नयी दिल्ली ।
*सुप्रीम कोर्ट केस क्रमांक 416/ 2018 - सारांश* गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ फार्मेसी कराड के एक SC ST जाति के स्टोर कीपर की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में उनके सीनियर ने विपरीत टिप्पणी दर्ज की। स्टोर कीपर ने उनके विरुद्ध SC ST एट्रोसिटी एक्ट के तहत FIR पुलिस में दर्ज कर दी। पुलिस ने उन अधिकारियो को गिरफ्तार करने हेतु डायरेक्टर ऑफ टेक्निकल एजुकेशन से अनुमति मांगी जिसे मंजूर नहीं की गई । इसके करीब 5 साल बाद उक्त स्टोर कीपर ने डायरेक्टर टेक्निकल एजुकेशन के विरुध्द FIR दर्ज करवा दी। (पेज 3 ,4). डायरेक्टर ने अग्रिम जमानत हेतु न्यायालय में याचिका पेश की जिस पर केस सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। एट्रोसिटी एक्ट में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के नागरिकों के विरुद्ध होने वाले कृत्यों को अपराध माना गया है I जैसे, उनका सामाजिक बहिष्कार करना, जान बूझ कर उन्हे सार्वजानिक रूप से अपमानित या प्रताड़ित करना,, इत्यादि. विवाद का विषय यह है कि इस एक्ट के सेक्शन 18 के अनुसार, यदि इस एक्ट के अंतर्गत यदि किसी की विरुद्ध FIR की जाती है तो उसे अग्रिम जमानत नहीं मिल सकती . इसका यह भी अर्थ निकाला गया की यदि कोई कंपलेंट करे तो उसे FIR दर्ज़ कर गिरफ्तार करना है भले ही बाद में कोर्ट में केस झूठा सिद्ध हो पर उसे पहले जेल जाना होगा। विडम्बना ये है कि लूट, डकैती, बलात्कार , हत्या जैसे आरोपों में भी अग्रिम जमानत मिल सकती है पर एट्रोसिटी एक्ट के तहत नहीं. (फैसले का पृष्ठ 15 एवं 24). इस एक्ट का दुरूपयोग करते हुए बड़ी संख्या में केस विशेष रूप से शासकीय एवं अर्धशासकीय सेवकों के विरुद्ध व्यक्तिगत स्वार्थवश फाइल किये गए हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्डस ब्यूरो , मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफेयर्स के डाटा (क्राइम इन इंडिया 2016- सांख्यिकी) के अनुसार वर्ष 2016 में SC केसेस में 5347 केस एवं ST के 912 केस झूठे पाए गए. वर्ष 2015 में 15638 में से 11024 केसेस में आरोप मुक्त कर दिए गए , 495 केस वापस ले लिए गए (पृष्ठ 30)। वर्ष 2015 में कोर्ट द्वारा निष्पादित केस में से 75 % से अधिक केस में या तो आरोप सिद्ध नहीं हुये या केस वापस ले लिए गए (पृष्ठ 33 )। कोर्ट ने कहा कि सामाजिक न्याय के लिए बने इस एक्ट का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। इसे व्यकितगत शत्रुता के कारण बदला लेने या ब्लैकमेल करने का हथियार बनने नहीं देना चाहिए. (पृष्ट 25 ). कानून निरपराध को बचाने एवं दोषी को दंड दिलाने के लिए है. अतः यदि प्रथम दृष्ट्या किसी ने अपराध नहीं किया है तो सिर्फ किसी के आरोप लगा देने मात्र से सेक्शन 18 के तहत अग्रिम ज़मानत न देना उचित नहीं है। इस तरह स्वतंत्रता के मूल संवैधानिक अधिकार का हनन होगा. यदि ऐसा नहीं हुआ तो शासकीय सेवकों का कार्य निष्पादन कठिन होगा। सामान्य नागरिक को भी इस एक्ट के तहत गलत केस में फंसा देने की धमकी दे कर ब्लैक मेल किया जा सकता है। (पृष्ठ 67 ) . अंततः कोर्ट ने कहा की एट्रोसिटी एक्ट के केस में अग्रिम ज़मानत देने पर कोई रोक नहीं है अगर प्रथम दृष्टया केस दुर्भावनावश फ़ाइल किया गया हो। निरपराध नागरिकों को गलत आरोपों के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए डी एस पी द्वारा समयबद्ध प्राथमिक जांच की जानी चाहिए एवं केस रजिस्टर होने के बाद भी गिरफ़्तारी आवश्यक नहीं है। इस एक्ट के हो रहे दुरूपयोग के मद्देनज़र शासकीय सेवकों को बिना नियुक्तिकर्ता अधिकारी की अनुमति के गिरफ्तार नहीं किया जा सकेगा। गैर शासकीय सेवकों के केस में जिले की वरिष्ठ पुलिस सुपरिंटेंडेंट की अनुमति आवश्यक होगी. (पृष्ठ 86 87)।...


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New delhi।
1. Two days back, CJI Dipak Misra ordered a special investigation team (SIT) to reopen 1984 Sikh riots cases and investigate 186 cases related to it. . 2. Last month, CJI Dipak Misra slammed Kapil Sibal when he asked to postpone the judgement of Ram Janmbhumi case after July 2019. . 3. Justice Dipak Misra is leading the bench which will pass judgement on Rama-janmabhumi case. . 4. The judges collegium, everyone knows is a part of the "ecosystem" created over the last 7 decades and has always thwarted efforts to let "outsiders"come in the circle. It was this collegium which Modi Government wanted to dismantle through NJAC and wanted that people's representatives should have a say in Judges appointment. The entire Judiciary ably supported by Congress derailed the entire activity and refused to comply. . 5. Well, the campaign against Dipak Misra, maligning the CJI (a constitutional post) baselessly and asking his impeachment a day after he ordered reopening of Sikh riots case and is set to pass judgement on Rama-janmabhumi case shows the power of ecosystem. . As retired SC Judge RS Sodhi said, "These four judges have formed a union. There are 23 other judges as well. This trade unionism to malign the office of CJI is immature and uncalled for. These 4 judges have no right to sit in the highest court and must be impeached." I agree with Justice Sodhi. #CleanTheCollegium #IStandWithDipakMisra #Ecosystem_Activated Via: Kshitij Mohan Singh P.S.: The Congress Ecosystem is in Universities, Bureaucracy, Judiciary and every where you can imagine in this country. We have only the people's support to dismantle the ecosystem and the filth called Congress which considers this Country it's inherent property because they have developed that ecosystem which provides it oxygen, day in and day out. Provide Modi the support he deserves to clean the 70 year rot....


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नयी दिल।
कुछ न होगा।सुप्रीम कोर्ट आलरेडी कई जजमेंट दे चुका है कि हिंदू कोई रिलीजन नही है।इसलिए स्कूली प्रार्थना हिंदू धर्म से संबंधित हो ही नही सकती है। और दोनो हाथ जोङकर प्रार्थना करना(स्कूल मे हो या अधिकारी, नेता, बङो के सामने),प्रणाम करना ,अभिवादन करना ,स्वागत मे माला पहनाना, उद्घाटन मे दीप प्रज्वलन करना,शिलान्यास मे नारियल फोङना, पैर छूना, आदि आदि इत्यादि सब भारतीय संस्कृति है न कि हिंदू धर्म। और मूल संविधान के पन्नो पर प्राचीन भारतीय राष्ट्र पुरूषो,रामायण महाभारत के संदर्भित चित्रों ,उपनिषद के महावाक्यों आदि का चित्रित होना,संसदीय गलियारे मे दीवारो पर प्राचीन मध्य एवं आधुनिक सांस्कृतिक व राष्ट्रीय धरोहरो,प्रतीको,एवं विचारों का उत्कीर्ण होना-चित्रांकित होना आखिर क्या बताता है? साफ उद्घोषणा है यह कि यह सब भारत की संस्कृति के हिस्से हैं,धरोहर हैं और समृद्ध गौरवशाली अद्भुत राष्ट्रीय परंपरा है।इसी के लिए हमारा भारत दुनिया भर मे जाना पहचाना जाता है और आज कहूंगा कि एक राष्ट्र के रूप मे हम चिरकाल से इसीलिए अस्तित्व मे हैं। इसको जिसे जो समझना है समझे पर यही हमारे राष्ट्रभाव का मूल है।यही हमारी संस्कृति की आत्मा है।यही हमारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है।इसे न तो आजादी की लङाई के वीरो ने त्यागा, न ही स्वतंत्र होने के बाद संविधान सभा ने संविधान निर्माण करने व उसमे संस्कृति व राष्ट्रीय परंपरा को शामिल करने व दृढ करने मे कोई ढीलापन दिखाया।लगभग हर अच्छी बढिया भाव व बातों को शामिल किया गया।नीति निर्देशक तत्वो से लेकर मूलाधिकारो व शक्तियो के पार्थक्य के सिद्धांत से लेकर जो उद्देशिका मे सर्वोत्तम भावो व आदर्शो को स्थापित किया वह हमारे नेताओ की सार्वकालिक और सर्वतोमुखी संयुक्त प्रतिभा का बेहतरीन प्रमाण है। इसलिए संस्कृति को रिलीजन से घालमेल करना असंभव होगा।सुप्रीम कोर्ट स्वयं इस घालमेल को कई बार संवैधानिक पीठ के जरिए जजमेंट देकर दूर कर चुका है।इस बार व आगे भी वह भारतीय संस्कृति व परंपरा को हिंदू धर्म या किसी रिलीजन का हिस्सा कहने के आरोप का दूध का दूध व पानी का पानी करने मे समर्थ होगा।...


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