भारत/नई दिल्ली   83
नरेंद्र मोदी देश में उतने कमजोर नहीं हुए हैं जितने भाजपा में होते जा रहे हैं...और... यह अप्रत्याशित भी नहीं है। अमित शाह को आगे बढ़ा कर उन्होंने जिस तरह सत्ता के साथ ही संगठन पर अपना एकछत्र नियंत्रण स्थापित कर लिया था यह भाजपा के लिये नया अनुभव था। जाहिर है, शक्ति और लोकप्रियता के शिखर पर आरूढ़ शीर्ष नेता के समक्ष जन्म लेती कुंठाओं और बढ़ते असंतोष को मुखर होने का कोई अवसर नहीं मिल पा रहा था। अब...जब दुर्ग की दीवारों में छिद्र नजर आने लगे हैं तो अप्रत्यक्ष ही सही, असंतोष के स्वर भी उठने लगे हैं। यह 'ब्रांड मोदी' का करिश्मा था कि भाजपा शानदार जीत हासिल कर पहली बार अपने दम पर बहुमत में आई थी। संगठन आभारी था और दोयम दर्जे के तमाम नेता नतमस्तक। एक आडवाणी को छोड़ भाजपा में कोई पहले दर्जे का नेता था भी नहीं। लोकतंत्र में दर्जा जनता देती है और भाजपा में अटल-आडवाणी के बाद कोई नेता ऐसा नहीं रह गया था जो जनप्रियता के मामले में 'ए लिस्टर' नेता ठहराया जा सके। एक प्रमोद महाजन थे लेकिन...अब उनकी बात क्या करनी। तो...वयोवृद्ध आडवाणी को साइड करने के बाद मोदी की एकछत्रता निष्कंटक थी। बड़ी आसानी से अमित शाह को पार्टी अध्यक्ष बनवा कर उन्होंने संगठन को अपने पीछे कर लिया और इंदिरा गांधी के बाद दूसरे सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री का रुतबा हासिल कर लिया। फिर...ऐसा क्या हुआ कि जिस मोदी के बारे में महज साल-डेढ़ साल पहले तक अजेयता का मिथक गढ़ा जा रहा था वे सवालों के घेरे में आते जा रहे हैं। असंतुष्ट सहयोगियों की कुंठाएं अप्रत्यक्ष प्रहार का रूप लेने लगी हैं और विरोधी उत्साहित हो उठे हैं। दरअसल, नरेंद्र मोदी को जिस स्तर का 'विजनरी' राजनेता माना गया था, अपने परिणामों में यह कहीं से नजर नहीं आया। उनके द्वारा लगाए गए प्रायः सभी दांव विपरीत असर डालने वाले ही साबित हुए। कोई कह सकता है कि उनकी नीयत सही थी। लेकिन, समस्याओं से घिरे इस देश को नीयत से बढ़ कर परिणामों की अपेक्षा थी। नोटबन्दी, जिसके परिणाम पहले दिन से ही संदिग्ध थे, के मामले में आम लोगों ने उनकी नीयत को ही प्रमुखता दी और हजार फ़ज़ीहतें झेलने के बावजूद वेनेजुएला की तरह लोग सड़कों पर नहीं उतरे। लेकिन, नोटबन्दी झंझावाती परिणाम लेकर सामने आया और साथ ही, इसने बैंकिंग सिस्टम की कलई भी उतार दी जब भ्रष्ट बैंकरों ने रातोंरात काले धन रूपी नकदी को जमा कर मुख्य धारा में ला दिया। नवउदारवादी आर्थिकी एकल बाजार की मांग करती है और भारत जैसे विविधताओं से भरे विशाल देश के संदर्भ में भी यह सत्य बदल नहीं सकता था, इस लिहाज से जीएसटी आज नहीं तो कल सामने आना ही था। मनमोहन सरकार ने भी इसके लिये प्रयास किया था लेकिन अंजाम तक इसे मोदी ने पहुंचाया। परंतु, इसके क्रियान्वयन की जटिलताओं ने मोदी सरकार के आर्थिक मामलों के कर्त्ता-धर्त्ताओं की 'मीडियाकरी' को एक्सपोज कर दिया। एक विजनरी राजनेता को प्रतिभासम्पन्न सलाहकारों और सहयोगियों की दरकार होती है लेकिन देश के साथ ही यह मोदी का भी दुर्भाग्य रहा कि जिन पर उन्होंने भरोसा किया वे पूरे के पूरे 'मीडियाकर' निकले। अंततः जीएसटी, जिसके बारे में उम्मीदें की जा रही हैं कि यह एक दिन बेहतर परिणाम सामने लाएगा, अपने वर्त्तमान दौर में हाहाकारी प्रभावों के साथ लोगों, खास कर छोटे और मंझोले व्यापारियों की अंतहीन परेशानियों का सबब बन गया। दरअसल, नरेंद्र मोदी की एक दिक्कत यह भी रही कि उनके नेतृत्व में सत्ता प्रतिष्ठान को प्रतिभाशाली और स्वतंत्र चेता 'प्रोफेशनल्स' बर्दाश्त ही नहीं हुए। रघुराम राजन इसके एक उदाहरण हैं। इस मामले में मोदी जी इंदिरा गांधी से सीख ले सकते थे जो प्रतिभाओं का सम्मान करती थीं और उन्हें कार्य करने की स्वतंत्रता भी देती थीं। आज के दौर में कोई भी सरकार अपनी आर्थिक उपलब्धियों को लेकर ही आंकी जाती है, लेकिन नरेंद्र मोदी जिस राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हैं वह अपने जनसापेक्ष आर्थिक चिंतन के लिये नहीं, विशिष्ट सांस्कृतिक चिंतन के लिये जानी जाती है। ऐसा एकायामी चिंतन, जो अपने मौलिक संदर्भों में आज के भारत के लिये अनेक सांस्कृतिक संकटों का जनक बन गया है। तो...सांस्कृतिक स्तरों पर बढ़ते कोलाहल के बीच आर्थिक उपलब्धियों के मामले में दरिद्रता ने मोदी सरकार को आमलोगों की नजरों में एक्सपोज करना शुरू कर दिया। कहाँ तो दो करोड़ रोजगार प्रतिवर्ष सृजित करने का वादा था...कहाँ बेरोजगारी की दर उच्चतम स्तरों को छूने लगी। कौशल विकास योजना का भ्रामक नारा दलित, पिछड़ों और ग्रामीण युवाओं के प्राइवेट नौकरियों में प्रवेश में सहायक नहीं बन सका। इधर, सरकारी नियुक्तियों में घोषित-अघोषित रोक ने हालातों को बद से बदतर बना दिया। बढ़ती हुई बेरोजगारी और इस फ्रंट पर मोदी सरकार की नाकामियों ने 'ब्रांड मोदी' की चमक पर सबसे गहरा धब्बा लगाया। उम्मीदों से भरे युवाओं के लिये यह ऐसी नाकामियां आपराधिक थीं। बदतर यह...कि बेरोजगारों के हाथों में ज्ञात-अज्ञात संगठनों ने लट्ठ, तलवारें और किसिम-किसिम के झंडे थमाने शुरू किए। युवाओं को कभी "मां भारती" पुकारने लगी तो कभी 'धर्म' अपने रक्षार्थ उनका आवाहन करने लगा, कभी "गोमाता की चीत्कार" पर लोगों को गोरक्षक बना कर हत्यारा बनाया जाने लगा तो कभी "राम लला हम आएंगे" जैसे निरर्थक और विभाजक नारे लगाते युवा शान्तिकामी समाज के सामने सवाल बन कर खड़े होने लगे। देश के स्तर पर ऐसी अशांतियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्थिति हास्यास्पद बनाई और युवाओं को भटकाव के सिवा कुछ हासिल नहीं हुआ। ऐसी मान्यताओं के आधार हो सकते हैं कि व्यक्तिगत स्तरों पर नरेंद्र मोदी ने हत्यारे गोरक्षकों और लंपट रामभक्तों को बढ़ावा नहीं दिया, लेकिन यह तथ्य तो सामने है कि उनके राज में इन नकारात्मक शक्तियों ने जम कर उत्पात मचाया और देश को सांस्कृतिक विभाजन के रास्ते पर धकेला। मामला फिर 'नीयत' और 'परिणाम' का ही सामने आता है। मोदी सरकार ऐसे उपद्रवकारी तत्वों पर लगाम कसने में विफल साबित हुई और विरोधियों को यह कहने का मौका मिला कि ऐसी अशांतियाँ स्वयं 'सरकार प्रायोजित' ही हैं। शक्तिशाली प्रधानमंत्री का मिथक तब टूटने लगा जब नरेंद्र मोदी अपने नीतिगत निर्णयों और कार्यकलापों में कारपोरेट शक्तियों द्वारा संचालित होने का आरोप झेलने लगे। ऐसे एक से एक उदाहरण सामने आने लगे जो मोदी को जनता का नेता नहीं, सत्ता में कारपोरेट का प्रतिनिधि साबित करने के लिये पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत करने लगे। आयुष्मान भारत योजना, उच्च शिक्षा संरचना में नीतिगत बदलावों का खाका, गैस नीति, राफेल प्रकरण आदि ने उनकी शक्तिशाली राजनेता की छवि पर कारपोरेट परस्ती की गहरी छाप लगाई। संस्थाओं का निर्माण और विघटन गतिशील लोकतंत्र के लिये एक सामान्य प्रक्रिया है। इसलिये, नरेंद्र मोदी ने नेहरू युगीन संस्थाओं को वैकल्पिक रूप देना शुरू किया तो यह कतई अस्वाभाविक नहीं था। लेकिन, इस पूरी प्रक्रिया में स्वप्नद्रष्टा राजनेता की वह छाप नहीं पड़ सकी जो लोगों को आश्वस्त कर सकता। नीति आयोग योजना आयोग का प्रहसन नुमा विकल्प बन कर सामने आया जिसके कर्णधार प्रोफेशनल्स सरकार की निजीकरण की नीतियों का खाका खींचने वाले कारपोरेट एजेंट के अलावा कुछ और नहीं लगते हैं। साहित्य अकादमी से लेकर आईआईटीज तक को बाजार में धकेलने की नीतियां कई सारे सवालों को जन्म देती है जिसका जवाब देने के लिये अहंकारी सत्ता प्रतिष्ठान कतई उत्सुक नहीं लगता। संस्थाओं के साथ नाकाम प्रयोग, उनकी गरिमा पर प्रहार, उनकी स्वायत्तता में हस्तक्षेप आदि ऐसे अध्याय हैं जो अंतहीन सवालों को जन्म देते हैं। नतीजा...जिन-जिन को लगा कि मोदी सरकार की मनमानियों पर चुप्पी के लिये इतिहास भविष्य में उन्हें कठघरे में खड़ा कर सकता है, उन्होंने पलायन को ही उपयुक्त रास्ता समझा। रिजर्व बैंक गवर्नर उर्जित पटेल हों या प्रधानमंत्री के विभिन्न सलाहकारों का इस्तीफा...यह इतिहास के सवालों से बचने का उपक्रम ही तो है। लेकिन...नरेंद्र मोदी कैसे बचेंगे? उन्हें तो जवाब देने ही होंगे। इतिहास अपनी कसौटियों को लेकर अत्यंत निर्मम होता है। बढ़ती बेरोजगारी, महंगी होती शिक्षा और चिकित्सा, युवाओं का आक्रोश, किसानों की बेचारगी आदि-आदि, आमलोगों का संशय, पार्टी के साथियों की कुंठाओं और उनके असंतोष की अभिव्यक्तियों की शुरुआत, जमीन सूंघते राजनीतिक विरोधियों का बढ़ता उत्साह...नरेंद्र मोदी के साढ़े चार साल की सत्ता का हासिल यही है। उनकी उपलब्धियों से बड़ा ग्राफ उनकी असफलताओं का है। आशाओं और आश्वस्तियों का स्थान निराशाओं ने लेना शुरू कर दिया है। राजनीतिक अजेयता का मिथक अब पुनर्वापसी के संशय में बदल रहा है। सपनों का सौदागर कहीं धुंध में गुम होता जा रहा है। ...


Leave a comment