नई दिल्ली ।
आपातकाल के कैदी मेरे पिता के. विश्वदेव राव #Emergency उन दिनों (1976-77) दिल्ली की तिहाड़ जेल के वार्ड सत्रह में पिताजी नजरबन्द थे| जार्ज फर्नांडिस तथा 23 अन्य के साथ। सी.बी.आई. की चार्जशीट में लगी धाराओं के अनुसार उन्हें सजाये-मौत देने की मांग की गई थी। यह मेरे जन्म (22 मार्च 1978) के चन्द महीनों पहले का वृत्तांत है। अपने अग्रज सुदेव और दीदी विनीता तथा माँ सुधा से विवरण सुनता आया था। पुलिसिया आकलन में बड़ौदा डाइनामाईट केस के सभी अभियुक्तों का इन्दिरा गाँधी के सर्वाधिक खतरनाक शत्रुओं में शुमार था। हालांकि तमाम सच्चे झूठे प्रयासों के बावजूद सी.बी.आई. कोई प्रमाण नहीं जुटा पाई थी कि इन विद्रोहियों ने किसी प्रकार की प्राण-हानि पहुँचाई हो। बड़ौदा सेन्ट्रल जेल में पिताजी के साथ पाँच कैदी थे जिन्हें तन्हा कोठरी में बेड़ियों के साथ दो ताले लगाकर अलग-अलग बन्द किया जाता था। इन नब्बे वर्ग फिटवाली कोठरियों का निर्माण महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने 1876 में फांसी के सजायाफ्ता अपराधियों के लिए किया था। कुछ महीनों बाद इन कैदियों को बड़ौदा से दिल्ली के तिहाड़ जेल में ले जाया गया। वहाँ नौ राज्यों में गिरफ्तार किये गये डायनामाइट केस के अन्य अभियुक्तों को भी साथ रखा गया था। एक साहसी संवाददाता के नाते पिताजी ने अभिव्यक्ति की आज़ादी के दमन के विरूद्ध अभियान चलाया था। इंडियन फेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष (पुणे सम्मेलन, 1973 में) वे चुने गये थे। अतः प्रेस सेंसरशिप (25 जून 1975) लागू होते ही संघर्ष शुरू कर दिया था। फेडरेशन की राष्ट्रीय परिषद के बंगलूर अधिवेशन (फरवरी 1976) में इन्दिरा गाँधी शासन की तानाशाही की भर्त्सना वाला प्रस्ताव उन्होंने बहुमत से पारित कराया। इसके चन्द दिनों बाद ही (19 मार्च 1976) गुजरात पुलिस ने पिताजी को कैद कर लिया। और तभी अखबारी आज़ादी के अनन्य समर्थक टाइम्स ऑफ़ इंडिया के प्रधान संपादक शाम लाल तथा सम्पादक गिरिलाल जैन ने बड़ौदा जेल में पिताजी के निलम्बन का आदेश (अप्रैल 1976), फिर दिल्ली जेल में (अक्टूबर 1976) बरखास्तगी का आदेश भिजवा दिया। इतनी त्वरित गति से काम किया कि सत्ता पर सवार लोग प्रभावित हो गये थे। इस बीच हमारे परिवार पर क्या गुजरी यह दर्दभरी दास्तां है। मेरी माँ (डा. सुधा) का बड़ौदा मंडलीय रेलवे अस्पताल से पाकिस्तान के सीमावर्ती गाँधीधाम (कच्छ) रेगिस्तानी इलाके में तबादला कर दिया गया। वे राजपत्रित रेल अधिकारी थीं। परिवार बिखर गया। पिताजी ने जेल से ही स्वाधीनता सेनानी और संपादक रहे रेलमंत्री पंडित कमलापति त्रिपाठी को विरोध-पत्र लिखा कि अंग्रेजों ने भी कभी किसी स्वाद्दीनता सेनानी के परिवार को तंग नहीं किया, तो फिर कांग्रेस सरकार की ऐसी अमानवीय नीति क्यों? आखिर स्वयं त्रिपाठी जी तथा मेरे दादाजी (नेहरू के नेशनल हेरल्ड के संस्थापक-सम्पादक) स्व. के. रामा राव भी (1942) में जेल गये थे। उनके परिवार को ब्रिटिश राज ने कभी परेशान नहीं किया था। इस पर रेल मंत्री ने दिल्ली के एक पत्रकार-प्रतिनिधि मंडल से कहा कि वे असहाय थे। “ऊपर से आदेश आया था|” इतना सब होने के कुछ दिन पूर्व ही अचानक बड़ौदा के समाचारपत्रों में खबर छपी कि कर्नाटक पुलिस और सी.बी.आई पिताजी को सान्ताक्रूज (मुम्बई) थाने में, फिर बंगलूर की हिरासत में ले गई है। माँ ने सी.बी.आई. अधिकारियों से विरोध व्यक्त किया कि बिना परिवार को सूचित किये बड़ौदा जेल में न्यायिक हिरासत से बाहर पिताजी को कैसे ले गये? इस पर पुलिस का जवाब था, “सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायमूर्ति ए. एन. राय के निर्णय के अनुसार इमर्जेंसी में सरकार को किसी भी नागरिक की जान लेने का भी अधिकार है। इसके खिलाफ कहीं भी सुनवाई नहीं हो सकती है|” बंगलूर (मल्लीश्वरम्) पुलिस हिरासत में ठण्डी फर्श पर सुलाना, बिना कुर्सी दिये घंटों खड़ा रख कर सवाल-जवाब करना, रात को तेज रोशनी चेहरे पर डालकर जगाये रखना, इसपर भी कुछ न बताने पर हेलिकाप्टर (पंखे से लटकाना) बनाना आदि यातनायें दीं गईं। बडौदा के मुख्य दण्डाधिकारी और जिला जज ने जमानत की याचिका खारिज कर दी। बाद में पिताजी की अपील सुनकर गुजरात हाई कोर्ट ने जमानत पर रिहाई का आदेश दे दिया। तभी इन्दिरा गाँधी सरकार ने उन पर मीसा (आन्तरिक सुरक्षा कानून) के तहत नजरबन्दी का आदेश लागू कर दिया। तब तक कानून था कि यदि पुलिस साठ दिन में चार्जशीट नहीं दायर कर सकी तो जमानत अपने आप मिल जाती थी। इस प्रावधान को कांग्रेस सरकार ने संशोधित कर एक सौ बीस दिन कर दिया। इसके अलावा यह भी कानून बना दिया गया कि पुलिस के समक्ष दिया गया बयान भी सबूत माना जायेगा। अर्थात जबरन लिया गया वक्तव्य भी वैध बना दिया गया जो गुलाम भारत में भी नहीं था। जब जमानत मिलने पर भी जेल के अन्दर ही पिताजी को दुबारा गिरफ्तार कर दिल्ली रवाना कर दिया गया तो ये सारे अमानविक तथा अवैध संशोधन अपनी तीव्रता खो चुके थे। तब एक चुटकुला चल निकला था कि मीसा के मायने हैं मेइंटिनेन्स ऑफ़ इन्दिरा एण्ड संजय (इन्टर्नल सेक्युरिटि) एक्ट है। अन्याय की पराकाष्ठा तो तब हुई जब पिताजी के वकील को भी जेल में निरुद्ध कर दिया गया था। बड़ौदा जेल में पिताजी के साथ यादगार घटनायें हुई। माओ जेडोंग का निधन (9 सितम्बर 1976) हो गया था तो पिताजी ने अपने वार्ड में शोकसभा रखी। सभी कैदी शामिल हुए| जिसे श्री बाबूभाई जशभाई पटेल, जो 1977 में जनता पार्टी के मुख्य मंत्री बने, जनसंघ विधायक चिमनभाई शुक्ल जो राजकोट से लोकसभा में आये, सर्वोदयी प्रभुदास पटवारी जो 1977 में तमिलनाडु के राज्यपाल नियुक्त हुए, आदि ने संबोधित किया। सबने वन्दे मातरम भी गाया तो संगठन कांग्रेसियों ने केवल पहला छन्द ही गाया क्योंकि अगले में मूर्तिपूजा का भास था, जिस पर कुछ मुसलमान आपत्ति करते आये है। इस पर जनसंघ विधायक चिमनभाई शुक्ल ने आलोचना की कि इन कांग्रेसियों ने पहले भारत को बांटा और अब वन्दे मातरम को भी काट रहे हैं। बड़ौदा जेल में पिताजी को भोजन की कठिनाई तो होती थी क्योंकि वे प्याज-लहसुन तक का परहेज करते है। नाश्ते में उन्हें गुड़ और भुना चना मिलता था| जिसे वे चींटियों और चिड़ियों को खिला देते थें। लेकिन सबसे कष्टदायक बात थी कि पत्रकार को समाचारपत्र नही मिलते थे। पिताजी की दशा बिन पानी की मछली जैसी थी। मगर यह दुःख शीघ्र दूर हो गया जब एक युवक रोज पिताजी के लिए अखबारों का बण्डल पहुँचाता था| जिसे तरस खाकर जेलर साहब पिताजी के बैरक में पहुँचा देते थे। वह युवक था नरेन्द्र दामोदरदास मोदी, अधुना गुजरात के मुख्य मंत्री (आज भारत के प्रधानमंत्री)। उनकी कैद के प्रथम दिन से ही पिताजी की प्रतिरोधात्मक संकल्प शक्ति को तोड़ने की साजिश सी.बी.आई. रचती रही थी। आला पुलिस हाकिमों ने केन्द्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर पिताजी को जार्ज फर्नांडिस के विरूद्ध वादामाफ गवाह (एप्रूवर) बनाने का सतत यत्न किया था। एक दिन तो उनलोगों ने पिताजी को अल्टिमेटम दे डाला कि यदि वे सरकारी गवाह नही बनेंगे तो उनकी पत्नी (मेरी माँ) को भी सहअपराद्दी बनाकर बड़ौदा जेल में ले आयेंगे। पिताजी ने बाद में हम सबको बताया कि सी.बी.आई. की धमकी से वे हिल गये थे। तब मेरी बहन विनीता चार वर्ष की और भाई सुदेव तीन वर्ष के थे। दूसरे शनिवार को माँ बड़ौदा जेल भेंट करने आईं। उनसे पिताजी ने पूछा। माँ ने बेहिचक कहा कि, “जेल में खाना पकाऊँगी। यहीं रहेंगे। पर साथी (जार्ज फर्नांडिस) से गद्दारी नही करेंगे|” अगले दिन सी.बी.आई वाले जानने आये। पिताजी का जवाब तीन ही शब्दों में था, “लड़ेंगे. झुकेंगे नहीं”। फिर यातनाओं का सिलसिला ज्यादा लम्बाया। कैदी के रूप में पिताजी तथा उनके साथियों से बड़े अपमानजनक तरीके से बर्ताव किया गया था, खासकर जब उन्हें अदालत ले जाया जाता था। हथकड़ी और मोटी रस्सी से बांध कर आठ-आठ सिपाही लोग बख्तरबन्द गाड़ी में जेल से कोर्ट और वापस ले जाते थें। सैकड़ों सशस्त्र पुलिसवाले उनकी गाड़ी के आगे पीछे चलते थे। पिताजी की कलाई के साथ स्व. वीरेन जे. शाह को भी बाँधा जाता था। इस पर पिताजी ने व्यंग किया कि इन्दिरा गाँद्दी ने असली समाजवाद ला दिया है। श्री वीरेन शाह अरबपति, उद्योगपति (मकुन्द आयरन एण्ड स्टील के मालिक), भारतीय जनसंघ के सांसद और बाद में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल बने। अर्थात श्रमजीवी पत्रकार मेरे पिता तथा पूंजीपति वीरेन शाह का संग! सी.बी.आई. ने जब तीस हजारी कोर्ट (दिल्ली) के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्टेªट मोहम्मद शमीम (बाद में दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति तथा अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष) के सामने अभियुक्तों को पेश किया तो जार्ज फर्नांडिस ने एक लिखित बयान पढ़ा। उसमें एक वाक्य था, “हम सब लोगों की कलाइयों पर बंधी ये हथकड़ियाँ वस्तुतः भारत राष्ट्र पर लगी जंजीरें है”। ठीक उसी वक्त पिताजी और अन्य ने बाँहें उठा हथकड़ियाँ झनझनायी। इसे बी.बी.सी. के संवाददाता मार्क टल्ली ने विस्तार से प्रसारित किया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों का दस्ता कोर्ट आकर उनका “लाल सलाम” के नारे से अभिवादन करता था। तीस हजारी कोर्ट में अभियुक्तों से भेंट करने आने वालों में मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेई, मधु लिमये, राजनारायण, चन्द्रशेखर, भाकपा के ज्योतिर्मय बसु आदि थे। उसी दौर में बडौदा डायनामाइट केस के अभियुक्तों के बचाव में एक सलाहकार समिति गठित हुई थी। इसके अध्यक्ष थे वयोवृद्ध गाँधीवादी अस्सी-वर्षीय आचार्य जीवतराम भगवानदास कृपलानी। चन्द्रभानु गुप्त कोशाध्यक्ष थे। अन्य सदस्य थे न्यायमूर्ति वी.एम. तारकुण्डे, सोली सोराबजी, अशोक देसाई आदि लब्धप्रतिष्ठित विधि विशेषज्ञ। एक युवा वकील दम्पति भी थे - स्वराज कौशल तथा सुषमा स्वराज अचानक एक रात (18 जनवरी 1977) आकाशवाणी पर प्रधानमंत्री की घोषणा हुई कि मार्च में छठी लोकसभा का चुनाव आयोजित होगा। मीसा बन्दी सब रिहा हो गये। मगर डायनामाइट केस के सभी 25 अभियुक्त जेल में ही रहे। पिताजी बताते हैं कि तिहाड़ जेल में कैद जनसंघ के सुंदर सिंह भण्डारी (बाद में बिहार और गुजरात के राज्यपाल) ने बताया था कि ये सारे मीसाबन्दी रिटर्न टिकट लेकर जेल के बाहर जा रहे हैं। चुनाव के बाद वे सब फिर कैद कर लिये जायेंगे। भण्डारी जी का कथन था कि “डायनामाइट केस के आप कैदी तो तभी रिहा होंगे जब इन्दिरा गाँधी खुद चुनाव हार जायें|” मार्च के प्रथम सप्ताह (9 मार्च, मेरे दादाजी की सोलहवीं पुण्यतिथि पर) मेरी माँ दोनों बच्चों (मेरी पाँच-वर्षीया दीदी और चार-वर्षीय भाई) के साथ पिताजी से भेंट करने गाँधीधाम से दिल्ली तिहाड़ जेल गईं। रूंधे गले से माँ ने पिताजी को बताया कि शायद यह आखिरी मुलाकात है क्योंकि इन्दिरा गाँधी चुनाव जीत रहीं हैं और फिर जार्ज फर्नांडिस तथा पिताजी को फाँसी हो जाएगी। ये दोनों व्यक्ति नम्बर एक और दो पर नामित अभियुक्त थे। पिताजी हँसे और बोले कि कांग्रेस का सूपड़ा हिन्दी-भाषी प्रदेशों में साफ हो रहा है। राज नारायण जी रायबरेली से जीतने जा रहे हैं। जनता पार्टी की सरकार बनेगी। जेल के भीतर पिताजी को लोकमानस की सही सूचना थी बजाय बाहर रहकर माँ को, क्योंकि मीडिया पर सेंसर चालू था। फिर चुनाव परिणाम आये। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। उनकी काबीना का प्रथम निर्णय था कि बड़ौदा डायनामाइट केस वापस ले लिया जाय। इसमें गृहमंत्री चरण सिंह, वित्त मंत्री एच.एम. पटेल, कानून मंत्री शान्ति भूषण तथा विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अहम भूमिका थी। केस वापस हुआ और जार्ज फर्नांडिस ने मंत्री पद की शपथ ली। सभी लोग (22 मार्च 1977 को) तिहाड़ जेल से रिहा कर दिये गये। मगर किस्सा अभी बाकी था। कांग्रेस पार्टी के सांसदों और वकीलों ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की कि मोरारजी देसाई काबीना का निर्णय अवैध करार दिया जाय और सार्वजनिक एवं राष्ट्रहित में डायनामाईट केस दुबारा चलाया जाय। हाईकोर्ट द्वारा इसे खारिज कर देने पर इन कांग्रेसी वकीलों ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दर्ज की। न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर तथा न्यायमूर्ति चेन्नप्पा रेड्डि की खण्ड पीठ ने सुनवाई की। बचाव के वकील थे जनता पार्टी के सांसद और वकील राम जेठमलानी। उनका तर्क था कि यदि इन्दिरा गाँद्दी, जो तब तक सत्ता पर लौट आई थीं, चाहें तो मुकदमा स्वयं खुलवा सकती हैं। अतः सर्वोच्च न्यायालय क्यों हस्तक्षेप करें| जजों की पीठ ने कांग्रेसी अपील खारिज कर दी। इमर्जेंसी की भूल के लिए जनता से बारम्बार क्षमा याचना करने वाली इन्दिरा गाँधी दुबारा हिम्मत नहीं जुटा सकी कि डायनामाइट केस खोल दें। अन्ततः पिताजी और सभी साथी मुक्त रहे। फिर टाइम्स ऑफ़ इण्डिया प्रबंधन ने पिताजी को लखनऊ ब्यूरो प्रमुख बनाकर (फरवरी 1978) मेरे जन्म के एक माह पूर्व) नियुक्त किया। मगर इसमें भी मोरारजी देसाई को हस्तक्षेप करना पड़ा। जनता पार्टी काबीना का महत्वपूर्ण निर्णय था कि जो भी लोग इम्मेर्जेंसी का विरोध करने पर बर्खास्त हुये हैं उन्हें बकाया वेतन के साथ पुनर्नियुक्त कर दिया जाय। प्रधानमंत्री ने टाइम्स ऑफ़ इण्डिया के चेयरमैन अशोक जैन को खुद आदेश दिया कि काबीना के इस निर्णय के तहत पिताजी को सवेतन वापस लिया जाय। अतः टाइम्स ऑफ़ इण्डिया जो आम तौर पर भारत के श्रम कानून की खिल्ली उड़ाता रहता है, को मानना पड़ा। वह केन्द्रीय सरकार के निर्णय की अवहेलना करने से सहमा। और तब पिताजी लखनऊ में संवाददाता के रूप में कार्यरत हो गये (फरवरी 1978)। हमारें परिवार की यह गाथा है। ...


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नई दिल्ली / नेपाल/ चीन।
भारत का अंध विरोध नेपाल को गृहयुद्ध में धकेल सकता है बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसा बनने की आशंका -आलेख : रवीन्द्र वाजपेयी बीते कुछ समय से नेपाल के भारत विरोधी आक्रामक रवैये के कारण मोदी सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठ रहे हैं | राजनीति को कुछ देर के लिए अलग रखकर देखें तो भी आम हिन्दुस्तानी को आश्चर्यमिश्रित चिंता सताने लगी | गलवान घाटी में उत्पन्न तनाव के दौरान जब भारत और चीन के बीच युद्ध की संभावनाएं चरम पर थीं तब चीन के सरकारी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने ये चेतावनी दी कि भारत को एक साथ तीन मोर्चों पर लड़ना पड़ेगा | उसका आशय ये था चीन के साथ - साथ पाकिस्तान और नेपाल भी भारत के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई कर देंगे | नेपाल सरकार की और से भी कुछ ऐसे बयान आये जो चौंकाने वाले थे क्योंकि उसमें इतनी ताकत नहीं है कि वह भारत से दो - दो हाथ करने की सोच भी सके | इसीलिये जब भारत के थलसेनाध्यक्ष ने ये कहा कि नेपाल की ऐंठ के पीछे किसी और का हाथ है तो नेपाल सरकार ने फौरन सफाई देते हुए डींग हांकी कि वह अपने बलबूते भारत से उन सीमावर्ती इलाकों को वापिस ले ले लेगा जो उसके अनुसार भारत के कब्जे में हैं | हाल ही में उसने अपना नक्शा संशोधित करते हुए संसद से पारित भी करवा लिया | उसके बाद उसकी संसद ने नागरिकता कानून में बदलाव करते हुए नेपाली पुरुष द्वारा विदेशी महिला से विवाह करने पर पत्नी को सात साल तक नागरिकता और राजनीतिक अधिकार नहीं देने का प्रावधान कर दिया | वैसे इसमें अटपटा कुछ भी नहीं था | लेकिन नया नक्शा पारित करने के तत्काल बाद विदेशी पत्नी की नागरिकता की अवधि का निर्धारण भारत विरोधी रणनीति का ही हिस्सा है | दरअसल नेपाल और भारत की सीमा पर स्थित तराई का हिस्सा मैदानी है | इसे कभी मध्यदेश कहा जाता था जो धीरे - धीरे बोलचाल की भाषा में मधेश कहलाने लगा | यहाँ रहने वाले मूलतः बिहार और उप्र से सैकड़ों वर्ष पूर्व इस इलाके में जा बसे लोगों के वंशज हैं | आज की स्थिति में ये कानूनी तौर पर तो नेपाल के नागरिक हैं लेकिन चेहरे - मोहरे से लेकर इनका बाकी सब भारतीय है | दोनों देशों के बीच रोटी और बेटी के जिन संबंधों की दुहाई दी जाती है उसका असल आधार यही मधेशी है जो सामाजिक और पारिवारिक तौर पर बिहार और पूर्वी उप्र से निकटता से जुड़े हुए है | चूंकि दोनों देशों के नागरिकों के लिए आवाजाही पूरी तरह से स्वतंत्र रही है इसलिए मधेश कहलाने वाले इन लोगों को भारत में संबंध रखने और उनका निर्वहन करने में कोई परेशानी नहीं हुई | परन्तु नेपाल में इन्हें पहाड़ी क्षेत्रों की तुलना में उपेक्षा का शिकार होना पड़ता रहा है | सरकारी नौकरियों से लेकर तो नेपाल की संसद में आबादी के अनुपात में इनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है | विकास सम्बन्धी असमानता के अलावा मधेशी लोगों को पीड़ा है कि उनको नेपाल के मूल निवासियों की तुलना में दोयम दर्जे का माना जाता है | इन सब समस्याओं को लेकर 2015 - 16 में मधेशी आन्दोलन काफी उग्र हो चला | पुलिस द्वारा कुछ आन्दोलनकारियों की हत्या के बाद जब भारत ने नेपाल सरकार से उनकी मांगों पर विचार करने कहा तो उसने इसे उसके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप मानकर ऐतराज जताया | नेपाल की 275 सदस्यों वाली संसद में कुल 33 मदेशी सदस्य हैं | तराई के कुल 22 जिलों में रहने वाले 1 करोड़ मधेशियों में से 56 लाख की नागरिकता अटकाकर रखी हुई है | मधेशियों के साथ सबसे बड़ा भेदभाव ये है कि पहाड़ों पर हर संसदीय सीट पर जहां 10 हजार से कम की आबादी है वहीं मधेशी बहुल तराई के जिलों में एक निर्वाचन क्षेत्र में 70 हजार से 1 लाख तक जनसंख्या रहती है | मधेशियों को कहना है ऐसा होने से संसद में उनकी आवाज दबाने में पहाड़ के लोगों को सहूलियत होती है | जब पिछली बार आन्दोलन उग्र हुआ और मधेशियों ने नेपाल से सटी सीमा पर नाकेबंदी कर दी जिससे नेपाल को जरूरी चीजों की आपूर्ति रुक गई | तब वहां की वामपंथी सरकार को मदद करने चीन आगे आया लेकिन उसकी सहायता से नेपाल का काम नहीं चला और अंततः नेपाल ने भारत से अनुनय विनय कर सीमा खुलवाई | सीमा तो खुल गई लेकिन रिश्तों में खटास नहीं मिटी | हालांकि नेपाल पर आये किसी भी संकट में भारत ने बड़े भाई की तरह उसकी मदद की किन्तु वामपंथी प्रभाव वाली सरकार ने चीन की तरफ झुकाव बढ़ाया और आखिर बात यहाँ तक आ गई कि नेपाल भारत से दो - दो हाथ करने की हिम्मत दिखाने लगा | हालांकि संशोधित नक्शे के अलावा नए नागरिकता कानून को लेकर नेपाल में न सिर्फ मधेशियों वाले तराई अपितु पहाड़ी हिस्सों में भी सरकार विरोधी प्रदर्शन हुए हैं | नेपाल में वामपंथ के बढ़ते शिकंजे के बाद से समाज का एक तबका तो चीन के प्रभाव में आकर भारत विरोधी रंग में रंग गया है लेकिन अभी भी एक वर्ग ऐसा है जो ये मानकर चल रहा है कि चीन के हाथों खेलना देश की संप्रभुता के लिए खतरा बन सकता है और भारत के साथ पुश्तैनी ताल्लुकातों को दुश्मनी में बदलना नेपाल को अराजकता की खाई में धकेल सकता है | लेकिन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली पूरी तरह चीन के दबाव और प्रभाव में हैं | रोचक बात ये है कि नेपाल में राजतन्त्र के विरुद्ध हुए लम्बे माओवादी आन्दोलन के प्रमुख चेहरे रहे पुष्पदहल कमल प्रचंड जो पहले माओवादी सरकार के प्रधानमंत्री भी बने, मौजूदा प्रधानमन्त्री ओली से नाराज रहे हैं | लेकिन चीन उन्हें सरकार गिराने से रोक लेता है | हाल के महीनों में ओली सरकार खतरे में आ गई थी लेकिन भारत विरोध ने उन्हें अभयदान दे दिया | यद्यपि प्रचंड भी चीन के पिट्ठू हैं लेकिन वे ओली द्वारा उठाये गये हालिया कदमों से असहमत बताये जाते हैं | इस बीच नेपाल के वरिष्ठ पत्रकारों और समाचार पत्रों ने भी ओली सरकार द्वारा उत्पन्न नक्शा विवाद और मधेशियों की भारतीय नवविवाहिता भारतीय पत्नी को सात साल तक नागरिकता नहीं देने जैसे निर्णयों को घातक बताते हुए चेताया है कि भारत के साथ सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रिश्तों को खराब कर लेना नेपाल के भविष्य के लिए अच्छा नहीं होगा | चीन द्वारा नेपाल में जिस तेजी से अपनी पकड़ मजबूत की जा रही है तथा वह विकास परियोजनाओं के नाम पर देश भर में फ़ैल गया है उसे लेकर नेपाल के एक बड़े वर्ग में बेचैनी है | चीन विरोधी प्रदर्शन भी होने लगे हैं | ताजा रिपोर्ट के अनुसार चीन ने नेपाल के कुछ गाँवों पर अपना दावा ठोंककर विस्तारवादी नीति का अग्रिम परिचय दे दिया है | आर्थिक सहायता के एवज में वह नेपाल के शासन - प्रशासन में हस्तक्षेप भी करने लगा है | इससे वहां का भारत विरोधी वर्ग भी सनाके में है | उसे लग रहा है कि भारत ने कभी भी नेपाल में इस तरह की दखलंदाजी नहीं की | ये सब देखते हुए ये आशंका बढ़ रही है कि नेपाल गृहयुद्ध की आग में न जलने लगे | मधेशियों को लगने लगा है कि माओवादी सत्ता आने के बाद बना नया संविधान उनके अधिकारों का हनन है और माओवादी सरकार चीन की शह पाकर उनका दमन करने पर आमादा है | ऐसी स्थितियों में बड़ी बात नहीं अगर एक बार फिर 2015 जैसी स्थितियां बन जाएँ और नाकेबंदी की नौबत आ जाए | लेकिन अब यदि वैसा हुआ तब भारत को भी नेपाल में हस्तक्षेप करने मजबूर होना पड़ेगा क्योंकि चीन की कूटरचना मधेशियों को परेशान करते हुए उन्हें भारत जाने के लिए मजबूर करने की होगी | और तब शरणार्थी समस्या से बचने के लिए भारत को बांग्लादेश जैसी कार्रवाई करनी पड़ सकती है | घटना चक्र जिस तरह घूम रहा है उससे लगता है नेपाल ने चीन की चाल में फंसकर भारत रूपी शेर की पूंछ पर पैर रख दिया है | यदि उसके भीतर चल रहा सत्ता संघर्ष और मधेशियों के बीच पनप रहा असंतोष और बढ़ा तब नेपाल में पाकिस्तान जैसी स्थिति भी बन सकती है | जो बलूचिस्तान के साथ ही गिलगित और बालतिस्तान में हो रहे जनांदोलनों को जितना दबाता है वे उतने ही उग्र हो रहे हैं | चीन नेपाल को दूसरा तिब्बत बनाने के मास्टर प्लान पर आगे बढ़ रहा है जिससे वह भारत के प्रवेश द्वार पर आकर बैठ सके | लेकिन उसके पहले नेपाल या तो बांगलादेश जैसे हश्र की ओर बढ़ेगा या फिर अफगानिस्तान की तरह लम्बे गृहयुद्ध की आग में झुलसने मजबूर होगा | भारत के लिए नेपाल की अस्थिरता चिंताजनक होगी लेकिन ये भी सही है कि मधेशियों के रूप में उसके पास एक ढाल भी है | उल्लेखनीय है तराई का ये इलाका ब्रिटिश हुकूमत के पास ही था लेकिन 1857 के भारतीय सैन्य विद्रोह के दमन में गोरखाओं से मिली मदद से खुश होकर अंग्रेजों ने वह इलाका नेपाल को दे दिया गया | हो सकता है समय का पहिया पीछे घूमने वाला हो |...


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नई दिल्ली/भारत।
अक्सर आपने लोगों को कहते सुना होगा। “सच को आंच नहीं” !भारतवर्ष में सालों से जो झूठ मडा गया। भारतीयों को Arya (आर्य) और द्रविड़ की झूठी कहानियां बता कर उन्हें सत्य से भ्रमित रखा गया। आज तक भारत में सभी ने एक ही बात किताबों में पड़ी और एक ही बात किताबों में सुनी। Arya बाहर से आये थे। उन्होंने भारत के मूलनिवासियों पर हमला किया और यही बस गए। यही नहीं फैलाया तो यह भी गया कि आर्यो ने मूलनिवासियों को अपना हज़ारों सालों से दास बना कर रखा। भारत का इतिहास दोबारा लिखा जायेगा ? भारत का अब इतिहास बदलने जा रहा है। अब भारत के इतिहास को दोबारा से लिखने की आवश्यकता है। सन 2015 में अरमेन्द्र नाथ के निर्देशन में खुदाई हुई थी। हरियाणा राज्य के राखीगढ़ी के अंदर एक नरकंकाल मिला था। नर कंकाल एक खेत के अंदर खुदाई करते समय मिला था। यह नर कंकाल लगभग 2500 BCE पुराना बताया जा रहा है। यानी आज से 4500 वर्ष पुराना है। हज़ार से ज़्यादा लेब में भेजा गया सैंपल यह नर कंकाल जो पुरातत्त्व विशेषज्ञ को मिला था, वो किसी स्री का कंकाल था। जब पुरातत्त्व विशेषज्ञों ने इसपर लगातार शोध किया और इसके डीएनए सैंपल को दुनिया भर की 1000+ लिबोरिटी में भेजा गया डीएनए जाँच के हेतु। लगभग तीन सालों तक चले इस शोध और डीएनए रिपोर्ट से यह सामने निकलकर आया। उस प्राप्त नरकंकाल का डीएनए, प्राचीन आर्यन डीएनए रिपोर्ट से मेल नहीं खाता है। खुदाई से प्राप्त नरकंकाल में भारतीय जीन मौजूद है। नाकि प्राचीन Arya जीन। 10,000 सालों से भारतीयों का एक ही जीन 10,000- 12,000 सालों से भारतीय लोगो का मूलभूत एक ही जीन है। वो बात अलग है भारत में विदेशियों के आते रहने की वजह से जीन में कुछ बदलाव ज़रूर आये है, किन्तु जीन का आंकलन मूलभूत जीन से ही किया जाता है। इसके अलावा 120 सैंपल लिए गए। हर एक सैंपल को 1000+ लैब में भेजा गया। 2,65,000 मार्कअप मिला जिसमे पाया गया समय-समय पर जीन में मिलावट हुई। इस मिलावट की मात्रा कम है। लेकिन भारतीयों का मूलभूत जीन एक ही पाया गया है। भारत में बहुत ज़्यादा डाइवर्सिटी थी। जो की यूरोप, अमेरिका, साउथ अफ्रीका से भी ज़्यादा है। भारत में Arya (आर्य) कभी आये ही नहीं इस रिपोर्ट के बाद एक और बड़ा खुलासा हो गया है कि, अफगानिस्तान से लेकर अंडमान निकोबार तक सबका जीन एक ही है। कोई Arya (आर्य) नहीं है कोई द्रविड़ नहीं है और ना ही कोई आदिवासी है। इन सभी का जीन एक ही है। द्रविड़ ही आर्य है और आर्य ही द्रविड़ है। यानी कि, भारत पर आज से 2500 BCE पहले किसी ने हमला नहीं किया था और उस वक़्त तक कोई भी भारत नहीं आया था। नरकंकाल पर किसी भी तरह के चोट के निशान नहीं है। पुरातत्त्व विशेषज्ञों का मानना है, इस स्त्री की मौत बाढ़ की वजह से हुई होगी। पुरातत्व विशेषज्ञ बसंत शिंदे ने कहा है अध्ययन के लिए जेनेटिक डाटा और पुरातात्विक डाटा को मिलकर अध्ययन किया गया है। – भारत के लोगो ने खुद ही खेती करना, शिकार करना एवं पशुपालन करना सीखा था। साथ ही भारत के लोगो ने अपनी सभ्यता को खुद ही विकसित किया है। भारत में बाहर से आकर भारतीयों को किसी ने कुछ नहीं सिखाया। प्राचीन भारत के विषय में कहा गया कि, भारत में लोग ईस्ट, वेस्ट एवं नार्थ एशिया से आकर भारत में बस गए थे और उन्ही लोगो ने उन्नत सभ्यता का विकास किया जो कि गलत है। जीवन के शुरुआत से लेकर पहले शहरी निर्माण तक की उन्नति व विकास भारतीयों ने खुद किया है। जीवन जीने के बेहतरीन तरीके की खोज भारतीयों की देन है ना कि विदेशियों की। साउथ एशिया का भारतीय समूह पूरी तरह से स्वतंत्र था। यह किसी भी देश के लोगो पर निर्भर नहीं था। इन्होने 7000 BCE से लेकर उन्नत हड़प्पन सभ्यता तक तरक्की की। भारत में बाहर से कोई आता तो अपनी सभ्यता और कल्चर लेकर साथ में ज़रूर आता जैसा की अक्सर होता रहा है। लेकिन भारतीय कल्चर सभ्यता में बाहरी प्रभाव देखने को नहीं मिलता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया पुरातत्व विशेषज्ञ मानते है, प्राचीन भारत में पहले लोग नक्शा बनाते थे, नक़्शे के अनुसार ही शहर बसाते थे। नक़्शे में बनाई गयी गलिया हवा के समान्तर और सटीक होती थी। आज के समय में बिना जीपीएस सिस्टम उपयोग किये ऐसी सटीक गलिया नहीं बनाई जा सकती है । माना जा रहा है राखीगढ़ी के नीचे पूरा का पूरा शहर होने की सम्भावना है। खुदाई के दौरान मिले सामान कई नरकंकाल के अलावा भी खुदाई में प्राचीन भारत की सभ्यता के बहुत सारे सामान मिले है। जो आज के समय में लोगो को अचंभित करके रख देंगे। रॉक और पिल्लर, पाल्म लीव्स, प्लेट्स, पत्थरो की दीवारे, मिट्टी की टेबल, हथियार, पॉटरीज,गहने, मूर्ति, प्राचीन पेंटिंग इत्यादि। नुकिले हथियार, तलवार एवं पुराने ज़माने के पत्थर इत्यादि। खुदाई के दौरान मिटटी के बर्तन, मिटटी के पॉट भी मिले जिसको बजने पर मेटल के बर्तनो जैसी ध्वनि सुनाई देती है। राखीगढ़ी में खुदाई करते समय आगी जलने वाले भट्टे भी मिले है जो अत्याधुनिक है। ऐसे भट्टे भारत में आज तक कभी नहीं देखे गए। इन्ही भट्टों पर मिटटी को तपाकर इतने शानदार मजबूत बर्तन बनाये जाते थे। जिनसे मेटल के बर्तनो जैसी आवाज़े आती थी। यह भट्टे बहुत ही आधुनिक थे, उसके अंदर चैम्बर बने हुए है, अलग अलग चैम्बर में अलग-अलग तापमान पर बर्तन पकाते थे। जिससे मिटटी के बर्तनो को सही आकार एवं मजबूती मिलती थी। इन भट्टियों को नाम दिया है प्रिस्कत भट्टी। अन्टोलॉजिस्ट केनेज़िंड ने बताया की अभी तक जितने भी भारत में कंकाल मिले है, और जो अभी के सारे भारतीय है उनके जीन में कोई फर्क नहीं है। अब सोचने वाली बात यह है कि, ऐसी बातें समाज में बिना सबूत और आधार के क्यों फैलाई गयी। आर्य बाहर से आये थे। ऐसा करने के पीछे कारण क्या रहा होगा ? कई सालों से भारत में जो नफरत का बीज बोया गया था। उसकी फसल का फायदा अंग्रेजो से लेकर भारत के नेताओं एवं बुद्धिजीवियों ने खूब उठाया। इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने पर बहुत लोगो की रोजी रोटी आने वाले समय में बंद हो जायेगी। आईये हम विस्तार से इसके बारे में बताते है फ़्रिएद्रिच मैक्स मुल्लर का जन्म जर्मनी में हुआ था, बाद में इंग्लैंड जा बसे। ऑक्सफ़ोर्ड में इंग्लिश भाषा के स्कॉलर होने की वजह से उन्होंने 1884 में आर्यन शब्द की एक थ्योरी दी। जिसमे उन्होंने आर्यन वंश, भाषा, और आर्यन रेस के बारे में बताया। उनकी इस बात पर पहले जर्मन ने फिर अंग्रेजो ने भी हवा देना शुरू कर दिया। यही सब बातें भारत में भी फैलाई गयी बिना सत्य जाने कि, किन सबूतों के आधार पर उन्होंने ऐसी विचार धारा फैलाई। सबसे मजेदार बात इसमें यह थी कि, एक अंग्रेजी भाषा के स्कॉलर ने इतिहास के बारे में इतना सब कहा कैसे ? यानी रोमांटिक नॉवेल लिखने वाला इतना ज्ञान दे गया। लेखकों की कल्पना शक्ति भी कमाल की होती है न ? यानी हम ऑक्सफ़ोर्ड से इंग्लिश पढ़ेंगे तो, शायद हम भी इतिहास के फिलोस्पर हो जाएंगे और शायद लोग हमे भी परमज्ञानी मान ले क्योंकि कभी कभी काल्पनिक बातें भी सच लगने लगती है । भारत में Arya (आर्य) शब्द का उपयोग भारत के प्राचीन इतिहास पर नज़र डाले तो, भारत के वैदिक काल से ही Arya (आर्य) शब्द का उपयोग किया जा रहा है। आर्य एक संस्कृत शब्द है। जिसका वास्तविक अर्थ होता है- ‘श्रेष्ठ, सच्चा, प्रिय, सज्जन इत्यादि’। वेदों में Arya किसे कहा गया है ? ऋग्वेद के अनुसार आर्य वो होते है। “आर्य सर्वा समाससेवा सदैवा प्रियदर्शिनः” जो समाज में समानता से सेवा करते है, वो सदैव ही समाज के लिए प्रिये होते है। इन्ही को वेदों में आर्य कहा गया है। अर्थात वेदों में आर्य का अर्थ जाति सूचक बिलकुल भी नहीं है। “प्रजा आर्य ज्योतिरागृह” (ऋग्वेद VII. 33.17) अर्थात आर्यों के बच्चें सदैव प्रकाश की राह पर चलते है। ऐसे ही Arya (आर्य) शब्द का उपयोग 66 बार ऋग्वेद में किया गया है, किन्तु किसी श्लोक में आर्य रेस जैसी बातों का उपयोग नहीं किया गया। भारत में हड़प्पा सभ्यता की खोज भारत में हड़प्पा सभ्यता की खोज 1921 में हुई। इसके ठीक एक साल बाद 1922 में मोहनजोदड़ो को भी खोज लिया गया। अब ध्यान देने की बात यह है। मैक्स मुल्लर ने भारत को लेकर आर्यन invasion थ्योरी 1884 में दी थी। और इसके बाद से मैक्स मुल्लर की थ्योरी को ख़त्म नहीं किया गया। इसके विपरीत और भी तरह की भ्रांतिया समाज में फैलाई गयी। निराधार तर्क पेश किये गए। आर्यों को लेकर भारत में फैलाई गई गलत जानकारी भारत में लोगों को बाँटने हेतु जितने प्रयास किये जाने थे। वो सभी किये गए। जात, नसल, क्षेत्र, धर्म, भाषा, रंग-रूप के नाम पर हर तरीके से देश के लोगो को आपस में बांटा गया फिर लड़वाया गया। लेकिन सत्य नहीं बताया गया। बिना ठोस जानकारी और प्रमाण के यह अनुमान लगा लिया गया कि, Arya बाहर से आये थे और इतिहास की किताबों में बहुत गर्व से लिखा गया। अगर सत्य पता नहीं था तो इसका यह अर्थ था कि, आप झूठ को जनता के सामने परोसोगे। उनसे यह सारी बातें छिपाओगे कि, मैक्स मुल्लर जैसे लोग पुरातत्त्ववेत्ता, इतिहास कार नहीं थे। यह केवल नावेल लिखने वाले राइटर थे। जो ऑक्सफ़ोर्ड से इंग्लिश स्कॉलर मात्र थे। भारत में अधिकतर लोगो को यह बात भी नहीं पता होगी। क्योंकि भारतीयों लोगो को इतिहास के बारे में कुछ भी सही नहीं बताया गया था। अब भी कुछ लोग सत्य को मानना नहीं चाहते दुःख इस बात का है कि, आज भी लोग इन स्वार्थी लोगो के प्रपंच समझ नहीं पाते है। उनका ब्रैनवॉश इस हद तक किया गया है कि, अगर आज आप पुरे सबूतों और तथ्यों के आधार पर इतिहास बताने की कोशिश करेंगे । वो लोग यह बात नहीं मानेंगे। उनके लिए सत्य वही है। जो एक इंग्लिश स्कॉलर ने इनको इतिहास के रूप में बताया था। ना कि वो जो आज के दुनियाभर के पुरातत्व विशेषज्ञ कह रहे है। यह ठीक वैसा ही है एक ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी का इंग्लिश टीचर एमबीबीएस का पाठ पढ़ा रहा हो, और एमबीबीएस डॉक्टर बोल रहे हो यह गलत बता रहा है, लोग एमबीबीएस से कह रहे हो तुम कुछ नहीं जानते हो वो ऑक्सफ़ोर्ड का स्कॉलर है उसे ज़्यादा पता है। द्वेष भावना ही सर्वोपरी जब किसी के प्रति द्वेष मन में घर कर जाता है फिर उसे कितना भी समझा लो, हज़ारों सबूत दे दो। उनके लिए यह सब माईने नहीं रखते । इसके बहुत से निजी कारण हो सकते है। इसलिए सत्य उनके लिए वही होगा जिसको वो स्वीकार करेंगे । राखीगढ़ी के डीएनए टेस्ट पर अध्ययन करने में विश्व की सहायक संस्थाए Department of Archaeology, Deccan College Post-Graduate and Research Institute, Pune 411006, India Department of Genetics, and Harvard Medical School, Boston, MA 02115, USA Howard Hughes Medical Institute, Harvard Medical School, Boston, MA 02115, USA Broad Institute of Harvard and MIT, Cambridge, MA 02142, USA Birbal Sahni Institute of Palaeosciences, Lucknow 226007, India Amity Institute of Biotechnology, Amity University, Noida 201313, India CSIR-Centre for Cellular and Molecular Biology, Hyderabad 500 007, India Max Planck Institute for Evolutionary Anthropology, Leipzig 04103, Germany Department of Human Evolutionary Biology, Harvard University, Cambridge, MA 02138, USA Present address: Department of Anthropology, University of California, Santa Cruz, Santa Cruz, CA 95064, USA Department of Human Evolutionary Biology, Harvard University, Cambridge, MA 02138, USA Max Planck-Harvard Research Center for the Archaeoscience of the Ancient Mediterranean, Cambridge, MA 02138, USA Department of Biomolecular Engineering, University of California and Santa Cruz, Santa Cruz, CA 95064, USA । साभार :- गूगल बाबा...


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