नई दिल्ली/काश्मीर।
डॉ ज्योत्सना मिश्रा की निःशब्द करती यह कविता आप सबके साथ साझा कर रहा हूँ । _____________ भूल जाओ जलावतनों को - डाॅ ज्योत्सना मिश्रा उन जलावतनों को भूल जाओ भूल जाओ उन तमाम गीतों को जो चिनारों ने साझा किये थे आसमानों से भूल जाओ उन सभी कहकहों को जो हवाओं ने डल झील के साथ मिल के लगाये कालीदास, सोमदेव ,वसुगुप्त, क्षेमराज,जोनराज, कल्हण, बिल्हण की तो वैसे भी किसे याद है भुला दो लल्द्यद को भी भुला दो,हब्बा खातून की सदा दीनानाथ नादिम और मोतीलाल क्यमू की किताबें हवाले कर दो दीमकों के मंटो को पाकिस्तान भेज दो चक़बस्त को भूलना मत भूलना उफ़क के किनारों को ताक़ीद कर दो सावधान रहें रातों की बेहिसाब तारीकियों से कि उग आता है बार बार एक बगावती चाँद अग्निशेखर उसे जलावतन करो जल्दी करो। बारूदी सुरंगों से पाट दो खेल के मैदान बो दो केसर की क्यारियों में एके-फोर्टी सेवन सुलगा दो स्कूलों की मेजें, कुर्सियां ताले डालो विश्व विद्यालयों में ध्यान रहे यहीं से लौटने की कोशिश करेंगें वो अपनी ज़मीन की मुहब्बत के मारे हुये लोग नदियों के नाम बदल दो वो उन्हें पुराने नामों से ढूंढते रह जायेंगें बदल दो रास्तों के नक्श नेस्तनाबूद कर दो उनके घर जल्दी करो वरना वो लौट आयेंगे हरगिज़ न भूलना राजतरंगिणि को दफ़न करना इतिहास में बड़ी ताक़त होती है दिलों को बदलने की । वो सिखा देंगें सहिष्णुता का पहला पाठ त्रिक शास्त्र पढ़ाकर वो विष्णु शर्मा बनकर पंचतंत्र की कहानियां रचेंगे वो लीला ,नात ,लडीशाह कहेंगे और फिजा़ चहक उठेगी बड़ी मुश्किल होगी तब तुम अपने बच्चों को कैसे समझा पाओगे फ़िदायीन बनने का अर्थ ? इसलिए जल्दी करो निकालो खींच कर निकालो सभी को बच्चे बूढे मर्द जहन्नुम में भेजो औरतें यहीं रहें तो बेहतर सारी रिवायतें ,मुहब्बतें , संगीत, साहित्य सबको देशनिकाला दो हर अलग शै को चुन चुन कर निकालो ये दोस्ती निभाने का समय नहीं सँस्कृति ,सभ्यता ,सहिष्णुता सबको जलावतन कर दो फिर उन जलावतनों को भूल जाओ ...


Leave a comment

नई दिल्ली/काश्मीर।
एक नदी का निर्वासन - मैं तुम्हें भेजता हूँ अपनी नदी की स्मृति सहेजना इसे वितस्ता है कभी यह बहती थी मेरी प्यारी मातृभूमि में अनादि काल से मैं तैरता था एक जीवंत सभ्यता की तरह इसकी गाथा में अब बहती है निर्वासन में मेरे साथ साथ कभी शरणार्थी कैंपों में कभी रेल यात्रा में कभी पैदल कहीं भी रात को सोती है मेरी उजडी नींदों में नदी बहती है मेरे सपनों में शिराओं में मेरी इसकी पीड़ाएं हैं काव्य सम्वेदनाएँ मेरी और मेरे जैसों की मैं तुम्हें भेजता हूँ स्मृतियाँ एक जलावतन नदी की 0 -अग्निशेखर ________________ चित्र सौजन्य : कपिल कौल...


Leave a comment

भारत/प्रयागराज ।
आज पिता श्री जनकवि कैलाश गौतम जी का 75 वाँ जन्म दिवस है।सादर नमन। अमवसा क मेला •••••••••••••••••••••• ई भक्ति के रंग में रंगल गाँव देखा, धरम में, करम में, सनल गाँव देखा. अगल में, बगल में सगल गाँव देखा, अमवसा नहाये चलल गाँव देखा. एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा, अ कान्ही पे बोरा, कपारे पर बोरा. कमरी में केहू,अ कथरी में केहू, रजाई में केहू, दुलाई में केहू. आजी रँगावत हईं गोड़ देखाऽ, हँसत हँउवे बब्बा, तनी जोड़ देखाऽ. घुंघटवे से पूछे पतोहिया कि, अईया, गठरिया में अब का रखाई बतईहा. एहर हउवे लुग्गा, ओहर हउवे पूड़ी, रामायण का लग्गे ह मँड़ुआ के डूंढ़ी. चाउर आ चिउरा किनारे के ओरी, नयका चपलवा अचारे के ओरी. अमवसा के मेला, अमवसा के मेला मचल हउवे हल्ला, चढ़ावाऽ उताराऽ, खचाखच भरल रेलगाड़ी निहाराऽ. एहर गुर्री-गुर्रा, ओहर लोली-लोला , अ बीचे में हउवा शराफत से बोलाऽ चपायल । केहु, दबायल ह केहू, अ घंटन से उपर टँगायल ह केहू. केहू हक्का-बक्का, केहू लाल-पियर, केहू फनफनात हउवे कीरा के नियर. बप्पा रे बप्पा, अ दईया रे दईया, तनी हम्मे आगे बढ़ै देताऽ भईया. मगर केहू दर से टसकले ना टसके, टसकले ना टसके, मसकले ना मसके, छिड़ल ह हिताई-मिताई के चरचा, पढ़ाई-लिखाई-कमाई के चरचा. दरोगा के बदली करावत हौ केहू, लग्गी से पानी पियावत हौ केहू. अमवसा के मेला, अमवसा के मेला. गुलब्बन के दुलहिन चलै धीरे धीरे भरल नाव जइसे नदी तीरे तीरे. सजल देहि जइसे हो गवने के डोली, हँसी हौ बताशा शहद हउवे बोली. देखैंली ठोकर बचावेली धक्का, मने मन छोहारा, मने मन मुनक्का. फुटेहरा नियरा मुस्किया मुस्किया के निहारे ली मेला चिहा के चिहा के. सबै देवी देवता मनावत चलेली, नरियर प नरियर चढ़ावत चलेली. किनारे से देखैं, इशारे से बोलैं कहीं गाँठ जोड़ें कहीं गाँठ खोलैं. बड़े मन से मन्दिर में दर्शन करेली आ दुधै से शिवजी के अरघा भरेली. चढ़ावें चढ़ावा अ गोठैं शिवाला छूवल चाहें पिण्डी लटक नाहीं जाला. अमवसा के मेला, अमवसा के मेला. एही में चम्पा-चमेली भेंटइली. बचपन के दुनो सहेली भेंटइली. ई आपन सुनावें, ऊ आपन सुनावें, दुनो आपन गहना-गदेला गिनावें. असो का बनवलू, असो का गढ़वलू तू जीजा क फोटो न अबतक पठवलू. ना ई उन्हें रोकैं ना ऊ इन्हैं टोकैं, दुनो अपने दुलहा के तारीफ झोंकैं. हमैं अपना सासु के पुतरी तूं जानाऽ हमैं ससुरजी के पगड़ी तूं जानाऽ. शहरियो में पक्की देहतियो में पक्की चलत हउवे टेम्पू, चलत हउवे चक्की. मने मन जरै आ गड़ै लगली दुन्नो भया तू तू मैं मैं, लड़ै लगली दुन्नो. साधु छुड़ावैं सिपाही छुड़ावैं हलवाई जइसे कड़ाही छुड़ावै. अमवसा के मेला, अमवसा के मेला. कलौता के माई के झोरा हेराइल बुद्धू के बड़का कटोरा हेराइल. टिकुलिया के माई टिकुलिया के जोहै बिजुरिया के माई बिजुरिया के जोहै. मचल हउवै हल्ला त सगरो ढुढ़ाई चमेला के बाबू चमेला क माई. गुलबिया सभत्तर निहारत चलेले मुरहुआ मुरहुआ पुकारत चलेले. छोटकी बिटउआ के मारत चलेले बिटिइउवे प गुस्सा उतारत चलेले. गोबरधन के सरहज किनारे भेंटइली. गोबरधन का संगे पँउड़ के नहइली. घरे चलताऽ पाहुन दही गुड़ खिआइब. भतीजा भयल हौ भतीजा देखाइब. उहैं फेंक गठरी, परइले गोबरधन, ना फिर फिर देखइले धरइले गोबरधन. अमवसा के मेला, अमवसा के मेला. केहू शाल, स्वेटर, दुशाला मोलावे केहू बस अटैची के ताला मोलावे केहू चायदानी पियाला मोलावे सोठौरा के केहू मसाला मोलावे. नुमाइश में जातै बदल गइली भउजी भईया से आगे निकल गइली भउजी आयल हिंडोला मचल गइली भउजी देखते डरामा उछल गइली भउजी. भईया बेचारु जोड़त हउवें खरचा, भुलइले ना भूले पकौड़ी के मरचा. बिहाने कचहरी कचहरी के चिंता बहिनिया के गौना मसहरी के चिंता. फटल हउवे कुरता टूटल हउवे जूता खलीत्ता में खाली किराया के बूता तबो पीछे पीछे चलल जात हउवें गदोरी में सुरती मलत जात हउवें. अमवसासा के मेला,अमवसा क मेला (कैलाश गौतम-भोजपुरी काव्य संग्रह 'तीन चौथाई आन्हर' से साभार)...


Leave a comment

उत्तर प्रदेश/लखनऊ ।
उपवन की कलिकाओं में जीवन्त रहेंगे गीत,अनुगीत निर्माणों में होते रहेंगे चेतन,अनुचेतन के सृजन और घुलते रहेंगे कल्पनाओं के मूर्त चरित्र धूल में मिटती रहेंगी छटाएं उभरती रहेंगी चित्रावलियाँ रंगों के इंद्रधनुषी आभा में उस दिन मैं फिर से जलूँगी होकर अनश्वर,,,,,,,,, दीपक अनन्य ही रहेंगे गहन निशा में,,,, प्रतीक्षारत,,,, अनवरत,,, होने को एकाकार,,,,,,,,,,,,!!! अपनी आँखों में वत्सलता का काजल और हाथों में तुम्हारे प्यार का आँचल लिए खड़ी हूँ जीवन के मरुस्थल में तुम्हारे शुभ की कामना और,,,!! समारोपित स्वप्नों में पूर्णता की संकल्पना लिए यह विस्तृत आत्मा विस्तीर्ण क्षितिज पर आज फिर से अपनी सम्पूर्णता के आलिंगन में है भीगे हुए नयनकोरों में उमड़ते स्वातिबिंदु आतुर हैं फिर से मोती बन जाने को फिर से आतुर हैं कुछ गीत गाने को पाने को आतुर है फिर से अनहद के स्वरों को स्वरमालिका के कुछ अस्फुट स्वर रचने को हैं आतुर फिर से,,,,,, अभिवंदना,,,,!! परम्,,,,!!तुम्हारी सत्ता में हो विलीन,,,,!! तुम्हारे स्वर,गीत,सृजन,स्वप्न सुरक्षित हो निहार रहे हैं अनवरत,,,, उपवन की कलिकाओं में जीवन्त रहेंगे गीत,अनुगीत निर्माणों में होते रहेंगे चेतन,अनुचेतन के सृजन और घुलते रहेंगे कल्पनाओं के मूर्त चरित्र धूल में मिटती रहेंगी छटाएं उभरती रहेंगी चित्रावलियाँ रंगों के इंद्रधनुषी आभा में उस दिन मैं फिर से जलूँगी होकर अनश्वर,,,,,,,,, दीपक अनन्य ही रहेंगे गहन निशा में,,,, प्रतीक्षारत,,,, अनवरत,,, होने को एकाकार,,,,,,,,,,,,!!!...


Leave a comment

ननकाना साहब / लखनऊ ।
गुरू नानक सबके सिरताजा - 13 ---------------- -------------------- ब्‍यक्ति‍त्व और संदेश -2 ---------- -------------- समाज सुधार आंदोलन को ब्‍यवस्थित रूप देने के लिए अपने सिद्धांतों - मान्‍यताओं के आधार पर उन्‍होंने संगठनात्मक कदम भी उठाये । देश - विदेश के दूरस्‍थ इलाकों में धर्म शालायें स्‍थापित कीं , जहां उनके अनुयायी एकत्रित हो उनकी अवधाराणाओं का अभ्‍यास कर सकते थे और उनका धर्म - संदेश अन्‍य लोगों में प्रसारित कर सकते थे । अपने मिशन को आगे बढाने के लिए उन्‍होंने कुछ लोगों का चयन कर मांजी , उपदेशक , के रूप में नियुक्‍त किया । उनके जीवन काल में उनके अनुयायियों को ' नानक पंथी ' कहा जाता था और उनका ' सत करतार ' कह कर आपस में अभिवादन करने का पृथक तरीका था । बाद के गुरुओं ने धर्म शाला ( धार्मिक केन्‍द्र ) , संगत , लंगर ( साझा रसोई ) और मांजी ( उपदेश मंच ) संस्‍थाओं को विस्‍तारित किया । मांसाहार : ----- गुरू अर्जुन देव तक प्रारंभिक पांच गुरू निरामिष थे । पीरी - मीरी की दो तलवारें धारण करने वाले छठे गुरू हर गोबिंद से मांस खाने का चलन शुरू हुआ , जो दशम गुरू गोबिंद सिंह महाराज तक जारी रहा । गुरू नानक ने समय - समय पर जीव हत्या और मांसाहार के विरुद्ध अपना मत दिया और इसकी भर्त्सना की । इससे यही निष्‍कर्ष निकलता है कि वे वैष्‍णव संतों की तरह मांसाहार के विरुद्ध थे। उदासियों में भी उनके कहीं मांसाहार लेने का उल्‍लेख नहीं मिलता । मक्‍का, मदीना , बगदाद और कांधार वगैरह इस्‍लामिक नगरों - देशों में प्रवास के दौरान भी । उनका एक पद है - मुरसिद मेरा मरहमी जिन मरम बताया । दिल अंदर दीदार है जिन खोजा तिन पाया ।। तसबी एक अजूब है जाके हरदम दाना । कुंज किनारे बैठि‍के फेर तिन्ह जाना ।। क्‍या बकरी क्‍या गाय है क्‍या अपनो जाया । सबको लोहू एक है साहि‍ब ने फरमाया ।। पीर पैगम्‍बर ओलिया सब मरने आया । नाहक जीव न मारिये पोषन को काया ।। हिरिस दिये हैवान है बस करिलै भाई । दार इलाही नानका जिसे देवै खुदाई ।। इसमें वे शरीर पोषण के लिए अनावश्‍यक जीव हत्या का निषेध करते हैं । देवी मंदिरों में पशु बलि दिये जाने से आहत नानकदेव एक अन्‍य वााणी में कहते हैं - तगु कपाहहु क‍तीए ब्राह्मण वेट आइ । कुहु बकरा रिन्‍ह खाइआ सभुको आखै पाइ।। माणस खाने करहिं नेवाज । छुरी बगाईनि तिन गलिताग ।। तिन घरि ब्रह्मण पूरहि नाद । उन्‍हा भी आवहि ओई साद ।। कूडी रासि कूडा ब्‍ाापारू । कूडि बोलि करहिं अहारू ।। सरम धरम का डेरा दूरि । नानक कुडु रहिआ भरपूरि ।। मथै टिका तेडि धोती कखाई । हथि छूरी जगत कसाई ।। जो ब्राह्मण लोगों को जनेऊ पहनने को कहता है वह बकरा काट कर खाता है , मांस खाने वाला मुल्‍ला नमाज पढ कर अपनी नेकी जाहिर करता है । जीवों के गले में छुरियां चलाने वाले ब्राहृमण अपने गले में जनेऊ धारण किये घूमते हैं। ऐसे लोगों की करनी और रहनी झूठी है , उनका खाना - पीना झूठा है । ब्राहृमण माथे पर तिलक लगा कर और शरीर पर धोती बांध कर फिरते हैं , परंतु उनके हाथों में छूरियां हैं , वे कसाई की तरह जीव हत्या करते हैं । कब , किस संदर्भ में उन्‍हों ने इस बारे में क्‍या कहा है , इस विचार के आलोक में ही मांस खाने - न खाने को लेकर उनकी मान्‍यता के बारे में कोई निष्‍कर्ष निकाला जा सकता है । जगजीत सिंह अपनी किताब ' द सिख रिवल्‍यूशन ' में गुरू नानक की एक वाणी के आधार पर कहते हैं कि उन्‍होंने सामिष आहार से मना नहीं किया । नानक कहते हैं कि कोई भी जीव मांस में ही रूप लेता है , फिर गर्भ में मांस में ही विकसित होता है । मुंह और जीभ मांस की होती है । हां, जीवन मांस से चातुर्दिक बंधा रहता है । लोग मांस क्‍या है और क्‍या नहीं है ,क्‍या खाना पाप है और क्‍या खाना पाप नहीं है, इस बारे में सही बात नहीं जानते और ऊपरी बातों में झगडते हैं । ....... ओ पंडित ,सभी आदमी और सभी औरतें मांस से ही पैदा हैं , जैसे सभी राजा और शासक भी हैं। अगर ये सभी नर्क जाएंगे तो तुम उन मांस खाने वालों से दान की भेंट क्‍यों स्‍वीकार करते हो ? ओ पंडित , तुम नहीं जानते कहां से सारा मांस आया । यह वस्तु्त: पानी से ही है जैसे अनाज , गन्‍ना कपास .... । जगजीत सिंह के अनुसार इस लम्‍बी वाणी में नानक ने मांस खाने के बारे में स्‍पष्‍ट राय दे दी है । जिसमें उन्‍होंने जोर दिया है कि हर जीवन का आधार एक साझा स्रोत है । किसी न किसी रूप में मांस का उपयोग किये बिना किसी जीव का जीवन संभव नहीं है । शाकाहारी शुद्ध हैं और मांसाहारी अशुद्ध , ये सारी बातें मनमानी हैं, क्‍यों कि जीवन का आधार एक ही तत्व हैं। जगजीत सिंह एक साखी ( जन्‍म साखी , बालेवाली , सुरिन्‍दर सिंह कोहली द्वारा संपादित) के आधार पर कहते कि ' गुरू नानक ने स्‍वंय कुरुक्षेत्र में मांस पकाया था - In fact , Guru Nanak himself cooked meat at Kurukshetra । उनके उत्तराधिकारी दूसरे गुरू अंगद के लंगर में मांस परोसा जाता था और बाद के अन्‍य गुरुओं के लंगर में भी चलता रहा । यह कहा जाता है कि पांचवें गुरू अर्जुन देव लंगर में मांस परोसे जाने पर रोक लगा दी । छठे पातशाह ने भी संगत में मांस खाने से मना किया । गुरूवार के लंगर में अब सामान्‍यत: मांस का चलन नहीं है । ऐसा लगता है मांसा खाने - न खाने पर कोई स्‍पष्‍ट राय देने के बजाय गुरू नानक ने इसे लोगों के विवेक पर छोड दिया , अनावश्‍यक जीव हत्या का निषेध जरूर किया है ।...


Leave a comment