नई दिल्ली / चीन।
सोवियत संघ के पतन के बाद पेंटागन के एक उच्चाधिकारी ने कहा था कि अब हमारे स्तर का कोई शत्रु दुनिया मे नहीं रहा। लगता है, उस अधिकारी की यह अहंकार भरी बात किसी मुस्कुराते शैतान ने सुन ली थी, जिसने आज अमेरिका के सामने चीन के रूप में एक दुर्धर्ष शत्रु को खड़ा कर दिया है। चीन को इतना शक्तिशाली बनाने के पीछे भी अमेरिका ही है। जुलाई 1971 में अमेरिका के नेशनल सिक्युरिटी एडवाइजर हेनरी किसिंजर ने चीन से कूटनीति स्तर के सम्बंध स्थापित करने के लिए चोरी से चीन की यात्रा की थी, जिसके फल स्वरूप फरवरी 1972 में अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने चीन की यात्रा की थी। उस समय चाइना कम्युनिस्ट पार्टी के चैयरमेन मायो देजोंग थे। यह किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की पहली चीन यात्रा थी। सप्ताहभर चली उस यात्रा ने दुनिया के सभी देशों को चकित किया था, क्योंकि कुछ साल पहले वियतनाम ने चीन की सहायता से अमेरिका को हराया था जिसमें 50,000 अमेरिकन सैनिक मारे गए थे। कुछ भी हो इस यात्रा के बाद चीन के भाग्य के द्वार खुल गए थे। मायो ने निक्सन से कहा था कि हमारे पास सस्ते मजदूर है, और आपके पास टेक्नॉलॉजी, दोनों इसका लाभ उठा सकते है। इन दो धुरविरोधी विचारधाराओं के नेताओं के बीच इस मीटिंग को कराने के पीछे पाकिस्तान का हाथ था। इस सफल यात्रा के बाद अमेरिकन और यूरोपियन देश बहुत खुश थे। उनकी सोच थी कि उन्होंने सोवियतसंघ के सबसे तगड़े कम्युनिस्ट मित्र को अपने पाले में कर लिया है। अमेरिका से सम्बंध स्थापित होते ही चीन को यूरोप से व्यापार के दरवाजे खुलवाने में देर न लगी। पश्चिमी देशों के साथ चीन ने बड़ी सावधानी से व्यापार करना शुरू किया। व्यापार के अलावा उसने बड़ी संख्या में अपने विद्यार्थी वहाँ की यूनिवर्सिटीयों में भेजे। उनकी मशीनों की रिवर्स इंजीनयरिंग करके उस जैसी मशीने तैयार करके बेचनी शुरू की। जैसे-जैसे चीन अमीर होता गया उसने अपने देश में सड़क, रेल, बंदरगाहों का विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करता गया। मायो के बाद देश में जो भी शासक आया ली झियानियान, यांग शांगकुन, झिआंग जेमिन, हू जिंताओ या शी जिनपिंग सबने अपने एक बड़े नेता डेंग झियाओपिंग के दिए गए सूत्र पर काम किया- Hide your capabilities and bide your time. इधर चीन चुपचाप तरक्की करता जा रहा था, दूसरी ओर अमेरिका और यूरोपियन देश सोवियत संघ के पीछे पड़े थे। 1990 में उन्होंने उसका विघटन भी कर दिया। रूस को तोड़ने के बाद भी अमेरिका और उसके साथी देश नही रूके, वे इराक, अफगानिस्तान, सीरिया, लीबिया के साथ युद्धों में फँसकर अपना पैसा, सैन्य संसाधन, सैनिक बरबाद करते रहे। जबकि चीन चुपचाप उनके उच्च कोटि के संस्थानों में सेंध लगाकर उनकी टेक्नोलॉजी चुराता रहा था तथा उनसे व्यापार करके अरबों डॉलर कमाता रहा। उन दिनों चीन का एक नारा था peaceful rise of china. चीन अपनी नीति में पूरी तरह सफल रहा। उसने अपनी उन्नति के लिए कठोर परिश्रम के अलावा चालाकी, धूर्तता, दमन-प्रलोभन, तिकड़म हर नीति का सहारा लिया। कम्युनिस्टो में नैतिकता नहीं होती अतः उनके लिए वैध-अवैध कोई मायने नही रखता। दूसरे कम्युनिस्ट देश होने से चीन ने हमेशा विदेशी जर्नलिस्टों, पत्रकारों को अपने देश में एक सीमा से आगे घुसने नही दिया, जबकि प्रजातांत्रिक देशों में उसके पत्रकार, जर्नलिस्ट हर जगह घूमते रहे। इसका लाभ यह हुआ पश्चिमी देशों के पास जो भी अच्छा और सर्वश्रेष्ठ था, वह चीन के पास पहुँचता रहा। प्रजातंत्र के कारण पिछले चालीस सालों में लाखों चीनी यूरोप, अमेरिका, आस्ट्रेलिया में जा बसे, जिसमें बहुत सारे जासूस भी होंगे। इस बीच शायद ही कोई विदेशी चीन में जाकर बसा हो। चीन की उन्नति के पीछे एक राज और है, और वह है चीनीयों की जटिल सामाजिक संरचना। वे अति आत्मकेंद्रित (घूने) होते है। आप उनसे घुल-मिल नहीं सकते। उनसे कोई राज निकलवाना बड़ा मुश्किल काम है। इतिहास गवाह है, रेशम बनाने की कला चीन ने दो सौ साल छुपा कर रखी थी, जो बाद में कुछ बौद्ध भिक्षुओं द्वारा छुपाकर लाए गए रेशम के कीड़ों से दुनिया को पता चली। उनकी वृत्ति आपराधिक भी होती है, मौका मिलने पर पैसा कमाने के लिए उन्हें अपराध से गुरेज नही होता। जिस-जिस देश में चीनी पहुँचे आपराधिक गतिविधयों में भी लिप्त हुए। आज बर्मा, थाईलैंड, मलेशिया, नेपाल, कम्बोडिया केे जुआघरों, वेश्यावृति के अड्डों, ड्रग व्यापार पर चीनी अपराधियों का कब्जा है। अपराध करने में चीनी बेजोड़ होते है, अपने गैंग में वे किसी बाहरी को घुसने नही देते। कुछ दिन पहले एक रिपोर्ट पढ़ी थी जिसमें कहा गया था कि रूस के चीन सीमा से सटे शहरों में चीनी अपराधियों का दबदबा बढ़ता जा रहा है। ब्लादिवोस्टक जो पूर्वी रूस का सबसे बड़ा शहर है, उसके अपराध जगत पर पहले रूसी माफियाओं का कब्जा था। बीते कुछ सालों में चीनी अपराधियों ने अधिकतर रूसी माफियाओं को मार दिया है, बाकी भाग गए है। अब शहर के सभी अवैध धंधों पर चीनीयों का कब्जा है। इसी तरह चीनी सीमा के निकट बर्मा के कई शहर चीनीयों ने जुआघरों में बदल दिए है। बर्मा का सारा स्टोन मार्केट उनके कब्जे में है। वे अफ्रीकी देशों में चोरी से सोना निकाल रहे है। वहाँ के वन्य जीवों की तस्करी कर रहे है। इस समय चीन दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली देशो में से एक है। दुनिया के लगभग 14% व्यापार पर उसका कब्जा है तथा उसकी फैक्ट्रियाँ दुनिया का लगभग 28% समान बनाती है। दुनिया में कोई ऐसा प्रोडक्ट नही है, जो वह न बनाता हो। कुछ आंकड़ो के अनुसार यदि चीन इसी गति से निर्बाध चलता रहा तो इस सदी के अंत तक उसका दुनिया के 50 प्रतिशत व्यापार पर कब्जा हो जाएगा। आज उसके पास दुनिया की सबसे बड़ी आधुनिक सेना है, अति विशाल इंफ्रास्ट्रक्टर है। उसके नगरों की इमारतें दुनिया में सबसे चमचमाती हुई और भव्य है। उसके बैंक पैसों से लबालब भरे है, उसका फोरेक्स रिजर्व सबसे अधिक 3399 बिलियन अमेरिकन डॉलर के लगभग है। साथ ही वह दुनिया का सबसे बड़ा महाजन है। उसने 150 से अधिक देशों को 1500 बिलियन से अधिक कर्ज बाँट रखा है, जो दुनिया के सबसे बड़े वित्तीय संस्थानों वर्ल्ड बैंक और आई एम एफ के बाँटे गए कर्ज से अधिक है। जिनमें दर्जनों देश ऐसे है, जो इस कर्ज को लौटा नही पाएँगे। देर-सवेर उन्हें अपने देश की प्रभुसत्ता का सौदा चीन के साथ करना पड़ेगा। पिछले चालीस सालों में चीन ने विराट इंफ्रास्ट्रक्टर खड़ा कर लिया है। अब उसकी मंशा पूरी दुनिया में फैलने की है, जिसकी झलक उसकी सबसे महत्वाकांशी योजना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव(BRI) में दिखाई देती है। यह योजना दुनिया की सबसे बड़ी योजना है जिस पर 8 ट्रिलियन अमेरिकन डॉलर खर्च होने का अनुमान है।(भारत की GDP अभी 3 ट्रिलियन डॉलर से कम है) BRI योजना से एशिया, अफ्रीका, यूरोप, मिडिल ईस्ट और अमेरिका के 130 देश सीधे चीन से जुड़ जाएँगे। । यह योजना 2013 में शुरू हुई थी और इसे 2049 तक पूरा होना है। CPEK भी इसी योजना का हिस्सा है। कुछ देशों में जहाँ से यह सड़क गुजरी है उसके किनारे चीनी अपनी कॉलोनी भी बसाते जा रहे है। अमेरिका को यह योजना खटक रही है कहने को चीन इसे द्विपक्षीय व्यापारिक योजना बताता है पर वास्तव में वह इसे अपना माल बेचने के लिए तैयार कर रहा है। अतः दिन दूनी, रात चौगुनी गति से बढ़ते जा रहे चीन को पहला झटका डोनाल्ड ट्रम्प ने दिया। चार साल पहले डोनाल्ड ट्रम्प ने सरकार बनने के बाद चीन की संदिग्ध गतिविधियों पर ध्यान देना शुरू किया। उन्होंने पाया कि चीन और अमेरिका के टेक्निकल गैप लगभग खत्म होने के कगार पर है, इसका मतलब था कुछ सालों के बाद अमेरिका के पास कोई ऐसी टेक्नॉलॉजी नही बचेगी जो चीन के पास न हो। कई क्षेत्रों में तो चीन अमेरिका से आगे निकल गया था। अब चीन को रोकना लाजिमी था, यदि नही रोका गया तो एक दो दशक बाद चीन का सुपरपावर बनना निश्चित था। इसके लिए ट्रम्प ने दो काम किए एक तो उसने अमेरिका के संवेदनशील उच्च संस्थानों से चीनीयों को भगाना शुरू किया, जहाँ वे अमेरिका की कटिंग एज टेक्नॉलॉजी की चोरी कर चीन भेज रहे थे। दूसरे चीन से आयात किए जा रहे सामानों पर भारी-भरकम टेक्स लगाकर अपनी कमाई बढ़ाई और चीन की कम की। अभी दोनों देशों के बीच ट्रेडवार चल ही रह था कि दुनिया के सामने कोरोना वायरस का संकट आ गया। यह वायरस प्राकृतिक है या कृत्रिम यह बाद का प्रश्न है, पर यह निर्विवाद सत्य है कि इसका उद्गम चीन है। करोना वायरस ने दुनिया में जान-माल की भारी तबाही मचाई है। 195 देशों के चार लाख के लगभग लोग मर चुके है, जिनमें सबसे अधिक अमेरिकी है। सभी देशों की अर्थव्यवस्थाएँ चरमरा गई और काम-धंधे ठप्प हो गए है। कुछ अर्थ शास्त्रियों का अनुमान है कि कोरोना से दुनियाभर में 200 करोड़ लोगो का वापस गरीबी में जाना तय है, यें वे लोग है जो कुछ साल पहले गरीबी रेखा से बाहर निकले थे। इस वक्त सारे देश चीन से नाराज है, कुछ गुस्से में उबल रहे है। ऊपर से इस संकट की घड़ी में चीन का व्यवहार असंवेदनशील, मौकापरस्त, हठधर्मिता वाला रहा है। कोरोना के फैलने में उसकी गतिविधियाँ संदिग्ध है। जब अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया जैसे देशों ने उससे कोरोना की संदिग्ध जन्मस्थली वुहान लेब की जाँच करने की माँग की तो उसने साफ मना कर दिया। इस नकारात्मक उत्तर से सबको लगा कि चीन ने कोरोना को जानबूझकर फैलाया है। चीन के असहयोग भरे रवैये से अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने उसे सबक सिखाने की ठान ली। आपने किसी स्टेज वन वाले कैंसर के मरीज को देखा होगा, वह पूर्ण स्वस्थ दिखाई देता है, पर उसे नही पता होता कि वह मृत्यु की ओर उन्मुख हो चुकी है। इस समय चीन की स्थिति स्टेज वन के मरीज जैसी है। वह रोज खोखला होता जा रहा है। पिछले तीन महीनो में उसकी बहुत अर्थ हानि हो चुकी है। मार्च के प्रथम सप्ताह में उसका फोरेक्स रिजर्व 3399 बिलियनअमेरिकन डॉलर था, जो अप्रैल के अंत तक 3091 बिलियन डॉलर रह गया था। उसके बाद चीन नेआंकड़े देने बन्द कर दिए है। अनुमान है, उसका फोरेक्स रिजर्व 15 बिलियन प्रति सप्ताह की दर से गिर रहा है। दूसरे पिछले महीने यू एस सीनेट ने अमेरिकन स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टिड चीन की लगभग 800 कम्पनियों को डीलिस्टड करने का बिल पास किया है। इन्हें डीलिस्ट करने की प्रक्रिया में बहुत सारी कानूनी अड़चने आएँगी पर शुरुआत हो चुकी है। इसी प्रकार भारत और कई यूरोपीय देशों ने भी अपने स्टॉक एक्सचेंजों में चीन की FDI रोकने के लिए नियम सख्त कर दिए है। कुछ दिन पहले ही अमेरिका ने हांगकांग के साथ विशिष्ट व्यापार वाला दर्जा समाप्त कर दिया है। अकेले हांगकांग से ही चीन को सालाना चार सौ से अधिक बिलियन अमेरिकन डॉलर की कमाई होती थी। कोरोना संकट के बाद कई एजेंसी चीन की आर्थिक हानि का अनुमान लगा रही है, सबके आंकड़े अलग है। यदि सबका औसत निकाला जाए तो चीन को अब तक 1600 बिलियन अमेरिकन डॉलर का नुकसान हो चुका है। ऊपर से एक्सपोर्ट ओरिएंटेड इकोनॉमी होने और ऑर्डर न होने से उसकी बहुत सारी फैक्ट्रियाँ बन्द पड़ी है। रिसकर आती खबरों के अनुसार चीन के 8 करोड़ मजदूर बेरोजगार हो चुके है। कोढ़ में खुजली यह कि चीन से हजारों कम्पनियाँ शिफ्ट होकर अपने या दूसरे देशों में जाने की सोच रही है। कोरोना से उसकी BRI योजना भी खटाई में जाती दीख रही है। यह सब चीन के लिए बुरे सपने जैसा है। मुझे लगता है यह देश शापित है। जब भी यह अपने स्वर्णकाल तक पहुँचने को होता है, तो ऐसी गलती कर बैठता है कि इसका पतन शुरू हो जाता है। सन 1400 में चीन के पास दुनिया का सबसे बड़ा जहाजी बेड़ा था जिसे 'ट्रेजर फ्लीट' कहा जाता था। ट्रेजर फ्लीट में 3500 जहाज थे। उनमें कुछ उस समय यूरोप में बने जहाजो से पाँच गुना बड़े थे। उन जहाजो की विशालता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उनमें कुछ की लम्बाई 120 मीटर होती थी(वास्कोडिगामा के जहाज की लंबाई 19 मीटर थी) और एक जहाज में 1500 जहाजी चलते थे। जब चीन का जहाजी बेड़ा अफ्रीका में व्यापार के लिए निकलता था तो तीन सौ से अधिक जहाज एक साथ जाते थे। विशालता चीनीयों को सदैव प्रिय रही है, इतनी प्रिय की यें एक दिन चीनी इसके बोझ में दब जाते है। चीन की दीवार भी इसका उदाहरण है। इतने सारे जहाजो का खर्च और रखरखाव उनसे किए व्यापार की कमाई से आधी पड़ रहा था। यह घाटा धीरे-धीरे बढ़ता गया। परेशान होकर सन 1525 में उस समय के मिंग वंश के राजा ने पूरे बेड़े को आग लगाकर नष्ट कर दिया। यदि उस समय चीन अपनी नौ सेना का प्रयोग किसी दूसरे रूप में करता तो हो सकता है उस समय विश्व का सबसे शक्तिशाली देश बन जाता। अपनी बेवकूफी भरी हरकतों से कोरोना को पूरी दुनिया में फैलने देकर चीन ने एक बार फिर वही गलती कर दी और सुपर पावर बनने का मौका गवाँ दिया। विश्व समुदाय में उसकी छवि ध्वस्त हो गयी है। विदेशों में उसके नागरिकों को पीटा जा रहा है। दो, तीन देशो को छोड़ दे तो असज चीन अकेला खड़ा है। आश्चर्य यह कि इतनी बुरी स्थिति में भी वह पड़ोसियों से झगड़ रहा है। भारत, जापान, वियतनाम इसके उदाहरण है। लद्दाख, सिक्किम पर हमारी सेना से टकराव पैदा करके वह भारत को धमकाना चाहता है कि अमेरिका के अधिक पास न जाए जबकि अमेरिका भारत के लिए फूल मालाएँ लिए खड़ा है, दूसरे चीन देश में अस्थिरता फैलाना चाहता है, ताकि चीन छोड़ने वाली कम्पनियाँ भारत न आ पाए। वह हमसे युद्ध नही चाहता, यदि चाहता तो उसके पास डोकलाम विवाद अच्छा मौका था। तब उसका व्यापार ठीक चल रहा था, और भारत भी आज की अपेक्षा कम शक्तिशाली था। चीन को आभास चुका है कि उसके स्वर्णकाल का उत्स जा चुका है, अब उसके सामने ढलान ही ढलान है। अमेरिका और यूरोपीय देश उसके पीछे पड़ चुके है। इन देशों का व्यवहार भेड़ियों के झुंड की तरह होता है जो शिकार को थकाकर मारते है। इनके हमलें तो शुरू हो चुके है चीन के मर्मस्थलों की टोह लेना बाकी है। यदि चीन इनके सामने नही झुका तो कुछ सालों तक ही अपने को बचा पाएगा, यें चीन का शिकार करके ही दम लेंगे। सोवियत संघ के विघटन के समय सबने इन देशों का व्यवहार देखा है। यें देश अफ्रीकी देशों की तरह नही जहाँ राजनीतिज्ञों को रिश्वत देकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है। यें सब देश अपनी जनता के प्रति जवाबदेह है, देर-सवेर इस कम्युनिस्ट देश से हिसाब और वसूली करके ही मानेंगे।...


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भारत /चीन/एशिया।
ड्रैगन की पूँछ भाग 1 - चीन और विश्व लेख : प्रवीण शुक्ल सांप को अगर आप को कंट्रोल करना है तो आप उसकी पूंछ की तरफ से उसको पकड़ते है, पूंछ पकड़ कर आप उसे उठा लेते हैं। सांप का ही एक रिश्तेदार है, ड्रैगन, आजकल ड्रैगन को भी काबू में करने के लिए पूँछ उठाई जा रही है। ड्रैगन यानी चीन कोविड वायरस जैसे जैविक हथियार बनाने की कोशिश में था और दुनिया में रही है कि वुहान में उसकी एक ऐसी ही लैब से यह वायरस निकला हैं।अमरीकी सेक्रेटरी आफ स्टेट माइक पॉमपियो ने तो खुल कर चीन पर यह इल्जाम लगा रहे हैं और इजरायल जाकर सात देशों को अपने पक्ष में भी कर लिया। चीन की बढ़ती ताकत ने जियोपोलिटिकल अलाइनमेंट बदल दिया हैं, पहले हम रूस की तरफ थे पर अब धीरे धीरे अमरीकी खेमे की तरफ बढ़ रहे हैं, तेजी से दुनिया मे दो टीमें बन रही हैं टीम अ: अमरीका, भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान, ब्राजील, ब्रिटेन और कनाडा मिलकर चीन की बढ़त पर दबाव बना रहे हैं तो वही 'शंघाई ' के टीम च : चीन रूस सेंट्रल एशिया के रूसी प्रभाव वाले मुल्क जिनमें कजाकिस्तान प्रमुख है, चीन,पाकिस्तान और बैकडोर से ईरान और नार्थ कोरिया भी शामिल हैं। रूस के आमंत्रण पर भारत भी नाममात्र के लिए इसमे शामिल हैं। यूरोप अभी चीन पर कुछ ज्यादा ही निर्भर हैं इस लिए यूरोपीय संघ अभी इस अलाइनमेंट से दूरी बनाए हुए हैं मगर यूरोप के टीम ताकतवर मुल्क जर्मनी फ्रांस और इटली कल कहां खड़े होंगे यह कोई बड़ी पहेली नही हैं। ड्रैगन की पूंछ को कहां कहां से उठाया : 1) साउथ चाइना समुद्र: चीन जबरदस्ती 95% साउथ चाइना समुद्र पर अपना अधिकार जमा रहा हैं तो 'टीम अ' इसमे विएतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस का भी 50%से ज्यादा हिस्सा मानता हैं। अगर चीन से सम्भावित जंग हुई तो यह इसी इलाके में होगी, आज यह कोल्ड वॉर का सबसे प्रमुख थियेटर हैं। 2) हांगकांग : हांगकांग को जब अंग्रेजों ने व्होद था तब एक देश और दो संविधान के तहत चीन ने हांगकांग और ब्रिटेन से वादा किया था। पिछले साल तो एक छोटा सा कानून चीन ने बदला था तो इतना बवाल हुआ था अब इस वर्ष चीन ने हांगकांग के संविधान को खत्म करने का बिल लाया हैं अब क्या होगा सोचिये ? 3) ताइवान : इतिहास में ताइवान जापानियों के पास था बाद में ब्रिटिश सेना ने इसे जीत कर चीन में मिला दिया। फिर जब कम्युनिस्ट सत्ता में आये तो चियांग काई शेक वाले राष्ट्रवादी दल को चीन से भगा दिया गया जो बाद में यूरोप और अमरीकी चटरचस्य में ताइवान में सेटल जो गए। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता हैं तो ताइवान अपने को नही मानता। इस वर्ष ताइवान में चीन विरोधी ताइवानी नेशनलिस्ट नेता चुनाव जीती हैं अब चीन परेशान हैं। अभी विश्व स्वास्थ्य संगठन की बैठक में ताइवान को अलग सीट देने की चर्चा पर चीन उखड़ गए था। 4)विनिवेश -डिसइन्वेस्टमेंट: कोविड के बाद से बड़ी अमरीकी और यूरोपीय कम्पनियों ने सारी मैन्युफैक्चरिंग चीन में करने की अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना शुरू कर दिया हैं। यह कंपनियां अपने निवेश जैसे फैक्ट्रियां रिसर्च सेंटर आदि को भारत वियतनाम जैसे मुल्कों में डायवर्सिफाई करना चाहती हैं यानी सारे सेब चीन की टोकरी में ना रख करके अब इन सेबों को भारत, चीन, मलेशिया, थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे मुल्कों में बांटा जाएगा। 5) साइनो अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार विवाद : विश्व का प्रमुख बाजार अमरीका हैं, तो इस बाजार की डिमांड का सामान बड़ी मात्रा में चीन में बनता हैं जिससे अमरीका को चीन से करीब करोड़ का व्यापार घाटा होता हैं। 2018 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन को बड़ा झटका देते हुए पहले सोलर पैनल फिर स्टील और उसके बाद मई 2019 में 200 अरब डॉलर के उत्पादों पर आयात शुल्क ढाई गुना तक बढ़ा दिया. इसके चलते अमेरिका में चीनी सामान की कीमत में 10 से 25 फीसदी तक का उछाल आ गया था। चीन अपनी लेबर को जबरदस्ती सस्ती सैलरी और इंडस्ट्री को छुपकर सब्सिडी देकर अपना सामान सस्ते में बना कर दुनिया भर में पटकता था अब ट्रम्प ने जिस तरह से इन सस्ते सामानों पर टैक्स बढ़ोतरी कर इन महंगा कर दिया हैं उससे चीन दुखी हैं। 2019 में ही अमरीका ने कहा था वो करीब एक हजार करोड़ के चीनी सामानों पर टैक्स बढ़ाएगा। सोचिये 2020 में अमरीका क्या करेगा ?? 6) क्षेत्रीय विवाद : चीन अपने पड़ोसियों भारत जापान विएतनाम रूस को सामरिक रूप से घेरने की कोशिश करता रहता हैं। उसने विएतनाम से पार्सल द्वीप, जापान का सेनकाकू द्वीप, भारत का अक्साई चिन, गिलगित बाल्टिस्तान के शाक्षघाम घाटी समेत काराकोरम का बड़ा हिस्सा चीन के पास हैं। अस्ट्रिलिया के बीफ और बारले पर अत्यधिक टैक्स वृद्धि और वहां बढ़ती चीनी आबादी और इन्वेस्टमेंट आदि प्रमुख विवाद हैं। यह सब देश टीम अ बनाकर चीन की विस्तारवादी नीति को रोकने की कोशिश में हैं। (शेष अगले अंक में)...


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नई दिल्ली ।
परिशिष्ट आप किसके साथ खड़े हैं इसका उत्तर कई तरह से मिल सकता है। यदि राजनीतिक लगाव रखते हैं तो आप किसी दल का नाम ले सकते हैं। यदि सामाजिक चिंता अधिक गहरी है तो आप कह सकते हैं हम सामाजिक अन्याय का उन्मूलन करने वालों के साथ हैं। आर्थिक विपन्नता से ग्रस्त हैं और सामाजिक स्थिति ऐसी है जिसमें आपको सामाजिक ‘विषमता के निवारण’ के नाम पर जो रियायतें मिलती हैं ,उनमें से भी कोई नहीं मिलतींं, तो आप संपन्न या इस व्यवस्था का का लाभ उठाकर मालामाल हो चुके लोगों की दी जाने वाली रियायतों की ओर उँगली उठाते हुए इसे ही अन्याय और अवसर की असमानता सिद्ध करते हुए इसके विरोध में खड़े हो सकते हैं। कुछ ऐसे लोग जो रोशनी में आपके विरोध में खड़े दिखाई दे सकते हैं धुँधलके में आपके साथ खड़े हो सकते हैं। कई बार तो आप अपने विरुद्ध, अपनी आदत और बीमारी के साथ, अपने देश और समाज के विरुद्ध और उन विदेशी ताकतों के साथ खड़े हो सकते हैं जो समाजवाद की घुट्टी पिला कर आपको अपने ही देश के खिलाफ अपने साम्राज्यवादी योजनाओं के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। आप किसी ऐसे चारे के रूप में पेश किए गए लुभावने खयाल के साथ खड़े दिखाई दे सकते हैं, जैसे आपको हैवान बना कर इनाम में झूठे स्वर्ग का भरोसा देने वाले पुराने मजहब, या धरती पर स्वर्ग उतारने का सपना दिखाने वाले और अपने व्यवहार में पूरी तरह विफल यहां तक कि त्रासदी के नए रूप सिद्ध होने वाले नए मजहब जो कहने को मजहब का विरोध करते हैं पर मजहबियों द्वारा भी इस्तेमाल कर लिए जाते हैं, जैसे भारतीय कम्युनिज्म या सेकुलरिज्म। आप जहां भी खड़े हैं या खड़े होने की आदत डाल चुके हैं वह आपकी नजर में पूरी धरती पर सबसे सही मुकाम है और आप सबसे सही आदमी। पर आप अपनी समझ से सत्य के साथ खड़े हो सकते हैं और असत्य और पाखंड का समर्थन कर सकते हैं, और इस कड़वी सचाई से अनजान भी रह सकते हैं। जिस मान्यता से आप वर्षों से जुड़े रहे हैं, या कहें जिसमें आपने अपने जीवन के इतने वर्षों की लागत लगाई हो, उसके विरुद्ध यदि ऐसे तर्क और प्रमाण मिलें, जो उसे गलत सिद्ध कर सकें, या जिन से उसके गलत सिद्ध होने का अंदेशा हो, तो उसे जानना ही नहीं चाहेगा; जान गया तो मानने को तैयार नहीं होगा। जो भी हो, जब भी आप किसी के साथ खड़े होते हैं तो किसी के विरोध में खड़े होते हैं, विरोध में खड़े होते हैं जाने अनजाने किसी के साथ खड़े होते हैं। जब आप हिंदुत्व के विरुद्ध खड़े होते हैं तो आप मानवता के उन शत्रुओं के साथ खड़े होते हैं जिनमें से एक का सही खाका रसेल ने प्रस्तुत किया था। दूसरे का सही रूप उससे भी अधिक बीभत्स है इसे अब तक न जानते रहे हो तो मरकज और तबलीग की योजनाओं और कारनामों से जान चुके होंगे। इसके बाद भी, आदतन, हिंदुओं में ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं मिलेगी जो आज भी बिना यह जाने कि हिंदुत्व क्या है, हिंदुत्व को कोसने और उनका बचाव करने के लिए खड़े हो जाएंगे। मुसलमानों में तो इसलिए भी खड़े हो जाएंगे कि उनकी असुरक्षा की भावना इन कारनामों के सामने आने से बढ़ जाएगी और वे इशारों में बताएंगे कि हिंदुत्ववादी उनका सामुदायिक चरित्र हनन कर रहे हैं। परन्तु यह नहीं बताएँगे कि इन गतिविधियों की जानकारी उन्हें पहले से थी, और इस पर चुप्पी लगाए रहे- कभी लिख कर या बोल कर या किसी कला-माध्यम से विरोध करने की जगह, उस समय भी चुप रहे जब बात बेबात काल्पनिक स्थितियाँ पैदा करके हिंदुत्व पर हल्ला बोल प्रदर्शन करते रहे। यदि उन्हें तबलीग का मौन समर्थक कहने वाले पैदा हो जाएँ तो उन्हें गलत सिद्ध करने का सही तर्क मेरे तलाशे भी न मिलेगा। हिंदुत्व का नाम आते ही सारा ज्ञान, सारा पांडित्य, सारा तर्क कौशल हवा हो जाता है। पिछले 70 सालों में लगातार एक ही झूठ को बार-बार दोहराते हुए सामुदायिक सौहार्द के नाम पर इस घृणा का पोषण नाजी प्रचार तंत्र का इस्तेमाल करते हुए किया गया, और इसे फोबिया मिश्रित आतंक और घृणा का ऐसा जमा पहनाया गया कि अपने को उदार और मानवीय सिद्ध करने की कोशिश में हमारे समाज के महत्वाकांक्षी बुद्धिजीवी मानव द्रोही मजहबों के सेवादार बन कर इसे मिटाने के लिए प्रयत्न करते रहे। मैंने अपना समापन लेख समग्र साक्ष्यों के साथ बहुत स्पष्ट रूप में यह बताते हुए क्या हम हिंदुत्व का प्रयोग सनातन धर्म के लिए कर रहे हैं और सनातन धर्म मानवीय मूल्यों बल्कि सत्ता के अविभाज्य नियमों का संकलन है मनुष्यता को यदि जीवित रहना है तो इसका पालन भी करना होगा। हिंदू समाज में हिंदुत्व विमुख लोग हैं, हिंदुत्व वंचित लोग भी हो सकते हैं, परंतु यह नहीं है जो किसी जाति के हो अपितु जिनका व्यवहार मानवता की अपेक्षाओं के अनुरूप न हो । वे ब्राह्मण भी हो सकते हैं, और भी। दूसरे देश और काल के ऐसे लोग भी हिंदू की परिभाषा में आते हैं जो मानवीय मूल्यों का सम्मान करते हैं उनसे विचलित होने पर अनुभव करते रहे, और आज भी जिन्होंने दूसरों की अपेक्षा इन मूल्यों को बचा कर रखा है। मैंने यह कहीं दावा नहीं किया कि हिंदू समाज निर्दोष है, या हिंदू समाज का आचरण हिंदुत्व को परिभाषित करता है। स्वयं हिंदू को और अपने को मानवीय सरोकारों से जुड़ा अनुभव करने वालों को हिंदुत्व के अनुरूप अपने को ढालना होगा। ऐसे कुछ लोगों की समझ में जिनकी बुद्धि पर मुझ को संदेह नहीं है, यह बात समझ में नहीं आई, परंतु उनका आभार है कि उन्होंने अपना पक्ष स्पष्ट रूप में रखा और मुझे यह समझने का अवसर मिला कुछ लोग दूसरे सरोकारों से जुड़े होने के कारण हिंदुत्व को उसका विरोधी मान बैठे हैं, और हिंदुत्व को ब्राह्मणवाद का पर्याय मानते हैं क्योंकि इसे इसी रूप में प्रचारित किया गया है। हिंदुत्व की भर्त्सना करने वाले दूसरे लोगों ने उस लेख को पढ़ा नहीं होगा, या पढ़ते हुए घबराकर छोड़ दिया होगा, परंतु उनकी धारणा में कोई परिवर्तन हुआ होगा इसकी आशा मैं नहीं करता। फोबिया से ग्रस्त व्यक्ति का दिमाग काम नहीं करता, सिर्फ डर काम करता है, और उसके दबाव में आने के बाद उन्हें स्वयं इसका बोध होता है जिसके लिए उन्हें बहाने तलाशने पड़ते हैं। कहने को वे कहेंगे वे दक्षिणपंथी राजनीति के विरुद्ध है, हिंदू समाज के नहीं। हम यह पहले बताए हैं कि वे सबसे पहले हिंदू समाज से नफरत करते हैं और तब से नफरत करते हैं जब हिंदू संगठनों का कोई नाम तक नहीं जानता था, और आज तक हैं परंतु इससे अनजान हैं। इसे बार-बार दोहराने की जरूरत नहीं हिंदू समाज के संकट पर हमेशा उन्होंने नकारात्मक रुख अपनाया है और आज भी अपना रहे हैं। आतताइयों की रक्षा के लिए उन्होंने आतंकवादी गतिविधियों में शरीक, पुलिस की पकड़ में आ चुके अपराधियों को क्षमा दान देते हुए उनका अपराध धार्मिक झुकाव रखने वाले हिंदुओं पर लादते हुए, मीडिया का इस्तेमाल करते हुए, फाइलों को दबाते और नष्ट करते हुए, अदालतों में अपने दिए बयानों को उलटते हुए एक काल्पनिक हिंदू आतंकवाद की सृष्टि करने का प्रयत्न किया और यदि आर वी एस मणि की पुस्तक दि मिथ ऑफ हिंदू टेरर से, जिसमें उनको भी धार्मिक रुझान रखने के कारण गृह मंत्रालय में एक जिम्मेदार पद पर होते हुए अपहरण करने और फँसाने का प्रयत्न किया गया जो उनके सौभाग्य से विफल रहा और उन्होंने तत्काल इसकी रपट थाने में लिखवा दी और इसके बाद उनको इसलिए प्रताड़ित किया जाता रहा किसी तरह वह अपना बयान बदल दें, इसमें विफल होने वाले इंस्पेक्टरों की उन्नति रुक गई, कुछ को विफलता के लिए सजा मिली क्योंकि तत्कालीन गृहमंत्री पसीने छूट रहे थे। इसमें यह सिद्ध करने के लिए कि 26/11 के मुंबई कांड में भी अपराधियों को बचाते हुए, पाकिस्तानी सरकार की पाकिस्तानी मिली भगत पर पर्दा डालते हुए, हिंदू आतंकवाद सिद्ध करने के लगातार प्रयत्न किए जाते रहे, कसाब तक को हिंदू पहचान देने के प्रयत्न किए जाते रहे, तिथि, फाइल, नोट, बदले हुए नोट, अदालती साक्ष्यों और बयानों, पार्लमेंट की बहसों, और दूसरे दस्तावेजों के इतने पुष्ट प्रमाण हैं कि उनसे गुजरने के बाद स्वयं मैं आश्वस्त हो पाया कि सोनिया समर्थित कांग्रेस और अन्तरात्मा का सौदा करके पद और लूट के लिए दूसरे महत्वाकांक्षी कहाँ तक गिर सकते हैं। जो भी हो, जब भी किसी के साथ खड़े होते हैं तो किसी के विरोध में खड़े होते हैं, विरोध में खड़े होते हैं जाने अनजाने किसी के साथ खड़े होते हैं। जब आप हिंदुत्व के विरुद्ध खड़े होते हैं तो आप मानवता के उन शत्रुओं के साथ खड़े होते हैं जिनमें से एक का सही खाका रसेल ने प्रस्तुत किया था। दूसरे का सही रूप उससे भी अधिक बीभत्स है इसे अब तक न जानते रहे हो तो मरकज और तबलीग की योजनाओं और कारनामों से जान चुके होंगे। इसके बाद भी, आदतन, हिंदुओं में ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं मिलेगी जो आज भी बिना यह जाने कि हिंदुत्व क्या है, हिंदुत्व को कोसने और उनका बचाव करने के लिए खड़े हो जाएंगे। मुसलमानों में तो इसलिए भी खड़े हो जाएंगे कि उनकी असुरक्षा की भावना इन कारनामों के सामने आने से बढ़ जाएगी और वे इशारों में बताएंगे कि हिंदुत्ववादी उनका सामुदायिक चरित्र हनन कर रहे हैं। परन्तु यह नहीं बताएँगे कि इन गतिविधियों की जानकारी उन्हें पहले से थी, पर इस पर चुप्पी लगाए रहे- कभी लिख कर या बोल कर या किसी कलामाध्यम से उस समय भी चुप रहे जब बात बेबात काल्पनिक स्थितियाँ पैदा करके हल्ला बोल प्रदर्शन करते रहे। यदि उन्हें मौन समर्थक कहने वाले पैदा हो जाएँ तो उन्हें गलत सिद्ध करने का सही तर्क मेरे तलाशे न मिलेगा। जब आप हिन्दुत्व के साथ नहीं होते हैं तो आततायियों और देशद्रोहियों की सत्ता के साथ होते हैं, शत्रु देशों से अपने ही देश पर हमला कराने वालों के साथ होते हैं और बौद्धिक दृष्टि से इतने खोखले हो चुके होते हैं कि इतना गिरा हुआ, सांप्रदायिक जहर से भरा हुआ शासन, बहुजन को बहुजन होने के अपराध के कारण मिटाने के लिए तैयार शासन आपको मानवतावादी लगता है आप चुप लगाए रहते हैं उसकी वापसी तक की प्रतीक्षा करते हैं. और आज तक कठिन परीक्षाओं से गुजरते हुए भी सबका साथ सबका विकास के लिए प्रयत्नशील व्यवस्था आपको उद्विग्न कर देती है। आपके सारे काल्पनिक भय अंधड़ की तरह यथार्थ को ओझल कर देते हैं। हिन्दुत्व द्रोहियों का लक्ष्य हिंदुत्व को समझना नहीं इस पर प्रहार करना होता है। समझने और सराहने की दृष्टि मूर्तिकार और वास्तुकार की होती है, जो यदि मूर्तिभंजक और ध्वंसकारी में पैदा हो जाए तो उसके हाथों में आया हुआ हथौड़ा और मारतौल उसके ही शरीर में आए कंपन और प्रस्वेदन से छूट कर गिर जाएगा और वह जानुपात की मुद्रा में आ जाएगा। इस आशंका से ही दूसरा कारण जुड़ा है। अपने कारनामे को अंजाम देने के लिए वह नजर तो डालता है पर गौर से देखने का साहस नहीं जुटा पाता। वह जहाँ समझने का अभिनय करता है, वहाँ भी समझने से कतराता है, वह गहन विवेचन के नाम पर कुतर्क द्वारा अध्याय (जिसका अध्ययन करना है) उसे दूषित और नष्ट करता है।...


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यूरोप/भारत।
संपादन के क्रम में ईसा के जन्म से 900 साल पहले वेटिकन से मिली लिंग की प्रतिमा (पिछली पोस्टें देखें) इस विषय में किसी तरह का संदेह नहीं रहने देती कि मातृदेवी और लिंग – सृष्टि के मूल- की उपासना का, पश्चिमी जगत में, प्रसार भारत से हुआ था। इसका इतिहास की व्याख्या में महत्व यह है कि हड़प्पा के जिस व्यापारिक तंत्र के माध्यम से संस्कृत भाषा, देव समाज, और ज्ञानविज्ञान का भारोपीय क्षेत्र में प्रसार हुआ था उसमें दो स्तरो के लोग सम्मिलित थे। एक व्यापारी वर्ग और दूसरा उसकी सेवा में लगे हुए लोग जो परिवहन पशुपालन, नौचालन और मालवहन का काम करते थे, घरेलू स्तर पर औद्योगिक उत्पादन में भी इन्हीं का हाथ था। ये आपस में अपनी बोलियां बोलते थे, अपनी रीति रिवाज और विश्वास का निर्वाह करते थे और व्यापक संपर्क के लिए उस भाषा का प्रयोग करते थे जिसका साहित्यिक रूप ऋग्वेद में मिलता है। इसका ही परिणाम है कि जिस कुर्गान क्षेत्र में आर्य भाषियों की सुरक्षित बस्तियों की पहचान की गई थी उसी में द्रविड़ और मुंडारी बोलियों के प्रचलन का प्रमाण मिला। जिस लघु एशिया में आर्यभाषा बोलने वाले अभिजात वर्ग की पहचान की गई उसी के अश्वचालन पर पुस्तक लिखने वाला किक्कुली था जो मुंडारी है। पहली नजर में हमारा ध्यान केवल संस्कृत भाषा और ऋग्वेद के देवताओं की ओर गया, जबकि जमीनी स्तर पर उर्वरता की पूजा करने वाले भी अपनी भाषा, अपने देवी देवताओं और विश्वासों के साथ उपस्थित थे। यही कारण है की यूरोप की भाषाओं में द्रविड़ और मुंडारी के शब्दों की ओर दृष्टि जाने पर विद्वानों की समझ में नहीं आया कि वे उन भाषाओं में कैसे पहुंचे। इस समस्या के समाधान का कभी प्रयत्न नहीं किया गया। मातृदेवियां और शिव आज भी पिछड़ी जनजातियों के विश्वास का हिस्सा हों, या हड़प्पा के नागर संदर्भ में उन के प्रमाण मिलें. अथवा भारत से लेकर इटली तक मातृ देवो की उपासना देखने में आए, इसे समझने में विद्वानों ने चूक की है, अतः सभ्यताविमर्श को सही संदर्भ में रख नहीं पाए हैं। यूरोपीय विद्वानों की अपनी विवशता थी, भारतीय विद्वान यूरोपीय पांडित्य से निर्देशित थे। *क्रांति करने वाले तात्कालिक सफलता में विश्वास करते हैं। उसके लिए गर्हित तरीके अपनाने के लिए तैयार रहते हैं। गर्हित तरीके यदि इच्छित परिणाम लाएं तो उन पर गर्व भी करते हैं। बंदूक की नली से निकलने वाली क्रांति की तरह। बंदूक की नली से निकलने वाली क्रांति इंसान की जबान से टपकती राल तक का सामना नहीं कर पाती, इसे आधुनिक जगत के इतिहास से परिचित लोग जानते हैं, भले वे इन दोनों के बीच के रिश्ते को न पहचानते हों। *अंतःप्रकृति या चेतना का, महाप्रकृति - भौतिक जगत या पंचमहाभूतों के प्रपंच से, अविभाज्य संबंध है। एक में आया अंतर दूसरे को भी प्रभावित करता है। यह भारतीय चिंताधारा की लोकविदित मान्यता है, इसे ‘जैसा अन्न वैसा मन’ मुहावरे में भी देखा जा सकता है, और माया-ब्रह्म के द्वेताद्वैत में भी। पश्चिम को इसका पता उसके ‘विज्ञान-युग’ में भी बहुत बाद में मिल पाया इसलिए उसकी चिंताधारा में इसे जगह न मिल पाई। मुहम्मद साहब और उनसे पहले के लोगों से क्या शिकायत जब कि अपनी स्थापनाओं को वैज्ञानिक बनाने के लिए सतर्क मार्क्स के लेखन में यह कमी रह ही गई जिसे सुधारने की कोशिश करने की जगह विज्ञान को ही फरेब सिद्ध करना आरंभ कर दिया गया। इसका परिणाम? अंतःप्रकृति महाप्रकृति पर भारी पड़ी। लोग कहते हैं काउ ब्वाएज जीन्स की चाहत ने क्रांति को क्रांति के लिफाफे में बदल दिया।।...


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भारत/महाराष्ट्र/नागपुर।
हर दिन पावन 1 अप्रैल/जन्म-दिवस संघ संस्थापक डा. हेडगेवार विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आज कौन नहीं जानता ? भारत के कोने-कोने में इसकी शाखाएँ हैं। विश्व में जिस देश में भी हिन्दू रहते हैं, वहाँ किसी न किसी रूप में संघ का काम है। संघ के निर्माता डा. केशवराव हेडगेवार का जन्म एक अपै्रल, 1889 (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, वि. सम्वत् 1946) को नागपुर में हुआ था। इनके पिता श्री बलिराम हेडगेवार तथा माता श्रीमती रेवतीवाई थीं। केशव जन्मजात देशभक्त थे। बचपन से ही उन्हें नगर में घूमते हुए अंग्रेज सैनिक, सीताबर्डी के किले पर फहराता अंग्रेजों का झण्डा यूनियन जैक तथा विद्यालय में गाया जाने वाला गीत ‘गाॅड सेव दि किंग’ बहुत बुरा लगता था। उन्होंने एक बार सुरंग खोदकर उस झंडे को उतारने की योजना भी बनाई; पर बालपन की यह योजना सफल नहीं हो पाई। वे सोचते थे कि इतने बड़े देश पर पहले मुगलों ने और फिर सात समुन्दर पार से आये अंग्रेजों ने अधिकार कैसे कर लिया ? वे अपने अध्यापकों और अन्य बड़े लोगों से बार-बार यह प्रश्न पूछा करते थे। बहुत दिनों बाद उनकी समझ में यह आया कि भारत के रहने वाले हिन्दू असंगठित हैं। वे जाति, प्रान्त, भाषा, वर्ग, वर्ण आदि के नाम पर तो एकत्र हो जाते हैं; पर हिन्दू के नाम पर नहीं। भारत के राजाओं और जमीदारों में अपने वंश तथा राज्य का दुराभिमान तो है; पर देश का अभिमान नहीं। इसी कारण विदेशी आकर भारत को लूटते रहे और हम देखते रहे। यह सब सोचकर केशवराव ने स्वयं इस दिशा में कुछ काम करने का विचार किया। उन दिनों देश की आजादी के लिए सब लोग संघर्षरत थे। स्वाधीनता के प्रेमी केशवराव भी उसमें कूद पड़े। उन्होंने कोलकाता में मैडिकल की पढ़ाई करते समय क्रान्तिकारियों के साथ और वहाँ से नागपुर लौटकर कांग्रेस के साथ काम किया। इसके बाद भी उनके मन को शान्ति नहीं मिली। सब विषयों पर खूब चिन्तन और मनन कर उन्होंने नागपुर में 1925 की विजयादशमी पर हिन्दुओं को संगठित करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। गृहस्थी के बन्धन में न पड़ते हुए उन्होंने पूरा समय इस हेतु ही समर्पित कर दिया। यद्यपि स्वाधीनता आंदोलन में उनकी सक्रियता बनी रही तथा 1930 में जंगल सत्याग्रह में भाग लेकर वे एक वर्ष अकोला जेल में रहे। उन दिनों प्रायः सभी संगठन धरने, प्रदर्शन, जुलूस, वार्षिकोत्सव जैसे कार्यक्रम करते थे; पर डा. हेडगेवार ने दैनिक शाखा नामक नई पद्धति का आविष्कार किया। शाखा में स्वयंसेवक प्रतिदिन एक घंटे के लिए एकत्र होते हैं। वे अपनी शारीरिक स्थिति के अनुसार कुछ खेलकूद और व्यायाम करते हैं। फिर देशभक्ति के गीत गाकर महापुरुषों की कथाएं सुनते और सुनाते हैं। अन्त में भारतमाता की प्रार्थना के साथ उस दिन की शाखा समाप्त होती है। प्रारम्भ में लोगों ने इस शाखा पद्धति की हँसी उड़ायी; पर डा. हेडगेवार निर्विकार भाव से अपने काम में लगे रहे। उन्होंने बड़ों की बजाय छोटे बच्चों में काम प्रारम्भ किया। धीरे-धीरे शाखाओं का विस्तार पहले महाराष्ट्र और फिर पूरे भारत में हो गया। अब डा. जी ने पूरे देश में प्रवास प्रारम्भ कर दिया। हर स्थान पर देशभक्त नागरिक और उत्साही युवक संघ से जुड़ने लगे। डा. हेडगेवार अथक परिश्रम करते थे। इसका दुष्प्रभाव उनके शरीर पर दिखायी देने लगा। अतः उन्होंने सब कार्यकर्ताओं से परामर्श कर श्री माधवराव गोलवलकर (श्री गुरुजी) को नया सरसंघचालक नियुक्त किया। 20 जून को उनकी रीढ़ की हड्डी का आॅपरेशन (लम्बर पंक्चर) किया गया; पर उससे भी बात नहीं बनी और अगले दिन 21 जून, 1940 को उन्होंने देह त्याग दी।...


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