नयी दिल्ली/लखनऊ।
दो कविताएं मेरे संकलन से...(पग बढ़ा रही है धरती) विरह शरद के अंतिम फूल झर गए नग्न गाछ गा रहा है... जल रही है प्रिय ऋतु जो आया था वह जा रहा है... मैंने उससे कहा थाम लो मेरे हाथ ! वह बोली, देखो... अपनी दृष्टि से ! मैंने देखा...उसके पीछे-पीछे चला गया है मेरा चाहना भी टंगा है उसका चेहरा मेरी आंख में जैसे टंगा रहता है पहर समय की रेख पर जैसा टंगा होता है कोई कंदील अमावस की छत पर... ------------------------------ प्रद्युम्न ठाकुर (गुड़गांव में जिस मासूम की नृशंस हत्या हुई) मां जब कहती है कि उसे ईश्वर ने आंखें ही क्यों दीं तब मुझे अचानक सुनाई पड़ता है.. जैसे कह रही हो, हो इसी कर्म पर वज्रपात ! और तब मैं किसी अंधी दुनिया में रोशन जिन्दगी का झूठा सच भी देखता हूं मां जब कहती है कि तोड़ डालते उसके हाथ-पांव गला क्यों रेत डाला तब मैं हत्या के घिसेपिटे बाइस्कोप में सिनेमाई बदलाव के रील पलटता हूं जब मैं सोचता हूं कि उसी एक क्षण भला प्रद्युम्न को क्यों जाना था बाथरूम तब मैं ऐसी ही स्तब्धकारी हत्याओं के काल से असंभव छेड़छाड़ करता हूं इससे अधिक तो मैं सोच नहीं पाता फिर मैं सोचता हूं कि मां का क्या होगा प्रद्युम्न तो एक द्युति है उसकी आंख और आत्मा में जलती हुई एक स्पर्श है हर हवा पर सवार एक धोखा है किसी कोने से धप्पा करता हुआ कभी सोता हुआ, कभी जागता, बतियाता कभी दीदी के बाल खींचता कभी खाने में हील हुज्जत करता कभी दोपहर के ढाई बजे का चीन्हा हुआ पदचाप सा बजता हुआ और आलिंगनबद्ध तो हर क्षण वह भला कैसे पार पा सकेगी इन भुतहा स्वरों, रूप, रस और आभासी स्पर्श से उसे तो न जाने कितने दिवस मास तक मरना होगा निरंतर ही मरती रहेगी वह जीवन की हर छटा में कौन जाने उसे कब मिलेगी मुक्ति इस मृत्यु से या मिल भी सकेगी कि नहीं......


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नई दिल्ली/काश्मीर।
डॉ ज्योत्सना मिश्रा की निःशब्द करती यह कविता आप सबके साथ साझा कर रहा हूँ । _____________ भूल जाओ जलावतनों को - डाॅ ज्योत्सना मिश्रा उन जलावतनों को भूल जाओ भूल जाओ उन तमाम गीतों को जो चिनारों ने साझा किये थे आसमानों से भूल जाओ उन सभी कहकहों को जो हवाओं ने डल झील के साथ मिल के लगाये कालीदास, सोमदेव ,वसुगुप्त, क्षेमराज,जोनराज, कल्हण, बिल्हण की तो वैसे भी किसे याद है भुला दो लल्द्यद को भी भुला दो,हब्बा खातून की सदा दीनानाथ नादिम और मोतीलाल क्यमू की किताबें हवाले कर दो दीमकों के मंटो को पाकिस्तान भेज दो चक़बस्त को भूलना मत भूलना उफ़क के किनारों को ताक़ीद कर दो सावधान रहें रातों की बेहिसाब तारीकियों से कि उग आता है बार बार एक बगावती चाँद अग्निशेखर उसे जलावतन करो जल्दी करो। बारूदी सुरंगों से पाट दो खेल के मैदान बो दो केसर की क्यारियों में एके-फोर्टी सेवन सुलगा दो स्कूलों की मेजें, कुर्सियां ताले डालो विश्व विद्यालयों में ध्यान रहे यहीं से लौटने की कोशिश करेंगें वो अपनी ज़मीन की मुहब्बत के मारे हुये लोग नदियों के नाम बदल दो वो उन्हें पुराने नामों से ढूंढते रह जायेंगें बदल दो रास्तों के नक्श नेस्तनाबूद कर दो उनके घर जल्दी करो वरना वो लौट आयेंगे हरगिज़ न भूलना राजतरंगिणि को दफ़न करना इतिहास में बड़ी ताक़त होती है दिलों को बदलने की । वो सिखा देंगें सहिष्णुता का पहला पाठ त्रिक शास्त्र पढ़ाकर वो विष्णु शर्मा बनकर पंचतंत्र की कहानियां रचेंगे वो लीला ,नात ,लडीशाह कहेंगे और फिजा़ चहक उठेगी बड़ी मुश्किल होगी तब तुम अपने बच्चों को कैसे समझा पाओगे फ़िदायीन बनने का अर्थ ? इसलिए जल्दी करो निकालो खींच कर निकालो सभी को बच्चे बूढे मर्द जहन्नुम में भेजो औरतें यहीं रहें तो बेहतर सारी रिवायतें ,मुहब्बतें , संगीत, साहित्य सबको देशनिकाला दो हर अलग शै को चुन चुन कर निकालो ये दोस्ती निभाने का समय नहीं सँस्कृति ,सभ्यता ,सहिष्णुता सबको जलावतन कर दो फिर उन जलावतनों को भूल जाओ ...


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नई दिल्ली/काश्मीर।
एक नदी का निर्वासन - मैं तुम्हें भेजता हूँ अपनी नदी की स्मृति सहेजना इसे वितस्ता है कभी यह बहती थी मेरी प्यारी मातृभूमि में अनादि काल से मैं तैरता था एक जीवंत सभ्यता की तरह इसकी गाथा में अब बहती है निर्वासन में मेरे साथ साथ कभी शरणार्थी कैंपों में कभी रेल यात्रा में कभी पैदल कहीं भी रात को सोती है मेरी उजडी नींदों में नदी बहती है मेरे सपनों में शिराओं में मेरी इसकी पीड़ाएं हैं काव्य सम्वेदनाएँ मेरी और मेरे जैसों की मैं तुम्हें भेजता हूँ स्मृतियाँ एक जलावतन नदी की 0 -अग्निशेखर ________________ चित्र सौजन्य : कपिल कौल...


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भारत/प्रयागराज ।
आज पिता श्री जनकवि कैलाश गौतम जी का 75 वाँ जन्म दिवस है।सादर नमन। अमवसा क मेला •••••••••••••••••••••• ई भक्ति के रंग में रंगल गाँव देखा, धरम में, करम में, सनल गाँव देखा. अगल में, बगल में सगल गाँव देखा, अमवसा नहाये चलल गाँव देखा. एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा, अ कान्ही पे बोरा, कपारे पर बोरा. कमरी में केहू,अ कथरी में केहू, रजाई में केहू, दुलाई में केहू. आजी रँगावत हईं गोड़ देखाऽ, हँसत हँउवे बब्बा, तनी जोड़ देखाऽ. घुंघटवे से पूछे पतोहिया कि, अईया, गठरिया में अब का रखाई बतईहा. एहर हउवे लुग्गा, ओहर हउवे पूड़ी, रामायण का लग्गे ह मँड़ुआ के डूंढ़ी. चाउर आ चिउरा किनारे के ओरी, नयका चपलवा अचारे के ओरी. अमवसा के मेला, अमवसा के मेला मचल हउवे हल्ला, चढ़ावाऽ उताराऽ, खचाखच भरल रेलगाड़ी निहाराऽ. एहर गुर्री-गुर्रा, ओहर लोली-लोला , अ बीचे में हउवा शराफत से बोलाऽ चपायल । केहु, दबायल ह केहू, अ घंटन से उपर टँगायल ह केहू. केहू हक्का-बक्का, केहू लाल-पियर, केहू फनफनात हउवे कीरा के नियर. बप्पा रे बप्पा, अ दईया रे दईया, तनी हम्मे आगे बढ़ै देताऽ भईया. मगर केहू दर से टसकले ना टसके, टसकले ना टसके, मसकले ना मसके, छिड़ल ह हिताई-मिताई के चरचा, पढ़ाई-लिखाई-कमाई के चरचा. दरोगा के बदली करावत हौ केहू, लग्गी से पानी पियावत हौ केहू. अमवसा के मेला, अमवसा के मेला. गुलब्बन के दुलहिन चलै धीरे धीरे भरल नाव जइसे नदी तीरे तीरे. सजल देहि जइसे हो गवने के डोली, हँसी हौ बताशा शहद हउवे बोली. देखैंली ठोकर बचावेली धक्का, मने मन छोहारा, मने मन मुनक्का. फुटेहरा नियरा मुस्किया मुस्किया के निहारे ली मेला चिहा के चिहा के. सबै देवी देवता मनावत चलेली, नरियर प नरियर चढ़ावत चलेली. किनारे से देखैं, इशारे से बोलैं कहीं गाँठ जोड़ें कहीं गाँठ खोलैं. बड़े मन से मन्दिर में दर्शन करेली आ दुधै से शिवजी के अरघा भरेली. चढ़ावें चढ़ावा अ गोठैं शिवाला छूवल चाहें पिण्डी लटक नाहीं जाला. अमवसा के मेला, अमवसा के मेला. एही में चम्पा-चमेली भेंटइली. बचपन के दुनो सहेली भेंटइली. ई आपन सुनावें, ऊ आपन सुनावें, दुनो आपन गहना-गदेला गिनावें. असो का बनवलू, असो का गढ़वलू तू जीजा क फोटो न अबतक पठवलू. ना ई उन्हें रोकैं ना ऊ इन्हैं टोकैं, दुनो अपने दुलहा के तारीफ झोंकैं. हमैं अपना सासु के पुतरी तूं जानाऽ हमैं ससुरजी के पगड़ी तूं जानाऽ. शहरियो में पक्की देहतियो में पक्की चलत हउवे टेम्पू, चलत हउवे चक्की. मने मन जरै आ गड़ै लगली दुन्नो भया तू तू मैं मैं, लड़ै लगली दुन्नो. साधु छुड़ावैं सिपाही छुड़ावैं हलवाई जइसे कड़ाही छुड़ावै. अमवसा के मेला, अमवसा के मेला. कलौता के माई के झोरा हेराइल बुद्धू के बड़का कटोरा हेराइल. टिकुलिया के माई टिकुलिया के जोहै बिजुरिया के माई बिजुरिया के जोहै. मचल हउवै हल्ला त सगरो ढुढ़ाई चमेला के बाबू चमेला क माई. गुलबिया सभत्तर निहारत चलेले मुरहुआ मुरहुआ पुकारत चलेले. छोटकी बिटउआ के मारत चलेले बिटिइउवे प गुस्सा उतारत चलेले. गोबरधन के सरहज किनारे भेंटइली. गोबरधन का संगे पँउड़ के नहइली. घरे चलताऽ पाहुन दही गुड़ खिआइब. भतीजा भयल हौ भतीजा देखाइब. उहैं फेंक गठरी, परइले गोबरधन, ना फिर फिर देखइले धरइले गोबरधन. अमवसा के मेला, अमवसा के मेला. केहू शाल, स्वेटर, दुशाला मोलावे केहू बस अटैची के ताला मोलावे केहू चायदानी पियाला मोलावे सोठौरा के केहू मसाला मोलावे. नुमाइश में जातै बदल गइली भउजी भईया से आगे निकल गइली भउजी आयल हिंडोला मचल गइली भउजी देखते डरामा उछल गइली भउजी. भईया बेचारु जोड़त हउवें खरचा, भुलइले ना भूले पकौड़ी के मरचा. बिहाने कचहरी कचहरी के चिंता बहिनिया के गौना मसहरी के चिंता. फटल हउवे कुरता टूटल हउवे जूता खलीत्ता में खाली किराया के बूता तबो पीछे पीछे चलल जात हउवें गदोरी में सुरती मलत जात हउवें. अमवसासा के मेला,अमवसा क मेला (कैलाश गौतम-भोजपुरी काव्य संग्रह 'तीन चौथाई आन्हर' से साभार)...


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उत्तर प्रदेश/लखनऊ ।
उपवन की कलिकाओं में जीवन्त रहेंगे गीत,अनुगीत निर्माणों में होते रहेंगे चेतन,अनुचेतन के सृजन और घुलते रहेंगे कल्पनाओं के मूर्त चरित्र धूल में मिटती रहेंगी छटाएं उभरती रहेंगी चित्रावलियाँ रंगों के इंद्रधनुषी आभा में उस दिन मैं फिर से जलूँगी होकर अनश्वर,,,,,,,,, दीपक अनन्य ही रहेंगे गहन निशा में,,,, प्रतीक्षारत,,,, अनवरत,,, होने को एकाकार,,,,,,,,,,,,!!! अपनी आँखों में वत्सलता का काजल और हाथों में तुम्हारे प्यार का आँचल लिए खड़ी हूँ जीवन के मरुस्थल में तुम्हारे शुभ की कामना और,,,!! समारोपित स्वप्नों में पूर्णता की संकल्पना लिए यह विस्तृत आत्मा विस्तीर्ण क्षितिज पर आज फिर से अपनी सम्पूर्णता के आलिंगन में है भीगे हुए नयनकोरों में उमड़ते स्वातिबिंदु आतुर हैं फिर से मोती बन जाने को फिर से आतुर हैं कुछ गीत गाने को पाने को आतुर है फिर से अनहद के स्वरों को स्वरमालिका के कुछ अस्फुट स्वर रचने को हैं आतुर फिर से,,,,,, अभिवंदना,,,,!! परम्,,,,!!तुम्हारी सत्ता में हो विलीन,,,,!! तुम्हारे स्वर,गीत,सृजन,स्वप्न सुरक्षित हो निहार रहे हैं अनवरत,,,, उपवन की कलिकाओं में जीवन्त रहेंगे गीत,अनुगीत निर्माणों में होते रहेंगे चेतन,अनुचेतन के सृजन और घुलते रहेंगे कल्पनाओं के मूर्त चरित्र धूल में मिटती रहेंगी छटाएं उभरती रहेंगी चित्रावलियाँ रंगों के इंद्रधनुषी आभा में उस दिन मैं फिर से जलूँगी होकर अनश्वर,,,,,,,,, दीपक अनन्य ही रहेंगे गहन निशा में,,,, प्रतीक्षारत,,,, अनवरत,,, होने को एकाकार,,,,,,,,,,,,!!!...


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