यूरोप/भारत   131
संपादन के क्रम में ईसा के जन्म से 900 साल पहले वेटिकन से मिली लिंग की प्रतिमा (पिछली पोस्टें देखें) इस विषय में किसी तरह का संदेह नहीं रहने देती कि मातृदेवी और लिंग – सृष्टि के मूल- की उपासना का, पश्चिमी जगत में, प्रसार भारत से हुआ था। इसका इतिहास की व्याख्या में महत्व यह है कि हड़प्पा के जिस व्यापारिक तंत्र के माध्यम से संस्कृत भाषा, देव समाज, और ज्ञानविज्ञान का भारोपीय क्षेत्र में प्रसार हुआ था उसमें दो स्तरो के लोग सम्मिलित थे। एक व्यापारी वर्ग और दूसरा उसकी सेवा में लगे हुए लोग जो परिवहन पशुपालन, नौचालन और मालवहन का काम करते थे, घरेलू स्तर पर औद्योगिक उत्पादन में भी इन्हीं का हाथ था। ये आपस में अपनी बोलियां बोलते थे, अपनी रीति रिवाज और विश्वास का निर्वाह करते थे और व्यापक संपर्क के लिए उस भाषा का प्रयोग करते थे जिसका साहित्यिक रूप ऋग्वेद में मिलता है। इसका ही परिणाम है कि जिस कुर्गान क्षेत्र में आर्य भाषियों की सुरक्षित बस्तियों की पहचान की गई थी उसी में द्रविड़ और मुंडारी बोलियों के प्रचलन का प्रमाण मिला। जिस लघु एशिया में आर्यभाषा बोलने वाले अभिजात वर्ग की पहचान की गई उसी के अश्वचालन पर पुस्तक लिखने वाला किक्कुली था जो मुंडारी है। पहली नजर में हमारा ध्यान केवल संस्कृत भाषा और ऋग्वेद के देवताओं की ओर गया, जबकि जमीनी स्तर पर उर्वरता की पूजा करने वाले भी अपनी भाषा, अपने देवी देवताओं और विश्वासों के साथ उपस्थित थे। यही कारण है की यूरोप की भाषाओं में द्रविड़ और मुंडारी के शब्दों की ओर दृष्टि जाने पर विद्वानों की समझ में नहीं आया कि वे उन भाषाओं में कैसे पहुंचे। इस समस्या के समाधान का कभी प्रयत्न नहीं किया गया। मातृदेवियां और शिव आज भी पिछड़ी जनजातियों के विश्वास का हिस्सा हों, या हड़प्पा के नागर संदर्भ में उन के प्रमाण मिलें. अथवा भारत से लेकर इटली तक मातृ देवो की उपासना देखने में आए, इसे समझने में विद्वानों ने चूक की है, अतः सभ्यताविमर्श को सही संदर्भ में रख नहीं पाए हैं। यूरोपीय विद्वानों की अपनी विवशता थी, भारतीय विद्वान यूरोपीय पांडित्य से निर्देशित थे। *क्रांति करने वाले तात्कालिक सफलता में विश्वास करते हैं। उसके लिए गर्हित तरीके अपनाने के लिए तैयार रहते हैं। गर्हित तरीके यदि इच्छित परिणाम लाएं तो उन पर गर्व भी करते हैं। बंदूक की नली से निकलने वाली क्रांति की तरह। बंदूक की नली से निकलने वाली क्रांति इंसान की जबान से टपकती राल तक का सामना नहीं कर पाती, इसे आधुनिक जगत के इतिहास से परिचित लोग जानते हैं, भले वे इन दोनों के बीच के रिश्ते को न पहचानते हों। *अंतःप्रकृति या चेतना का, महाप्रकृति - भौतिक जगत या पंचमहाभूतों के प्रपंच से, अविभाज्य संबंध है। एक में आया अंतर दूसरे को भी प्रभावित करता है। यह भारतीय चिंताधारा की लोकविदित मान्यता है, इसे ‘जैसा अन्न वैसा मन’ मुहावरे में भी देखा जा सकता है, और माया-ब्रह्म के द्वेताद्वैत में भी। पश्चिम को इसका पता उसके ‘विज्ञान-युग’ में भी बहुत बाद में मिल पाया इसलिए उसकी चिंताधारा में इसे जगह न मिल पाई। मुहम्मद साहब और उनसे पहले के लोगों से क्या शिकायत जब कि अपनी स्थापनाओं को वैज्ञानिक बनाने के लिए सतर्क मार्क्स के लेखन में यह कमी रह ही गई जिसे सुधारने की कोशिश करने की जगह विज्ञान को ही फरेब सिद्ध करना आरंभ कर दिया गया। इसका परिणाम? अंतःप्रकृति महाप्रकृति पर भारी पड़ी। लोग कहते हैं काउ ब्वाएज जीन्स की चाहत ने क्रांति को क्रांति के लिफाफे में बदल दिया।। ...


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