भारत/प्रयागराज ।
आज पिता श्री जनकवि कैलाश गौतम जी का 75 वाँ जन्म दिवस है।सादर नमन। अमवसा क मेला •••••••••••••••••••••• ई भक्ति के रंग में रंगल गाँव देखा, धरम में, करम में, सनल गाँव देखा. अगल में, बगल में सगल गाँव देखा, अमवसा नहाये चलल गाँव देखा. एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा, अ कान्ही पे बोरा, कपारे पर बोरा. कमरी में केहू,अ कथरी में केहू, रजाई में केहू, दुलाई में केहू. आजी रँगावत हईं गोड़ देखाऽ, हँसत हँउवे बब्बा, तनी जोड़ देखाऽ. घुंघटवे से पूछे पतोहिया कि, अईया, गठरिया में अब का रखाई बतईहा. एहर हउवे लुग्गा, ओहर हउवे पूड़ी, रामायण का लग्गे ह मँड़ुआ के डूंढ़ी. चाउर आ चिउरा किनारे के ओरी, नयका चपलवा अचारे के ओरी. अमवसा के मेला, अमवसा के मेला मचल हउवे हल्ला, चढ़ावाऽ उताराऽ, खचाखच भरल रेलगाड़ी निहाराऽ. एहर गुर्री-गुर्रा, ओहर लोली-लोला , अ बीचे में हउवा शराफत से बोलाऽ चपायल । केहु, दबायल ह केहू, अ घंटन से उपर टँगायल ह केहू. केहू हक्का-बक्का, केहू लाल-पियर, केहू फनफनात हउवे कीरा के नियर. बप्पा रे बप्पा, अ दईया रे दईया, तनी हम्मे आगे बढ़ै देताऽ भईया. मगर केहू दर से टसकले ना टसके, टसकले ना टसके, मसकले ना मसके, छिड़ल ह हिताई-मिताई के चरचा, पढ़ाई-लिखाई-कमाई के चरचा. दरोगा के बदली करावत हौ केहू, लग्गी से पानी पियावत हौ केहू. अमवसा के मेला, अमवसा के मेला. गुलब्बन के दुलहिन चलै धीरे धीरे भरल नाव जइसे नदी तीरे तीरे. सजल देहि जइसे हो गवने के डोली, हँसी हौ बताशा शहद हउवे बोली. देखैंली ठोकर बचावेली धक्का, मने मन छोहारा, मने मन मुनक्का. फुटेहरा नियरा मुस्किया मुस्किया के निहारे ली मेला चिहा के चिहा के. सबै देवी देवता मनावत चलेली, नरियर प नरियर चढ़ावत चलेली. किनारे से देखैं, इशारे से बोलैं कहीं गाँठ जोड़ें कहीं गाँठ खोलैं. बड़े मन से मन्दिर में दर्शन करेली आ दुधै से शिवजी के अरघा भरेली. चढ़ावें चढ़ावा अ गोठैं शिवाला छूवल चाहें पिण्डी लटक नाहीं जाला. अमवसा के मेला, अमवसा के मेला. एही में चम्पा-चमेली भेंटइली. बचपन के दुनो सहेली भेंटइली. ई आपन सुनावें, ऊ आपन सुनावें, दुनो आपन गहना-गदेला गिनावें. असो का बनवलू, असो का गढ़वलू तू जीजा क फोटो न अबतक पठवलू. ना ई उन्हें रोकैं ना ऊ इन्हैं टोकैं, दुनो अपने दुलहा के तारीफ झोंकैं. हमैं अपना सासु के पुतरी तूं जानाऽ हमैं ससुरजी के पगड़ी तूं जानाऽ. शहरियो में पक्की देहतियो में पक्की चलत हउवे टेम्पू, चलत हउवे चक्की. मने मन जरै आ गड़ै लगली दुन्नो भया तू तू मैं मैं, लड़ै लगली दुन्नो. साधु छुड़ावैं सिपाही छुड़ावैं हलवाई जइसे कड़ाही छुड़ावै. अमवसा के मेला, अमवसा के मेला. कलौता के माई के झोरा हेराइल बुद्धू के बड़का कटोरा हेराइल. टिकुलिया के माई टिकुलिया के जोहै बिजुरिया के माई बिजुरिया के जोहै. मचल हउवै हल्ला त सगरो ढुढ़ाई चमेला के बाबू चमेला क माई. गुलबिया सभत्तर निहारत चलेले मुरहुआ मुरहुआ पुकारत चलेले. छोटकी बिटउआ के मारत चलेले बिटिइउवे प गुस्सा उतारत चलेले. गोबरधन के सरहज किनारे भेंटइली. गोबरधन का संगे पँउड़ के नहइली. घरे चलताऽ पाहुन दही गुड़ खिआइब. भतीजा भयल हौ भतीजा देखाइब. उहैं फेंक गठरी, परइले गोबरधन, ना फिर फिर देखइले धरइले गोबरधन. अमवसा के मेला, अमवसा के मेला. केहू शाल, स्वेटर, दुशाला मोलावे केहू बस अटैची के ताला मोलावे केहू चायदानी पियाला मोलावे सोठौरा के केहू मसाला मोलावे. नुमाइश में जातै बदल गइली भउजी भईया से आगे निकल गइली भउजी आयल हिंडोला मचल गइली भउजी देखते डरामा उछल गइली भउजी. भईया बेचारु जोड़त हउवें खरचा, भुलइले ना भूले पकौड़ी के मरचा. बिहाने कचहरी कचहरी के चिंता बहिनिया के गौना मसहरी के चिंता. फटल हउवे कुरता टूटल हउवे जूता खलीत्ता में खाली किराया के बूता तबो पीछे पीछे चलल जात हउवें गदोरी में सुरती मलत जात हउवें. अमवसासा के मेला,अमवसा क मेला (कैलाश गौतम-भोजपुरी काव्य संग्रह 'तीन चौथाई आन्हर' से साभार)...


Leave a comment

उत्तर प्रदेश/लखनऊ ।
उपवन की कलिकाओं में जीवन्त रहेंगे गीत,अनुगीत निर्माणों में होते रहेंगे चेतन,अनुचेतन के सृजन और घुलते रहेंगे कल्पनाओं के मूर्त चरित्र धूल में मिटती रहेंगी छटाएं उभरती रहेंगी चित्रावलियाँ रंगों के इंद्रधनुषी आभा में उस दिन मैं फिर से जलूँगी होकर अनश्वर,,,,,,,,, दीपक अनन्य ही रहेंगे गहन निशा में,,,, प्रतीक्षारत,,,, अनवरत,,, होने को एकाकार,,,,,,,,,,,,!!! अपनी आँखों में वत्सलता का काजल और हाथों में तुम्हारे प्यार का आँचल लिए खड़ी हूँ जीवन के मरुस्थल में तुम्हारे शुभ की कामना और,,,!! समारोपित स्वप्नों में पूर्णता की संकल्पना लिए यह विस्तृत आत्मा विस्तीर्ण क्षितिज पर आज फिर से अपनी सम्पूर्णता के आलिंगन में है भीगे हुए नयनकोरों में उमड़ते स्वातिबिंदु आतुर हैं फिर से मोती बन जाने को फिर से आतुर हैं कुछ गीत गाने को पाने को आतुर है फिर से अनहद के स्वरों को स्वरमालिका के कुछ अस्फुट स्वर रचने को हैं आतुर फिर से,,,,,, अभिवंदना,,,,!! परम्,,,,!!तुम्हारी सत्ता में हो विलीन,,,,!! तुम्हारे स्वर,गीत,सृजन,स्वप्न सुरक्षित हो निहार रहे हैं अनवरत,,,, उपवन की कलिकाओं में जीवन्त रहेंगे गीत,अनुगीत निर्माणों में होते रहेंगे चेतन,अनुचेतन के सृजन और घुलते रहेंगे कल्पनाओं के मूर्त चरित्र धूल में मिटती रहेंगी छटाएं उभरती रहेंगी चित्रावलियाँ रंगों के इंद्रधनुषी आभा में उस दिन मैं फिर से जलूँगी होकर अनश्वर,,,,,,,,, दीपक अनन्य ही रहेंगे गहन निशा में,,,, प्रतीक्षारत,,,, अनवरत,,, होने को एकाकार,,,,,,,,,,,,!!!...


Leave a comment

ननकाना साहब / लखनऊ ।
गुरू नानक सबके सिरताजा - 13 ---------------- -------------------- ब्‍यक्ति‍त्व और संदेश -2 ---------- -------------- समाज सुधार आंदोलन को ब्‍यवस्थित रूप देने के लिए अपने सिद्धांतों - मान्‍यताओं के आधार पर उन्‍होंने संगठनात्मक कदम भी उठाये । देश - विदेश के दूरस्‍थ इलाकों में धर्म शालायें स्‍थापित कीं , जहां उनके अनुयायी एकत्रित हो उनकी अवधाराणाओं का अभ्‍यास कर सकते थे और उनका धर्म - संदेश अन्‍य लोगों में प्रसारित कर सकते थे । अपने मिशन को आगे बढाने के लिए उन्‍होंने कुछ लोगों का चयन कर मांजी , उपदेशक , के रूप में नियुक्‍त किया । उनके जीवन काल में उनके अनुयायियों को ' नानक पंथी ' कहा जाता था और उनका ' सत करतार ' कह कर आपस में अभिवादन करने का पृथक तरीका था । बाद के गुरुओं ने धर्म शाला ( धार्मिक केन्‍द्र ) , संगत , लंगर ( साझा रसोई ) और मांजी ( उपदेश मंच ) संस्‍थाओं को विस्‍तारित किया । मांसाहार : ----- गुरू अर्जुन देव तक प्रारंभिक पांच गुरू निरामिष थे । पीरी - मीरी की दो तलवारें धारण करने वाले छठे गुरू हर गोबिंद से मांस खाने का चलन शुरू हुआ , जो दशम गुरू गोबिंद सिंह महाराज तक जारी रहा । गुरू नानक ने समय - समय पर जीव हत्या और मांसाहार के विरुद्ध अपना मत दिया और इसकी भर्त्सना की । इससे यही निष्‍कर्ष निकलता है कि वे वैष्‍णव संतों की तरह मांसाहार के विरुद्ध थे। उदासियों में भी उनके कहीं मांसाहार लेने का उल्‍लेख नहीं मिलता । मक्‍का, मदीना , बगदाद और कांधार वगैरह इस्‍लामिक नगरों - देशों में प्रवास के दौरान भी । उनका एक पद है - मुरसिद मेरा मरहमी जिन मरम बताया । दिल अंदर दीदार है जिन खोजा तिन पाया ।। तसबी एक अजूब है जाके हरदम दाना । कुंज किनारे बैठि‍के फेर तिन्ह जाना ।। क्‍या बकरी क्‍या गाय है क्‍या अपनो जाया । सबको लोहू एक है साहि‍ब ने फरमाया ।। पीर पैगम्‍बर ओलिया सब मरने आया । नाहक जीव न मारिये पोषन को काया ।। हिरिस दिये हैवान है बस करिलै भाई । दार इलाही नानका जिसे देवै खुदाई ।। इसमें वे शरीर पोषण के लिए अनावश्‍यक जीव हत्या का निषेध करते हैं । देवी मंदिरों में पशु बलि दिये जाने से आहत नानकदेव एक अन्‍य वााणी में कहते हैं - तगु कपाहहु क‍तीए ब्राह्मण वेट आइ । कुहु बकरा रिन्‍ह खाइआ सभुको आखै पाइ।। माणस खाने करहिं नेवाज । छुरी बगाईनि तिन गलिताग ।। तिन घरि ब्रह्मण पूरहि नाद । उन्‍हा भी आवहि ओई साद ।। कूडी रासि कूडा ब्‍ाापारू । कूडि बोलि करहिं अहारू ।। सरम धरम का डेरा दूरि । नानक कुडु रहिआ भरपूरि ।। मथै टिका तेडि धोती कखाई । हथि छूरी जगत कसाई ।। जो ब्राह्मण लोगों को जनेऊ पहनने को कहता है वह बकरा काट कर खाता है , मांस खाने वाला मुल्‍ला नमाज पढ कर अपनी नेकी जाहिर करता है । जीवों के गले में छुरियां चलाने वाले ब्राहृमण अपने गले में जनेऊ धारण किये घूमते हैं। ऐसे लोगों की करनी और रहनी झूठी है , उनका खाना - पीना झूठा है । ब्राहृमण माथे पर तिलक लगा कर और शरीर पर धोती बांध कर फिरते हैं , परंतु उनके हाथों में छूरियां हैं , वे कसाई की तरह जीव हत्या करते हैं । कब , किस संदर्भ में उन्‍हों ने इस बारे में क्‍या कहा है , इस विचार के आलोक में ही मांस खाने - न खाने को लेकर उनकी मान्‍यता के बारे में कोई निष्‍कर्ष निकाला जा सकता है । जगजीत सिंह अपनी किताब ' द सिख रिवल्‍यूशन ' में गुरू नानक की एक वाणी के आधार पर कहते हैं कि उन्‍होंने सामिष आहार से मना नहीं किया । नानक कहते हैं कि कोई भी जीव मांस में ही रूप लेता है , फिर गर्भ में मांस में ही विकसित होता है । मुंह और जीभ मांस की होती है । हां, जीवन मांस से चातुर्दिक बंधा रहता है । लोग मांस क्‍या है और क्‍या नहीं है ,क्‍या खाना पाप है और क्‍या खाना पाप नहीं है, इस बारे में सही बात नहीं जानते और ऊपरी बातों में झगडते हैं । ....... ओ पंडित ,सभी आदमी और सभी औरतें मांस से ही पैदा हैं , जैसे सभी राजा और शासक भी हैं। अगर ये सभी नर्क जाएंगे तो तुम उन मांस खाने वालों से दान की भेंट क्‍यों स्‍वीकार करते हो ? ओ पंडित , तुम नहीं जानते कहां से सारा मांस आया । यह वस्तु्त: पानी से ही है जैसे अनाज , गन्‍ना कपास .... । जगजीत सिंह के अनुसार इस लम्‍बी वाणी में नानक ने मांस खाने के बारे में स्‍पष्‍ट राय दे दी है । जिसमें उन्‍होंने जोर दिया है कि हर जीवन का आधार एक साझा स्रोत है । किसी न किसी रूप में मांस का उपयोग किये बिना किसी जीव का जीवन संभव नहीं है । शाकाहारी शुद्ध हैं और मांसाहारी अशुद्ध , ये सारी बातें मनमानी हैं, क्‍यों कि जीवन का आधार एक ही तत्व हैं। जगजीत सिंह एक साखी ( जन्‍म साखी , बालेवाली , सुरिन्‍दर सिंह कोहली द्वारा संपादित) के आधार पर कहते कि ' गुरू नानक ने स्‍वंय कुरुक्षेत्र में मांस पकाया था - In fact , Guru Nanak himself cooked meat at Kurukshetra । उनके उत्तराधिकारी दूसरे गुरू अंगद के लंगर में मांस परोसा जाता था और बाद के अन्‍य गुरुओं के लंगर में भी चलता रहा । यह कहा जाता है कि पांचवें गुरू अर्जुन देव लंगर में मांस परोसे जाने पर रोक लगा दी । छठे पातशाह ने भी संगत में मांस खाने से मना किया । गुरूवार के लंगर में अब सामान्‍यत: मांस का चलन नहीं है । ऐसा लगता है मांसा खाने - न खाने पर कोई स्‍पष्‍ट राय देने के बजाय गुरू नानक ने इसे लोगों के विवेक पर छोड दिया , अनावश्‍यक जीव हत्या का निषेध जरूर किया है ।...


Leave a comment

ननकाना साहब / लखनऊ ।
गुरू नानक सबके सिरताजा - अंतिम ---------------- -------------------- गुरू नानक से पहले रामानंद , कबीर दास , चैतन्‍य स्‍वामी और वल्‍लभाचार्य आदि ने सब मानव समान हैं का संदेश देते हुए धर्म - परंपरा की जडता को झकझोरा था , कबीर ने मूर्ति पूजा की निस्‍सारिता बतायी थी लेकिन समाज सुधार को संगठित प्रयास नहीं किये थे । उससे पहले बुद्ध ने भी नहीं । उनकी धर्म - चेतना स्‍व आनंद की तलाश में ब्‍यक्ति परक अधिक थी , और वे संसार को असत्य - निस्‍सार मानते हुए त्यागी - वैरागी ही अधिक बने रहे । नानक ने संसार से भागने के बजाय उसमें रहते हुए जीवन संवारने का संदेश दिया । उनका प्रयास जन सामान्‍य को ही ऊंचा उठाने , उसे योगी बनाने का था , ' जोग भोग मंह राखेउ गोई ' पौराणिक जनक जैसा । उपदेशों और वाणियों में संदेश देने के साथ ही उन्‍होंने वैसा ही जीवन जिया भी । वह जिस धर्म -परंपरा में जन्‍मे थे उसमें उन्‍हें तीन बातें सर्वाधिक रोग ग्रसित लगीं - मूर्ति पूजा , कर्मकांड और जातिगत ऊंच- नीच । अपने नव जागरण आंदोलन में उन्‍होंने इन्‍हीं तीन से सायास दूरी बनायी । कुंंठित व अवसाद ग्रस्‍त समाज में आत्म सम्‍मान के मानवीय मूल्‍य - चेतना की स्‍थापना के लिए । अन्‍य संत सुधारकों केे समता - संदेश को अंगीकार किया , एक कदम आगे बढ कर श्रम के महत्व को प्रतिपादित किया । स्‍वयं भी खेतों में नियमित रूप से किसान की तरह काम किया । वैदिक काल में यज्ञ - भाेेज हर वर्ग के लोग एक साथ खाते - पीते थे , लंगर में इसकी पुर्नस्‍थापना कर सभी मनुष्‍य एक समान हैं की मान्‍यता काेे ब्‍यावहारिक रूप दिया । एक निर्गुण ब्रह्म या परम शक्ति की उपासना पर बल दिया और मूर्ति पूजा के नाम पर पाखंडों की भर्त्सना की । कर्मकांडो के बंधन - जाल में फंसे समाज को मुक्‍त किया । इससे धर्म के नाम पर इससे पैमाने पर हो रहा लोगों का शोषण रुका । नानकदेव के जीवन - दर्शन और संदेश के आधार स्‍तम्‍भ हैं - सुरति - स्‍मरण , समपर्ण , श्रम , साहचर्य , सद्भाव , सेवा , समानता , संयम, शौर्य , दान , निरहंकारिता , निडरता , निर्वैर , त्याग , क्षमा , संतुलित और सादा जीवन । गृहस्‍थ जीवन में रह कर ही आचरण की ईश्‍वर को स्‍वंय में , कण - कण में पाना , देखना । उनका धर्म - पथ बिल्‍कुल सरल है , व्रत , तप , कर्मकांड , पुरोहित - पंडित आदि का कोई झंझट नहीं । वह कहते हैं - हमरे मत मंह कोउ आवै । सीताराम गाइ सुख पावै।। नाम जप पर पर जोर देते हुए उन्‍होंने कहा - बिना नाम हरिके मुक्ति नाहीं । कहै नानक दास । और , राम नाम उचरंत रसना सदा हरि रस गाइयै। वह कहते हैं नाम रस के आगे सब रस फीके हैं - अवर सुुवाद सब फिक्कै लागै जब सच नाम सुख दीआ । कह नानक सो खरा स्‍ाुुवादी एक उंकार रस पीआ।। नाम से ही दु:ख - निवृत्ति है - नानक दुखिया सब संसारा । सो सुखिया जो नाम अधारा ।। नाम स्‍मरण से ही अहंकार - रोग मिटता है और शोक नहीं होता - सदा अनंद न होवी सोग । कबहूं न ब्‍यापै हउमै रोग । नाम ही सभी रोगों की औषधि है - सरब रोग का अउखद नाम । ईश्‍वर भजन न करने वाले को वह मृतक समान बताते हैं - अति सुंदर कुलीन चतर मुख ज्ञानी धनवंत । मिरतक कहिए नानका जिह प्रीत नहीं भगवंत ।। वह कहते हैं जिसकी श्‍वास - प्रश्‍वास की प्रत्येक अावृत्ति में हरि नाम का उच्‍चार चला करता है , वही पूर्ण संत है , धन्‍य है - जिना सासि गिरासि न बिसरै हरि नामां मनि मंत । धन्‍नुसि सेई नानका पूरन सोई संत ।। श्री हरि के चरणों में सर्वात्मभावेन एक निष्‍ठ समर्पण ही भक्‍त या संत का लक्षण है । जो सदैव उस सर्वान्‍तर्यामी हरि की मौजूदगी महसूस करता है , कृत कर्मों को प्रिय मानता है , हरि नाम स्‍मरण और कीर्तन में जिसके जीवन के क्षण बीत रहे हैं , जिसके लिए शत्रु - मित्र समान हैं , अननय भक्ति वाले ऐसे लोग ही संत हैं - आठ पहर निकट क‍रि जानै । प्रभु का कीआ मीठा मानै । एकु नाम संतनु आधारू । होई रहै सब की पग छारू ।। संत रहत सुनहु मेरे भाई । उआ की महिमा कथनु न जाई ।। वरतणि जाके केवल नाम। अनंद रूप कीरतन बिसराम ।। मित्र सत्रु जाकै एक समानै । प्रभ बिन अपने अवरु न जानै।। वह मन की गति को लेकर सावधान करते हुए कहते हैं कि यह कहना नहीं मानता , जगत प्रपंचों में पड कर केवल अपना पेट भरता है - यह मन नेक न कह्यो करै । सीख सिखाय रह्यो अपनी सी दुरमति ते न टरै ।। मद माया बस भयो बाबरो हरि जस न उचरै ।। करि परपंच जगत के डहकै अपनौ उदर भरै ।। स्‍वान पूंछ ज्‍यों होय न सूधो कह्यो न कान धरै।। कह नानक भजु राम नाम नित जाते काज सरै ।। उनका एक लोकप्रिय भजन है - राम सुमिर राम सुमिर एही तेरो काज है । माया को संग त्याग हरिजू की सरन लाग । जगत सुख मान मिथ्‍या झूठौ सब साज है । । बारू की भीत तैंसे बसुधा को राज है । नानक जन कहत बात बिनसि जैहै तेरो गात । छिन छिन करि गयौ काल्‍ह तैसे जात आज है ।। नानकदेव कहते हैं कि प्रेम ही ईश्‍वर प्राप्ति का साधन है - जिन प्रेम कीओ तिन ही प्रभ पायो । लेकिन वह कहते हैं प्रेम का मार्ग साहस का मार्ग है , जरूरत पडने पर सिर भी देना पडता है , इस मार्ग के पथिक को पीठ दिखाने की छूट नहीं है - जउ तउ प्रेम खेलन का चाउ । सिर धरि तली गली मेरी आउ । । इत मारग पैर धरीजै । सिर दीजेेकाणि न कीजे ।। नानक से लेकर उनके बाद तक के सभी सिख गुरुओं अपने जीवन चरित्र से प्रेम के इसी उचच मापदंड पर चल कर दिखाया भी । नानकदेव का वृहत रचना संसार है । उन्‍होंने अपने समय में प्रचलित सीधी सादी भाषा में , जिसे सधुक्‍कडी कहा जाता है , कवितायें कहीं । वह प्रयास कर कविता नहीं लिखते थे । मन साफ - पवित्र होने से कवितायें देश - काल के अनुसार उतरती थीं । वह कहते , ' मरदाना रबाब बजाओ । वाणी आयी है । ' और संगीत की मोहक स्‍वर लहरी गूंज उठती । उनकी रचनाओं में तत्कालीन राजनैतिक - सामाजिक स्थितियों का चित्रण है , वे इतिहास समेटे हैं । पंजाबी , ब्रज भाषा (हिंदी) दोनों में हैं , सुविधा - सरलता के लिए कब पंजाबी , कब हिंदी और कब फारसी के शब्‍द आ जाएं , कहा नहीं जा सकता । हिंदी लेखकों ने कबीर की तरह नानक केे काव्‍य - जगत पर अपेक्षित ध्‍यान नहीं दिया । उस पर गंभीरता से पृथक विवेचन किये जाने की जरूरत है । संसार के रिश्‍ते कितने स्‍वार्थ परक हैं , यह बताते हुए नानकदेव ने गाया - या जग मीत न देख्‍यो कोई । सकल जगत अपने सुख लाग्‍यो दु:ख में संग न होई ।। दारा मीत पूत सम्‍बंधी सगरे धन सों लागे । जबहीं निरधन देख्‍यो नर को संग छांडि सब भग्‍यो ।। कहा कहूं या मन बौरे को इनसों नेह लगाया । दीनानाथ सकल भय भंजन जस ताको बिसराया ।। स्‍वान पूंछ ज्‍यों भयो न सूधो बहुत जतन मैं कीन्‍हों । नानक लाज बिरद की राखौ नाम तिहारो लीन्‍हें ।। साधक की आदर्श स्थिति के बारे में वह कहते हैं - जो नर दु:ख में दु:ख नहिं मानै । सुख सनेह अरु भय नहिं जाके कंचन माटी जानै। । नहिं निंदा नहिं अस्‍तुति जाके लोभ मोह अभिमाना । हरष सोक ते रहै नियारो नाहि मान अपमाना ।। आसा मनसा सकल त्यागि कैै जगतें रहै निरासा । काम क्रोध जेहि परसै नाहिन तेहि घट ब्रह्म निवासा ।। गुरु किरपा जेहि नर पै कीन्‍ही तिन्‍ह यह जुगति पिछानो । नानक लीन भयो गोबिंद सों ज्‍यों पानी संग पानी । । नानक परम संत हैं , संतों के संत । भाई गुरुदास ने तभी कहा - गुरू नानक सबके सिरताजा । जिसको सिमिर सरै सब काजा ।।...


Leave a comment

नई दिल्ली/लखनऊ/उज्जैन।
वैसे तो बाकी संसार की यश एषणा, काम एषणा और पुत्र एषणा से अलग विशुद्ध भारतीय आत्मा नित्य मोक्ष के लिए अधिक छटपटाती है किन्तु उसने भौतिक पक्ष को भी समादृत कर रखा है। भारतीय भौतिक सुख का एक नमूना देखें:- "कालिदास कविता नवं वय: माहिषं दधि सशर्करं पय:। एणमांसमबला सुकोमला संभवन्तु मम जन्म-जन्मनि।" यदि प्रत्येक जन्म में मुझे कालिदास की कविता, नई चढ़ती हुई जवानी, भैंस के दूध का जमा हुआ दही, शक्कर पड़ा हुआ दूध, हरिण का मांस और कोमल नवेली युवती प्राप्त होती रहें तो इस भवचक्र में जितनी बार भी जन्म लेना पडे़, मुझे वह स्वीकार है। इन सुखों की क्रमशः विवेचना करें। १- #कालिदास कविता- चेतन भगत छाप साहित्यकारों का आशिक आज का भारतीय नागरिक कितने बड़े सुख से वंचित है। हम आवाहन करते हैं कि हर व्यक्ति कम से कम एक बार अभिज्ञान शाकुन्तलम् और कुमार सम्भवम् अवश्य पढ़े। अनुवाद ही सही। यह सुख सबको मिले। समालोचकों ने कवियों की गणना में कविता -कामिनी -विलास कालिदास को 'कनिष्ठिकाधिष्ठित' बताकर उनकी स्पर्धा में ठहरने वाले किसी अन्य प्रतिस्पर्धी कवि के अस्तित्व की संभावना का ही खंडन किया है । आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में ''भारतीय धर्म , दर्शन , शिल्प और साधना में जो कुछ उदात्त है ,जो कुछ ललित और मोहन है ,उनका प्रयत्न पूर्वक सजाया सँवारा रूप कालिदास का काव्य है।'' दो सहस्र वर्षों बाद भी उनकी रचनाएँ यथावत आनंददायक हैं ।संस्कृत के सुप्रसिद्ध कवि बाणभट्ट ने लिखा है - ''निर्गतासु न वा कस्य कालिदासस्य सूक्तिषु । प्रीतिर्मधुरसान्द्रासु मञ्जरीष्विव जायते ॥ '' कालिदास कि प्रसंशा मे कहा गया है - ''पुष्पेषु चम्पा ,नगरीषु काञ्ची, नदीषु गङ्गा ,नृपतौ च रामः | नारीषु रम्भा .पुरुषेषु विष्णुः , काव्येषु माघः ,कवि कालिदासः ||'' जर्मन कवि गेटे ने कहा था- ‘‘यदि तुम युवावस्था के फूल प्रौढ़ावस्था के फल और अन्य ऐसी सामग्रियां एक ही स्थान पर खोजना चाहो जिनसे आत्मा प्रभावित होता हो, तृप्त होता हो और शान्ति पाता हो, अर्थात् यदि तुम स्वर्ग और मर्त्यलोक को एक ही स्थान पर देखना चाहते हो तो मेरे मुख से सहसा एक ही नाम निकल पड़ता है- शकुन्तला महान् कवि कालिदास की एक अमर रचना !’’ पर ध्यान रहे- कालिदासगिरां सारं कालिदाससरस्वती। चतुर्मुखोऽथवा ब्रह्मा विदुर्नान्ये तु मादृश:। २)#नवं वयः सुकोमला..- करियर प्रधान कलिकाल में निर्दोष काम-सुख भी अलभ्य हो चला। कई बार चने और दांत का संबंध भी देखा जाता है। काम चिंतन प्रभावी है वरण नहीं। नवयौवना अभिसार पर यहाँ कहना उचित नहीं। फिर भी, बस इतना कि- स्मितेन भावेन च लज्जया भिया पराङ्गमुखैरर्धकटाक्षवीक्षणैः । वचोभिरीर्ष्याकलहेन लीलया समस्तभावैः खलु बन्धनं स्त्रियः ।। मुस्कान से, प्रणय-भाव से, लज्जा से, कातरता से कुछ-कुछ तिरछी चितवन से,मुँह फेरकर निरखने से मीठे बोलों से, ईर्ष्यावश झगड़ने से,अंगभंगियों से इन सभी से मन को बाँध लेती है रमणियाँ । ३)#माहिषं दधि-तीसरे सुख की बात करें। भैंस के दूध को मिट्टी के बरतन कहंतरी या नदिया में खूब औंटाने के बाद उपयुक्त ताप पर जमावन या जोरन डाल कर यह सुख तैयार होता है। चर्चाओं में गौमाता हैं पर मौसी भी कहाँ कम हैं। भोजपुरी देहात में कई बार कह देते हैं कि 'माई मरे मौसी जिए' । इसका सकारात्मक अर्थ ही लिया जाए। भैंस की दही एकदम चौचक चेक्का की तरह अतिरिक्त घनत्व और अतिरिक्त चिकनाई के साथ पता नहीं किन स्वाद कलिकाओं को संतुष्ट करती है। ब्रह्मवैवर्तपुराण, आयुर्वेद भावप्रकाश, चिकित्सासारतंत्र, चरक संहिता आदि इसके गुण गाते हैं। माहिषं दधि सुस्निग्धं श्लेष्मलं वातपित्तनुत स्वादुपाकमभिष्यन्दि वृष्यं गुर्वस्रदूषकम पथ्यं रसायनं बल्यं हृद्यं मेघ्यं गवाँ पयः। आयुष्यं पुस्त्वकृद्वातरक्तपित्तविकारनुत्॥ -धनवन्तरीय निघण्टु, सुवर्णादि; षष्ठो वर्गः ४) #सशर्करं पयः-गोदुग्ध की महिमा का बखान भला कौन कर सकता है। शक्कर(चीनी नहीं), मधु और एला आदि से युक्त देसी गाय का दूध (विदेशी और संकर किस्म की गाय नहीं )रखिए देवता सेंधमारी पर उतर आएंगे। ममता और दूध माखन के लालच में ईश्वर भी आते हैं धरती पर। चरक संहिता, सूत्र स्थान, अध्याय 27 दूध को रसायन कहता है। तदेवंगुणमेवौजः सामान्यादभिवर्धयेत्। प्रवरं जीवनीयानां क्षीरमुक्तं रसायनम्। सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान अध्याय 45 गोदुग्ध के दस गुणों का वर्णन करता है। “गोक्षीरमनभिष्यन्दि स्निग्धं गुरु रसायनम्। रक्तपित्तहरं शीतं मधुरं रसपाकयोः॥ जीवनयं तथा वातपित्तघ्नं परमं स्मृतम्॥ ५) #एणमांस- मांसाहार के पक्ष विपक्ष में अनेकों तर्क हैं। आस्था और विश्वास भी जुड़े हैं। पर मांसाहारियों के लिए सही स्रोत और स्वाद का चुनाव भी आवश्यक है। एण मांस या हिरन का मांस जिसे अंग्रेजी में Venison कहते हैं लगभग अलभ्य है। ऐसी दशा में छाग मांस उत्तम विकल्प है। परंतु अधिसंख्य मांसाहारी नागरिक एंटीबायोटिक वाले गंदे दुर्गंध युक्त, सूखे ढट्ठे जैसे रेशों वाले ब्रायलर मुर्गे खाने को अभिशप्त हैं। परंपरागत मछलियों मांगुर, सिंघी आदि को पता नहीं किसकी नजर लग गई। सर्वेशां उत्तमं छागं। व्यापारिक संभावनाएं भी खूब हैं। इनसे अतिरिक्त हमारा व्यक्तिगत सुख गौघृत (आयुर्वैघृतम्)और तक्र ( तक्रं शक्रस्य दुर्लभम्) है साथ ही भर जुलाई चौसा आम जिसे कवि संभवतः भूल गए। सुख साझा किया जाए। ||नमस्कार|| डॉ. मधुसूदन उपाध्याय अवध प्रान्त १०/०६/२०१८...


Leave a comment