वाराणसी/उत्तरप्रदेश।
मिलिए बीएचयू के इस 'देवता' से आज जब तमाम डॉक्टर सरकारी नौकरी छोड़कर प्राइवेट प्रैक्टिस से करोडों का अस्पताल खोलने में दिलचस्पी लेते हैं, इस दौर में बीएचयू के प्रख्यात कार्डियोलाजिस्ट पद्मश्री प्रो. डॉ. टी के लहरी साहब मिसाल खड़ी करतेहैं। गरीब मरीजों के लिए ये शख्सियत किसी देवता से कम नहीं रिटायरमेंट के बाद भी वे मुफ्त में बीएचयू को अपनी सेवाएं दे रहे है । खासबात यह है कि पेंशन से सिर्फ अपने भोजन के लिए पैसा लेते है। शेष पैसा बीएचयू को दान दे देते है । एक तरफ जहां इनके पेशे से जुडे लोग लक्जरी कार से दवा कंपनी और पैथालॉजी के सौजन्य से दौडते नजर आते है वही इस महान व्यक्तित्व ने आज तक कोई वाहन ही नहीं खरीदा । यह महान विभूति आज भी अपने आवास से अस्पताल तक पैदल ही आते जाते है ......महामना के मानस पुत्र को मेरा सादर चरण स्पर्श है.....ऊं नम : शिवाय पोस्ट को अधिक से अधिक शेयर करें। ताकि डॉ. टीके लहरी साहब के इस देवतुल्य कार्य के बारे में जानकर उन तमाम डॉक्टरों का जमीर जागे। जो कि चंद पैसों के लिए लाशों को भी वेंटिलेटर पर रखकर फर्जी इलाज करने से नहीं चूकते......


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इंदौर/नयी दिल्ली ।
मेडिकल की पढ़ाई अब हिंदी में डॉ. वेदप्रताप वैदिक आजकल मैं इंदौर में हूं। यहां के अखबारों में छपी एक खबर ऐसी है कि जिस पर पूरे देश का ध्यान जाना चाहिए। केंद्र सरकार का भी और प्रांतीय सरकारों का भी। चिकित्सा के क्षेत्र में यह क्रांतिकारी कदम है। पिछले 50 साल से देश के नेताओं और डाॅक्टरों से मैं आग्रह कर रहा हूं कि मेडिकल की पढ़ाई आप हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में शुरु करें। ताकि उसके कई फायदे देश को एक साथ हों। एक तो पढ़ाई के आसान होने से डाॅक्टरों की संख्या बढ़ेगी। गांव-गांव तक रोगियों का इलाज हो सकेगा। दूसरा, इलाज के नाम पर अंग्रेजी के जादू-टोने से जो ठगी होती है, वह रुकेगी। तीसरा, दवाइयों के दामों में जो लूट-पाट मचती है, वह रुकेगी। हिंदी में नुस्खे लिखे जाएंगे तो वे मरीज के भी पल्ले पड़ेंगे। चौथा, स्वभाषा में पढ़ाई होने पर छात्रों की मौलिकता में वृद्धि होती है। यदि वे अनुसंधान अपनी भाषा में करेंगे तो भारत में पैदा होनेवाले रोगों का मौलिक इलाज़ ढूंढ सकेंगे। विदेशों पर होनेवाली उनकी पूर्ण निर्भरता घटेगी। इन सब बुनियादी कामों की शुरुआत अब मध्यप्रदेश में हो रही है। यहां की मेडिकल युनिवर्सिटी के बोर्ड आॅफ स्टडीज ने फैसला कर लिया है कि सभी चिकित्सा परीक्षाएं अब हिंदी में भी होंगी। मेरी बधाई ! ऐसी अनुमति देनेवाली दिल्ली की मेडिकल कौंसिल को भी धन्यवाद ! और सबसे ज्यादा आभार, धन्यवाद और बधाई भारत के स्वास्थ्य मंत्री जगतप्रकाश नड्ढा को, जिनसे इस मामले में बराबर मेरी बात होती रही और जिन्होंने लगभग दो माह पहले ही मुझसे कहा था कि अब मेडिकल की पढ़ाई हिंदी में ही नहीं, कई भारतीय भाषाओं में शुरु होने ही वाली है। यह मप्र में सबसे पहले शुरु हुई है, इसलिए मुख्यमंत्री शिवराज चौहान भी बधाई के पात्र हैं। मप्र के डाॅक्टर बंधुओं से मेरा निवेदन है कि वे मेडिकल की हिंदी पाठ्य-पुस्तकें जल्दी से जल्दी तैयार करें ताकि मप्र चिकित्सा-क्रांति का अग्रदूत बन सके।...


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बिहार।
हार्ट अटैक के सबसे मुख्य कारण, जो आपको कोई नहीं बताता,,,,, 1.गर्म भोजन के तुरंत बाद ठंडा पानी पीना। यह पानी ऐसे क्रिस्टल निर्माण करता है जो ब्लॉकेज बनाने में सहायक होते हैं। 2.जटिल हाइड्रोजनीकरण युक्त वसा, और चर्बी वाले खाद्य, जैसे आइसक्रीम, फास्टफूड, इत्यादि का सेवन। 3.आलस्य, श्रम न करने की प्रवृत्ति और वातानुकूलित जीवन का अभ्यास। 4.प्लास्टिक का उपयोग, चाहे वह किसी भी रूप में हो। 5.स्थानीय फल, शब्जी, खाद्य, जल, वायु आदि की उपेक्षा कर ग्लोबल स्टैंडर्ड के अनुसार उपयोग या भोग। जैसे राजस्थान में नारियल पानी की बजाय तरबूज का उपयोग करना चाहिए। 6.हरेक खाद्य में नमक, शक्कर अथवा तेल का प्रयोग।एक बार इनका त्याग करके वस्तुओं को उनके मूल स्वाद में खाना सीखिये। 7.कृत्रिम, सिंथेटिककार्बनिक पदार्थों का परित्याग करें, चाहे वह रंग,सुगंध, दवाई आदि ही क्यों न हो। अंत में,,,, जीवन के भविष्य निर्धारण का 90% भाग गर्भधारण से लेकर जन्म के दसवें दिन तक में ही हो जाता है। उसके बाद वाले प्रयत्नों का योगदान बहुत नगण्य है। तो ऐसा कौन ध्यान देता है? उदाहरण के लिए गर्भस्थ शिशु के व्यायाम की क्या व्यवस्था है,,,? घरेलू चक्की ऐसा साधन था जो गर्भस्थ भ्रूण को न केवल व्यायाम करवाता था, नॉर्मल डिलीवरी भी होती थी। और घट्टी के एंटीक्लॉकवाइज घूर्णन के साथ, उसके मस्तिष्क में क्लॉकवाइज पॉजिटिव तरंगों का उद्गार होता था। बड़े से बड़े परिवार की बहुएं भी चक्की अवश्य चलाती थी। प्रायः उनका समय ब्रह्ममुहूर्त होता था। यदि,,, आज कोई गर्भवती महिला हथचक्की चला रही है तो जानिए कि वह कोई #बैकवर्ड नहीं है, बल्कि #महाफॉर्वर्ड है। क्योंकि आगामी 50 वर्ष के बाद वर्तमान जनसंख्या वाले मानवीय जीव जब अपने शरीरों को कटा फटा, ढेर सारी औषधियों से पेट भर कर, सुस्त कीड़े की तरह नाममात्र की चलती श्वांस के साथ कराह रहे होंगे, इस माता का बच्चा, (यदि उपरोक्त वर्जनाओं का पालन करता रहा तो,,) सुपरहीरो की तरह राज कर रहा होगा। भारत को खतरा न दलितों से है, न सवर्णों से। उन्हें खतरा है स्वयं के #श्लथ हो जाने से। मुटियाने से। भोगसाधनों के बीच रहते हुए भी भोग में असमर्थ जीवन जीने से। इसी को नपुंसकता कहा जाता है। आधुनिक विकारों के मूल में प्रमुख कारण यह असामर्थ्य ही है। #kss...


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नयी दिल्ली।
उच्चतर शिक्षा और इस शिक्षा को पाने के बाद भी युवाओं की बेरोजगारी के लिए सरकारों को दोष दिया जाता रहा है। सरकारों की अकर्मण्यता को जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है। लेकिन क्या केवल सरकारें ही दोषी हैं ? आम जनता का एक अंग जो इस उच्चतर शिक्षा को छात्रों को प्रदान करता है। शिक्षक क्या उनका भी दोष है। आज इसी पर मेरी कही : सन 1991 में आर्थिक उदारीकरण के बाद बड़ी तेजी से औद्योगीकरण हुआ। देसी विदेशी कितनी ही कम्पनियाँ नयी लगी। जिनमे तकनीकी और प्रोफेशनल लोगों की जरूरत थी। सन 91 तक भारत में 5 IIT , इतने ही IIM , कुछ सौ सरकारी इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट कालेज थे। और कुछ सौ ही दक्षिण और महाराष्ट्र में निजी तकनीकी कालेज थे। और ये कालेज आने वाली जरूरत को पूरा नहीं कर सकते थे। केंद्र सरकार ने स्थिति को समझते हुए बड़ी तेजी से भारत में केंद्रीय इंजीनियरिंग कालेजों की स्थापना की। आज लगभग हर प्रदेश में IIT है। केंद्र की विभिन्न सरकारों ने इलेक्ट्रॉनिक्स , आईटी फील्ड के लिए पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप में ढेरो IIIT भी खोले। राज्य और केंद्र सरकारों की बराबर हिस्सेदारी वाले रीजनल इंजीनियरिंग कालेजों को केंद्र सरकार ने पूरी तरह अपने हाथ में लेकर उन्हें NIT बना दिया। इसके अलावा ढेरो सेन्ट्रल यूनिवर्सिटीज भी खोली गयी। चूँकि राज्य सरकारों के पास लिमिटेड बजट होता है। इसलिए केंद्र में रही विभिन्न सरकारों ने स्वंय अपने बजट से ढेरो कालेज खोले जिनकी गुणवत्ता श्रेष्ठ बनी हुई है। इनके अलावा राज्यों ने भी स्टेट इंजीनियरिंग कालेज खोले। और दक्षिण के अलावा लगभग हर राज्य में निजी कालेजों की बाढ़ भी आयी। आज भारत में 4000 के आसपास इंजीनियरिंग कालेज हैं। कुछ सौ से 4000 . कुछ सौ से निकलने वाले छात्रों में गुणवत्ता थी , ज्ञान था। उन्हें कभी नौकरी की समस्या नहीं रही। लेकिन संख्या बेतहाशा बढ़ने के बाद वही गुणवत्ता बरक़रार न रह सकी। सरकारों की नजर में ये बात शुरू से थी। जब नए नए कालेज 90 के दशक में खुल रहे थे , तब उनमे पढ़ाने के लिए योग्य शिक्षक मिलने मुश्किल थे। बीटेक पास बीटेक को पढ़ा रहे थे। MTech और PhD कराने के लिए कालेज ही नहीं थे। इसलिए सरकारों ने शुरू में ढील रखी। लेकिन 2000 के बाद सरकारों ने नकेल कसनी शुरू की। सरकार ने पहला नियम ये बनाया की शिक्षकों को असिस्टेंट प्रोफ़ेसर से प्रोफ़ेसर पद पर तरक्की के लिए पीएचडी करना अनिवार्य कर दिया। अर्थात प्रमोशन पाना है, सैलरी बढ़वानी है तो सरकारी कालेज हो या निजी , PhD करना जरूरी हो गया। इसके अलावा सरकार ने ये भी नियम बनवा दिया की पीएचडी के लिए रेपुटेड जनरल्स में दो रिसर्च पेपर्स छपवाने अनिवार्य कर दिए। कमसेकम दो रिसर्च पेपर। इसके पीछे सरकार की मंशा यही थी की एक सब्जेक्ट विशेष में रिसर्च किया आदमी , वैसे विषयो पर बेहतर शिक्षा दे सकेगा। छात्रों को भी रिसर्च के लिए मोटिवेट कर सकेगा। इसके लिए AICTE के जरिये कॉलेजों को ढेरो आर्थिक मदद दी गयी। MTech और PhD छात्रों के लिए स्टीपेन्ड बढाए गए। एक सरकार जो और जितना जरूरी था , वो कर रही थी। लेकिन एक दिक्कत थी। शिक्षक बनने के बाद , आदमी या महिला में आगे पढ़ने का जोश खत्म हो चुका होता है। चाहे स्कूलों में पढ़ाते शिक्षक हों या कॉलेजों में। इंजीनियरिंग कॉलेजों में तब भी थोड़े बहुत शिक्षक मिल जायेंगे पढ़ते रहते हैं , नए नए सब्जेक्ट , तकनीकों से खुद को समृद्ध रखते हैं। लेकिन ज्यादातर नहीं। उनका काम केवल क्लास लेना है। फिर ऐसे शिक्षक पीएचडी कैसे कर पाते। क्या कोई तरीका हो सकता था ? कुछ पैसा खर्च करके कुछ जुगाड़ करके ? फिर भारत में एक नयी इंडस्ट्री ने जन्म लिया। रिसर्च जनरल्स जिनमे ऐसे रिसर्च पेपर्स छपते हैं। जो पूरे विश्व में जाने जाते हैं। जिनमे रिसर्च पेपर का छपना बेहद तारीफ की बात माना जाता है। जो हर छपने वाले पेपर की पूरी जाँच पड़ताल करते हैं। जिनका हर विषय पर अपना एडिटोरियल बोर्ड होता है , जिनमे विश्व के नामी विशेषज्ञ होते हैं। औरयही जनरल्स पेपर छापने से पहले नेशनल और इंटरनेश्नल्स लेवल पर कांफ्रेंसेस करवाते हैं जहाँ रिसर्चर अपने पेपर पढ़ते हैं और उन्हें डिफेंड करते हैं। ऐसे नामी जनरल्स भला फर्जी , निम्न स्तर के रिसर्च पेपर क्यों छापते। पैसा लेकर भी नहीं छापते। फिर भारत में जहाँ अपना कोई प्रोडक्ट मुश्किल से बन पाता है लेकिन नकली दूध , मावा , दवाई बेहद आसानी से बन जाती है। वहां नकली , डूबियस या विज्ञानं की भाषा में प्रीडेटरी जनरल्स का शुरू हो जाना क्या बड़ी बात थी। कुछ पैसा लेकर अपने जनरल्स में रिसर्च पेपर छापने वाले लोगों की बाढ़ आ गयी। कुछेक नहीं , कुछ सौ नहीं कई हजा...


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