भारत/ऑक्सफोर्ड   96
साढ़े चार साल ऑक्सफ़ोर्ड में प्रवास के दौरान अंग्रेजों से साथ रहते हुए मैंने बहुत अनुभव किये। मैं वहां रहा तो जरूर किन्तु एक पल भी नही भूल पाया कि साढ़े तीन सौ सालों तक इन्ही अंग्रेजों के पूर्वजो ने भारत पर बेतहाशा जुल्म ढाए थे। मैं ऑक्सफ़ोर्ड का विद्यार्थी था इसलिए मैं भी विश्वविद्यालय के अनगिनत उत्सवों का हिस्सा बना किन्तु एक, सिर्फ एक उत्सव ऐसा था जिसमे सम्मिलित होने के लिए मैं उस वक़्त योग्य नही था। वह था यूनिवर्सिटी का degree function अर्थात कॉन्वोकेशन। शायद वर्ष में दो बार होता था यह उत्सव। मैं अक्सर University के प्रसिद्ध Sheldonian Theatre के बाहर से गुजरते वक़्त देखा करता था। लंबे चौंगे जैसी यूनिफार्म पहने हुये विद्यार्थी। हाथों में काली, चकोर कैप लिए। और एक हाथ मे रोल्ड की हुई ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी की डिग्री। एक जीवनभर की दौलत।। हँसते खिलखिलाते मुस्कुराते ज्यादातर अपने प्राउड पेरेंट्स के साथ फिर आया वर्ष दिसंबर 2007 ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में मेरी भी डॉक्टरेट पूरी हो चुकी थी। मेरे जीवन का एक बड़ा सपना पूरा हो गया था। और अब मैं भी ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के उस महान उत्सव का हिस्सा बनने वाला था जिसको मैंने अब तक सिर्फ बाहर से देखा था। यूनिवर्सिटी से पत्र भी आ चुका था। मुझे अगले वर्ष जुलाई 2008 में होने वाले कॉन्वोकेशन में सम्मिलित होकर डॉक्टरेट की उपाधि लेने के लिए आमंत्रित किया गया था। इसके कुछ माह पहले उस वक़्त भारत के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी को भी ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी ने एक आनरेरी डॉक्टरेट दी थी और उस फंक्शन में मुझे भी बुलाया गया था। डॉक्टर मनमोहन सिंह जी को ऑनरेरी डिग्री देते समय जो humiliation परंपरा के नाम पर अंग्रेजो ने किया, उसका मैं प्रत्यक्ष गवाह था। वह अंग्रेजो के जमाने के किसी दरबार से कम नही था। जहां हाल के बीचों बीच ऊंचे स्थान पर सिंहासन नुमा कुर्सी पर लार्ड पैटन बैठे हुए थे। उनके आजु बाजू पद के हिसाब से ऊँचाई वाली कुर्सियों पर अन्य पदाधिकारी अंग्रेज बैठे थे। दरबारियों की तरह हमें साइड की कुर्सियों पर बैठाया गया था। ये कुर्सियां हाइट में सबसे नीचे थी किन्तु जमीन से थोड़ा ऊपर। हाल के बीचों बीच जमीन पर लाल कालीन बिछा था जो हाल के दरवाजे तक जाता था। इसी दरवाजे से भारत के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी का प्रवेश होने वाला था। उनको आनरेरी डॉक्टरेट जो दी जा रही थी। कुछ पलों के मौन के बाद टनाटन की घंटियां बजी और दरवाजे पर मनमोहन सिंह जी दो लाल वर्दी वाले सिपाहियों के साथ प्रकट हुए जैसा इस वक़्त आप सोच रहे हैं मैंने भी ठीक वैसा ही सोचा था। कि शायद अब मनमोहन सिंह जी को सैनिक सम्मान के साथ हाल में लाया जाएगा, सम्मानित किया जाएगा। किन्तु यह क्या, मनमोहन सिंह जी तो दरवाजे पर ही रुक गए। और उनके आजू बाजू में खड़े दोनो लाल वर्दी धारी सैनिक, बिल्कुल वैसे ही जैसे आज मणिकर्णिका में देखे आगे बढ़े। हाल के बीचबीच आकर वो सैनिक रुक गए। और लार्ड पैटन को लगभग झुक कर salute इत्यादि करने के बाद लैटिन में कुछ बोले। उनके बोलने के बाद लार्ड पैटन ने अपना हाथ ऊपर उठाया जैसे कह रहे हों इजाजत है। फिर वो दोनों सैनिक सैल्यूट ठोक कर पीछे मुड़े, दरवाजे तक गए। तब तक मनमोहन सिंह जी दरवाजे पर अकेले ही खड़े रहे। मुझे समझ नही आ रहा था कि वो आनरेरी डिग्री लेने आये थे कि उनके दरवाजे पर भीख लेने!! दोनो सैनिक दरवाजे पर पहुच चुके थे। अब उन्होंने मनमोहन सिंह जी को भी कुछ जोर से चिल्लाकर कहा और फिर आजू बाजू से घेरकर चलते हुए उनको अंदर लाये। ठीक वैसे ही जैसे किसी राजा के दरबार में अपराधी को लाया जाता होगा हाल में एक बार फिर बीचो बीच पहुंच कर मनमोहन सिंह जी को रोका गया। फिर लैटिन में कुछ डायलॉग बाजी हुई। लार्ड पैटन ने एक बार फिर हाथ उठाया, मनमोहन सिंह जी ने सिर झुकाया और मनमोहन सिंह जी को वहीं बीचोबीच खड़े खड़े आनरेरी डॉक्टरेट मिल गयी!! इस सारे नाटक में भारत के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी ने क्या फील किया होगा, मुझे नही पता किन्तु मैं लज्जा से गड़ा जा रहा था!! मेरे प्यारे देश भारत के 120 करोड़ लोगों के प्रतिनिधि, मेरे प्रतिनिधि, भारत के प्रधानमंत्री को वहां उस हॉल में सम्मानित किया जा रहा था या अंग्रेजी परंपरा के नाम पर जलील किया जा रहा था, मुझे समझ नही आया। खैर, डिग्री समारोह हो गया। श्री मनमोहन सिंह जी को मानद उपाधि मिल गयी। किन्तु इस घटना ने मेरे मन मष्तिष्क पर एक घाव सा छोड़ दिया। और एक सवाल भी। क्या मुझे भी इतना ही जलील होना पड़ेगा ऑक्सफ़ोर्ड से डिग्री लेते समय!!! सिर झुकाना पड़ेगा?? मैंने तो अपनी डॉक्टरेट भीख में नही कमाई थी। दिन रात मेहनत की थी, हड्डियां गलाई थी इसके लिए। हफ्ते दर हफ्ते अंग्रेजों द्वारा ही निर्धारित किये गए मानकों को, उनकी परीक्षाओं को किसी की दया नही, अपनी योग्यता के बल पर उत्तीर्ण किया था। और इस प्रकार वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद, ऑक्सफ़ोर्ड की डिग्री पाने का अधिकारी बना था। तो क्या अंग्रेजी परंपरा के नाम पर इसी प्रकार जलील होना पड़ेगा मुझे भी डिग्री लेते समय?? इसी सवाल को लेकर मैं कुछ अनुभवी सहपाठियों के पास गया और उनसे पूछा कि क्या हमारे साथ भी ऐसा ही कुछ होगा। और सच्चाई जानकर मेरे दुख का ठिकाना न रहा। सच्चाई यही थी कि लैटिन में बोलकर उनके कुछ वफादार होने की हामी भरवाई जाएगी, सिर झुकवाया जाएगा और तब हमें ऑक्सफ़ोर्ड से डॉक्टरेट माना जायेगा।। इस प्रकार सिर झुकाना मंजूर नही था मुझे!! मैं यूनिवर्सिटी आफिस गया और वहां जाकर पूछा कि डिग्री लेने का कोई और ऑप्शन नही है क्या? मुझे अधिकारियों ने बताया कि अगर आप समारोह में नही आना चाहते तो आपको आपकी एब्सेंस में इन अब्सेंशिया डिग्री मिल जाएगी। पर ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के कॉन्वोकेशन में जाना तो किसी भी धरती पर पैदा हुए इंसान का सपना होता है, तुम समारोह में क्यो नही जाओगे। मैं उनको कैसे कहता कि हर आम इंसान की तरह यह सपना तो मेरा भी है। किंतु सिर को झुकाना और भीख की तरह अंग्रेजों से उपाधि लेना मंजूर नही मुझे!! मैने अधिकारियों को कुछ नही बताया। किंतु मन ही मन डिसाइड कर लिया, कि कट जाएगा ये सिर, किन्तु अंग्रेजों के सामने झुकेगा नही। और मैं यूनिवर्सिटी के कॉन्वोकेशन समारोह में नही गया।। 7 जुलाई 2008 को मुझे मेरी अनुपस्थिति में ऑक्सफ़ोर्ड ने डॉक्टरेट की उपाधि दी। और बाद में मेरी डिग्री by पोस्ट मेरे घर आ गयी। आज मणिकर्णिका देखी। सिर कट गया रानी का किन्तु अंग्रेजों के सामने झुका नही।। देख कर आंखों में आंसूं आ गए। कुछ बीता हुआ याद जो आ गया था!! 😪😪 मैं रहूं या ना रहूं, भारत ये रहना चाहिए 🚩🚩 जय हिंद 🚩🚩 डॉ सुनील वर्मा ...


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