नई दिल्ली/वाराणसी   341
आपदा और युद्ध में विपक्ष का व्यवहार ही तय करता है राष्ट्र का भविष्य आज़ादी के बाद के भारत के इतिहास में अभी तक ऐसा वक्त कभी नहीं आया था जैसा इस समय है। आपदा और युद्ध में अब तक के इतिहास में सत्ता और समाज का व्यवहार हमेशा परस्पर सहयोगी का ही रहा है। आज भी है। 1962 में चीन युद्ध को छोड़कर विपक्ष का भी व्यवहार सहयोगी का ही रहा है। चीन युद्ध के समय ही केवल विपक्ष ने नेहरू की नीतियों की आलोचना की थी। उसे नेहरू की भूल का परिणाम बताया था। लेकिन तब भी विपक्ष देश के साथ था। विपक्ष का मोदी के नेतृत्व वाली राजग सरकार के साथ शत्रुता पूर्ण रवैया केवल #कोरोना संकट के समय ही नहीं है। बात पुलवामा के आतंकी हमले की हो या सर्जिकल स्ट्राइक की। विपक्ष का रवैया केवल मोदी विरोधी ही नहीं एक तरह से भारत विरोधी भी रहा है। सेना के अभियानों पर सवाल उठा कर विपक्ष ने उनका मनोबल तोड़ने का काम किया। आतंकवादी नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए की गयी नोटबंदी के समय भी यही रवैया था। कश्मीर से धारा 370 ख़त्म करने जैसे राष्ट्रिय हित के मसले को भी विपक्ष ने सांप्रदायिक मसले के रूप में परिभाषित कर सरकार की आलोचना की।।नागरिकता कानून अधिनियम में संसोधन को लेकर तो विपक्ष का रवैया पागल हाथियों जैसा रहा। संसद से लेकर सड़क तक विपक्ष ने देश के मुसलमानों को भड़काकर नो तांडव किया उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं हो सकती। यहां तक कि विपक्ष के एक वर्ग ने अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी #CAA को मुद्दा बनाकर देश को शर्मशार करने की कोशिश की। ये अलग बात है कि उन्हें न तो देश में और न ही विदेश में कहीं तवज्जो मिली। कोरोना संकट के समय जिस प्रकार का रवैया विपक्ष ने अपना रखा है वह केवल शर्मिंदा करने वाला नहीं बल्कि निहायत घटिया भी है। यह अलग बात है कि समाज जैसे हमेशा आपद्काल में सरकारों के साथ रहा है वैसे ही अब भी है तमाम भड़काने की कोशिशों के बावजूद। विपक्ष के इस रवैये से लगता है कि अब उनके लिए राष्ट्र प्रथम न होकर प्रधानमंत्री मोदी प्रथम हैं और वह उन्हें किसी भी सूरत में सफल प्रधानमंत्री के रूप में नहीं देखना चाहता। मसला चाहे तबलीगी ज़मात के दुर्व्यवहार पर पर्दा डालने का हो या फिर प्रधानमंत्री केअर फण्ड का, विपक्ष का रवैया राष्ट्रविरोधी-समाजविरोधी दिखाई दे रहा है। जब मैं विपक्ष कह रहा हूँ तो उसे आप, कांग्रेस, कम्युनिस्ट, नक्सली, सेक्युलर, कथित गाँधीवादी, विदेशी चंदे से चलने वाले NGO और इस्लामिस्ट, इन सबको एक में रखकर देखिये। विपक्ष का यह रवैया कोरोना के बाद के हालातों की ओर इसारा करते हैं। कोरोना का समय तो जैसे तैसे निकल जायेगा लेकिन राष्ट्र के विकास का मार्ग अवरुद्ध करने की विपक्ष की नीति देश को बहुत पीछे ले जा सकती है। ...


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