नयी दिल   278
भारोपीय का मिथक मिथक सचाई का भ्रम खड़ा करके धूर्तों द्वारा अपनी मनमानी के लिए गढ़ा गया ऐसा हथियार है जिसे खंडित कर दिया जाय तो भी वे आसानी से हार नहीं मानते। वे उसके खंडित टुकड़ों को भी हथियार बना कर तब तब तक लड़ते रहते हैं, जब तक वे टुकड़े भी टूटते टूटते रेत में नहीं बदल जाते । इसके बाद, उनकी एक ही गति बची रहती है, अपने ही हथियार के चूरे के नीचे दफन हो जाना। आर्यों की, उनके आक्रमण की कहानियां दुहराने वालों के साथ कुछ ऐसा ही है। यह मिथक से अधिक तिलिस्म था। यह तिलिस्म केवल उनको सच लगता था जो पश्चिमी शिक्षाप्राप्त थे। अशिक्षतों और अल्पशिक्षितों के अपने पौराणक तिलिस्म थे, जिनके पाये अधिक मजबूत थे और जिसमें वे अधिक सुरक्षित अनुभव करते थे। यह समझना मुश्किल नहीं है कि कहने को उन्नत और उच्च शिक्षा-प्राप्त लोगों को ही आर्य और अनार्य के कच्चे रेत-गारे से तैयार किये गए इस तिलिस्म ने इतना आत्ममुग्ध कर दिया कि वे इसे चिनाई के हर कदम पर डांवाडोल देख कर भी इसके इन्द्रजाल को नहीं समझ सके। गुलामी में उन्नति के दरवाजे कमीनेपन के उस अनुपात में खुलते हैं जिस अनुपात में वह अपने मालिक की आकांक्षा को अपनी चेतना का हिस्सा बना कर उसके आदेश या संकेत के अभाव में भी उसकी सेवा के लिए अपने ही स्वजनों के साथ दुर्व्यवहार करने लगता है। सच कहें तो राजनीतिक रूप में पराधीन बनाए जा चुके लोग पराधीन तो होते हैं पर गुलाम नहीं होते। प्रभुओं से धन, पद और सम्मान चाहने वाले ही उनके सच्चे गुलाम हो सकते हैं। गुलाम बनने को बाध्य किये गए और उस गुलामी से मुक्त होने के लिए बार बार संघर्ष करने वालों को कोड़े मारने वाला गुलाम उनकी नजर में अधिक सम्मानित और अपनी नजर में उनका मालिक हुआ करता है, जब कि वास्तव में न तो उसके पास अपनी आत्मा होती है न अपना दिमाग। हम जितना भी प्रयत्न करें, कुछ बातें संकेत रूप में या संक्षेप में ही समझाई जा सकती हैं। कुछ बहुप्रचारित और निराधार या क्षीणाधार या सत्याभासी मान्यताओं का खंडन भी इसी तरह करना होगा। इनमें से कुछ से आप पहले से परिचित भी होंगे, और शेष की मैंने अपनी कृतियों में अपेक्षित विस्तार से चर्चा की है इसलिए पुनरावृत्ति से बचना भी जरूरी है : आर्य और अनार्य का सवाल बाद में उठा, पहली समझ यह थी कि संस्कृत केवल ब्राहमणों की भाषा है। समस्या ब्राहमणों और गैर ब्राहमणों की थी। भारत के वे हो नहीं सकते थे, क्योंकि उस दशा में वे काले होते और गोरे जिन पर शासन कर रहे थे, किसी सुदूर अतीत में वे गोरों पर शासन करते सिद्ध हो रहे थे। इसलिए संस्कृत को और ब्राहमणों को भारत से भिन्न किसी ऐसे भूभाग की भाषा और निवासी सिद्ध करना था जहां के निवासी काले नहीं होते। इसके लिए जोंस ने ईरान को चुना था यह हम विलियम जोंस की चर्चा में कुछ विस्तार से समझा आए हैं। यूरोप की क्लासिकी भाषाएं और संस्कृत से गहरी समानताएं रखने वाली अन्य भाषाएं संस्कृत की संतान नहीं हैं, इसके लिए जोंस को एक आद्य जननी भाषा की कल्पना करनी पड़ी। जोंस का , अवेस्ता, अरबी आदि का ज्ञान नाममात्र को था फिर भी उनकी दृष्टि असाधारण रूप में मर्मभेदी थी। सचाई यह है कि भाषा का प्रसार पाणिनीय संस्कृत के जन्म से हजारों साल पहले हुआ था, पर अभी तक वेदों का नाम भलें जोंस के कान में पड़ा हो, उसकी भाषा की विशेषताओं से वह परिचित नहीं थे। भारत में एक उन्नत नागर सभ्यता के उतने प्राचीन चरण पर होने की तो उस समय तक कल्पना तक नहीं की जा सकती थी, उसकी देशान्तर की गतिविधियों का अनुमान तो उसके बाद की चीज थी। इस अन्तिम स्थिति में ही यह सोचा जा सकता था कि प्रसार बोलचाल की भाषा का हुआ होगा, साहित्यिक या लिखित भाषा का नहीं। समानताएं भाषागत ही न थीं, देवशास्त्र, रीतिनीति में भी थी। उदाहरण के लिए ग्रीक समाज में शव के चिता पर जलाए जाने के अवशेष थे, ग्रीक स्त्री-पुरुष भारतीय पुरुषों और महिलाओं से मिलते जुलते अनसिले वस्त्र पहनते थे। इसलिए जोंस का मानना था कि भाषा, विचार, रीति, पुराण संबंधी जो भी समानताएं हैं वे सभी उस आद्य समाज की उपलब्धियां थीं, जिसका उत्तराधिकार इन्हें मिला था। यह रोचक है कि संस्कृत ब्राहमणों की भाषा थी, इसलिए विलियम जोंस को भारत की ओर ईरान से निर्वासित करके भारत में पहुंचाना पड़ा था। हमला कर के वे पहुंच नहीं सकते थे, क्योंकि ब्राह्मण हथियार नहीं चलाते थे, शाप अवश्य देते थे। वे भारत में पहुंच कर भी आपस में संस्कृत बोलते रहे और किसी दूसरे को अपनी भाषा तक पहुंचने नहीं देते थे। विलियम जोंस के बाद कुछ नई जरूरतें पैदा हो गईं । इनमें से एक थी किसी उस मूल भाषा का नामकरण जिसकी सन्तान ये सभी भाषाएं थीं? कई ...


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