नयी दिल्ली/लखनऊ   37
दो कविताएं मेरे संकलन से...(पग बढ़ा रही है धरती) विरह शरद के अंतिम फूल झर गए नग्न गाछ गा रहा है... जल रही है प्रिय ऋतु जो आया था वह जा रहा है... मैंने उससे कहा थाम लो मेरे हाथ ! वह बोली, देखो... अपनी दृष्टि से ! मैंने देखा...उसके पीछे-पीछे चला गया है मेरा चाहना भी टंगा है उसका चेहरा मेरी आंख में जैसे टंगा रहता है पहर समय की रेख पर जैसा टंगा होता है कोई कंदील अमावस की छत पर... ------------------------------ प्रद्युम्न ठाकुर (गुड़गांव में जिस मासूम की नृशंस हत्या हुई) मां जब कहती है कि उसे ईश्वर ने आंखें ही क्यों दीं तब मुझे अचानक सुनाई पड़ता है.. जैसे कह रही हो, हो इसी कर्म पर वज्रपात ! और तब मैं किसी अंधी दुनिया में रोशन जिन्दगी का झूठा सच भी देखता हूं मां जब कहती है कि तोड़ डालते उसके हाथ-पांव गला क्यों रेत डाला तब मैं हत्या के घिसेपिटे बाइस्कोप में सिनेमाई बदलाव के रील पलटता हूं जब मैं सोचता हूं कि उसी एक क्षण भला प्रद्युम्न को क्यों जाना था बाथरूम तब मैं ऐसी ही स्तब्धकारी हत्याओं के काल से असंभव छेड़छाड़ करता हूं इससे अधिक तो मैं सोच नहीं पाता फिर मैं सोचता हूं कि मां का क्या होगा प्रद्युम्न तो एक द्युति है उसकी आंख और आत्मा में जलती हुई एक स्पर्श है हर हवा पर सवार एक धोखा है किसी कोने से धप्पा करता हुआ कभी सोता हुआ, कभी जागता, बतियाता कभी दीदी के बाल खींचता कभी खाने में हील हुज्जत करता कभी दोपहर के ढाई बजे का चीन्हा हुआ पदचाप सा बजता हुआ और आलिंगनबद्ध तो हर क्षण वह भला कैसे पार पा सकेगी इन भुतहा स्वरों, रूप, रस और आभासी स्पर्श से उसे तो न जाने कितने दिवस मास तक मरना होगा निरंतर ही मरती रहेगी वह जीवन की हर छटा में कौन जाने उसे कब मिलेगी मुक्ति इस मृत्यु से या मिल भी सकेगी कि नहीं... ...


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