मुंबई/काशी   183
अपना बना लो ... मेरे कई दोस्त जो हमारे महामिलन के बारे में नहीं जानते, कहते हैं ये क्या बकवास लिखते हो रोज रोज ? वैसे तो तुम्हारे पास फोन उठाने का वक्त नहीं रहता लेकिन इतना लिखने के लिए वक्त कहाँ से आ जाता है ? आज उनके लिए बस इतना ही कहना चाहता हूँ की हमारे फेसबुक के कुछ मित्रगण भोपाल मे 16 दिसम्बर को एक मिलन समारोह आयोजित किये हैं, मै भी उसमे शामिल हूँ और उसी के बारे में लिखता रहता हूँ l लेकिन मै क्यों लिखता हूँ इसकी कई वज़ह है, आइये आज आपको एक वजह से मिलाता हूँ l ******* बात लगभग 40-42 वर्ष पुरानी है, उस वक्त मुंबई में रहने की बहुत दिक्कत होती थी l हम लोग खुशनसीब थे की दादाजी को सांताक्रूझ में फ़्लैट अलॉट किया था l दादाजी और मै, बस दो ही रहने वाले l मै छोटा था और दादाजी को ड्यूटी जाना होता था l हमारे पडोसी ने सुझाव दिया किरायेदार रख लो, किराया भी मिलेगा, बच्चे की देखभाल भी हो जायेगी l बात जंची लेकिन किरायेदार ऐसा होना चाहिए जो घर का लगे, नही तो शिकायत हो जाने पर रूम खाली करना पड़ता l एक लोग मिले तबलावादक थे, संघर्ष के दौर में थे l दिनभर अपनी ही रोजी रोटी की जुगाड़ में रहते, न मुझे देख पाते न किराया दे पाते l लेकिन दादाजी का पैर दिन भर में बीस बार छूते, कहते आप मेरे पिता समान हो l फिर उन्होंने अपने एक और मित्र जो हारमोनियम बजाने के साथ साथ गाते भी थे, उन्हें ले आये l ऐसे ही कई लोग आते गए, दादाजी को पिता और मुझे भतीजा बनाते गए l लेकिन किराया किसी ने नहीं दिया l अक्सर खाना भी दादाजी का ही खाया और वक्त जरूरत उधार भी लिया l बस इतना अच्छा हो गया था की अब कोई सामान बाज़ार से दादाजी को नहीं लाना होता, न ही उन्हें खाना बनाना होता l ये सभी लोग फिल्म के ही किसी न किसी विधा से जुड़े थे और कमोबेश सभी संधर्षरत ही थे l लेकिन इन लोगो से मेरा फायदा हो जाता l शूटिंग और हीरो हिरोइन को देखने व कभी कभी उनसे मिलने का मौका भी मिल जाता था l ******** फिर आये "संतोष व्यास" l ये उज्जैन से आये थे और फिल्मो में लिखना चाहते थे l लेकिन मौका नहीं मिल रहा था l रोज अपनी कहानी लेकर जाते और थकहार वापस आ जाते l दादाजी की इन्ही से सबसे ज्यादा जमती थी l शायद इसलिए की ये बुद्धिमान भी थे और गम्भीर भी l ये लेखक थे और दादाजी को भी कविताएं लिखने का शौक था l संघर्षो का कभी तो अंत होता ही है और हुआ भी l व्यास जी की मुलाक़ात हुई "सुलतान अहमद" से l उन्हें कहानी पसंद आई और उस कहानी पर फिल्म बनी " गंगा की सौगंध " जिसमे महानायक अमिताभ बच्चन ने अभिनय किया था l उस वक्त व्यास जी का पारश्रमिक तय हुआ था 25000 रुपये l साइनिग अमाउंट न के बराबर मिला था l फिल्म की रिलीज के बाद मिले पैसों से व्यास जी, मिठाई और कई महीने का किराया लिफ़ाफ़े में भर कर लाये थे l मुझे याद है वो लिफाफा देते वक्त उनके हाँथ काँप रहे थे और आँखों से झर झर आंसू गिर रहे थे l वो बार बार दादाजी का पैर छू रहे थे l दादाजी ने लिफाफा लेकर मेज पर रख दिया, उनके कंधो पर हाँथ रख कर सोफे पर बिठाते हुए बोले " किराया मकान का होता है घर का नहीं l तुम मुझे पिता मानते हो तो ये तुम्हारा घर हुआ और घरो में घर वाले रहते है किरायेदार नहीं " l फिल्म हिट हो गयी थी, फिल्म की सिल्वर जुबली पार्टी में मुझे भी जाने का मौका मिला था ,"सुलतान अहमद" बड़े दानिशमंद निकले उन्होंने रुपये 25000 अतिरिक्त दिए व्यास जी को l उसी दिन उन्हें एक और कहानी लिखने को मिली, बाद में उसी कहानी पर शत्रुध्न सिन्हा अभिनीत "ज्वाला" फिल्म बनी l ******* लेकिन मुझे कहानी फिल्मो की नहीं व्यास जी की सुनानी थी l मै भूलता नहीं हूँ की कैसे उन्हें मुंबई की फिल्मो की दुनिया बहुत रास नहीं आई l फिल्म बनाना और बेचना भी एक पेशा है हर पेशे में कुछ अच्छी और कुछ बुरी बात भी होती है l व्यास जी की कहानी पर एक और फिल्म जीतेंद्र और रेखा के साथ "अपना बना लो" बनी l उस समय अमिताभ जी के फिल्म 'लावारिस' का एक गाना "मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है" धूम मचाये हुए था l उस गाने को टक्कर देने के लिए फिल्म "अपना बना लो" की कहानी को थोड़ा ढीला करते हुए एक गाना डाला गया, "अपने अपने मियां पर सबको बड़ा नाज है" l व्यास जी को फिल्म की कहानी से छेड़छाड़ और इस गाने की वल्गैरिटी दोनों से बहुत था एतराज था और कुछ वादे के मुताबिक पैसे भी कम मिले l व्यास जी दुखी हो गये थे l दादाजी भी रिटायर होकर गांव चले आए थे l व्यास जी अब दूसरी जगह रहने लगे थे जो उन्हें बहुत पसंद नहीं थी l उन्हे अपने आपको साबित करना था वो उन्होंने कर दिया था l उनका दिल तो उज्जैन में बसता था l वो अपने घर एक मंदिर बनवाना चाहते थे l उनकी दिली तमन्ना थी की उस मंदिर में दर्शन करने दादाजी जरूर आएं l पर हम सब तो समय की बिसात पर बिछे मोहरे है l दादाजी और व्यास जी का मिलन फिर नहीं हो पाया l दादाजी रहे नहीं , व्यास जी का अता पता मुझे मालुम नहीं l लेकिन दादाजी की इच्छा जरूर थी उज्जैन जाने की, व्यास जी से मिलने की l मै दादाजी की इच्छा तो पूरी नहीं कर पाया पर तलाशता जरूर हूँ व्यास जी को हर उस शख्स मे जिसे दौलत शोहरत से ज्यादा अपनी संस्कृति, सभ्यता, अपनी जमीन और अपनी मिट्टी से प्यार है l मै चाहता हूं दादाजी और व्यास जी का वह संबंध जिसमें भावनाओं का मोल था, पैसा तो बंद लिफाफे में तिरस्कृत सा टेबल पर पड़ा था l मुझे तलाश है उन रिश्तो की जो गले मिले और आंसुओ से कहे, घर में घरवाले रहते है किरायेदार तो मकानो में रहते हैं l ...


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