नई दिल्ली   105
एक बड़ा भारी प्रचार यह भी ख़ूब चला है कि इस्लाम ने भारतीयों को व्यंजन बनाना और ख़ाने का सलीका सिखाया । बिरयानी पुलाव और हलवा के साथ साथ जलेबी गुलाब जामुन और तरह तरह के मुग़लई व्यंजन गोया वह अपने साथ लाये थे । सबसे पहले तो यह समझ लेना ज़रूरी है कि जितने भी व्यंजन ऊपर गिनाये गये हैं उनकी जान देसी घी में बसती है जो दुनिया को भारत की देन है , बाहर की दुनिया में भारत की नकल कर के बटर ऑयल या क्लैरीफाइड बटर बनाया जाता है वह घी नहीं होता । दूसरी बात आज भी दुनिया के ७० प्रतिशत मसालों का उत्पादन भारत में होता है तो यह पुलाव और बिरयानी क्या बिना मसाले के बनते थे । छोले भटूरे पंजाब का व्यंजन है और मसालेदार छोले पाकिस्तान के आगे मिलना दुश्वार है । अफ़ग़ानिस्तान से मोरक्को तक काबुली चने को उबाल कर लहसुन के साथ पीस के उसकी दुर्गति कर , तिल और जैतून के तेल से बनी चटनी जिसे पूरे मध्य एशिया में ताहिनी सॉस बोलते हैं के साथ मिला कर हम्मस नाम का व्यंजन बनाया जाता है जिसमें ढेर सारा जैतून का तेल डाल कर पिटा ब्रेड के साथ खाया जाता है । पूड़ी कचौड़ी की सीमा भी पाकिस्तान के बाद ख़त्म । अलीबाबा की कहानी में खुल जा सिम सिम याद होगा , तो सिम सिम के मायने तिल होता है । जो भी हलवा अरब में बनता है वह तिल और जैतून के तेल के मिश्रण के माध्यम से ही बनता था , आजकल जरूर अरब जगत ने भी देसी घी का उत्पादन शुरू कर दिया है । मिस्र जरूर प्राचीन नदी सभ्यता थी जहाँ एक तरह का मक्खन जिसे सम्ना कहते हैं तलने और चिकनाई के माध्यम के रूप में प्रयोग किया जाता है । इस्लाम अपने उद्भव के समय शक्कर और उसके उत्पादों से बहुत परिचित नहीं था । नबी के प्रिय भोजन तलबीना जो एक प्रकार का जौ का दलिया होता है में मिठास के लिये शहद और खजूर का प्रयोग किया जाता है । घी की तरह गन्ना और शर्करा भी दुनिया को भारत की देन है । अंग्रेज दूर देशों में गन्ना उत्पादन के लिये यहाँ के मजदूरों को एग्रीमेंट पर ले गये जो कालांतर में गिरमिटिया मजदूर कहलाये । भारत में घुसते ही मुसलमानों की आँखें यहाँ के वैभव से चुँधिया गईं । इक़बाल लिखते हैं, तुर्कों का जिसने दामन हीरों से भर दिया था । मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है । संसार को हीरे से भी भारत ने ही परिचित कराया । क्या ग़जब है कि ख़ाना ख़ाना हमें अरबों और तुर्कों ने सिखाया । बाबर लिखता है कि हिंदुस्तान में एक फल अम्बा (आम) पाया जाता है जो खरबूजे के बाद सबसे स्वादिष्ट फल होता है । अब आप समझ सकते हैं बाबर की स्वाद ग्रंथियों को । कहाँ फलों का राजा आम और कहाँ बेस्वाद खरबूजा ? बाबर का यह एतराज जायज़ है कि भारतवासी बिना दस्तरख़्वान बिछाये ख़ाना खाते है । लेकिन मध्येशिया के लोग पूरा ऊँट भून कर खाने वाले बिना कपड़ा बिछाये कैसे ज़मीन पर रख कर खा सकते थे । अब्बासी ख़लीफ़ा ने जब बनू उमैया का क़त्ले आम किया तो लाशों के ऊपर ही दस्तरख़्वान बिछा कर दावत उड़ाई और जब वह भोजन जीम रहे थे तब नीचे से अधमरे बनू उमैया के कराहने की आवाज़ें भी आ रही थीं । भारतीयों को ख़ाना पकाने और ख़ाने का सलीका सिखाने वाले आज भी न तो इडली सांभर दोसा वड़ा बना सकते हैं न बंगाल की प्रसिद्ध इलिश सरसों बाटा न उडुपी की शाकाहारी थाली न राजस्थानी कढ़ी । अरे इतने मसाले किस अनुपात में पड़ेंगे यह जान पाना अरब के रेगिस्तान के बद्दुओं के बस की बात नहीं । आक्रांताओं ने यहाँ के निवासियों का केवल धर्म बदला बंगलादेशी मानुष पहले भी पटोला वैसे ही बनाता था आज भी वैसे ही बनाता है । पुर्तगालियों ने जरूर भारत का पूरा खाना बदल दिया । वे अपने साथ आलू गोभी मक्का और सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण चीज़ लाल मिर्च लाये जिसने भारतीयों का ज़ायका ही बदल दिया । लाल मिर्च हिंदुस्तान की धरती को इतनी भाई कि आज दुनिया की सबसे तीखी लाल मिर्च भूत झोलकिया आसाम में उगाई जाती है । लाल मिर्च से पहले भारत कटु स्वाद के लिये सोंठ काली मिर्च और पीपल का प्रयोग करता था जिसे आयुर्वेद में त्रिकटु के नाम से जानते हैं । भोजन पर भारत ने बहुत शोध किया है । षटरस यानी खट्टा मीठा खारा चरपरा कड़वा और कसैला तथा छप्पन भोग न जाने कब से भारत में प्रचलित हैं । चालुक्य राजा सोमदेव तृतीय के ग्रंथ मानसोल्लास में एक बड़ा अध्याय भोजन और पाक कला को समर्पित है । आज के अनेक लोकप्रिय भारतीय व्यंजनों की पाकविधि उसमें वर्णित है । भुना गोश्त खाने के शौकीन मध्य एशियाई तंदूर जरूर अपने साथ लाये लेकिन भारत के विशाल वनस्पति जगत ने उनके भोजन में इतने स्वाद मिला दिये एक अलग मिश्रित प्रजाति का भोजन तैयार हुआ जिसे मुगलई कहा जाने लगा । लेकिन मसालों से लेकर दालें तक विशुद्ध भारतीय ही रहीं । खिचड़ी का खिचड़ा ज़रूर बन गया जिसे हलीम बोलते हैं । शाकाहारी लोग अगर अरब जगत में जायें तो बड़े आराम से हम्मस और पिटा ब्रेड खा कर गुज़ारा हो सकता है । हम्मस बनाना सीख लीजिये । भारत आने से पहले मुसलमान गोश्त के सिवा यही खाते थे , राजकमल गोस्वामी और धान तो आज भी अरब में पैदा नहीं होता । ...


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