नई दिल्ली/काश्मीर   70
एक नदी का निर्वासन - मैं तुम्हें भेजता हूँ अपनी नदी की स्मृति सहेजना इसे वितस्ता है कभी यह बहती थी मेरी प्यारी मातृभूमि में अनादि काल से मैं तैरता था एक जीवंत सभ्यता की तरह इसकी गाथा में अब बहती है निर्वासन में मेरे साथ साथ कभी शरणार्थी कैंपों में कभी रेल यात्रा में कभी पैदल कहीं भी रात को सोती है मेरी उजडी नींदों में नदी बहती है मेरे सपनों में शिराओं में मेरी इसकी पीड़ाएं हैं काव्य सम्वेदनाएँ मेरी और मेरे जैसों की मैं तुम्हें भेजता हूँ स्मृतियाँ एक जलावतन नदी की 0 -अग्निशेखर ________________ चित्र सौजन्य : कपिल कौल ...


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