नई दिल्ली/केरल।
सनातन आस्थायें एवं सबरीमाला ;त्रिलोचन नाथ तिवारी ------------------------------------- आध्यात्मिक तथा आधिभौतिक शक्तियों को सामाजिक जीवन हेतु उपयोगी बनाने की कला ही संस्कृति है। हमारे भारतीय वांग्मय के मनीषियों ने मनुष्य को स्वयं में एक आध्यात्मिक शक्ति माना है, और मनुष्य का सम्बंध अपने चतुर्दिक जिस विश्व से है उसे आधिभौतिक शक्ति की संज्ञा से अभिहित किया है। जब मनुष्य अपने ज्ञान तथा विवेक की सत्ता से अपनी इन्द्रियों को कार्यक्षम बनाता है, विकारों पर अधिकार पा लेता है, तथा बुद्धि, भावना एवं आकांक्षा की प्रगल्भता का उदय करता है तब वह आध्यात्मिक संस्कृति का निर्माण करता है। इस संस्कृति के निर्माण से नीति, सौन्दर्य, सत्य, न्याय, श्रेयस तथा मीमांसा का जीवन से संपर्क स्थापित होता है जिसके फल स्वरूप विधियों, नियमों, धर्म, साहित्य, विज्ञान, तर्क तथा समाज एवं राज्य की विभिन्न व्यस्थाओं का आविर्भाव होता है। मनुष्य द्वारा अपने चतुर्दिक फैले विश्व का अपने सामाजिक जीवन के अनुकूल रूपांतरण भौतिक संस्कृति की जन्मदाता है। इससे मनुष्य अपने चतुर्दिक सृष्टि से जल, भूमि, अग्नि, वायु, आकाश, वृक्ष-वनस्पति, खनिज, पशु आदि को अपने अनुकूल तथा उपयोगी बनाता है और इससे कृषि, शिल्प, वाणिज्य, विज्ञान, पशु-पालन, युद्ध, विजय, शस्त्र और यंत्र अथवा कहें कि “अभियान” की स्थापना करता है। भौतिक तथा आध्यात्मिक संस्कृतियाँ अन्योन्याश्रित हैं, क्योंकि अपने समीपवर्ती जगत का उपयोग करते ही मनुष्य की आतंरिक शक्तियां विकसित हो जाती हैं। संस्कृति का विकास धर्ममूल आधृत है। प्राथमिक परिस्थितियों के प्रत्येक मानव-समूह में जीवन के धार्मिक तथा व्यावहारिक दो रूप सामने आये। विश्व का कोई भी समाज हो, उसका एक अपना धर्म-मूल है। जीवन के धार्मिक रूप श्रद्धा तथा अलौकिकता पर आधारित होते हैं। यह श्रद्धा तथा अलौकिकता जिन आचरणों को जन्म देती है वह पाप-पुण्य, भूत-प्रेत-पितर-राक्षस, अनेकानेक देवी-देवताओं आदि की कल्पना करती है तथा उसका सम्बंध स्वर्ग, मोक्ष, परमार्थ तथा आध्यात्म-मार्ग से होता है। यह अलौकिक शक्ति तथा उससे सम्बंधित शक्तिमान की अवधारणा, वास्तविक अनुभवों से परिपुष्ट संकल्पनाओं की विपर्यस्त रचना से एक भाव-संपृक्त मन का निर्माण करती है जो शक्ति तथा शक्तिमान के प्रति भीति, प्रीति तथा शरणागति से आच्छादित होता है। ऐसा मन दो प्रकार के प्रयास करता है – एक उन शक्तियों तथा शक्तिमान को अपने अनुकूल कर लेने का, अथवा फिर उन्हें अपने वशवर्ती कर लेने का। यह मनाने की क्रिया, शक्ति को अपने अनुकूल करने की क्रिया ही आराधना है तथा उसे वशवर्ती करने की क्रिया ही साधना है। तंत्र-मन्त्र-यंत्र, अभिचार, कृत्या, जारण, मारण, उच्चाटन आदि तांत्रिक अथर्वण क्रियायें इसी साधना का अंग हैं। सम्पूर्ण कर्म-काण्ड तथा तंत्र-शास्त्र इसी आराधना तथा साधना की विभिन्न पद्धतियाँ हैं। किसी भी जाति या धर्म के साथ संस्कृति का सम्बंध संस्कारों में निहित है। पीढ़ियाँ अपने आचार-विचार, कला, साहित्य, लोक-व्यवहार तथा आध्यात्मिक प्रभाव अपनी आगामी पीढ़ियों को सौंपती जाती हैं और इस प्रकार संस्कार दृढ़ होते-होते जब जातियों के जीवन को पूर्णतः प्रभावित कर लेते हैं तब हम उसे संस्कृति के नाम से जानने लगते हैं। अपनी परम्परा, अपनी पद्धति तथा अपनी संस्कृति सबको प्यारी होती है। आर्य संस्कृति का जीवन दीर्घकाल-व्यापी रहा। गंगा की उपत्यकाओं में आर्यों का स्थापित वैदिक धर्म आर्यों के इतिहास-पुरुषों को देवता की महत्ता प्रदान करता था तथा उससे सम्बंधित कर्मकाण्ड अपने चरम पर पहुंचे हुए थे, किन्तु तर्क ने संदेह को जन्म दिया और वैदिक धर्म पर प्रहार प्रारम्भ हुये। वैदिक धर्म की शक्ति और दुर्बलता दोनों यही थी उसमें संदेहों तथा तर्कों को आदर प्राप्त था तथा उसमें समन्वय की संभावना को कभी नकारा नहीं गया। स्यात् वैदिक धर्म और आगे चल कर उससे ही एक नये स्वरुप में आये सनातन धर्म की इसी परिणति ने अन्य धर्मों को धर्म में संदेह तथा तर्क को कोई स्थान न देने को बाध्य किया। पांचाल-राज प्रवाहण तथा उसके शिष्य उद्दालक ने ब्रह्म-ज्ञान, पुनर्जन्म तथा आत्मा के अविनश्वरता की अवधारणा को स्थापित किया, और ब्रह्म-ज्ञानियों की विद्वत्सभायें तर्कों-वितर्कों से गूँज उठीं। वैदिक याज्ञवल्क्य ब्रह्मज्ञानी गार्गी के समक्ष निरुत्तर हुए, उपनिषदों की रचना हुई। किन्तु विचारधारा यहीं नहीं रुकी! वह आगे बढ़ी तथा विभिन्न दर्शनों के रूप में धर्म, समाज तथा साहित्य को एक क्रान्ति से आप्लाविल कर गई। लोगों के सोचने-विचारने, अध्ययन-अध्यापन के ढंग परिवर्तित हो गये। शैली बदली, भाषा बदली, रहन-सहन बदला। वेद मन्त्रों का स्थान सूत्रों तथा वार्तिकों ने ले लिया। पाणिनि आदि वैयाकरणों नें भाषा का संस्कार किया तथा संस्कृत का आधुनिक परिष्कृत स्वरुप स्थिर हुआ। आर्यों के अपने विकसित जीवन के लगभग ढाई हजार साल व्यतीत हो चुके थे। वे भारत-युद्ध में जाति तथा अधिकारों की एक विकट समस्या को सुलझाने का प्रयत्न कर चुके थे। भारत-युद्ध एक प्रकार से आर्य-शक्ति का विनाशक युद्ध सिद्ध हुआ था और इस युद्ध के एकमात्र महानायक कृष्ण के प्रभास तीर्थ पर अवसान के पश्चात भारतवर्ष के प्रत्येक घर में सदियों तक मरण-शौच व्याप्त रहा। आर्यों की शक्ति बिखर चली, उनके विचारों में नव्यता का समावेश न हो सका, नई विचार-शक्तियाँ प्रखरता से पुरातन विचारों पर आक्रामक हुईं और ऐसी ही एक विचार-शक्ति बुद्ध के साथ इस भारत-भूमि में आयी जो एक बार तो इस भारत-भूमि पर ही नहीं, देश-देशान्तरों पर छा गई, किन्तु कालान्तर में उसमें आये दोषों के कारण वह अनेक रूपों में विभाजित हो कर भारत भूमि से तो नष्टप्राय हो गई, किन्तु विदेशों में तत्कालीन देश-धर्म से प्रभावित हो कर अपना रूप बदलते हुए वह नितांत परिवर्तित रूप में अब भी जीवित है। सनातन धर्म भी देश-काल के साथ अपना समन्वय बनाते हुये अपना अस्तित्व बनाए रखने में सफल हुआ और प्रत्येक नये विचार को अपनी विशालता में एक भाग प्रदान करते हुये धीरे-धीरे व्यापक किन्तु बहुरंगी होता गया क्योंकि सनातन में न तो किसी शक्ति-विशेष के प्रति दुराग्रह रहा, न उस शक्ति के आश्रय शक्तिमान में ही। और इस प्रकार सनातन बाहर और भीतर से नारंगी सा बन गया। भीतर से भिन्न, अलग, किन्तु बाहर से एक! सनातन में प्रत्येक का अपना देवता अलग हो सकता है, उस देवता के उपासना की पद्धति अलग हो सकती है, मान्यताएं अलग हो सकती हैं, प्रथाएं अलग हो सकती हैं, विश्वास अलग हो सकते हैं, किन्तु सनातन फिर भी सनातन है और यह इसकी बहुत बड़ी शक्ति है, किन्तु यही इसकी दुर्बलता भी है। बाहर से एक होने से क्या होता है? भीतर से तो सब अलग ही थे! इस भीतर के अलगाव को समायोजित करने हेतु एक नयी अवधारणा का जन्म हुआ जो सभी बिखरी हुई अवधारणाओं के देवताओं, पद्धतियों, परम्पराओं और विश्वासों को एकीकृत करने का प्रयास था और वह प्रयास था अनगिन आध्यात्मिक धाराओं का वैष्णव, शैव, तथा शाक्त तीन मुख्य धाराओं में नियोजन। अब इस प्रयास के उपरांत सनातन कुछ सुगठित हो गया। किन्तु मनुष्य की स्वभावगत दुर्बलता है वर्चस्व की कामना! बस मैं श्रेष्ठ हूँ और बस मेरा श्रेष्ठ है! यह वर्चस्व-कामना विचारों के क्षेत्र में भी उतनी लोलुपता प्रदर्शित करती है जितनी अन्य क्षेत्रों में। यह दुष्कामना सनातन में एक आतंरिक संघर्ष का हेतु बनी तथा वैष्णव, शैव तथा शाक्तों का परस्पर संघर्ष सभी के लिये असह्य हो गया। भारत के दाक्षिणात्य प्रान्तों में यह संघर्ष अत्यंत उग्र हो उठा। सनातन के इस संघर्ष को विराम दिया भगवान् स्वामी अय्यप्पा ने! इस समन्वय की कथा बहुत रोचक है जिसमें शाक्त, शैव तथा वैष्णव तीनों मतों के प्रमुख आराध्यों की महत्वपूर्ण भूमिका है और कथा का प्रथम अनुच्छेद प्रारम्भ होता है शाक्तों के आराध्य देवी दुर्गा से। यह गाथा भी अपने आदि से अन्त तक है आर्यों के इतिहास का ही एक अंश, किन्तु इस आलेख का विषय इतिहास के रहस्यों का उद्घाटन नहीं प्रत्युत आस्था तथा धर्म है अतः इतिहास के तथ्य पुनः कभी अन्य अवसर पर! स्वरोचिष मन्वंतर में चण्ड-मुण्ड, मधु-कैटभ, रक्तबीज तथा महिषासुर आदि का वध करके देवी दुर्गा ने देवताओं को भयहीन किया था जो अपने विविध रूपों में शाक्तों की आराध्या हैं। माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध के उपरान्त महिषासुर की भगिनी “महिषी” ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की तथा उन्हें वर देने को विवश कर दिया। जब ब्रह्मदेव ने उससे वर मांगने को कहा तो उसने अमरत्व माँगा, किन्तु अमरत्व का वरदान अदेय था। तब महिषी ने ब्रह्मा से शिव तथा विष्णु के परस्पर संसर्ग से उत्पन्न पुत्र के अतिरिक्त अन्य किसी भी हेतु द्वारा अपनी मृत्यु न होने का वरदान माँगा क्योंकि शिव तथा विष्णु का पुत्र होना तो परिकल्पना से परे, असंभव ही था! ब्रह्मदेव विवश वर दे कर लौट गये और तब वह राक्षसी “महिषी” जगत में उत्पात मचाते घूमने लगी। सृष्टि तथा उसके नियामक देवता पुनः संकट में थे। सभी देवता एक बार पुनः अपनी इस समस्या के साथ श्री हरि भगवान् विष्णु के पास पहुंचे तब विष्णु ने उनसे कहा कि समुद्र-मंथन के समय एक विशेष प्रयोजन से मैं स्त्री-रूप धारण करूंगा जो मोहिनी रूप से विख्यात होगा। उस मोहिनी रूप में शिव-संसर्ग से मुझे एक पुत्र उत्पन्न होगा किन्तु उस पुत्र का पालन किसी मनुष्य द्वारा होगा। वही पुत्र इस “महिषी” नामक राक्षसी का वध करेगा। समय आने पर विष्णु के मोहिनी रूप तथा शिव के संसर्ग से जिस बालक का जन्म हुआ वही बालक भगवान् अय्यप्पा स्वामी हैं जिनका एक नाम हरिहरन भी है अर्थात हरि तथा हर या विष्णु तथा शिव के पुत्र! शिशु-जन्म के उपरांत विष्णु अपने स्वरूप में लौट आये तथा शिव तथा विष्णु ने उस शिशु के कंठ में एक मणिमय कंठिका (जिसे भ्रम वश घंटिका अर्थात घंटी माना जाता है) बाँध कर उसे पम्पा नदी के तट पर छोड़ दिया। इस शिशु को पण्डालम के राजा राजशेखर ने पम्पा-तट पर देखा। वह शिशु योग-मुद्रा में अवस्थित था तथा उसके अधरों पर एक मंद स्मित था जिसके कंठ में एक दिव्य मणि-कंठिका झिलमिला रही थी। राजा राजशेखर उस शिशु के तेजस्वी स्वरुप से मोहित हो कर उसे अपने साथ ले आये। राजा निःसंतान थे अतः उन्होंने इस शिशु को अपना पुत्र बना लिया और उसका नाम मणिकंठन रखा क्योंकि वह शिशु उन्हें कंठ में मणि-कंठिका धारण किये ही प्राप्त हुआ था। यही मनिकंठन नाम बाद में मणिकंथन तथा फिर मणिकंदन के रूप में प्रचलित हो गया। शिशु मणिकंठन किशोरावस्था को पहुंचा तब तक राजशेखर की पत्नी को भी एक पुत्र उत्पन्न हो गया था। औरस पुत्र की प्राप्ति के पश्चात रानी का मन मणिकंठन के प्रति विद्वेश - भाव से भर गया क्योंकि उसे शंका ही नहीं यह विश्वास था कि राज्य उसके पुत्र को न मिल कर मणिकंठन को ही मिलेगा। अब वह मणिकंठन को प्रताड़ित करने लगी। राजा इन सब बातों से भिज्ञ था किन्तु वह मणिकंठन से स्नेह करने के बाद भी अपनी रानी को नियंत्रित न कर सका। समय आने पर राजा ने मणिकंठन को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हुये उसे अपना सिंहासन सौंपने का निश्चय कर लिया, किन्तु रानी ने इसका विरोध किया। उधर “महिषी’ नामक राक्षसी को यह ज्ञात हो गया था कि उसका वध करने वाला शिव तथा मोहिनी रूप विष्णु का पुत्र यही मणिकंठन है अतः वह मणिकंठन को मारने हेतु अवसर खोजने लगी। उसने राजशेखर की रानी को यह गुप्त सन्देश भिजवाया कि यदि वह मणिकंठन को निर्जन वन में भेज दे तो उसे मार कर वह रानी का कष्ट दूर कर देगी। रानी इस के लिये तैयार हो गई। रानी ने इस कार्य हेतु एक नाट्य रचा। उसने स्वयं को रुग्ण सिद्ध कर के यह प्रचारित किया कि वह बाघिन का दूध पी कर ही स्वस्थ हो पायेगी। राजा तथा अन्य कर्मचारी इस असाध्य-साधन हेतु प्रस्तुत नहीं थे, किन्तु मणिकंठन को जब यह ज्ञात हुआ तो वह स्वयं इस कार्य को करने का निश्चय कर के वन में गया जहां उसे महिषासुर की भगिनी महिषी मिली। महिषी ने मणिकंठन की हत्या का प्रयास किया किन्तु वह स्वयं मणिकंठन द्वारा मारी गई तथा मणिकंठन वन से एक सद्यःप्रसूता बाघिन को पकड़ कर उसका दूध निकालने के स्थान पर उसे ही जीवित लिये उसी पर आसीन हो महल तक आ गया। किन्तु उसे जीवित तथा एक जीवित बाघिन पर आसीन देख कर भयार्त रानी अपना नाट्य भूल गई और मणिकंठन यह जान गया कि उसके साथ छल हुआ है। यद्यपि उसके तेज तथा कृत्य को देख कर राजा और प्रजा दोनों उसे चमत्कारी पुरुष मान कर उसकी अभ्यर्थना और स्तुति करते रहे किन्तु खिन्न मणिकंठन ने राज्य-त्याग का निर्णय लिया। राजा तथा प्रजा दोनों के अनुरोध पर उसने राजा से सबरीमाला (सबरी = पहाड़ियां, माला = शृंखला) पर एक मंदिर बनवाने को कहा तथा प्रचलित गाथाओं के अनुसार वह मंदिर बनाने को कह कर स्वर्ग लौट गया। पुत्र की इच्छा के अनुसार राजा राजशेखर ने सह्याद्रि की पर्वत मालाओं में उसके नाम पर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया तथा उस मंदिर में परशुराम ने मणिकंठन की मनोहर मूर्ति का निर्माण कर के मकर संक्रांति के अवसर पर उसे मंदिर में प्रतिष्ठित किया। परशुराम ने ही मणिकंठन को भगवान् अय्यप्पा स्वामी का नाम दिया क्योंकि वे जानते थे कि मणिकंठन भगवान् शिव का ही पुत्र है। तभी से उस मंदिर में भगवान् अय्यप्पा स्वामी की पूजा आस्था तथा भक्ति सहित हो रही है। रानी के प्रति अपनी वितृष्णा के कारण मणिकंठन ने अपने उस मंदिर में सर्जना-शक्ति से संपन्न नारी का प्रवेश निषिद्ध कर दिया क्योंकि उनका मानना था कि सर्जना-शक्ति संपन्न नारी इस विश्व में अपने पुत्र के अतिरिक्त किसी को स्नेह नहीं दे सकती। किन्तु यह शर्त उन्होंने सीधे तरीके से नहीं लगाई। उन्होंने इसके लिए शर्त यह रखी कि मंदिर में वही प्रवेश करेगा जो इकतालिस दिनों तक नियम और संयम के साथ शुद्धता से जीवन बिताये। इकतालिस दिन की इस अवधि में कोई भी वयस्क नारी रजस्वला हुये बिना नहीं रह सकती और रजस्वला होने की अवधि में धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नारी अशुद्ध हो जाती है इसी कारण उस मंदिर में उस प्रत्येक नारी का प्रवेश निषिद्ध है जो रजस्वला हो सकती है। एक मान्यता यह भी है कि स्वामी अय्यप्पा ब्रह्मचारी हैं अतः इस लिये भी मंदिर में प्रजनन-शक्ति संपन्न युवा स्त्री का प्रवेश वर्जित है। मंदिर में दर्शन करने के कुछ कठिन नियम हैं जैसे - १. भक्तों को यहाँ आने से पहले इकतालीस दिन तक समस्त लौकिक बंधनों से मुक्त होकर ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक है। २. इन दिनों में उन्हें नीले या काले कपड़े ही पहनने पड़ते हैं। ३. गले में तुलसी की माला रखनी होती है और पूरे दिन में केवल एक बार ही साधारण भोजन करना होता है। ४. सायंकाल उसे अय्यपा की पूजा करनी होती है और भूमि-शयन करना पड़ता है। ५. इस व्रत की पूर्णाहुति पर एक गुरुस्वामी के निर्देशन में पूजा करनी होती है जो अय्यप्पा के पूजन के विधि-विधान से भिज्ञ हो। ६. मंदिर की यात्रा में दर्शनार्थी को अपने शीश पर इरुमुडी रखनी होती है। इरुमुडी दो थैलियां और एक थैला होता है जिसमें एक में घी से भरा हुआ नारियल, एक मे पूजा सामग्री होती है तथा थैले में भोजन सामग्री। यह सब लेकर उन्हें शबरी पीठ की परिक्रमा भी करनी होती है, तब जाकर अठारह सीढियों से होकर मंदिर में प्रवेश मिलता है। दक्षिण भारत के राज्य केरल में सबरीमाला में स्थित सह्याद्रि की पर्वत-शृंखलाओं बीच यह अय्यप्पा स्वामी मंदिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था का प्रतीक है। कहा जाता है कि इस मंदिर के पास मकर संक्रांति की रात को पहाड़ी की कान्तामाला नामक चोटी पर गहन अन्धकार में रह रहकर एक असाधारण चमक वाली ज्योति दिखती है जिसके दर्शन के लिये विश्व भर से करोड़ों श्रद्धालु प्रत्येक वर्ष यहाँ आते हैं। बताया जाता है कि जब-जब यह ज्योति दिखती है तब-तब इसके साथ एक शोर भी सुनाई देता है। अय्यप्पा के भक्त मानते हैं कि यह देव ज्योति है और स्वयं भगवान इसे जलाते हैं। इस ज्योति का नाम मकर ज्योति है। यद्यपि यह आस्था का विषय है किन्तु परम्परा का भी इस मान्यता में कम योगदान नहीं है। मकर संक्रांति के दिन भोर में पूर्व में उदित होता अभिजित नक्षत्र तथा पश्चिम में डूबने को तत्पर मृगशिरा नक्षत्र का ब्याध नामक तारा एक साथ दिखता है जिसमें अभिजित भगवान् विष्णु का तथा व्याध भगवान् शिव का प्रतीक है। प्राची में उदित होने को उद्द्यत मकर राशि से पूर्व भोर के झुटपुटे में इन दोनों तारकों का एक साथ दर्शन भी मकर-ज्योति कहलाती है, अर्थात वह प्रकाश जिसके आलोक में मकर राशि का उदय होने को है। भरत एक धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र है। यहाँ प्रत्येक व्यक्ति को उसके अपने मान्यताओं, आस्थाओं, विश्वासों, परम्पराओं, विधाओं तथा रूढ़ियों के भी अनुरूप अपने धर्म को मानने तथा तदनुरूप आचरण करने की स्वतन्त्रता प्राप्त है। सनातन धर्म में आस्था रखने वाला प्रत्येक हिन्दू अपने विशिष्ट आराध्य के प्रति समर्पित होने के पश्चात भी सनातन धर्म की इस वैष्णव, शैव तथा शाक्त की त्रिपुटी के प्रति गहन आस्था रखता है। फिर सबरीमाला का मंदिर तथा इस मंदिर के अधीष्ठित देवता भगवान् अय्यप्पा स्वामी तो एक साथ वैष्णव, शैव तथा शाक्त तीनों के समन्वय का साक्षात विग्रह है। इस समन्वित शक्ति के प्रति हिन्दुओं की प्रीति तथा शरणागति तो सनातन के माथे का त्रिपुण्ड है। किसी पंथ या मत का अनुयायी हिन्दू हो, भगवान् अय्यप्पा स्वामी मणिकंठन सबकी आस्था का केंद्र हैं। जिस राष्ट्र में धर्म राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करता वहाँ राजनीति निरंतर धर्म में हस्तक्षेप कर रही है जिसकी सूची गिनाने की आवश्यकता नहीं है। राजनीति का धर्म में यह हस्तक्षेप हमारी मान्यताओं, आस्थाओं, विश्वासों, परम्पराओं, विधाओं तथा श्रद्धा में स्पष्ट हस्तक्षेप है तथा स्पष्टतः संविधान द्वारा प्राप्त मौलिक अधिकारों का भी हनन है जिसके दोषी भारतीय राजनीति के कर्णधार तो हैं ही, साथ ही न्यायपालिका भी इसकी अपराधी है। जिस प्रकार भारतीय संविधान की नियमावली में धर्म के नियम हस्तक्षेप नहीं कर सकते, उसी प्रकार धार्मिक रीतियों में भी संविधान का हस्तक्षेप तब तक उचित नहीं है जब तक उससे किसी व्यक्ति-विशेष या समूह को सीधी आर्थिक या शारीरिक क्षति नहीं पहुँचती हो। नारीवाद के समर्थकों को भी यह ध्यान रखना चाहिये कि इस प्रक्रम में नारियों का मंदिर में प्रवेश कहीं से भी नारी के समानता के अधिकार में नहीं आता क्योंकि इस प्रकरण में नारी को उसके सामजिक, आर्थिक, मानसिक या किसी भी अन्य स्तर पर पुरुष से हेय नहीं सिद्ध किया जा रहा है। सनातन हिन्दू नारी को सरस्वती, लक्ष्मी तथा दुर्गा स्वरूपा मानता है। कर्मकाण्डों में उसे दक्षिण पार्श्व का आसन देकर प्रतिष्ठित किया जाता है। नारी हमारे लिये गंगा-तट की बाण-भूमि में लम्बी ज्वार-बाजरा-इक्षु-गोधूम के खेतों की शोभा है, नदी के वक्ष पर डांड चलाती लहरों से बाहु-युद्ध करती, भिनसारे धान कूटती और सांझ को गीत-मुखरित कंठ के साथ चक्की चलाती, संध्या को तुलसी के चौरे पर दीपदान करती, कभी पीत तो कभी रक्तिम या कभी रंगीन चुनरी में लिपटी हमारे घरों में प्रत्येक नारी सशरीर गंगा है जो हमारे परिवार को सींचती है, उसे दूध-भात बांटती है। अंतरिक्ष से लेकर युद्धभूमि तक, शासन से लेकर प्रशासन तक, विज्ञान से लेकर तकनीक तक आज वह हमारी वास्तविक संगिनी है, परिवार तथा समाज की धुरी है, साक्षात सुरसरि है। सनातन के ऐसे भी लोकाचार हैं जिनको निभाने का अधिकार मात्र नारी के पास है और उसमें पुरुष सम्मिलित नहीं हो सकता। उसी प्रकार सबरीमाला की परम्परा भी ऐसी है जिसमें रजस्वला हो सकने वाली, ध्यान रहे कि नारी-मात्र नहीं, मात्र रजस्वला हो सकने वाली नारी के प्रवेश का निषेध है। इस परम्परा के पालन में न तो कोई हानि है न किसी के प्रति कोई दुराव या अन्याय! यह मात्र एक आस्थाजनित परम्परा है जिसका सम्मान सभी का धर्म है। विविध कारणों से सदियों से मंदिर अशुद्ध होते रहते हैं किन्तु हमारे शास्त्रों में उन्हें शुद्ध करने के पर्याप्त विधान हैं अतः मंदिर पुनः शुद्ध होते रहे हैं और शुद्ध हो जायेंगे। किन्तु यह घटना सनातन हिन्दू की आस्था पर पाद-प्रहार है और इसका प्रतिरोध, इसका प्रतिकार और आवश्यक हो तो इसका प्रतिशोध भी आवश्यक है। साथ ही आवश्यक है कि राजनीति तथा न्याय-व्यवस्था के कर्णधारों को यह ज्ञात करा दिया जाय कि हिमालय से कन्याकुमारी तक प्रत्येक सनातनी हिन्दू न मात्र इस निर्णय तथा इस घटना की भर्त्सना करता है, बल्कि यह चेतावनी देना चाहता है कि बस अब और नहीं! सनातन वह विराट पुरुष है जिसे अंतिम रूप से बाँधने के प्रयास का परिणाम महाभारत होता है। कहीं ऐसा न हो कि पीछे हटते – हटते सनातनी हिन्दू ऐसे सिरे पर पहुँच जाय जहाँ पहुँच कर उसके पास प्रत्याक्रमण के अतिरिक्त कोई मार्ग शेष न रहे, क्योंकि हमारे राष्ट्र के सर्वश्रेष्ठ उपदेष्टा ने हमें सिखाया है -- सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्नुहि।। शासन तथा न्यायपालिका की इस दुरभिसन्धि का हम सभी सनातनी हिन्दू एक स्वर से विरोध करते हैं तथा हम सभी हिन्दू स्वयं को भगवान् अय्यप्पा का भक्त घोषित करते हुये सबरीमाला के अनुयायियों के साथ हैं।...


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भारत/नई दिल्ली।
चले कहां को, देखिए तो कहां ठहरे हैं असंपादित (मैं चाहता था सांप्रदायिक भेदभाव के बीच सबके लिए सम्मानजनक जीवन निर्वाह का क्या आधार हो सकता है, इस पर विचार करूँ। अपनी बात समझाने के क्रम में फैलाव ऐसा हो गया कि बीच में ही रुक जाना पड़ा और जो शीर्षक चुना था उसे भी बदल कर इस रूप में रखना पड़ा, जिस रूप में आप इसे ऊपर देख रहे हैं।) कांग्रेस ने जिस राष्ट्रवाद को अपनाया था, वह पश्चिमी राष्ट्रवाद नहीं था। उसकी जड़ें भारतीय जन-मानस में थीं। अनेक भाषाओं, अनेक राज्यों और राजाओं, खानपान की अनेक रीतियों, अनेक धर्मों, विश्वासों, परंपराओं, दर्शनों के बावजूद हिमालय से कन्याकुमारी तक एक देश की कल्पना और इससे गहरे जुड़ाव की भावना पश्चिमी जनों और पश्चिमी शिक्षा प्राप्त भारतीयों को चकित करती है। एक अनपढ़ भारतीय को यह इतनी वास्तविक लगती है कि वह इस बात पर चकित होता है कि कोई इसे अविश्वसनीय मान सकता है। एकता की यह भावना, आजीवन अपने गांव जवार में ही सिमटे रह जाने वाले अनपढ़ या मात्र साक्षर में कैसे पैदा हुई इसे दोनों में से कोई नहीं जानता। पहले को जानने की जरूरत नहीं, जो प्रत्यक्ष है, वह है। इस पर इतना सर क्यों खपाना? दूसरे को जानने की जरूरत तो है, परंतु वह सभ्यता के निर्माणकाल को इतनी छोटी सीमा में रखकर देखना चाहता है कि इस रहस्य को समझ ही नहीं सकता। पश्चिमी कूटनीतिज्ञों को यह एकता माया, या आभासी लगती रही है और वे इसे रेत का ऐसा ढूह समझते रहे हैं जो तेज हवा से बिखर सकता है। उनके इतिहासकारों को भी यह पता नहीं था यह कितने अंधड़ और तूफान सहने के बाद भी यह ज्यों का त्यों बना हुआ है। अपनी आशा के विपरीत वे पाते रहे हैं आपसी रगड़-झगड़ के बाद भी बाहरी आघात होने के क्षणों में यह एक महाशक्ति के रूप में तन कर खड़ा हो जाता है; कुछ न कर पाने की दशा में आहत अनुभव करता है। चोट कहीं लगे, दर्द की अनुभूति तेज कहीं भी हो, इसकी चेतना और सिहरन पूरी काया में अनुभव की जाती है। इसका रहस्य क्या है, इसे न तो पश्चिमी विद्वान समझ सके, न भारतीय राजनीतिज्ञ। उन्होंने इसे विविधता में एकता की कामचलाऊ संज्ञा दी । यह संज्ञा सर्वप्रथम रिजले ने दी थी, जिसे भारतीय पंडित दुहराते रहे, परंतु यह समझने का प्रयास नहीं किया कि भारत में ही विविधता में यह एकता कैसे स्थापित हो पाई। अन्य देशों की विविधताओं के बीच ऐसी एकता क्यों नहीं स्थापित हुई? यदि अपनी कल्पना शक्ति का सर्जनात्मक उपयोग करते, तो यह समझ जाते की इस्लाम के विस्तार के साथ, पूरे ईसाई जगत में ऐसी ही एकात्मता की अनुभूति पैदा हुई थी। यह सच है भारत में मजहब की वह एकता भी नहीं थी। यहां तो एक ही घर में एक वैष्णव और दूसरा शाक्त हो सकता था, एक हिंदू और दूसरा जैन हो सकता था, एक परिवार हिंदू और उसका एक बेटा सिख हो सकता था। क्या यह देव समाज की साझी विरासत थी? इस पर किसी ने गौर नहीं किया। इसके साथ फिर वही समस्या सामने आ जाती थी कि यह साझा कैसे पैदा हुआ? इसे हम उस आदिम अवस्था मैं लौट कर ही समझ सकते हैं जब भारतवर्ष में विचरने वाले समुदाय पर्वतीय और समुद्री बाधाओं के भीतर आहार और शिकार के लिए पूरे क्षेत्र में विचरण करते और प्राकृतिक उत्पादों की प्रचुरता के दिनों में किन्हीं क्षेत्रों में, आसानी से पहचाने जा सकने वाले, निश्चित स्थानों पर - नदी के संगम उद्गम या किसी विशाल सरोवर के निकट, क्या समुद्र तट पर विशिष्ट पहचान वाले स्थलों पर समागम किया करते थे। यही आगे चलकर तीर्थ स्थानों के रूप में समादृत हुए। मोटे तौर पर पूरा देश उनका परिक्रमा क्षेत्र था। इसकी नदियों पहाड़ों को छोड़कर भूभाग की अलग पहचान न थी। इसी का परिणाम है, सभी भाषाओं में, किसी न किसी रूप में, दूसरे सभी के तत्वों का पाया जाना। मैं इस बात को कुछ स्पष्ट कर दूँ। संस्कृत में, एक के लिए, एक का प्रयोग होता है। बहुत पहले, इसके लिए ‘ऊन’ का प्रयोग होता था। इससे पहले उनका ‘ऊ’ प्रयोग दूर के लिए, बड़े के लिए, व्यापक के लिए होता था। और इसके ठीक विपरीत ‘ई’ का प्रयोग. निकट के लिए, यहां के लिए लघु के लिए होता था। ‘ऊन’ का अर्थ था वह जो व्यापक नहीं है बड़ा नहीं है अर्थात् छोटा है और इसी तरह से यह संख्याओं में सबसे छोटी संख्या ‘एक’ के लिए प्रयोग में आने लगा। काफी विश्वास के साथ यह बात करने के बाद भी यह निवेदन करना बाकी रह जाता है कि मैं स्वयं कह नहीं सकता की यह स्वर ‘ऊ’ था या ‘ओ’ । ‘ऊ’ में ‘न’ जुड़ने के बाद ‘ऊन’ बना जो यूनुस, यूनिट, यूनियन आदि में बचा हुआ है या ‘ओ’ में ‘न’ जुड़ने के बाद ‘ओन’ जो अंग्रेजी के ‘वन’, तमिल से ‘ओन्र’ में बचा हुआ है, या ‘ओ’ में ‘म’ जुड़ने के बाद ‘ओम’ में जिसका उच्चारण अ+ऊ+म के संपृक्त उच्चारण, अर्थात् एक अक्षर के रूप में, ‘ऊँ’ के रूप में। ‘ओम इत्येकाक्षरं विद्धि’। इसी से एक और ‘ऊन’ दूसरी ओर ‘ओं’ तीसरी ओर ओन्र और चौथी ओर ‘ओन’ (onorous, onimid)। अर्थ सबका एक ही, एक, अनन्य, सर्वोपरि, और सबसे छोटा। सबसे छोटा इसलिए कि तब तक (0) की कल्पना नहीं हुई थी। कम और सबसे छोटा का अर्थ एक ही था। एक दूसरा शब्द है, पद, जिस के इतिहास में हम नहीं जाना चाहेंगे। 12 इतना बताना जरूरी है इसका एक अर्थ सर्वोपरि सबसे बड़ा हुआ करता था जो गीता के ‘पदवी कवीनां’ और हमारे व्यवहार के पद और पदवी मे बचा हुआ है। गणना के आदिम चरणों पर सबसे बड़ी संख्या के रूप में कभी 3 का प्रयोग हुआ कभी 4 का प्रयोग हुआ कभी 5 का प्रयोग हुआ कभी 6 का प्रयोग हुआ कभी साथ का प्रयोग हुआ कभी आज का प्रयोग हुआ और कभी 10 का प्रयोग हुआ 8 और 10 के बीच इससे काम नहीं चल रहा था इसलिए संस्कृत में नौ का प्रयोग हुआ जिस का अर्थ था नया यद्यपि या 10 की खोज के बाद पैदा हुआ था। जो भी हो हम इनके विस्तार में नहीं जाएंगे पर यह याद दिलाना चाहेंगे का पद अर्थात् 10, इसी का जाया है। अब तमिल के ओन्बदु (ऊन+पदु) =नव और संस्कृत के, हिंदी के भी ऊनविंशति/ उन्नीस और इसी क्रम में ऊपर की संख्याओं पर ध्यान दें तो शब्द विकास और अर्थ कार की अंतर धारा को समझ पाएंगे जो आर्य और द्रविड़ दोनों में प्रवाहित है। इसी से हम उस अंतःसूत्र को पहचान सकते हैं जिससे भारतीयता का निर्माण हुआ है। इसी क्रम में वे जीवन मूल्य विकसित हुए थे जिन्हें हम भारतीय मूल्य प्रणाली कह सकते हैं। अन्य भिन्नताओं के होते हुए यही वे सर्वनिष्ठ सांस्कृतिक सूत्र रहे हैं जो पृथक दीखने वाले मनकों को एक में भी पिरोते हुए वैजयंती माला अदृश्य रूप में भारतीयों के गले का हार बनाए रहे और जिनसे इसे यह शक्ति मिली कि वह अपने से भिन्न मूल्यों, मानो, रीतियों और विश्वासों का सम्मान कर सके। भारत की राष्ट्रीयता की आत्मा यही है। बाद में, स्थायी बस्ती बसने के बाद विकास की एक स्तर पर अलग अलग संवर्तों की सृष्टि हुई और उनके निवासी अपने अपने आवर्त से बाहर जाना अनिष्टकर मानने लगे। आर्यावर्त का निवासी यदि तीर्थ को छोड़कर किसी अन्य प्रयोजन से उससे बाहर जाता है तो भ्रष्ट हो जाता है, परंतु यदि वहां से उसका कोई संबंध ही नहीं था उसके उन क्षेत्रों में पड़ गए। यही वह सूत्र है जो हमे इतिहास सुदूर अवस्था तक ले जाता है। इसे आप हिंदुत्व कह सकते हैं, भारतीयता कह सकते हैं, और यह समझ सकते हैं कि अपनी ओर से किसी को अपना बनाए बिना समय-समय पर किसी भी रूप में आने वालों को य से आत्मसात करता है। केवल इस्लाम को जिस के जन्म के साथ ही युयुत्सा और गृहकलह जुड़ा हुआ है, जो किसी का न हुआ, एक ही ग्रंथ में विश्वास रखने वालों को जोड़ कर नहीं रख सकता, उसके भारत में आने से यह प्रक्रिया बाधित हुई तो हैरानी की बात नहीं।...


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ब्रिटेन/भारत/नई दिल्ली।
.संयुक्त राज्य अमेरिका में स्टीफन नैप नाम के एक विदेशी लेखक की बहुत रिसर्च की हुई पुस्तक " भारत के खिलाफ अपराधों और प्राचीन वैदिक परंपरा की रक्षा की आवश्यकता " प्रकाशित हुई है। ये पुस्तक विदेशों में चर्चित हुई है मगर भारत में उपेक्षित, अवहेलित है। इस पुस्तक का विषय भारत में हिन्दुओं के मंदिरों की सम्पत्ति, चढ़ावे, व्यवस्था की बंदरबांट है। इस पुस्तक में दिए गए आँखें खोल देने वाले तथ्यों पर विचार करने से पहले आइये कुछ #काल्पनिक प्रश्नों पर विचार करें। 1.बड़े उदार मन, बिलकुल सैक्यूलर हो कर परायी बछिया का दान करने की मानसिकता से ही बताइये कि क्या हाजियों से मिलने वाली राशि का सऊदी अरब सरकार ग़ैर-मुस्लिमों के लिये प्रयोग कर सकती है ? प्रयोग करना तो दूर वो क्या वो ऐसा करने की सोच भी सकती है ? केवल एक पल के लिये कल्पना कीजिये कि आज तक वहाबियत के प्रचार-प्रसार में लगे, कठमुल्लावाद को पोषण दे रहे, परिणामतः इस्लामी आतंकवाद की जड़ों को खाद-पानी देते आ रहे सऊदी अरब के राजतन्त्र का ह्रदय परिवर्तन हो जाता है और वो विश्व-बंधुत्व में विश्वास करने लगता है। सऊदी अरब की विश्व भर में वहाबियत के प्रचार-प्रसार के लिये खरबों डॉलर फेंकने वाली मवाली सरकार हज के बाद लौटते हुए भारतीय हाजियों के साथ भारत के मंदिरों के लिये 100 करोड़ रुपया भिजवाती है। कृपया हँसियेगा नहीं ये बहुत गंभीर प्रश्न है। 2.क्या वैटिकन आने वाले श्रद्धालुओं से प्राप्त राशि ग़ैर-ईसाई व्यवस्था में खर्च की जा सकती है ? कल्पना कीजिये कि पोप भारत आते हैं। दिल्ली के हवाई अड्डे पर विमान से उतरते ही भारत भूमि को दंडवत कर चूमते हैं। उठने के साथ घोषणा करते हैं कि वो भारत में हिन्दु धर्म के विकास के लिये 100 करोड़ रुपया विभिन्न प्रदेशों के देव-स्थानों को दे रहे हैं। तय है आप इन चुटकुलों पर हँसने लगेंगे और आपका उत्तर निश्चित रूप से नहीं होगा। प्रत्येक धर्म के स्थलों पर आने वाले धन का उपयोग उस धर्म के हित के लिए किया जाता है। तो इसी तरह स्वाभाविक ही होना चाहिए कि मंदिरों में आने वाले श्रद्धालुओं के चढ़ावे को मंदिरों की व्यवस्था, मरम्मत, मंदिरों के आसपास के बुनियादी ढांचे और सुविधाओं के प्रशासन, अन्य कम ज्ञात मंदिरों के रख-रखाव, पुजारियों, उनके परिवार की देखरेख, श्रद्धालुओं की सुविधा के लिये उपयोग किया जाये। अब यहाँ एक बड़ा प्रश्न फन काढ़े खड़ा है। क्या मंदिरों का धन मंदिर की व्यवस्था, उससे जुड़े लोगों के भरण-पोषण, आने वाले श्रद्धालुओं की व्यवस्था से इतर कामों के लिये प्रयोग किया जा सकता है ? 3.#असली_बात अब आइये इस पुस्तक में दिए कुछ तथ्यों पर दृष्टिपात करें। आंध्र प्रदेश सरकार ने मंदिर अधिकारिता अधिनियम के तहत 43,000 मंदिरों को अपने नियंत्रण में ले लिया है और इन मंदिरों में आये चढ़ावे और राजस्व का केवल 18 के प्रतिशत मंदिर के प्रयोजनों के लिए वापस लौटाया जाता है। तिरुमाला तिरुपति मंदिर से 3,100 करोड़ रुपये हर साल राज्य सरकार लेती है और उसका केवल 15 प्रतिशत मंदिर से जुड़े कार्यों में प्रयोग होता है। 85 प्रतिशत राज्य के कोष में डाल दिया जाता है और उसका प्रयोग सरकार स्वेच्छा से करती है। क्या ये भगवान के धन का ग़बन नहीं है ? इस धन को आप और मैं मंदिरों में चढ़ाते हैं और इसका उपयोग प्रदेश सरकार हिंदु धर्म से जुड़े कार्यों की जगह मनमाना होता है। उड़ीसा में राज्य सरकार जगन्नाथ मंदिर की बंदोबस्ती की भूमि के ऊपर की 70,000 एकड़ जमीन को बेचने का इरादा रखती है। 4.केरल की कम्युनिस्ट और कांग्रेसी सरकारें गुरुवायुर मंदिर से प्राप्त धन अन्य संबंधित 45 हिंदू मंदिरों के आवश्यक सुधारों को नकार कर सरकारी परियोजनाओं के लिए भेज देती हैं। अयप्पा मंदिर से संबंधित भूमि घोटाला पकड़ा गया है। सबरीमाला के पास मंदिर की हजारों एकड़ भूमि पर कब्ज़ा कर चर्च चल रहे हैं। केरल की राज्य सरकार त्रावणकोर, कोचीन के स्वायत्त देवस्थानम बोर्ड को भंग कर 1,800 हिंदू मंदिरों को अधिकार पर लेने के लिए एक अध्यादेश पारित करने के लिए करना चाहती है। 5.कर्णाटक की भी ऐसी स्थिति है। यहाँ देवस्थान विभाग ने 79 करोड़ रुपए एकत्र किए गए थे और उसने उस 79 करोड़ रुपये में से दो लाख मंदिरों को उनके रख-रखाव के लिए सात करोड़ रुपये आबंटित किये। मदरसों और हज सब्सिडी के लिये 59 करोड़ दिए और लगभग 13 करोड़ रुपये चर्चों गया। कर्नाटक में दो लाख मंदिरों में से 25 प्रतिशत या लगभग 50000 मंदिरों को संसाधनों की कमी के कारण बंद कर दिया जायेगा। क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि महमूद गज़नी तो 1030 ईसवी में मर गया मगर उसकी आत्मा अभी भी हज़ारों टुकड़ों में बाँट कर भारत के मंदिरों की लूट में लगी हुई है ? 6.यहाँ यह प्रश्न उठाना समीचीन है कि आख़िर मंदिर किसने बनाये हैं ? हिंदु समाज के अतिरिक्त क्या इनमें मुस्लिम, ईसाई समाज का कोई योगदान है ? बरेली के चुन्ना मियां के मंदिर को छोड़ कर सम्पूर्ण भारत में किसी को केवल दस और मंदिर ध्यान हैं जिनमें ग़ैरहिंदु समाज का योगदान हो ? मुस्लिम और ईसाई समाज कोई हिन्दू समाज की तरह थोड़े ही है जिसने 1857 के बाद अंग्रेज़ी फ़ौजों के घोड़े बांधने के अस्तबल में बदली जा चुकी दिल्ली की जामा-मस्जिद अंग्रेज़ों से ख़रीद कर मुसलमानों को सौंप दी हो। 7.यहाँ ये बात ध्यान में लानी उपयुक्त होगी कि दक्षिण के बड़े मंदिरों के कोष सामान्यतः संबंधित राज्यों के राजकोष हैं। एक उदाहरण से बात अधिक स्पष्ट होगी। कुछ साल पहले पद्मनाभ मंदिर बहुत चर्चा में आया था। मंदिर में लाखों करोड़ का सोना, कीमती हीरे-जवाहरात की चर्चा थी। टी वी पर बाक़ायदा बहसें हुई थीं कि मंदिर का धन समाज के काम में लिया जाना चाहिये। यहाँ इस बात को सिरे से गोल कर दिया गया कि वो धन केवल हिन्दू समाज का है, भारत के निवासी हिन्दुओं के अतिरिक्त अन्य धर्मावलम्बियों का नहीं है। उसका कोई सम्बन्ध मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी समाज से नहीं है। वैसे वह मंदिर प्राचीन त्रावणकोर राज्य, जो वर्तमान में केरल राज्य है, के अधिपति का है। मंदिर में विराजे हुए भगवान विष्णु महाराजाधिराज हैं और व्यवस्था करने वाले त्रावणकोर के महाराजा उनके दीवान हैं। नैतिक और क़ानूनी दोनों तरह से पद्मनाभ मंदिर का कोष वस्तुतः भगवान विष्णु, उनके दीवान प्राचीन त्रावणकोर राजपरिवार का, अर्थात तत्कालीन राज्य का निजी कोष हैं। उस धन पर क्रमशः महाराजाधिराज भगवान विष्णु, त्रावणकोर राजपरिवार और उनकी स्वीकृति से हिन्दू समाज का ही अधिकार है। केवल हिन्दु समाज के उस धन पर अब वामपंथी, कांग्रेसी गिद्ध जीभ लपलपा रहे हैं। 8.यहाँ एक ही जगह की यात्रा के दो अनुभवों के बारे में बात करना चाहूंगा। वर्षों पहले वैष्णव देवी के दर्शन करने जाना हुआ। कटरा से मंदिर तक भयानक गंदगी का बोलबाला था। घोड़ों की लीद, मनुष्य के मल-मूत्र से सारा रास्ता गंधा रहा था। लोग नाक पर कपड़ा रख कर चल रहे थे। हवा चलती थी तो कपड़ा दोहरा-तिहरा कर लेते थे। काफ़ी समय बाद 1991 में फिर वैष्णव देवी के दर्शन करने जाना हुआ। तब तक जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल पद को जगमोहन जी सुशोभित कर चुके थे। आश्चर्यजनक रूप से कटरा से मंदिर तक की यात्रा स्वच्छ और सुविधाजनक हो चुकी थी। कुछ वर्षों में ये बदलाव क्यों और कैसे आया ? पूछताछ करने पर पता चला कि वैष्णव देवी मंदिर को महामहिम राज्यपाल ने अधिग्रहीत कर लिया है और इसकी व्यवस्था के लिये अब बोर्ड बना दिया गया है। अब मंदिर में आने वाले चढ़ावे को बोर्ड लेता है। उसी चढ़ावे से पुजारियों को वेतन मिलता है और उसी धन से मंदिर और श्रद्धालुओं से सम्बंधित व्यवस्थायें की जाती हैं। 9.ये स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ गया कि मंदिर जो समाज के आस्था केंद्र हैं, वो पुजारी की निजी वृत्ति का ही केंद्र बन गए हैं और समाज के एकत्रीकरण, हित-चिंतन के केंद्र नहीं रहे हैं। अब समाज की निजी आस्था अर्थात हित-अहित की कामना और ईश्वर प्रतिमा पर आये चढ़ावे का व्यक्तिगत प्रयोग का केंद्र ही मंदिर बचा है। मंदिर के लोग न तो समाज के लिये चिंतित हैं न मंदिर आने वालों की सुविधा-असुविधा उनके ध्यान में आती है। क्या ये उचित और आवश्यक नहीं है कि मंदिर के पुजारी गण, मंदिर की व्यवस्था के लोग अपने साथ-साथ समाज के हित की चिंता भी करें ? यदि वो ऐसा नहीं करेंगे तो मंदिरों को अधर्मियों के हाथ में जाते देख कर हिंदु समाज भी मौन नहीं रहेगा ? मंदिरों के चढ़ावे का उपयोग मंदिर की व्यवस्था, उससे जुड़े लोगों के भरण-पोषण, आने वाले श्रद्धालुओं की व्यवस्था के लिये होना स्वाभाविक है। ये 'त्वदीयम वस्तु गोविन्दः' जैसा ही व्यवहार है। साथ ही हमारे मंदिर, हमारी व्यवस्था, हमारे द्वारा दिए गये चढ़ावे का उपयोग अहिन्दुओं के लिये न हो ये आवश्यक रूप से करवाये जाने वाले विषय हैं। संबंधित सरकारें इसका ध्यान करें, इसके लिये हिंदु समाज का चतुर्दिक दबाव आवश्यक है अन्यथा लुटेरे भेड़िये हमारी शक्ति से ही हमारे संस्थानों को नष्ट कर देंगे ........


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सनातन भारत /नई दिल्ली ।
"गुदा" नाम की इन्द्रिय समलैंगिकता की इन्द्रिय है । पापों के बढ़ने पर उपस्थ नाम की कामेन्द्रिय अनियन्त्रित होकर सक्रिय हो जाती है और पापों का घड़ा भरने पर समलैंगिकता की इन्द्रिय सक्रिय हो जाती है । कामेन्द्रिय तो सन्तान भी उत्पन्न कर सकती है, किन्तु पापों का घड़ा भरने पर सन्तान उत्पन्न करने की अनुमति नहीं मिलती, तब समलैंगिकता की इन्द्रिय सक्रिय हो जाती है। यह सभी जीवों के लिए है, केवल मनुष्य के लिए नहीं । कोई प्रजाति जब एक्सटिंक्शन के पास पँहुचती है तो समलैंगिकों की संख्या और हिम्मत अचानक बढ़ने लगती है । ज्योतिष के प्राचीन ग्रन्थों में भी विकृत काम-वासना के ज्योतिषीय योगों का वर्णन है । पश्चात जगत में शारीरिक सुख प्रधान है और भारत में सर्वोच्च लक्ष्य है मोक्ष अतः भारत मे इसकी कोई जरूरत नहीं थी। कर्मेन्द्रियों में दो हैं : उपस्थ(लिंग) और गुदा। इनमे से पहला बहके तो मनुष्य हेटेरो-सेक्स-मैनिएक बन जाता है, और गुदा बहके तो समलैंगिक बनता है । यह एक मानसिक रोग है, जिसका उपचार है यम-नियम-आसान-प्राणायाम, सात्विक आहार-विहार-विचार, एवं गृह-शान्ति आदि, न कि क़ानून बनाकर इस मनोविकार को प्रोत्साहन देना !!! भारतीय संकृति न तो समलैंगिकता को उचित मानती है और न विसमलैंगिक वासना को। भारतीय संस्कृति में ब्रह्मचर्य जीवन का पहला चरण है, यह विषम / सम लैंगिक शिश्नदेवों को कौन सिखाये (ऋग्वेद में ऐसे लोगों को "शिश्नदेवा" कहा गया है) ? कामवासना जब हद से बढ़ जाय और जीवन में मनुष्य 4000 से अधिक बार वीर्यपात कर ले तो हिजड़ापन हावी होने लगता है, वीर्यपात की अधिकतम सम्भव संख्या 6000 है | हर वीर्यपात के साथ गुणसूत्र के अन्त में टेलोमेर का एक खण्ड टूटता है और आयु घटती है (आजकल पश्चिम के वैज्ञानिक गोरी नस्ल को अमरत्व देने के लिए शोध कर रहे हैं कि सेक्स करने पर भी टेलोमेर न टूटे इसका कोई उपाय निकल जाय), कुल 6000 खण्ड होते हैं। ऐसे व्यक्ति का हिजड़ापन बढ़ जाय और कारण-शरीर में गुदा-कर्मेन्द्रिय तमगुणी हो तो समलैंगिकता की ओर रुझान बढ़ता है दैवज्ञ बताते हैं कि जन्मकुण्डली में इसके कुछ योग होते हैं, जिनके कारक ग्रहों की दशा आने पर समलैंगिकता हावी होती है, दशा समाप्त होने पर नहीं रहती। पाँच कर्मेन्द्रियों द्वारा संकल्प सहित जो कार्य किया जाय वही "कर्म" है और वही फल उत्पन्न कर सकता है। अतः हस्त-पाद-वाक्-उपस्थ-गुदा इन पाँच कर्मेन्द्रियों के आधार पर "कर्म" के पाँच भेद हैं : हस्त-पाद द्वारा होने वाले समस्त कर्म, मुँह से निकले वचन, उपस्थ (लिंग) द्वारा कर्म अर्थात यौनक्रिया, और समलैंगिकता। मल और मूत्र का सामान्य रूप से त्याग कर्म नहीं है, वह विवशता है, किन्तु गलत जगह पर जानबूझकर किया जाय तब कर्म है और ऐसे कर्म का कारण है हस्त-पाद न कि उपस्थ और गुदा। सामान्य वासना का घड़ा भरने पर ही समलैंगिकता की ओर मनोवृत्ति होती है, समलैंगिकता जीव के पतन का आखिरी सोपान है, और किसी प्रजाति में यदि जनसंख्या का 13वाँ हिस्सा समलैंगिक हो जाए तो उस पूरी प्रजाति का extinction आरम्भ हो जाता है जो वापस नहीं लौटाया जा सकता। आधुनिक मानव प्रजाति में extinction का स्विच दब चुका है। --शिव नारायण जी...


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मथुरा /कश्मीर।
श्रीकृष्ण और कश्मीर के संबंध -अग्निशेखर प्राचीन संस्कृत ग्रंथ 'नीलमतपुराण' का आरंभ ही जनमेजय की इस जिज्ञासा से होता है कि महाभारत के युद्ध में अनेक देशों के राजाओं ने भाग लिया था,उसमें कश्मीर मंडल का नरेश क्यों नहीं था। कश्मीर तो संसार में प्रधान प्रदेश है। व्यास के शिष्य वैशम्पायन उत्तर देते हैं कि महाभारत युद्ध से पहले कश्मीर नरेश दामोदर अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ एक स्वयंवर में वासुदेव कृष्ण के हाथों मारे गए थे। उस समय उसकी पत्नी यशोवती गर्भवती थी जिसका श्रीकृष्ण ने राज्याभिषेक किया था। उसके बाद रानी यशोवती ने एक पुत्र-रत्न को जन्म दिया था ,उसका नाम गोनंद द्वितीय रखा गया। महाभारत के समय नन्हा बच्चा होने के कारण उस बाल नरेश को न पाण्डवों की ओर से और न ही कौरवों की ओर से आमंत्रित किया गया था। 'नीलमतपुराण' में हमें कश्मीर की उत्पत्ति का पौराणिक उपाख्यान, उसकी प्राचीन संस्कृति,जन -जातियाँ,उसके रीति-रिवाज, तीर्थ-पर्व,परंपरा, सामाजिक, धार्मिक, उत्सव, और विधि-विधान आदि की विस्तृत जानकारियाँ मिलती हैं । यह भाषिक -संरचना की दृष्टि से कल्हण की 'राजतरंगिणी' से लगभग पाँच -छह सौ वर्ष पुराना छठी शताब्दी का ग्रंथ माना जाता है। ।। दामोदर क्यों गए थे स्वयंवर में कृष्ण को मारने ।। किंवदंती है कि मगध सम्राट जरासंध और कश्मीर नरेश गोनंद आपस में संबंधी थे।कदाचित् मौसेरे भाई।कल्हण 'राजतंगिणी' (1/59) में गोनन्द को 'जरासंधेन बन्धुना' कहकर उसे उसका बन्धु घोषित करता है। जरासंध ने अपनी दो बेटियाँ अस्ति और प्राप्ति कंस को ब्याही थीं । महाभारत से बरसों पहले की बात है।कुछ तथ्यों के आधार पर कहा जाता है यह घटना महाभारत युद्ध से कोई बीस वर्ष पुरानी है। श्रीकृष्ण ने मथुरा के राजा कंस का वध किया। अपनी कन्याओं के विधवा होने पर मगध सम्राट जरासंध क्रुद्ध हुआ।उसने मथुरा राज्य के उत्तराधिकारी के रूप में कंस के पुत्र शूरसेन को आगे किया। इसके साथ ही अपने दामाद कंस की हत्या के बदले की भावना से जरासंध ने विशाल सेना लेकर श्रीकृष्ण की मथुरा पर चारों तरफ से धावा बोल दिया था। इसमें जरासंध ने अपने अनेक सहयोगी मित्र राजाओं का सैन्य सहायता के लिए आह्वान किया था। श्रीकृष्ण और बलभद्र अपनी वृष्णिसेना सहित चारों तरफ से घिर गये। डाॅ.रघुनाथ सिंह अपनी पुस्तक 'काश्मीर कीर्ति कलश', (पृ 8 पर पाद टिप्पणी) में कहते हैं, " महाभारत सभापर्व के अनुसार 18 राजकुलों ने इस युद्ध में भाग लिया था।परंतु हरिवंश पुराण में जो तालिका दी गयी है उसके अनुसार कम से कम 40 भारतीय राजाओं ने जरासंध की ओर से युद्ध किया था।श्रीकृष्ण की ओर से किन राजाओं ने भाग लिया था इसका उल्लेख नहीं मिलता।गोनंद का नाम सब तालिकाओं में है।" जरासंध के बंधु कश्मीरनरेश गोनंद ने अपनी यशस्वी सेना कश्मीर वाहिनी के साथ मथुरा पहुंचकर उसे पश्चिम की ओर से घेर लिया था। कश्मीर नरेश गोनंद के साथ इस भयानक युद्ध में श्रीकृष्ण की हतोत्साहित सेना हथियार डाल देने का मन बना ही रही थी कि सहसा हल उठाए श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम अपनी वृष्णि सेना की एक टुकडी के साथ गोनंद से भिड गये।दोनों समान बलशाली थे।महापराक्रमी भी। कल्हण राजतरंगिणी (तरंग 1, श्लोक 59-63 ) में इस युद्ध का विशद वर्णन करता है। उसके अनुसार युद्ध के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब यादवी सेना पलायन उन्मुख हुई। भग्न हुई उस सेना की रक्षा के लिए लांगलध्वज (बलराम) उस योद्धा (कश्मीर नरेश गोनन्द) से युद्ध में रत हुए। अंततः गोनंद वीरगति को प्राप्त हुए। गोनंद के बाद उनका पुत्र दामोदर कश्मीर के राजा हुए।वह मथुरा में अपने पिता की हत्या और कश्मीर की सेना की पराजय का प्रतिशोध लेने के अवसर की प्रतीक्षा में उतावला था ।उसने अपने आदर्श नेतृत्व में चतुरंगिणी सेना को अस्त्र शस्त्र से लैस और शौर्य तथा उत्साह से अद्वितीय बनाया था। ऐसे में एकदिन राजा दामोदर ने (राजतरंगिणी1/66 ) सुना कि गान्धारों के सिन्धु तट आयोजित कन्या स्वयंवर में श्रीकृष्ण सहित वृष्णि आमंत्रित हैं। कश्मीर नरेश दामोदर के लिए यह अपने पिता के वध का प्रतिशोध लेने का सही अवसर था।वह अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ गान्धारों के सिन्धुतट की ओर बढ़े ।सिन्धुतट के निकट कश्मीर वाहिनी ने श्रीकृष्ण और उनकी वृष्णि सेना का मार्ग रोका।दोनों सेनाओं में देर तक भयंकर युद्ध हुआ। स्वयंवर मंडप पर मातम छा गया। डाॅ.रघुनाथ सिंह के शब्दों में,"श्रीकृष्ण ने देखा-अपनी सेना का बुरी तरह होता संहार।उन्हें आशा न थी कि कश्मीरी मथुरा के पश्चात् इतने शीघ्र पुनः तैयारी कर लेंगे ।वे यादवी सेना के पराजय की कल्पना करने लगे।पराजय समीप दिखाई पड़ती थी।श्रीकृष्ण ने चक्र उठाया।"(काश्मीर कीर्ति कलश,पृ.13) पराक्रमी कश्मीर नरेश दामोदर का शीष धड़ से अलग होकर भूमि पर गिर पड़ा। पराजित सेना वापस कश्मीर लौट आई। ।। गर्भवती रानी का राज्याभिषेक।। स्वयंवर समारोह के बाद श्रीकृष्ण ने, ऐसा प्रतीत होता है, इस राजनीतिक घटनाक्रम के दूरगामी परिणामों को देखते हुए एक सुचिंतित कूटनीति से काम लिया।उन्होंने अप्रत्याशित रूप से कश्मीर नरेश दामोदर की गर्भवती विधवा रानी का राज्याभिषेक कर उसे कश्मीर के गौरवशाली सिंहासन पर बिठाया। यह निर्णय दोनों के लिए सरल न रहा होगा । श्रीकृष्ण ने इस अनोखी पहल से एक पंथ सौ काज किए। डाॅ. रघुनाथ सिंह ने इस प्रसंग की सुसंगत व्याख्या की है।उनके निष्कर्ष देखें तो श्रीकृष्ण ने पहली बार भारत में किसी स्त्री को सिंहासन सौंपा जो विधवा थी।विधवाओं को अशुभ मानने की रूढि को तोड़ा ।वह गर्भवती होने पर भी युद्ध में पति के साथ कश्मीर से गान्धार के सिन्धुतट गयी थी। एक पराक्रमी सैनिक की तरह। श्रीकृष्ण ने गर्भवती रानी का अभिषेक कर यह भी संकेत दिया कि यशोवती का गर्भस्थ शिशु ही जन्म लेने के बाद कश्मीर का राजा होगा । 'भविष्यत् पुत्र राज्यार्थं तस्य देशस्य गौरवात् ' (नीलमतपुराण,श्लोक 9) यह एक नयी परंपरा थी। एक विधवा को पति की सम्पत्ति का अधिकार दिया । श्रीकृष्ण चाहते तो कश्मीर के सिंहासन पर अपने किसी मथुरावासी को भी राज्य दे कर कश्मीर को अपना उपनिवेश बना सकते थे। उनके पूर्ववर्ती राम ने भी लंका-नरेश रावण के वध के बाद उसके भाई विभीषण का ही राज्याभिषेक किया था।हालाँकि यशोवती और विभीषण की भूमिकाएँ सर्वथा अलग थीं । राज्याभिषेक के बाद यशोवती ने जब एक पुत्र-रत्न को जन्म दिया वह उस शिशु नरेश की संरक्षिका बनी।इस तरह भारत में पहली बार 'राजमाता' नामक संस्था की शुरुआत हुई लगती है जो आगे चलकर 'प्रजामाता'(राज.1/73) भी कहलायी। आज हम पौराणिक उपाख्यान के आधार पर यशोवती को संसार की पहली स्त्री साम्राज्ञी या अभिभाविका या राजमाता कह सकते हैं जो बाल गोनन्द के वयस्क होने (लगभग पंद्रह -सोलह वर्ष ) तक मंत्रिमंडल के परामर्श से कश्मीर का राजकाज चलाती रही। ।। राज्याभिषेक सिंध में या कश्मीर में ।। अब प्रश्न उठता है कि क्या यह राज्याभिषेक समारोह गान्धार के सिन्धुतट पर स्वयंवर स्थल के समीपवर्ती क्षेत्र में कहीं हुआ हो सकता है, जैसा कि डाॅ.रघुनाथ सिंह मानते हैं ।चाहे दामोदर का वहीं कहीं दाह-संस्कार भी हुआ हो। वैसे इस बात का भी नीलमतपुराण में कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता ।यह डाॅ. रघुनाथ सिंह की कल्पना हो सकती है। कल्हण 'धीर और चक्रवर्ती' उस राजा (दामोदर ) के वध की बात (राज.1/69) करते ही अगले श्लोक में कहते हैं, " यदुकुल श्रेष्ठ श्रीकृष्ण ने राज्य (कश्मीर जाकर ? ) पर दामोदर की गर्भवती पत्नी यशोवती का द्विजों से अभिषेक कराया। यह कितने दिनों बाद की घटना है इस पर नीलमतपुराण और राजतरंगिणी दोनों चुप हैं । डाॅ.रघुनाथ सिंह का यह भी मानना है कि इस निमित्त श्रीकृष्ण कश्मीर आए और उन्होंने यशोवती का राज्याभिषेक किया ,इसका कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं । नीलमतपुराण इस विषय में क्या कहता है,हमें श्लोक क्रमांक 6,7 और 8 देखने होंगे ।क्रमानुसार डाॅ वेदकुमारी घई कृत उनके शब्दार्थ इस तरह हैं : ".......(दामोदर ) अपनी चतुरंगिणी सेना लेकर वासुदेव के पुत्र माधव से युद्ध करने के लिए किसी स्वयंवर में गया हुआ था ।।6।।" "वहाँ उसका बुद्धिमान वासुदेव के साथ वैसा ही युद्ध हुआ जैसा वासुदेव के पुत्र कृष्ण का नरकासुर के साथ हुआ था ।।7।।" "फिर वह (कश्मीरनरेश) वासुदेव द्वारा मार गिराया गया ।।8।।" "उस (कश्मीर )प्रदेश के गौरव के कारण वासुदेव ने राजा की गर्भवती पत्नी का राज्याभिषेक किया ताकि भविष्य में उत्पन्न होने वाला उस (राजा) का पुत्र वहाँ राज्य कर सके ।।9।। इन तीनों श्लोकों में कोई संकेत नहीं कि दामोदर के वध के बाद यशोवती का राज्याभिषेक गान्धार के उसी सिन्धु तट पर हुआ। अब श्लोक क्रमांक 11 में वैशम्पायन से पूछे गये जनमेजय के प्रश्न पर ध्यान दें - देशस्य गौरवं चक्रे किमर्थं द्विजसत्तम । वासुदेवो महात्मा यदभ्यषिञ्चत् स्वयं स्त्रियं।। अर्थात् "हे द्विजों में श्रेष्ठ द्विज ! पवित्रात्मा वासुदेव ने स्वयं एक नारी का राज्याभिषेक करके (कश्मीर ) प्रदेश को यह सम्मान क्यों प्रधान किया ?" इस प्रश्न में "वासुदेवो...स्वयं स्त्रियं " और "देशस्य गौरवं" पर ध्यान देने की ज़रूरत है।अर्थात् श्रीकृष्ण ने स्वयं एक स्त्री का राज्याभिषेक किया और कश्मीर का सम्मान बढ़ाया । यह दोनों बातें रण-क्षेत्र सिन्धु तट पर संभव न हुई होंगी।सेनाएं वीरगति को प्राप्त हुए अपने राजा का शव लिए तत्काल कश्मीर लौटी होंगी ।उसके बाद श्रीकृष्ण के दूत इस निमित्त संदेश लेकर यशोवती के पास आए होंगे । फिर एक दिन श्रीकृष्ण स्वयं उसका राज्याभिषेक करने हेतु कश्मीर आए होंगे ।वह कश्मीर की उत्पत्ति के आख्यान और उसकी आध्यात्मिक ऊँचाइयों के प्रति सुविज्ञ लगते हैं ।कूटनीतिक दृष्टि से यह कश्मीर-महात्म्य का ज्ञान श्रीकृष्ण के काम आया। वह यशोवती को सम्मानित करने के पीछे अपने असंतुष्ट मंत्रियों को स्पष्टीकरण देते हुए कश्मीर के धार्मिक महात्म्य का उल्लेख करते हुए उन्हें समझाते हैं कि जो देवी पार्वती हैं वही कश्मीरा है (नीलमतपुराण,श्लोक 12)। कल्हण के अनुसार भी कि ईर्ष्या -द्वेष युक्त अपने सचिवों को उस समय श्रीकृष्ण ने यह पौराणिक श्लोक (राज.1/72) सुनाकर निवारित किया : " कश्मीर की भूमि पार्वती है।वहाँ का राजा हर का अंश है।कल्याण के इच्छुक लोग दुष्ट होने पर भी उसका अपमान न करें ।" ऐसा कहकर उन्होंने कश्मीर नरेश गोनन्द और उसके उत्तराधिकारी राजा दामोदर की हत्याओं से क्रुद्ध कश्मीर की जनता के मर्माहत मन को ,आज की भाषा में कहें तो, कूटनीतिक मरहम (हीलिंग टच) से सहलाने की कोशिश की लगता है। प्रश्न उठता है कि यदि श्रीकृष्ण सच में मानते थे कि कश्मीर का राजा हर का अंश है तो वह सबसे पहले गोनन्द को और बाद में दामोदर को क्यों मारते हैं? वह कूटनीति या रणनीति से काम लेकर इसी पवित्र भावना से दूत भेजकर गोनन्द को मथुरा युद्ध में भाग न लेने से रोक भी सकते थे। दामोदर के वध की नौबत ही न आती। यह मेरी निजी राय है। ।। श्रीकृष्ण से दीर्घकालिक नाराज़गी ।। मथुरा के युद्ध में श्रीकृष्ण के भाई बलराम के हाथों मारे गये कश्मीर नरेश गोनन्द के पोते का नाम गोनन्द द्वितीय रखना मुझे साभिप्राय लगता है। सामान्य नहीं ।इस नामकरण के पीछे गोनन्द और दामोदर की हत्याओं की स्मृति और प्रतिशोध की भावना निहित लगती है। क्या यह अकारण हो सकता है जिस श्रीकृष्ण को संसार विष्णु का अवतार मान चुका था उसे छठी शती में रचित 'नीलमतपुराण' के प्रारम्भिक श्लोकों (क्रमांक 7और 9 ) में 'वासुदेवो महात्मा' तथा 'वासुदेवेन धीमता '( बुद्धिमान वासुदेव ) कहकर संबोधित करता है,किसी देवत्व सूचक पद से नहीं । क्या यह अकारण हो सकता है कि कश्मीर घाटी में हमें कोई प्राचीन ऐतिहासिक कृष्ण मंदिर या तीर्थ नहीं मिलता।राजा अवंतीवर्मन के मंदिर के भग्नावशेषों में गोपियों के संग श्रीकृष्ण का मिलना नवीं शताब्दी की बात है। राजतरंगिणी में हमें पहली बार उल्लेख मिलता है कि मरणासन्न राजा अवंतीवर्मन को गीता सुनाई जा रही है। नीलमतपुराण में वर्णित विष्णु के बुद्धावतार सहित दस अवतारों में मान्य कृष्णावतार का मिलना भी इसे छठी शताब्दी ( नीलमतपुराण का रचनाकाल) के बाद की घटना सिद्ध करता है। अब तक कश्मीर ने अपनी पारंपरिक कटु स्मृतियों से ऊपर उठकर श्रीकृष्ण को विष्णु के अवतार के रूप में स्वीकार कर लिया था।घर घर में भगवत् गीता का ज्ञान पहुँच चुका था। प्रो.वेदकुमारी घई का यह कथन विचारणीय है कि जहाँ तक नीलमतपुराण का प्रश्न है,इसमें कृष्णावतार के विकास की वह स्थिति दिखाई देती है जिसमें कृष्ण, वासुदेव, नारायण और विष्णु सभी नाम एक ऐसे देव के लिए प्रयुक्त हैं जिसका पालन गायों के मध्य हुआ।(नीलमत पुराण : सांस्कृतिक तथा संस्कृतपाठ एवं हिन्दी अनुवाद, पृ.139) प्राचीन कश्मीर में शताब्दियों तक श्रीकृष्ण पर कश्मीर के निवासी अपने बच्चों के नाम नहीं रखते थे। काश्मीरी पंडितों के ये लोकप्रिय कृष्णपरक नाम जैसे वासुदेव,कन्हैयालाल,गिरिधारीलाल, गोकलनाथ,गोपीकृष्ण,राधेश्याम,अवतारकृष्ण,राधाकृष्ण, हरिकृष्ण, माधव जु ,मोहनलाल, बंसीलाल, द्वारकानाथ आदि नाम तो बहुत बाद की बात है। ।। कश्मीर में गीता की लोकप्रियता ।। जैसे आद्य शंकराचार्य ने अपने अद्वैतमत के लिए गीता पर गहन विचार कर शंकरभाष्य रचा था ठीक उसी प्रकार कश्मीर के शैवाचार्यों ने भी गीता पर विचार करना शुरु किया। आचार्य अभिनवगुप्त कृत प्रसिद्ध 'श्रीमद् भगवद्गीतार्थ संग्रह ' की भूमिका में (प्रो.) (पृथ्वीनाथ) पुष्प कहते हैं, "शिवाद्वय की दृष्टि से भगवद्गीता पर विचार करने की जो प्रथा कश्मीर में नवीं शती तक उभर आई थी उसी को अभिनवगुप्त ने अपनी प्रतिभा के स्पर्श से और भी सटीक कर दिया।" ।। कश्मीर में विद्यमान महाभारत की पांडुलिपि।। प्रसिद्ध कश्मीरी शैवाचार्य (स्वर्गीय)स्वामी लक्ष्मण जी देश में उपलब्ध महाभारत की पांडुलिपि और कश्मीर में विद्यमान महाभारत की पांडुलीपि के अनेक श्लोकों में पारस्परिक पाठभेद गिनाते हुए आचार्य अभिनवगुप्त की 'श्रीमद्गीतार्थसंग्रह' के पुरोवाक् में कहते हैं, "भारतवर्ष में प्रचलित भगवत् गीता के श्लोक तो यहीं के महाभारत की पांडुलिपि से मेल खाते हैं किन्तु अभिनवगुप्त आचार्य द्वारा संग्रहीत इस भगवत् गीता के श्लोक काश्मीरिक महाभारत की पांडुलिपि से मिलते हैं ।" अर्थात् कश्मीर में महाभारत की जो प्राचीन पांडुलिपि की प्रामाणिकता असंदिग्ध है। ।। जन्माष्टमी नहीं, 'ज़रमॅसतम' ।। कश्मीरियों में प्रचलित पारंपरिक वैदिक ज्योतिष के अनुसार श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्णा सप्तमी की मध्यरात्रि को हुआ जिसे वे 'उदयात् उदयस्ते भानुः' सिद्धांत के अनुसार अष्टमी नहीं गिनते। अर्थात् एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक पूरा दिन होता है।इसलिए मध्य रात्रि में जन्मे श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव कश्मीरी पंडित सप्तमी को ही मनाते हैं,जिसे वे 'ज़रमॅ सतम' (जन्म -सप्तमी) कहते हैं । ऐसा प्रचलित है कि मध्यरात्रि को कंस की कारा में जन्मे नवजात कान्हा को चोरी छिपे गोकुल ले जाया गया था। गोकुल में दूसरी सुबह यानी अष्टमी के दिन यह समाचार गोकुलवासियों ने सुना।इसलिए उन्होंने इसे जन्माष्टमी कहा। कश्मीर में श्रीकृष्ण को 'महात्मा वासुदेव ' और 'बुद्धिमान वासुदेव ' से विष्णु के अवतार तथा ' सर्व उपनिषद रूपी गायों को दुहने वाले गोपालनंदन ' , अखिल ब्रह्माण्डीय चेतना के अपूर्व दार्शनिक ,गोपी-वल्लभ, धर्म की स्थापना करने वाले अवतारी पुरुष स्वरूप में हृदय से स्वीकारे जाने तक निश्चित रूप से पीढ़ियों का समय और श्रम लगा होगा । कश्मीर में हिन्दुओं की सामूहिक जलावतनी के वर्ष 1989-90 तक श्रीकृष्ण का जन्म पारंपरिक लोक- उत्सवधर्मिता से घर-घर और प्रत्येक शहर ,गाँव,देहात में मनाया जाता था। हर्षोल्लास से शोभा यात्राएँ निकलती थीं।मंदिरों में कथाएँ होती थीं।कहीं कहीं रास-लीलाएं भी। घरों में कान्हा के झूले सजाए जाते।लोग चाव से उपवास रखते।साग,बैंगन,सेब के पकौड़े बनते। विवाहित बेटियों के यहाँ श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के शगुन स्वरूप नाना फल और कच्चे अखरोट भेजे जाते। ।। कश्मीर में कृष्ण काव्य परंपरा ।। 'कश्मीरी साहित्य का इतिहास' के लेखक डाॅ. शशिशेखर तोषखानी (पृष्ठ 133) कश्मीरी भक्ति काव्य के तत्कालीन काव्य परिदृश्य पर बात करते हुए एक महत्त्वपूर्ण सूचना देते हैं : "भक्ति की भारतीय व्यापी लहर ने उन्नीसवीं शती में आकर ही कश्मीर की भूमि का स्पर्श किया हो -ऐसी बात नहीं ,पर काव्य के रूप में उसका लिखित साक्ष्य सत्रहवीं शती से पहले नहीं मिलता।" यद्यपि पंद्रहवीं शताब्दी में रचित भट्टावतार की 'बाणासुर कथा', उन्हीं के शब्दों में, हरिवंश पुराण के ख्यात् उषा-अनिरुद्ध तथा कृष्ण-बाणासुर युद्ध के प्रसंगों से बुना गया है।यह भक्ति काव्य नहीं है। यह तो रही कश्मीरी काव्य की बात। क्षेमेंद्र के यहाँ ग्यारहवीं शती में उनके संस्कृत काव्य 'दशावतार' में श्रीकृष्ण हमें विष्णु के अवतार के रूप में वर्णित मिलते हैं । बाद में उन्नीसवीं शताब्दी में कश्मीरी परिदृश्य लीला-कवि परमानंद, लक्ष्मण कौल बुलबुल,कृष्ण जु राज़दान कृत राधा स्वयंवर,मोहिनी प्रसंग,सुदामा चरित,मन वृंदावन जैसी लोकप्रिय किन्तु महत्त्वपूर्ण कृष्ण काव्य से आप्लावित रहा। 0...


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