नई दिल्ली/जयपुर   139
# पत्रकारिता का एक अनुभव यह भी एक मित्र लेखिका ने अपना एक आलेख अपनी वाल पर शेयर किया। वहां एक विद्वान वामी साथी की प्रतिक्रिया थी - "बढ़िया आलेख है, पर क्या जम्मू-काश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों विशेषकर मणिपुर और असम की जनता से कोई बातचीत की थी आपने? इन्टरनेट पर सर्च किया था कि कहां-कहां सेना ने दया दिखाई महिलाओं पर? इस तरह के आलेख भावुक होकर नहीं शोध करके लिखे जाएं, तो ज्यादा प्रमाणिक होंगे।" (विद्वान वामी ने कश्मीर को 'काश्मीर' और प्रामाणिक को 'प्रमाणिक' ही लिखा था, अतः इसे कृपया मेरा अज्ञान नहीं मान लें। मैंने बस, जस का तस रहने दिया है।) बात पते की है, लेकिन आलेख एक बचकाने भाषण के प्रतिवाद में लिखा गया था, अतः जो सबके सामने है, वही वर्णन उसमें था। प्रतिक्रिया की भी प्रतिक्रिया में पूछा जा सकता है कि भाषणबाज़ ने क्या सीमाओं को कभी देखा है, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों विशेषकर मणिपुर और असम में तैनात सैनिकों से बात की है। वे वहां किन परिस्थितियों में रहते हैं, कभी यह जानने की कोशिश की है? लेकिन जाने दीजिए, इसलिए कि भाषण का मंतव्य जो था, उसके लिए इस गहन शोध की नहीं, एक विशेष नज़रिए की आवश्यकता है। ठीक उसी तरह एक अख़बारी आलेख और एकेडमिक शोध में भी अंतर है। मेरे ख़याल से विद्वान साथी से समझने में यही चूक हुई और यह चूक कोई नादानी में नहीं हुई थी, एक सोची-समझी शातिराना चाल के साथ जान-बूझ कर की गई थी, इस पर मैं सुनिश्चित हूं। ख़ैर, लेकिन इससे मुझे एक बहुत पुरानी घटना स्मरण हो आई। 'जनसत्ता' शुरू होने वाला था। विज्ञापन देख कर मैंने भी उप संपादक पद के लिए आवेदन भेज दिया। आवेदन के साथ एक से डेढ़ हज़ार शब्दों का एक आलेख किसी भी करेंट टॉपिक पर मांगा गया था। तब 'असम समस्या' चरम पर थी, अतः इसी विषय पर तक़रीबन चौदह सौ शब्दों का एक आलेख लिख कर मैंने अपने परिचय के साथ संलग्न कर दिया था। कुछ समय बाद साक्षात्कार के लिए बुलावा आ गया। मैं दिल्ली पहुंचा। गेट पर ही एक सरदार जी के दर्शन हुए। मैंने उनसे पूछ लिया कि इंटरव्यू किस तरफ़ चल रहे हैं। बस, ग़ज़ब हो गया। अब मेरे सामने अज़ब तमाशा था। उनका श्रीमुख ऐसे खुला, जैसे किसी बोलने वाली मशीन का बटन दब गया हो और गलती से उसकी स्पीड कई गुना कर दी गई हो। उनके दोनों हाथ बोलने की गति के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे, सारा शरीर थिरक रहा था या कहें कि वे उछल-कूद रहे थे और मैं हक्का-बक्का उन्हें देख रहा था। संभवतः वे मुझे अपना अंग्रेज़ी ज्ञान जता रहे थे, लेकिन मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था। इस तरह तो अगर कोई हिन्दी बोले, तो वह भी समझी न जाए। मैंने कुछ देर सहन किया, फिर जोर से कहा - 'हप्प', और बिना यह देखे कि उनकी गति क्या हुई, आगे बढ़ गया। निश्चय ही वे भी मेरी तरह ही हक्का-बक्का हुए कुछ देर तो खड़े रहे ही होंगे, क्योंकि सभी हमारी ओर ही देख रहे थे। उनमें से कुछ बेसाख़्ता हंस दिए और कुछ मुस्करा उठे। कुछ ही देर में मैं ठिकाने पर पहुंच गया और बुलावा आने पर साक्षात्कार कक्ष में प्रवेश किया। यह दूसरा मौक़ा था, जब एक बार फिर हक्का-बक्का होना पड़ा। लगा जैसे गलती से मैं बॉलीवुड के किसी विलेन के अड्डे पर आ गया हूं। कमरे में घुप्प अन्धेरा था। दिखाई दिया कि लगभग दस फीट दूर एक धीमी रोशनी का बल्ब काफी नीचे लटका हुआ था। उसके ठीक नीचे एक कुर्सी रखी थी। बाक़ी क्या है, कुछ है भी या नहीं, यह अंधेरे में खोया हुआ था। किसी कुएं से आती लगी एक आवाज़ ने कुर्सी पर बैठने का हुक्म दिया और इंटरव्यू शुरू हुआ। आवाज़ों के अंतर से स्पष्ट हो गया कि वहां कई लोग मौजूद थे। बाक़ी सब तो जाने दें, क्योंकि मुझे अनुमान हो गया था कि अपना सलेक्शन होगा नहीं, अतः मैं खीझ में था और उस घुटन से शीघ्र बाहर आना चाहता था। उनमें से एक सज्जन ने मुझे यह मौक़ा दे दिया। पूछा - "आपने आलेख अच्छा लिखा है? क्या कभी असम गए थे। कैसे लिखा?" मैंने कहा - "यह तो रेफ़रेंसेज से लिखा गया है।" अब वे व्यंग्यात्मक स्वर में बोले - "ओह, तो आप रेफ़रेंसेज से लिखते हैं।" मैंने अंधेरे में आंखें गढ़ा दीं और ठीक उसी सुर में बोला - "आप जो दुनियाभर, उसके लोगों और उनकी समस्याओं पर लिखते हैं, क्या सभी जगह गए हैं? सब से मिले हैं?" "सवाल नहीं, सवाल हम पूछेंगे," उधर से आवाज़ आई। मैं उठ खड़ा हुआ। दोनों हाथ जोड़े। कहा - "नमस्कार," ... और चला आया। मेरे बाहर निकलने तक अंधेरे से खुसर-पुसर की ध्वनि शुरू हो चुकी थी। आज मैं सोचता हूं कि अच्छा हुआ कि मेरी नियुक्ति वहां नहीं हुई, वरना संभव है कि मैं भी इन दिनों सोशल मीडिया में सक्रिय वहां के कुख्यात 'ब्लॉकबाज़ दलाल' के प्रतिरूप में तब्दील हो चुका होता। 🤔 --------------------------------- यह स्मृति लगभग तीन वर्ष पूर्व लिखी गई थी। तब इसमें महिला मित्र और विद्वान साथी के शुभनाम भी थे, लेकिन अब दोनों ही मुझे अनफ्रेंड कर गए हैं, अतः इस टिप्पणी को उसी रूप में पुनर्प्रस्तुत करना मुझे उचित नहीं लगा। इसलिए मैंने इसे कुछ संशोधित कर दिया और शेयर करने के बजाय यह एक नए रूप में आपके सामने है। रसास्वादन कीजिए। ...


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