नई दिल्ली/केरल   68
सनातन आस्थायें एवं सबरीमाला ;त्रिलोचन नाथ तिवारी ------------------------------------- आध्यात्मिक तथा आधिभौतिक शक्तियों को सामाजिक जीवन हेतु उपयोगी बनाने की कला ही संस्कृति है। हमारे भारतीय वांग्मय के मनीषियों ने मनुष्य को स्वयं में एक आध्यात्मिक शक्ति माना है, और मनुष्य का सम्बंध अपने चतुर्दिक जिस विश्व से है उसे आधिभौतिक शक्ति की संज्ञा से अभिहित किया है। जब मनुष्य अपने ज्ञान तथा विवेक की सत्ता से अपनी इन्द्रियों को कार्यक्षम बनाता है, विकारों पर अधिकार पा लेता है, तथा बुद्धि, भावना एवं आकांक्षा की प्रगल्भता का उदय करता है तब वह आध्यात्मिक संस्कृति का निर्माण करता है। इस संस्कृति के निर्माण से नीति, सौन्दर्य, सत्य, न्याय, श्रेयस तथा मीमांसा का जीवन से संपर्क स्थापित होता है जिसके फल स्वरूप विधियों, नियमों, धर्म, साहित्य, विज्ञान, तर्क तथा समाज एवं राज्य की विभिन्न व्यस्थाओं का आविर्भाव होता है। मनुष्य द्वारा अपने चतुर्दिक फैले विश्व का अपने सामाजिक जीवन के अनुकूल रूपांतरण भौतिक संस्कृति की जन्मदाता है। इससे मनुष्य अपने चतुर्दिक सृष्टि से जल, भूमि, अग्नि, वायु, आकाश, वृक्ष-वनस्पति, खनिज, पशु आदि को अपने अनुकूल तथा उपयोगी बनाता है और इससे कृषि, शिल्प, वाणिज्य, विज्ञान, पशु-पालन, युद्ध, विजय, शस्त्र और यंत्र अथवा कहें कि “अभियान” की स्थापना करता है। भौतिक तथा आध्यात्मिक संस्कृतियाँ अन्योन्याश्रित हैं, क्योंकि अपने समीपवर्ती जगत का उपयोग करते ही मनुष्य की आतंरिक शक्तियां विकसित हो जाती हैं। संस्कृति का विकास धर्ममूल आधृत है। प्राथमिक परिस्थितियों के प्रत्येक मानव-समूह में जीवन के धार्मिक तथा व्यावहारिक दो रूप सामने आये। विश्व का कोई भी समाज हो, उसका एक अपना धर्म-मूल है। जीवन के धार्मिक रूप श्रद्धा तथा अलौकिकता पर आधारित होते हैं। यह श्रद्धा तथा अलौकिकता जिन आचरणों को जन्म देती है वह पाप-पुण्य, भूत-प्रेत-पितर-राक्षस, अनेकानेक देवी-देवताओं आदि की कल्पना करती है तथा उसका सम्बंध स्वर्ग, मोक्ष, परमार्थ तथा आध्यात्म-मार्ग से होता है। यह अलौकिक शक्ति तथा उससे सम्बंधित शक्तिमान की अवधारणा, वास्तविक अनुभवों से परिपुष्ट संकल्पनाओं की विपर्यस्त रचना से एक भाव-संपृक्त मन का निर्माण करती है जो शक्ति तथा शक्तिमान के प्रति भीति, प्रीति तथा शरणागति से आच्छादित होता है। ऐसा मन दो प्रकार के प्रयास करता है – एक उन शक्तियों तथा शक्तिमान को अपने अनुकूल कर लेने का, अथवा फिर उन्हें अपने वशवर्ती कर लेने का। यह मनाने की क्रिया, शक्ति को अपने अनुकूल करने की क्रिया ही आराधना है तथा उसे वशवर्ती करने की क्रिया ही साधना है। तंत्र-मन्त्र-यंत्र, अभिचार, कृत्या, जारण, मारण, उच्चाटन आदि तांत्रिक अथर्वण क्रियायें इसी साधना का अंग हैं। सम्पूर्ण कर्म-काण्ड तथा तंत्र-शास्त्र इसी आराधना तथा साधना की विभिन्न पद्धतियाँ हैं। किसी भी जाति या धर्म के साथ संस्कृति का सम्बंध संस्कारों में निहित है। पीढ़ियाँ अपने आचार-विचार, कला, साहित्य, लोक-व्यवहार तथा आध्यात्मिक प्रभाव अपनी आगामी पीढ़ियों को सौंपती जाती हैं और इस प्रकार संस्कार दृढ़ होते-होते जब जातियों के जीवन को पूर्णतः प्रभावित कर लेते हैं तब हम उसे संस्कृति के नाम से जानने लगते हैं। अपनी परम्परा, अपनी पद्धति तथा अपनी संस्कृति सबको प्यारी होती है। आर्य संस्कृति का जीवन दीर्घकाल-व्यापी रहा। गंगा की उपत्यकाओं में आर्यों का स्थापित वैदिक धर्म आर्यों के इतिहास-पुरुषों को देवता की महत्ता प्रदान करता था तथा उससे सम्बंधित कर्मकाण्ड अपने चरम पर पहुंचे हुए थे, किन्तु तर्क ने संदेह को जन्म दिया और वैदिक धर्म पर प्रहार प्रारम्भ हुये। वैदिक धर्म की शक्ति और दुर्बलता दोनों यही थी उसमें संदेहों तथा तर्कों को आदर प्राप्त था तथा उसमें समन्वय की संभावना को कभी नकारा नहीं गया। स्यात् वैदिक धर्म और आगे चल कर उससे ही एक नये स्वरुप में आये सनातन धर्म की इसी परिणति ने अन्य धर्मों को धर्म में संदेह तथा तर्क को कोई स्थान न देने को बाध्य किया। पांचाल-राज प्रवाहण तथा उसके शिष्य उद्दालक ने ब्रह्म-ज्ञान, पुनर्जन्म तथा आत्मा के अविनश्वरता की अवधारणा को स्थापित किया, और ब्रह्म-ज्ञानियों की विद्वत्सभायें तर्कों-वितर्कों से गूँज उठीं। वैदिक याज्ञवल्क्य ब्रह्मज्ञानी गार्गी के समक्ष निरुत्तर हुए, उपनिषदों की रचना हुई। किन्तु विचारधारा यहीं नहीं रुकी! वह आगे बढ़ी तथा विभिन्न दर्शनों के रूप में धर्म, समाज तथा साहित्य को एक क्रान्ति से आप्लाविल कर गई। लोगों के सोचने-विचारने, अध्ययन-अध्यापन के ढंग परिवर्तित हो गये। शैली बदली, भाषा बदली, रहन-सहन बदला। वेद मन्त्रों का स्थान सूत्रों तथा वार्तिकों ने ले लिया। पाणिनि आदि वैयाकरणों नें भाषा का संस्कार किया तथा संस्कृत का आधुनिक परिष्कृत स्वरुप स्थिर हुआ। आर्यों के अपने विकसित जीवन के लगभग ढाई हजार साल व्यतीत हो चुके थे। वे भारत-युद्ध में जाति तथा अधिकारों की एक विकट समस्या को सुलझाने का प्रयत्न कर चुके थे। भारत-युद्ध एक प्रकार से आर्य-शक्ति का विनाशक युद्ध सिद्ध हुआ था और इस युद्ध के एकमात्र महानायक कृष्ण के प्रभास तीर्थ पर अवसान के पश्चात भारतवर्ष के प्रत्येक घर में सदियों तक मरण-शौच व्याप्त रहा। आर्यों की शक्ति बिखर चली, उनके विचारों में नव्यता का समावेश न हो सका, नई विचार-शक्तियाँ प्रखरता से पुरातन विचारों पर आक्रामक हुईं और ऐसी ही एक विचार-शक्ति बुद्ध के साथ इस भारत-भूमि में आयी जो एक बार तो इस भारत-भूमि पर ही नहीं, देश-देशान्तरों पर छा गई, किन्तु कालान्तर में उसमें आये दोषों के कारण वह अनेक रूपों में विभाजित हो कर भारत भूमि से तो नष्टप्राय हो गई, किन्तु विदेशों में तत्कालीन देश-धर्म से प्रभावित हो कर अपना रूप बदलते हुए वह नितांत परिवर्तित रूप में अब भी जीवित है। सनातन धर्म भी देश-काल के साथ अपना समन्वय बनाते हुये अपना अस्तित्व बनाए रखने में सफल हुआ और प्रत्येक नये विचार को अपनी विशालता में एक भाग प्रदान करते हुये धीरे-धीरे व्यापक किन्तु बहुरंगी होता गया क्योंकि सनातन में न तो किसी शक्ति-विशेष के प्रति दुराग्रह रहा, न उस शक्ति के आश्रय शक्तिमान में ही। और इस प्रकार सनातन बाहर और भीतर से नारंगी सा बन गया। भीतर से भिन्न, अलग, किन्तु बाहर से एक! सनातन में प्रत्येक का अपना देवता अलग हो सकता है, उस देवता के उपासना की पद्धति अलग हो सकती है, मान्यताएं अलग हो सकती हैं, प्रथाएं अलग हो सकती हैं, विश्वास अलग हो सकते हैं, किन्तु सनातन फिर भी सनातन है और यह इसकी बहुत बड़ी शक्ति है, किन्तु यही इसकी दुर्बलता भी है। बाहर से एक होने से क्या होता है? भीतर से तो सब अलग ही थे! इस भीतर के अलगाव को समायोजित करने हेतु एक नयी अवधारणा का जन्म हुआ जो सभी बिखरी हुई अवधारणाओं के देवताओं, पद्धतियों, परम्पराओं और विश्वासों को एकीकृत करने का प्रयास था और वह प्रयास था अनगिन आध्यात्मिक धाराओं का वैष्णव, शैव, तथा शाक्त तीन मुख्य धाराओं में नियोजन। अब इस प्रयास के उपरांत सनातन कुछ सुगठित हो गया। किन्तु मनुष्य की स्वभावगत दुर्बलता है वर्चस्व की कामना! बस मैं श्रेष्ठ हूँ और बस मेरा श्रेष्ठ है! यह वर्चस्व-कामना विचारों के क्षेत्र में भी उतनी लोलुपता प्रदर्शित करती है जितनी अन्य क्षेत्रों में। यह दुष्कामना सनातन में एक आतंरिक संघर्ष का हेतु बनी तथा वैष्णव, शैव तथा शाक्तों का परस्पर संघर्ष सभी के लिये असह्य हो गया। भारत के दाक्षिणात्य प्रान्तों में यह संघर्ष अत्यंत उग्र हो उठा। सनातन के इस संघर्ष को विराम दिया भगवान् स्वामी अय्यप्पा ने! इस समन्वय की कथा बहुत रोचक है जिसमें शाक्त, शैव तथा वैष्णव तीनों मतों के प्रमुख आराध्यों की महत्वपूर्ण भूमिका है और कथा का प्रथम अनुच्छेद प्रारम्भ होता है शाक्तों के आराध्य देवी दुर्गा से। यह गाथा भी अपने आदि से अन्त तक है आर्यों के इतिहास का ही एक अंश, किन्तु इस आलेख का विषय इतिहास के रहस्यों का उद्घाटन नहीं प्रत्युत आस्था तथा धर्म है अतः इतिहास के तथ्य पुनः कभी अन्य अवसर पर! स्वरोचिष मन्वंतर में चण्ड-मुण्ड, मधु-कैटभ, रक्तबीज तथा महिषासुर आदि का वध करके देवी दुर्गा ने देवताओं को भयहीन किया था जो अपने विविध रूपों में शाक्तों की आराध्या हैं। माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध के उपरान्त महिषासुर की भगिनी “महिषी” ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की तथा उन्हें वर देने को विवश कर दिया। जब ब्रह्मदेव ने उससे वर मांगने को कहा तो उसने अमरत्व माँगा, किन्तु अमरत्व का वरदान अदेय था। तब महिषी ने ब्रह्मा से शिव तथा विष्णु के परस्पर संसर्ग से उत्पन्न पुत्र के अतिरिक्त अन्य किसी भी हेतु द्वारा अपनी मृत्यु न होने का वरदान माँगा क्योंकि शिव तथा विष्णु का पुत्र होना तो परिकल्पना से परे, असंभव ही था! ब्रह्मदेव विवश वर दे कर लौट गये और तब वह राक्षसी “महिषी” जगत में उत्पात मचाते घूमने लगी। सृष्टि तथा उसके नियामक देवता पुनः संकट में थे। सभी देवता एक बार पुनः अपनी इस समस्या के साथ श्री हरि भगवान् विष्णु के पास पहुंचे तब विष्णु ने उनसे कहा कि समुद्र-मंथन के समय एक विशेष प्रयोजन से मैं स्त्री-रूप धारण करूंगा जो मोहिनी रूप से विख्यात होगा। उस मोहिनी रूप में शिव-संसर्ग से मुझे एक पुत्र उत्पन्न होगा किन्तु उस पुत्र का पालन किसी मनुष्य द्वारा होगा। वही पुत्र इस “महिषी” नामक राक्षसी का वध करेगा। समय आने पर विष्णु के मोहिनी रूप तथा शिव के संसर्ग से जिस बालक का जन्म हुआ वही बालक भगवान् अय्यप्पा स्वामी हैं जिनका एक नाम हरिहरन भी है अर्थात हरि तथा हर या विष्णु तथा शिव के पुत्र! शिशु-जन्म के उपरांत विष्णु अपने स्वरूप में लौट आये तथा शिव तथा विष्णु ने उस शिशु के कंठ में एक मणिमय कंठिका (जिसे भ्रम वश घंटिका अर्थात घंटी माना जाता है) बाँध कर उसे पम्पा नदी के तट पर छोड़ दिया। इस शिशु को पण्डालम के राजा राजशेखर ने पम्पा-तट पर देखा। वह शिशु योग-मुद्रा में अवस्थित था तथा उसके अधरों पर एक मंद स्मित था जिसके कंठ में एक दिव्य मणि-कंठिका झिलमिला रही थी। राजा राजशेखर उस शिशु के तेजस्वी स्वरुप से मोहित हो कर उसे अपने साथ ले आये। राजा निःसंतान थे अतः उन्होंने इस शिशु को अपना पुत्र बना लिया और उसका नाम मणिकंठन रखा क्योंकि वह शिशु उन्हें कंठ में मणि-कंठिका धारण किये ही प्राप्त हुआ था। यही मनिकंठन नाम बाद में मणिकंथन तथा फिर मणिकंदन के रूप में प्रचलित हो गया। शिशु मणिकंठन किशोरावस्था को पहुंचा तब तक राजशेखर की पत्नी को भी एक पुत्र उत्पन्न हो गया था। औरस पुत्र की प्राप्ति के पश्चात रानी का मन मणिकंठन के प्रति विद्वेश - भाव से भर गया क्योंकि उसे शंका ही नहीं यह विश्वास था कि राज्य उसके पुत्र को न मिल कर मणिकंठन को ही मिलेगा। अब वह मणिकंठन को प्रताड़ित करने लगी। राजा इन सब बातों से भिज्ञ था किन्तु वह मणिकंठन से स्नेह करने के बाद भी अपनी रानी को नियंत्रित न कर सका। समय आने पर राजा ने मणिकंठन को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हुये उसे अपना सिंहासन सौंपने का निश्चय कर लिया, किन्तु रानी ने इसका विरोध किया। उधर “महिषी’ नामक राक्षसी को यह ज्ञात हो गया था कि उसका वध करने वाला शिव तथा मोहिनी रूप विष्णु का पुत्र यही मणिकंठन है अतः वह मणिकंठन को मारने हेतु अवसर खोजने लगी। उसने राजशेखर की रानी को यह गुप्त सन्देश भिजवाया कि यदि वह मणिकंठन को निर्जन वन में भेज दे तो उसे मार कर वह रानी का कष्ट दूर कर देगी। रानी इस के लिये तैयार हो गई। रानी ने इस कार्य हेतु एक नाट्य रचा। उसने स्वयं को रुग्ण सिद्ध कर के यह प्रचारित किया कि वह बाघिन का दूध पी कर ही स्वस्थ हो पायेगी। राजा तथा अन्य कर्मचारी इस असाध्य-साधन हेतु प्रस्तुत नहीं थे, किन्तु मणिकंठन को जब यह ज्ञात हुआ तो वह स्वयं इस कार्य को करने का निश्चय कर के वन में गया जहां उसे महिषासुर की भगिनी महिषी मिली। महिषी ने मणिकंठन की हत्या का प्रयास किया किन्तु वह स्वयं मणिकंठन द्वारा मारी गई तथा मणिकंठन वन से एक सद्यःप्रसूता बाघिन को पकड़ कर उसका दूध निकालने के स्थान पर उसे ही जीवित लिये उसी पर आसीन हो महल तक आ गया। किन्तु उसे जीवित तथा एक जीवित बाघिन पर आसीन देख कर भयार्त रानी अपना नाट्य भूल गई और मणिकंठन यह जान गया कि उसके साथ छल हुआ है। यद्यपि उसके तेज तथा कृत्य को देख कर राजा और प्रजा दोनों उसे चमत्कारी पुरुष मान कर उसकी अभ्यर्थना और स्तुति करते रहे किन्तु खिन्न मणिकंठन ने राज्य-त्याग का निर्णय लिया। राजा तथा प्रजा दोनों के अनुरोध पर उसने राजा से सबरीमाला (सबरी = पहाड़ियां, माला = शृंखला) पर एक मंदिर बनवाने को कहा तथा प्रचलित गाथाओं के अनुसार वह मंदिर बनाने को कह कर स्वर्ग लौट गया। पुत्र की इच्छा के अनुसार राजा राजशेखर ने सह्याद्रि की पर्वत मालाओं में उसके नाम पर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया तथा उस मंदिर में परशुराम ने मणिकंठन की मनोहर मूर्ति का निर्माण कर के मकर संक्रांति के अवसर पर उसे मंदिर में प्रतिष्ठित किया। परशुराम ने ही मणिकंठन को भगवान् अय्यप्पा स्वामी का नाम दिया क्योंकि वे जानते थे कि मणिकंठन भगवान् शिव का ही पुत्र है। तभी से उस मंदिर में भगवान् अय्यप्पा स्वामी की पूजा आस्था तथा भक्ति सहित हो रही है। रानी के प्रति अपनी वितृष्णा के कारण मणिकंठन ने अपने उस मंदिर में सर्जना-शक्ति से संपन्न नारी का प्रवेश निषिद्ध कर दिया क्योंकि उनका मानना था कि सर्जना-शक्ति संपन्न नारी इस विश्व में अपने पुत्र के अतिरिक्त किसी को स्नेह नहीं दे सकती। किन्तु यह शर्त उन्होंने सीधे तरीके से नहीं लगाई। उन्होंने इसके लिए शर्त यह रखी कि मंदिर में वही प्रवेश करेगा जो इकतालिस दिनों तक नियम और संयम के साथ शुद्धता से जीवन बिताये। इकतालिस दिन की इस अवधि में कोई भी वयस्क नारी रजस्वला हुये बिना नहीं रह सकती और रजस्वला होने की अवधि में धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नारी अशुद्ध हो जाती है इसी कारण उस मंदिर में उस प्रत्येक नारी का प्रवेश निषिद्ध है जो रजस्वला हो सकती है। एक मान्यता यह भी है कि स्वामी अय्यप्पा ब्रह्मचारी हैं अतः इस लिये भी मंदिर में प्रजनन-शक्ति संपन्न युवा स्त्री का प्रवेश वर्जित है। मंदिर में दर्शन करने के कुछ कठिन नियम हैं जैसे - १. भक्तों को यहाँ आने से पहले इकतालीस दिन तक समस्त लौकिक बंधनों से मुक्त होकर ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक है। २. इन दिनों में उन्हें नीले या काले कपड़े ही पहनने पड़ते हैं। ३. गले में तुलसी की माला रखनी होती है और पूरे दिन में केवल एक बार ही साधारण भोजन करना होता है। ४. सायंकाल उसे अय्यपा की पूजा करनी होती है और भूमि-शयन करना पड़ता है। ५. इस व्रत की पूर्णाहुति पर एक गुरुस्वामी के निर्देशन में पूजा करनी होती है जो अय्यप्पा के पूजन के विधि-विधान से भिज्ञ हो। ६. मंदिर की यात्रा में दर्शनार्थी को अपने शीश पर इरुमुडी रखनी होती है। इरुमुडी दो थैलियां और एक थैला होता है जिसमें एक में घी से भरा हुआ नारियल, एक मे पूजा सामग्री होती है तथा थैले में भोजन सामग्री। यह सब लेकर उन्हें शबरी पीठ की परिक्रमा भी करनी होती है, तब जाकर अठारह सीढियों से होकर मंदिर में प्रवेश मिलता है। दक्षिण भारत के राज्य केरल में सबरीमाला में स्थित सह्याद्रि की पर्वत-शृंखलाओं बीच यह अय्यप्पा स्वामी मंदिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था का प्रतीक है। कहा जाता है कि इस मंदिर के पास मकर संक्रांति की रात को पहाड़ी की कान्तामाला नामक चोटी पर गहन अन्धकार में रह रहकर एक असाधारण चमक वाली ज्योति दिखती है जिसके दर्शन के लिये विश्व भर से करोड़ों श्रद्धालु प्रत्येक वर्ष यहाँ आते हैं। बताया जाता है कि जब-जब यह ज्योति दिखती है तब-तब इसके साथ एक शोर भी सुनाई देता है। अय्यप्पा के भक्त मानते हैं कि यह देव ज्योति है और स्वयं भगवान इसे जलाते हैं। इस ज्योति का नाम मकर ज्योति है। यद्यपि यह आस्था का विषय है किन्तु परम्परा का भी इस मान्यता में कम योगदान नहीं है। मकर संक्रांति के दिन भोर में पूर्व में उदित होता अभिजित नक्षत्र तथा पश्चिम में डूबने को तत्पर मृगशिरा नक्षत्र का ब्याध नामक तारा एक साथ दिखता है जिसमें अभिजित भगवान् विष्णु का तथा व्याध भगवान् शिव का प्रतीक है। प्राची में उदित होने को उद्द्यत मकर राशि से पूर्व भोर के झुटपुटे में इन दोनों तारकों का एक साथ दर्शन भी मकर-ज्योति कहलाती है, अर्थात वह प्रकाश जिसके आलोक में मकर राशि का उदय होने को है। भरत एक धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र है। यहाँ प्रत्येक व्यक्ति को उसके अपने मान्यताओं, आस्थाओं, विश्वासों, परम्पराओं, विधाओं तथा रूढ़ियों के भी अनुरूप अपने धर्म को मानने तथा तदनुरूप आचरण करने की स्वतन्त्रता प्राप्त है। सनातन धर्म में आस्था रखने वाला प्रत्येक हिन्दू अपने विशिष्ट आराध्य के प्रति समर्पित होने के पश्चात भी सनातन धर्म की इस वैष्णव, शैव तथा शाक्त की त्रिपुटी के प्रति गहन आस्था रखता है। फिर सबरीमाला का मंदिर तथा इस मंदिर के अधीष्ठित देवता भगवान् अय्यप्पा स्वामी तो एक साथ वैष्णव, शैव तथा शाक्त तीनों के समन्वय का साक्षात विग्रह है। इस समन्वित शक्ति के प्रति हिन्दुओं की प्रीति तथा शरणागति तो सनातन के माथे का त्रिपुण्ड है। किसी पंथ या मत का अनुयायी हिन्दू हो, भगवान् अय्यप्पा स्वामी मणिकंठन सबकी आस्था का केंद्र हैं। जिस राष्ट्र में धर्म राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करता वहाँ राजनीति निरंतर धर्म में हस्तक्षेप कर रही है जिसकी सूची गिनाने की आवश्यकता नहीं है। राजनीति का धर्म में यह हस्तक्षेप हमारी मान्यताओं, आस्थाओं, विश्वासों, परम्पराओं, विधाओं तथा श्रद्धा में स्पष्ट हस्तक्षेप है तथा स्पष्टतः संविधान द्वारा प्राप्त मौलिक अधिकारों का भी हनन है जिसके दोषी भारतीय राजनीति के कर्णधार तो हैं ही, साथ ही न्यायपालिका भी इसकी अपराधी है। जिस प्रकार भारतीय संविधान की नियमावली में धर्म के नियम हस्तक्षेप नहीं कर सकते, उसी प्रकार धार्मिक रीतियों में भी संविधान का हस्तक्षेप तब तक उचित नहीं है जब तक उससे किसी व्यक्ति-विशेष या समूह को सीधी आर्थिक या शारीरिक क्षति नहीं पहुँचती हो। नारीवाद के समर्थकों को भी यह ध्यान रखना चाहिये कि इस प्रक्रम में नारियों का मंदिर में प्रवेश कहीं से भी नारी के समानता के अधिकार में नहीं आता क्योंकि इस प्रकरण में नारी को उसके सामजिक, आर्थिक, मानसिक या किसी भी अन्य स्तर पर पुरुष से हेय नहीं सिद्ध किया जा रहा है। सनातन हिन्दू नारी को सरस्वती, लक्ष्मी तथा दुर्गा स्वरूपा मानता है। कर्मकाण्डों में उसे दक्षिण पार्श्व का आसन देकर प्रतिष्ठित किया जाता है। नारी हमारे लिये गंगा-तट की बाण-भूमि में लम्बी ज्वार-बाजरा-इक्षु-गोधूम के खेतों की शोभा है, नदी के वक्ष पर डांड चलाती लहरों से बाहु-युद्ध करती, भिनसारे धान कूटती और सांझ को गीत-मुखरित कंठ के साथ चक्की चलाती, संध्या को तुलसी के चौरे पर दीपदान करती, कभी पीत तो कभी रक्तिम या कभी रंगीन चुनरी में लिपटी हमारे घरों में प्रत्येक नारी सशरीर गंगा है जो हमारे परिवार को सींचती है, उसे दूध-भात बांटती है। अंतरिक्ष से लेकर युद्धभूमि तक, शासन से लेकर प्रशासन तक, विज्ञान से लेकर तकनीक तक आज वह हमारी वास्तविक संगिनी है, परिवार तथा समाज की धुरी है, साक्षात सुरसरि है। सनातन के ऐसे भी लोकाचार हैं जिनको निभाने का अधिकार मात्र नारी के पास है और उसमें पुरुष सम्मिलित नहीं हो सकता। उसी प्रकार सबरीमाला की परम्परा भी ऐसी है जिसमें रजस्वला हो सकने वाली, ध्यान रहे कि नारी-मात्र नहीं, मात्र रजस्वला हो सकने वाली नारी के प्रवेश का निषेध है। इस परम्परा के पालन में न तो कोई हानि है न किसी के प्रति कोई दुराव या अन्याय! यह मात्र एक आस्थाजनित परम्परा है जिसका सम्मान सभी का धर्म है। विविध कारणों से सदियों से मंदिर अशुद्ध होते रहते हैं किन्तु हमारे शास्त्रों में उन्हें शुद्ध करने के पर्याप्त विधान हैं अतः मंदिर पुनः शुद्ध होते रहे हैं और शुद्ध हो जायेंगे। किन्तु यह घटना सनातन हिन्दू की आस्था पर पाद-प्रहार है और इसका प्रतिरोध, इसका प्रतिकार और आवश्यक हो तो इसका प्रतिशोध भी आवश्यक है। साथ ही आवश्यक है कि राजनीति तथा न्याय-व्यवस्था के कर्णधारों को यह ज्ञात करा दिया जाय कि हिमालय से कन्याकुमारी तक प्रत्येक सनातनी हिन्दू न मात्र इस निर्णय तथा इस घटना की भर्त्सना करता है, बल्कि यह चेतावनी देना चाहता है कि बस अब और नहीं! सनातन वह विराट पुरुष है जिसे अंतिम रूप से बाँधने के प्रयास का परिणाम महाभारत होता है। कहीं ऐसा न हो कि पीछे हटते – हटते सनातनी हिन्दू ऐसे सिरे पर पहुँच जाय जहाँ पहुँच कर उसके पास प्रत्याक्रमण के अतिरिक्त कोई मार्ग शेष न रहे, क्योंकि हमारे राष्ट्र के सर्वश्रेष्ठ उपदेष्टा ने हमें सिखाया है -- सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्नुहि।। शासन तथा न्यायपालिका की इस दुरभिसन्धि का हम सभी सनातनी हिन्दू एक स्वर से विरोध करते हैं तथा हम सभी हिन्दू स्वयं को भगवान् अय्यप्पा का भक्त घोषित करते हुये सबरीमाला के अनुयायियों के साथ हैं। ...


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