नई दिल्ली /वाराणसी   229
ग्रामीण जीवन,सभ्यता और हमारी समझ रुपेश पाण्डेय गांव यानि खेती, किसानी, गरीबी और गंदगी | यह एक सामान्य समझ बनी हुई है हमारी गांव के बारे में | गांव के प्रति एक सामान्य भारतीय की यह समझ कैसी है और कैसे बनी, यह सवाल विचारणीय है | इस समझ को लेकर पले-बढ़े नीति नियंताओं के हिसाब से गांव को ख़त्म कर नगरीकरण की प्रक्रिया को तेज करना क्या सभी समस्याओं का समाधान है ? ये सवाल अगर हमारे दिमाग में नहीं हैं तो हम भारत के उत्थान और गौरव को लेकर एक प्रकार का दिवा स्वप्न देख रहे हैं | हमें ध्यान रखना पड़ेगा कि हम भारत के जिस गौरवशाली अतीत का गुणगान करते हैं और पुनः भारत को सम्पूर्ण विश्व का आदर्श बनाना चाहते हैं, उसका आधार ग्रामीण समाज व्यवस्था रही है | भविष्य भी उसी पर आधारित हो सकता है | भारत के ग्रामीण जीवन, उसकी रचना और आज की गांवों की परिस्थिति, साथ में यह सवाल कि क्या आज भारत को परंपरागत ग्रामीण जीवन की ओर ही बढ़ना है या ग्रामीण जीवन का कोई और रास्ता हो सकता है ? जरुरी नहीं कि हम ग्रामीण जीवन का विचार करते समय दो सौ साल पुरानी ग्राम व्यवस्था में जीने की कल्पना करें| ऐसा कर पाएं तो अच्छा ही होगा लेकिन हम ऐसे जरूर जीने की कल्पना करें जिसमें हमारी सभ्यता,सौंदर्यबोध,प्रकृति और मानवता की क्षति न हो | इस सन्दर्भ में गाँधी जी का लिखा आज भी हमारा ठीक-ठीक मार्गदर्शन करता है | 16 मई 1936 को गांधी जी ने हरिजन में लिखा, " क्या भारत के गांव हमेशा वैसे ही थे जैसे कि वे आज हैं, इस प्रश्न की छानबीन करने का कोई लाभ नहीं होगा | अगर वे कभी इससे अच्छे नहीं थे, तो इससे हमारी पुरानी सभ्यता का, जिस पर हम इतना अभिमान करते हैं, एक बड़ा दोष प्रगट होगा | हर एक देशप्रेमी के सामने आज जो काम है, वह यह है कि नाश की प्रक्रिया को कैसे रोका जाए या दूसरे शब्दों में भारत के गांवों का पुनरुद्धार कैसे किया जाय ताकि किसी के लिए भी उसमें रहना उतना आसान हो जाय, जितना आसान वह शहर में माना जाता है | सचमुच हर एक देशभक्त के सामने आज यही काम है | ग्राम सुधार आंदोलन में केवल ग्रामवासियों के शिक्षण की बात नहीं है, शहरवासियों को भी उससे उतना ही शिक्षण लेना है | इस काम को उठाने के लिए शहरों से जो कार्यकर्ता आएं, उन्हें ग्राम मानस का विकास करना है और ग्रामवासियों की तरह रहने की कला सीखनी है | इसका यह अर्थ नहीं कि उन्हें ग्रामवासियों की तरह भूखे मरना है, लेकिन इसका यह अर्थ जरूर है कि जीवन की उनकी पुरानी पद्धति में आमूल परिवर्तन होना चाहिए |" गांधी जी जिस ग्राम मानस की बात करते हैं उसके बारे में गांधी जी के सहयोगी रहे धीरेन्द्र मजुमदार की पुस्तक 'समग्र ग्राम सेवा की ओर' पढ़ते हुए दो शब्दों पर ध्यान जाता है | दीनता और हीनता | सामान्य बोल चाल की भाषा में हम किसी मजबूर,लाचार,गरीब इंसान के लिए दोनों शब्द एक साथ इस्तेमाल करते हैं | ठीक से देखें तो दीनता और हीनता दो अलग बाते हैं | हीनता भाव की कमी का पक्ष है जबकि दीनता अर्थ की कमी का | भारतीय ग्रामीण समाज 'दीन' जरूर है लेकिन 'हीन' नहीं | वह भावों से भरा हुआ है | भारत के शहरी समाज में साधन सम्पन्नता के बावजूद भाव की घोर कमी है | वहां हीनता भरी हुई है | 'मानस' के बारे में रविंद्र शर्मा गुरूजी एक बढ़िया उदहारण देते थे दीनता और हीनता की बात इस उदाहरण से और स्पष्ट हो जाएगी | एक युवक गुरूजी से मिलने आते रहते थे | वो किसी संस्था में काम करते थे, जिसका काम ग्रामीण और आदिवासी कारीगरों के सामानों की प्रदर्शनी लगाना था | एकबार वे आदिलाबाद के गांवों में घूम कर वापस गुरूजी के पास आश्रम में आये तो तो गुरूजी ने पूछा क्या देखे | वे बोले गुरूजी गांव में बहुत गरीबी है | गुरूजी बोले लोगों ने तुम्हे कुछ खाने को दिया या नहीं | हाँ, गुरूजी खाना-पीना तो बहुत हुआ | हर एक के घर में कुछ न कुछ खाने को मिला | कुछ नहीं तो एक गिलास पानी तो मिला ही | गुरूजी बोले तुम क्या उनके रिश्तेदार थे या उनकी जाति वाले थे जो वो तुम्हारी इतनी खातिरदारी किये रिश्तेदार के माफिक | एक अजनबी को जो समाज इतना सम्मान दे वो धन से भले ही गरीब हो लेकिन मन से तो अमीर होगा न | क्या आज किसी शहर में किसीअजनबी को किसी घर में एक गिलास पानी मिल सकता है | अगर कोई अपार्टमेंट होगा तो गॉर्ड की इज़ाज़त के बिना तो कोई अजनबी घुस ही नहीं पायेगा घर तक पहुँचाना तो दूर | अगर किसी मोहल्ले में कोई किसी घर के सामने खड़ा होकर पुकारे तो भीतर से आवाज़ आएगी कोई है नहीं | पलट के दरवाजे पर खड़ा इंसान बोल दे कि माई/भाई आप तो हो न तो फिर भीतर से आवाज आएगी मालिक नहीं है जाओ | ये जो गांव में किसी भी व्यक्ति को मिलने वाला सम्मान है,अपनापन है, यह धन की अमीरी के कारण नहीं है यह भाव की अमीरी के कारण है | आज भी थोड़ा कम ज्यादा भाव हमें गांव में मिल ही जाता है भले ही अब गांव भी शहरों के रस्ते पर आगे बढ़ गए हैं | गुरूजी की बातचीत में 'मानस' ऊँचा करने के अनेक उदाहरण सुनने को मिलते थे | गांव का यह मानस सहज ही था | उसके लिए कोई विशेष पढाई नहीं थी | खेल में, बातचीत में, काम करते हुए, गीत गाते हुए,मनोरंजन करते हुए, भजन करते हुए,आपस के व्यवहार से सहज ही मानस ऊँचा करने का शिक्षण हो जाता था | आज जब यह प्रश्न हमरे सामने है कि लोग श्रम नहीं करना चाहते | गांव का सहज जीवन कठिन लगने लगा है जिसकी वजह से लोग गांव से पलायन कर रहे हैं तो मुझे लगता है कि ग्रामीण शिक्षण और जीवन को लेकर ग्रामोद्योग पत्रिका में जुलाई 1946 में लिखी गाँधी जी की बात को पुनः समझना जरुरी है | गांधी जी लिखते हैं कि "अगर हम यह चाहते हैं कि गांवों को न केवल जीवित रहना चाहिए बल्कि उन्हें बलवान और समृद्ध बनना चाहिए तो हमारे दृष्टिकोण में गांवों की प्रधानता में शहरों की तड़क-भड़क के लिए कोई जगह नहीं हो सकती | शहरी खेलों या मनोरंजनों की भी कोई जरूरत नहीं है | हम ग्रामीण प्रदर्शनी को तमाशे का रूप नहीं दे सकते और न उसे आय का साधन बना सकते हैं | उसे व्यापारियों के लिए उनके माल का विज्ञापन करने वाला साधन भी नहीं बनने देना चाहिए | वहां किसी तरह की विक्री नहीं होनी चाहिए | प्रदर्शनी को शिक्षा का माध्यम होना चाहिए, जिसे देखकर गांव वालों को ग्रामोद्योग सीखने और चलाने की प्रेरणा मिले | उसे मौजूदा ग्राम जीवन की त्रुटियां और कमियां दिखानी चाहिए और उन्हें सुधारने के उपाय बताना चाहिए | गांव में दो तरह के नमूने दिखाए जाएं, एक तो जैसे वे आज हैं और दूसरा सुधरा हुआ जैसे कि हम बनाना चाहते हैं | सुधरा हुआ गांव साफ-सुथरा होगा | घर, गलियां, सड़कें, आसपास की ज़मीन और खेत सब स्वच्छ होंगे | मवेशियों की हालत भी बेहतर होगी | किताबों,नक्शों और तस्वीरों के द्वारा यह दिखाया जाना चाहिए कि किन उद्योगों से ज्यादा आय हो सकती है और कैसे |" गांधी जी जब गांव के सुधार की बात करते हैं और आज के गांव की हालत का जो वर्णन करते हैं तो उनके दिमाग में लिओनेल कर्टिस की वो बात ध्यान में होती है जो उसने भारतीय गांवों का वर्णन करते हुए लिखा था | कर्टिस ने भारतीय गांवों का वर्णन करते हुए उन्हें 'कूड़े का ढेर' कहा था | गांधी जी ने इसका जिक्र हरिजन में एक मार्च 1936 को लिखे लेख में किया | साथ ही गांधी जी ने अपने इस लेख में कर्टिस की बात का जवाब देते हुए ग्राम सुधार आंदोलन के कार्यकर्ताओं से कहा हमें अपने गांवों को आदर्श बस्तियों में बदलना है | मैं गांवों को एक सुंदर दर्शनीय वस्तु बना देने की आकांक्षा रखता हूँ | मैं यहाँ एक बात और कहना चाहुंगा कि गांधी जी ग्राम सुधार आंदोलन के जिन कार्यकर्ताओं से गांव में काम करने की बात कर रहे हैं उनके व्यवहार के बारे में धीरेन्द्र मजूमदार को पढ़ते हुए एकबात ध्यान में आयी | वह यह कि ग्राम सेवा के लिए ग्राम श्रद्धा सबसे जरुरी है | हम जिसकी सेवा करना चाहते हैं उसके प्रति अगर हमारे मन में श्रद्धा नहीं होगी तो सेवा होना संभव नहीं होगा फिर हम उपकार या एहसान कर रहे होंगे | गाँधी जी ने जो यह सुंदर गांवों की कल्पना की यह महज़ कल्पना नहीं रही है | कभी हमारे गांव बहुत सुंदर ढंग से बसे रहे हैं | मुझे नहीं लगता कि रविंद्र शर्मा गुरूजी ने कभी गांधी जी की इन बातों को पढ़ा या किसी से सुना होगा लेकिन वे गांधी जी की कल्पनाओं के सुंदर गांवों, उसकी व्यवस्थाओं का दर्शन अपनी बातचीत में जरूर करा देते थे, जो अभी हाल-हाल तक मौजूद रही हैं | हमें गुरूजी से गांव की व्यवस्थाओं की एक बिलकुल अलग सी समझ मिलती है | मैं उस बातचीत को आगे बढ़ाऊं उससे पहले धर्मपाल जी की एक बात को जरूर कहना चाहूंगा जो वो अक्सर कहा करते थे | धर्मपाल जी की इस बात से हमें यह एहसास हो जायेगा कि हमें गांवों की जरूरत क्यों है या ग्रामीण जीवन में जीना क्यों जरुरी है | धर्मपाल जी अक्सर एक बात कहा करते थे कि हम अपनी सभ्यता से निकल कर किसी और सभ्यता में जीने लगे हैं | सभ्यता के सवाल पर जब हम गुरूजी को सुनते और समझते हैं तो धर्मपाल जी कि यह किसी और सभ्यता में चले जाने वाली बात बहुत ठीक ठंग से समझ में आती है | मेरा मानना है कि गांव में जीना ही अपनी सभ्यता में जीना और अपनेपन में जीना है जिससे आज हम बाहर आ चुके हैं | ऐसा नहीं है कि शहरों में जीने वाले अपनी सभ्यता में नहीं जी सकते लेकिन शहरी जीवन में वह मानस निर्माण नहीं होता जिसमें सभ्यता का अपनापन होता है | गुरूजी कहते हैं कि सभ्यता के मूल में होती है अर्थव्यवस्था और संस्कृति के मूल में होती है सौंदर्य दृष्टि | अब इस नजरिये से हम जब शहरी जीवन की अर्थव्यवस्था को देखते हैं तो यह पूरी तरह से अभारतीय दिखती है | आज के हमारे गांव भी इसी असभ्य अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ चले हैं | गुरूजी के अनुसार कोई इंसान कहीं भी रहकर क्यों जीना चाहेगा ? जहाँ उसके आहार और गौरव की सुरक्षा होगी वहीँ कोई आदमी जीने का सोचेगा | हमारे गांव में यह सहज रहा है | गांव यानि जहाँ हर एक के आहार की सुरक्षा और गौरव का मानस रखने वाले लोग रहते हैं,वह गांव है | गांव कि क्या इससे सरल भी कोई परिभाषा हो सकती है | अगर हम इस कसौटी पर देखें तो हमारे शहर क्या ये दोनों भी चीज हमें दे पा रहे हैं, शायद नहीं | शहरों में गौरव और सम्मान की बात भी आर्थिक सम्पन्नता से आंकी जाती है | लोग किसी तरह मर खप कर अपने लिए रोटी का जुगाड़ भर कर पा रहे हैं | लेकिन फिर भी गांवों से शहरों की ओर लोगों का पलायन हो रहा है तो उसकी एकमात्र वजह है आहार की सुरक्षा की उम्मीद | हमारी ग्रामीण व्यवस्था में से लोगों को आहार की सुरक्षा देने वाली व्यवस्था टूट गयी है | यहाँ हमें एक बात का और ध्यान रखना पड़ेगा | पिछले चार-पांच सौ सालों में हम तीन प्रकार की व्यवस्थाओं में जिए हैं | एक, जमींदारी से पूर्व की व्यवस्था जिसमें बहुत कुछ अच्छा सा रहा है | दूसरा, जमींदारी की व्यवस्था जिसमें किसानों और कारीगर समाज के साथ घोर अत्याचार हुआ है, केवल विदेशियों द्वारा नहीं अपने लोगों द्वारा भी सत्ता और पुरस्कारों के लोभ में और तीसरा, जमींदारी के बाद की व्यवस्था | आज़ादी के बाद जमींदारी ख़त्म होने से बहुत सारे लोगों को लगा है कि हमारी आज़ादी तो अभी आयी है | वो किसी भी तरह से गांव के अत्याचारी जीवन से निकल भागने के लिए शहरों की ओर पलायन किये हैं | हमारी सभ्यता का यह संकट गहरा है | हमारे गांव कला,आध्यात्म,विज्ञान और सामाजिक अर्थशास्त्र के जिन चार पायों पर टिके थे वे इस जमींदारी व्यवस्था और आधुनिक औद्योगीकरण में चरमरा कर टूट गए हैं | कभी भारत, बिना मजदूर,दुकान और पुलिस वाला देश रहा है | होटल और लॉज बीसवीं सदी के शुरू में आये | क्या आज हम इन चार के बिना देश की कल्पना भी कर सकते हैं | कभी हमारा जीने का सूत्र था- "जीने के लिए मेरा गांव मेरी दुनियां और ज्ञान के लिए पूरी दुनियां मेरा गांव" | आज हमारा रास्ता क्या होगा ? क्या हम अपनी परम्परागत व्यवस्था में जायेंगे या आधुनिकता में ही कुछ सुधार कर अपने गांवों को बचाएंगे और उसमें जियेंगे | मेरे हिसाब से से तो इसका बहुत ही सरल उपाय है | हमारे मौलिक अधिकारों की तरह ही हमारी मौलिक जरूरतें हैं | हर एक इंसान की या जीव की तीन मौलिक जरूरतें हैं | हर एक को शुद्ध भोजन,शुद्ध जल और शुद्ध वायु चाहिए | मैंने यहाँ शुद्धता पर जोर दिया है | वह इसलिए कि अगर हमें शुद्ध नहीं चाहिए होता तो हमारे घरों में जल को शुद्ध करने के यंत्र नहीं लगे होते | हमारी चाहत इन तीनों को शुद्ध रूप में ही प्राप्त करने की है | ये तीनों केवल और केवल ग्रामीण जीवन में श्रम पूर्वक जीने से ही प्राप्त हो सकता है | इसका कोई विकल्प नहीं है | कुछ लोग पैसे से इन्हे खरीद कर प्राप्त करना चाहेंगे तो समज में हिंसा और असमानता बढ़ेगी | हम खेती छोड़ देंगे तो सरकारें कंपनियों से खेती कराएँगी | सेवा में भी मेवा ढूंढने वाले व्यापारी हमें शुद्ध अन्न,जल उपलब्ध करा रहे हैं या नहीं इसका अविश्वास सदैव बना ही रहेगा | साथ ही मैं यह भी कहना चाहूंगा कि आज जो यह चारो ओर बचाओ बचाओ का शोर लगा हुआ है उसमें सेवा और कर्त्वयनिष्ठा की कमी दिखती है | सेवा और कर्तव्य पालन से ही बचने का काम संभव है न की आंदोलन या एनजीओ से | गाय बचाने के लिए गाय पाल कर उसके साथ जीना पड़ेगा | खेती बचानी है तो खेती करनी पड़ेगी | कुंए,तालाब,नदी बचाना है तो अपने जीवन में इनको स्थान देना पड़ेगा | हम कुंओं,तालाब या नदी के जल के साथ जिए बिना पानी बचाने की बात करेंगे तो हमें पुरस्कार मिल सकता है लेकिन कुछ बचेगा नहीं | इस सभ्यता दृष्टि से देखने और जीने में समाधान संभव है | ...


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