नई दिल्ली/लखनऊ   33
कार्यक्रम के बहाने विवेकानंद -------------------------------- सभागार में मैं ही सबसे बुजुर्ग था । कार्यक्रम विवेकानंद जयंती के नाम पर था। सोच रहा था- स्‍वामी विवेकानंद के नाम पर कार्यक्रम तो बहुत होते हैं , जयंती पर खास कर , हर साल। लेकिन , क्‍या कभी हमने ईमानदारी से यह हृदयंगम करने का प्रयास किया है कि आखिर वे कहना और करना क्‍या चाहते थे ? करीब सवा सौ साल बाद भी वे क्‍यों यूथ आइकॉन और आकषर्ण -केन्‍द्र बने हुए हैं? 42-44 साल पहले इंटर और इलाहाबाद विवि में बीए करते समय स्‍वामी विवेकानंद मेरेे भी आदर्श थे। ढूंढ - ढूंढ कर उनका और उन पर कितना ही साहित्‍य चाटा था । स्‍वामी रामतीर्थ का भी। दोनों के प्रति बडा आस्‍थामयी आकर्षण - भाव था। संन्‍यासी होने के बारे में भी सोचता था । लेकिन विपरीत हवा के झोंके ऐसा उडाते गये कि फिर जमीन नहीं मिली। तो क्‍या वे संन्‍यासी थे , अंग्रेजीदां थे और अमेरिका -यूरोप में हिंदू धर्म के झंडे गाडे थे , इस लिए महनीय हैं ? संन्‍यासी तो उनके पितामह दुर्गा चरण दत्‍त भी थे , उन्‍होंनें भी लगभग विवेकानंद की आयु में संन्‍यास लिया था । अंग्रेजी के साथ ही फारसी भी पढे थे । अपने नवजात पुत्र (विवेकानंद के पिता विश्‍वनाथ दत्‍त) का मुख देख कर 25 वर्ष की आयु में संन्‍यासाश्रम में गये तो फिर नहीं लौटे। विरासत में मिली विपुल सम्‍पत्ति छोड कर , विवेकानंद (तब नरेन्‍द्रनाथ दत्‍त ) तो जब संन्‍यासी बने तो उनका घर कर्ज में डूबा और सामान्‍य निर्वहन की समस्‍याओं से घिरा था । संन्‍यासी तो स्‍वामी रामतीर्थ भी थे , अंग्रेजी जानने वाले और लाहौर के डिग्री कालेज में गणित के प्रोफेसर । नौकरी और युवा पत्‍नी , दो छोटे बेटे और एक बेटी को छोड कर 25 वर्ष की आयु में संन्‍यास - दीक्षा ले ली थी। जापान के विश्‍व धर्म सम्‍मेलन में गये थे , अमेरिका भी दो साल रहे थे ।लौटते समय विश्‍व प्रसिद्ध इस्‍लामी इदारे अलअजहर यूनिवर्सिटी ने उनका लेक्‍चर भी कराया था। यह सम्‍मान पाने वाले वे पहले भारतीय थे। विवेकानंद का वैशिष्‍ट्य था , लोक दु:ख से अनुप्राणित हाेना । वे मोक्ष कामना से नहीं , पीडित-शोषित अभाव ग्रस्‍त भारतीय जनता के कल्‍याणार्थ कर्मयोगी बने थे। 'दरिद्र नारायण' का वाक्‍यांश उन्‍हीं का दिया है। गोस्‍वामी तुलसीदास ने कहा है - निज परिताप द्रवहि नवनीता। परदुख द्रवहिं संत सुपुनीता ।। संत दूसरे के दु:ख के ताप से पिघलता है। गौरवशाली अतीत वाले देश की प्राय: हजार साल की गुलामी , शरिया के बाद अंग्रेजों का शासन । दस फीसदी लोग ही शिक्षित , शेष अनपढ । इतने ही पैसे वाले , बाकी पशु से भी बदतर हालत में । भरपेट भोजन नहीं , कपडे नहीं, आवागमन के साधन नहीं, चिकित्‍सा नहीं , सुरक्षा - सम्‍मान नहीं। घोर जातिवाद , छुआछूत में कसमसाता समाज । स्त्रियों की हालत तो और दयनीय ,बच्‍चे पैदा करने की मशीन , अधिकार विहीन। भारत की इस दरिद्रता ने विवेकानंद की आंखों से नींद छीन ली। उन्‍होंने कहा , यदि इसे दूर करने के लिए मैं मोक्ष- मुक्ति की अपेक्षा कई जन्‍म लेना पसंद करूंगा। इस दरिद्र नारायण की सेवा और भारत के पुराने गौरव की पुनर्स्‍थापना के लिए उन्‍होंने स्‍वयं को झोंक दिया । अहर्निश , अनथक परिश्रम, लेखन , लेक्‍चर , बुद्धिजीवियों ख्‍यातिलब्‍ध लोगों से मिलने और समर्पित सेवाभावी शिष्‍यों का संगठन खडा करने में दिन-रात मेहनत की । इसी परिश्रमाधिक्‍य ने उनके शरीर को बीमार बना दिया और 40वां जन्‍म दिन आने से पहले ही वे अगली महायात्रा को निकल गये। वे करीब 27 साल की उम्र में भारत भ्रमण पर निकले , बिना नाम- पहचान के ,बिना किसी संगी-साथी के, मांगते-खाते। कई दिन हो गये थे धूम्रपान किये हुए । अछूत मानी जाने वाले एक बस्‍ती से गुजरते हुए एक ब्‍यक्ति को तंबाखू पीते देखा तो तलब लग आयी। मन कडा कर आगे बढे ,फिर लौटे । तंबाखू पीने को मांगी , वह ब्‍यक्ति घबडा गया । कहा ,महाराज यह आप क्‍या कह रहे हैं ? मैं अछूत जाति का , लोग देखेंगे तो क्‍या कहेंगे ? लेकिन , वे क्रांतिधर्मी साधु थे , गरीबों, अछूतों में नारायण के दर्शन करते थे, स्‍वयं को उनके बीच पाते थे। उनकी बस्तियों में भी रुक जाते थे। जोर देने पर उस ब्‍यक्ति ने अपनी चिलम धो कर तंबाखू पीने को दी । उसे धन्‍यवाद कर आगे बढे, गुजरात , महाराष्‍ट् , राजस्‍थान आदि होते हुए 1892 ई. को सुदूर दक्षिण रामेश्‍वरम पहुंचे ।सुना तो शिकागो विश्‍व धर्म सम्‍मेलन में जाने का निश्‍चय किया । नारंगी रंग का अंगरखा , पीली पगडी का चुनाव किया और अपना नाम करण किया , विवेकानंद। पहली विदेश यात्रा , किन विषम पस्थितियों और कठिनाईयों में सम्‍मेलन सम्मिलित हुुुए और कैसे अमेरिका में वेदांत -दर्शन की यशोपताका फहराई , यह अलग लंबी कहानी है। तब वे तीस वर्ष के थे और सर्वधर्म संसद में भाग लेने वालों में सबसे युवा । अमेरिका , इंग्‍लैंड घूम कर चार साल बाद लौटे तो देश ब्‍यापी नाम-ख्‍याति , सम्‍मान और अमेरिका - इंग्‍लैंड के शिष्‍य- शिष्‍याओं के साथ। वहां वेदांत समितियां गठित कर । प्राय: इसी उम्र में , उनसे करीब पांच सौ साल पहले लोक दु:ख के निवराणार्थ परम संत नानक उदासियों में निकले थे। देश में तब इस्‍लामी शासन था , वे काबा, मदीना , बगदाद आदि प्रमुख इस्‍लामी नगरों में गये थे। दसवें नानक गुरू गोबिंद ने तत्‍कालीन परिस्थितियों की मांग के अनुरूप देश- धर्म बचाने को खालसा का सृृृृजन किया था , स्‍वामी विवेकानंद जाग्रत विवेक वाले सेवाभावी संन्‍यासियों की टीम खडा करने में लगे। बेलूर मठ और रामकृष्‍ण मिशन की स्‍थापना इसी के क्रम थी । महा भारत कहता है - न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा:। न सा वृद्धये यो न बदति धर्मम्। न सा धर्मो यत्र न सत्‍यमस्ति । न तत् सत्‍यं यच्‍छलेशनुविद्धम्।। जहां वृद्ध पुरुष न हों , वह सभा सभा नहीं है, वे वृद्ध वृृृद्ध नहीं हैं जो धर्म की बात न बतावें , वह धर्म नहीं है जिसमें सत्‍य न हो और वह सत्‍य नहीं है जो छल से युक्‍त हो। उनके गुरू स्‍वामी राम कृष्‍ण परमहंस का सम्‍यक स्‍मरण किये बिना विवेकानंद को याद किया और समझा नहीं जा सकता । स्‍वामी रामकृष्‍ण के बिना उद्धत, उर्वर और तर्क आग्रही युवा शायद नरेन्‍द्रनाथ दत्‍त ही रह जाते , विवेकानंद के रूप में उनका रूपांतरण न हो पाता । और , रानी रासमणि का भी कृतज्ञ स्‍मरण जरूरी है। हमारा समाज कितना स्‍वार्थी और एकाग्रही है। विवेकानंद याद किये जाते हैं , उनके गुरू नहीं, उनका साधाना पथ सरल बनाने वाली जमींदारिनी रासमणि नहीं । तन,मन ,धन समर्पित कर मुहम्‍मद की राहें आसान बनाने और उन्‍हें पैगम्‍बर के रूप में सर्व प्रथम मान्‍यता देने वाली बीबी खदीजा भी तो भुला दी गयीं , रसूल ही याद रहे। अपना पति , पुुुत्र, पौत्र और स्‍वयं भी सिख पंथ के लिए मूक आधार बन आत्‍मोत्‍सर्ग करने वाली माता गूजर कौर भी कहां याद आती हैं ? रानी रासमणि ने एक अंग्रेज से उसका बडा बागीचा खरीद कर और लाखों रुपये खर्च कर दक्षिणेश्‍वर का काली व शिव मंदिर बनवा कर रहने -खाने निर्विघ्‍न -निश्चिंत प्रबंध न किया होता तो संभव है पं. गदाधर चटर्जी गांव में ही घूमते रह जाते । उनके रामकृष्‍ण परमहंस बनने और अवतार कहे जाने तक की यात्रा में रासमणि का ही प्रमुख योगदान है, जो धन के समाज सेवा के कामों में लगाने की प्रतीक हैं , जिन्‍हें शूद्रा मान कर ब्राह्मण उनके मंदिर का पुजारी बनने से बच रहे थे। अल्‍प शिक्षित स्‍वामी रामकृष्‍ण वेद-शास्‍त्रों का आश्रय ले बढने के नहीं , अपनी आध्‍यात्मिक साधना से परमावस्‍था प्राप्‍त करने के प्रतीक हैं। वे सगुण , साकार का आराधन कर योगावस्‍था में पहुंचे और फिर निराकार की साधना- यात्रा कर के भी वही दर्शन - अनुभव किया । वे स्‍त्रैण थे, स्‍त्री भाव के आधिक्‍य वाले , विवेकानंद में पुरुष भाव की प्रधानता थी, उन्‍होंने निराकार से साकार की यात्रा की । रामकृष्‍ण परमहंस कहते थे - दोनों मार्गों का फलित एक ही है। इस्‍लामी और ईसाई साधना पद्धति‍यों के प्रयोग से भी उन्‍होंने यही अनुभव किया। उन्‍होंने अपनी योग-ऊर्जा से अपने सर्व प्रिय शिष्‍य को लोक सेवा के उस चुनौती पूर्ण मार्ग का पथिक होने को प्रेरित किया जिस पर वह स्‍वयं नहीं चल पाये थे। इसी में गुरू- शिष्‍य दोनों की पूर्णता है। यह मार्ग था और है , सेवा का , मानव मात्र से प्रेम का , करुणा का , सहयोग का , मानवीय गरिमा के उत्‍थान का , समता का और आध्‍यात्मिक विकास का । यह कैसा 'युवा संवाद' है जिसमें केवल वक्‍ता और मुख्‍य वक्‍‍‍‍ता को बोलना है , संवाद तो उभयपक्षी होता है। अच्‍छा वक्‍ता कुशलता से विवेकानंद का नाम और उनके नाम पर हुए आयोजन को किसी दल विशेष और नेता विशेष से राजनीतिक उद्देश्‍यों के लिए जोडता है तो वह न्‍याय संगत नहीं कहा जा सकता । राजनीतिक अभीष्‍ट सिद्धि के लिए तो राजनीतिक मुद्दे ही काफी हैं । ...


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