नई दिल्ली/जेएनयू   129
#मन_की_बात #ममता_अधिग्रहित_बंगाल से जब JNU में अध्ययन हेतु JNU पहुंचे तो हमको वामपंथ पता ही नही था क्योंकि हम तो वैसे भी विज्ञान के विद्यार्थी थे लेकिन JNU में MA (अंतराष्ट्रीय संबंध) में एडमिशन मिल गया। मेरा दिल्ली जाना ही पहली बार हुआ और जब बाँदा स्टेशन से दिल्ली के लिए टिकट रिज़र्व करवाने गए तो उन्होंने हज़रत निज़ामुद्दीन का टिकट दे दिया (BNDA -NZM) टिकट मिलते ही उस टिकट काउंटर वाले को डांट लगाई की दिल्ली जाना है निज़ामुद्दीन नही।वे बोले टिकट यही तक का है। निज़ामुद्दीन से आप दिल्ली के लिए ट्रेन ले लीजियेगा। अब निज़ामुद्दीन से एक ऑटो में JNU पहुँचे तो पता चला कि आज शानिवार है और शनिवार की केंद्रीय विश्वविद्यालय बंद रहता है। पहली बार मालूम चला कि केंद्रीय संस्थान (बैंक को छोड़कर) साप्ताहिक दो दिन अवकाश रहता है। तो अब ठहरे कहाँ तो वापस निज़ामुद्दीन आये स्टेशन प्लेटफॉर्म में ही रुके रात वहीं काटी। अब सोमवार को जब JNU गए एडमिशन के लिए तो उधर देखा झुंड के झुंड में लड़के, लड़कियां बैच लगाए हुए हैं बैच में लिखा है SFI या AISA, AISF मैंने सोचा कि ये लोग JNU के स्टॉफ हैं। उसमे से एक मेरे पास आया और बोला "YOU ARE NEW COMMER" मुझे तो इंग्लिश आती नही थी तो मैने सर हिला दिया। मैंने अपने जीवन मे प्रथम बार देखा कि लड़कियाँ सिगरेट पी रही हैं, लड़के भी उसी झूंठी सिगरेट को पी रहे हैं। खैर मुझे दाल में कुछ काला तब लगा जब दबे कुचले किनारे एक काउंटर लगा था "ABVP वेलकम ऑल न्यू स्टूडेंट" वंदे मातरम। तो मैंने निश्चय किया कि किसी से कोई सहायता नही ली जाएगी। स्वयं एडमिशन प्रक्रिया पूरी की ( उस समय 12 फोलियो भरिए और अन्य फॉर्म भरिए हाँथ में दर्द हो जाये और 13 फ़ोटो चिपकाइये)। चलो एडमिशन लिया और अपने होमटाउन से एक मित्र का फोन न लिया वो उस समय लोदी कॉलोनी में UPSC की तैयारी हेतु रहते थे और 6 माह पहले ही दिल्ली आए थे। चले गए लोदी कॉलोनी उसके पास 3 दिन रुके लेकिन उसके मकान मालिक को समस्या उत्पन्न हुई और हम चले आये बाँदा अपने गृहनगर। मेरे सहपाठी की बड़ी बहन दिल्ली के संगम।बिहार में रहती थी तो उसको लेकर पुनः दिल्ली आए और एक सप्ताह संगम बिहार में रहे। JNU जाने के लिए संगम बिहार के जिहादी विश्वविद्यालय जामिया हमदर्द से (380 न कि बस से मुनिरका और मुनिरका से 615 बस न से JNU, चूंकि क्लासेज 9 बजे शुरू होती थी तो प्रातः 7 बजे संगम बिहार से चलते थे) प्रतिदिन जाते थे। School of International Studies में एक सप्ताह बाद वही आदमी/JNU का विद्यार्थी जो मुझे एडमिशन के समय बोला था "may i help you" SFI का एक्टिविस्ट व कार्डहोल्डर परिमल माया सुधाकर पुनः मिला गया और बोला "you are new student" मैंने बोला हां , कहाँ रहते हों -संग बिहार में, तब तो आपको आने जाने में समस्या होती होगी, मैंने कहाँ हां। उसमे बोला क्या आप मेरे हॉस्टल रूम में एडजेस्ट हो सकते मैंने कहा क्यों नही। उसने अपना रूम न बताया झेलम हॉस्टल रूम न 143, दरवाजे के ऊपर वेंटीलेटर है उसमे रूम key रखी हुई है। संगमबिहार गए उधर से बैग लेकर आ गए झेलम हॉस्टल और निश्चिंत हो गए कि अब ज्यादा दूर से आना नही पड़ेगा। शाम में देखा कि उस रूम में 6 अन्य नए स्टूडेंट हैं।मैंने कहाँ की इतने सारे लोग कैसे एक रूम उसने बोला कि ऐसे ही आपको एडजेस्ट करना है। परिमल माया सुधाकर जो स्वयं अपनें मित्र के साथ रहता था अपनें रूम में कभी कभार आता था। कुछ समय बाद वह SFI की मीटिंग में यूनियन "JNUSU" ऑफिस ले गया तो उधर वही लड़की जिसको प्रथम दिन एडमिशन गेट में देखा था (अनु------मौर्या, आज JNU में फैकल्टी एक कॉमरेड की पत्नी है -कसम से) सिगरेट पीते हुए समूह में वही लड़की पुनः उसी रूप में मीटिंग में , खैर धुवाँ भरे वातावरण में परिचय हुआ। खैर उस धुवाँ से मेरा सर दुख गाय और उधर उल्टि कर दिए। शाम 7 PM में वापस आवास आये और जब मेस में खाने गए तो मेस मैनेजर ने बोला कि रेजिस्टर में एंटी करिये। जब नाम।तभी नही तो मैनेजर बोला कि आप गेस्ट हैं।इएलिये आपको कूपन लेकर खाना होगा। उस दिन से रामसिंह का ढाबा जिंदाबाद। अब CPI-M का छात्र संगठन SFI-स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया के परिमल माया सुधाकर ने हम सभी नए विद्यार्थियों को "दास कैपिटल" व "कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो" पकड़ा दिया और बोले कल इस पर डिबेट करेगें। हम बोले ये डिबेट क्या होता है । हम तो साइंस पढ़े हैं, एल्गी/फनजाई (जूलॉजी, बॉटनी)। क्या था यहां बीमारी थी मेस में पब्लिक टॉक होती थी और हम पहली बार फारुख शेख को सतलज हॉस्टल मेस में गये सुनने गये। इसी बीच हमारे क्लेससमेट आनंद कुमार काशिव संघ की शाखा जाने लगे विवेकानंद शाखा जो कि JNU के सरस्वती पुरम पार्क में लगती थी। एक दिन हॉस्टल चेकिंग हुई तो सभी लोग जग गये थे और हमारा उसी दौरान आनंद के साथ शाखा जाना हुआ जब लौटे तो परिमल माया सुधाकर ने देख लिया। एक तो हम लोग "दास कैपिटल" व "कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो" पर पर डिबेट नही करते हैं लेकिन शाखा में जाते है। तो उन्होंने V I Lenin की "Imperialism the Highest Stage of Capitalism" पुस्तक दे दी कि अब इसको पढ़कर आना है। हम लोग पढ़ते ही नही थे क्योंकि मार्क्स, लेलिन हमारे पाठयक्रम में था ही।इसी दौरान एक बड़ी घटना घटी की JNU में संस्कृत SCHOOL होना चाहिए के लिए abvp संघर्ष कर रही थी। उधर सभी वामी संगठन encluding NSUI उसका पूरा विरोध, उसी में से एक थे बीजू कृष्णन जो कि SFI के बड़े नेता है (पिछले साल जो महाराष्ट्र में मोदी सरकार के खिलाफ एक बड़ा किसान आंदोलन हुआ था उसको पीछे वही बीजू कृष्णन थे/हैं) , उनका नियमित परिमल के रूम में आना जाना था। मुझसे परिचय हुआ तो बोले "वाजपेयी" हो फिर बोले की संस्कृत स्कूल jnu में नही खुलना चाहिए, अगर ये खुला तो यहां पर पोंगा पंडित आयेगें, हवन करेगें ,कथा करेगें तंत्र मंत्र करेगें। उसके लिए प्रोटेस्ट करना है कल दोपहर 2:30 pm एडमिनिस्ट्रेशन बिल्डिंग के सामने। उसी दिन सुबह परिमल ने पुनः देखा कि ये संघ की शाखा में नियमित जाते है तो उन्होंने बोल दिया कि आप लोग अपने रहने का कहीं और व्यवस्था कर लें। उसी दिन दोपहर में जब वे लोग हम।लोगो को प्रोटेस्ट डेमोस्ट्रेशन में ले गए, नारे लग रहे थे SFI MARCH ON मार्च ऑन,मार्च ऑन लेकिन उनका उच्चारण सुनाई दे रहा था SFI माँच ऑन माँच ऑन, हम नए हिंदी भाषी लोगो ने नारे लगाएं SFI माँ चो----माँ चो---, हमने सोचा ये कौन से नारे हैं जिसमे गालियाँ है और इनके नारे लग रहे है। हालांकि उन्होने कई बार टोंका की गाली मत दो, लेकिन हमसे जल्दी में गाली ही निकले। क्या है उस प्रोटेस्ट में sfi की महिला कार्यकर्ताएं भी थी तो उनको बुरा लग गया। रात्रि में हमसे कहा गया कि आप लोग कहीं और व्यवस्था कर लें, ये दूसरी बार बोला गया और हमको लगभग 6 माह हो गए थे परिमल के रूम में रहते। इसी बीच मेरे उस समय के क्लासमेट व मित्र प्रवीण (आजकल PMO में हैं) को माही हॉस्टल मिल गया तो उसने मुझे अपने हॉस्टल रूम शिफ्ट करवा लिया तो अब हम आ गए माही हॉस्टल प्रवीण व आशुतोष (रेलवे में बड़े पद में तैनात हैं) के साथ। उसी दौरान क्या हुआ कि SFI/AISA वालो ने स्वामी विवेकानंद की छबि SIS कॉमन रूम में लगी थी तो उसको SFI की लीडर अलबीना शकील ने फेक दिया की इनकी छबि यहां नही लग सकती और इस बात को लेकर ABVP वालों से झगड़ा हो गया और देखा कि दोपहर में ही SFI का पोस्टर आ गया। वॉटर कूलर में वह पोस्टर लगा हुआ था। मेरे एक मित्र ने मेस टेबल में बोला की बाजपेयी तुम तो बड़े नेता हो गए हो तुम्हारा नाम है उस पोस्टर में कि तुम लोगो ने SFI के लोगो को मारा है। तुम लोगो के लिए लिखा है ABVP's NEW GOONS। हम भी जाकर पढ़े।।उस दिन मुझे मालूम चला कि हम goons हैं। प्रोटेस्ट डेमो, वीमेन rights, आज़ादी, दलितो का शोषण उनकी इसमें स्थिति उसमे स्थिति, Smash Patriarchy, बेखौप आज़ादी, अल्पसंख्यककों की इसमें स्थिति उसमे स्थिति आदि आदि इतने नए शब्द जिनको मैंने पहली बार सुना-जाना हैं सभी लिख नही सकते। अब हमको लगा कि हम #कम्युनिस्ट_अधिग्रहित_टेरिटरी में आ गए है। लंबे समय तक #COT (#Communist_Occupied_Teritory) में रहने बाद सोचा की अब अच्छे दिन आएगें लेकिन क्या #ममता_अधिग्रहित_बंगाल (#मोब) में। क्रमशः जारी-------- ...


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