जम्मू कश्मीर।
"आधुनिक कश्मीरी कविता के सात दशक" से चयन ● अग्निशेखर बहुत दिनों से सोच रहा हूँ कि अपने हज़ारों फेसबुक मित्रों से आधुनिक कश्मीरी कविताओं से उनका परिचय कराऊं। मुझे यहाँ यह बताने की आवश्यकता नहीं कि मैं तीन दशकों से अधिक समय से हिन्दी में अपनी मौलिक सृजनात्मक सक्रियता के साथ साथ मातृभाषा कश्मीरी से अनुवाद कर्म में भी रत रहा हूँ। मेरे अनुवाद तो ' जनसत्ता ',कतार', 'पहल-36', 'वसुधा', 'समकालीन भारतीय साहित्य' , 'नया ज्ञानोदय ', 'प्रगतिशील आकल्प' , 'शीराज़ा' आदि सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं व संकलनों में प्रकाशित होते रहे हैं। इस कोरानाकाल में मैंने "आधुनिक कश्मीरी कविता के सात दशक" शीर्षक से विशद भूमिका सहित प्रकाशन के लिए एक पाण्डुलिपि तैयार कर रहा हूँ । प्रकाशक तो मिल ही जाएगा। इन्हीं अनूदित कविताओं में से प्रत्येक कवि की मात्र एक कविता मैं क्रमबद्ध ढंग से हर दिन या दूसरे दिन पोस्ट करता जाऊंगा। यों तो इस आगामी अनुवाद पुस्तक में मैंने सत्तर वर्षों के महत्वपूर्ण कवियों की कई कई कविताएँ रखी हैं,यहाँ उनकी केवल एक ही रचना पोस्ट की जाएगी। आधुनिक कश्मीरी कविताओं के मेरे चयन में आप ●मास्टर ज़िन्द कौल/ ●गुलाम अहमद महजूर/ ●अब्दुल अहद आज़ाद/ ●मिर्जा आरिफ/ ●दीनानाथ नादिम/ ●गुलाम रसूल नाज़की/ ●रहमान राही/ ●अमीन कामिल/ आदि से समकालीन कवियों की चयनित रचनाओं से परिचित होंगे। और आप पसंद भी करेंगे,ऐसी मेरी आशा है। पुनश्च * इसके साथ साथ फेसबुक पर मेरी इस कोरानाकाल में ही शुरू की हुई शृंखला ● " निर्वासन में कवि " भी जारी रहेगी।इस शृंखला की 25 वीं किस्त कुछ ही दिनों में आपको पढने को मिलेगी। मैं अभिभूत हूँ आपकी सबकी सराहना से। सस्नेह...


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जम्मू/कश्मीर।
स्मृतिहीन भारतीय लोगो! आज ज्येष्ठ मास की निर्जला एकादशी है। आज जन्मतिथि है उस व्यक्तित्व की जिसने अन्तिम बार पूरे भारतीय वाङ्मय को समग्रता से एकत्र करके उसे सदा के लिए प्रामाणिक रूप से संरक्षित कर दिया। आज उसी महानतम आचार्य के जन्म की तिथि है, और वो आचार्य हैं 'महामाहेश्वराचार्य अभिनवगुप्त' जिन्हें हमारी परम्परा सम्मान से "अभिनवगुप्तपाद" कहती है। उनके इस नाम के पीछे भी एक रोचक कहानी है, जिसे आगे कहा जायेगा। वास्तव में आचार्य अभिनवगुप्त ही एकमात्र ऐसे आचार्य हैं जिन्होंने भारतीयता के प्रत्येक आंतरिक आयामों की उच्छिन्न परम्परा के बीच के अवकाश (स्थान) को भरा है, उसे लोकानुकूल रूप से तर्कपूर्ण ढंग से व्याख्यायित किया है, उनमें शोधन किया है, नवीन,मौलिक उद्भावनाएँ दी हैं,और बिखराव को समेट कर एक सूत्र में उपस्थापित किया है, और भारत को एक विश्वविजयी दर्शन दिया है। आचार्य अभिनवगुप्त ने समग्र भारतीय दर्शन, साहित्य-शास्त्र, नाट्य-शास्त्र, संगीत, साधनाविधि जैसे सभी ऐसे विषय जिनसे किसी संस्कृति का निर्माण व परिचालन होता है ,उन सब पर अपनी विशद लेखनी चलाई है। भारतीय ज्ञान परम्परा में यदि सदियों से कोई ऊहापोह या विवाद चला आ रहा हो और फिर यदि आचार्य अभिनवगुपउसपर अपना मत रख दिया है,तो वह विवाद सद्यः ही समाप्त होकर एक सामरस्यपूर्ण 'अभिनवसिद्धांत' को प्राप्त हो जाता है। ख़ैर यह एक परिचयात्मक आलेख ही है कोई शोध-पत्र नहीं। लगभग 7 वीं शताब्दी में काश्मीर के राजा ललितादित्य ने कन्नौज (तत्कालीन कान्यकुब्ज) पर विजय पाई और वहां से धुरन्धर विद्वान और शैवागम के आचार्य अत्रिगुप्त को अपने राज्य कश्मीर में ले आये, वहां वितस्ता नदी के तट पर भगवान शीतांशुमौलिन (शिव) का अतिविशाल मन्दिर बनवाया तथा अत्रिगुप्त को विद्याप्रसार के कार्य मे नियुक्त किया, उन्हीं आचार्य की पीढ़ी में लगभग 950 ईस्वी में आचार्य अभिनवगुप्त का जन्म हुआ, यह भारतीय ज्ञानपरम्परा के क्षेत्र में एक महनीया घटना थी। आचार्य अभिनवगुप्त के पिता का नाम श्री नृसिंहगुप्त /चुखुलुक और माता का नाम विमला/विमलकला था, वो एक योगिनी थीं (तंत्र में 16वीं कला को विमलकला कहते हैं) अतः आचार्य अभिनवगुप्त को उनके यशस्वी टीकाकार जयरथ ने "योगिनीभू" कहा है। व्याकरण उनके घर की विद्या थी,जिसमे आचार्य अभिनवगुप्त पारंगत थे उन्होंने व्याकरणिक कोटियों का उपयोग अपने दार्शनिक सिद्धांतों को समझाने के लिए किया है जो कि तर्क प्रणाली में एक अद्भुत महत्ता रखता है। आचार्य अभिनवगुप्त ने 50 से अधिक ग्रन्थ रचे। उन्होंने जो भी टीकाएँ लिखीं, वो अपने आप मे एक स्वतंत्र ग्रन्थ बन गए। उन्होंने समस्त 64 आगमों को एक-वाक्यता प्रदान करते हुए, उनमें सामरस्य करते हुए एक विशालकाय ग्रन्थ "तंत्रालोक" की रचना की, जिसे 'अशेषआगमोपनिषद' कहा जाता है,यह विशालकाय ग्रन्थ भारत की सम्पूर्ण साधनात्मक प्रक्रियाओं को अपने में समेटे हुए एक समुद्र की तरह लहराता है, ये हमारा दुर्भाग्य है कि हम इस समुद्र का अवगाहन नहीं करते हैं। तंत्रालोक में भारतीय साधना, रहस्य, कला सिद्धान्त ,दर्शन आदि का अत्यंत सहज विवेचन है। काश्मीर शैवदर्शन जिसे त्रिक या प्रत्यभिज्ञा दर्शन भी कहते हैं, वे उसके प्रतिष्ठापक आचार्य हैं। दार्शनिक प्रतिपादन में आचार्य अभिनव भारत के ही नहीं बल्कि विश्व के महानतम दार्शनिकों में अग्रगण्य हैं। रस सिद्धांत पर उनके मत की कीर्तिपताका को भला कौन नहीं जानता। इस बात पर काव्यप्रकाश के टीकाकार मणिक्यचन्द्र का बहुत सुन्दर पद्य भी मिलता है। साहित्य,दर्शन,संगीत,वास्तु के महानतम आचार्यों ने उन्हें अपने अपने ग्रन्थ में तत् तत् शास्त्रों का ज्ञाता मानकर उन्हें नमन किया है। आज हम जिस नाट्यशास्त्र को लेकर विश्व मे अपने कलात्मक प्रयोग और उनकी दार्शनिकता को लेकर स्वयं को गौरवान्वित अनुभूत करते हैं,उसका श्रेय आचार्य अभिनवगुप्त को है, क्योंकि नाट्यशास्त्र को हम जिस के द्वारा समझ पाते हैं, वह आचार्य अभिनवगुप्त की 'अभिनव-भारती' टीका ही है, उसमें आचार्य ने भारतीय संस्कृति के साहित्यिक और कलात्मक पक्षों को मूल रूप में हमारे सामने रख दिया है, उन्होंने नाट्यशास्त्र की व्याख्या में जो 600 वर्ष का बीच का रिक्त स्थान था, उसकी भी पूरी भरपायी उन उन पुराने आचार्यों के मत के साथ करके, हमें शोध की सहजता और भारतीय परम्परा के इतिहास की भी रक्षा की है। भारत में गीता के जो रहस्यात्मक व्याख्यान की परम्परा चली वह आचार्य ने ही प्रारम्भ की, उन्होंने दुराग्रहों का खंडन किया और सर्वसमावेशी सामरस्य का स्थापन किया। उन्होंने विभिन्न गुरुओं से जाकर विद्या का अध्ययन किया था,लगभग 20 गुरुओं का नाम उन्होंने उल्लिखित किया है। इस बात पर भी उनका एक बहुत सुन्दर पद्य है। कश्मीर भारत का शारदा-पीठ रहा है, भारतीय ज्ञान परम्परा के पचासों उद्भट विद्वान वहां से निकले हैं। कश्मीर की परम्परा आचार्य अभिनव को "दक्षिणामूर्ति" (ज्ञान का देवता/शिव का एक रूप) मानती है। दक्षिण के विद्वान् मधुराज योगिन ने उनका जो पेन पोर्टेट बनाया है, उसके पद्य सुनकर उनकी भव्यता का पता चलता है। उन्होंने कश्मीर के बीरू नामक स्थान पर अपने भैरवस्तोत्र को गाते हुए 72 वर्ष की आयु में हज़ारों शिष्यों को जिस गुफा के द्वार पर रोककर अंदर जाकर समाधि ली थी,वह आज भी है,किन्तु उसपर कुछ बुरे लोगों ने कब्जा कर रखा है, जिसकी तसावीर कुछ वर्ष पूर्व आईं थीं। आज भारतीयों से वह गुफा अपने प्रत्यभिज्ञान की मांग करती है। आज बार बार कश्मीरियत शब्द आता है, सच्ची कश्मीरियत देखनी हो तो वह कश्मीर के बारे में कहे गए उनके मनोरम पद्यों में देखिए, उन्हें अपने कश्मीरी होने का बड़ा आनन्द है, और वो उसकी प्रशंसा भी करते हैं। यह आलेख मात्र कुछ बिंदुओं के परिचय के रूप में आज के दिन के लिए था, मैं इन सभी बिंदुओं पर लाइव सीरीज करने की सोच रहा हूँ। एक बात और मैं किसी और से शिकायत क्या करूँ, पर कश्मीरी-ब्राह्मण जो बड़े बड़े पदों पर रहे उन्होंने अपनी सन्ततियों को आचार्य अभिनवगुप्त के नाम से परिचित नहीं करवाया ,शैवदर्शन के बारे में नहीं बताया। ख़ैर समय आएगा,,, अंत मे मेरा एक पद्य- भेदसिद्धान्तजीमूतविध्वंसनविचक्षणम्। भजेsभिनवगुप्ताख्यं विमर्शानन्दबोधकम् ।। आनन्दबोधपर्याय शैवज्ञानमहार्णसे। खेचरीसंधृताङ्कायाभिनवगुरवे नमः।। भेद-सिद्धान्त रूपी पर्वत को विध्वंस करने में विशेष रूप से प्रवीण, विमर्श यानि चेतना के होने की सतत अनुभूति के आनन्द का हम सबको (अपनी विद्वता के माध्यम से) बोध कराने वाले अभिनवगुप्त नाम से ख्यात गुरु का मैं भजन करता हूँ। (भेद-सिद्धान्त- द्वैत-विचार/ इस चराचर को एक ही परम चेतना का विकास ना मानना) आनन्द-बोध (आने पूर्णस्वरूप के ज्ञान की रसात्मक अनुभूति) के पर्याय, शैव-दर्शन/आगमशास्त्र के महान समुद्र, खेचरी शक्ति को अपनी गोद में लेकर आनन्द मगन रहने वाले आचार्य अभिनवगुप्त गुरु को नमन है। नोट- (यहां खेचरी शक्ति कहा गया है ना कि खेचरी मुद्रा) खेचरी शक्ति:- दार्शनिक शब्दावली में जो विमर्श शक्ति है उसे तांत्रिक शब्दावली में खेचरी कहते हैं। यहां भाव यह हैं कि आचार्य अभिनवगुप्त चेतना के लिए आधार बनते हुए परमशिव रूप को प्राप्त हैं। --सर्वेश त्रिपाठी...


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नयी दिल्ली/लखनऊ।
दो कविताएं मेरे संकलन से...(पग बढ़ा रही है धरती) विरह शरद के अंतिम फूल झर गए नग्न गाछ गा रहा है... जल रही है प्रिय ऋतु जो आया था वह जा रहा है... मैंने उससे कहा थाम लो मेरे हाथ ! वह बोली, देखो... अपनी दृष्टि से ! मैंने देखा...उसके पीछे-पीछे चला गया है मेरा चाहना भी टंगा है उसका चेहरा मेरी आंख में जैसे टंगा रहता है पहर समय की रेख पर जैसा टंगा होता है कोई कंदील अमावस की छत पर... ------------------------------ प्रद्युम्न ठाकुर (गुड़गांव में जिस मासूम की नृशंस हत्या हुई) मां जब कहती है कि उसे ईश्वर ने आंखें ही क्यों दीं तब मुझे अचानक सुनाई पड़ता है.. जैसे कह रही हो, हो इसी कर्म पर वज्रपात ! और तब मैं किसी अंधी दुनिया में रोशन जिन्दगी का झूठा सच भी देखता हूं मां जब कहती है कि तोड़ डालते उसके हाथ-पांव गला क्यों रेत डाला तब मैं हत्या के घिसेपिटे बाइस्कोप में सिनेमाई बदलाव के रील पलटता हूं जब मैं सोचता हूं कि उसी एक क्षण भला प्रद्युम्न को क्यों जाना था बाथरूम तब मैं ऐसी ही स्तब्धकारी हत्याओं के काल से असंभव छेड़छाड़ करता हूं इससे अधिक तो मैं सोच नहीं पाता फिर मैं सोचता हूं कि मां का क्या होगा प्रद्युम्न तो एक द्युति है उसकी आंख और आत्मा में जलती हुई एक स्पर्श है हर हवा पर सवार एक धोखा है किसी कोने से धप्पा करता हुआ कभी सोता हुआ, कभी जागता, बतियाता कभी दीदी के बाल खींचता कभी खाने में हील हुज्जत करता कभी दोपहर के ढाई बजे का चीन्हा हुआ पदचाप सा बजता हुआ और आलिंगनबद्ध तो हर क्षण वह भला कैसे पार पा सकेगी इन भुतहा स्वरों, रूप, रस और आभासी स्पर्श से उसे तो न जाने कितने दिवस मास तक मरना होगा निरंतर ही मरती रहेगी वह जीवन की हर छटा में कौन जाने उसे कब मिलेगी मुक्ति इस मृत्यु से या मिल भी सकेगी कि नहीं......


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नई दिल्ली/काश्मीर।
डॉ ज्योत्सना मिश्रा की निःशब्द करती यह कविता आप सबके साथ साझा कर रहा हूँ । _____________ भूल जाओ जलावतनों को - डाॅ ज्योत्सना मिश्रा उन जलावतनों को भूल जाओ भूल जाओ उन तमाम गीतों को जो चिनारों ने साझा किये थे आसमानों से भूल जाओ उन सभी कहकहों को जो हवाओं ने डल झील के साथ मिल के लगाये कालीदास, सोमदेव ,वसुगुप्त, क्षेमराज,जोनराज, कल्हण, बिल्हण की तो वैसे भी किसे याद है भुला दो लल्द्यद को भी भुला दो,हब्बा खातून की सदा दीनानाथ नादिम और मोतीलाल क्यमू की किताबें हवाले कर दो दीमकों के मंटो को पाकिस्तान भेज दो चक़बस्त को भूलना मत भूलना उफ़क के किनारों को ताक़ीद कर दो सावधान रहें रातों की बेहिसाब तारीकियों से कि उग आता है बार बार एक बगावती चाँद अग्निशेखर उसे जलावतन करो जल्दी करो। बारूदी सुरंगों से पाट दो खेल के मैदान बो दो केसर की क्यारियों में एके-फोर्टी सेवन सुलगा दो स्कूलों की मेजें, कुर्सियां ताले डालो विश्व विद्यालयों में ध्यान रहे यहीं से लौटने की कोशिश करेंगें वो अपनी ज़मीन की मुहब्बत के मारे हुये लोग नदियों के नाम बदल दो वो उन्हें पुराने नामों से ढूंढते रह जायेंगें बदल दो रास्तों के नक्श नेस्तनाबूद कर दो उनके घर जल्दी करो वरना वो लौट आयेंगे हरगिज़ न भूलना राजतरंगिणि को दफ़न करना इतिहास में बड़ी ताक़त होती है दिलों को बदलने की । वो सिखा देंगें सहिष्णुता का पहला पाठ त्रिक शास्त्र पढ़ाकर वो विष्णु शर्मा बनकर पंचतंत्र की कहानियां रचेंगे वो लीला ,नात ,लडीशाह कहेंगे और फिजा़ चहक उठेगी बड़ी मुश्किल होगी तब तुम अपने बच्चों को कैसे समझा पाओगे फ़िदायीन बनने का अर्थ ? इसलिए जल्दी करो निकालो खींच कर निकालो सभी को बच्चे बूढे मर्द जहन्नुम में भेजो औरतें यहीं रहें तो बेहतर सारी रिवायतें ,मुहब्बतें , संगीत, साहित्य सबको देशनिकाला दो हर अलग शै को चुन चुन कर निकालो ये दोस्ती निभाने का समय नहीं सँस्कृति ,सभ्यता ,सहिष्णुता सबको जलावतन कर दो फिर उन जलावतनों को भूल जाओ ...


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नई दिल्ली/काश्मीर।
एक नदी का निर्वासन - मैं तुम्हें भेजता हूँ अपनी नदी की स्मृति सहेजना इसे वितस्ता है कभी यह बहती थी मेरी प्यारी मातृभूमि में अनादि काल से मैं तैरता था एक जीवंत सभ्यता की तरह इसकी गाथा में अब बहती है निर्वासन में मेरे साथ साथ कभी शरणार्थी कैंपों में कभी रेल यात्रा में कभी पैदल कहीं भी रात को सोती है मेरी उजडी नींदों में नदी बहती है मेरे सपनों में शिराओं में मेरी इसकी पीड़ाएं हैं काव्य सम्वेदनाएँ मेरी और मेरे जैसों की मैं तुम्हें भेजता हूँ स्मृतियाँ एक जलावतन नदी की 0 -अग्निशेखर ________________ चित्र सौजन्य : कपिल कौल...


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