नई दिल्ली/जम्मू कश्मीर।
अनुच्छेद 370 हटने के बाद कर्मेन्दु शिशिर और अशोक कुमार पाण्डेय की बिन्दुवार बहस : कौन कितना सही -अग्निशेखर आज मैंने एक मित्र के यहाँ वाइ-फाइ की सुविधा का लाभ उठाते अनुच्छेद 370 हटाए जाने के दूसरे दिन यानी 6 अगस्त 2019 को लिखी कर्मेन्दु शिशिर की पोस्ट और उसे बिन्दुवार नकारती हुई अशोक कुमार पाण्डेय की प्रतिक्रिया पढ़ी। यह एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है और आज से नहीं, 26 अक्तूबर 1947 के दिन हुए भारत के साथ हुए विलय से ही चर्चा में रहा है । बल्कि इस मुद्दे से बेशुमार राजनीतिक रोटियाँ सेंकी जाती रही हैं । यहाँ चूंकि कर्मेन्दु शिशिर की बातों को अशोक कुमार पाण्डेय ने व्हाट्सेप आधारित जानकारी कहकर उनको ख़ारिज करने की उतावली और अपना CUT PASTE ज्ञान बघारने की रस्म निभाई है इसलिए मुझे जम्मू-कश्मीर के मूल निवासी और उसकी लोकवार्ता , उसके इतिहास-भूगोल सहित उसकी आधुनिक राजनीति का विनम्र किंतु जागरूक विद्यार्थी होने के नाते बिन्दुवार हस्तक्षेप करना ज़रूरी लगा । कर्मेन्दु शिशिर लिखते हैं : (1) " यह बात विचित्र है कि कश्मीर की कोई लड़की गैर कश्मीरी से शादी करें तो उसके सारे अधिकार खत्म और पुरुष गैरकश्मीरी लड़की लाये तो उसे सारे अधिकार हासिल।इस अन्यायपूर्ण कानून पर कोई बहस चाहिए क्या? इसे कश्मीरी नेताओं ने खुद क्यों नहीं बदल लिया? " # # अशोक कुमार पाण्डेय का खंडन : ____________________ " 2002 में आया था जम्मू और कश्मीर हाईकोर्ट का फैसला।उसके बाद से कश्मीरी लडकी किसी से शादी करे उसकी नागरिकता पर असर नहीं पड़ता।मेरी किताब में भी है और भी हर जगह ।आपने व्हाट्सेप पर भरोसा किया।" # # मेरा हस्तक्षेप : -कर्मेन्दु शिशिर ने सही सवाल उठाया है और अशोक कुमार पाण्डेय ने अधूरा जवाब देकर गुमराह करने का कुत्सित खेल रचा है । वास्तव में 7 अक्तूबर 2002 को हाईकोर्ट की Full Bench का जो निर्णय आया जिसमें न्यायाधीश झांजी(Jhanji) और दोआबिया (Doabia) ने स्पष्ट किया- " The daughter of a permanent resident marrying a non-permanent resident will not lose the status of permanent resident in the state of Jammu and Kashmir." अशोक कुमार पाण्डेय ने कर्मेन्दु शिशिर को यह नहीं बताया कि तत्कालीन केंद्र सरकार की रज़ामंदी और नेशनल कान्फ्रेंस और पीडीपी राजनीति और राज्य सरकार ने इसे कैसे अर्धसत्य अथवा अपंग न्याय ( "Half Judgement " ) में बदला और इसे कभी लागू नहीं होने दिया। इस ऐतिहासिक निर्णय की वाहवाही तो हुई,जो कि होनी ही चाहिए थी, इसे राज्य से बाहर किसी गैर राज्यीय नागरिक से विवाह करने वाली मेरी नागपुर निवासी अपनी छोटी बहन और मुम्बई निवासी बेटी जैसी हज़ारों स्त्रियों की नागरिकता तक ही सीमित कर दिया गया। अर्थात् मेरी छोटी बहन और मेरी बेटी की नागरिकता पंगु कर दी गयी।उनका पैतृक संपत्ति का अधिकार उनतक ही सीमित माना गया।यानी मेरी बहन और मेरी बेटी इस निर्णायक जजमेंट के बावजूद अपनी पैतृक संपत्ति का कुछ नहीं कर सकतीं ।न अपने बच्चों/ संतति को ही अग्रेषित कर सकती हैं और न उनके बच्चे ही अपनी माँ की पैतृक संपत्ति के उत्तराधिकारी हो सकते हैं ।क्योंकि जजमेंट को पंगु बना दिए जाने के बाद जम्मू-कश्मीरराज्य की ऐसी बेटियों की नागरिकता को उन तक ही सीमित कर दिया गया । इस जजमेंट के बाद कभी नेशनल कान्फ्रेंस और कभी पीडीपी ने इसे विधान सभा में कभी एक कानून भी नहीं बनने दिया। तत्पश्चात सन् 2004 और सन् 2010 में Permanent Resident Disqualification Bill (PRC Bill) को राजनीतिक नौटंकी के तहत कभी पटल पर नेशनल कान्फ्रेंस ने तो कभी पीडीपी ने रखा।इसे विवादित बनाकर विधान परिषद तक पहुँचने ही नहीं दिया गया।इसे तत्कालीन केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के कारण कानून बनाने में अडंगे डाले गए । अंततः इस विधायक को कानून बनने से रोकने के आशय से 5 अप्रैल 2010 में तकनीकी त्रुटि ( "technical flaw" ) के नाम पर सदा के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और विधान परिषद ( upper House ) जाने का इसका रास्ता बंद किया गया । इसलिए कश्मीर पर श्रीमान् Cut Paste Writer और स्वयंभू विशेषज्ञ अशोक कुमार पाण्डेय ने जानबूझकर अर्धसत्य कहा है। यह तो अब इधर अगस्त 2019 के constitutional Order no 272 के तहत 35-A के गिर जाने से जम्मू-कश्मीर की ऐसी बेटियों को पूर्ण नागरिकता के अधिकारों की बहाली हुई है । उनके साथ अब कोई लैंगिक भेदभाव नहीं होगा । वे अब लगभग सात दशकों के बाद संविधान प्रदत्त उन सभी मूल अधिकारों की हकदार हैं जो किसी भी भारतीय नागरिक को धारा 14,15,16,19,20 और 21 के अंतर्गत प्राप्त हैं । यह कश्मीर की मुस्लिम राजनीति से प्रेरित एक खास पितृसत्तात्मक मानसिकता(typical patriarchal mindset) और श्रीमान् अशोक कुमार पाण्डेय जैसे उसके अंध समर्थकों के गिरोह के लिए एक बड़ा धक्का है। # # कर्मेन्दु शिशिर लिखते हैं : (2) "पंजाब से दलित सफाई मजदूरों को गंदगी साफ करने के लिए लाकर बसाया गया उनकी तीन पीढ़ियाँ गुजर गई।आपने क्यों नहीं उनको वोट का अधिकार दिये?आप दे दिये होते।" अशोक कुमार पाण्डेय का खंडन : _____________________ " 2,3 प्वाइंट इतने सीधे नहीं जितना आप सोचते हैं। 35ए के तहत नागरिकता नहीं संभव थी,उसके लिए किसी ने पहल नहीं की ।आप वालों ने भी नहीं ।शरणार्थियों को नागरिकता दी गई।जम्मू में सब के सब वोटर्स हैं ।जाकर देख आइए।" ## मेरा हस्तक्षेप : -" कर्मेन्दु शिशिर के दूसरे बिन्दु के साथ उनके उठाए तीसरे बिन्दु (पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर और पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों की नागरिकता) को मिलाकर दोनों पर अशोक कुमार पाण्डेय ने जो चलताऊ और गैर -ज़िम्मेदाराना प्रतिक्रिया दी है उससे उन्होंने यहाँ भी अपने 'कट पेस्ट विशेषज्ञ' होने का ही सबूत दिया है । यह लाल बुझक्कड़ कैसा ज्ञान बघार रहा है हिंदी जगत को ! जिन दलित सफाई मज़दूर भाई बहनों को पंजाब से गंदगी साफ करने के लिए लगभग सौ साल पहले जम्मू लाकर बसाया गया ,उनको कौन सा वोट का अधिकार है ? वे पीढ़ी- दर-पीढ़ी मैला ढोने वाले ही रखे गए। अशोक कुमार पाण्डेय से कोई कहे कि जम्मू आकर मेरे साथ चलकर उनकी बस्ती में आकर देखें ।उनसे मिलें । जम्मू में पश्चिम पाकिस्तानी शरणार्थियों की नागरिकता बहाली के लिए, मानवाधिकारों के घोर हनन अर्थात् एक प्रकार का नस्लभेद (Apartheid) के सवाल पर समय समय पर आवाज़ उठती रही है।अपनी सीमाओं में संघर्ष चलता रहा है । इन शरणार्थियों को कब और किसने नागरिकता दी ? इन देशभक्तों के साथ दशकों से अन्याय होता आ रहा है । क्या वो किसी सरकारी नौकरी अथवा कल्याणकारी योजना के लिए आवेदन कर सकते थे ,नहीं ! यह तो अब अनुच्छेद 370 हटने के बाद वे लोग अन्य सामान्य नागरिकों की तरह बराबर की योग्यता वाले हो गये। लंबे संघर्ष के इतिहास बाद आखिर अब उनका सपना साकार हुआ है। उनके नाम के साथ "पश्चिमी पाकिस्तान रिफ्यूजी" का टैग समाप्त हो गया । शरणार्थी लोकसभा चुनाव में मतदान तो कर सकते थे , विधानसभा चुनाव में कदापि नहीं ।क्या ये सरासर नाइंसाफ़ी नहीं थी? क्या अशोक कुमार पाण्डेय कर्मेन्दु शिशिर के उठाए मुद्दे के जवाब में यह तथ्य भी बताने की ज़ेहमत उठाएंगे कि कैसे कश्मीर के तथाकथित कद्दावर सेक्युलर नेता शेरे कश्मीर शेख़ मुहम्मद अब्दुल्ला ने कैसे तकरीबन साठ साल पहले तिब्बत और चीन के मुस्लिम शरणार्थियों को कश्मीर में शरण दी जिनकी बस्ती को श्रीनगर में 'ब्वटॅ सराय' (भोट सराय) कहते हैं और पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर से आए हिंदू शरणार्थियों को घाटी में न रहने देकर जम्मू भगा दिया। झूठ बोल रहे हैं अशोक कुमार पाण्डेय । नागरिकता आदि को लेकर उनका यह तर्क कि ये मुद्दे 'इतने सीधे नहीं' का क्या मतलब हुआ कि लगभग एक शताब्दी से उनके हवा में लटके रहने को जायज़ ठहराओगे क्योंकि आप यहाँ मुस्लिम अलगाववादी राजनीति के वर्चस्व के पक्षधर हो ? ## कर्मेन्दु शिशिर लिखते हैं : (4) "आपने गैरमुस्लिम आबादी के लिए पोस्टर चिपकाये जवान बेटियों,बहुओं को छोड़कर बूढ़ी औरतों के साथ सारे गैरमुस्लिम घाटी छोड़ दो।उनके साथ बलात्कार हुए,नंगी कर बीच से आरे से चीर दिये? तब मानवाधिकार कहाँ था? यह स्पेस नहीं देता है? भाजपा को स्पेस हवा में नहीं मिला है।सोचिए और गलत है तो बताइये न? ## अशोक कुमार पाण्डेय का खंडन : _____________________ "आपने"? कौन से आपने ? सारे कश्मीरी मुसलमानों ने ? मौलाना मदूदी और मीरवायज़ ने जो मार दिए गए उसी दौरान ? नेशनल कान्फ्रेंस के कोई दो सौ लोगों ने जो मार दिए गए उसी दौरान? मेरे पास एक इंटरव्यू है जिसमें एक कश्मीरी पंडित ,जो अब भी रह रहा है कश्मीर में,उसने बताया कि स्थानीय नेशनल कान्फ्रेंस के नेता ने कहा था जब तक वह है किसी को जाने की ज़रूरत नहीं ।उसे मार दिया आतंकवादियों ने।कुछ के किए का सब पर लाद देंगे और ऐसी थियरी देंगे ? तो देव हर लिंचिंग के लिए आप और मैं भी ज़िम्मेदार हैं ।" ## मेरा हस्तक्षेप : -" यों तो हत्याएँ हत्याएँ होती हैं और उनके आंकड़ों से तर्क वितर्क करना अपराध होता है,यहाँ जिहादियों द्वारा हत्याओं के पीछे के आशय जानना आवश्यक है। जिहाद का इतिहास है कि यह अपने लक्ष्य को छल बल से टार्गेट तो करता ही है, अपने रास्ते में आने वाले स्वधर्मियों को भी निर्ममता खत्म करता है। यहाँ कर्मेन्दु शिशिर ने कश्मीरी हिंदुओं की बर्बर हत्याओं का जो मुद्दा उठाया है उसपर उसपर सहानुभूति का एक औपचारिक शब्द न कहकर अशोक कुमार पाण्डेय उसे गौण करने का कुत्सित प्रयास करते हैं । इस जिहादी आतंक की भेंट चढ़े सभी मृतकों के प्रति अफसोस प्रकट करते हुए मैं इन महाशय के जवाब में कहना चाहूँगा कि एक ओर तो कश्मीर में चल रहे पाकिस्तान समर्थित अलगाववादी हिंसाचार को आप कश्मीरियों की अवामी तहरीक कहते हैं तो कश्मीरी मुसलमानों के 'मेहमान मुजाहिद्दीनों' को आप जनता से अलग कर के भी दिखाना चाहते हैं । जब नब्बे के दशक में आए दिन घाटी भर में लाखों लाख मुसलमान सड़कों पर निकलते थे,वो कौन सी अवाम थी ?क्या वे पाकिस्तान, अफगानिस्तान,सऊदी अरब अमीरात या ईरान के मुसलमान थे ? क्या आम लोगों ने पाकिस्तानी दहशतगर्दों को " मेहमान मुजाहिद्दीन " कहकर अपने घरों में शरण नहीं थी? जहाँ तक मौलाना मसूदी ( मदूदी नहीं जैसा कि अशोक कुमार पाण्डेय ने उनका नाम लिखा है) की नृशंस हत्या का प्रश्न है,उसके पीछे एकाधिक कारण रहे होंगे । एक ज़माने में शेख मुहम्मद अब्दुल्ला के साथी रहे मौलाना मसूदी जनता पार्टी में भी शामिल हुए थे ।ऐसा लगता है बुजुर्ग मौलाना मसूदी सहित मौलवी फारूक और गनी लोन( एक ज़माने में कांग्रेसी तथा शिक्षा मंत्री)आदि को पाकिस्तानी आलाकमान शक की नज़र से देखते रहे। रही बात नैशनल कान्फ्रेंस के कोई दो सौ लोगों की आतंकवादियों द्वारा हत्याओं की , 'निज़ामे मुस्तफा' ( कट्टरपंथी इस्लामी राज्य) कायम करने के लिए जिहादी, जिसे भी या जिन्हें भी चाहें, वे उनके अपने ही मुसलमान क्यों न हों ,वे रणनीति के तहत मार डाल दिए जाते हैं । अशोक कुमार पाण्डेय कश्मीर घाटी में रहे रहे किसी एक विरले कश्मीरी पंडित से लिए इंटरव्यू का हवाला देते हैं कि उन्हें आतंकवादियों के हाथों मारे गए ऐसे किसी नेशनल कान्फ्रेंस के नेता ने आश्वासन दिया था कि किसीके भागने की ज़रूरत नहीं । वह ज़रूर कोई नेकदिल इंसान रहा होगा।ऐसे अपवाद हर कहीं और हर दौर में होते हैं । ऐसा अपवाद इतने बड़े कश्मीरी पंडित 'जीनोसाइड'( genocide) और धर्म आधारित जातीय सफाए ( religious cleansing) को झुठलाना नहीं सकता। ## कर्मेन्दु शिशिर लिखते हैं : (5) "पाकिस्तान तो खैर पाकिस्तान है ही।मुफ्ती महबूबा कह रही है कि यह जरूरी इसलिए है कि यहाँ हर हाल में मुस्लिम समुदाय का बहुमत और वर्चस्व बना रहे।आप सोचिए ठीक इसी सोच की तो भाजपाई रट लगाये हैं कि हिन्दू का बहुमत और वर्चस्व बना रहे।मुझको हिन्दू मुस्लिम से कुछ नहीं लेना-देना है लेकिन एक बुद्धिजीवी के नाते कहियेगा कि मुस्लिम बहुमत और वर्चस्व के पक्ष में खड़े होइये और हिन्दू बहुमत और वर्चस्व के विपक्ष में ?तो मैं हर हाल में किसी भी तरह के बहुमत की नृशंसता का विरोध करूँगा ही करूँगा।भले अकेले पड़ जाऊँ।" ## अशोक कुमार पाण्डेय का खंडन : ______________________ " ....कश्मीर भारत का इकलौता मुस्लिम बहुल प्रदेश था,उसकी संस्कृति और धार्मिक स्वरूप की रक्षा का वचन दिया था भारत ने। 99 फीसद राज्य हिन्दु बहुल हो तो सेकुलरिज्म है और कोई समस्या नहीं, एक राज्य मुस्लिम हो तो सारी समस्या वहीं हैं ।गज़ब है एकदम।" ## मेरा हस्तक्षेप : - " यहाँ बात किसी राज्य के मुस्लिम बहुल होने की नहीं है ।जम्मू और कश्मीर राज्य धर्मनिरपेक्ष भारत की धरती पर मुस्लिम राज्य के रूप में a state within state की है जिसे धीरे धीरे एक Semi-Muslim Nation के रूप में पनपने दिया जाता रहा ।यह लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष भारतीय संविधान का जीता जागता अंतर्विरोध था जो विगत दशकों से अब परोक्ष रूप से भारत विरोधी जिहादी सोच का सहायक ( Collaborator) था। याद करें पूर्व विधायक और पेंशनयाफ्ता अलगाववादी हुर्रियत नेता का बयान ( यूट्यूब पर उपलब्ध) : " यहाँ सेक्युलरइज्म नहीं चलेगा! यहाँ सोशलइज्म नहीं चलेगा ! यहाँ नैशनलइज्म नहीं चलेगा ! यहाँ सिर्फ और सिर्फ इस्लाम चलेगा ! हम पाकिस्तानी हैं पाकिस्तान हमारा है!" इन्ही सबसे बड़े अलगाववादी नेता के शब्दों में यह आज़ादी की लडाई इस्लाम के लिए आज़ादी की तहरीक थी : " आज़ादी बराए इस्लाम!" इसी जिहाद का घोषित एजेंडा था : - बटन हिंज़ कबर कशीरि न्यबर (अर्थात् कश्मीरी पंडितों की कब्रें घाटी से बाहर खोदी जाएँ यानी कश्मीरियों पंडित कश्मीर से बाहर जा मरें।) - असि छु बनावुन पाॅकिसतान बटल रोसतुय बटव सान ( हमें यहाँ पंडित की स्त्रियों सहित और पंडित पुरुषों को छोड़कर पाकिस्तान बनाना है। -ऐ काफिरो ! ऐ ज़ाबिरो ! कश्मीर हमारा छोड़ दो ! या -यहाँ क्या चलेगा? निज़ामे मुस्तफा! - पाकिस्तान से रिश्ता क्या ? लाइल्लाह इल्लाह! यह होता है धर्मनिरपेक्ष भारत की धरती पर अलगाववादी मुस्लिम साम्प्रदायिक वर्चस्ववादी राज्य के बनने देने का नतीजा।इसे ही कानून की भाषा में अनुच्छेद 370 और 35 -ए तथा विलयोत्तर कालखंड में गुमराहकुन " कश्मीरियत " की संज्ञा दी गयी जिसे लाखों कश्मीरी पंडितों के सामूहिक देशनिकाला, जीनोसाइड तथा सांस्कृतिक संहार (cultural genocide) से तार तार किया गया। ## कर्मेन्दु शिशिर लिखते हैं : (6) "आप कश्मीरियत कश्मीरियत चिल्लाते खूब हैं लेकिन आनंदवर्धन से लेकर नंदु ऋषि के सैकड़ों ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक प्रतीकों का इस्लामीकरण क्यों करते रहे? आपने यह सब किया और भाजपा के लिए यह सब शानदार खुराक बनती गई । # # अशोक कुमार पाण्डेय का खंडन : ______________________ (6) "ग़ज़ब है कर्मेंदु जी. इतना अज्ञानी आपको नहीं जानता था. नन्द ऋषि जानते हैं कौन थे? दो पीढ़ी पहले उनके पितामह ने धर्म परिवर्तन करके इस्लाम अपना लिया था. नाम था उनका शेख़ नुरूद्द्दीन. नुन्द का अर्थ किसी कश्मीरी से पूछ लीजियेगा. बता दूं कि कश्मीर में ऋषि (असल में रेष) परम्परा मुस्लिम सूफी परम्परा है. आप इतना कम जानते हैं कश्मीर के बारे में! लाल द्यद याद आईं? उन्हें शैव योगिनी की तरह याद किया जाता है. मटन का सूर्य मंदिर उसी रूप में है. श्रीनगर का शंकराचारी भी. गणेश मंदिर भी. खीर भवानी भी. कम से कम साहित्य अकादमी से छपा शेख़ नुरूद्द्दीन पर मोनोग्राफ पढ़ लिया होता यहाँ ज्ञान देने से पहले." ## मेरा हस्तक्षेप : - इस स्वयंभू कश्मीर विशेषज्ञ अशोक कुमार पाण्डेय को कौन बताए कि नुन्दॠषि के पितामह ग्रज़ संज़ नहीं,बल्कि उनके पिता सलर संज़ कश्मीर में मुसलमान हो गये थे और सोद्र माॅज ( संस्कृत साद्रा ) उनकी माँ थीं जो कवयित्री भी बतायी जाती हैं । चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जन्मे नुंदॠषि खुद अपना नाम बताते हैं- सलर का पुत्र नुन्द संज़,मैं हूँ ।मेरे माता पिता दोनों संज़ राजाओं के कुल से हैं,याद रखो मेरा कुल संज़ ही है। शेख नुरुद्दीन वली नूरानी कहलाया जाना बाद की बाद है। नुन्द का अर्थ होता है सुन्दर ।और नुन्दॠषि ने अपने श्रुखों में अर्थात् श्लोकों में अपना नाम कहीं नुरुद्दीन नहीं लिखा है। नन्द ही लिखा है । लोगों के लिए वह सहजानंद और नुन्दॠषि ही रहे । नुन्दॠषि की सात पीढ़ियों की उपलब्ध वंशावली के अनुसार उनके पूर्वज किश्तवाड के राजपूत वंशी क्षत्रिय थे। अशोक कुमार पाण्डेय को यह नहीं मालूम कि कश्मीर में " मुस्लिम ऋषि परंपरा " और " सूफी परंपरा " दो अलग समांतर धाराएं रही हैं जिन्हें बाद में सूफियों की ईरानी और तुर्की मूल के नक्शबन्दी, सुहारवर्दी,नूरबख्शी,कुब्रवी और कादिरी सम्प्रदायों के प्रचार प्रसार के तहत सूफियों के 'वहदत्-उल-वजूद' की अवधारणा के साथ एक करने की कोशिश की गयी लगती है । कश्मीर में ऋषि परंपरा का क्रम बहुत पुराना है ।लोगों के धर्म परिवर्तन के बाद भी यह ऋषि परंपरा अक्षुण्ण बनी रही। इन मुसलमान ऋषियों के विचार चिंतन पर निश्चित रूप से वेदांत,शैव तथा बौध दर्शनों की प्रतिच्छाया है(शशिशेखर तोषखानी,कश्मीरी साहित्य का इतिहास,पृ 47)। प्रोफेसर मोहीउद्दीन हाजिनी के अनुसार "सामान्यतः कश्मीरी ब्राह्मणों के विश्वास और विशेषतः बौद्धों के विश्वास के अनुसार इन्द्रिय दमन ही आध्यात्मिकता प्राप्त करने की प्रथम आवश्यकता है ।या यह भी कहा जा सकता है कि कश्मीरी ब्राह्मण और बौद्ध एकांत सेवन अथवा पुरोहितत्व को ही ज्ञान प्राप्त करने की नींव जानते थे और इसके बिना वे मुसलमान प्रचारकों के प्रचार से किसी भांति प्रभावित नहीं होते थे।"(हमारा साहित्य 1984,पृ 27)। इसलिए कश्मीरी मुस्लिम ॠषि परंपरा के तीन चरण हैं ।एक, इस्लाम आगमन से पूर्व यानी नुन्दॠषि से पहले, नुन्दॠषि के समकालीन और उनके बाद। पता नहीं, कश्मीर के ''मटन का सूर्य मंदिर उसी रूप में है,श्रीनगर का शंकराचार्य भी।गणेश मंदिर भी।खीर भवानी भी " कहकर क्या कहना चाहते हैं विशेषज्ञ महोदय? क्या यही कि कश्मीर के मंदिरों के तोड़े जाने, क्षतिग्रस्त किए जाने, उनकी ज़मीनें,और शमशान भूमियां तक हड़पे जाने की बातें झूठी हैं ? यह यथार्थ को जानबूझकर झुठलाने (Policy of Denial ) के अभियान का हिस्सा है । ## कर्मेन्दु शिशिर लिखते हैं : (7) दुनिया के आज तक के इतिहास में कोई भी हुकूमत क्यों न हो, वह सशस्त्र विरोध को बर्दाश्त नहीं कर सकती।किसी कश्मीरी नेता ने आजतक महात्मा गाँधी के रास्तों पर चलते हुए विरोध दर्ज नहीं किया।सत्याग्रह सरीखा आंदोलन नहीं किया।अगर 72 साल इस शैली का आंदोलन चला होता तो बात कहाँ से कहाँ गई होती।उस पर आप पाकिस्तानियों का खुलेआम साथ लीजिएगा।आईएसआई के झंडे फहराइयेगा।मसलन मसल पावर से, थ्री नट थ्री से समस्या सुलझाइयेगा तो लीजिए सुलझाइये।मसल पावर के मामले में कर्मेन्दु शिशिर क्या कर सकते हैं -- घेवड़ा?दोनों पक्ष सिर्फ और सिर्फ अन्याय करता रहा है।बस मौके -मौके की बात है!" ## अशोक कुमार पाण्डेय का खंडन : _______________________ -"आपसे यह उम्मीद नहीं थी. जब आप जैसा हिन्दी का विद्वान कश्मीर का क जाने बिना ज्ञान देने का अधिकारी समझे खुद को तो वाकई हिन्दी पर शर्म आनी चाहिए." # # मेरा हस्तक्षेप : " खामोशी गुफ्तगू है बेज़ुबानी है ज़ुबां मेरी !" 0...


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नई दिल्ली।
दक्षिणपंथियों की यही सबसे बड़ी दिक्कत है कि वो अपने वास्तविक मसलों को भी नहीं उठा पाते, वहीं जिनकी कोई विश्वसनीयता नहीं है वे 40-50 लोग भी झूठी बातों को इतना फैला देते हैं कि सभी जगह उसी पर चर्चा होने लग जाती है। ओवैसी जैसा एक नंबर का मुस्लिम कट्टरपंथी अकेला होते हुए भी अपने समाज के झूठे, सच्चे सभी मसले संसद में उठा लेता है, फिर क्या वजह है कि दक्षिणपंथी BJP की 303 सांसद हिंदुओं के एक भी मुद्दे को संसद में नहीं उठा पाते। वो कौन सी बुनियादी दिक्कत है जो ऐसा नहीं हो पा रहा है। इसी तरह दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन होने का दावा करने वाला RSS भी वास्तविक मुद्दों को उठा पाने में बहुत पीछे है। RSS के संबद्ध कई ऐसे संगठन हैं जिन्हें हिंदुओं की आवाज़ उठाने के लिए बनाया गया था, ऐसा लगता है वे भी अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। बदली हुई परिस्थितियों में ये संगठन खुद को अपडेट नहीं कर पाए हैं। तभी तो ताकत होने के बावजूद मुद्दों में उबाल नहीं ला पाते। पिछले 4-5 सालों में हिंदुओं को बदनाम करने के सैकड़ों कामयाब बड़े प्रयास किए गए, कहीं भी ये मोर्चे पर मजबूती से खड़े नहीं दिखे। इसे एक उदाहरण से समझने की कोशिश कीजिए- दिल्ली के भोगल में एक मुसलमान ने सरे बाज़ार एक हिंदू लड़की को चाकुओं से गोदकर मार डाला, स्थानीय बहादुर लोगों ने उसे किसी तरह काबू करके पुलिस के हवाले कर दिया। काबू करने के दौरान उस जेहादी की ठीक-ठाक ठुकाई कर दी गई, शुरू में मीडिया ने इसे भी मुसलमान की मॉब लिंचिंग नाम देने की पूरी कोशिश की। अब इस मुद्दे को संसद के चलते हुए भी बीजेपी के एक सांसद ने भी नहीं उठाया। तो ऐसे फिर ऐसे में इन 303 ऐसे लोगों की हिंदुओं के लिए कोई उपयोगिता बचती है? आप ये सोचकर देखो दिल्ली के भोगल की घटना में अगर लड़की मुसलमान होती और लड़का हिंदू होता तो क्या भारत का राजनीतिक वातावरण ऐसे ही शांत बना रहता? तब क्या मीडिया ऐसे ही एक सिरफिरे आशिक जैसे टाइटल से न्यूज़ चलाता? ये मैंने सिर्फ बात समझने के लिए एक मिसाल दी है, घटनाएं तो न जाने कितनी हो रही हैं, हो रही हैं। 5 साल में BJP बुरी तरह नाकाम रही है बड़े मुद्दों को उठाने में। हिदुओं को बदनाम करने की बात तो छोड़ो, BJP तो अपने मारे जा रहे कार्यकर्ताओं का मुद्दा भी नहीं उठा पा रही है। वहीं ममता ने हिंदुओं को बदनाम करने के लिए 49 बिकाऊ खरीद ही लिए। अब बात करते हैं मेरे जैसे साइबर सिपाहियों की, जिन्होंने कई बार हालात को पलटकर रख दिया है, वो भी बिना किसी आधिकारिक ताक़त के, याद है न क़ुरान बांटने वाला कोर्ट का फैसला, वो फैसला केवल सायबर वर्ल्ड पर चले आक्रामक अभियान की वजह से कोर्ट को मजबूर होकर वापस लेना पड़ा। क्या वजह है ? हमें मिलकर मंथन करने की जरूरत है। BJP प्रतिनिधियों को भी अहंकार के सातवें आसमान पर खुद को जाने से रोकना होगा।...


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ऋषिकेश/उत्तराखंड।
जब देश भर मे पुलिस के जनता से व्यवहार व कानून व्यवस्था को लेकर सवाल खघे किए जा रहे हैं और पुलिस सुधार के लिए बङे कदम उठाने की जरूरत की चर्चा जोरों पर है।इसी दौर मे उत्तराखंड पुलिस का एक अधिकारी जो अपने मानवीय व जागरूक ऐक्शन से हमेशा आधुनिक पुलिसिंग को चरित्रार्थ करता है,निश्चित ही नये भारत मे पुलिस सुधार कार्य को उसी दिशा मे ले जाना होगा।आइए खुद उसी अधिकारी की जबानी जानते हैं उनकी एक और बदलाव की कोशिश की... खोमचा पुलिस:- साथी हाथ बढ़ाना पिछले कई दिनों से मैं देख रहा था कि लक्ष्मण झूला क्षेत्र के घाटों के आसपास बहुत सा प्लास्टिक का कचरा, विशेषकर प्लास्टिक चटाई सीट, प्लास्टिक के कप, कटोरिया इत्यादि तथा स्नानार्थियों द्वारा स्नान के बाद जगह जगह पर गीले कपड़े के अंबार लगाए गए थे। इस क्रम में सबसे पहले मेरे द्वारा स्वयं सादे वस्त्र में प्लास्टिक सीट बेचने वाले दुकानदारों के अड्डों की तलाश की गई तथा 17 एवं 18 तारीख को लक्ष्मण झूला पुलिस के साथ उन प्लास्टिक सीटों को जप्त किया गया ।18 तारीख की रात जब मैं सादे वस्त्र और में एक खोमचे के पास चबूतरे पर चाय पी रहा था तो बातों बातों में ही मैंने बगल के दुकानदार से प्लास्टिक की पन्नी खरीदने की पेशकश की। पहले तो उसने बताया कि पुलिस की बड़ी सख्ती है, पुलिस बेचने नहीं दे रही पर थोड़ा लालच देने पर उसने ₹20 प्रति पन्नी के भाव से सौदा तय किया ।उसके साथ जाकर मैंने उसका अड्डा देखा। बाद में पुलिस भेज कर उसकी प्लास्टिक जब्त की माफी मांगने पर भविष्य में प्लास्टिक न बेचने की शर्त पर उसे छोड़ दिया गया। इस घटना से मुझे प्रतीत हुआ कि जब तक आम जनमानस को साथ नहीं लिया जाएगा तब तक इस कुप्रथा को खत्म नहीं किया जा सकता। इसी क्रम में दिनांक 19 जुलाई को 12:00 बजे गीता भवन घाट पर मैंने समस्त खोमचे वाले, स्थानीय जनप्रतिनिधियों,वार्ड मेम्बरान तथा नगर पंचायत अध्यक्ष के साथ एक मीटिंग की तथा उन्हें बताया की उनकी जीविका गंगा जी की कृपा से चल रही है अतः उनकी सामाजिक नैतिक और धार्मिक जिम्मेदारी है कि वे गंगा मैया को प्लास्टिक के प्रदूषण से दूर रखें तथा दूसरों को भी गंदगी फैलाने से रोकें। इसी क्रम में सबको निम्न शपथ दिलाई गई। 1- मैं ना तो प्लास्टिक का प्रदूषण फैलाऊंगा ना ही किसी अन्य को गंगा जी में प्लास्टिक की कोई वस्तु डालने दूंगा। 2- गंगा जी हमारी मां है अतः घाटों पर गंदगी नहीं होने देंगे, लोगों को कूड़ेदान का प्रयोग करने के लिए प्रेरित करेंगे और अपने दुकानों पर कूड़ेदान रखेंगे। 3- अपने क्षेत्र में किसी भी अवांछनीय वस्तु अथवा व्यक्ति की सूचना तत्काल पुलिस को देंगे। 4- आवश्यकता पड़ने पर हम लोग पुलिस के साथ खड़े रहेंगे तथा कानून व्यवस्था को बनाए रखने में सहयोग देंगे। इसके बाद सब के साथ घाटों के पड़े कूड़ो को इकट्ठा किया गया। आज दिन भर पूरे घाट पर स्वच्छता का माहौल रहा। आज रात को जब मैं सादे कपड़ों में घाटों के पास घूम रहा था ,तभी दो-तीन लड़के मेरे पास आए तथा अभिवादन कर मुझे बताया की सुबह के शपथ के समय वे शामिल थे तथा आज दिन भर उन लोगों ने वालंटियर के तौर पर सभी स्नान करने वालों को सफाई करने के लिए प्रेरित किया। जो लोग नहीं मान रहे थे उन्हें भारी जुर्माने का आगाह कराया। इसके बाद वे तीनों युवा मेरे साथ गलियों में गए तथा चोरी से प्लास्टिक की पन्नी बेचने वालों का अड्डा दिखाया जिसे बाद में स्थानीय पुलिस द्वारा जप्त किया गया। मुझे अपने इन नए पुलिस वालों पर गर्व है। लक्ष्मण झूला पुल बंद होने के कारण कांवड़ के समय एक बहुत बड़ी चुनौती पुलिस और प्रशासन के समक्ष उत्पन्न हो गई है ।सीमित बल के साथ कांवरियों को नए रास्ते पर भेजना बहुत बड़ी चुनौती है, परंतु आज इस रेहड़ी खोमचा चलाने वाले विशेष पुलिस अधिकारियों के जज्बे और उत्साह को देख कर मुझे पूरा विश्वास है यह मेला पहले से भी ज्यादा शांतिपूर्ण ,सुरक्षित , स्वच्छता युक्त और प्रदूषण मुक्त संपन्न होगा। जय हिंद, जय उत्तराखंड, जय हिंद की जनता।...


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नई दिल्ली।
कल लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण की समाप्ति पर सभी चैनलो ने अपने-2 सर्वे दिखाते हुए मोदी सरकार के वापसी के रूझानो को दर्शाया है। ऐसा लगता है कि मोदी सरकार के उज्ज्वला,इज्जतघर,और आवास तथा आयुष्मान व किसान सहायता योजना का जबरदस्त लाभ भाजपा को इन चुनावो मे होने जा रहा है। यह भी रूझानो के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा व राष्ट्रवाद का मुद्दा भी विपक्ष के अन्य सभी मुद्दो पर भारी पङा है।इसके चलते भाजपा रिकार्ड जीत की ओर अग्रसर हो रही है।और देश मे क्या अमीर व क्या गरीब,क्या शहर व क्या गांव सर्वत्र मोदी ब्रांड का डंका बजा है।लोगो को मोदी मे दृढ,विजनरी और ईमानदार नेता की छवि का विश्वास बढचढकर चुनावो के परिणामो को प्रभावित कर गया है।इसीलिए तो भाजपा समर्थको मे उत्फाह ही उत्साह है वे तो आज ही सरकार बनने को पक्का मान रहे है तथा कह रहे है कि मोदी है तो मुमकिन है। यदि वालतव मे तेईस मई को परिणाम ऐसे ही आते है तो साफ है कि देश ने मोदी को एक और पारी खेलने का पूरा मौका दिया है,लेकिन अपेक्षाए भी वैसी ही ऊंची होंगी।तो खरा उतरना भी बहुत आसान नही होगा।लेकिन फिर भी इतना तो साफ लगता है कि देश हिंदूवादी राष्ट्रवादी ताकतो के साथ खङा हो गया है और सबका साथ सबका विकास का नारा सुपरहिट साबित हुआ है।क्योकि बिना सभी वर्गो के समर्थन के भाजपा इतनी बङी भावी विजय के फाथ वेपसी नही कर सकती।बाकी आगे जो परिणाम आए।फिलहाल तो नमो नमो का दौर आगे बढता नजर आ रहा है।...


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लखनऊ।
(बृजनंदन) लखनऊ, 03 मई । उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर में चर्चित कांग्रेस के गढ़ रायबरेली संसदीय क्षेत्र में इस बार सोनिया गांधी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। चार लोकसभा चुनावों से लगातार इस सीट से अजेय रहीं सोनिया गांधी की डगर इस बार भाजपा उम्मीदवार दिनेश प्रताप सिंह से कड़ी चुनौती मिलने की वजह से मुश्किल लग रही है। गांधी परिवार के करीबी रहे दिनेश प्रताप सिंह ऐन चुनाव के वक्त कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गये थे। रायबरेली लोकसभा सीट पर अभी तक कुल 16 बार लोकसभा आम चुनाव और दो बार लोकसभा उपचुनाव हुए हैं। इनमें से 15 बार कांग्रेस को जीत मिली है, जबकि एक बार भारतीय लोकदल और दो बार यहां से भाजपा की जीत हो चुकी है। 2004 में सोनिया गांधी यहां से चुनाव जीतकर संसद पहुंचीं। तब से वह लगातार रायबरेली से जीतती आ रही हैं। इस सीट पर 2014 की मोदी लहर में भी बीजेपी का 'कमल' नहीं खिल सका था। उम्मीदवार लोकबंधु राजनारायण ने उन्हें 55 हजार 202 मतों से हराया था। इस हार के बाद इंदिरा गांधी ने फिर कभी रायबरेली से चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं जुटाई। यहां कभी नहीं खुला सपा-बसपा का खाता रायबरेली संसदीय सीट पर सपा-बसपा का कभी खाता नहीं खुल पाया है। सपा अक्सर यहां से अपना उम्मीदवार ही नहीं उतारती है। इस बार भी सपा-बसपा गठबंधन के बावजूद रायबरेली से उम्मीदवार नहीं उतारा गया है। रायबरेली में तीन चुनावों को छोड़कर हमेशा कांग्रेस उम्मीदवार की ही जीत हुई है। वह भी तब जब यहां से 'गांधी परिवार' के किसी सदस्य ने चुनाव नहीं लड़ा। सोनिया को हराना आसान नहीं कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता शुचि विश्वास श्रीवास्तव ने 'हिन्दुस्थान समाचार' से बातचीत में कहा कि मैं रायबरेली में ही प्रियंका गांधी के साथ हूं। सोनिया गांधी को यहां से हराना आसान नहीं है। रायबरेली और अमेठी दोनों सीट कांग्रेस भारी अंतर से जीत रही है। शुचि विश्वास ने कहा कि रायबरेली में शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा जैसे मुद्दों पर काफी काम हुआ है। यह सीट गांधी परिवार से जुड़ी होने के कारण जानबूझकर यहां 50 से अधिक विकास योजनाओं का कार्य रोका गया ताकि जनता को असुविधा हो। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता चन्द्र भूषण पाण्डेय ने कहा कि इस बार रायबरेली में सोनिया गांधी की हार तय है। रायबरेली की जनता ने इंदिरा गांधी को भी हराया था। इस बार सोनिया को भी हराने का मन रायबरेली की जनता बना चुकी है। कांग्रेस कार्यकर्ता विहीन हो चुकी है। कुछ मुट्टीभर चाटुकारों के सहारे चुनाव नहीं जीते जा सकते। कांग्रेस की कुटिल चालों का पर्दाफाश हो चुका है। अबकी बार जनता इनके बहकावे में नहीं आने वाली है।...


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