिक्षित शैलेन्द्र तिवारी राजकिशेार कुशवाहा, दिलीप त्रिपाठी, विजय चितौरी, पवनेस पवन वेदानन्द, हौसला प्रसाद पटेल इत्यादि सैकड़ों पत्रकार उपस्थित रहे। ...


नयी दिल्ली
# 'लव जिहाद' बनाम सेक्यूलरिज़्म के दिखावटी दांत 'लव जिहाद' कुछ है या नहीं हैं, मैं यहां इसका विश्लेषण करने नहीं जा रहा। सिर्फ इतना अवश्य कहूंगा कि इस अवधारणा का हल्ला मचाने वाले निहायत बेवक़ूफ़ और ज़ाहिल क़िस्म के आदमी हैं। बिना सबूत शोर-ओ-गुल से क्या हासिल होगा? कुछ नहीं। बस, इतनी समझ उनमें नहीं है। उनकी जगह मैं होता अथवा इनकी नीयत अगर साफ़ होती, तो ये देशभर से ऎसी घटनाओं या अपराधों के तथ्य एकत्र करते और उसका डॉक्यूमेंटेशन उचित मंच पर रखते हुए समाधान का प्रयास करते। लेकिन नहीं, यह हुआ, तो समस्या रहेगी नहीं और समस्या बनी रहना, राजनीतिक रोटियों की आंच है। अभी मैं एक दूसरी बात पर विचार कर रहा हूं। हाल ही राजस्थान में 'लव जिहाद' का एक तथाकथित मामला जोर-शोर से उछला। एक लड़की ने मुस्लिम युवक से निकाह कर लिया। उसके माता-पिता इसे 'लव जिहाद' बताते हुए हाई कोर्ट पहुंच गए, जहां से उन्हें निराश लौटना पड़ा। अदालत ने लड़की की इच्छा को वरीयता देते हुए उसे शौहर के साथ रहने की इज़ाज़त दे दी। इस प्रकरण में कुछ और फ़ैसला हो भी नहीं सकता था। यह मामला काफी दिन चला और राष्ट्रीय अख़बारों में भी सुर्ख़ियों में रहा। मेरी रुचि इसमें थी, अतः मैंने इससे संबंधित समस्त ख़बरों को ध्यान से पढ़ा। दिल्ली के एक अंग्रेज़ी अख़बार में प्रकरण की अंतर्कथा छपी थी, जिसके अनुसार लड़की के पिता साईबाबा के भक्त थे। उन्होंने अपने घर के बाहर साईमन्दिरम बना रखा था और उसके पुजारी का काम स्वयं करते थे। विशेष अवसरों पर अपने मुस्लिम मित्रों के नमाज़ अदा करने के लिए वे अपने लॉन में प्रबंध करते थे। ये समस्त कार्य उन्हें सच्चे धर्मनिरपेक्ष यानी सेक्यूलर के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं, तो समाज में इसी रूप में उनकी काफ़ी इज़्ज़त थी। लड़का और लड़की एक ही साथ अध्ययन करते थे और लड़की के पिता के एक ऐसे ही कार्यक्रम में निकट आए थे। ज़ाहिर है कि उनकी संतति को जो माहौल मिला, जिसमें उसकी परवरिश हुई, उसके हिसाब से उसका यह कदम मेरे नज़रिए के अनुसार कतई ग़लत नहीं है और नए परिवार में समायोजित होने में भी उसे कोई तकलीफ़ होने वाली नहीं थी। फिर माता-पिता को तकलीफ़ क्या हुई और क्यों हुई? यही सवाल महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है सेक्यूलरिज़्म के तमाम दांत दिखावटी ही हैं। उन्हें भगत सिंह दूसरों के घर में पैदा होते देखना सुहाता है, हथियार वे उसे मुहैया करा देंगे। जब अपनी संतति उस राह पर आगे बढ़ती है, तो उन्हें सूली, फांसी, फंदा सब याद आ जाता है। क्या पाखंड का इससे बड़ा उदाहरण कोई और हो सकता है? 🤔 ...


Allahabad
(मुनेश्वर मिश्र) धूकर जली चिता मे पार्थिव शरीर जलकर स्वाहा हो गया ।विजय मिश्र नहीं रहे,इस अहसास ने दिल को तोड़ दिया ।इतनी भी क्या जल्दी थी विजय भाई, कैसे इतनी जल्दी चले जाने का मन बना लिया ।एक बार मौत से लड़कर बाहर आ गये थे।फिर शुरू हो गये थे आपके सामाजिक सरोकार ।सिविल लाइन्स हो या हाईकोर्ट या पत्रकार कालोनी, हर बैठक मे होता था आपका इन्तजार ।आपके आते ही शुरू हो जाती थी दीन दुनिया की बातें,राजनीति से लेकर समाज और घर तक की तथा आप के अखबार इलाहाबाद लाइव में छपी खबरों की चर्चा। जिसे आप बड़ी मेहनत व लगन से निष्पक्ष तरीके से प्रकाशित कर रहें थे।किसी पर कोई संकट होता तो पूरा बवाल अपने सर ले लेते ।पर निष्ठुर काल एक बार फिर से रुग्ण शैय्या तक खींच ले गया । 29 मार्च को जब आपके घर गया तो आप पहचान रहे थे पर बोल नहीं पा रहे थे । मेरे हाथ को कसकर पकड़ा था, मौत के गीत में भी जिन्दगी गुनगुना रही थी ।सोचा था दो तीन दिन में सब नार्मल हो जायेगा पर 31मार्च को चले जाने की मनहूस खबर आ गयी।वक्त बड़े बड़े गम भुला देता है, बड़े बड़े घाव भर देता है पर आपको इतनी जल्दी नहीं भुला पाएँगे हम लोग । ...


आगरा/लखनऊ
मुन्ना बजरंगी की हत्या : कलियुग का यही गुण-धर्म है । --- कुख्यात अपराधी मुन्ना बजरंगी की हत्या कलियुग के वैशिष्ट्य का सूचक है । क्या है वैशिष्ट्य ? --- एक समय सत्ययुग, त्रेतायुग एवं द्वापर युग अपने अपने बड़प्पन के लिए लड़ रहे थे । कलियुग कोने में चुपचाप बैठा झगड़ा देख रहा था । कई दिनों तक मामला हल नहीं हुआ तो वह बोल पड़ा-'आप सब बिना मतलब लड़ रहे हैं । जबकि सबसे श्रेष्ठ तो मैं हूँ ! सिद्ध करो कलियुग कि तुम श्रेष्ठ हो ! --- कलियुग ने सत्ययुग से पूछा कि यह तो देवताओं का युग था । जब शंकर जी को भस्मासुर दौड़ा रहा था तब आप को खुद मोहिनी बन कर आना पड़ा और उसका इनकाउंटर करना नहीं पड़ा था ? इसी तरह त्रेता में रावण को मारने के लिए तथा द्वापर में कंस, दुर्योधन आदि को मारने के लिए एक बार श्रीराम तथा दूसरी बार श्रीकृष्ण बन कर नहीं आना पड़ा था ? नारायण ने हां कहा । कलियुग बोला- इस युग में नारायण आपको कभी नहीं आना पड़ता है ! मैं खुद ही एक बदमाश को दूसरे बदमाश से इनकाउंटर करा देता हूं । आप चैन से कभी बैकुंठ में तो कभी क्षीरसागर में माता लक्ष्मी के साथ चैन से रहते हैं । खबरें भी मुन्ना बजरंगी की तरह चल रही ! --- मीडिया के सभी संसाधनों से इस हत्याकांड की लंबी लम्बी खबरें चल रही हैं जिसे 'माफिया-न्यूज' कहा जा सकता है । इन खबरों से नए माफियाओं को प्रेरणा मिल सकती है जब उसके हिम्मत, साहस और रसूख का चित्रण होता है । कुल मिलाकर उसका चरित्र निंदनीय था । अतः मृत्यु के बाद इस तरह की खबरें उसके प्रति सहानुभूति ज्यादा पैदा कर सकती हैं । उसकी पत्नी का इंटरव्यू उसके प्रति हमदर्दी जगा सकती हैं । जबकि उसकी पत्नी से मुन्ना द्वारा 40 हत्याओं के समय उसे (पत्नी को) तथा पहली पत्नी छोड़ने पर कैसा लगता था, पूछा जाना चाहिए था । लूट, फिरौती के पैसे से गृहस्थी चलाने पर आनन्द मिलता था या नहीं ? ...


नयी दिल्ली
वरिष्ठ पत्रकार समरेंद्र सिंह जी का लेख पढ़ने लायक है । जो जिस क्षेत्र का होता है, वही अपने संकलित अनुभव से उस बात को लिख सकता है । पत्रकारिता के प्रति विश्वास पुनर्जागरण के लिए धन्यवाद । -------------------------- PMO का दखल और क्रांतिकारी पत्रकारिता इन दिनों टीवी के दो बड़े पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी और रवीश कुमार अक्सर ये कहते हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) की तरफ से चैनल के मालिकों और संपादकों के पास फोन आता है और अघोषित सेंसरशिप लगी हुई है. सेंसरशिप बड़ी बात है. जिस हिसाब से सरकार के खिलाफ खबरें आ रही हैं उनसे इतना स्पष्ट है कि सेंसरशिप जैसी बात बेबुनियाद है. हां यह जरूर है कि ऐसा स्वच्छंद माहौल नहीं है कि आप प्रधानमंत्री के खिलाफ जो चाहे वह छाप दें और सत्तापक्ष से कोई प्रतिक्रिया नहीं हो. लेकिन यहां सवाल यह है कि क्या ऐसा स्वच्छंद माहौल पहले भी था? क्या पहले वाकई ऐसा था कि पीएमओ की तरफ से कभी किसी संपादक या फिर मीडिया संस्थान के मालिक को फोन नहीं किया जाता था और उन्हें जो चाहे वह छापने की आजादी थी? चैनल पर सरकार विरोधी “भाषण” देने की खुली छूट थी? सरकार विरोधी “एजेंडा” चलाने की पूरी आजादी थी? यहां मैं आपको एक तेरह साल पुराना किस्सा सुनाता हूं. यह किस्सा उसी संस्थान से जुड़ा है जहां रवीश कुमार काम करते हैं. उन दिनों मैं भी एनडीटीवी इंडिया में ही हुआ करता था. और उन्हीं दिनों केंद्र में आजादी के बाद से अब तक के सबसे "उदार और कमजोर" प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का शासन था. दान में मिली कुर्सी पर बैठकर मनमोहन सिंह भी गठबंधन सरकार पूरी उदारता से चला रहे थे. तो सत्ता और पत्रकारिता के उस "सर्णिम काल" में, एनडीटीवी के क्रांतिकारी पत्रकारों को अचानक ख्याल आया कि क्यों नहीं मनमोहन सरकार के मंत्रियों की रिपोर्ट कार्ड तैयार की जाए और अच्छे और खराब मंत्री चिन्हित किए जाएं. एनडीटीवी ने इस क्रांतिकारी विचार पर अमल कर दिया. एनडीटीवी इंडिया पर रात 9 बजे के बुलेटिन में अच्छे और बुरे मंत्रियों की सूची प्रसारित कर दी गई. उसके बाद का बुलेटिन मेरे जिम्मे था तो संपादक दिबांग का फोन आया कि बुरे मंत्रियों की सूची गिरा दो. मैंने कहा कि सर, अच्छे मंत्रियों की सूची भी गिरा देते हैं वरना यह तो चाटूकारिता लगेगी. उन्होंने कहा कि बात सही है... रुको, रॉय (डॉ प्रणय रॉय, चैनल के मालिक) से पूछ कर बताता हूं. मेरी भी एक बुरी आदत थी. जो बात मुझे सही नहीं लगती थी उसे मैं अपने तरीके से बॉस के सामने रख देता था. लेकिन जिरह नहीं करता था. मेरा मत है कि जिन व्यक्तियों पर चैनल चलाने की जिम्मेदारी है चैनल उन्हीं के “हिसाब” से चलना चाहिए. उस दिन भी मैंने वही किया अपनी बात उनके सामने रखी और फैसले का इंतजार किया. थोड़ी देर बाद दिबांग का फोन आया कि वो (डॉ रॉय) अच्छे मंत्रियों की लिस्ट चलाने को कह रहे हैं. मैंने बुरे मंत्रियों की सूची गिरा दी और अच्छे मंत्रियों की सूची चला दी. करीब नौ साल बाद 2014 में जब मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार संजय बारू की किताब “द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर” बाजार में आयी तो पता चला कि आखिर डॉ प्रणय रॉय ने ऐसा क्यों किया था. पेज नंबर 97 पर संजय बारू ने बताया है कि अब तक के सबसे अधिक उदार और कमजोर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने फोन करके एनडीटीवी के ताकतवर पत्रकार मालिक डॉ प्रणय रॉय को ऐसी झाड़ पिलाई कि उनकी सारी पत्रकारिता धरी की धरी रह गई. खुद प्रणय रॉय के मुताबिक मनमोहन सिंह ने उन्हें कुछ ऐसे झाड़ा था जैसे कोई टीचर किसी छात्र को झाड़ता है. मनमोहन सिंह से मिली झाड़ के बाद महान पत्रकार/मालिक प्रणय रॉय इतना भी साहस नहीं जुटा सके कि अपनी रिपोर्ट कार्ड पूरी तरह गिरा सकें. अच्छे मंत्रियों की सूची सिर्फ इसलिए चलाई गई ताकि मनमोहन सिंह की नाराजगी दूर की जा सके. आप इसे पत्रकार से कारोबारी बने डॉ प्रणय रॉय की मजबूरी कह सकते हैं, सरकार की चाटूकारिता कह सकते हैं या जो मन में आए वह कह सकते हैं, लेकिन इसे किसी भी नजरिए से पत्रकारिता नहीं कह सकते. खैर, इस वाकये से दो बातें साफ होती हैं. पहला कि जरूरत पड़ने पर पीएमओ ही नहीं प्रधानमंत्री का मीडिया सलाहकार और खुद प्रधानमंत्री भी मीडिया संस्थान के मालिकों और संपादकों को फोन करते रहे हैं. प्रदेशों के मुख्यमंत्री और उनके अधिकारी भी फोन करते रहे हैं. ज्यादातर राज्यों की सूचना और जनसंपर्क कार्यालय की विज्ञापन नीति इसी हिसाब से तैयार की जाती है. दूसरी बात कि सरकार चाहे कितनी भी उदार क्यों नहीं हो, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री चाहे कितना भी बड़ा डेमोक्रेट क्यों नहीं हो अगर उसकी छवि पर सुनियोजित तरीके से हमला होगा, उसके खिलाफ अपनी “नफरत” का इजहार किया जाएगा तो फिर उसकी तरफ से भी प्रतिक्रिया जरूर होगी. यह पहले भी होती थी और भविष्य में भी होगी. ऐसे में अगर कोई पत्रकार यह कह रहा है कि पीएमओ की तरफ से अचानक फोन आने लगा है तो उसकी दो ही वजहें हो सकती हैं. पहली वजह यह कि वह पत्रकार किसी भी चैनल में कभी ऐसे जिम्मेदार संपादकीय पद पर नहीं रहा जिससे कि सरकारी नुमाइंदे उसे फोन करते. और दूसरी वजह यह कि वह पत्रकार खुद किसी बड़े सियासी खेल का हिस्सा है और उसी के तहत एक सामान्य बात को असामान्य तौर पर प्रचारित कर रहा है. रवीश कुमार जिस चैनल में काम करते हैं उसके मालिक डॉ प्रणय रॉय हमेशा उसी बड़े सियासी खेल का हिस्सा रहे हैं. अगर आप डॉ प्रणय रॉय और एनडीटीवी के अतीत पर नजर डालेंगे तो पाएंगे कि डॉ रॉय को आगे बढ़ाने में कांग्रेस और तीसरे मोर्चे की सरकारों का बड़ा योगदान रहा है. शुरुआती दिनों में उन्हें दूरदर्शन से करोड़ों रुपये के ठेके दिए गए. डीडी की कीमत पर उनको खड़ा किया गया. उसके बाद जिस दौर में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी उस दौर में वह रुपर्ट मर्डोक वाले स्टार न्यूज के लिए चैनल चलाया करते थे. तब पैसा मर्डोक की कंपनी देती थी और डॉ रॉय अपना एजेंडा चलाते थे. फिर वो दिन भी आया जब मर्डोक को लगने लगा कि डॉ रॉय उसके पैसे से अपना हित साध रहे हैं तो फिर उसने 2003 में एनडीटीवी से करार खत्म कर दिया. 2004 में डॉ रॉय अपना चैनल लेकर आए तो केंद्र में एक बार फिर से कांग्रेस और सहयोगी दलों की सरकार थी. 2004 से 2014 के बीच एनडीटीवी ने सत्तापक्ष की पत्रकारिता की. मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान सदी के महान पत्रकार रवीश कुमार भी सत्तापक्ष की पत्रकारिता ही करते थे. 2007 के रेल बजट वाले दिन खुद इन्होंने और एक और बड़े पत्रकार ने यानी दो बड़े पत्रकारों ने मिल कर लालू यादव के एक अधिकारी के साथ ब्रेकफास्ट पर ऐतिहासिक इंटरव्यू किया था जिसमें उन्होंने बताया था कि अधिकारी महोदय की महती भूमिका की वजह से रेल बजट तैयार हुआ है. (इस मसले से जुड़ा मेरा खुद का एक बेहद कड़वा अनुभव है. तब “फ्री स्पीच” की वकालत करने वाले रवीश कुमार पत्रकारिता पर एक टिप्पणी से इस कदर विचलित हुए कि रोते हुए मालकिन राधिका रॉय के पास शिकायत करने पहुंच गए थे. उस वाकये पर मैं फिर कभी विस्तार से लिखूंगा). बहरहाल, ऊपर बताई गई रेल बजट वाली क्रांतिकारी पत्रकारिता से फुरसत मिलने पर रवीश स्पेशल रिपोर्ट में दलित की दुकान दिखाया करते थे या फिर मुंबई में स्ट्रगलर्स कॉलोनी या फिर मुजरेवालियों पर विशेष बनाया करते थे. ये एनडीटीवी की फेस सेविंग एक्सरसाइज थी और यहां ध्यान रखना होगा कि 2004 से 2014 के दौर में एनडीटीवी ने कभी भी सत्ता के खिलाफ कोई सशक्त स्टोरी नहीं की. सुनियोजित तरीके से सरकार के खिलाफ कोई “कैंपेन” नहीं चलाया. मौका पड़ने पर चमचागीरी ही की. अन्ना आंदोलन के दौरान जब केंद्र की मनमोहन सरकार पर भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लगे तब भी एनडीटीवी का रवैया संतुलित बना रहा. 2014 के बाद एनडीटीवी की पत्रकारिता अचानक “बागी” हो गई तो इसलिए क्योंकि जिस सियासी खेल में डॉ प्रणय रॉय शामिल थे उसमें मौजूदा सरकार के खिलाफ स्टैंड लेना उनकी मजबूरी थी. फिर भी डॉ प्रणय रॉय ने संतुलन बनाने की कोशिश की. उसी कोशिश के तहत कुछ बड़े लोग हटाए गए. लेकिन मौजूदा सत्तापक्ष ने एनडीटीवी को स्वीकार नहीं किया. अगर मौजूदा सत्तापक्ष ने एनडीटीवी को स्वीकार कर लिया होता तो इसकी भाषा भी काफी पहले बदल गई होती. जो मालिक एक झटके में 3-4 सौ कर्मचारियों को बाहर निकाल सकता है, अगर उसे लाभ का विकल्प दिया जाए तो वह किसी को भी बाहर कर सकता है. जो पत्रकार नौकरी से निकाले गए अपने सहयोगियों का फोन उठाना बंद कर दे, या फिर उन्हें बाहर निकालने की साजिश रचे, या फिर मातहत काम करने वालों को नौकरी से निकाल देने की धमकी दे, वह पत्रकार भी जरूरत पड़ने पर कोई भी समझौता कर सकता है. इसलिए वर्तमान दौर में आत्मवंचना में लिप्त जो भी पत्रकार खुद को “क्रांतिकारी” होने का दावा कर रहा है, उसकी समीक्षा इस बात पर होगी कि 2014 से पहले उसने कैसी पत्रकारिता की थी? क्या उसने मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के खिलाफ सुनियोजित तरीके से कोई कैंपेन चलाया था या नहीं? या फिर इन क्रांतिकारी पत्रकारों की परीक्षा तब होगी जब केंद्र में एक बार फिर नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं रहेगी. अभी के दौर में देखा जाए तो ज्यादातर नामचीन पत्रकार एक बड़े “सियासी खेल” का हिस्सा नजर आते हैं. सत्तापक्ष और सत्ता विरोधी खेमे में खड़े इन चंद चर्चित पत्रकारों की “सियासत” के चलते पत्रकारिता और समाज का बड़ा नुकसान हुआ है. इस नुकसान का भुगतान देश को और समाज को लंबे समय तक करना होगा. - वरिष्ठ पत्रकार समरेंद्र सिंह ...


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