नयी दिल्ली/खनऊ   52
न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भातृभाज्यं न च भारकारी । व्ययेकृते वर्द्धति एव नित्यं विद्याधनं सर्व धनप्रधानम् । बचपन से यह श्लोक विद्यालय की दीवाल पर लिखा हुआ पढ़ता आया हूँ । चुनाव ड्यूटी में भी प्राथमिक शालाओं में जाना हुआ है तो विद्यारूपी धन की शाश्वत अनश्वरता दर्शाता यह श्लोक अब भी दीवारों की शोभा बढ़ाता दिखाई देता है। चाणक्य का कहना था कि धन की रक्षा चोरों और राजपुरुषों से करनी चाहिये । आपके पास धन है इसका पता लगते ही चोर और राजा दोनों ही सक्रिय हो जाते हैं और येन केन प्रकारेण सेंध लगा कर या शुल्क लगा कर धन छीनने का पूरा प्रयास करते हैं । लेकिन इस श्लोक में चोर और राजपुरुष के समकक्ष भाई को भी खड़ा कर दिया गया है । यानी विद्या ऐसा घन है जिसे न चोर चुरा सकता है न राजा अपहरण कर सकता है और न भाई बाँट सकता है । न ही इस धन में इतना भार होता है कि थक कर कहीं रख दें । सबसे बड़ी बात कि खर्च करने पर यह धन नष्ट होने की बजाय बढ़ता ही है । बहुत से मित्रों के पास कतिपय विषयों पर बहुत गहन अध्ययन है मगर पूछने पर भी नहीं बताते । मुझे लगता है कि विद्या का निरंतर उपयोग न करने से वह नष्ट हो जाती है । यज्ञोपवीत के सूत्र तीन ऋणों के द्योतक हैं जो आदमी पर जीवन भर सवार रहते हैं । मातृ ऋण पितृ ऋण और आचार्य ऋण । यह आचार्य वाला ऋण तब तक नहीं उतरता जब तक अपनी सीखी हुई विद्या आप किसी को सिखा नहीं देते । ख़ैर विद्या दान करते हुए भी पात्रता का सदैव ध्यान रखना रखना चाहिये । कुपात्र को दी गई विद्या नाशकारी भी हो सकती है । ...


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