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श्रीकृष्ण जन्मभूमि और हिंदुओं का इस्लामिक उत्पीड़न : मधुसूदन उपाध्याय, राष्ट्रवादी चिंतक एवं लेखक

उत्तरप्रदेश / मथुरा | 09 Aug ,Sunday 324

राजा मान सिंह और अकबर __________________________________________ कृष्ण जन्मभूमि- बहुत कम लोगों को जानकारी है कि अकबर अपने राज्य में मंदिर तुड़वाता तो था किंतु मंदिर बनवाने की इजाजत नहीं देता था। संत तुलसीदासजी को भी हनुमान मंदिर बनाने की इजाजत नहीं मिली थी। जब तुलसीदासजी ने वाराणसी के महल की परिधि में हनुमान मंदिर बना लिया तो उसे भी तोड़े जाने के आदेश अकबर ने जारी कर दिए थे। वह तो राजा मानसिंह और टोडरमल के हस्तक्षेप तथा वाराणसी महाराज द्वारा यह कहने पर कि मैंने अपने स्वयं के पूजन के लिए मंदिर बनवाया है, वह भी महल के अंदर तब कहीं जाकर मंदिर टूटने से बचा। बाबर के समय पहली बार राम जन्मभूमि का मंदिर तोड़ा गया था। उसके मरते ही हुमायूं के राज्यकाल में हिन्दुओं ने अयोध्या से मुसलमानों को मार भगाया और राम जन्मभूमि पर बॉकी द्वारा बनी मस्जिद तोड़ डाली और पुन: उसी मसाले से एक मंदिर बना डाला। अकबर का एक सेनापति था हुसैन खां तुकड़िया। कांतगोला और लखनऊ उसकी जागीर में थे। यह मुगल नहीं अफगान था। इसने सुना कि बादशाह बाबर ने सन् 1528 में काफिरों के देवता राम का मंदिर तुड़वा दिया था, जिसे हुमायूं के भारत से भागते समय सन् 1540 में मैनपुरी के चौहानों ने पुन: बनवा डाला है। तब हुसैन खां तुकड़िया ने अकबर को खबर भिजवाई कि मैं जिहाद पर जा रहा हूं। हुसैन ने अयोध्या पर आक्रमण कर फिर से मंदिर तुड़वा दिया। मंदिर के टूटने की खबर फैलते ही हिन्दुओं ने बगावत कर दी। राजा मानसिंह और टोडरमल अपनी सेना के साथ अलीकुली खां खानजमा का सामना कर रहे थे। ये भी सेनाओं के साथ अयोध्या पहुंचे। वहां हुसैन खां तुकड़िया पुन: मस्जिद तामीर कर चुका था। एक ओर हुसैन खां की फौजें थीं, दूसरी ओर हजारों हथियारबंद हिन्दू मरने-मारने पर आमादा थे। बीच में थी मा‍नसिंह और टोडरमल की फौजें। आगरे में अकबर के पास अयोध्या के तनाव की खबरें पहुंचीं। उसने मध्य का रास्ता निकाला। मस्जिद के सामने हिन्दुओं को एक चबूतरा बनाने की इजाजत मिल गई, जहां वे पूजन-अर्चन कर सकें। तब राम चबूतरे का निर्माण हुआ और मानसिंह के बीच-बचाव से एक भीषण रक्तपात टल गया। मथुरा के मंदिरों के टूटने और बनने का सिलसिला भी कई बार चला। सन् 1018 में महमूद गजनवी ने मथुरा के समस्त मंदिर तुड़वा दिए थे, लेकिन उसके लौटते ही मंदिर बन गए। सन् 1192 में पृथ्वीराज चौहान की पराजय के साथ भारत में मुसलमानी राज्य स्थाई रूप से जम गया। उत्तर भारत में मंदिर टूटने लगे और फिर बनवाए न जा सके। उनके स्थान पर मकबरे-मस्जिदें बना दी गईं। 350 वर्ष तक हिन्दू मंदिर विहीन मथुरा में जीवन बिताता रहा। सन् 1555 में आदिलशाह सूर के सेनापति हेमचन्द्र भार्गव ने दिल्ली-आगरा व आसपास का इलाका जीत अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। उसने यज्ञ कर विक्रमादित्य की उपाधि धारण की और दिल्ली में हिन्दू राज्य की स्थापना की। दुर्भाग्य से हेमू भार्गव का राज्य मात्र एक वर्ष तक ही रहा किंतु इस एक वर्ष में ही आसपास के जाट और यादवों ने मिलकर मथुरा की एक-एक मस्जिद तोड़ डाली। मथुरा खंडहरों का शहर बन गया, किंतु 1556 में अकबर का राज्य स्थापित होने पर नए मंदिर नहीं बन सके। मथुरा के चौबे की हवेली के पास ही खंडहर था, भगवान कृष्ण की जन्मभूमि का। यह पूरा इलाका कटरा केशवदेव कहलाता था। हिन्दू तीर्थयात्री आते थे। श्रद्धालुओं को प्रतिदिन खंडहर की परिक्रमा-पूजा करते देख चौबे अपनी हवेली में बैठ आंसू बहाता रहा। लेकिन असहाय चौबे कर ही क्या सकता था। राज्य अकबर का, सेना अकबर की, शहर कोतवाल और काजी अकबर के। जब किसी नए स्थान पर ही मंदिर बनाने की अनुमति नहीं थी तो केशवदेव मंदिर पर बनी मस्जिद के खंडहर पर मंदिर कौन बनाने देता। इन्हीं दिनों राजा मा‍नसिंह बंगाल विजय कर लौटे। अभी तक बाबर, हुमायूं और अकबर भी संपूर्ण बंगाल नहीं जीत सके थे। आगरे में धूमधाम से मानसिंह का स्वागत हुआ। अकबर ने मानसिंह से कहा- जीत के इस मौके पर जो मांगना है, मांग लो। अकबर मन ही मन बंगाल, बिहार और उड़ीसा की सूबेदारी मानसिंह को देने का निश्चय कर चुका था, लेकिन मानसिंह ने अपनी जागीर के लिए मांगा मथुरा और वृंदावन के हिन्दू तीर्थों को। अकबर इस निष्ठावान हिन्दू की श्रद्धा देख प्रभावित हुआ। उसने मथुरा-वृंदावन के तीर्थ तुरंत मानसिंह को जागीर में दे दिए, साथ ही बंगाल, बिहार, उड़ीसा का नाम बदलकर वीर मानसिंह भूमि कर दिया। वर्तमान में परगना वीरभूमि, परगना मानभूमि और परगना सिंहभूमि के रूप में ये क्षेत्र पुकारे जाते हैं। रेकॉर्ड में यही नाम दर्ज हैं। मथुरा-वृंदावन के मानसिंह की जागीर में शामिल होते ही वहां से मुगल सैनिक हटा लिए गए, किंतु न्यायाधीश के पद पर काजी डटा रहा। अकबर ने शेख अब्दुल नबी को सदर उल्सदूर (प्रधान धर्माचार्य) के पद पर नियुक्त किया था। यही व्यक्ति न्याय, इस्लाम और धार्मिक स्थानों का कार्य देखता था और मस्जिदों-मकबरों और मुल्ला-मौलवियों को दान-दक्षिणा देता था। मथुरा की प्रशासन व्यवस्था आमेर कछवाहा सैनिकों के हाथ में आते ही मथुरा के हिन्दुओं का साहस लौट आया। कटरा केशवदेव के चौबे ने कृष्ण जन्मभूमि के खंडहर से पत्‍थर-ईंटें चुनकर एक चबूतरा बना डाला। उस काल में तब मंदिर बनाने पर रोक थी तो मूर्तियां कौन बनाता? कृष्ण की मूर्ति नहीं थी, सो चौबे ने जल्दी-जल्दी में शिव की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा कर डाली। गुलामी के बीते 350 वर्षों में यह मथुरा का पहला हिन्दू मंदिर था, सो दर्शनार्थियों की भीड़ उमड़ पड़ी। शहर काजी को पता लगा तो उसने चौबे को अपनी इजलास में तलब किया। लेकिन चौबे को फुर्सत कहां? वह तो दिन-रात पूजन-अर्चन और आते-जाते दर्शनार्थियों की व्यवस्था में लगा था। चबूतरे पर दीवार और गुंबद निर्माण का काम जोरों से चल रहा था। उत्साहित दर्शनार्थी रुपयों के ढेर न्योछावर कर रहे थे। न धन की कमी थी, न जन की। नि:शुल्क मजदूरी देने वाले श्रमिकों की कतारें लगी थीं। शहर में मुसलमान सैनिक थे नहीं और कछवाह सैनिक आमेर के बाहर प्रथम हिन्दू मंदिर का निर्माण देख पुलक रहे थे। आगरे से एक-दो जत्थे धर्मांध मुस्लिम सैनिकों के आए भी, लेकिन जोश से भरे हजारों दर्शनार्थियों के बदले तेवर देख चुपचाप खिसक लिए। खबर मिलते ही सदर उल्सदूर और देशी-विदेशी मुस्लिम सरदारों ने सीकरी के दरबार में अकबर को जा घेरा और कुफ्र की सीनाजोरी को कुचलने की मांग करने लगे। दरबार और हरम में पक्ष और विपक्ष में दो दल हो गए। समस्त मुस्लिम सरदार एक ओर तथा हिन्दू सरदार दूसरी ओर हो गए। हरम की मुसलमान बेगमें मंदिर तोड़ने की बात कर रही थीं तो हिन्दू बेगमों और सरदारों का कहना था कि पहले वहां कृष्ण जन्मभूमि का मंदिर था इसलिए जो बन गया, सो बन गया। उसे नहीं तोड़ना चाहिए। मुस्लिम सरदारों और शेख अब्दुल नबी सदर का कहना था कि राज्य मुसलमानी है इसलिए इस्लामी राज्य में मंदिर का बनना कुफ्र है। वहां मंदिर को तोड़कर मस्जिद बना दी गई थी। वह जैसी भी हालत में है, उस स्थान पर मंदिर का बनना इस्लाम के खिलाफ है। अकबर दुविधा में फंसा था। भारत का हिन्दू प्रतिरोध तो समाप्त हो चुका था, लेकिन उसके परिवार के मिर्जा और भारतीय अफगान सिर उठा रहे थे। गुजरात के मिर्जा अब्दुल्ला, जैनपुर चुनार के अलीकुली खां, खानजमां और बहादुर खां, मालवा-कड़ा के आसफ खां, बंगाल के अफगान दाऊद खां और काबुल का उसका भाई मिर्जा हकीम मानसिंह और टोडरमल की तलवारों से ही झुकाए जा सकते थे। वह राजपूतों को दुश्मन बनाना नहीं चाहता था और न देशी-विदेशी मुसलमानों को नाराज करना चाहता था। इस कारण उसने सदर से कहा, यह धार्मिक मामला है और आप उसके प्रमुख हैं, जैसा चाहें वैसा करें। मैं हस्तक्षेप नहीं करूंगा। शेख अब्दुल नबी सदर ने फरमान जारी किया कि बिना इजाजत बन रहे मथुरा के मंदिर को तोड़ दिया जाए, साथ ही दो हजार मुगल सैनिक मथुरा रवाना कर दिए। आगरा से उड़ी खबर मथुरा पहुंची, अब मंदिर तोड़ दिया जाएगा...! आग की तरह खबर गांवों में फैल गई। मथुरा के चहुंओर बसा 'अजगर' फुफकार उठा। अ से अहीर, ज से जाट, ग से गड़रिए और र से राजपूत सिर पर कफन बांधकर मथुरा पर उमड़ पड़े। जन्मभूमि परिसर और मथुरा की गलियां भर गईं। जैनों, अग्रवालों, कायस्थों ने धन की थैलियां खोल दीं। मथुरा का हर हिन्दू घर रसोड़ा बन गया। हिन्दू देवियां रात-दिन पूड़ी-साग बनातीं और उनके मरद हाथ जोड़-जोड़ मिन्नतें कर बाहर से आए धर्मयोद्धाओं को खिलाते। वणिकों की गाड़ियां घर-घर आटा बांटती फिरतीं। सारा मथुरा उत्सव नगर बन गया था। मुगल दस्ता मथुरा पहुंचा तो गली-मोहल्लों में खचाखच भरे हथियारबंद हिन्दुओं को देख सहम गया। तब घूमकर मुगल घुड़सवार जन्मभूमि पहुंचे। वहां भी हिन्दू जनता अटी पड़ी थी। मुगलों को जन्मभूमि की ओर जाते देख मथुरा के कछवाहा सैनिक भी घोड़ों पर बैठ उसी ओर चल दिए। कछवाहा सैनिकों को देख मुगलों की हिम्मत बंधी। मुगल सरदार ने ऊंची आवाज में परिसर में खड़े हिन्दुओं से कहा- 'आप लोग यह जगह खाली कर दीजिए, यहां बिना इजाजत काम हो रहा है, नहीं तो खून-खराबा हो जाएगा। लेकिन कोई टस से मस नहीं हुआ। ये तो मौत को गले लगाने आए थे, कौन हटता, कौन मां का दूध लजाता? तब मुगलों ने तलवारें सूंत लीं। परिसर में खड़े हिन्दू भी गेती-फावड़े, लाठी-बल्लम, पत्थर-ईंट जो भी मिला, लेकर सन्नद्ध हो गए। मुगल घुड़सवार हमला करें, उसके पूर्व ही कछवाहा सैनिक तलवारें खींच मुगलों और जनता के बीच आ गए। कछवाहा सरदार ने मुगल सालार से कहा- '‍मियां! एक भी हिन्दू को हाथ लगाने की ‍हिम्मत की तो तुम्हारी यहीं कब्रें बना दी जाएंगी।' इस बदली परिस्थिति में मुगल चकरा गए। जनता से तो जैसे-तैसे भिड़ लेते, लेकिन शाही कछवाहा सैनिकों से पार पाना कठिन है। सारी जनता इनके साथ है। गनीमत इसी में है कि लौट चला जाए। और बागें मुड़ गईं, मुगल जैसे आए थे, वैसे ही लौट चले। आगरा जाकर मुगल सालार ने जनता की और कछवाहा सैनिकों की बगावत की बात नमक-मिर्च लगाकर अकबर को सुनाई। सदर और मुसलमान सरदारों ने भी दबाव डाला, लेकिन महाविनाश की आशंका से अकबर चुप्पी साध गया। उधर मेवाड़ में महाराणा प्रताप एक के बाद एक मुगल किले छीनते जा रहे थे। चित्तौड़, अजमेर और मांडलगढ़ को छोड़ सभी जगह से मुगल खदेड़ दिए गए। अकबर ने सोचा कि 50 हजार कछवाहे सैनिक महाराणा प्रताप से मिल गए तो फिर मेरी सल्तनत का क्या होगा? आखिरकार यह तय हुआ कि चौबे को आगरा बुलाया जाए और पूछताछ की जाए। दरबार के राजा बीरबल और अबुल फजल आगरा भेजे गए। वे अपनी ओर से विश्वास दिलाकर उस ब्राह्मण को लेकर आगरा आए और दरबार में निवेदन किया कि थोड़ी बेअदबी जरूर हुई है लेकिन अपने देवता के जन्मस्थान पर मंदिर बनाना कोई अपराध नहीं है। अब तो ब्राह्मण (चौबे) राजधानी आगरे में आ चुका था। उसकी समर्थक हिन्दू प्रजा और हिन्दू कछवाहे तो यहां थे नहीं, तो सदर के हुक्म से वह जेल में डाल दिया गया। अब दरबार में रोज बहस होती, उस ब्राह्मण के साथ क्या किया जाए। मुसलमान मृत्युदंड पर अड़े थे और और हिन्दू जुर्माना लेकर तथा बेइज्जत कर शहर में घुमाकर छोड़ देने का कह रहे थे। मानसिंह सारी बहस को चुपचाप सुन रहा था। मानसिंह की अंगारा उगलती आंखें और चुप्पी उसके मन का संकल्प बता रहे थे। अकबर को सामने टूटकर बिखरता मुगल साम्राज्य दिख रहा था। अकबर ने मानसिंह और टोडरमल को अलग से बुलाया और कहा- 'राजा साहब! मथुरा में मंदिर को तोड़ने की आज्ञा तो मैं नहीं दूंगा और वृंदावन में अगर आप चाहें तो और मंदिर बनवा सकते हैं, उसमें मैं हस्तक्षेप नहीं करूंगा।' इधर सदर अब्दुल नबी व कट्टर मुल्ला-मौलवियों को अलग से बुलाकर कहा- 'मथुरा-वृंदावन अब मानसिंह की अमलदारी में है। वहां मुगल हुकूमत नहीं है, सो आप वहां के लिए कुछ मत कहिए। ब्राह्मण आपके कब्जे में हैं, उसके लिए जो भी चाहे फैसला करें।' अगले दिन शेख सदर ने ब्राह्मण का कत्ल करवा दिया। ब्राह्मण के कत्ल की खबर फैलते ही हिन्दू दरबारी सीकरी के तालाब पर जा पहुंचे। पुन: बहस छिड़ गई। फाजिल बदायूंनी हत्या को उचित ठहरा रहा था तो अकबर ने डांटकर उसे दरबार से भगा दिया, फिर जीवनपर्यंत बदायूंनी दरबार में नहीं आया। बादशाह के गुरु शेख मुबारक ने कहा कि सारी इमामत और निर्णय के अधिकार अकबर के पास होने चाहिए। उनके ऐसा कहने पर शेख सदर के सारे अधिकार छीन उन्हें ‍मस्जिद में बैठा दिया गया, किंतु हिन्दू शांत नहीं हुए। मानसिंह के सैनिक शेख अब्दुल नबी सदर की मस्जिद के चारों ओर चक्कर काटने लगे और कट्टर मुस्लिम सैनिक भी सदर की प्राणरक्षा के लिए मस्जिद में जमा होने लगे। दिन-पर-दिन आग भड़कती ही गई। मुगल साम्राज्य को बचाने के लिए अकबर ने शेख अब्दुल नबी को एक रात चुपचाप सीकरी बुलवाया और कहा- 'मुगल तख्त और आपकी जान की सलामती इसी में है कि आप चुपचाप हज के बहाने मक्के चले जाओ और फिर लौटकर भारत मत आना।' (मुहम्मद हुसैन आजाद कृत 'अकबर के दरबारी') अकबर ने सदर को बहुत सा धन और मखदूम-उलमुल्क के साथ हज रवाना किया और वृंदावन में 4 मंदिर बनाने की इजाजत दे दी। सबसे पहले गोपीनाथ का मंदिर फिर मदनमोहन का मंदिर और 1590 में गोविंददेव के मंदिर बने। सबसे अंत में जुगलकिशोर का मंदिर 1627 में जहांगीर के काल में पूर्ण हुआ। (स्मिथ पृष्ठ 479) मक्का में शेख का मन नहीं लगा और उसकी मौत उसे भारत खींच लाई। वह जहाज में बैठ खम्भात आया। यहां हालात बदले हुए थे। शेख सीधे अकबर के दरबार में पहुंचा। जो अकबर कभी इनके जूते उठाकर पहनने के लिए देता था, अकबर को कभी इसने एक डंडा मारा था और बादशाह ने उसे प्रसाद समझकर ग्रहण किया था, उसी अकबर ने इसे दरबार में देखते ही कसकर मुंह पर एक घूंसा मारा। सदर ने चुपचाप इतना ही कहा- 'जहांपनाह! मुझे छुरी से ही क्यों नहीं मार डालते।' टोडरमल भी खार खाए बैठा था। मक्का जाते समय इसे खजाने से 70 हजार रुपया दिया गया था। टोडरमल ने उस रुपए का हिसाब मांगा। फैसला होने तक ये अबुल फजल की निगरानी में रखे गए। मानसिंह के सैनिक अबुल फजल की हवेली के चक्कर काटने लगे। अकबर ने संके‍त किया- 'भले मानस! राजपूत इसके खून के प्यासे हैं। कहीं ऐसा न हो कि इसके साथ मैं और मेरी सल्तनत भी तबाह हो जाए।' ...और एक रात शेख अब्दुल नबी सदर को कोई अबुल फजल की हवेली से उठा ले गया। दूसरे दिन आगरावासियों ने देखा कि मुनारों के मैदान में इस्लाम के धर्माचार्य शेख की लाश लावारिस पड़ी है। दूर कुछ कछवाये घुड़सवार चक्कर लगा रहे थे, डर के मारे कोई लाश के पास जा नहीं रहा था। (मुहम्मद हुसैन आजाद कृत अकबर के दरबारी पृष्ठ 299) इस घटना से यह बात साफ हो जाती है कि अकबर हिन्दुओं के प्रति उदार नहीं था। वह पहले नंबर का स्वार्थी था। जब हिन्दुओं को कुचलना था, गुलाम बनाना था, तब अपने देशवासियों, मुगलों का सहयोग लिया और जब सिर उठा रहे मुगलों, अपने भाई-बंदों को मरवाना था, तब राजपूतों का सहयोग लिया। बदले में उन्हें मंदिर बनवाने की इजाजत दी, जजिया हटाया, तीर्थों पर कर हटाया। जेसुइट मिशन का पादरी मोंसरात के मुताबिक, अकबर बड़ा धूर्त था, उसके मन की थाह कोई नहीं ले सकता था। जब उसे किसी से काम निकालना होता था, तब उसकी प्रशंसा-खुशामद सभी कर लेता था और काम निकलने के बाद ऐसा मुंह फेरता, मानो जानता ही नहीं। गोआ के पादरियों से भी उसने यही व्यवहार किया था।साभार


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राम जन्मभूमि मंदिर विवाद और तत्कालीन पत्रकारिता -- के विक्रम राव,वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक

नई दिल्ली/अयोध्या | 08 Aug ,Saturday 324

IFWJ और अयोध्या का मुद्दा के. विक्रम राव #IFWJ #Ayodhya #RamMandir आजाद भारत का तीव्रतम जनसंघर्ष (जन्मभूमि वाला) गत सप्ताह समाप्त हो गया| मगर चन्द मुजाहिदीनों के लिए यह जिहाद अभी जारी है| असद्दुद्दीन ओवैसी ने कहा कि इस्लाम में मस्जिद हमेशा मस्जिद ही रहती है| यही बात हिन्द इमाम तंजीम के सदर साजिद रशीद कल बोले कि : “मंदिर तोड़कर मस्जिद फिर बनाई जाएगी|” कई मुसलमानों ने तो इस्ताम्बुल के हाजिया संग्रहालय का उदाहरण दे डाला, जो 86 वर्षों बाद गत माह फिर इबादतगाह बन गयी| फिलवक्त विषय यह है कि विगत सात दशकों में राष्ट्रीय मीडिया के एक विशेष और वृहद् हिस्से (कथित गंगा-जमुनी वाले) की अयोध्या पर भूमिका का निदान, समीक्षा होनी चाहिए| नैतिक पत्रकारिता का यह तकाजा है| पत्रकार पक्षधर नहीं होता| परन्तु सही और गलत को जानते हुए तटस्थ भी नहीं रह सकता| मकसद यही है कि वैचारिक छिछलापन, शाब्दिक उतावलापन, सोच का सतहीपन, इतिहास के प्रति अनपढ़ गंवारपन तथा नाफखोर मीडिया व्यापारियों आदि को दुबारा मौका न मिले| इसीलिए इस दौर की पत्रकारिता के रोल को परखना आवश्यक है| भारतीय प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष स्व. न्यायमूर्ति राजेंद्र सिंह सरकारिया द्वारा 1990 में “अयोध्या और मीडिया” पर गठित जांच समिति के सदस्य के नाते मुझे (IFWJ, अध्यक्ष) विभिन्न प्रकाशन केन्द्रों पर जाना पड़ा था| मेरे साथी सदस्यों में ‘दिनमान’ के संपादक स्व. रघुवीर सहाय, पीटीआई के महाप्रबंधक एन. चन्द्रन तथा स्व. डॉ. नन्दकिशोर त्रिखा भी थे| हमारी रपट परिषद् को पेश की गयी थी | मीडिया द्वारा अयोध्या-घटना की कवरेज की त्रासदी यह रही कि 20-23 दिसंम्बर 1949 के कुछ माह बाद सम्बंधित सूचनाएँ रोक दी गयीं थीं| उन्हीं दिनों रामलला की मूर्ति गुम्बद तले रखी गयी थी| तत्कालीन प्रधानमंत्री और यूपी मुख्यमंत्री के मध्य मसला उठा था| इसकी रपट कई बार छपी थी| जवाहरलाल नेहरु ने गोविन्द वल्लभ पन्त को रामलला की मूर्ति हटाने का निर्देश दिया| पर मुख्यमंत्री ने दंगे भड़क जाने का अंदेशा व्यक्त किया | बस यही विशेष और बड़ी खबर छपी थी तथा कुछ दिनों तक चली| फिर बंद हो गयी| अर्थात कांग्रेस सरकार द्वारा मीडिया प्रबन्धन बड़ा कारगर रहा| फिर आये मशहूर केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री, पूर्वी दिल्ली वाले श्री हरिकिशन लाल भगत| रामजन्म भूमि के मसले पर मीडिया पर दबाव का प्रमाण एक और भी है| हिन्दू संगठनों की “धर्म रक्षा समिति’ ने 6 अगस्त 1983 को नई दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में प्रेस कांफ्रेंस की थी| यह मीडिया के साथ अयोध्या पर प्रथम बड़ी बैठक थी| सौ से ऊपर पत्रकारों के साथ विस्तार में संपन्न इस सभा में प्रश्नोत्तर की झड़ी लगी थी| यह प्रेस कांफ्रेंस सौ मिनट तक चली थी| मगर तुर्रा यह था कि दूसरे दिन (सात अगस्त 1983), के किसी भी पत्र-पत्रिका में अयोध्या विषयक एक अक्षर भी नहीं छपा| मानो वह कोई खबर ही नहीं थी| हालाँकि उसमें जनांदोलन को तीव्रतर करने का ऐलान था| शीघ्र ही हिन्दू जागरण मंच, विराट हिन्दू सम्मलेन (महाराजा कर्ण सिंह की अध्यक्षता वाला), और कांग्रेसी स्वाधीनता सेनानी तथा पूर्व मंत्री दाऊ दयाल खन्ना आदि काशी, मथुरा और अयोध्या मुक्ति आन्दोलन से जुड़ गए थे| तब भी मीडियाजन ने प्रेस क्लब में धरती को डुला देने वाली इस खबर को सिगरेट के धुएं की फूंक में या दारू की पेग पर उड़ा दिया| नजरअंदाज कर दिया| फिर हुआ इंडियन फेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट (IFWJ) का 21वां प्रतिनिधि-अधिवेशन| इसे फैजाबाद, साकेत और अयोध्या में कुल नौ किलोमीटर क्षेत्र के भवनों में आयोजित किया गया| तभी मैं इक्यानबे प्रतिशत वोट पाकर राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित हुआ था| सम्मेलन की तारीखें थीं 25 से 27 जून 1984 तक| याद रहे इन्हीं तिथियों पर नौ साल पूर्व, 1975 में इंदिरा गाँधी ने भारत पर इमर्जेंसी थोपकर प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी थी| अधिवेशन में भारत के 27 प्रदेशों से 840 प्रतिनिधि आये थे| इसके स्वागताध्यक्ष थे दैनिक ‘जनमोर्चा’ (फैजाबाद) के संपादक ठाकुर शीतला सिंह और महासचिव मदन मोहन बहुगुणा (दैनिक हिंदुस्तान), लखनऊ| साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ (मुंबई) के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख ए. राघवन, ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के पं. उपेन्द्र वाजपेयी, एस. के. पाण्डे तथा श्रीमती सुजाता मधोक (अधुना DUJ अध्यक्ष और महामंत्री) लखनऊ से हसीब सिद्दीकी, कु. मेहरू जाफर, मोहम्मद अब्दुल हफीज, शरद प्रधान, रवीन्द्र कुमार सिंह, कैलाश चन्द्र जैन (झाँसी), इलाहाबाद से शिवशंकर गोस्वामी, कृष्णमोहन अग्रवाल, तुषार भट्टाचार्य और के. डी. मिश्र, काशी पत्रकार संघ के स्व. मनोहर खाडेकर, कार्टूनिस्ट जगत शर्मा, राजस्थान से पद्म सिंह भाटी, वशिष्ठ शर्मा, भंवर सिंह सुराणा आदि प्रतिनिधि रहे| नागपुर के प्रतिनिधि मंडल में जयंतराव हरकरे और राजाभाऊ पोफली विशेष थे| यह दोनों राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्व. मोरोपंत पिंगल के आग्रह पर कई अन्य प्रतिनिधियों को लेकर आये थे| बाबरी ढांचे के गुम्बद के तले बने रामलला के अस्थायी मन्दिर के दर्शनार्थ वे सब गए थे| आंध्र तथा तमिलनाडु के पत्रकारों ने मुझे बाद में बताया कि उनकी महिला प्रतिनिधियों की ऑंखें भर आयीं थीं| उनसे रहा नहीं गया कि “हमारे ईष्ट सियाराम भगवान् एक टाट पर मस्जिद तले विराजें!” यह घटना समस्त प्रतिनिधि शिविर में फ़ैल गयी| फिर कतार में सारे पत्रकार बाबरी ढांचे में विराजे रामलला के दर्शन के लिए गये| घर लौटकर कईयों ने देशभर के अपने हजारों पत्र-पत्रिकाओं में राम की दयनीय हालत का चित्रण किया| राष्ट्रीय मीडिया द्वारा अयोध्या की दुर्दशा सारी दिशाओं में, नैऋत्य से ईशान तक, चर्चित हो गयी| नवनिर्वाचित राष्ट्रीय कार्यकारिणी के कई पदाधिकारियों ने अपने प्रदेश स्तरीय बैठकों में अयोध्या की हालत पर विचारयज्ञ कराया| नए राष्ट्रस्तरीय नेतृत्व में उपाध्यक्ष-द्वय स्व.एसवी जयशील राव (कर्णाटक) और प्रकाश दुबे (नागपुर में दैनिक भास्कर के समूह संपादक), महासचिव : कोचिन (केरल) वाले के. मैथ्यू राय, राष्ट्रीय सचिव रामदत्त त्रिपाठी (उत्तर प्रदेश), ए. प्रभाकर राव (आंध्र प्रदेश), चितरंजन आल्वा (इंडियन एक्सप्रेस, नयी दिल्ली) और मनोहर अंधारे (युगधर्म, नागपुर, महाराष्ट्र) थे| इस त्रिदिवसीय अधिवेशन को संबोधित करने वालों में इंदिरा गाँधी काबीना के मंत्री स्व. नारायणदत्त तिवारी (उद्योग), स्व. विश्वनाथ प्रताप सिंह (वाणिज्य), स्व. वी.एन. गाडगिल (संचार) और आरिफ मोहम्मद खान (सम्प्रति केरल गवर्नर) थे| उद्घाटन यूपी के मुख्यमंत्री स्व. श्रीपति मिश्र ने किया था| उनके साथ पं. लोकपति त्रिपाठी तथा प्रमोद तिवारी आये थे| विदेशी प्रतिनिधि भी आये थे| अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार संगठन (IOJ, प्राग) के अध्यक्ष डॉ. कार्ल नोर्देर्नस्ट्रांग, ब्रिटिश नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स के अध्यक्ष श्री जॉर्ज फिंडले (स्कॉटलैंड), जर्मन पत्रकार यूनियन के महामंत्री डॉ. मैनफ्रेड वाईगैंण्ड तथा ऑस्ट्रिया और नेपाल के प्रतिनिधियों ने भाग लिया| कई पर्यवेक्षकों की राय में इतना बड़ा विश्व स्तरीय सम्मेलन किसी भी आंचलिक इलाके (अयोध्या) में अभी तक कभी नहीं हुआ| ज्ञात हुआ कि IFWJ के अयोध्या सम्मेलन के बाद रामजन्म भूमि पर कई संघर्षशील कार्यक्रम हुए| विश्व हिन्दू की धर्म संसद की उसी वर्ष ठीक ढाई माह बाद (अक्टूबर 1984) संपन्न सभा में रामजन्मभूमि न्यास स्थापित हुआ| फिर छः वर्षों बाद सोमनाथ-अयोध्या रथयात्रा द्वारा (1977 में सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहे) लालचंद किशिनचंद आडवाणी ने संघर्ष को तीव्रता दी| यूं तो IFWJ शुद्ध रूप से व्यावसायिक मीडिया संगठन है जिसमें नक्सली (झारखण्ड –छत्तीसगढ़), कांग्रेसी (आंध्र), भाजपायी (महाराष्ट्र), समाजवादी (बिहार और उत्तर प्रदेशीय), जनतादलीय (कर्णाटक) इत्यादि भिन्न विचारधाराओं वाले श्रमजीवी पत्रकार हैं| मगर लक्ष्य सबका केवल यही है कि स्वच्छ पत्रकारिता मजबूत हों| कमजोरियां कम करें| संगठन व्यापक बने | हर जनांदोलन में IFWJ की भागीदारी क्रियाशील हो| K Vikram Rao Mobile : 9415000909 E-mail: k.vikramrao@gmail.com


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गोविंदाचार्य : स्वदेशी विचारक से 'प्रकृतिपुरुष' तक; रूपेश पांडेय,स्वदेशी चिंतक एवं लेखक

उत्तराखंड/उत्तरप्रदेश/काशी | 24 Sep ,Thursday 316

प्रकृति पुरुष गोविंदाचार्य  प्रकृति केंद्रित समाजनीति, राजनीति और अर्थनीति के सिद्धांतकार के. एन. गोविंदाचार्य क्या अब प्रकृति पुरुष की भूमिका में आगये हैं | प्रकृति पुरुष के लक्षण और पहचान क्या हैं | क्या गोविन्द जी में लक्षण विद्यमान हैं | यह कोई सवाल नहीं है | पड़ताल है |  प्रकृति पुरुष, प्रकृति का नियंता नहीं होता | वह सिर्फ प्रकृति संवाद का संवाहक और व्याख्याकार होता है | या कहें कि प्रकृति केंद्रित जीवन का प्रेरणा पुरुष होता है | वह प्रकृति के जिवों और जिवेत्तर रचनाओं के बीच तालमेल का पोषक होता है | जो यह बताता है कि समस्त प्रकृति सिर्फ मानव ही नहीं, मानवेत्तर जिवों के जीवन से परिपूर्ण है |  प्रकृति पुरुष, लोकनायक नहीं होता | वह सिर्फ लोक की संवेदनाओं को सम्प्रेषित करता हुआ स्पंदित करता है | यह स्पंदन ही उसे लोकग्राही और लोकव्यापी बनाता है | जब समाज, राजनीति और अर्थ सत्ता सिर्फ मानव केंद्रित होकर प्रकृति के शोषण और विनाश की रचना करते हैं, तब प्रकृति पुरुष मानवेत्तर जिवों को लोकापेक्षी बना कर प्रकृति संरक्षण की योजना बनाता है |  अपने अध्ययन अवकाश के पिछले दो दशकों की यात्रा में गोविंदाचार्य कुछ ऐसी ही भूमिका में नज़र आ रहे हैं | वे वे जन की बात कर रहे हैं | जल की बात कर रहे हैं | जंगल की, ज़मीन और जानवर की बात कर रहे हैं | वे जन, जल, जंगल, ज़मीन और जानवर को एक-दूसरे का पूरक और पोषक बता रहे हैं | जब वे ऐसा कह रहे होते हैं तो पद और प्रतिष्ठा की तमाम विप्लवी अपेक्षाओं से मुक्त दिखाई देते हैं |  संभव है कि हममे से बहुतों ने कभी गोविंदाचार्य को एक पौध रोपते हुए न देखा हो लेकिन उनकी प्रेरणा से देश भर में हज़ारों लोगों ने लाखों पौधे रोपे हैं | उनका संरक्षण किया है | वे पौध रोपण के लिए जन को जंगलमुखी बनाते हैं | वे स्वयं कोई गाय या पशु नहीं पालते लेकिन उनकी प्रेरणा से सैकड़ों लोगों ने खुद को गौ सेवा के लिए समर्पित कर दिया | ऐसा जान पड़ता है जैसे गोविंदाचार्य करोड़ों गऊ माताओं के आशीर्वाद की शक्ति से अभिसिंचित हो प्रकृति केंद्रित राजनीति के लिए देश को मथ डालने हेतु बेचैन हैं | गोविंदाचार्य के पास अपनी एक इंच भूमि नहीं है लेकिन वे धरती माता के ऐसे वरदपुत्र दिखाई देते हैं जिनके खेती के विचारों को सुनकर हजारों किसानों ने स्वदेशी, अहिंसक और कर्ज मुक्त-खर्च मुक्त खेती को ही अपने जीवन का आधार बना लिया है | जल संरक्षण के लिए गोविंदाचार्य ने किसी नदी, तालाब या पोखर को बचाने के लिए कभी प्रोजेक्ट का धंधा नहीं किया लेकिन वे गंगा के धवल पुत्र की तरह पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक लोक मानस में प्रतिष्ठित हैं |  जन, जल, जंगल, ज़मीन और जानवर के अस्तित्व की बात करते हुए गोविंदाचार्य देश की राजनीति को मानव केंद्रित की बजाय प्रकृति केंद्रित बनाने की सदिच्छा से भ्रमण कर रहे हैं | वे प्रकृति केंद्रित राजनीति की प्रेरणा से कार्य कर रहे देशभर के तमाम आंदोलनकारी समूहों के बीच सेतु-समन्वय के अनुगामी बने हुए हैं | वे अपनी समझ और संसाधन के बल पर कार्य करने वाली उन तमाम संस्थाओं को "भारत विकास संगम" के रूप में मंच प्रदान करते हैं जिन्हे सरकार के नहीं समाज के संरक्षण की जरूरत होती है | वे गांव और गाय को केंद्र में रखकर देश के आधार को मजबूत करने वाले किसानों-कारीगरों को सभ्यता की नींव का पत्थर बनाने में सक्रीय हैं |  77 की अवस्था में जब एक साधारण मनुष्य राम नाम की माला जपकर जीवन पूरा करने की कल्पना करता है तो उसी अवस्था में बेहद सामान्य सी काया के गोविंदाचार्य राम नाम को सभ्यता का हथियार बनाकर लोक को राममय बनाने की प्रेरणा से देशभर में भ्रमण कर रहे हैं | ऐसी साधारण काया के प्रकृति पुरुष गोविंदाचार्य को गंगा माता, गऊ माता, गायत्री माता और धरती माता का आशीर्वाद मिले इसी कामना के साथ उन्हें प्रणाम करता हूं |  (रुपेश पाण्डेय )



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पुण्यतिथि पर अटल जी की स्मृति : मनमोहन शर्मा ,वरिष्ठ पत्रकार एवं अटल जी के साथी

नई दिल्ली/भारत | 16 Aug ,Sunday 320

यादों के झरोखे से part-1 जब अटल जी दिल्ली परिवहन की बसों में धक्का खाते हुए सफर दिया करते थे! आज की पीढ़ी को शायद इस बात पर विश्वास नहीं होगा कि पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी पांच वर्षों तक दिल्ली परिवहन की आम बसों में साधारण यात्रियों की तरह धक्के खाते हुए सफर किया करते थे। सन् 1957 के चुनाव में अटल जी उत्तर प्रदेश के बलरामपुर क्षेत्र से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए थे। एक सांसद के रूप में उन्हें साउथ एवेन्यू में फ्लैट नम्बर-110 पहली बार अलाॅट हुआ था। इस फ्लैट में तब अटल जी अकेले ही रहा करते थे। उन दिनों साउथ एवेन्यू में ही भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी भी रहते थे। उनके घर में उनके साथ कई संघ प्रचारक भी रहते थे। इनमें से पांचजन्य के यशस्वी सम्पादक यादवराव देशमुख, रमिन्द्र बनर्जी आदि का नाम उल्लेखनीय है। उन दिनों मैं भी साउथ एवेन्यू में ही रहा करता था। तब मैं कुंवारा था। इसलिए अटल जी एवं दत्तोपंत ठेंगड़ी आदि के साथ हम लोग साउथ एवेन्यू की कैंटीन में ही भोजन किया करते थे। तब इस कैंटीन में भोजन की एक थाली 60 पैसे में मिलती थी। उन दिनों जनसंघ पार्टी की आर्थिक स्थिति बहुत जर्जर थी। इसलिए पार्टी के सभी सांसद अपना सम्पूर्ण वेतन और भत्ता पार्टी फंड में दे दिया करते थे। उन्हें भोजन आदि के लिए पार्टी द्वारा एक सौ रुपये मासि भत्ता दिया जाता था। यही धनराशि अटल जी और ठेंगड़ी जी को भी प्राप्त होती थी। इसलिए यह दोनों हमेशा आर्थिक संकट से जूझा करते थे। तब अटल जी के पास अपना कोई निजी वाहन नहीं था। टैक्सी या स्कूटर किराये पर लेना आर्थिक संकट के कारण सम्भव नहीं था। इसलिए अटल जी दिल्ली परिवहन की बसों में आम यात्री की तरह धक्के खाते हुए सफर किया करते थे। अटल जी ने पहली कार वर्ष 1967 में ली थी। उन दिनों जनसंघ का मुख्य कार्यालय अजमेरी गेट के समीप एक कमरे में हुआ करता था। एक अन्य प्रचारक जगदीश माथुर मीडिया प्रभारी थे। दत्तोपंत ठेंगड़ी को खाने-पीने का कोई खास शौक नहीं था। मगर अटल जी और जगदीश माथुर मिष्ठान और चाट प्रेमी थे। इसलिए इन दोनों को जब मौका मिलता यह दोनों चावड़ी बाजार, बाजार सीताराम और हौज काजी आदि के चक्कर लगाते और तरह-तरह की मिष्ठान की दुकानों और चाट भंडारों को तलाशते। अटल जी को सड़क पर खड़े होकर खाना-पीना पसंद नहीं था इसलिए वह इन दुकानों से भांति-भांति के मिष्ठान साथ बांधकर ले आते। अगर ऐसे मौकों पर हम भाजपा के दफ्तर में मौजूद होते तो फिर हमारी ईद होती और खूब डटकर मिष्ठानों और चाट पर हाथ साफ किया करते थे। अटल जी इसके साथ-साथ ठंडई के भी बेहद शौकीन थे। अब इनमें से हमारे अधिकांश साथी इस दुनिया से कूच करके वहां चले गए हैं जहां से कोई वापस नहीं लौट पाता। उनकी सिर्फ स्मृति ही शेष रह गई है।



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