भारत/प्रयागराज   107
आज पिता श्री जनकवि कैलाश गौतम जी का 75 वाँ जन्म दिवस है।सादर नमन। अमवसा क मेला •••••••••••••••••••••• ई भक्ति के रंग में रंगल गाँव देखा, धरम में, करम में, सनल गाँव देखा. अगल में, बगल में सगल गाँव देखा, अमवसा नहाये चलल गाँव देखा. एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा, अ कान्ही पे बोरा, कपारे पर बोरा. कमरी में केहू,अ कथरी में केहू, रजाई में केहू, दुलाई में केहू. आजी रँगावत हईं गोड़ देखाऽ, हँसत हँउवे बब्बा, तनी जोड़ देखाऽ. घुंघटवे से पूछे पतोहिया कि, अईया, गठरिया में अब का रखाई बतईहा. एहर हउवे लुग्गा, ओहर हउवे पूड़ी, रामायण का लग्गे ह मँड़ुआ के डूंढ़ी. चाउर आ चिउरा किनारे के ओरी, नयका चपलवा अचारे के ओरी. अमवसा के मेला, अमवसा के मेला मचल हउवे हल्ला, चढ़ावाऽ उताराऽ, खचाखच भरल रेलगाड़ी निहाराऽ. एहर गुर्री-गुर्रा, ओहर लोली-लोला , अ बीचे में हउवा शराफत से बोलाऽ चपायल । केहु, दबायल ह केहू, अ घंटन से उपर टँगायल ह केहू. केहू हक्का-बक्का, केहू लाल-पियर, केहू फनफनात हउवे कीरा के नियर. बप्पा रे बप्पा, अ दईया रे दईया, तनी हम्मे आगे बढ़ै देताऽ भईया. मगर केहू दर से टसकले ना टसके, टसकले ना टसके, मसकले ना मसके, छिड़ल ह हिताई-मिताई के चरचा, पढ़ाई-लिखाई-कमाई के चरचा. दरोगा के बदली करावत हौ केहू, लग्गी से पानी पियावत हौ केहू. अमवसा के मेला, अमवसा के मेला. गुलब्बन के दुलहिन चलै धीरे धीरे भरल नाव जइसे नदी तीरे तीरे. सजल देहि जइसे हो गवने के डोली, हँसी हौ बताशा शहद हउवे बोली. देखैंली ठोकर बचावेली धक्का, मने मन छोहारा, मने मन मुनक्का. फुटेहरा नियरा मुस्किया मुस्किया के निहारे ली मेला चिहा के चिहा के. सबै देवी देवता मनावत चलेली, नरियर प नरियर चढ़ावत चलेली. किनारे से देखैं, इशारे से बोलैं कहीं गाँठ जोड़ें कहीं गाँठ खोलैं. बड़े मन से मन्दिर में दर्शन करेली आ दुधै से शिवजी के अरघा भरेली. चढ़ावें चढ़ावा अ गोठैं शिवाला छूवल चाहें पिण्डी लटक नाहीं जाला. अमवसा के मेला, अमवसा के मेला. एही में चम्पा-चमेली भेंटइली. बचपन के दुनो सहेली भेंटइली. ई आपन सुनावें, ऊ आपन सुनावें, दुनो आपन गहना-गदेला गिनावें. असो का बनवलू, असो का गढ़वलू तू जीजा क फोटो न अबतक पठवलू. ना ई उन्हें रोकैं ना ऊ इन्हैं टोकैं, दुनो अपने दुलहा के तारीफ झोंकैं. हमैं अपना सासु के पुतरी तूं जानाऽ हमैं ससुरजी के पगड़ी तूं जानाऽ. शहरियो में पक्की देहतियो में पक्की चलत हउवे टेम्पू, चलत हउवे चक्की. मने मन जरै आ गड़ै लगली दुन्नो भया तू तू मैं मैं, लड़ै लगली दुन्नो. साधु छुड़ावैं सिपाही छुड़ावैं हलवाई जइसे कड़ाही छुड़ावै. अमवसा के मेला, अमवसा के मेला. कलौता के माई के झोरा हेराइल बुद्धू के बड़का कटोरा हेराइल. टिकुलिया के माई टिकुलिया के जोहै बिजुरिया के माई बिजुरिया के जोहै. मचल हउवै हल्ला त सगरो ढुढ़ाई चमेला के बाबू चमेला क माई. गुलबिया सभत्तर निहारत चलेले मुरहुआ मुरहुआ पुकारत चलेले. छोटकी बिटउआ के मारत चलेले बिटिइउवे प गुस्सा उतारत चलेले. गोबरधन के सरहज किनारे भेंटइली. गोबरधन का संगे पँउड़ के नहइली. घरे चलताऽ पाहुन दही गुड़ खिआइब. भतीजा भयल हौ भतीजा देखाइब. उहैं फेंक गठरी, परइले गोबरधन, ना फिर फिर देखइले धरइले गोबरधन. अमवसा के मेला, अमवसा के मेला. केहू शाल, स्वेटर, दुशाला मोलावे केहू बस अटैची के ताला मोलावे केहू चायदानी पियाला मोलावे सोठौरा के केहू मसाला मोलावे. नुमाइश में जातै बदल गइली भउजी भईया से आगे निकल गइली भउजी आयल हिंडोला मचल गइली भउजी देखते डरामा उछल गइली भउजी. भईया बेचारु जोड़त हउवें खरचा, भुलइले ना भूले पकौड़ी के मरचा. बिहाने कचहरी कचहरी के चिंता बहिनिया के गौना मसहरी के चिंता. फटल हउवे कुरता टूटल हउवे जूता खलीत्ता में खाली किराया के बूता तबो पीछे पीछे चलल जात हउवें गदोरी में सुरती मलत जात हउवें. अमवसासा के मेला,अमवसा क मेला (कैलाश गौतम-भोजपुरी काव्य संग्रह 'तीन चौथाई आन्हर' से साभार) ...


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