उत्तर प्रदेश/लखनऊ   44
उपवन की कलिकाओं में जीवन्त रहेंगे गीत,अनुगीत निर्माणों में होते रहेंगे चेतन,अनुचेतन के सृजन और घुलते रहेंगे कल्पनाओं के मूर्त चरित्र धूल में मिटती रहेंगी छटाएं उभरती रहेंगी चित्रावलियाँ रंगों के इंद्रधनुषी आभा में उस दिन मैं फिर से जलूँगी होकर अनश्वर,,,,,,,,, दीपक अनन्य ही रहेंगे गहन निशा में,,,, प्रतीक्षारत,,,, अनवरत,,, होने को एकाकार,,,,,,,,,,,,!!! अपनी आँखों में वत्सलता का काजल और हाथों में तुम्हारे प्यार का आँचल लिए खड़ी हूँ जीवन के मरुस्थल में तुम्हारे शुभ की कामना और,,,!! समारोपित स्वप्नों में पूर्णता की संकल्पना लिए यह विस्तृत आत्मा विस्तीर्ण क्षितिज पर आज फिर से अपनी सम्पूर्णता के आलिंगन में है भीगे हुए नयनकोरों में उमड़ते स्वातिबिंदु आतुर हैं फिर से मोती बन जाने को फिर से आतुर हैं कुछ गीत गाने को पाने को आतुर है फिर से अनहद के स्वरों को स्वरमालिका के कुछ अस्फुट स्वर रचने को हैं आतुर फिर से,,,,,, अभिवंदना,,,,!! परम्,,,,!!तुम्हारी सत्ता में हो विलीन,,,,!! तुम्हारे स्वर,गीत,सृजन,स्वप्न सुरक्षित हो निहार रहे हैं अनवरत,,,, उपवन की कलिकाओं में जीवन्त रहेंगे गीत,अनुगीत निर्माणों में होते रहेंगे चेतन,अनुचेतन के सृजन और घुलते रहेंगे कल्पनाओं के मूर्त चरित्र धूल में मिटती रहेंगी छटाएं उभरती रहेंगी चित्रावलियाँ रंगों के इंद्रधनुषी आभा में उस दिन मैं फिर से जलूँगी होकर अनश्वर,,,,,,,,, दीपक अनन्य ही रहेंगे गहन निशा में,,,, प्रतीक्षारत,,,, अनवरत,,, होने को एकाकार,,,,,,,,,,,,!!! ...


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