नई दिल्ली/लखनऊ   100
बीमार आदमी के स्वस्थ विचार - 2 बात अक्टूबर , 2012 की है । लखनऊ में शेखर जोशी को मिलने वाला श्रीलाल शुक्ल सम्मान समारोह था । लेकिन दुर्भाग्य से यह पूरा समारोह तत्कालीन सहकारिता मंत्री शिवपाल सिंह यादव के सम्मान समारोह में तब्दील था । शेखर जोशी का तो सिर्फ़ संदर्भ था । लेकिन उन को कोई पूछने वाला नहीं था । शिवपाल ही शिवपाल थे । उन्हीं के कट आऊट , उन्हीं के पोस्टर , उन्हीं को ढेर सारी मालाएं । उन्हीं के कार्यकर्ताओं की भीड़ । लगभग भगदड़ की स्थिति थी । बतौर निर्णायक दिल्ली से राजेंद्र यादव भी आए थे । राजेंद्र यादव को भी कोई पूछने वाला नहीं था । बात इतनी हो गई कि शेखर जोशी के सम्मान के समय राजेंद्र यादव मंच पर उपस्थित होते हुए भी शेखर जोशी को सम्मान देने के लिए औपचारिक रुप से उपस्थित नहीं हो सके । गो कि संचालक सुशील सिद्धार्थ ने राजेंद्र यादव का नाम भी पुकारा । लेकिन उस भगदड़ में सुशील सिद्धार्थ समेत किसी को भी यह याद नहीं रहा कि मंच पर बैठे राजेंद्र यादव को उठा कर , खड़ा कर , मौके पर ले आया जाए। राजेंद्र यादव कुर्सी से उठ कर , खड़े हो कर खुद आ नहीं सकते थे । सो कुर्सी पर बैठे रह गए और शेखर जोशी का सम्मान हो गया । सरकारी आयोजन के नाते जलपान आदि की भी पर्याप्त व्यवस्था थी । शिवपाल के कार्यकर्ताओं की भगदड़ के चलते यहां भी किसी को कोई पूछने वाला नहीं था । खैर भगदड़ जब समाप्त हुई , शाम से रात हुई तो एक मेज पर राजेंद्र यादव के साथ हम कुछ लेखक जलपान के लिए बैठे । चाय पीते-पीते अचानक राजेंद्र यादव ने एक महिला का नाम लेते हुए मुझ से कहा कि , ' फला नहीं दिख रही ? ' ' वह तो गईं। ' मैं ने उन्हें बताया। ' ऐसा कैसे हो सकता है ?' राजेंद्र यादव ने कहा , ' ऐसे कैसे चली जाएगी ?' ' मैं ने जाते हुए देखा है। इस लिए बता रहा हूं। ' ' नहीं , नहीं। एक बार ज़रा चेक कर के आइए। ' उन्हों ने बिदकते हुए कहा कि , ' ऐसे नहीं जा सकती। ' राजेंद्र यादव का सम्मान करते हुए मैं ने पूरे पंडाल का घूम कर जायजा लिया। एक बार नहीं , दो बार पूरे पंडाल की पड़ताल की और लौट कर हंसते हुए बताया कि , ' कहीं नहीं मिलीं वह। ' राजेंद्र यादव को यकीन नहीं हुआ। वह उदास हो गए। फिर उन्हों ने एक दूसरे लेखक को उन महिला को खोजने के लिए भेजा। उन्हों ने भी वापस आ कर बताया कि , ' नहीं मिलीं। ' अब राजेंद्र यादव ने उन महिला को फोन मिला दिया। और उन से पूछा कि , ' कहां हो ?' ' घर आ गई हूं। ' राजेंद्र यादव के मोबाइल पर आ रही आवाज़ वहां उपस्थित लोग भी सुन रहे थे। मैं भी । गो कि मोबाइल का स्पीकर आन नहीं था। तो भी उन दिनों ऐसे मोबाइल होते थे कि कभी-कभार अन्य लोग भी हलकी आवाज़ सुन लेते थे। लेकिन राजेंद्र यादव को इस सब की परवाह नहीं थी । वैसे भी वह इन सब बातों को छुपाने के तलबगार नहीं थे । उन का सब कुछ खुल्लमखुल्ला था । ' घर कैसे चली गई ? ' राजेंद्र यादव नाराज होते हुए बोले , ' ऐसे कैसे चलेगा ?' ' सारी सर ! ' ' कुछ नहीं , मैं होटल पहुंच रहा हूं , तुम भी पहुंचो। ' ' जी सर ! ' महिला बोली , ' पहुंचती हूं सर !' हम लोगों की बैठकी बर्खास्त हो गई थी । राजेंद्र यादव होटल के लिए रवाना हो गए। हालां कि वहां उपस्थित एक पत्रकार ने यह पूरी बातचीत रिकार्ड कर ली । बाद में मजा ले-ले कर वह सब को सुनाते रहे थे तब के दिनों । खैर , अब वह महिला अपने को स्थापित कहानीकार मानती हैं । गो कि हैं नहीं । इस के पहले वह अपने को स्थापित कवयित्री मानती थीं। गो कि थीं नहीं । लेकिन तब के दिनों एक मशहूर महाकवि की उन पर कृपा थी । उन मशहूर कवि की भी सूची राजेंद्र यादव जैसी ही है । शायद राजेंद्र यादव से भी बड़ी सूची है । ...


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