नई दिल्ली/पटना   54
आपको कौन सा सौन्दर्यशास्त्र पसन्द है? मेरे पिछले पोस्ट के नीचे एक महानुभाव ने लिखा :-- "बॉलीवुड अभी वैचारिक रूप से परिपक्व नहीं हुआ है तथा दर्शकों की सोच को रिक्शा तांगा चालकों की मानसिकता से जोड़कर चलचित्र धारावाहिक बनाता है।" मेरा उत्तर ः-- "रिक्शा तांगा चालकों की मानसिकता" से आपको घृणा है,उनको और पूरे देश को बॉलीवुड अचेत पशु बनाना चाहता है क्योंकि सेठों को माल खरीदने वाले ग्राहक चाहिए जो अपनी बुद्धि से सोचने की क्षमता न रखें । ऊपर से मैकॉले के मानसपुत्रों का षडयन्त्र तो है ही । "रिक्शा तांगा चालकों की मानसिकता" इतनी घटिया नहीं होती । एक रिक्शा चालक से मैंने गुरुदत्त के प्यासा फिल्म की चर्चा की तो उसकी प्रसन्नता और उत्साह देखकर मैं दंग रह गया,हालाँकि अपनी भावना को सही तरीके से शब्दों में व्यक्त करने का प्रशिक्षण उसे नहीं मिला था । रिक्शा तांगा चालकों के कारण ही गुरुदत्त की "प्यासा" फिल्म जब-जब मेरे शहर में आई सुपरहिट रही । कभी फल के जूस की दो बोतल खरीदकर रिक्शा पर बैठिये,एक स्वयं पीजिये और दूसरा रिक्शा चालक को पिलाइये , और फिर उसके दिल को छूने वाले किसी विषय पर चर्चा छेड़ दीजिये,हो सकता है आपकी इन्सानियत कुछ सुधर जाये ! देश की संस्कृति को कौन सुनियाजित तरीके से नष्ट कर रहे हैं?कौन देश के संसाधनों को लूट रहे हैं? कालेधन वाले कौन हैं? राष्ट्रीय उत्पादन को बढ़ाने वाले वास्तविक उत्पादक कौन हैं?खून पसीना बहाने वाले लोग,या शीशमहल में ऐय्याशी करने वाले धनपशु? "सौन्दर्य" को कौन बेहतर समझता है? एक श्रमजीवी जब अपने बेटे के लिए बहू ढूँढता है तो वह भी "सुन्दर" पुत्रवधू ही ढूँढता है,किन्तु उसके लिए सुन्दर नारी वह है जो हट्टी कट्ठी हो, एक हाथ में हँसिया लेकर खेत में फसल काटते समय दूसरे हाथ से पीठ पर टँगे शिशु को झाँसी की रानी की तरह सम्भाल सके ,जो पति सहित सास ससुर की देखभाल कर सके,जो पड़ोसनों के सुख-दुख में हाथ बँटा सके और आवश्यकता पड़ने पर बेलन या झाड़ू को हथियार बनाकर पड़ोसनों से डटकर लोहा भी ले सके | इसके विपरीत सामन्तवादी सौन्दर्यशास्त्र में "सुन्दर" नारी वह है जिसकी कमर पतली हो,बिना सहारे के अधिक चल भी न सके,एनीमिया के रोगी की तरह दिखने के लिए स्लिम बने और इसके लिए पति की कमाई फूँके, बच्चे की देखभाल नौकरों से कराये और हर प्रकार के काम काज से घृणा करे , "रिक्शा तांगा चालकों की मानसिकता" से विशेष तौर पर घृणा करे ! पूँजीवादी सोच में "सुन्दर" नारी कैसी होनी चाहिये इसके लिये बॉलीवुड की अपनेत्रियों को देखें, रोल पाने के लिए देह नुचवाती है और फिर नोचे-खसोटे चेहरे को छुपाने के लिये नकली चेहरा लगाकर गुरुदत्त के शब्दों में कागज के फूल की "भूतनी" बन जाती हैं! जो क्षणभङ्गुर न हो,टिकाऊ हो,अर्थात जिसकी वास्तव में सत्ता हो और जो केवल कल्पना का पुलाव न हो वही "सत्य" है। जो सबके लिये कल्याणकारी हो वही "शिव" है । अपरिवर्तनीय सत्य और शिव से पूरित होकर भी जो नित नूतनता का भाव जगाते हुए चकोर की चाहत को कुन्द न होने दे उस चाँद को सुन्दर कहते हैं ! अतः वास्तविक सौन्दर्य आत्मा का सौन्दर्य है,वह अनन्त है! शेष सबकुछ क्षणभङ्गुर है,माया का छलावा है! सत्य-शिव-सुन्दर का जो थोड़ा सा अंश बचा हुआ है वह किन लोगों में है?"सुन्दर" की सनातनी परिभाषा क्या होनी चाहिये?आपको कौन सा सौन्दर्यशास्त्र पसन्द है? आपकी सोच तय करती है कि आप कितने सुन्दर हैं, क्योंकि आपकी असलियत आपकी सोच है जो मरने के बाद भी साथ जाती है, देह तो नश्वर है। यही सनातन धर्म है । विषविद्यालयों के प्रोफेसरों से बेहतर सौन्दर्यशास्त्र हर शिशु समझता है जो नानी की गोद में बैठकर कभी नहीं सोचता कि झुर्रियों वाली उसकी बूढ़ी नानी बदसूरत है ! ज्यों ज्यों वह बड़ा होता है,"परिपक्व" लोगों का सान्निध्य पाकर वह अपने जन्मजात ज्ञान को भूलने लगता है । किन्तु पूरी तरह कभी नहीं भूल पाता । आमलोगों के मन में दबे उस भूले बिसरे अलौलिक अलख को जो जगा दे वही सच्चा कलाकार है । तालस्तॉय सामन्ती वर्ग से आये थे किन्तु उनकी सोच सामन्ती नहीं थी । हर सामन्त या हर पूँजीपति बुरा नहीं होता, किन्तु सामन्ती सोच और पूँजीवादी सोच सदैव बुरी ही होती है । हर श्रमजीवी अच्छा इन्सान हो यह भी सत्य नहीं है । किन्तु श्रम की महत्ता भारतीय दर्शन के कर्म के सिद्धान्त पर आधारित है । ...


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