ननकाना साहब / लखनऊ   76
गुरू नानक सबके सिरताजा - 13 ---------------- -------------------- ब्‍यक्ति‍त्व और संदेश -2 ---------- -------------- समाज सुधार आंदोलन को ब्‍यवस्थित रूप देने के लिए अपने सिद्धांतों - मान्‍यताओं के आधार पर उन्‍होंने संगठनात्मक कदम भी उठाये । देश - विदेश के दूरस्‍थ इलाकों में धर्म शालायें स्‍थापित कीं , जहां उनके अनुयायी एकत्रित हो उनकी अवधाराणाओं का अभ्‍यास कर सकते थे और उनका धर्म - संदेश अन्‍य लोगों में प्रसारित कर सकते थे । अपने मिशन को आगे बढाने के लिए उन्‍होंने कुछ लोगों का चयन कर मांजी , उपदेशक , के रूप में नियुक्‍त किया । उनके जीवन काल में उनके अनुयायियों को ' नानक पंथी ' कहा जाता था और उनका ' सत करतार ' कह कर आपस में अभिवादन करने का पृथक तरीका था । बाद के गुरुओं ने धर्म शाला ( धार्मिक केन्‍द्र ) , संगत , लंगर ( साझा रसोई ) और मांजी ( उपदेश मंच ) संस्‍थाओं को विस्‍तारित किया । मांसाहार : ----- गुरू अर्जुन देव तक प्रारंभिक पांच गुरू निरामिष थे । पीरी - मीरी की दो तलवारें धारण करने वाले छठे गुरू हर गोबिंद से मांस खाने का चलन शुरू हुआ , जो दशम गुरू गोबिंद सिंह महाराज तक जारी रहा । गुरू नानक ने समय - समय पर जीव हत्या और मांसाहार के विरुद्ध अपना मत दिया और इसकी भर्त्सना की । इससे यही निष्‍कर्ष निकलता है कि वे वैष्‍णव संतों की तरह मांसाहार के विरुद्ध थे। उदासियों में भी उनके कहीं मांसाहार लेने का उल्‍लेख नहीं मिलता । मक्‍का, मदीना , बगदाद और कांधार वगैरह इस्‍लामिक नगरों - देशों में प्रवास के दौरान भी । उनका एक पद है - मुरसिद मेरा मरहमी जिन मरम बताया । दिल अंदर दीदार है जिन खोजा तिन पाया ।। तसबी एक अजूब है जाके हरदम दाना । कुंज किनारे बैठि‍के फेर तिन्ह जाना ।। क्‍या बकरी क्‍या गाय है क्‍या अपनो जाया । सबको लोहू एक है साहि‍ब ने फरमाया ।। पीर पैगम्‍बर ओलिया सब मरने आया । नाहक जीव न मारिये पोषन को काया ।। हिरिस दिये हैवान है बस करिलै भाई । दार इलाही नानका जिसे देवै खुदाई ।। इसमें वे शरीर पोषण के लिए अनावश्‍यक जीव हत्या का निषेध करते हैं । देवी मंदिरों में पशु बलि दिये जाने से आहत नानकदेव एक अन्‍य वााणी में कहते हैं - तगु कपाहहु क‍तीए ब्राह्मण वेट आइ । कुहु बकरा रिन्‍ह खाइआ सभुको आखै पाइ।। माणस खाने करहिं नेवाज । छुरी बगाईनि तिन गलिताग ।। तिन घरि ब्रह्मण पूरहि नाद । उन्‍हा भी आवहि ओई साद ।। कूडी रासि कूडा ब्‍ाापारू । कूडि बोलि करहिं अहारू ।। सरम धरम का डेरा दूरि । नानक कुडु रहिआ भरपूरि ।। मथै टिका तेडि धोती कखाई । हथि छूरी जगत कसाई ।। जो ब्राह्मण लोगों को जनेऊ पहनने को कहता है वह बकरा काट कर खाता है , मांस खाने वाला मुल्‍ला नमाज पढ कर अपनी नेकी जाहिर करता है । जीवों के गले में छुरियां चलाने वाले ब्राहृमण अपने गले में जनेऊ धारण किये घूमते हैं। ऐसे लोगों की करनी और रहनी झूठी है , उनका खाना - पीना झूठा है । ब्राहृमण माथे पर तिलक लगा कर और शरीर पर धोती बांध कर फिरते हैं , परंतु उनके हाथों में छूरियां हैं , वे कसाई की तरह जीव हत्या करते हैं । कब , किस संदर्भ में उन्‍हों ने इस बारे में क्‍या कहा है , इस विचार के आलोक में ही मांस खाने - न खाने को लेकर उनकी मान्‍यता के बारे में कोई निष्‍कर्ष निकाला जा सकता है । जगजीत सिंह अपनी किताब ' द सिख रिवल्‍यूशन ' में गुरू नानक की एक वाणी के आधार पर कहते हैं कि उन्‍होंने सामिष आहार से मना नहीं किया । नानक कहते हैं कि कोई भी जीव मांस में ही रूप लेता है , फिर गर्भ में मांस में ही विकसित होता है । मुंह और जीभ मांस की होती है । हां, जीवन मांस से चातुर्दिक बंधा रहता है । लोग मांस क्‍या है और क्‍या नहीं है ,क्‍या खाना पाप है और क्‍या खाना पाप नहीं है, इस बारे में सही बात नहीं जानते और ऊपरी बातों में झगडते हैं । ....... ओ पंडित ,सभी आदमी और सभी औरतें मांस से ही पैदा हैं , जैसे सभी राजा और शासक भी हैं। अगर ये सभी नर्क जाएंगे तो तुम उन मांस खाने वालों से दान की भेंट क्‍यों स्‍वीकार करते हो ? ओ पंडित , तुम नहीं जानते कहां से सारा मांस आया । यह वस्तु्त: पानी से ही है जैसे अनाज , गन्‍ना कपास .... । जगजीत सिंह के अनुसार इस लम्‍बी वाणी में नानक ने मांस खाने के बारे में स्‍पष्‍ट राय दे दी है । जिसमें उन्‍होंने जोर दिया है कि हर जीवन का आधार एक साझा स्रोत है । किसी न किसी रूप में मांस का उपयोग किये बिना किसी जीव का जीवन संभव नहीं है । शाकाहारी शुद्ध हैं और मांसाहारी अशुद्ध , ये सारी बातें मनमानी हैं, क्‍यों कि जीवन का आधार एक ही तत्व हैं। जगजीत सिंह एक साखी ( जन्‍म साखी , बालेवाली , सुरिन्‍दर सिंह कोहली द्वारा संपादित) के आधार पर कहते कि ' गुरू नानक ने स्‍वंय कुरुक्षेत्र में मांस पकाया था - In fact , Guru Nanak himself cooked meat at Kurukshetra । उनके उत्तराधिकारी दूसरे गुरू अंगद के लंगर में मांस परोसा जाता था और बाद के अन्‍य गुरुओं के लंगर में भी चलता रहा । यह कहा जाता है कि पांचवें गुरू अर्जुन देव लंगर में मांस परोसे जाने पर रोक लगा दी । छठे पातशाह ने भी संगत में मांस खाने से मना किया । गुरूवार के लंगर में अब सामान्‍यत: मांस का चलन नहीं है । ऐसा लगता है मांसा खाने - न खाने पर कोई स्‍पष्‍ट राय देने के बजाय गुरू नानक ने इसे लोगों के विवेक पर छोड दिया , अनावश्‍यक जीव हत्या का निषेध जरूर किया है । ...


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