भारत/नई दिल्ली/जम्मू कश्मीर   196
वरिष्ठ निर्वासित कश्मीरी साहित्यकार अमर मालमोही से एक भेंट सहसा -अग्निशेखर बरसों बाद एक विवाह समारोह में यहाँ जम्मू में वरिष्ठ कश्मीरी और उर्दू के नाटककार,कहानीकार, उपन्यासकार और चिन्तक प्रोफेसर अमर मालमोही से भेंट हुईं । कश्मीर से निर्वासन के बाद कुछ वर्ष जम्मू में बदहाली का शरणार्थी जीवन जीने के बाद पुणे जाकर बेटे के पास रहने को बाध्य हुए। यह अधिकांश कश्मीरी विस्थापितों का बच्चों की आर्थिक बाध्यताओं के चलते दूसरा विस्थापन है जिसके चलते वे देश के सुदूर राज्यों में और ज़्यादा छितरा गये। प्रो. अमर मालमोही की यह भी एक विडंबना है कि इनके बड़े सुपुत्र दिव्यांग हैं और इन्हें एक माँ की तरह उनका हरदम खयाल ही नहीं रखना होता है,बल्कि अपने साए की तरह नित्य अपने साथ रखना पड़ता है। जहाँ जाते हैं साथ ले चलते हैं। उचाट अकेलेपन में उसे पीछे किसके पास छोड़कर जाएँ वो भी किराए के मकान में! कश्मीर की बात अलग थी।अपना घर था। मालमोह गाँव था ,अडोस पडोस अपना था। फिर यह बच्चा छोटा भी तो था।संयुक्त घर में देखभाल थी।पत्नी थीं, माँ थीं । भाई और भौजाइयां थीं । हर एक कश्मीरी विस्थापित की तरह प्रो.अमर मालमोही की भी अपनी एक दुनिया थी । संबंधों का एक स्वायत्त गणतंत्र था जिसमें कश्मीरी,उर्दू,हिंदी और अंग्रेज़ी के उनके दर्जनों साहित्यिक मित्र थे,रंगकर्मी थे । एक ज़िन्दादिली थी। विचार-विनिमय और बहसें थीं शादी-ब्याह,मेले-ठेले,तीज-त्यौहार, खेत खलिहान थे। और एक दिन उनकी दुनिया भी बदल गयी। अडोस पडोस बदल सा गया। यार दोस्त,कालेज के सहकर्मी बदल से गये।आज जब पलटकर याद करते हैं तो चीज़ें साफ दिखाई देती हैं,"तब हमने उस पूरी प्रोसेस को समझने में कोताही की। यकीन न किया कि ऐसा भी हो सकता है हमारे साथ।हालांकि हमारी सामूहिक जलावतनी से पहले हवा पगलाई जा रही थी और हम थे कि शायद समझकर भी मानना ही न चाह रहे थे।" अमर मालमोही चूंकि एक प्राध्यापक और प्रसिद्ध साहित्यकार थे,इसलिए एक रुतबा था।याद करते हैं कि कैसे उनका पूरा गांव खाली हो गया था और वह गाँव में ही टिके रहे।आखिरी कश्मीरी पंडित घर के रूप में चिन्हित होने तक। उनकी माताश्री उनसे भी बढकर बंधी थीं अपने गाँव मालमोह से,अपने घर से।एक एक ईंट जोड़ कर बनाया था घर।यहाँ तक कि जब अमर मालमोही ने बेबसी, दहशत और हत्या की करीब आती आशंका के चलते गाँव छोडने का फैसला किया तो उनकी माताश्री वहीं अकेले रहने की बेतुकी ज़िद्द पर अड गयीं। जान पर बन आई थी अमर मालमोही के,क्या करते! प्रो.अमर मालमोही को अनिष्ट का पूर्वाभास तो था, और यह पूर्वाभास कहानीकार हरिकृष्ण कौल ,कवि मोहन निराश आदि उनके कई समकालीनों की रचनाओं में भी दबे स्वर में कब से अभिव्यक्ति पा रहा था,इसलिए वह अपने गाँव से 40-45 किलोमीटर दूर सोपोर डिग्री कालेज आते जाते बस में परिचितों के साथ भी कोई बात न करते। एक दिन इशारों में उनके एक सहयोगी ने कालेज में उनसे कहा भी कि हालात दिनों दिन खराब ही हुए जा रहे हैं,अपना "खास" खयाल रखिये । गाँव में भी ऐसी ही सूँघ ने उन्हें बेचैन कर दिया था।पूरी घाटी से अधिकांश हिन्दू घरबार छोड़ कर भाग गये थे। उनका अपना दिल नहीं मान रहा था।जैसे दिल नहीं, उनकी ज़िद्दी माँ हो। अमर मालमोही अब सोपोर कालेज से गाँव न लौटकर सीधे गनपतयार ( श्रीनगर) अपने मौसेरे भाई दया कृष्ण कौल के पास चले जाते।रात वहाँ रहकर सुबह बटमालू बस-अड्डे से लगभग 45 किलोमीटर दूर सोपोर चले जाते। अब तक श्रीनगर भी धीरे धीरे कश्मीरी हिन्दुओं से खाली हो चुका था।याद करते हैं ,"एक दिन सोपोर के सब डिविजन मजिस्ट्रेट ने मुझे लिखित अनुदेश भेजा कि आपको सोपोर का मजिस्ट्रेट बनाया गया है ।यह खबर मेरी आतंकवादियों के हाथों मारे जाने की एक डैथ-वारंट के समान थी।अब वे मुझे क्यों छोड़ते! मैंने घबराकर एस. डी. एम. के कार्यालय जाकर वहाँ आवेदन दिया कि मैं अपने विकलांग बच्चे और बूढ़ी मां के कारण इस ज़िम्मेदार को निभाने में असमर्थ हूँ ।" उन दिनों को याद करते हुए अमर मालमोही की आवाज़ में आज भी कंपकंपी महसूस की जा सकती है। एक दिन कालेज से लौटते हुए सोपोर बस-अड्डे की ओर जा रहे थे ।रास्ते में कुछ हरी सब्जियां खरीदीं थीं जो एक थैले में डाल रखीं थीं ।उन्हें उसी दिन वेतन भी मिला था। असुरक्षा की भावना का आलम यह था कि उन्होंने सब्जी के थैले में ही पूरी तन्ख्वाह छिपाकर रखी थी। " सर,अस्सलामुअलैकुम ! " उन्होंने पलटकर देखा।एक फिरन पहने नव युवक उनके पीछे पीछे आ रहा था।उन्होंने आगन्तुक के अभिवादन का स्वागत किया । "सर,आपने मुझे पहचाना नहीं ।मैं आपका स्टूडेंट हूँ ।पढ़ाया है आपने मुझे!" पीछे पीछे आ रहा नवयुवक अब उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने लगा ।देखते ही देखते दूसरा नव युवक भी मेरी बाईं तरफ प्रकट हुआ। " सर, क्या आप यह चाहेंगे कि आप यहाँ सोपोर की सड़कों पर अपने ही स्टूडेंट्स का लहू बहाएँ ?" उस नव युवक ने प्रो.अमर मालमोही से ऐसा कहकर उनके होश उडा दिए । उन्होंने घबराई लेकिन संयत दिखने वाली आवाज़ में उस लड़के से बात को साफगोई से बताने को कहा। दिल की धडकनें तेज़ हो गयीं थीं। उन्हें ऐसी कई घटनाएं याद हो आईं जब आतंकवादियों ने अपनों से ही अपनों की हत्याएँ करवायीं थीं । "हमने सुना है कि आपको सरकार ने मजिस्ट्रेट के अधिकार दिए हैं। हम जब पुलिस और भारतीय फौजों से लड़ाई कर रहे होंगे तो वे आपसे गोली चलाने का आदेश माँगेंगे।और उनकी गोलियों से हम मरेंगे,आपके शागिर्द ।" अमर मालमोही समझ गये थे कि उनके ये विद्यार्थी कौन हैं ।इससे पहले कि वह उस नवयुवक की बात का जवाब देते, उसके हाथ से सब्जी का थैला लेकर उस नवयुवक ने अपने दूसरे साथ को थमाते हुए निर्देश दिया ," जा, तुम प्रोफेसर साहब के लिए श्रीनगर की बस में फ्रंट सीट की टिकट खरीद कर रखो,हम आते हैं ।" अमर मालमोही बताते हैं कि उस एक पल सहसा मुझे अपनी जान से ज़्यादा चिन्ता सब्जी के थैले में छिपा कर रखे वेतन की हुई। मैं कैसा मूर्ख था ! बस अड्डे की ओर डग भरते हुए अमर मालमोही को उस नवयुवक ने धीरे से कहा," आप कुछ दिनों के लिए छुट्टी ले सकते हैं ...." याद करते हैं अमर मालमोही कि जब उन्हें बस में ड्राइवर की बगल में फ्रंट सीट पर उन दो नव युवकों ने सम्मान से बिठाया।मुझे किराया नहीं देने की बात कहकर मुझे विदा करते हुए 'अलविदा!' कहा । बस जब अड्डे से बाहर मुख्य राजमार्ग पर दौड़ने लगी तो बस के ड्राइवर ने ऊँची आवाज़ में मेरा शुक्रिया अदा करते हुए कहा, " पंडित जी,आपकी बदौलत हमें इन जाँबाज़ मुजाहिदों के दीदार नसीब हुए। दीन के लिए निकले हैं । " अमर मालमोही के आज भी सिहरन दौड़ती है । वह कहते हैं ,ऐसे दहशत भरे दिनों में सार्वजनिक तौर पर कोई नहीं चाहता था कि उसे हिंदू के रूप में पहचाना जाए। यह दुर्भाग्य के वो दिन थे जब मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करते कि कि राह चलते कोई आपसे 'नमस्ते ' न कहें और लोगों को पता चले कि आप हिंदू हैं । प्रो.अमर मालमोही के मौसेरी भाई, जिनके यहाँ सोपोर कालेज से रोज़ रोज़ श्रीनगर जाकर वह रहने लगे थे,दया कृष्ण कौल उनसे जुड़ी एक यह घटना सुनाते हैं ," एक दिन दोपहर में हमारे किराए के मकान के दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी। दस्तक किसी अजनबी की थी।लोग उन दिनों दस्तकों से खूब दहशत में आते थे ।" अमर मालमोही भाई की बात को ध्यान से सुनते हुए हामी में सर हिलाते हैं । दया कृष्ण कौल आगे कहते हैं, " मैंने दरवाज़ा खोला।सामने एक छः फुटा बीस-बाईस वर्ष का एक युवक था।यहाँ कोई प्रोफेसर रहता है,उसने पूछा ।मेरे होशोहवास उड गये। मैंने 'नहीं' कहने में अंदर से बहुत ज़ोर लगाया।उसने यही सवाल बार बार दोहराया ।मेरे पूछने पर उसने एक कृत्रिम सी वजह बताई कि वह उनसे ट्यूशन पढ़ने चाहता है ..फिर वह थोड़ी देर के बाद चला गया।" दया कृष्ण कौल को सारा खेल समझ में आया।प्रो.अमर मालमोही की पूरी जानकारी आतंकियों ने जुटा ली है।वह चार- साढे चार बजे सोपोर से श्रीनगर पहुँचते हैं। उन्होंने विवेक से काम लिया और घर (गनपतयार में) पहुँचने से पहले ही उन्होंने अमर मालमोही को रास्ते में ही रोककर उनसे यह बात बताई । ऐसा सुनने पर अमर मालमोही ने फट् से कहा था ," गाशा,शायद उसी नवजवान ने मुझे हब्बाकदल (पुल)पर अभी रोककर यही बात कही थी कि वह मुझसे ट्यूशन पढ़ना चाहता है।मैं हैरान था कि एक अजनबी से वह सीधे यह कैसे कह रहा था।" अमर मालमोही को वहीं से लौटाया भाई ने।वह जोखिम उठाकर गांव पहुँचा उलटे पाँव ।उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है । क्यों यह साम्प्रदायिक नारे दिए जा रहे हैं ..क्यों कश्मीरी पंडितों को डराया धमकाया जा रहा है..क्यों उन्हें भगाने पर तुले गये हैं ये लोग..और शाइस्ता लोग इसका विरोध क्यों नहीं कर रहे..क्यों कोई अपील नहीं करता कि अल्पसंख्यक हिंदुओं को टारगेट न किया जाय... उन्हें एक दिन अपने एक पडोसी मुस्लिम दोस्त ने अपनी ट्रक पर चढ़ाकर दूर तक सैर कराई थी।उसकी बातों से अमर मालमोही को अंदर के उबाल की कुछ भनक लगी थी।उनके इस दोस्त का एक भाई तरीके हुर्रियत का वरिष्ठ सदस्य था।इसलिए उसकी बात का मूल्य था। अमर मालमोही ने माताश्री से एकबार फिर विनती की कि वह चले जम्मू उसके साथ ।वह कहाँ मानने वाली थी! अचानक दो लोग घर चले आए और प्रोफेसर अमर मालमोही को हाथ में सिगरेट की डिब्बिया के कागज़ की एक पर्ची थमा कर चले गये। यह उनके इसी ड्राइवर दोस्त की उन्हें भेजी एक पर्ची थी,जिसपर लिखा था,जाना चाहो तो गाडी का इंतज़ाम भी हो जाएगा । किसी तरह जान हथेली पर रखकर अमर मालमोही जम्मू पहुँचे थे। भाई और बच्चे तो पहले ही जम्मू भाग आए थे।यहाँ परेड ग्राउंड के पास गीता-भवन के अहाते में निर्वासित लोगों का रेलमपेल था।पंजीकरण, राहत, तंबुओं का जुगाड़, जुलूस और जलसे इत्यादि के बीच अपनों से भी मिलना हो जाता। कुछ दिनों के बाद कश्मीर से फोन आया था अमर मालमोही को कि गाँव में आपकी अकेली माँ का इंतकाल हो गया है। अमर मालमोही कुछ रिश्तेदारों को साथ लेकर मालमोह गाँव पहुँचे तो उन्हें यह देखकर निहायत अफसोस हुआ कि गाँव भर में न उनका लौटना कोई घटना थी और न ही औपचारिकता वश भी कोई उनकी माँ के दाह-संस्कारा में शामिल हुआ। यह वो गाँव न था जहाँ वह सदियों से रहते आए थे।उन्होंने जाकर पटना तहसील की पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी लिखाने की असफल कोशिश की। वह आज भी हैरान है कि उनकी माताश्री की मृत्यु को सामान्य कहा जाए या और कुछ ... अमर मालमोही अपने सुपुत्र को साथ रिश्ते की अपनी एक बहन के बेटे के यज्ञोपवीत समारोह में शामिल होने के सिलसिले में जम्मू आए थे। उन्होंने देर तक मुझसे हमारे साझा साहित्यिक मित्रों के बारे में जानकारियाँ जुटाईं। # # ...


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