नई दिल्ली।
एक बड़ा भारी प्रचार यह भी ख़ूब चला है कि इस्लाम ने भारतीयों को व्यंजन बनाना और ख़ाने का सलीका सिखाया । बिरयानी पुलाव और हलवा के साथ साथ जलेबी गुलाब जामुन और तरह तरह के मुग़लई व्यंजन गोया वह अपने साथ लाये थे । सबसे पहले तो यह समझ लेना ज़रूरी है कि जितने भी व्यंजन ऊपर गिनाये गये हैं उनकी जान देसी घी में बसती है जो दुनिया को भारत की देन है , बाहर की दुनिया में भारत की नकल कर के बटर ऑयल या क्लैरीफाइड बटर बनाया जाता है वह घी नहीं होता । दूसरी बात आज भी दुनिया के ७० प्रतिशत मसालों का उत्पादन भारत में होता है तो यह पुलाव और बिरयानी क्या बिना मसाले के बनते थे । छोले भटूरे पंजाब का व्यंजन है और मसालेदार छोले पाकिस्तान के आगे मिलना दुश्वार है । अफ़ग़ानिस्तान से मोरक्को तक काबुली चने को उबाल कर लहसुन के साथ पीस के उसकी दुर्गति कर , तिल और जैतून के तेल से बनी चटनी जिसे पूरे मध्य एशिया में ताहिनी सॉस बोलते हैं के साथ मिला कर हम्मस नाम का व्यंजन बनाया जाता है जिसमें ढेर सारा जैतून का तेल डाल कर पिटा ब्रेड के साथ खाया जाता है । पूड़ी कचौड़ी की सीमा भी पाकिस्तान के बाद ख़त्म । अलीबाबा की कहानी में खुल जा सिम सिम याद होगा , तो सिम सिम के मायने तिल होता है । जो भी हलवा अरब में बनता है वह तिल और जैतून के तेल के मिश्रण के माध्यम से ही बनता था , आजकल जरूर अरब जगत ने भी देसी घी का उत्पादन शुरू कर दिया है । मिस्र जरूर प्राचीन नदी सभ्यता थी जहाँ एक तरह का मक्खन जिसे सम्ना कहते हैं तलने और चिकनाई के माध्यम के रूप में प्रयोग किया जाता है । इस्लाम अपने उद्भव के समय शक्कर और उसके उत्पादों से बहुत परिचित नहीं था । नबी के प्रिय भोजन तलबीना जो एक प्रकार का जौ का दलिया होता है में मिठास के लिये शहद और खजूर का प्रयोग किया जाता है । घी की तरह गन्ना और शर्करा भी दुनिया को भारत की देन है । अंग्रेज दूर देशों में गन्ना उत्पादन के लिये यहाँ के मजदूरों को एग्रीमेंट पर ले गये जो कालांतर में गिरमिटिया मजदूर कहलाये । भारत में घुसते ही मुसलमानों की आँखें यहाँ के वैभव से चुँधिया गईं । इक़बाल लिखते हैं, तुर्कों का जिसने दामन हीरों से भर दिया था । मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है । संसार को हीरे से भी भारत ने ही परिचित कराया । क्या ग़जब है कि ख़ाना ख़ाना हमें अरबों और तुर्कों ने सिखाया । बाबर लिखता है कि हिंदुस्तान में एक फल अम्बा (आम) पाया जाता है जो खरबूजे के बाद सबसे स्वादिष्ट फल होता है । अब आप समझ सकते हैं बाबर की स्वाद ग्रंथियों को । कहाँ फलों का राजा आम और कहाँ बेस्वाद खरबूजा ? बाबर का यह एतराज जायज़ है कि भारतवासी बिना दस्तरख़्वान बिछाये ख़ाना खाते है । लेकिन मध्येशिया के लोग पूरा ऊँट भून कर खाने वाले बिना कपड़ा बिछाये कैसे ज़मीन पर रख कर खा सकते थे । अब्बासी ख़लीफ़ा ने जब बनू उमैया का क़त्ले आम किया तो लाशों के ऊपर ही दस्तरख़्वान बिछा कर दावत उड़ाई और जब वह भोजन जीम रहे थे तब नीचे से अधमरे बनू उमैया के कराहने की आवाज़ें भी आ रही थीं । भारतीयों को ख़ाना पकाने और ख़ाने का सलीका सिखाने वाले आज भी न तो इडली सांभर दोसा वड़ा बना सकते हैं न बंगाल की प्रसिद्ध इलिश सरसों बाटा न उडुपी की शाकाहारी थाली न राजस्थानी कढ़ी । अरे इतने मसाले किस अनुपात में पड़ेंगे यह जान पाना अरब के रेगिस्तान के बद्दुओं के बस की बात नहीं । आक्रांताओं ने यहाँ के निवासियों का केवल धर्म बदला बंगलादेशी मानुष पहले भी पटोला वैसे ही बनाता था आज भी वैसे ही बनाता है । पुर्तगालियों ने जरूर भारत का पूरा खाना बदल दिया । वे अपने साथ आलू गोभी मक्का और सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण चीज़ लाल मिर्च लाये जिसने भारतीयों का ज़ायका ही बदल दिया । लाल मिर्च हिंदुस्तान की धरती को इतनी भाई कि आज दुनिया की सबसे तीखी लाल मिर्च भूत झोलकिया आसाम में उगाई जाती है । लाल मिर्च से पहले भारत कटु स्वाद के लिये सोंठ काली मिर्च और पीपल का प्रयोग करता था जिसे आयुर्वेद में त्रिकटु के नाम से जानते हैं । भोजन पर भारत ने बहुत शोध किया है । षटरस यानी खट्टा मीठा खारा चरपरा कड़वा और कसैला तथा छप्पन भोग न जाने कब से भारत में प्रचलित हैं । चालुक्य राजा सोमदेव तृतीय के ग्रंथ मानसोल्लास में एक बड़ा अध्याय भोजन और पाक कला को समर्पित है । आज के अनेक लोकप्रिय भारतीय व्यंजनों की पाकविधि उसमें वर्णित है । भुना गोश्त खाने के शौकीन मध्य एशियाई तंदूर जरूर अपने साथ लाये लेकिन भारत के विशाल वनस्पति जगत ने उनके भोजन में इतने स्वाद मिला दिये एक अलग मिश्रित प्रजाति का भोजन तैयार हुआ जिसे मुगलई कहा जाने लगा । लेकिन मसालों से लेकर दालें तक विशुद्ध भारतीय ही रहीं । खिचड़ी का खिचड़ा ज़रूर बन गया जिसे हलीम बोलते हैं । शाकाहारी लोग अगर अरब जगत में जायें तो बड़े आराम से हम्मस और पिटा ब्रेड खा कर गुज़ारा हो सकता है । हम्मस बनाना सीख लीजिये । भारत आने से पहले मुसलमान गोश्त के सिवा यही खाते थे , राजकमल गोस्वामी और धान तो आज भी अरब में पैदा नहीं होता ।...


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मथुरा/उत्तरप्रदेश।
मथुरा में मारे गए लस्सी विक्रेता स्वर्गीय भरत यादव की केवल दो बिटिया है और सामने अंधकारमय भविष्य। जो अपराधी हैं उनमें मुख्य अभियुक्त तो पकड़ा भी नहीं जा सका है और जो पकड़े गए हैं उन पर बेहद हल्की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। अब पीड़ित परिवार अपना भविष्य देखे या मुकदमा करे। कल कुछ मित्र कह रहे थे कि परिवार को आर्थिक मदद की आवश्यकता नहीं है पर आज मथुरा के स्थानीय और बेहद विश्वश्त लोगों ने सूचित किया है कि परिवार के आगे आर्थिक संकट तो है ही क्योंकि मृतक लस्सी बेचने का छोटा किंतु सम्मानजनक काम करता था और उसकी आय बेहद सीमित थी। आर्थिक मदद उन ज़ख्मों को तो नहीं भर सकता जो इस अभागे परिवार को मिला है पर उनको थोड़ा हौसला तो दे ही सकता है कि उनका समाज उनके साथ खड़ा है। उपलब्ध कराई गई पासबुक की छायाप्रति के अनुसार स्वर्गीय भारत यादव और उनकी पत्नी द्वारा संचालित संयुक्त खाता स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर में था। 1 April, 2017 के बाद से चूंकि SBBJ का विलय स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में हो गया है इसलिये IFSC कोड परिवर्तित हो गया है। अब चूंकि श्री भरत यादव इस दुनिया में नहीं हैं तो खाता उनकी पत्नी के द्वारा संचालित किया जा रहा है। खाते का विवरण इस प्रकार है:- Name - Mrs. Nitu Account No - 61232539759 IFSC code - SBIN0031010 Branch :- Ghiya Mandi, Mathura स्वयं भी यथासंभव मदद करिये और औरों को प्रेरित कीजिये। बाकी उनकी बेसहारा पत्नी और मासूम बच्ची की तस्वीर देखने के बाद कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। उल्लेखनीय है कि इस अपील का व्यापक असर जहां एक तरफ समाज मे हुआ और लोगो ने पीङित परिवार की अपने स्तर से आर्थिक मदद की कोशिश करी वहीं मामला जब बङा होने लगा तो यूपी सरकार भी सक्रिय हुयी और दो लाख का चेक आर्थिक सहायता के रूप मे मृत भारत यादव की विधवा को प्रदान किया। लेकिन परिवार की बच्चियो की पढाई के लिए एवं उनकी जिंदगी की बेहतरी के लिए सोशल मीडिया पर लगातार संवेदनाएं सामने आ रही है,इस संदर्भ भे उत्साहित व एकजुट नवयुवको ने एक 'सहोदर' नामक व्हासअप समूह भी बनाया है जिसकी चिंता के केंद्र मे इस तरह की हिंसा के शिकार पीङित परिवारो को समाज से स्वतःस्फूर्त सहायता का अभियान जारी रखने की इच्छा दिखती है। हालांकि ऐसी छोटी और निजी पहल पहले भी होती रही है लेकिन जिस तरह से इस घटना के बाद संगठित होकर युवाओ ने सोशल मीडिया के प्लेटफार्म का सकारात्मक उपयोग करने का बीङा उठाया सै वह बदलाव को दर्शा रहा है तथा इसकी गूंज सत्ता के गलियारो तक गयी है।कहीं न कहीं इसका सार्थक असर दिखना तय है।...


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नई दिल्ली/लखनऊ ।
स्वामी विवेकानंद का दरिद्र नारायण दीनदयाल का अंत्योदय बन गया। आदि शंकर का अद्वैत वेदांत दीनदयाल का एकात्म मानववाद हो गया। आजादी की लङाई का आंदोलन स्वदेशी व स्वराज्य दीनदयाल का विकेन्द्रित मध्यम लघु कुटीर उद्योग आधारित आर्थिक दर्शन बन गया। गांधी जी ने हिंद स्वराज्य मे राम-राज्य की जिस अवधारणा को सोचा था-और अंतिम आदमी की चिंता की थी।परंतु उसे ढीलेढाले ट्रस्टीशिप सिद्धांत बीच छोङ दिए थे। दीनदयाल उसे वास्तविक मुकाम तक पहुंचाते है और भारतीय परिवेश मे अर्थव्यवस्था का स्वदेशीकरण व विकेंद्रीकरण की बात करते है। जो न पूंजीवाद हो न समाजवाद आधारित हो बल्कि मनुष्य आधारित हो। दीनदयाल का चिंतन मूलतः राजनैतिक दर्शन था जो आर्थिक समस्याओ के मानवीय तरीको से सुलझाने पर केंद्रित था। यही नही दीन दयाल लोहिया के सामाजिक न्याय को भी अपनी समझ से सदियो से वंचित लोगो को सशक्त व अधिकार देकर मुख्यधारा मे लाने की बात करते थे।उनका सोचना था कि हर मनुष्य दूसरे मनुष्य से जुङा है जैसे की शरीर के सारे अंगप्रत्यंग एकदूजे पर आश्रित है-कहीं चोट या कमजोरी आती है तो पूरा शरीर प्रभावित व परेशान होता है। इसलिए दीनदयाल सबकी उन्नति खासकर आम भारतीय की सर्वांगीण उन्नति की बात सोचते है।और सांस्कृतिक तथा अध्यात्मिकता के साथ मनुष्यमात्र की एकता व सामाजिक समरसता उनके दर्शन को खांटी भारतीय बनाती है। इसतरह से वे अपने पूर्ववर्ती भारतीय चिंतको व महापुरूषो की जीवन दृष्टि को आत्मसात करते हुए आजादी बाद गांधीवाद व कम्युनिज्म के असफलता से राजनीति के क्षेत्र मे उभरे वैक्यूम को स्वदेशी व विकेंद्रीकृत राजनैतिक-आर्थिक-नैतिक चिंतन से पूर्ण करने का प्रयास करते है।और संघर्ष तथा केंद्रीय सत्तावाद की जगह समरसतापूर्ण विकेन्द्रित राजव्यवस्था का राजनैतिक विकल्प भी प्रस्तुत करते है। जिसके फलस्वरूप वे औद्योगिकक्रांति के बाईप्रोडक्ट के रूप मे जन्मे पूंजीवाद व समाजवाद दोनो यूरोपियन विचारधाराओं के उलट देशी दृष्टि वाली सनातनी आध्यात्मिकता से ओतप्रोत स्वदेशी आर्थिक राजनैतिक विचारधारा का श्रीगणेश करने मे सफल होते है। आज वही विचारधारा स्वीकृत होकर राजनैतिक शक्ति बनकर भारत भाग्य विधाता बन चुकी है।ऐसे महापुरूष को नमन।उन्हे जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि ।...


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नयी दिल्ली/लखनऊ ।
भाषा का सवाल सिर्फ़ भाषा का सवाल नही है ,सबसे पहले यह सवाल संस्कृति का है ।जब संस्कृति नष्ट होती है तो उसके साथ रहन सहन ,वेश भूषा ,बोलचाल ,भाषा और लिपि ,भोजन ,अचार -विचार ,लोक संस्कृति ,साहित्य और समाज सब ख़तरे में पड़ जाते हैं । भारत में अंग्रेज़ी राज से आज़ादी भले मिली लेकिन अंग्रेज़ीयत पूरी तरह नेहरु इंडिया की सबसे मज़बूत स्तम्भ बनी ,नेहरु राज और उसके बाद भी अंग्रेज़ी भाषा ने जिस क़दर भारत के विकसित व माडर्न बनते समाज को अपना ग़ुलाम बनाया वह कितना त्रासद है यह स्कूल -विश्विद्यालयो -शोध संस्थान ,अस्पताल ,बैंक ,मॉल,हवाई यात्राओं ,होटल ,सरकारी संस्थानो ,सेना ,न्यायपालिका में बहुतांश में अंग्रेज़ी भाषा के बर्चस्व और अंग्रेज़ी संस्कृति के शासन को देखकर कोई भी जान सकता है। और कितना भी हिंदी दिवस मना लें ,विश्व हिन्दी सम्मेलन व फ़ेस्टिवल कर लें -अंग्रेज़ी भाषा की ग़ुलामी बढ़ेगी ही ,मुक्ति तो सोचिए ही मत। दक्षिण भारत हो या उत्तर पसचिम पूर्व का भारत अंग्रेज़ी को १९९०के पहले नौकरशाही ने और उसके बाद आर्थिक उदारीकरण से आए वैश्वीकरण व बाजारवाद ने घर-२ को और नित नयी होती पीढ़ी में इनबिल्ट कर दिया है। इसकी जकड़ में सिर्फ़ हिंदी नहीं बल्कि एक-२ करके सभी भारतीय बोलियाँव भाषाएँ ग़ायब होती नज़र आएँगी।क्योंकि यह हमला सिर्फ़ एक भाषा पर नहीं पूरी भारतीय संस्कृति व समाज पर है-जब विकास के पश्चिमी मॉडल से भारतीय संस्कृति ही नही बचेगी तो भारतीय भाषाओं को एक-२करके मरना ही होगा।कल संस्कृत मरी तो आज तमिल भी मर रही परसों कन्नड़ व मलयालम तो आगे मराठी गुजराती भी इस महामारी से बच न सकेंगी। इसलिए भाषा का सवाल बड़ा तोहै पर संस्कृति का सवाल उससे भी बड़ा और प्रासंगिक है।इसलिये सभ्यता-संस्कृति को बचाइए।यदि संस्कृति बची रही तो भाषा भी बच जाएगी।...


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लखनऊ।
हम लोग कुछ चीजें पचा नहीं पाते .. क्योंकि जानकारी ही सीमित है .. कारण है कि कभी जानने की कोशिश नहीं की .. परन्तु जब सामने आता है तो "मैं नहीं जानता, इसको बताओ .." ये आसान सी बात को दम्भ बोलने ही नहीं देता ... . लगभग 9 - 10 वर्ष पूर्व जर्मनी से लौटते समय दिल्ली से लखनऊ की अगले सुबह की फ्लाइट की जगह शाम को ही ट्रैन पकड़ के घर आने का सोचा .. नई दिल्ली आये तो सौभाग्य से सहरसा गरीब रथ के 3AC में जगह मिल गया .. थोड़ी देर बाद ट्रैन चली तो लोग बात करने लगे .. बातों बातों में हमने बताया कि जर्मनी से वापस आ रहे है तो जाहिर है कि कई बिंदुओं पर बात हुई .. उन्होंने मेरा काम पुछा तो संक्षिप्त में मैंने बताया कि फ्लेक्सिबल इलेक्ट्रॉनिक्स क्या होता है और कैसे बिजली बना सकते हैं .. Alternate Energy पे रिसर्च का थोड़ा बताया ... कुछ वहां समय के सदुपयोग और हर चीज़ समय पर होने के बारे में बताया ... इसके कुछ समय बाद वहीं नॉएडा ग़ज़ियाबाद के चपडगंजु टाइप इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट के कॉलेज के छात्रों ने मेरे हर बात का मज़ाक उड़ाना चालू किया ... इन कॉलेज से पढ़े लड़के जो ढंग से Ohm's Law को अप्लाई नहीं कर सकते, Kirchhoff's Current और Voltage Law दूर की बात है ... उनके बिंदु थे ".. जर्मनी से दिल्ली का पैसा है लेकिन दिल्ली से लखनऊ का फ्लाइट का पैसा नहीं है हा हा हा हा ..." .. ".. मेरी चादर जिसमे से 220V बिजली निकलती है वो निकालूँ या 440 वाली हा हा हा हा ..." .. "... देख के बताओ कि क्या जूता निकालने का समय हो गया हा हा हा हा ..." .. " .. करवट लेने का समय हो गया और कितने एंगल पर लेना है हा हा हा हा ..." ... आदि आदि ... आम तौर पे ऐसे मूर्खों के बातों की मैं कोई प्रतिक्रिया नहीं करता .. क्योंकि मेरा मानना है "... Your Idiotic thinking is your problem or your happiness, not mine .. " . कुछ दिन पहले किसी ने एक अच्छा यूट्यूब वीडियो इनबॉक्स किया, उसको देखने के बाद अगला वीडियो किसी ध्रुव राठी का था .. उस वीडियो को देखा .. वीडियो में जो मूर्खता की पराकाष्ठा थी उससे ज्यादा अचंभित था उसके 13 मिलियन views से जिसमे से 80% like थे और 20% unlike थे .. नींचे उसके समर्थन में हिन्दू मान्यताओं का मज़ाक उड़ाते हुए कमेंट थे .. वीडियो था गोमूत्र से सम्बन्ध में .. कभी कहा जाता था ".. कटे पे पेशाब कर दो .." पेशाब में phenol होता है जो हीलिंग करता हैं, पुराने जमाने में लोग छोटे खरोच, कटे आदि पर पेशाब कर देते थे जिसका फिनॉल हीलिंग कर देता था .... इस ध्रुव राठी के वीडियो में मानव मूत्र और गोमूत्र को एक समान बता के वो कह रहा था जिसको गोमूत्र पीना हो वो उसका पेशाब पी ले .... इस वीडियो में पक्ष में जिन्होंने like और कमेंट किया था वो मूर्ख तो थे ही लेकिन unlike और पक्ष में कमेंट वालों के पास इस बात के धार्मिक मान्यता के अलावा कोई तर्क नहीं था ... क्योंकि उन्होंने अपनी बात रखने को कोई वैज्ञानिक तथ्य नहीं रखे थे .. जबकि वैज्ञानिक तथ्य उपलब्ध हैं ... . CSIR - CIMAP के पूर्व निदेशक Dr. SPS Khanuja ने गोमूत्र पर काफी अनुसन्धान किया और पाया कि इसमें न सिर्फ फिनॉल है बल्कि एंटीबायोटिक और एंटीफंगल भी है .. इसके अलावा कई अन्य फायदे भी है .. इस शोध को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नामी शोध पत्रों ने न सिर्फ प्रकाशित किया बल्कि उन्होंने उसका US पेटेंट भी लिया जिसका पेटेंट नंबर है US 6410059B1 दिनांक 25 जून, 2002 .. इस शोध को यहाँ पढ़ सकते हैं https://patentimages.storage.googleapis.com/5e/a5/21/4627f13c4833e0/US6410059.pdf .. इसके अलावा गोमूत्र पर कई अनुसन्धान हुए है जो कि अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रों जैसे Journal of Intercultural Ethnopharmacology (JIE), NCBI USA, US National Library of Medicine, National Institute of Health आदि में न सिर्फ प्रकाशित हुए बल्कि शोध के परिणामों को पुनः स्थापित भी किया गया .. इस सबमे गोमूत्र को Antibiotic, antifungal, antineoplastic, bioenhancer, Bos indicus, immune-enhancer माना गया ... एक अन्य जानकारी है कि भारत के शान्तिप्रिय समुदाय के साथ अन्य सेक्युलर प्रजातियाँ जहाँ गोमूत्र से जुडी धारणाओं का मज़ाक उड़ाती है, उन पर Scroll, Quint और Wire जैसे पोर्टल कटाक्ष लिखते हैं वहीँ कई अरब देशों में भारत के वैज्ञानिक गोविंदराजन सत्तानाथन और सौरमनिक्कम वेंकटलक्ष्मी के शोध "Cow Urine Distillate as an Ecosafe and Economical Feed Additive for Enhancing Growth, Food Utilization and Survival Rate in Rohu, Labeo rohita (Hamilton)" को अपने मछलियों के लिए इस्तेमाल करते हैं .... यहाँ तक कि पाकिस्तान में भी ... .. खैर आगे बढ़ते हैं ... . प्रधानमंत्री मोदी के सीवर से कुकिंग गैस बना के उस पर चाय बनाने वाले मामले पर लोग खूब उछाल मार रहे हैं .. कल की हमारी पोस्ट पर भी कई लोग आए थे और उनको सिर्फ व्यंग्य और मज़ाक सूझ रहा था ... कारण वही था कि जानकारी नहीं .. तो भारत का golden rule कि चूँकि हमको मालूम नहीं तो आप को जो मालूम वो मेरे ठेंगे पर .... मामला है सीवर से गैस निकालने और उसको जला के चाय बनाना और यहाँ तक कि बिजली बनाना भी है .... . एक है NTDTV - New Tang Dynasty Television, USA में जिसने भारत के मध्य प्रदेश में स्थित एक गाँव कोदीपुरा का दौरा किया था 2010 में ही जिसका विश्व प्रसारण उन्होंने किया था .. यहाँ इस गाँव में लोग sewage को इस्तेमाल करके गैस निकाल रहे थे जिससे वो बिजली बनाते थे और साथ में खाना बनाने का गैस भी .. ये भारत का NDTV नहीं है जो कि कोई काम का बात नहीं देता ... https://www.youtube.com/watch?v=SOBrV2-w1Ts . चेन्नई के ताम्बरम में Sewer से कुकिंग गैस 2013 में ही बनाई गई थी जिसका इस्तेमाल हो रहा है .. https://www.thehindu.com/news/cities/chennai/in-selaiyur-methane-from-sewage-becomes-cooking-gas/article4815131.ece . खैर किसी भी चीज़ को साबित करने के लिए गोरे लोगों का तड़का न लगे तो कोई भी चीज साबित नहीं होती .. तो जर्मनी में एक है University of Stuttgart जहाँ पर वैज्ञानिकों ने Sewer से निकलने वाली गैस जो की मीथेन ही होती है उसका इस्तेमाल cooking में करने का प्रयोग किया और उसको साबित किया .. और ये आज की नहीं 1981 का ही शोध है .. https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/0361365881900163 . विश्व की सबसे प्रख्यात शोध पत्र प्रकाशित करने वाली Journal है "Nature" अगर किसी वैज्ञानिक का शोध इसमें प्रकाशित होता है तो वो धन्य समझता है खुद को .. Germany में एक है Karlsruhe Institute of Technology जिसमे sewage से बायोगैस बना के उसको Audi कारों को चलाने, बिजली बनाने से लेकर घर में खाना बनाने तक का प्रयोग को प्रकाशित किया गया था ... Nature ने इसको April 2013 के अंक में छापा है ... . भारत के central Pollution control board (CPCB) ने बैंगलोर में इसका प्रयोग किया और 2006 में ही इसके इस्तेमाल करने के लिए रिपोर्ट दे दिया था लेकिन ये भारत है, यहाँ रिपोर्ट धुल फाँकती है और जनता बकैती पेलती है ... . इस पर एक सफल काम जर्मनी के वैज्ञानिक ने किया है और उन्होंने नाइजीरिया में एक कंपनी को सीवर से गैस बनाने और सप्लाई करने का पूरी तकनीकी प्रदान किया है ... अगर आप में से किसी को जानना हो और काम करना हो तो नीचे लिखे व्यक्ति से पूरी जानकारी लें और अपने दिमाग को शान्ति प्रदान करें .. Dr. Michael E. Onyenma E-Mail: michael.o@avenamlink.com . 2012 में तमिलनाडु के राजेंद्रन ने इनको सम्पर्क करके पूरी जानकारी ली थी और इसको स्थापित भी किया है ... . बाकी आगे लोग जैसा विचार करें ......


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