नई दिल्ली   185
कितना मुश्किल है मुसलमाँ का मुसलमाँ होना इस्लाम के सभी अध्येता बद्र की जंग को एक निर्णायक मोड़ मानते हैं। मुसलमानों द्वारा इसके लिए प्रयुक्त यौम अल फुरकान, निर्णय का दिन, भी इसी बात की पुष्टि करता है। यदि यह यह मोड़ है तो किससे मुड़ा या मुकरा जा रहा है? जो कुरान मक्का में उतरा था वह यदि कुरान है तो जो मदीना में और खास कर हिजरी 2 के 17वें रमजान के बाद उतरता रहा वह क्या था और वह किस आसमान पर रखा गया था कि पहले का सब कुछ उलट गया, सिर्फ नाम नहीं उलटा। एक को मानने वाला दूसरे को नहीं मान सकता। यदि मानता है तो खंडित चेतना से ग्रस्त, दोहरे व्यक्तित्व और विरोधी आचरण के जैकिल और हाइड की जिंदगी जीने को मजबूर होगा। मुस्लिम समाज की समस्या यही से आरंभ होती है। मुल्लों, इमामों, और मदरसों द्वारा अपने पूरे समाज को बीमार बना कर रखना, उनके साथ भेड़ बकरियों जैसा व्यवहार करना, उनके हित में तो है परंतु उस समाज के हित में नहीं। इनके द्वारा समाज के दिमाग का नियंत्रण बुद्धिजीवियों का अपमान है। जिस देश में मुल्लों की चलती हो, महंतों की चलती हो उसमें बुद्धिजीवियों की नहीं चल सकती। उसका बुद्धिजीवी भी गुलाम की तरह काम करेगा। अदाओं से रिझाएगा, परंतु रास्ता नहीं दिखा पाएगा,न स्वयं रास्ता ढूंढ पाएगा। मुस्लिम समाज बंधुआ समाज है। उसे उद्धारक की प्रतीक्षा है। उद्धारक उसका बुद्धिजीवी वर्ग ही हो सकता हे जो नजाकत को बौद्धिक दायित्व का निर्वाह मानता है। आतंकवादियों के साथ कोई समस्या नहीं है। उन्होंने मक्का में उतरी आयतों को अपनी किताब से निकाल दिया है। फाड़ कर फेंक दिया है, परंतु यदि अफवाह भी उठ जाए कि किसी ने उन फेंके हुए पन्नों को फाड़ दिया है, तो इस अपमान का बदला लेने के लिए, यह जानने से पहले कुछ ऐसा करेंगे जिससे लगेगा मक्का और मदीना दोनों की रखवाली वे ही करते हैं। परंतु उनके कुरान में मक्का गायब है मदीना ही मक्का तक सैलाब की तरह फैला है, और मक्का उसमें डूब गया है। बाढ़ रेगिस्तान में भी आती है। रेत के तूफान भी वही काम करते हैं, जो रेत की परत के नीचे दब गया वह दबा भले रहे, है तो। मक्का की आयतें तालिबानी कुरान इसी तरह दफ्न हैं, पर है और फसाद के लिए जरूरी होने पर खोद कर सतह पर लाई जा सकती हैं। अमल वे मदीना की आयतों पर ही करते हैं और इसके कारण लोग उनसे डरते भी हैं, नफरत भी करते हैं। उनके विषय में बनी हुई धारणा पूरे मुस्लिम समाज के विषय में न बन जाए इसलिए सभी देशों को उनके कारनामों के बाद अपने समाज की शांति और व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए क्षुब्ध जनों को शांत करने के लिए यह ज्ञापित करना होता है कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं, जो सही है। []यदि हो जाएं तो दुनिया का नक्शा ही बदल जाए। एक के रहते हैं दूसरों का अस्तित्व संकट में पड़ जाए और यह इतने बड़े दमन चक्र का रूप ले ले कि यह सामाजिक समस्या न रह कर सर्वराष्ट्रीय राजनीतिक समस्या बन जाए। उस विभीषिका की हम कल्पना तक नहीं कर सकते।[] मुस्लिम आतंकवाद मानवता के हित में नहीं है, स्वयं आतंक का रास्ता अपनाने वालों के हित में नहीं है, इसका विस्तार मुसलमानों के हित में नहीं है। मैंने ‘मुस्लिम आतंकवाद’ शब्द का प्रयोग किया है। इस प्रयोग पर समझदार लोगों को आपत्ति होगी। वे कहेंगे, कहते भी हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। मुस्लिम आतंकवाद हिंदू आतंकवाद जैसे प्रयोग गलत हैं। मजहब का प्रयोग उसी दशा में गलत जहाँ मजहब आतंकवाद न सिखाता हो। हिंदू आतंकवाद इसलिए गलत है कि कोई भी हिंदू ग्रंथ आतंक का समर्थन नहीं करता। मक्का का इस्लाम शांति और सद्भाव का मजहब है वह आतंकवाद का समर्थन नहीं करता। मुसलमान (शांति और सद्भाव के पक्षधर) हैं जो अपने जीवन व्यवहार में मक्का थे कुरान को अपना कुरान मानते हैं। परन्तु वे भी मदीने के कुरान का विरोध नहीं करते। जब तक विरोध नहीं करते हैं तब तक मुस्लिम आतंकवाद के प्रयोग का विरोध नहीं करना चाहिए, क्योंकि मुसलमान बात-बात पर कुरान की दुहाई देते हैं। कुरान न केवल आतंकवाद का समर्थन करता है बल्कि इसे जरूरी कर्तव्य भी बताता हैः Fighting is ordained for you, though it is hateful unto you; but it may happen that ye hate a thing which is good for you, and it mayhappen that ye love a thing which is bad for you. Allah knoweth, ye knownot. 2.216 मोहम्मद को भी पता था, लड़ाई झगड़े से बचना मनुष्य के स्वभाव में। कलह-प्रिय व्यक्ति से लोग नफरत करते हैं, इसके बावजूद वह इसी को संभावित अच्छाई बता कर मुस्लिम समाज को अल्पकालिक लाभ के लिए, मनुष्यता से दूर ले जा रहे थे और और अल्लाह का इस्तेमाल सोचने विचारने से विरत करने के लिए कर रहे थे। दुर्भाग्य से इसमें उन्हें सफलता भी मिली। इसलिए जो लोग मुस्लिम आतंकवाद को बुरा मानते हैं, उन्हें अल्ला के दिए हुए दिमाग का इस्तेमाल करते हुए, आतंकवादी अंशों को इस्लाम विरोधी मानना चाहिए। मानसिक द्वंद की लड़ाई बाहर जाकर नहीं लड़ी जाती, इसे अपने भीतर लड़ना होता है। हाइड को जैकिल से लड़ना और उसे परास्त करना होता है। यहाँ भीतर से हमारा आशय अपने भीतर और अपने समाज के भीतर, और उस पर कब्जा जमाने वालों के विरुद्ध तीनों से है। बाहर के लोग तो उनके भुक्तभोगी हैं। जेकिल किल करता है, हाइड उस पर परदा डालता है, जब किलिंग इतना बड़ा आकार ले लेती है कि परदा भी लिथड़ जाए तो उस पर चर्चा करने से बचता है और उस ओर ध्यान दिलाने वालों को ही उपद्रवी करार दे देता है या स्वयं असुरक्षित होने का इजहार करने लगता है। मुस्लिम बुद्धिजीवियों को चुनना होगा कि कुरान पर भरोसा करें या अपने विवेक पर। यदि कुरान पर भरोसा जरूरी है तो तय करें कौन सा कुरान। मक्के वाला या मदीने वाला। एक ही जिल्द में बँधे होने के कारण या एक ही व्यक्ति की रचना होने के कारण, ये दोनों परस्पर विरोधी पुस्तकें एक नहीं मानी जा सकतीं। एक के फैसले अल्लाह करता है, दूसरे का फैसला तलवार करती है, एक का अल्लाह सिरजनने वाला है, दूसरे का अल्लाह सत्यानाश करने वाला है। ऐसा ही चुनाव उन्हें मोहम्मद के दो रूपों में करना होगा। एक कुछ सीमाओं के बाद भी साधक, सत्याग्रही और मर्यादित आचरण वाला, दूसरा बद्र के जंग के बाद का जो किसी मर्यादा को नहीं मानता। अपने गलत कामों को सही सिद्ध करने के लिए अल्ला को भी अपना सहयोगी बना लेता है, और बचाव के लिए अल्ला की जगह शैतान पर दोष मढ़ देता है। चुनाव इसलिए भी जरूरी है कि कुरान की आयतों की तरह मुसलमानों को मोहम्मद साहब के कथनों और कामों को प्रमाण बनाने की बाध्यता बनी रहती है। जिस सिद्धांत पर मोहम्मद बद्र से पहले अमल करते रहे, वह यदि वह इस्लाम था, तो उसे नकार कर दूसरे रास्ते पर चलने को इस्लाम नहीं कहा जा सकता। दूसरा नाम आतंकवाद ही रह जाता है। बद्र के बाद अल्लाह के हुक्म से या शैतान के हस्तक्षेप से आतंक का दौर आरंभ हुआ जिसका पालन आज के आतंकवादी करते हैं । इसके कारण ही वे पूरी दुनिया से और पूरी दुनिया में लोग उनसे नफरत करते हैं। बद्र इस्लाम का अंत है जो विफलताओं के बीच भी, विरोध के होते हुए भी, उदात्त लक्ष्य के लिए, बिना किसी दुर्भावना के, संघर्ष करने का, और इसलिए जो असहमत हैं उनसे भी सद्भाव बनाए रखने का अभियान था। सभी उत्पादन और निर्माण धैर्य, आध्यवसाय, और सतर्कता की अपेक्षा रखते हैं। त्वरित सफलता चाहने वाले अनैतिक और प्रायः गर्हित तरीके अपनाते हैं जैसे जुआडी, लुटेरे, तस्कर, अपराध के अंधलोक, या अंडर-वर्ल्ड के लोग करते हैं। त्वरित सफलता या बड़े भूभाग पर अधिकार किसी उपक्रम के सही होने की कसौटी नहीं हो सकता। यह काम जंगी खान और हलाकू ने मुहम्मद से भी अधिक सफलता से किया था। यदि सफलता अल्ला के रहमो करम से आता है तो अल्ला का रहमो-करम सदा सभ्यता के विरुद्ध और दरिंदों के साथ रहा है। हलाकू ने मुस्लिम जगत को रौंद कर रख दिया था, फिर उसकी समझ में आया यही तो हमारा धर्म है, बौद्ध मत जहां रोकता है, वहां इस्लाम पूरी छूट देता है और उसने इस्लाम के पूरे क्षेत्र को जीतने के बाद, यह समझने के बाद यही तो हमें रास आता है, इस्लाम कबूल कर लिया। इस्लाम की सफलता थी या वहशत की यह तय करने के लिए बहस जरूरी है, परंतु इस पर किसी बहस की जरूरत नहीं कि जितने बड़े साम्राज्य पर जंगी खाँ या हलाकू का अधिकार अपने बल पर हुआ था उतने पर अल्लाह की मदद से भी मोहम्मद को हासिल नहीं हुआ था।[] []२९ जनवरी १२५८ में मंगोलों ने बग़दाद को घेरा डाला और ५ फ़रवरी तक वह शहर की रक्षक दीवार के एक हिस्से पर क़ब्ज़ा जमा चुके थे। अब ख़लीफ़ा ने हथियार डालने की सोची लेकिन मंगोलों ने बात करने से इनकार कर दिया और १३ फ़रवरी को बग़दाद शहर में घुस आये। उसके बाद एक हफ़्ते तक उन्होंने वहाँ क़त्ल, बलात्कार और लूट की। जिन नागरिकों ने भागने की कोशिश की उन्हें भी रोककर मारा गया या उनका बलात्कार किया गया। उस समय बग़दाद में एक महान पुस्तकालय था जिसमें खगोलशास्त्र से लेकर चिकित्साशास्त्र तक हर विषय पर अनगिनत दस्तावेज़ और किताबें थीं। मंगोलों ने सभी उठाकर नदी में फेंक दिये। जो शरणार्थी बचकर वहाँ से निकले उन्होंने कहा कि किताबों से बहती हुई स्याही से दजला का पानी काला हो गया था। महल, मस्जिदें, हस्पताल और अन्य महान इमारतें जला दी गई। यहाँ मरने वालों की संख्या कम-से-कम ९०,००० अनुमानित की जाती है। ख़लीफ़ा पर क्या बीती, इसपर दो अलग वर्णन मिलते हैं। यूरोप से बाद में आने वाले यात्री मार्को पोलो के अनुसार उसे भूखा मारा गया। लेकिन उस से अधिक विश्वसनीय मंगोल और मुस्लिम स्रोतों के अनुसार उसे एक क़ालीन में लपेट दिया गया और उसके ऊपर से तब तक घोड़े दौड़ाए गए जब तक उसने दम नहीं तोड़ दिया। (विकीपीडिया)[] [][]कहते हैं कि मुसलमानों के लिए तो चंगेज खान और हलाकू खान अल्लाह का कहर था। कहा जाता है कि उसके पास इतना पैसा और जमीन थी कि वह अपने जीवनकाल में भी न तो इसका उपयोग कर पाया और न ही कभी हिसाब-किताब लगा सका। चंगेज खान पर लिखी एक प्रसिद्ध किताब के लेखक जैक वेदरफोर्ड का कहना है कि जीवनभर लूटकर सारी दुनिया से पैसा इकट्‍ठा करने वाले चंगेज खान ने कभी खुद या परिजनों पर खर्च नहीं किया। मरने के बाद भी उसे साधारण तरीके से दफनाया गया था।… समझा जाता है कि उसके हमलों में तकरीबन 4 करोड़ लोग मारे गए। उसने अपने विजय अभियान के बाद धरती की 22 फीसदी जमीन तक अपने साम्राज्य का विस्तार कर लिया था।[][] ...


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