नयी दिल्ली /मद्रास   145
अनंत से अनंत तक का यात्री रामानुजन की जयंती पर... (यह आलेख मेरे शीघ्र प्रकाश्य गद्य संकलन आवारा बादल में समाहित है) यह बड़ी अजीब सी बात है कि साहित्यिक अभिरुचि का आदमी होकर भी मैं किसी कवि या लेखक की जीवनगाथा पढ़ते हुए उतना द्रवित कभी न हो सका जितना कि श्रीनिवास रामानुजन के बारे में पढ़ते हुए हुआ । रामानुजन का छोटा सा जीवन शीत की कुहेलिका में डूबे किसी दिव्य सरोवर सा है जो क्षण क्षण अपना रूप खोलता है । उसमें जितनी काव्यात्मकता,करुणा और आनंद है उतना कथा-कहानियों में नहीं । उसमें उतरना तो हम जैसी अगणितीय आत्माओं से कोसों दूर है, उसकी दिव्यता को छू भर लेना ही हमारे लिए परमाद्भुत रत्न को पाने जैसा है । उनके जन्म की कहानी। उनकी बचपन की विचित्रता। बहुत छोटी उम्र में उनके द्वारा पूछे गए विस्मयकारी प्रश्न और धीरे-धीरे गणित में धंसते हुए कुछ विलक्षण सोचना या करना, यह सब अपवादातात्मक या प्रतीयमान ही है । रामानुजन की दिव्यता का आभास यों तो बचपन से होने लगता है तथापि उनकी अपूर्व प्रतिभा का प्राकट्य तेरह-चौदह वर्ष की उम्र से होता है जब वे लोनी की त्रिकोणमिति की पुस्तक को समाप्त करते हुए उसके कुछ प्रमेयों का विस्तार कर जाते हैं । यद्यपि वे अनभिज्ञ हैं कि दुनिया उन प्रमेयों पर काम कर चुकी है । इस समय तक तो रामानुजन किसी अनजान गिरिगेह के शून्य में बैठे थे, जहां से कुछ प्रकाशित होना या विश्व में गणित पर होने वाले कार्यों को जानना असंभव ही था । रामानुजन की एकाधिक चिट्ठियां मेरे मन को विकल करती हैं । जब वे रामास्वामी अय्यर से अरज करते हैं या कैंब्रिज के प्रख्यात गणितज्ञ जी एच हार्डी को अपने प्रमेय भेजते हुए किसी दैवीय विश्वास से भरे हुए दीखते हैं । हार्डी को एक पत्र में तो वे यहां तक कहते हैं कि उन्हें अपने मस्तिष्क या बुद्धि को बचाए रखने के लिए फिलहाल भोजन की आवश्यकता है । क्योंकि वे अधभुखमरी की हालत में जी रहे हैं ।उऩके द्वारा भेजे गए प्रमेयों पर हार्डी की मुहर उन्हें मद्रास यूनिवर्सिटी या सरकार द्वारा छात्रवृत्ति दिलाने में कारगर होगी। बीसवीं सदी में भारत और विश्व के संपूर्ण बौद्धिक पटल पर रामानुजन सा विचित्र मनुष्य दूसरा नहीं हो सका । विचित्र इसलिए कि वे, तर्क और अध्यात्म के तत्व का जो अंतर्दृष्टिमूलक विपर्यय है, उसे एक साथ साधते हैं । एक ओर उनकी विलक्षण मति है जो प्रतिपल कुछ नवीन और प्रातिभ तेज से सामने वाले को हैरान करती है । दूसरी तरफ़ उनका अध्यात्म है जो उनकी मेधा को उर्जस्विता प्रदान करता है । बल्कि वह मेधा उसी आध्यात्मिक आभा, अंत:प्रज्ञा से मंडित है । उन्होंने अपने कई प्रमेयों पर बात करते हुए कहा था कि यह देवी नामगिरी ने स्वप्न में आकर बतला दिया था । यह बात भी दीगर है कि रामानुजन कई बार अर्द्धरात्रि में नींद से उठकर गणित के प्रमेय लिखने लगते थे । गणित जैसे गूढ़ विषय पर आधुनिक विश्व में ऐसा कोई दूसरा धुरंधर नहीं दीखता जो अपने प्रमेयों को कुलदेवी का प्रसाद कहता रहा हो । जर्मनी के रीमान एक और महान गणितज्ञ थे जो आध्यात्मिक प्रभा से दीप्त थे । रामानुजन कहा करते थे; “यदि कोई गणितीय समीकरण या सूत्र किसी भगवत विचार से मुझे नहीं भर देता तो वह मेरे लिए निरर्थक है ।” रामानुजन और उऩकी माता का जीवन एक अदृष्टपूर्व आध्यात्मिक चिंतन से अंतर्गुंफित है। माना जाता है कि रामानुजन की माता ने एक स्वप्न देखा था कि उनका पुत्र यूरोपीय लोगों से घिरा हुआ है और देवी नामगिरी उन्हें आदेश दे रही हैं कि वह अपने पुत्र की यूरोप यात्रा में बाधा न बनें । एक कथा यह भी है कि रामानुजन अपनी कुलदेवी के मंदिर में तीन रातों तक सोते रहे । दो दिनों तक तो कुछ भी नहीं हुआ लेकिन तीसरी रात को वे नींद से जागे और उन्होंने नारायण अय्यर को यह कह कर जगाया कि देवी ने उन्हें विदेश जाने का आदेश दिया है। रामानुजन की माता बहुत महत्वाकांक्षी थीं । उन्होंने अपने पुत्र के गणित प्रेम को उनकी जीवन सहचरी पर प्रश्रय दिया । पत्नी, जानकी अम्माल रामानुजन के लिए कुछ विशेष नहीं कर सकीं । विवाह के बाद के कुछ वर्षों तक वे वीतरागी ही रहे । बाद में इंग्लैंड प्रवास के कारण पत्नी से दूर ही हो गए । जब बीमार होकर भारत लौटे तो कुछ महीनों तक पत्नी के साथ रहे । तब जानकी अम्माल ने उनकी बहुत सेवा की । उन दिनों में वे विह्वल होकर कहते थे कि अगर तुम मेरे साथ रही होतीं तो मैं बीमार न होता ! इंग्लैंड में उनके साथ काम करते हुए प्रख्यात गणितज्ञ प्रोफेसर हार्डी ने कहा था, ‘’सबसे आश्चर्यचकित करने वाली बात उसकी वह अंतर्दृष्टि है जो सूत्रों और अऩंत श्रेणियों के रूपांतरण आदि में दिखती है। मैं आजतक उसके समान किसी व्यक्ति से नहीं मिला और मैं उसकी तुलना आयलर तथा जैकोबी से ही कर सकता हूं।‘’ महान गणितज्ञ लिटलवुड भी उन्हें जैकोबी मानते थे । प्रोफेसर हार्डी ने अन्यत्र लिखा है: ‘’ उसके ज्ञान की कमी भी उतनी ही विस्मय कर देने वाली थी जितनी कि उसके विचार की गहनता।वह एक ऐसा व्यक्ति था जो उस स्तर के मौड्यूलर समीकरण पर कार्य कर सकता था या कॉम्प्लेक्स गुणा कर सकता था जिसके बारे में किसी ने सुना तक न हो । निरंतर लंगड़ीभिन्न पर उसका इतना अधिकार था जितना विश्व में कदाचित किसी भी गणितज्ञ को नहीं था । उसने स्वयं ज़ीटा फंक्शऩ के समीकरण का पता लगा लिया था। उसने कभी डबल पीरी आइडिक फंक्शन या कॉची थ्योरम का नाम भी नहीं सुना था परंतु एनैलीटिकल नंबर थ्योरी की विशाल राशियों से से वह खेलता रहता था ।’’ प्रोफेसर हार्डी ने अन्यत्र कहा था कि उन्हें खुद को, महान गणितज्ञ लिट्लवुड और रामानुजन को आंकना हो तो वे खुद को सौ में पच्चीस, लिट्लवुड को पैंतीस और रामानुजन को सौ में से सौ अंक देंगे । महान दार्शनिक बर्टरेंड रसल हंस कर मजाक करते थे कि हार्डी और लिट्लवुड को लगता है कि उन्होंने पच्चीस पाउंड के खर्च में भारत से किसी नए न्यूटन को खोज लिया है । भारत लौट आने के बाद अपनी असाध्य रुग्णता के दिनों में उन्होंने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य किया । उन्होंने हार्डी को लिखे अपने पत्र में मॉकथीटा फंक्शन का जिक्र किया है। अमेरिकी गणितज्ञ प्रोफेसर जॉर्ज एंड्रूज़ रामानुजन के कार्यों पर शोध करने वाले अधिकारी गणितज्ञ माने जाते हैं । उन्होंने रामानुजन के इस सूत्र पर विचार करते हुए पचास वर्ष के बाद लिखा था.. ‘’इनको समझना किसी अच्छे गणितज्ञ तक के लिए कठिन है। एक वर्ग के पांच सूत्रों में से पहला मैंने पंद्रह मिनट में सिद्ध कर लिया था, परंतु दूसरे को सिद्ध करने में एक घंटा लगा चौथा दूसरे से निकल आया और तीसरे तथा पांचवें को सिद्ध करने में मुझे तीन महीने लगे “’ आज दुनिया के सभी महान गणितज्ञ इस बात से सहमत हैं कि आधुनिक विश्व की नैसर्गिक प्रतिभाओं में रामानुजन की तुलना संभवत: किसी और से हो ही नहीं सकती, जैकोबी और आयलर को छोड़कर । रामानुजन का पूरा जीवन ही इस बात का शाश्वत प्रमाण है कि अध्यात्म से सिंचित भारतीय मेधा और चिंतन परंपरा साक्षात ईश्वरीय संकेतों से चालित होती है। सिर्फ बत्तीस वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन जब वे विदा हुए तो पश्चिम का रंगभेदी दर्प ध्वस्त हो चुका था । रामानुजन पहले भारतीय थे जिन्होंने यह सिद्ध कर दिया था कि प्रतिभा रंग की मोहताज नहीं होती । एक साधारण कद काठी के काले मद्रासी ने बिना किसी विदेशी शिक्षा या पारंपरिक पठन पाठन के पश्चिमी गोरी चमड़ी के श्रेष्ठताबोध को तोड़ डाला था ।उनकी मृत्यु के बाद रामचंद्र राव ने लिखा था: “उसका नाम भारत को यश देता है और उसका जीवनवृत्त प्रचलित विदेशी शिक्षा प्रणाली की कटु निंदा का द्योतक है । उसका नाम उस व्यक्ति के लिए ऐसा स्तंभ है जो भारतीय अतीत के बौद्धिक सामर्थ्य से अनभिज्ञ है ।जब दो महाद्वीप उनके खोजे गणित के नए सूत्र प्रकाशित कर रहे थे तब भी रामानुजन वही बालोचित, दयालु और सरल व्यक्ति बना रहा, जिसको न ढंग के कपड़े पहनने का ध्यान था, न ही औपचारिकता की परवाह। इससे उनके कक्ष में मिलने आने वाले आश्चर्य के साथ कह उठते थे कि क्या यही वह हैं.. यदि मैं एक शब्द में रामानुजन को समाना चाहूं तो कहूंगा, भारतीयता ” अंत में श्रीनिवास रामानुजन के लिए लिखी अपनी ही एक कविता से उन्हें श्रद्धांजलि देता हूं.. जब तुम्हारे सहपाठी अंकों के आवागमन में दिमाग के विश्राम का द्वार टटोलते थे तब तुम शून्य से शून्य तक की यात्रा कर रहे थे ! तुम अनंत में पहले उतर आए वहां से अंत के सभी छोरों को कितनी सहजता से छू लिया तुमने संख्याएं तुम्हारी सहचरी बनीं दुकान पर हिसाब में जुड़ने वाली नहीं अनादि से अब तक गणितज्ञों के गूढ़ ब्रह्मांड में उड़ने वालीं अगणित तारिकाओं की तरह टिमकने वालीं तुमने अंकों की अनंताध्यायी रची जैसे एकल अंकों का वर्ण-विचार उनकी संधियों और सामासिकता का स्वरूप उनकी संज्ञा, विशेषण और सर्वनाम काल के सतत प्रवाह में उनकी नई पहचान संख्याओं का शाब्दिक संसार और उनका विचित्र विन्यास भी यह सब तुमने कहां से सीखा? तुम्हारी चमकती आंखों के पीछे क्या उसी देवी का सरोवर था! जो अकसर तुम्हारे स्वप्न में आती रहीं और खुद ही तोड़कर तुम्हें सौंपती रहीं सूत्रों के शतदल ! ...


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