लखनऊ   41
(बृजनंदन) लखनऊ, 03 मई । उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर में चर्चित कांग्रेस के गढ़ रायबरेली संसदीय क्षेत्र में इस बार सोनिया गांधी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। चार लोकसभा चुनावों से लगातार इस सीट से अजेय रहीं सोनिया गांधी की डगर इस बार भाजपा उम्मीदवार दिनेश प्रताप सिंह से कड़ी चुनौती मिलने की वजह से मुश्किल लग रही है। गांधी परिवार के करीबी रहे दिनेश प्रताप सिंह ऐन चुनाव के वक्त कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गये थे। रायबरेली लोकसभा सीट पर अभी तक कुल 16 बार लोकसभा आम चुनाव और दो बार लोकसभा उपचुनाव हुए हैं। इनमें से 15 बार कांग्रेस को जीत मिली है, जबकि एक बार भारतीय लोकदल और दो बार यहां से भाजपा की जीत हो चुकी है। 2004 में सोनिया गांधी यहां से चुनाव जीतकर संसद पहुंचीं। तब से वह लगातार रायबरेली से जीतती आ रही हैं। इस सीट पर 2014 की मोदी लहर में भी बीजेपी का 'कमल' नहीं खिल सका था। उम्मीदवार लोकबंधु राजनारायण ने उन्हें 55 हजार 202 मतों से हराया था। इस हार के बाद इंदिरा गांधी ने फिर कभी रायबरेली से चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं जुटाई। यहां कभी नहीं खुला सपा-बसपा का खाता रायबरेली संसदीय सीट पर सपा-बसपा का कभी खाता नहीं खुल पाया है। सपा अक्सर यहां से अपना उम्मीदवार ही नहीं उतारती है। इस बार भी सपा-बसपा गठबंधन के बावजूद रायबरेली से उम्मीदवार नहीं उतारा गया है। रायबरेली में तीन चुनावों को छोड़कर हमेशा कांग्रेस उम्मीदवार की ही जीत हुई है। वह भी तब जब यहां से 'गांधी परिवार' के किसी सदस्य ने चुनाव नहीं लड़ा। सोनिया को हराना आसान नहीं कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता शुचि विश्वास श्रीवास्तव ने 'हिन्दुस्थान समाचार' से बातचीत में कहा कि मैं रायबरेली में ही प्रियंका गांधी के साथ हूं। सोनिया गांधी को यहां से हराना आसान नहीं है। रायबरेली और अमेठी दोनों सीट कांग्रेस भारी अंतर से जीत रही है। शुचि विश्वास ने कहा कि रायबरेली में शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा जैसे मुद्दों पर काफी काम हुआ है। यह सीट गांधी परिवार से जुड़ी होने के कारण जानबूझकर यहां 50 से अधिक विकास योजनाओं का कार्य रोका गया ताकि जनता को असुविधा हो। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता चन्द्र भूषण पाण्डेय ने कहा कि इस बार रायबरेली में सोनिया गांधी की हार तय है। रायबरेली की जनता ने इंदिरा गांधी को भी हराया था। इस बार सोनिया को भी हराने का मन रायबरेली की जनता बना चुकी है। कांग्रेस कार्यकर्ता विहीन हो चुकी है। कुछ मुट्टीभर चाटुकारों के सहारे चुनाव नहीं जीते जा सकते। कांग्रेस की कुटिल चालों का पर्दाफाश हो चुका है। अबकी बार जनता इनके बहकावे में नहीं आने वाली है। ...


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