यूरोप/भारत।
संपादन के क्रम में ईसा के जन्म से 900 साल पहले वेटिकन से मिली लिंग की प्रतिमा (पिछली पोस्टें देखें) इस विषय में किसी तरह का संदेह नहीं रहने देती कि मातृदेवी और लिंग – सृष्टि के मूल- की उपासना का, पश्चिमी जगत में, प्रसार भारत से हुआ था। इसका इतिहास की व्याख्या में महत्व यह है कि हड़प्पा के जिस व्यापारिक तंत्र के माध्यम से संस्कृत भाषा, देव समाज, और ज्ञानविज्ञान का भारोपीय क्षेत्र में प्रसार हुआ था उसमें दो स्तरो के लोग सम्मिलित थे। एक व्यापारी वर्ग और दूसरा उसकी सेवा में लगे हुए लोग जो परिवहन पशुपालन, नौचालन और मालवहन का काम करते थे, घरेलू स्तर पर औद्योगिक उत्पादन में भी इन्हीं का हाथ था। ये आपस में अपनी बोलियां बोलते थे, अपनी रीति रिवाज और विश्वास का निर्वाह करते थे और व्यापक संपर्क के लिए उस भाषा का प्रयोग करते थे जिसका साहित्यिक रूप ऋग्वेद में मिलता है। इसका ही परिणाम है कि जिस कुर्गान क्षेत्र में आर्य भाषियों की सुरक्षित बस्तियों की पहचान की गई थी उसी में द्रविड़ और मुंडारी बोलियों के प्रचलन का प्रमाण मिला। जिस लघु एशिया में आर्यभाषा बोलने वाले अभिजात वर्ग की पहचान की गई उसी के अश्वचालन पर पुस्तक लिखने वाला किक्कुली था जो मुंडारी है। पहली नजर में हमारा ध्यान केवल संस्कृत भाषा और ऋग्वेद के देवताओं की ओर गया, जबकि जमीनी स्तर पर उर्वरता की पूजा करने वाले भी अपनी भाषा, अपने देवी देवताओं और विश्वासों के साथ उपस्थित थे। यही कारण है की यूरोप की भाषाओं में द्रविड़ और मुंडारी के शब्दों की ओर दृष्टि जाने पर विद्वानों की समझ में नहीं आया कि वे उन भाषाओं में कैसे पहुंचे। इस समस्या के समाधान का कभी प्रयत्न नहीं किया गया। मातृदेवियां और शिव आज भी पिछड़ी जनजातियों के विश्वास का हिस्सा हों, या हड़प्पा के नागर संदर्भ में उन के प्रमाण मिलें. अथवा भारत से लेकर इटली तक मातृ देवो की उपासना देखने में आए, इसे समझने में विद्वानों ने चूक की है, अतः सभ्यताविमर्श को सही संदर्भ में रख नहीं पाए हैं। यूरोपीय विद्वानों की अपनी विवशता थी, भारतीय विद्वान यूरोपीय पांडित्य से निर्देशित थे। *क्रांति करने वाले तात्कालिक सफलता में विश्वास करते हैं। उसके लिए गर्हित तरीके अपनाने के लिए तैयार रहते हैं। गर्हित तरीके यदि इच्छित परिणाम लाएं तो उन पर गर्व भी करते हैं। बंदूक की नली से निकलने वाली क्रांति की तरह। बंदूक की नली से निकलने वाली क्रांति इंसान की जबान से टपकती राल तक का सामना नहीं कर पाती, इसे आधुनिक जगत के इतिहास से परिचित लोग जानते हैं, भले वे इन दोनों के बीच के रिश्ते को न पहचानते हों। *अंतःप्रकृति या चेतना का, महाप्रकृति - भौतिक जगत या पंचमहाभूतों के प्रपंच से, अविभाज्य संबंध है। एक में आया अंतर दूसरे को भी प्रभावित करता है। यह भारतीय चिंताधारा की लोकविदित मान्यता है, इसे ‘जैसा अन्न वैसा मन’ मुहावरे में भी देखा जा सकता है, और माया-ब्रह्म के द्वेताद्वैत में भी। पश्चिम को इसका पता उसके ‘विज्ञान-युग’ में भी बहुत बाद में मिल पाया इसलिए उसकी चिंताधारा में इसे जगह न मिल पाई। मुहम्मद साहब और उनसे पहले के लोगों से क्या शिकायत जब कि अपनी स्थापनाओं को वैज्ञानिक बनाने के लिए सतर्क मार्क्स के लेखन में यह कमी रह ही गई जिसे सुधारने की कोशिश करने की जगह विज्ञान को ही फरेब सिद्ध करना आरंभ कर दिया गया। इसका परिणाम? अंतःप्रकृति महाप्रकृति पर भारी पड़ी। लोग कहते हैं काउ ब्वाएज जीन्स की चाहत ने क्रांति को क्रांति के लिफाफे में बदल दिया।।...


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भारत/महाराष्ट्र/नागपुर।
हर दिन पावन 1 अप्रैल/जन्म-दिवस संघ संस्थापक डा. हेडगेवार विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आज कौन नहीं जानता ? भारत के कोने-कोने में इसकी शाखाएँ हैं। विश्व में जिस देश में भी हिन्दू रहते हैं, वहाँ किसी न किसी रूप में संघ का काम है। संघ के निर्माता डा. केशवराव हेडगेवार का जन्म एक अपै्रल, 1889 (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, वि. सम्वत् 1946) को नागपुर में हुआ था। इनके पिता श्री बलिराम हेडगेवार तथा माता श्रीमती रेवतीवाई थीं। केशव जन्मजात देशभक्त थे। बचपन से ही उन्हें नगर में घूमते हुए अंग्रेज सैनिक, सीताबर्डी के किले पर फहराता अंग्रेजों का झण्डा यूनियन जैक तथा विद्यालय में गाया जाने वाला गीत ‘गाॅड सेव दि किंग’ बहुत बुरा लगता था। उन्होंने एक बार सुरंग खोदकर उस झंडे को उतारने की योजना भी बनाई; पर बालपन की यह योजना सफल नहीं हो पाई। वे सोचते थे कि इतने बड़े देश पर पहले मुगलों ने और फिर सात समुन्दर पार से आये अंग्रेजों ने अधिकार कैसे कर लिया ? वे अपने अध्यापकों और अन्य बड़े लोगों से बार-बार यह प्रश्न पूछा करते थे। बहुत दिनों बाद उनकी समझ में यह आया कि भारत के रहने वाले हिन्दू असंगठित हैं। वे जाति, प्रान्त, भाषा, वर्ग, वर्ण आदि के नाम पर तो एकत्र हो जाते हैं; पर हिन्दू के नाम पर नहीं। भारत के राजाओं और जमीदारों में अपने वंश तथा राज्य का दुराभिमान तो है; पर देश का अभिमान नहीं। इसी कारण विदेशी आकर भारत को लूटते रहे और हम देखते रहे। यह सब सोचकर केशवराव ने स्वयं इस दिशा में कुछ काम करने का विचार किया। उन दिनों देश की आजादी के लिए सब लोग संघर्षरत थे। स्वाधीनता के प्रेमी केशवराव भी उसमें कूद पड़े। उन्होंने कोलकाता में मैडिकल की पढ़ाई करते समय क्रान्तिकारियों के साथ और वहाँ से नागपुर लौटकर कांग्रेस के साथ काम किया। इसके बाद भी उनके मन को शान्ति नहीं मिली। सब विषयों पर खूब चिन्तन और मनन कर उन्होंने नागपुर में 1925 की विजयादशमी पर हिन्दुओं को संगठित करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। गृहस्थी के बन्धन में न पड़ते हुए उन्होंने पूरा समय इस हेतु ही समर्पित कर दिया। यद्यपि स्वाधीनता आंदोलन में उनकी सक्रियता बनी रही तथा 1930 में जंगल सत्याग्रह में भाग लेकर वे एक वर्ष अकोला जेल में रहे। उन दिनों प्रायः सभी संगठन धरने, प्रदर्शन, जुलूस, वार्षिकोत्सव जैसे कार्यक्रम करते थे; पर डा. हेडगेवार ने दैनिक शाखा नामक नई पद्धति का आविष्कार किया। शाखा में स्वयंसेवक प्रतिदिन एक घंटे के लिए एकत्र होते हैं। वे अपनी शारीरिक स्थिति के अनुसार कुछ खेलकूद और व्यायाम करते हैं। फिर देशभक्ति के गीत गाकर महापुरुषों की कथाएं सुनते और सुनाते हैं। अन्त में भारतमाता की प्रार्थना के साथ उस दिन की शाखा समाप्त होती है। प्रारम्भ में लोगों ने इस शाखा पद्धति की हँसी उड़ायी; पर डा. हेडगेवार निर्विकार भाव से अपने काम में लगे रहे। उन्होंने बड़ों की बजाय छोटे बच्चों में काम प्रारम्भ किया। धीरे-धीरे शाखाओं का विस्तार पहले महाराष्ट्र और फिर पूरे भारत में हो गया। अब डा. जी ने पूरे देश में प्रवास प्रारम्भ कर दिया। हर स्थान पर देशभक्त नागरिक और उत्साही युवक संघ से जुड़ने लगे। डा. हेडगेवार अथक परिश्रम करते थे। इसका दुष्प्रभाव उनके शरीर पर दिखायी देने लगा। अतः उन्होंने सब कार्यकर्ताओं से परामर्श कर श्री माधवराव गोलवलकर (श्री गुरुजी) को नया सरसंघचालक नियुक्त किया। 20 जून को उनकी रीढ़ की हड्डी का आॅपरेशन (लम्बर पंक्चर) किया गया; पर उससे भी बात नहीं बनी और अगले दिन 21 जून, 1940 को उन्होंने देह त्याग दी।...


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जम्मू।
जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों पर अब तक के सबसे बड़े फिदायीन हमले में गुरुवार को सीआरपीएफ के 30 जवान शहीद हो गए। 20 अन्य के घायल होने की सूचना है। घटना जम्मू-श्रीनगर नेशनल हाईवे पर दोपहर बाद सवा तीन बजे की है। फिदायीन हमलावर ने विस्फोटक भरी कार को काफिले की बस से टकरा दिया, जिससे विस्फोट में बस के परखच्चे उड़ गए। चारो ओर बस के टुकड़े तथा मलबा पड़ा नजर आ रहा था। आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद ने हमले की जिम्मेदारी ली है। जानकारी के अनुसार सीआरपीएफ का 78 वाहनों का काफिला 2500 जवानों को लेकर जम्मू से श्रीनगर आ रहा था। इनमें ज्यादातर अपनी छुट्टी बिताकर ड्यूटी ज्वाइन करने जा रहे थे। जम्मू-श्रीनगर हाईवे पर पुलवामा जिले के लेथपोरा में काफिले को निशाना बनाया गया। पुलिस के अनुसार आत्मघाती वाहन को चला रहे मानव बम की शिनाख्त कर ली गई है। वह पुलवामा जिले के काकापोर का आदिल अहमद था, जो वर्ष 2018 में आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद में शामिल हुआ था। ...


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पाकिस्तान/ पश्तूनिस्तान/बलूचिस्तान।
पाकिस्तान में तैयार हो रहा है एक और बांग्लादेश, बलूचों के बाद पश्तूनों ने खड़ा किया आज़ादी का आंदोलन .... . पाकिस्तान में इतिहास फिर से खुद को दोहरा रहा है। . 1971 में शेख मुज़ीबुर्रहमान की रहनुमाई में बांग्लादेश पाकिस्तान से टूटकर एक अलग आजाद मुल्क बन गया था .... अब पाकिस्तानी सत्ता के खिलाफ एक और वैसा ही हालात तैयार हो चुका है .... बस नाम बदला है ... बंगालियों की जगह पश्तून खड़े हैं .... मुक्तिबाहिनी की जगह "पीटीएम" यानि "पश्तून तहफुज़ मूवमेंट" और नेता है "मंजूर पश्तीन" ..... . कौन हैं पश्तून? . पश्तून, अफगान और पठानों की कौम है, जो मूलत: पश्तो भाषा बोलते हैं और पाकिस्तान के नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर इलाके से लेकर बलूचिस्तान और साउथ अफगानिस्तान में फैले हुए हैं। 2008 के आंकड़ों के मुताबिक पाकिस्तान में करीब 15.42 फीसदी पश्तून रहते हैं, जोकि करीब 3 करोड़ के आसपास हैं। जबकि अफगानिस्तान में पश्तून की जनसंख्या 1.4 करोड़ के आसपास है। . “ये जो दहशतगर्दी है..इसके पीछे वर्दी है” “दा संगा आजादी दा...” . पाकिस्तान के हरेक इलाके, हर शहर में ये नारे गूंज रहे हैं। 5 फरवरी को पीटीएम यानि पश्तून तहफुज़ मूवमेंट ने पाकिस्तान के 24 शहरों में लाखों की संख्या में प्रदर्शन किया है। यहां तक कि पीटीएम ने जर्मनी, जापान, स्वीडन, अमेरिका और ब्रिटेन समेत दर्जनों देशों में पाकिस्तान की सरकार धरने दिये गये। लेकिन आर्मी के आदेश पर पूरे पाकिस्तानी मीडिया में इन खबरों में ब्लैक आउट किया गया है। यहां तक कि डिज़िटल मीडिया में भी इन प्रदर्शनों पर पाबंदी है। लेकिन करीब 1 साल पहले शुरू हुआ ये आंदोलन पूरी दुनिया के पश्तूनों और अफगानों के बीच फैल चुका है। . क्यों और कैसे शुरू हुआ ये आंदोलन? . 1947 में आजादी के बाद से ही पाकिस्तान की सत्ता में पंजाबी और लॉबी का कब्ज़ा रहा है। आर्मी हो या राजनीतिक ताकतें, या फिर बड़ी बिजनेस इंडस्ट्रीज़ हर जगह पंजाबी लॉबी का कब्जा है। इसके बाद उर्दू स्पीकिंग लॉबी भी पाकिस्तान में धीरे-धीरे मजबूत होते गये। लेकिन पाकिस्तान के ऑरीजिनल तबके पश्तूनों को हमेशा दोयम दर्जें का समझा गया। नौकरियों, राजनीति, आर्मी में पश्तूनों की भागीदारी न के बराबर है। जिसके चलते सालों साल से एक दर्द और गुस्से का गुबार जमा होता रहा। जो फूटा 2014 में। जब पाकिस्तानी आर्मी ने अफगानिस्तान बॉर्डर से सटे इलाकों में ऑपरेशन ज़र्ब-ए-अज़्ब शुरू किया। . पाकिस्तान ने दावा किया वो वो अपनी सीमा में बसे तालिबान को खत्म करना चाहती है। इस ऑपरेशन की जद में तहरीके-तालिबान-पाकिस्तान, लश्कर-ए-झांगवी और हक्कानी नेटवर्क के सफाये की बात कही गयी। लेकिन हुआ ये कि पाकिस्तानी आर्मी ने इन इलाकों में बसे करीब 50 लाख पश्तूनों को उज़ाड़ दिया। आतंकवाद के सफाये के बहाने हज़ारों पश्तूनों का कत्लेआम हुआ। बस्तिय़ां तबाह कर दी गयी। पश्तूनों पर आर्मी के जुल्मों के खिलाफ आंदोलन यहीं से शुरू हुआ। . 2014 में डेरा इस्माइल खां में गोमल यूनिवर्सिटी के कुछ स्टूडेंट्स ने एक तहरीक शुरू की। महसूद तहफुज मूवमेंट जिसका शुरूआती मकसद था, महसूद इलाके में पाकिस्तान आर्मी द्वारा बिछायी गयी लैंडमाइंस को हटाने का। सालों तक ये स्टूडेंट्स पश्तूनों के लिए आंदोलन करते रहे। जनवरी 2018 में इनमें से एक स्टूडेंट नकीबुल्लाह महसूद को आर्मी की शह पर पुलिस ने एक फर्जी एनकाउंटर में मार डाला। दावा किया गया कि नकीबुल्ला के संबंध तालिबान से था। लेकिन नकीबुल्ला के हत्या के बाद पश्तूनों के गुस्से का ज्वालामुखी फूट पड़ा और देश भर में पाकिस्तान सरकार और आर्मी के खिलाफ आंदोलन शुरू हो गये। महसूद तहफुज मूवमेंट का नाम बदलकर पश्तून तहफुज मूवमेंट रख दिया गया। . इसके बाद 10 फरवरी को तत्कालीन पीएम शाहिद अब्बासी के कहने पर एडवाइज़र आमिर मुकाम ने आंदोलनकारी पश्तूनों को नकीबुल्लाह की हत्या के लिए जिम्मेदार आईएसआई और पुलिस अफसरों पर कार्रवाई का भरोसा दिया। आंदोलन कुछ दिनों के लिए ठंडा पड़ा, लेकिन ठीक वायदे के उलट आईएसआई और आर्मी ने उन आंदोलनकारियों को उठाना और एनकाउंटर करना शुरू कर दिया। जिन्होंने पीटीएम आंदोलन के खास कार्यकर्ता थे। इनमें पीटीएम के नेता मंजूर पश्तीन भी थे। लेकिन सोशल मीडिया पर खड़े आंदोलन के चलते पाकिस्तानी आर्मी ने मंजूर पश्तीन को छोड़ दिया गया। . नकीबुल्लाह के लिए न्याय से लेकर पश्तूनों की आजादी तक . 2018 में पाकिस्तानी आर्मी और आईएसआई ने आंदोलन को दबाने के लिए दर्जनों पीटीएम कार्यकर्ताओं को फर्जी एनकाउंटर में मार डाला। सैंकड़ों लापता हो गये..धीरे-धीरे पश्तून तहफुज मूवमेंट की मांगें जिम्मेदार हत्यारें अफसरों से बढ़कर पश्तूनों के असली हकूक की मांग में तब्दील हो गयीं। हालात इस मोड़ पर आ चुके हैं कि पीटीएम लीडर मंजूर पश्तीन ने पाकिस्तानी सरकार में विश्वास न होने की घोषणा कर दी है और अब वो सीधे यूनाइटेड नेशनंस से पश्तूनों के हक दिलाने की मांग कर रहे हैं। अंदरखाने में पश्तूनों में अलग स्टेट की मांग उठने लगी है। जिसको दबाने की कोशिश में पश्तून आंदोलनकारियों पर दिन-ब-दिन अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं। . जिस कड़ी में आईएसआई ने एक और पीटीएम लीडर अरमान लोनी की कस्टडी में हत्या कर दी। जिसके बाद पाकिस्तान के 24 शहरों समेत दुनियाभर में लाखों पश्तूनों और अफगानों ने पाकिस्तान के खिलाफ प्रदर्शन किया। . पाकिस्तान तेरे टुकड़े होंगे ... इंशाअल्लाह .. इंशाअल्लाह ......


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भारत/ऑक्सफोर्ड ।
साढ़े चार साल ऑक्सफ़ोर्ड में प्रवास के दौरान अंग्रेजों से साथ रहते हुए मैंने बहुत अनुभव किये। मैं वहां रहा तो जरूर किन्तु एक पल भी नही भूल पाया कि साढ़े तीन सौ सालों तक इन्ही अंग्रेजों के पूर्वजो ने भारत पर बेतहाशा जुल्म ढाए थे। मैं ऑक्सफ़ोर्ड का विद्यार्थी था इसलिए मैं भी विश्वविद्यालय के अनगिनत उत्सवों का हिस्सा बना किन्तु एक, सिर्फ एक उत्सव ऐसा था जिसमे सम्मिलित होने के लिए मैं उस वक़्त योग्य नही था। वह था यूनिवर्सिटी का degree function अर्थात कॉन्वोकेशन। शायद वर्ष में दो बार होता था यह उत्सव। मैं अक्सर University के प्रसिद्ध Sheldonian Theatre के बाहर से गुजरते वक़्त देखा करता था। लंबे चौंगे जैसी यूनिफार्म पहने हुये विद्यार्थी। हाथों में काली, चकोर कैप लिए। और एक हाथ मे रोल्ड की हुई ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की डिग्री। एक जीवनभर की दौलत।। हँसते खिलखिलाते मुस्कुराते ज्यादातर अपने प्राउड पेरेंट्स के साथ फिर आया वर्ष दिसंबर 2007 ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में मेरी भी डॉक्टरेट पूरी हो चुकी थी। मेरे जीवन का एक बड़ा सपना पूरा हो गया था। और अब मैं भी ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के उस महान उत्सव का हिस्सा बनने वाला था जिसको मैंने अब तक सिर्फ बाहर से देखा था। यूनिवर्सिटी से पत्र भी आ चुका था। मुझे अगले वर्ष जुलाई 2008 में होने वाले कॉन्वोकेशन में सम्मिलित होकर डॉक्टरेट की उपाधि लेने के लिए आमंत्रित किया गया था। इसके कुछ माह पहले उस वक़्त भारत के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी को भी ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी ने एक आनरेरी डॉक्टरेट दी थी और उस फंक्शन में मुझे भी बुलाया गया था। डॉक्टर मनमोहन सिंह जी को ऑनरेरी डिग्री देते समय जो humiliation परंपरा के नाम पर अंग्रेजो ने किया, उसका मैं प्रत्यक्ष गवाह था। वह अंग्रेजो के जमाने के किसी दरबार से कम नही था। जहां हाल के बीचों बीच ऊंचे स्थान पर सिंहासन नुमा कुर्सी पर लार्ड पैटन बैठे हुए थे। उनके आजु बाजू पद के हिसाब से ऊँचाई वाली कुर्सियों पर अन्य पदाधिकारी अंग्रेज बैठे थे। दरबारियों की तरह हमें साइड की कुर्सियों पर बैठाया गया था। ये कुर्सियां हाइट में सबसे नीचे थी किन्तु जमीन से थोड़ा ऊपर। हाल के बीचों बीच जमीन पर लाल कालीन बिछा था जो हाल के दरवाजे तक जाता था। इसी दरवाजे से भारत के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी का प्रवेश होने वाला था। उनको आनरेरी डॉक्टरेट जो दी जा रही थी। कुछ पलों के मौन के बाद टनाटन की घंटियां बजी और दरवाजे पर मनमोहन सिंह जी दो लाल वर्दी वाले सिपाहियों के साथ प्रकट हुए जैसा इस वक़्त आप सोच रहे हैं मैंने भी ठीक वैसा ही सोचा था। कि शायद अब मनमोहन सिंह जी को सैनिक सम्मान के साथ हाल में लाया जाएगा, सम्मानित किया जाएगा। किन्तु यह क्या, मनमोहन सिंह जी तो दरवाजे पर ही रुक गए। और उनके आजू बाजू में खड़े दोनो लाल वर्दी धारी सैनिक, बिल्कुल वैसे ही जैसे आज मणिकर्णिका में देखे आगे बढ़े। हाल के बीचबीच आकर वो सैनिक रुक गए। और लार्ड पैटन को लगभग झुक कर salute इत्यादि करने के बाद लैटिन में कुछ बोले। उनके बोलने के बाद लार्ड पैटन ने अपना हाथ ऊपर उठाया जैसे कह रहे हों इजाजत है। फिर वो दोनों सैनिक सैल्यूट ठोक कर पीछे मुड़े, दरवाजे तक गए। तब तक मनमोहन सिंह जी दरवाजे पर अकेले ही खड़े रहे। मुझे समझ नही आ रहा था कि वो आनरेरी डिग्री लेने आये थे कि उनके दरवाजे पर भीख लेने!! दोनो सैनिक दरवाजे पर पहुच चुके थे। अब उन्होंने मनमोहन सिंह जी को भी कुछ जोर से चिल्लाकर कहा और फिर आजू बाजू से घेरकर चलते हुए उनको अंदर लाये। ठीक वैसे ही जैसे किसी राजा के दरबार में अपराधी को लाया जाता होगा हाल में एक बार फिर बीचो बीच पहुंच कर मनमोहन सिंह जी को रोका गया। फिर लैटिन में कुछ डायलॉग बाजी हुई। लार्ड पैटन ने एक बार फिर हाथ उठाया, मनमोहन सिंह जी ने सिर झुकाया और मनमोहन सिंह जी को वहीं बीचोबीच खड़े खड़े आनरेरी डॉक्टरेट मिल गयी!! इस सारे नाटक में भारत के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी ने क्या फील किया होगा, मुझे नही पता किन्तु मैं लज्जा से गड़ा जा रहा था!! मेरे प्यारे देश भारत के 120 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि, मेरे प्रतिनिधि, भारत के प्रधानमंत्री को वहां उस हॉल में सम्मानित किया जा रहा था या अंग्रेजी परंपरा के नाम पर जलील किया जा रहा था, मुझे समझ नही आया। खैर, डिग्री समारोह हो गया। श्री मनमोहन सिंह जी को मानद उपाधि मिल गयी। किन्तु इस घटना ने मेरे मन मष्तिष्क पर एक घाव सा छोड़ दिया। और एक सवाल भी। क्या मुझे भी इतना ही जलील होना पड़ेगा ऑक्सफ़ोर्ड से डिग्री लेते समय!!! सिर झुकाना पड़ेगा?? मैंने तो अपनी डॉक्टरेट भीख में नही कमाई थी। दिन रात मेहनत की थी, हड्डियां गलाई थी इसके लिए। हफ्ते दर हफ्ते अंग्रेजों द्वारा ही निर्धारित किये गए मानकों को, उनकी परीक्षाओं को किसी की दया नही, अपनी योग्यता के बल पर उत्तीर्ण किया था। और इस प्रकार वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद, ऑक्सफ़ोर्ड की डिग्री पाने का अधिकारी बना था। तो क्या अंग्रेजी परंपरा के नाम पर इसी प्रकार जलील होना पड़ेगा मुझे भी डिग्री लेते समय?? इसी सवाल को लेकर मैं कुछ अनुभवी सहपाठियों के पास गया और उनसे पूछा कि क्या हमारे साथ भी ऐसा ही कुछ होगा। और सच्चाई जानकर मेरे दुख का ठिकाना न रहा। सच्चाई यही थी कि लैटिन में बोलकर उनके कुछ वफादार होने की हामी भरवाई जाएगी, सिर झुकवाया जाएगा और तब हमें ऑक्सफ़ोर्ड से डॉक्टरेट माना जायेगा।। इस प्रकार सिर झुकाना मंजूर नही था मुझे!! मैं यूनिवर्सिटी आफिस गया और वहां जाकर पूछा कि डिग्री लेने का कोई और ऑप्शन नही है क्या? मुझे अधिकारियों ने बताया कि अगर आप समारोह में नही आना चाहते तो आपको आपकी एब्सेंस में इन अब्सेंशिया डिग्री मिल जाएगी। पर ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के कॉन्वोकेशन में जाना तो किसी भी धरती पर पैदा हुए इंसान का सपना होता है, तुम समारोह में क्यो नही जाओगे। मैं उनको कैसे कहता कि हर आम इंसान की तरह यह सपना तो मेरा भी है। किंतु सिर को झुकाना और भीख की तरह अंग्रेजों से उपाधि लेना मंजूर नही मुझे!! मैने अधिकारियों को कुछ नही बताया। किंतु मन ही मन डिसाइड कर लिया, कि कट जाएगा ये सिर, किन्तु अंग्रेजों के सामने झुकेगा नही। और मैं यूनिवर्सिटी के कॉन्वोकेशन समारोह में नही गया।। 7 जुलाई 2008 को मुझे मेरी अनुपस्थिति में ऑक्सफ़ोर्ड ने डॉक्टरेट की उपाधि दी। और बाद में मेरी डिग्री by पोस्ट मेरे घर आ गयी। आज मणिकर्णिका देखी। सिर कट गया रानी का किन्तु अंग्रेजों के सामने झुका नही।। देख कर आंखों में आंसूं आ गए। कुछ बीता हुआ याद जो आ गया था!! 😪😪 मैं रहूं या ना रहूं, भारत ये रहना चाहिए 🚩🚩 जय हिंद 🚩🚩 डॉ सुनील वर्मा...


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