जम्मू।
जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों पर अब तक के सबसे बड़े फिदायीन हमले में गुरुवार को सीआरपीएफ के 30 जवान शहीद हो गए। 20 अन्य के घायल होने की सूचना है। घटना जम्मू-श्रीनगर नेशनल हाईवे पर दोपहर बाद सवा तीन बजे की है। फिदायीन हमलावर ने विस्फोटक भरी कार को काफिले की बस से टकरा दिया, जिससे विस्फोट में बस के परखच्चे उड़ गए। चारो ओर बस के टुकड़े तथा मलबा पड़ा नजर आ रहा था। आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद ने हमले की जिम्मेदारी ली है। जानकारी के अनुसार सीआरपीएफ का 78 वाहनों का काफिला 2500 जवानों को लेकर जम्मू से श्रीनगर आ रहा था। इनमें ज्यादातर अपनी छुट्टी बिताकर ड्यूटी ज्वाइन करने जा रहे थे। जम्मू-श्रीनगर हाईवे पर पुलवामा जिले के लेथपोरा में काफिले को निशाना बनाया गया। पुलिस के अनुसार आत्मघाती वाहन को चला रहे मानव बम की शिनाख्त कर ली गई है। वह पुलवामा जिले के काकापोर का आदिल अहमद था, जो वर्ष 2018 में आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद में शामिल हुआ था। ...


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पाकिस्तान/ पश्तूनिस्तान/बलूचिस्तान।
पाकिस्तान में तैयार हो रहा है एक और बांग्लादेश, बलूचों के बाद पश्तूनों ने खड़ा किया आज़ादी का आंदोलन .... . पाकिस्तान में इतिहास फिर से खुद को दोहरा रहा है। . 1971 में शेख मुज़ीबुर्रहमान की रहनुमाई में बांग्लादेश पाकिस्तान से टूटकर एक अलग आजाद मुल्क बन गया था .... अब पाकिस्तानी सत्ता के खिलाफ एक और वैसा ही हालात तैयार हो चुका है .... बस नाम बदला है ... बंगालियों की जगह पश्तून खड़े हैं .... मुक्तिबाहिनी की जगह "पीटीएम" यानि "पश्तून तहफुज़ मूवमेंट" और नेता है "मंजूर पश्तीन" ..... . कौन हैं पश्तून? . पश्तून, अफगान और पठानों की कौम है, जो मूलत: पश्तो भाषा बोलते हैं और पाकिस्तान के नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर इलाके से लेकर बलूचिस्तान और साउथ अफगानिस्तान में फैले हुए हैं। 2008 के आंकड़ों के मुताबिक पाकिस्तान में करीब 15.42 फीसदी पश्तून रहते हैं, जोकि करीब 3 करोड़ के आसपास हैं। जबकि अफगानिस्तान में पश्तून की जनसंख्या 1.4 करोड़ के आसपास है। . “ये जो दहशतगर्दी है..इसके पीछे वर्दी है” “दा संगा आजादी दा...” . पाकिस्तान के हरेक इलाके, हर शहर में ये नारे गूंज रहे हैं। 5 फरवरी को पीटीएम यानि पश्तून तहफुज़ मूवमेंट ने पाकिस्तान के 24 शहरों में लाखों की संख्या में प्रदर्शन किया है। यहां तक कि पीटीएम ने जर्मनी, जापान, स्वीडन, अमेरिका और ब्रिटेन समेत दर्जनों देशों में पाकिस्तान की सरकार धरने दिये गये। लेकिन आर्मी के आदेश पर पूरे पाकिस्तानी मीडिया में इन खबरों में ब्लैक आउट किया गया है। यहां तक कि डिज़िटल मीडिया में भी इन प्रदर्शनों पर पाबंदी है। लेकिन करीब 1 साल पहले शुरू हुआ ये आंदोलन पूरी दुनिया के पश्तूनों और अफगानों के बीच फैल चुका है। . क्यों और कैसे शुरू हुआ ये आंदोलन? . 1947 में आजादी के बाद से ही पाकिस्तान की सत्ता में पंजाबी और लॉबी का कब्ज़ा रहा है। आर्मी हो या राजनीतिक ताकतें, या फिर बड़ी बिजनेस इंडस्ट्रीज़ हर जगह पंजाबी लॉबी का कब्जा है। इसके बाद उर्दू स्पीकिंग लॉबी भी पाकिस्तान में धीरे-धीरे मजबूत होते गये। लेकिन पाकिस्तान के ऑरीजिनल तबके पश्तूनों को हमेशा दोयम दर्जें का समझा गया। नौकरियों, राजनीति, आर्मी में पश्तूनों की भागीदारी न के बराबर है। जिसके चलते सालों साल से एक दर्द और गुस्से का गुबार जमा होता रहा। जो फूटा 2014 में। जब पाकिस्तानी आर्मी ने अफगानिस्तान बॉर्डर से सटे इलाकों में ऑपरेशन ज़र्ब-ए-अज़्ब शुरू किया। . पाकिस्तान ने दावा किया वो वो अपनी सीमा में बसे तालिबान को खत्म करना चाहती है। इस ऑपरेशन की जद में तहरीके-तालिबान-पाकिस्तान, लश्कर-ए-झांगवी और हक्कानी नेटवर्क के सफाये की बात कही गयी। लेकिन हुआ ये कि पाकिस्तानी आर्मी ने इन इलाकों में बसे करीब 50 लाख पश्तूनों को उज़ाड़ दिया। आतंकवाद के सफाये के बहाने हज़ारों पश्तूनों का कत्लेआम हुआ। बस्तिय़ां तबाह कर दी गयी। पश्तूनों पर आर्मी के जुल्मों के खिलाफ आंदोलन यहीं से शुरू हुआ। . 2014 में डेरा इस्माइल खां में गोमल यूनिवर्सिटी के कुछ स्टूडेंट्स ने एक तहरीक शुरू की। महसूद तहफुज मूवमेंट जिसका शुरूआती मकसद था, महसूद इलाके में पाकिस्तान आर्मी द्वारा बिछायी गयी लैंडमाइंस को हटाने का। सालों तक ये स्टूडेंट्स पश्तूनों के लिए आंदोलन करते रहे। जनवरी 2018 में इनमें से एक स्टूडेंट नकीबुल्लाह महसूद को आर्मी की शह पर पुलिस ने एक फर्जी एनकाउंटर में मार डाला। दावा किया गया कि नकीबुल्ला के संबंध तालिबान से था। लेकिन नकीबुल्ला के हत्या के बाद पश्तूनों के गुस्से का ज्वालामुखी फूट पड़ा और देश भर में पाकिस्तान सरकार और आर्मी के खिलाफ आंदोलन शुरू हो गये। महसूद तहफुज मूवमेंट का नाम बदलकर पश्तून तहफुज मूवमेंट रख दिया गया। . इसके बाद 10 फरवरी को तत्कालीन पीएम शाहिद अब्बासी के कहने पर एडवाइज़र आमिर मुकाम ने आंदोलनकारी पश्तूनों को नकीबुल्लाह की हत्या के लिए जिम्मेदार आईएसआई और पुलिस अफसरों पर कार्रवाई का भरोसा दिया। आंदोलन कुछ दिनों के लिए ठंडा पड़ा, लेकिन ठीक वायदे के उलट आईएसआई और आर्मी ने उन आंदोलनकारियों को उठाना और एनकाउंटर करना शुरू कर दिया। जिन्होंने पीटीएम आंदोलन के खास कार्यकर्ता थे। इनमें पीटीएम के नेता मंजूर पश्तीन भी थे। लेकिन सोशल मीडिया पर खड़े आंदोलन के चलते पाकिस्तानी आर्मी ने मंजूर पश्तीन को छोड़ दिया गया। . नकीबुल्लाह के लिए न्याय से लेकर पश्तूनों की आजादी तक . 2018 में पाकिस्तानी आर्मी और आईएसआई ने आंदोलन को दबाने के लिए दर्जनों पीटीएम कार्यकर्ताओं को फर्जी एनकाउंटर में मार डाला। सैंकड़ों लापता हो गये..धीरे-धीरे पश्तून तहफुज मूवमेंट की मांगें जिम्मेदार हत्यारें अफसरों से बढ़कर पश्तूनों के असली हकूक की मांग में तब्दील हो गयीं। हालात इस मोड़ पर आ चुके हैं कि पीटीएम लीडर मंजूर पश्तीन ने पाकिस्तानी सरकार में विश्वास न होने की घोषणा कर दी है और अब वो सीधे यूनाइटेड नेशनंस से पश्तूनों के हक दिलाने की मांग कर रहे हैं। अंदरखाने में पश्तूनों में अलग स्टेट की मांग उठने लगी है। जिसको दबाने की कोशिश में पश्तून आंदोलनकारियों पर दिन-ब-दिन अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं। . जिस कड़ी में आईएसआई ने एक और पीटीएम लीडर अरमान लोनी की कस्टडी में हत्या कर दी। जिसके बाद पाकिस्तान के 24 शहरों समेत दुनियाभर में लाखों पश्तूनों और अफगानों ने पाकिस्तान के खिलाफ प्रदर्शन किया। . पाकिस्तान तेरे टुकड़े होंगे ... इंशाअल्लाह .. इंशाअल्लाह ......


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भारत/ऑक्सफोर्ड ।
साढ़े चार साल ऑक्सफ़ोर्ड में प्रवास के दौरान अंग्रेजों से साथ रहते हुए मैंने बहुत अनुभव किये। मैं वहां रहा तो जरूर किन्तु एक पल भी नही भूल पाया कि साढ़े तीन सौ सालों तक इन्ही अंग्रेजों के पूर्वजो ने भारत पर बेतहाशा जुल्म ढाए थे। मैं ऑक्सफ़ोर्ड का विद्यार्थी था इसलिए मैं भी विश्वविद्यालय के अनगिनत उत्सवों का हिस्सा बना किन्तु एक, सिर्फ एक उत्सव ऐसा था जिसमे सम्मिलित होने के लिए मैं उस वक़्त योग्य नही था। वह था यूनिवर्सिटी का degree function अर्थात कॉन्वोकेशन। शायद वर्ष में दो बार होता था यह उत्सव। मैं अक्सर University के प्रसिद्ध Sheldonian Theatre के बाहर से गुजरते वक़्त देखा करता था। लंबे चौंगे जैसी यूनिफार्म पहने हुये विद्यार्थी। हाथों में काली, चकोर कैप लिए। और एक हाथ मे रोल्ड की हुई ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की डिग्री। एक जीवनभर की दौलत।। हँसते खिलखिलाते मुस्कुराते ज्यादातर अपने प्राउड पेरेंट्स के साथ फिर आया वर्ष दिसंबर 2007 ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में मेरी भी डॉक्टरेट पूरी हो चुकी थी। मेरे जीवन का एक बड़ा सपना पूरा हो गया था। और अब मैं भी ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के उस महान उत्सव का हिस्सा बनने वाला था जिसको मैंने अब तक सिर्फ बाहर से देखा था। यूनिवर्सिटी से पत्र भी आ चुका था। मुझे अगले वर्ष जुलाई 2008 में होने वाले कॉन्वोकेशन में सम्मिलित होकर डॉक्टरेट की उपाधि लेने के लिए आमंत्रित किया गया था। इसके कुछ माह पहले उस वक़्त भारत के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी को भी ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी ने एक आनरेरी डॉक्टरेट दी थी और उस फंक्शन में मुझे भी बुलाया गया था। डॉक्टर मनमोहन सिंह जी को ऑनरेरी डिग्री देते समय जो humiliation परंपरा के नाम पर अंग्रेजो ने किया, उसका मैं प्रत्यक्ष गवाह था। वह अंग्रेजो के जमाने के किसी दरबार से कम नही था। जहां हाल के बीचों बीच ऊंचे स्थान पर सिंहासन नुमा कुर्सी पर लार्ड पैटन बैठे हुए थे। उनके आजु बाजू पद के हिसाब से ऊँचाई वाली कुर्सियों पर अन्य पदाधिकारी अंग्रेज बैठे थे। दरबारियों की तरह हमें साइड की कुर्सियों पर बैठाया गया था। ये कुर्सियां हाइट में सबसे नीचे थी किन्तु जमीन से थोड़ा ऊपर। हाल के बीचों बीच जमीन पर लाल कालीन बिछा था जो हाल के दरवाजे तक जाता था। इसी दरवाजे से भारत के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी का प्रवेश होने वाला था। उनको आनरेरी डॉक्टरेट जो दी जा रही थी। कुछ पलों के मौन के बाद टनाटन की घंटियां बजी और दरवाजे पर मनमोहन सिंह जी दो लाल वर्दी वाले सिपाहियों के साथ प्रकट हुए जैसा इस वक़्त आप सोच रहे हैं मैंने भी ठीक वैसा ही सोचा था। कि शायद अब मनमोहन सिंह जी को सैनिक सम्मान के साथ हाल में लाया जाएगा, सम्मानित किया जाएगा। किन्तु यह क्या, मनमोहन सिंह जी तो दरवाजे पर ही रुक गए। और उनके आजू बाजू में खड़े दोनो लाल वर्दी धारी सैनिक, बिल्कुल वैसे ही जैसे आज मणिकर्णिका में देखे आगे बढ़े। हाल के बीचबीच आकर वो सैनिक रुक गए। और लार्ड पैटन को लगभग झुक कर salute इत्यादि करने के बाद लैटिन में कुछ बोले। उनके बोलने के बाद लार्ड पैटन ने अपना हाथ ऊपर उठाया जैसे कह रहे हों इजाजत है। फिर वो दोनों सैनिक सैल्यूट ठोक कर पीछे मुड़े, दरवाजे तक गए। तब तक मनमोहन सिंह जी दरवाजे पर अकेले ही खड़े रहे। मुझे समझ नही आ रहा था कि वो आनरेरी डिग्री लेने आये थे कि उनके दरवाजे पर भीख लेने!! दोनो सैनिक दरवाजे पर पहुच चुके थे। अब उन्होंने मनमोहन सिंह जी को भी कुछ जोर से चिल्लाकर कहा और फिर आजू बाजू से घेरकर चलते हुए उनको अंदर लाये। ठीक वैसे ही जैसे किसी राजा के दरबार में अपराधी को लाया जाता होगा हाल में एक बार फिर बीचो बीच पहुंच कर मनमोहन सिंह जी को रोका गया। फिर लैटिन में कुछ डायलॉग बाजी हुई। लार्ड पैटन ने एक बार फिर हाथ उठाया, मनमोहन सिंह जी ने सिर झुकाया और मनमोहन सिंह जी को वहीं बीचोबीच खड़े खड़े आनरेरी डॉक्टरेट मिल गयी!! इस सारे नाटक में भारत के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी ने क्या फील किया होगा, मुझे नही पता किन्तु मैं लज्जा से गड़ा जा रहा था!! मेरे प्यारे देश भारत के 120 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि, मेरे प्रतिनिधि, भारत के प्रधानमंत्री को वहां उस हॉल में सम्मानित किया जा रहा था या अंग्रेजी परंपरा के नाम पर जलील किया जा रहा था, मुझे समझ नही आया। खैर, डिग्री समारोह हो गया। श्री मनमोहन सिंह जी को मानद उपाधि मिल गयी। किन्तु इस घटना ने मेरे मन मष्तिष्क पर एक घाव सा छोड़ दिया। और एक सवाल भी। क्या मुझे भी इतना ही जलील होना पड़ेगा ऑक्सफ़ोर्ड से डिग्री लेते समय!!! सिर झुकाना पड़ेगा?? मैंने तो अपनी डॉक्टरेट भीख में नही कमाई थी। दिन रात मेहनत की थी, हड्डियां गलाई थी इसके लिए। हफ्ते दर हफ्ते अंग्रेजों द्वारा ही निर्धारित किये गए मानकों को, उनकी परीक्षाओं को किसी की दया नही, अपनी योग्यता के बल पर उत्तीर्ण किया था। और इस प्रकार वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद, ऑक्सफ़ोर्ड की डिग्री पाने का अधिकारी बना था। तो क्या अंग्रेजी परंपरा के नाम पर इसी प्रकार जलील होना पड़ेगा मुझे भी डिग्री लेते समय?? इसी सवाल को लेकर मैं कुछ अनुभवी सहपाठियों के पास गया और उनसे पूछा कि क्या हमारे साथ भी ऐसा ही कुछ होगा। और सच्चाई जानकर मेरे दुख का ठिकाना न रहा। सच्चाई यही थी कि लैटिन में बोलकर उनके कुछ वफादार होने की हामी भरवाई जाएगी, सिर झुकवाया जाएगा और तब हमें ऑक्सफ़ोर्ड से डॉक्टरेट माना जायेगा।। इस प्रकार सिर झुकाना मंजूर नही था मुझे!! मैं यूनिवर्सिटी आफिस गया और वहां जाकर पूछा कि डिग्री लेने का कोई और ऑप्शन नही है क्या? मुझे अधिकारियों ने बताया कि अगर आप समारोह में नही आना चाहते तो आपको आपकी एब्सेंस में इन अब्सेंशिया डिग्री मिल जाएगी। पर ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के कॉन्वोकेशन में जाना तो किसी भी धरती पर पैदा हुए इंसान का सपना होता है, तुम समारोह में क्यो नही जाओगे। मैं उनको कैसे कहता कि हर आम इंसान की तरह यह सपना तो मेरा भी है। किंतु सिर को झुकाना और भीख की तरह अंग्रेजों से उपाधि लेना मंजूर नही मुझे!! मैने अधिकारियों को कुछ नही बताया। किंतु मन ही मन डिसाइड कर लिया, कि कट जाएगा ये सिर, किन्तु अंग्रेजों के सामने झुकेगा नही। और मैं यूनिवर्सिटी के कॉन्वोकेशन समारोह में नही गया।। 7 जुलाई 2008 को मुझे मेरी अनुपस्थिति में ऑक्सफ़ोर्ड ने डॉक्टरेट की उपाधि दी। और बाद में मेरी डिग्री by पोस्ट मेरे घर आ गयी। आज मणिकर्णिका देखी। सिर कट गया रानी का किन्तु अंग्रेजों के सामने झुका नही।। देख कर आंखों में आंसूं आ गए। कुछ बीता हुआ याद जो आ गया था!! 😪😪 मैं रहूं या ना रहूं, भारत ये रहना चाहिए 🚩🚩 जय हिंद 🚩🚩 डॉ सुनील वर्मा...


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चीन/भारत।
#विषैलावामपंथ #देंगसियाओपिंग भाग 2 माओ की मृत्यु के समय देंग एक बार फिर निर्वासन में थे. उन्हें माओ के अंतिम संस्कार के समारोहों में शामिल होने की भी अनुमति नहीं थी. माओ के उत्तराधिकारी थे माओ के विश्वासपात्र ह्वा गुऑफेंग. गुऑफेंग को खुद माओ ने चुना था और यह उनके लिए सबसे बड़ा पॉवर बेस था, पर असल सत्ता के केंद्र वे नहीं थे. एक तरफ थे पार्टी के पुराने दिग्गज जिनके बीच देंग का बहुत सम्मान था. और दूसरी ओर थी मैडम माओ की चौकड़ी जिसे गैंग ऑफ फोर कहा गया. गैंग ऑफ फोर को कोई पसंद नहीं करता था. गुऑफेंग भी नहीं. और उधर उनकी सत्ता पर कब्जा करने की योजना की खबरें हवा में थीं. तो गैंग ऑफ फोर को गिरफ्तार कर लिया गया. उधर पार्टी के पुराने लोगों ने देंग को धीरे धीरे पार्टी में पुनःस्थापित किया. माओ के जाने के बाद देंग निर्विवाद रूप से पार्टी के अंदर नए विराट पुरुष थे, पर उन्होंने सत्ता पर कब्जा करने का कोई प्रयास नहीं किया. गैंग ऑफ फोर पर मुकदमा चलाया गया और मृत रक्षामंत्री लिन बियाओ के साथ साथ उन सबको कल्चरल रेवोलुशन की ज्यादतियों और अत्याचारों के दोषी पाया गया. मैडम माओ ने इस पूरी सुनवाई के दौरान बेहद आक्रामक तेवर अपनाए रखा. उसका सबसे बड़ा तर्क यह था कि उसने यह सब चेयरमैन माओ के कहने पर किया था. उनमें से दो को 20 वर्ष के कारावास और दो को फाँसी के सजाएं सुनाई गईं. बाद में सबकी फाँसी को आजीवन कारावास में बदल दिया गया. मैडम माओ ने आगे चलकर जेल के हस्पताल में फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली. चेयरमैन माओ को भी इन अपराधों का दोषी पाया गया पर चीन के इतिहास और स्वतंत्रता की लड़ाई में माओ के योगदान का ख्याल करते हुए माओ को अपमानित नहीं किया गया. माओ के पोर्ट्रेट के साथ वह नहीं किया गया जो रूस में आगे चलकर लेनिन की मूर्ति के साथ किया गया. देंग को सत्ता नहीं चाहिए थी. लेकिन उन्हें चीन की उन्नति और बदलाव चाहिए था. उन्होंने पहला परिवर्तन लाया शिक्षा के क्षेत्र में. शिक्षा को साम्यवादी सिद्धांतों की तोतारटन्त से अलग कर के साइंस और टेक्नोलॉजी की पढ़ाई से जोड़ा गया. चीनी छात्र बड़ी संख्या में पश्चिमी देशों, विशेषतः अमेरिकी यूनिवर्सिटीज में पढ़ने गए. वहाँ से जब इन छात्रों की खेप लौटी तो यह अपने साथ सिर्फ विज्ञान की किताबें ही नहीं, पश्चिम की खुली सोच और वहाँ की प्रगति के किस्से लेकर भी आई. चीन के जिन क्षेत्रों में किसानों की हालत विशेष रूप से बुरी थी, उन्हें कम्यूनों से मुक्त करके अपने लिए खेती करने और अपना ख्याल खुद रखने के लिए छोड़ दिया गया. नतीजा यह हुआ कि उन क्षेत्रों में कृषि उत्पादन एकाएक सुधरने लगा. फिर धीरे धीरे यह प्रयोग पूरे देश में दोहराया गया और किसानों के कंधे से कम्यूनिज्म का जुआ उतार कर उन्हें अपने ढंग से खेती करने के लिए मुक्त कर दिया गया. खेती में उत्साहजनक परिणाम आने के बाद यही प्रयोग उद्योग और व्यवसाय में भी दुहराया गया. धीरे धीरे निजी उद्योगों और व्यवसायों की बाढ़ आ गयी. पहले कहा गया कि आठ कर्मचारियों वाले उद्योगों के मालिकों को पूंजीपति नहीं माना जायेगा. बाद में यह आठ कर्मचारियों वाला नियम भी गायब हो गया और चीन ने एकाएक कई पीढ़ियों के बाद संपन्नता और समृद्धि की गन्ध पाई. ऐसा नहीं था कि विरोध नहीं हुआ. यह पार्टी के अंदर बैठे शुद्धतावादी साम्यवादियों के पसंद की बात नहीं थी और उन्होंने जमकर देंग का विरोध किया. पर वे सभी देंग के आगे बौने थे. देंग ने माओ को झेल लिया था, अब उनके लिए ये सारे विरोध हवा में उड़ते तिनकों जैसे थे. 1978 में देंग सिंगापुर की यात्रा पर गए. यह यात्रा मूलतः सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली कुआन यू को यह समझाने के लिए थी कि वे सुदूर पूर्व के देशों को चीन के समर्थन में और रूस के विरुद्ध समर्थन जुटाने के लिए संगठित करें. इस यात्रा ने इस पूरे क्षेत्र का इतिहास बदल कर रख दिया. चीन सिंगापुर से संभवतः कुछ हज़ार गुना बड़ा है. पर ली कुआन ने एक बेहद साहसिक कदम लेते हुए देंग से एक बड़ा सीधा प्रश्न पूछा -" हम आपकी मदद क्यों करें? इस क्षेत्र के देश रूस से ज्यादा आपसे डरते हैं. हमारी समस्याएँ चीन की वजह से हैं. अगर आप अपनी जमीन का प्रयोग हमारे देशों में कम्यूनिज्म फैलाने में बंद कर दें, हमारे यहाँ के कम्युनिस्ट विद्रोहियों की सहायता करना बंद कर दें, तो कोई कारण नहीं है कि हम आपके मित्र ना बन सकें." देंग ने ली की दृष्टि को समझा और कुछ महीनों बाद चीन से सिंगापुर के कम्युनिस्टों को मदद मिलनी बन्द हो गई. पर उस यात्रा में देंग सिंगापुर की आर्थिक और औद्योगिक सफलता से बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने देखा कि सिंगापुर में शतप्रतिशत एम्प्लॉयमेंट है, और हर व्यक्ति के पास अपना घर है. यानि जो वायदे कम्यूनिज्म आजतक करता आ रहा था, वह संभव हुआ था तो सिर्फ पूंजीवादी व्यवस्था से. देंग सिर्फ अपनी पार्टी एफिलिएशन में कम्युनिस्ट थे, सैद्धांतिक प्रतिबद्धता में नहीं. इस सदी के इन दो महान चीनी मूल के नेताओं में यह बात कॉमन थी - वे सिद्धांतों को सिर्फ उद्देश्यों की पूर्ति का साधन समझते थे. कम्यूनिज्म हो या कैपिटलिज्म, जो भी समाज को समृद्धि दे, वह सही है. बहुत पहले देंग यह कहने के लिए जाने गए थे कि बिल्ली सफेद हो या काली, क्या फर्क पड़ता है...अगर वह चूहे पकड़ती हो.. और समृद्धि का रास्ता कम्यूनिज्म के दरवाजे से नहीं गुजरता है यह देखने में देंग नहीं चूके. और उन्होंने रास्ता बदलने से परहेज़ भी नहीं किया. उन्होंने वापस आकर यह सिंगापुर मॉडल का प्रयोग दुहराया और दक्षिणी चीन में कई स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन्स बनाये जहाँ उद्योगों की स्थापना के लिए अनेक रियायतें दी गईं. ये ज़ोन खूब सफल हुए और देखते देखते देश के सबसे पिछड़े ये इलाके देश के सबसे सम्पन्न इलाके बन गए. पर विरोधों का कोई अंत नहीं था. 1978 में ही देंग ने अपने कुछ बहुत ही प्रतिष्ठित विद्वानों को पश्चिमी यूरोप के पंद्रह शहरों की यात्रा पर भेजा और कैपिटलिस्ट देशों से क्या सीखा जा सकता है, इसपर रिपोर्ट देने को कहा. ये वे लोग थे जिनकी प्रतिबद्धता और ईमानदारी पर किसी को शक नहीं था और कोई यह नहीं कह सकता था कि ये देंग की बात ही दुहरा रहे हैं. इन लोगों ने वापस आकर जो रिपोर्ट दी, उसे लोगों ने कई घंटों तक मंत्रमुग्ध होकर सुना. इसमें देंग का अधिकांश विरोध उड़ गया और पार्टी चेयरमैन गुऑफेंग ने इज्जत से इस्तीफा देने में अपनी खैरियत समझी.... (क्रमशः)...


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भारतीय उपमहाद्वीप ; अफगनिस्तान बर्मा से मालदीव तथा इंडिनेशिया ।।
बृहत्तर भारत को जोड़ने वाली अद्भुत परंपरा: श्राद्ध जब मैं बृहत्तर भारत की बात करता हूँ उसमें केवल भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश नहीं आता| उसमें आता है अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, म्यांमार, लाओस, थाईलैंड, कम्बोडिया, वियतनाम से मलेशिया, इंडोनेशिया तक.. और यह सब मैं केवल कल्पना के आधार पर नहीं मानता बल्कि इसलिए मानता हूँ क्योंकि इतिहास के पन्नों के इस बृहत्तर हिन्दूराष्ट्र अखण्ड भारत की सांस्कृतिक चेतना आज तक भी पूरी तरह नहीं सोई है| और इस सांस्कृतिक एकात्मता की एक अद्वितीय पहचान है “श्राद्ध” श्राद्ध सनातन धर्म और सनातन धर्म की शाखा बौद्ध धर्म का भी आज तक एक अमिट अंग है| उपर बताए गये सभी देशों और जहाँ तक सनातन धर्म का प्रभाव रहा वहां आज तक पूर्वजों की तृप्ति के लिए लगभग समान रीतियों से श्राद्ध किया जाता है, जिसमें खासकर बौद्ध देशों को देखकर तो मैं बहुत ज्यादा विस्मित और गर्वित हो जाता हूँ वहीं चिंतित भी कि नवबौद्धवाद के नामपर आज हिन्दुओं के ही शूद्र वर्ग को श्राद्ध के खिलाफ भड़काया जाता है| चीन, ताइवान : चीनी कैलेंडर के सातवें महीने के 15 दिन पितृपक्ष की भांति मनाए जाते हैं| चीन के बौद्ध और ताओ अपने पूर्वजों के लिए कुर्सियां खाली छोडकर शाकाहारी भोजन निवेदित करते हैं| ईसापूर्व 1500 के शांग साम्राज्य से ही यह परंपरा चीन में चली आ रही है| लोग अपने 7 पीढ़ी तक के पूर्वजों का स्मरण करते हैं और बौद्ध भिक्षुओं को चावल भेंट करते हैं| माना जाता है सारे पितृ नर्क स्वर्ग से धरती पर 15 दिन को आते हैं| अंतिम दिन घोस्ट डे के रूप में मनाया जाता है, उस दिन वे अपने घरों के सामने अगरबत्ती जलाते हैं और नदियों में दीपक प्रवाहित करते हैं ताकि पितरों को विदा कर सकें| महायान बौद्ध ग्रन्थ के उल्लंबन सूत्र के अनुसार मुद्गलयायन को बुद्ध ने उपदेश दिया था कि चावल के पिंड अर्पित करके तुम अपनी माँ को प्रेतयोनि से मुक्त करो| इंडोनेशिया/सिंगापुर/मलेशिया/वियतनाम : यहाँ भी श्राद्ध घोस्ट फेस्टिवल के रूप में साल के सातवें महीने में मनाया जाता है और लोग बौद्ध मन्दिरों में जाकर पितरों के लिए दान करते हैं| वियतनाम में तेतत्रुंग न्गुयेन नाम के इस पर्व पर लोग पितरो के लिए पक्षियों, मछलियों और गरीबों को भोजन कराते हैं| जापान : जापान में साल के सातवें महीने के पन्द्रहवें दिन चुगेन नाम का पर्व मनाया जाता है जिस दिन जापानी लोग पितरों को उपहार अर्पित करते थे परन्तु अब इस दिन लोग सभी वरिष्ठों को उपहार देते हैं| कुछ जापानी समुदाय बॉन पर्व मनाते हैं जिस दिन लोग अपने पितरों के निवास पर जाकर श्रद्धांजली अर्पित करते हैं| कम्बोडिया/लाओस: पितृपर्व या पिक्म बेन नाम का पर्व कम्बोडिया में सितम्बर अक्तूबर में पड़ता है और तीन दिन की छुट्टी होती है| कम्बोडिया में मान्यता है कि राजा यम प्रेतों के लिए यम का द्वार खोल देते हैं, उनमें कुछ मुक्त हो जाते हैं कुछ वापिस नर्क आ जाते हैं| कम्बोडियाई लोग बौद्ध भिक्षुओं को भोज कराते हैं और चावल के पिण्डों का दान करते हैं| सात पीढ़ियों तक के पितरों की तृप्ति के लिए बौद्ध भिक्षु पाली के सुत्तों के अखण्डपाठ करते हैं| श्रीलंका/ म्यांमार: श्रीलंका में पितृपक्ष मटकादान्य नाम से मनाया जाता है और श्राद्ध तर्पण को उल्लंबन या सेगाकी कहते हैं जिसमें चावल के पिण्ड और जल प्रेत आत्माओं के लिए अर्पित करते हैं| बाकि परंपरा कम्बोडिया जैसे होती है| थाईलैंड: थाईलैंड में भी कम्बोडिया की तरह पितृपक्ष मनाया जाता है और अंतिम दिन सतथाई नाम से जाना जाता है जिसके अगले दिन से 9 दिवसीय शरद पर्व आता है| इसमें नवरात्र की तरह पूर्ण शाकाहारी रहना होता है| जैसे हमारे यहाँ साल के सातवें महीने अश्विन में पितृपक्ष पड़ता है वैसे ही इन अधिकांश देशों में पितृपक्ष या पितृ सम्बन्धित ये पर्व साल के सातवें महीने में पड़ते हैं| और देखिये पितृपर्व सम्बन्धी ज्यादातर मान्यताएं और परम्पराएं भी लगभग समान हैं| इन देशों में अन्य पर्व भी हिन्दू त्यौहारों से समानता रखते हैं| कौन नहीं मानेगा कि यह सब देश एक सांस्कृतिक सूत्र में जुड़े रहे हैं और वह सूत्र है "सनातन"| अंत में एक और बात बताता चलूँ आज चाहे इनमें से अधिकांश बौद्ध हैं पर इतिहास में यह सारे देश रहे हैं... ”हिन्दूराष्ट्र”... इसलिए हमें इन्हें भुलाना नहीं है क्योंकि कोई चक्रवर्ती सम्राट फिर करेगा अखण्ड हिन्दूराष्ट्र भारत का निर्माण.... जय श्री राम...


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