भारत मां की यशस्वी संतान,स्वयंसेवक,एकात्म मानववाद के जनक तथा भारतीय जनता पार्टी के आदिपुरूष -संस्थापक पं दीन दयाल जी को जयंत्ती पर शत-2 नमन।समस्त राष्ट्रवादी बंधुओ को शुभकामनाएँ हार्दिक बधाई-श्रीनिवास शंकर,इलाहाबाद ,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य भाजपा(कानूनी एवं विधिक विभाग) भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री हम सबके श्रद्धेय स्व.अटल बिहारी बाजपेयी के निधन पर पूरा देश दुखी है।शोक मे डूब गया है।महान नेता बहुमुखी प्रतिभा के धनी हम सबके प्रेरणा स्रोत अटल जी को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि-शत-2 नमनकारगिल विजय की वर्षगांठ पर उन 563 वीर शहीदों को हार्दिक श्रद्धांजलि और शत शत नमन। वे हमारे दिलों सदा अमर रहेंगे।हमारी सेना को विजय की हार्दिक बधाई।जय हिंद-जय हिंद की सेना।-श्रीनिवास राय शंकर।राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य,भाजपा,विधि एवं विधायी विभाग      

बिहार/पटना   40
पूर्व केंद्रीय मंत्री एल.पी.शाही के निधन के साथ ही एक महत्वपूर्ण लेख लिखने की मेरी योजना भी मर गयी। मैं 1952 के चुनाव को लेकर एक लेख लिखना चाहता था। मेरी जानकारी में तब की राजनीतिक घटना के वे एकमात्र चश्मदीद गवाह बचे थे।1952 में शाही जी पहली बार विधायक चुने गए थे। कुछ माह पहले उनके एक करीबी ने मुझे बताया था कि उन्हें अब भी पुरानी घटनाएं याद हैं। मैं सोच ही रहा था कि उनसे समय लेकर उनके यहां जाऊंगा। पर आज कल करता रह गया। आज जब उनके निधन की खबर मिली तो मुझे एक बार फिर वह कहावत याद आई कि आज का काम कल पर नहीं छोड़ना चाहिए। बिहार के मुख्य मंत्री डा.श्रीकृष्ण सिंहा एल.पी.शाही को ‘मुंशी जी’ कहा करते थे। उनके पास संस्मरणों को खजाना था। अस्सी के दशक में जब मैं जनसत्ता के लिए काम कर रहा था तो उनके पास बैठकर 1957 के चुनाव का विवरण सुना था। उन्होंने उस दृश्य का varnan किया था जब अनुग्रह बाबू नेता पद का चुनाव हारने के बाद श्रीबाबू से मिलने उनके आवास गए थे और दोनों मित्र किस तरह गले मिलकर रोए थे। संयोग ही था कि शाही जी उसी कोठी में बैठकर मुझे वह सब सुना रहे थे जिसमें कभी श्रीबाबू रहते थे। बाद के वर्षों में मैंने शाही जी के खिलाफ अखबार में एक कड़ी टिप्पणी की थी। उसके बाद उनके घर जाकर मिलने का अवसर मिला।मुझे भय था कि संभवतः वे अपनी नाराजगी प्रकट करेंगे। पर मिलते ही उन्होंने पास बैठाकर बड़े प्यार से मेरा दुबला -पतला हाथ पकड़ा और कहा, ‘सुरेंद्र जी, आप तो बहुत दुबले हो गए हैं।लाओ भाई सुरेंद्र जी को मिठाई खिलाओ।’ शायद वैसा वही कर सकते थे। यदि मेरे खिलाफ किसी ने उस तरह लिखा होता तो मैं तो नहीं कर पाता। शायद यह सब उस युग का असर था जिन दिनों ऐसे नेता पैदा होते और गढ़े जाते थे। ...


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