नई दिल्ली   313
(जो लोग साहित्य में रुचि रखते हैं, उन्हें अभिषेक कश्यप का नाम बताने की ज़रूरत नहीं है। हम एक-दूसरे को जानते हैं। अलबत्ता, कभी उनकी विचारधारा जानने की कोशिश मैंने नहीं की। मेरे लिए बस इतना पर्याप्त है कि वे सोचने-विचारने वाले नेक इनसान हैं। बीते दिनों फेसबुक पर उन्होंने एक पोस्ट की, जिसे देखकर मैंने एक टिप्पणी की। इस टिप्पणी के जवाब में अभिषेक जी ने एक पोस्ट अलग से लिखी। कल उनकी पोस्ट पर मेरी निगाह पड़ी तो मुझे भी जवाब देने की ज़रूरत लगी। इस चर्चा में आपका स्वागत है। बात जैसी भी हो, जितने भी तेवर में हो, कोई परेशानी नहीं, पर ईर्ष्या-द्वेष को परे रखने की कोशिश करेंगे तो अच्छा रहेगा।) ----- अभिषेक कश्यप की पोस्ट April 9 at 12:33 PM फेसबुक मित्रों के लिये एक सूचना : ----------------------------------------- फेसबुक की दुनिया के जाने/अनजाने मित्रो ! मुझे निम्न लोग FB मित्रता संदेश न भेजें और ऐसे लोग अगर मित्रता सूची में अब भी रह गए हैं तो अविलम्ब दूर हो जाएँ/मेरी सूची से निकल लें. 1. अंधभगत/ ज़ोंबी. 2. दिमागी दिवालियेपन के शिकार वे लोग, जिनके लिए व्यंग्य/हास्यबोध का मतलब फूहड़ता है. 3.जो अपनी मां-बहन को भी रात में गाली दे सकते हैं और सुबह 'जय श्री राम' के नारे लगाते हैं. 4.जिनके लिए गोदी जी या कोई व्यक्ति विशेष ही देश है, भगवान है. 5.जिनकी नजर में विपक्ष को सवाल पूछना ही नहीं चाहिये, सिर्फ सरकार की जय-जयकार करनी चाहिए. 6. जिन्हें ज्ञान TV/व्हाट्सएप्प और XJP के IT सेल से मिलता है और जिन्हें अंधविश्वास, गो मल-मूत्र आदि की महिमा पर भरोसा है. 7.जो अनर्गल प्रलाप करते हैं. जिनके लिए धर्म या जातिवादी गौरव लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान से सर्वोपरि है। 8. असहमति जताने का मतलब जिनके लिए कुतर्क और गाली-गलौज़ करना है़. 9.जाहिल हिन्दू, जाहिल मुसलमान, अन्य अंध-धर्मावलंबी कथित पढ़े-लिखे अर्थात् ‘कुपढ़ जाहिल’ भी मुझे रिक्वेस्ट न भेजें और जो मित्रता सूची में बाकी बचे रह गए हैं, तुरंत निकल लें. 10.जिन्हें लगता है कि थाली-ताली पीट कर और दीया जला कर कोरोना या किसी बीमारी का इलाज किया जा सकता है और ऐसा नहीं करता, वह गलत है. 11.जातिवादी लोग, जो सोचते हैं कि ब्राह्मण, राजपूत या कोई भी जाति/धर्म श्रेष्ठ है. 12.सिर्फ विज्ञान सम्मत दृष्टि रखनेवाले तार्किक और विचारवान लोगों का स्वागत है, जिनकी प्रथम आस्था देश के संविधान में है और जो सभ्य नागरिक समाज के निर्माण में अपना बौद्धिक योगदान देना चाहते हैं. सधन्यवाद ----मेरी टिप्पणी (सन्त समीर)---- बात विचारणीय है, पर मेरी क्या हैसियत होगी अभिषेक जी? मैं मोदी जी को जूते भी दिखाता रहता हूँ और कुछ अच्छा लग जाए तो माला भी पहना देता हूँ। मुझे 'जय श्रीराम' और 'लाल सलाम', दोनों में हद दर्जे के कुढ़मग़ज़ और समझदार मिल जाते हैं। गाय, गोबर, गोमूत्र को धार्मिक आस्था के तौर पर परले दर्जे का उल्लुआपा भले मानूँ, पर इनकी कई उपयोगिताएँ भी मैं साफ़-साफ़ महसूस करता हूँ। थाली पीटकर और दीया जलाकर कोई कोरोना भगाए तो यह मूर्खता नहीं, महामूर्खता है, पर कोई एकजुटता या जज़्बा ज़ाहिर करने के लिए करे, तो इसे वैसे ही समझता हूँ, जैसे कि लोग दूसरे पर्व-त्योहार वग़ैरह मनाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में आए दिन मोमबत्ती जलाने की जो परम्परा शुरू हुई है, वह दीया जलाने से कहीं ज़्यादा बुरी लगती है। देश के संविधान में भी बहुत ज़्यादा आस्था नहीं व्यक्त कर पाता, क्योंकि यह काम का कम, 'चूँ-चूँ का मुरब्बा' ज़्यादा लगता है। यह कैसा संविधान, जो एकदम स्पष्ट केस को भी दस साल लटका दे और इतने दिनों में दुर्दान्त अपराधी पीड़ित से ज़्यादा नेक नज़र आने लगे। बाक़ी बातें तो ख़ैर आपकी ठीक ही हैं। ----अभिषेक जी की जवाबी पोस्ट---- मेरा जवाब...कुछ बातें, जो मेरे ध्यान में न रहीं हों, वाद-विवाद-संवाद की स्वस्थ परम्परा के तहत आप मित्रगण भी इसमें जोड़ सकते हैं - संत समीर जी, आपसे परिचित हूं, इसलिए आपके ‘वैचारिक द्वैध’ को ले कर अचरज में हूं। आप कहते हैं-‘‘मैं मोदी जी को जूते भी दिखाता रहता हूं और कुछ अच्छा लगे तो माला भी पहना देता हूं।’’ इससे तो यही लगता है कि आप मौजूदा राजनैतिक परिदृश्य को संपूर्णता में नहीं, टुकड़े-टुकड़े में देखने के आदी हो चले हैं। यहां मैं आपकी या किसी व्यक्ति विशेष की बात नहीं कर रहा लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि ऐसी ‘मध्यमार्गी प्रवृत्ति’ का राजनैतिक अवसरवाद और सत्ता के लाभ-लोभ से गहरा संबंध रहा है। हमारे कई समाजवादी नेता इसके शिकार हुए और अंतत: उन्हें दक्षिणपंथ की शरण में ‘निर्वाण’ की प्राप्ति हुई है। यह तो कुछ ऐसा ही हुआ कि मैं गांधी और गोडसे, दोनों के साथ हूं। गांधी की हत्या के लिए मैं गोडसे (गोडसेवादियों) को जूते दिखाऊंगा लेकिन माला भी पहनाऊंगा ! अपने घनघोर राजनैतिक अवसरवाद के एजेंडे पर चलते हुए दक्षिणपंथी सत्ता यही तो कर रही है। वह ‘गोडसे भक्त साध्वी’ को टिकट दे कर संसद पहुंचाती है फिर जब साध्वी गोडसे को सरेआम नायक की उपाधि से विभूषित करती है तो साहेब उन्हें ‘दिल से माफ न करने’ का मैलोड्रामा रचते हैं। कोई भी इसमें निहित मंशा को आसानी से पहचान सकता है। जिस तरह गांधी और गोडसे, साथ-साथ नहीं चल सकते, उसी तरह ‘जूते दिखाने और माला पहनने’ की प्रवृत्ति को वही समझा जाएगा, ऊपर जिसकी मैंने चर्चा की। आपने लिखा है-‘‘जय श्री राम’ और ‘लाल सलाम’, दोनों में हद दर्जे के कुढ़मगज़ मिल जाएंगे।’’ दिक्कत यही है। जब आप विचार और दृष्टि की समग्रता की बजाय व्यक्ति पर केंद्रित हो कर देखेंगे/परखने लगेंगे तो निश्चय ही विचलन के शिकार होंगे। गाय, गोबर, गोमूत्र की पारंपरिक उपयोगिताएं हम सब जानते हैं लेकिन जब आप गोबर से उपले बनाने की बजाए उसे ‘पौष्टिक आहार’ मानने लगेंगे या बिना किसी वैज्ञानिक/चिकित्सकीय प्रमाण के गोमूत्र को किसी वायरस की शर्तिया दवा मान लेंगे तो ‘उपयोगिता का यह आग्रह’ सनक, जहालत या फिर प्रोपगेंडा ही माना जाएगा। जब वैश्विक महामारी से रोज़ दुनिया भर में हजारों की तादाद में लोग मर रहे हों, जब राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन से देश के करोड़ों बेरोजगार, बदहाल, निर्धन नागरिकों के रोजगार छिन गए हों, वे भूखे-प्यासे सैकड़ों-हजारों मील का सफर तय करने को मजबूर कर दिए गए हों, एक वक्त की रोटी के लिए तरस रहे हों, भूखे मरने की आशंका से ग्रस्त हों...तब ज़ज़्बे की नहीं, करूणा की जरूरत होती है। ऐसे कठिन समय में थाली-घंटेबाजी या दीये जला कर ख़ुशी मनाना...आपके शब्दों में कहें तो एकजुटता और ज़ज़्बा जाहिर करना एक मनुष्य-विरोधी कृत्य ही माना जाएगा! जैसा कि आपने कहा, ‘पर्व-त्योहार’…क्या यह पर्व-त्योहार मनाने का समय है ? जहां तक संविधान की बात है, हम सब जानते हैं, उन्होंने संविधान में संशोधन की गुंजाइश रखी और समय-समय पर इसमें बदलते समय के अनुरूप तमाम संशोधन होते रहे हैं। आगे भी होंगे। संविधान से संचालित लोकतांत्रिक व्यवस्था में गड़बड़ियों हो सकती हैं। दरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत और प्रभावी बनाने की है। इसके इतर जो अधिनायकवादी/फासीवादी शासन को लोकतांत्रिक व्यवस्था के विकल्प के रूप में देखते हैं, उन पर तरस ही खाया जा सकता है. -अभिषेक कश्यप -------------- -----मेरा जवाब (सन्त समीर)----- भाई अभिषेक जी! आपने शुरू में ही मेरे वैचारिक द्वैध पर अचरज जताया है। इससे बड़ा अचरज मुझे हो रहा है कि मेरी बातों में आपको आख़िर किस कोण से वैचारिक द्वैध दिखाई दे गया? अगर आपको लगता है कि किसी एक व्यक्ति, वर्ग या विचारधारा का पक्षधर होना वैचारिक स्पष्टता है, या कि किसी व्यक्ति के अच्छे गुणों को अच्छा कह देना और बुरे गुणों को बुरा कह देना वैचारिक द्वैध है, तो इस तरह की दृष्टि को मैं मानसिक बीमारी मानता हूँ। विचारधाराओं की ज़िद को भी मैं मानसिक बीमारी मानता हूँ। जितने भी दङ्गे-फ़साद हैं, सबके मूल में विचारधाराओं की ज़िद ही है। असल में जब हम किसी विचारधारा को मानने लगते हैं तो इसीलिए कि वह हमें सबसे बेहतर लगती है। ऊपर से हम कहें न कहें, पर भीतर की हमारी चाहत होती है कि इसी विचारधारा को दुनिया भर के सारे लोग मानें। यह भी कि सही मायने में इसी से विश्व-कल्याण होगा। असली दिक़्क़त यही है। विवाद और झगड़े यहीं से शुरू होते हैं। याद रखिए कि विचारधाराएँ हमारी-आपकी देन हैं, आसमानी नहीं। हमारे प्रगतिशील साथियों ने कुछ ऐसी स्थापनाएँ बनाने की कोशिश की हैं, जैसे कि एक ही आदमी में कुछ अच्छी और कुछ बुरी, दोनों तरह की बातें साथ-साथ नहीं रह सकतीं। और कि जैसे शोषक और शोषित, दोनों अलग-अलग रूप में आसमान से टपकाए गए हैं। याद रखिए, वैज्ञानिकता-वैज्ञानिकता रटने से ही कोई विचारधारा वैज्ञानिक नहीं हो जाती। आपने लिखा है कि मैं मौजूदा राजनैतिक परिदृश्य को सम्पूर्णता में नहीं, टुकड़े-टुकड़े में देखने का आदी हो चला हूँ, जबकि मुझे ठीक इसी का उलटा लगता है कि जब कोई एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति या विचारधारा में सिर्फ़ कोई एक ही पक्ष देख पाता है तो असल में चीज़ों को टुकड़े-टुकड़े में देखने का आदी तो वह है। यह कुछ वैसे ही है, जैसे हिन्दी फ़िल्मों के नायक और खलनायक। अच्छा पूरा अच्छा, और दुष्ट पूरा ही दुष्ट। अगर हम ऐसा मान लें कि इस दुनिया में कुछ ख़ास तरह के लोग पूरी तरह दुष्ट ही होते हैं और एक दूसरी तरह के लोग पूरी तरह अच्छे, तो इससे बड़ा नियतिवाद और कुछ नहीं है। आप कहते हैं कि ‘ऐसी (यानी मेरी तरह की) ‘मध्यमार्गी प्रवृत्ति’ का राजनैतिक अवसरवाद और सत्ता के लाभ-लोभ से गहरा सम्बन्ध रहा है।’ अब बात यह कि इसमें किस बात का मध्यमार्ग? असल में हमारी परेशानी यह है कि हम सीधे बात करने के बजाय पहले कुछ जुमले गढ़ते हैं, फिर बात आगे बढ़ाते हैं। मसलन, हम पहले ‘दक्षिणपन्थ’, ‘मध्यमार्ग’ टाइप के शब्दों को गाली के रूप में स्थापित करते हैं और फिर किसी पर इसे चस्पाँ कर देते हैं। ऐसा करके किसी को सिरे से ख़ारिज करना आसान हो जाता है। प्रकृति विचारधाराओं के हिसाब से नहीं चलती। मनुष्य के अलावा दुनिया का कोई जीव-जन्तु विचारधारा की बीमारी नहीं पालता। हमारे पास सोचने-विचारने वाला दिमाग़ है तो हम अपने अलग-अलग खाँचे बनाते हैं और भाँति-भाँति की विचारधाराएँ गढ़ते हैं। शरीर में एक भी संरचना प्रकृति ने ऐसी नहीं बनाई, जो विचारधाराओं के हिसाब से अलग-अलग हो। नींद में दिमाग़ शान्त हो जाता है तो विचारधाराओं का अता-पता नहीं होता। विचारधारा की ज़िद में खाने-पीने का तरीक़ा कितना भी अलग करने की कोशिश करें, पर हलक के नीचे उतरते ही आहार का पाचन सबका एक जैसा ही होता है। फिर मैं कह रहा हूँ विचारधारा कितनी भी अच्छी हो, अगर वह ज़िद के रूप में दिमाग़ पर सवार हो तो मानसिक बीमारी है। विचारधाराएँ जीवन को टुकड़े-टुकड़े में देखने की आदी बनाती हैं, जबकि इस संसार को समझना हो तो समग्रता की दृष्टि चाहिए। अब बात यह कि किसी समाजवादी नेता का निर्वाण दक्षिणपन्थ की शरण में हुआ तो यह समाजवादी जानें, इससे मेरा क्या लेना-देना? यों भी वादों में मेरा कोई विश्वास नहीं है। सच कहीं हो, उसे मैं नकार नहीं सकता और झूठ कहीं हो, उसे स्वाकीर नहीं सकता। ‘राजनैतिक अवसरवाद और सत्ता के लाभ-लोभ से गहरा सम्बन्ध’ कहकर आप क्या कहना चाहते हैं? अगर मेरे लिए कहना चाहते हों कि मैं मध्यमार्गी हूँ, इसलिए मैं भी ऐसा ही होऊँगा, तो पहली बात तो यह कि अध्यमार्गी-मध्यमार्गी होने में मेरा कोई भरोसा नहीं। दो टूक कहता और लिखता हूँ। आप तो बस इसकी शिनाख़्त फेसबुक जैसी चीज़ों से भी कर सकते हैं। कभी भी मेरी कोई पोस्ट किसी की चापलूसी में लिखी गई हो तो बताइए। कभी कोई सम्मान-पुरस्कार लेने की जुगत लगाई हो तो वह भी बताइए। यों, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई समाप्त करते-करते ही ऐसे काम कर गुज़रा हूँ कि लोगों ने सुझाव दिया कि फलाने-फलाने से कह दूँ तो दो-चार बड़े पुरस्कार मिल जाएँगे। वैश्वीकरण की बहस चलाने में थोड़ा नहीं, बहुत बड़ा योगदान रहा है मेरा और मेरे तमाम साथियों का। दस-बारह साल तक देश के तमाम अख़बारों को इस मुद्दे पर एक फ़ीचर एजेंसी चलाकर जाने कितनी समाग्री उपलब्ध करवा चुका हूँ। अपनी तारीफ़ करनी नहीं चाहिए, पर पहचान के लिए मर-मिट रही अपनी लेखक बिरादरी को देखिए और मुझे देखिए, फिर कहिए कि अवसरवाद क्या है? वह समय मुझे याद आ रहा है जब ‘नवभारत टाइम्स’ में छपे मेरे लेख ‘साहित्यकारों क तीर्थ में साहित्य का चकलाघर’ पर देश की संसद में हङ्गामा हुआ और कुछ ही दिन बाद ‘तोड़ना ही होगा सरकारी जुए का तिलिस्म’ पर उत्तर प्रदेश की विधानसभा में। लोग मेरा कूड़ा-कचरा कुछ भी छापने को तैयार थे, पर मैंने कुछ समय के लिए लिखना इसलिए बन्द कर दिया कि मुझे सेलीब्रिटी नहीं बनना। उम्र छोटी थी, पर मेरे कहने पर रामविलास शर्मा जैसे व्यक्ति ने अपने हाथ से हिन्दी के सवाल पर अपनी हैण्डराइटिङ्ग में लेख लिखकर भेजा, जबकि वे सार्वजनिक रूप से लिखना बन्द कर चुके थे। क्या यह अवसरवाद है कि मैं हर विचारधारा के व्यक्ति को एक मञ्च पर लाकर खड़ा कर सकता था। मुद्राराक्षस, अच्युतानन्द मिश्र, मन्नू भण्डारी, प्रो. रघुवंश, प्रभाष जोशी, रामबहादुर राय, प्रियदर्शन, नरेश मेहता...किसी ने कभी मुझे मना नहीं किया। कहानीकार दूधनाथ सिंह ने कहा कि वैसे तो मैं वहाँ जाना पसन्द नहीं करता, पर तुम कह रहे हो बेटा, तो मैं ज़रूर आऊँगा...और वे आए। प्रगतिशीलता की बीमारी का हाल समझने के लिए एक सच्ची घटना बताता हूँ। जैसे आपने लॉकडाउन की वजह से बदहाल हुए लोगों का ज़िक्र करते हुए ऐसे समय में थाली-घण्टेबाज़ी और दीये जलाने की लानत-मलामत की है, वैसे ही जब मक़बूल फ़िदा हुसैन का मामला उठा था तो मैंने भी समस्याओं के अम्बार के बरअक्स कला का धर्म याद दिलाने की कोशिश की थी तो प्रगतिशीलता के नामी धुरन्धरों ने मुझे दक्षिणपन्थी और न जाने क्या-क्या घोषित कर दिया। एक भलेमानुष पुरुषोत्तम अग्रवाल ने तो ‘हिन्दुस्तान’, ‘राष्ट्रीय सहारा’ और ‘पूर्वग्रह’ जैसी पत्र-पत्रिकाओं में मेरी लानत-मलामत करते हुए लेख ही लिख डाले। मज़ा यह कि किसी ने मुझे न तो कभी देखा था और न ही मेरी विचारधारा की पड़ताल की थी। इन महापुरुषों को पता ही नहीं था कि वे उस लड़के से उलझ रहे हैं, जो ख़ुद तब जनवादी लेखक सङ्घ का सदस्य था। ख़ैर, मेरे जवाबी लेख के बाद सन्नाटा खिंचा। इस घटना से मुझे समझ में आया कि प्रगतिशील तबक़ा नैरेटिव रचने में दक्षिणपन्थियों से ज़्यादा माहिर है और कुढ़मग़ज़ है। बिना जाँचे-परखे घर में बैठकर फ़तवे जारी करता है। इतिहासकार धर्मपाल से जुड़ी एक दूसरी घटना से भी प्रगतिशील सोच की वैज्ञानिकता का खोखलापन मुझे समझ में आया। पता नहीं किस खुन्दक में प्रगतिशील साथी इतिहासकार धर्मपाल को आज भी दक्षिणपन्थी घोषित करके उन्हें ख़ारिज करते रहते हैं? मैं धर्मपाल जी के साथ सेवाग्राम आश्रम में लम्बे समय तक रहता रहा हूँ। अच्छी तरह जानता हूँ कि धर्मपाल जी इञ्च भर भी वैसे नहीं थे, जैसा साम्यवादी भाई लोग कहते रहे हैं। आप किसी को नज़दीक से देखेंगे नहीं और मनगढ़न्त धारणाएँ बनाएँगे तो इसे परले दर्जे का उल्लुआपा न कहें तो क्या कहें? इसे मैं गाँवों में डायन कहकर मार दी जाने वाली महिलाओं की तरह देख रहा हूँ। पहले किसी को डायन कह-कहकर उसे सबकी नज़रों में ग़लत मनवा लो और फिर उसे मार देने में भी सबकी सहमति मिल ही जाएगी। याद आया कि एक बार ‘काजू भुने प्लेट के’ धुर मार्क्सवादी रचनाकार अदम गोण्डवी दिल्ली आए तो उनके भतीजे दिलीप जी का फ़ोन आया कि चाचाजी आए हैं और आपसे मिलना चाहते हैं। तब के हमारे सम्पादक गोविन्द सिंह जी थे। उनको पता चला कि तो उन्होंने कहा कि हम लोग भी अदम जी से मिलने चलेंगे, पर अदम जी ऐसे प्राणी थे कि ख़राब तबीयत के बादजूद ख़ुद ही मेरे दफ़्तर चले आए। मैंने उस समय उनका साक्षात्कार लिया, जो उनकी ज़िन्दगी का आख़िरी साक्षात्कार था। उन्होंने बातचीत में कहा—‘‘हम प्रगतिवादियों ने क्रान्ति के नाम पर बस यही उपलब्धि हासिल की कि एक-दूसरे की बीवियाँ बदल लीं।’’ इसे मैंने छापा। सङ्केत गहरे थे, जो आज भी महसूस किए जा सकते हैं। एक बात यह भी समझिए। अगर कोरोना प्रकरण में परम्परा में पहले से मौजूद दीया जलाना मूर्खता और अन्धविश्वास (हालाँकि मोदी जी ने साफ़ कहा कि यह एकजुटता दिखाने के लिए है) है, तो किसी हादसे पर एकजुटता दिखाने के लिए ही इण्डिया गेट पर मोमबत्ती जलाना क्या है? माना कि दीया जलाने से कोरोना भाग नहीं जाएगा, तो क्या मोमबत्ती जलाने से मरे लोग ज़िन्दा हो जाएँगे? ज़रूरी नहीं कि अन्धविश्वास सिर्फ़ दक्षिणपन्थी हरकतों में ही हों। ख़ैर... आपने लिखा है कि…‘‘ऐसे कठिन समय में थाली-घण्टेबाज़ी या दीये जलाकर ख़ुशी मनाना...आपके शब्दों में कहें तो एकजुटता और जज़्बा जाहिर करना एक मनुष्य-विरोधी कृत्य ही माना जाएगा!’’ आपकी इस भावना की क़द्र की जा सकती है, पर यह कहते हुए यह भी याद कीजिए कि इस कठिन समय में अपने घर में रहते हुए आपने कितनी बार हँसने-मुस्कराने की कोशिश की है। अगर लोगों की तकलीफ़ें देखकर आपके चेहरे से हँसी ग़ायब हो गई है और आप लोगों को मदद पहुँचाने के लिए भाग-दौड़ करने में लगे हैं तो मैं आपका अभिनन्दन करता हूँ कि आप अपनी भावना के हिसाब से चल रहे हैं, लेकिन जब बाहर मुश्किल में फँसे तमाम लोगों को रोना आ रहा है, तो ऐसे में अगर एक भी दिन आपके चेहरे पर हँसी आई, तो आपको ख़ुद को भी मनुष्य-विरोधी कृत्य वालों की जमात में शामिल करना पड़ेगा। मैं जब यह कह रहा हूँ तो अपने और अपने मुहल्ले के स्तर पर साथियों के साथ दवा, राशन वग़ैरह बाँटने के लिए तत्पर हूँ। यह भी याद कीजिए कि जितने लोगों ने थालियाँ पीटीं या दीये जलाए, वे सब क्या सचमुच मनुष्य-विरोधी लोग थे। फिर तो करोड़ों लोगों को देश-निकाला दे देना चाहिए। अगर मान लें कि लोग थालियाँ पीटकर या दीये जलाकर जश्न मना रहे थे, तो सवाल है कि आख़िर वे किस बात का जश्न मना रहे थे? यदि कुछ लोग ऐसा कर भी रहे थे, तो जो लोग सचमुच पूरी ईमानदारी से एकजुटता दिखाने के प्रतीक के तौर पर ही...और किसी पार्टी नहीं, बल्कि देश के प्रधानमन्त्री की अपील मानकर ऐसा कर रहे थे, उनके लिए क्या कहेंगे? असल में हम विचारधारा के वशीभूत बड़ी आसानी से चीज़ों के सरलीकरण के आदी हो गए हैं। अब बात यह अभिषेक जी कि इस पूरे प्रकरण में गान्धी और गोडसे का उदाहरण किस हिसाब से आपने दिया? इसका क्या तुक बनता है यहाँ? क्या आपको लगता है कि मैं गोडसे की जय-जयकार करने वाला व्यक्ति हूँ? गम्भीरता से सोचिए, क्या यह प्रसङ्गेतर और बचकाना उदाहरण नहीं लग रहा? मोदी जी की ही बात करें तो क्या वे गान्धी या गोडसे में से कोई एक माने जा सकते हैं? अगर ऐसा कोई मानता है तो यह यू. आर. अनन्तमूर्ति जैसे समझदार के बचकाने बयान जैसा ही है कि ‘अगर मोदी देश के प्रधानमन्त्री बन गए तो मैं देश छोड़ देना पसन्द करूँगा।’ दिल ज़रा बड़ा कीजिए और हर कहीं अच्छाई को अच्छाई और बुराई को बुराई के रूप में स्वीकार या अस्वीकार करने का माद्दा पैदा कीजिए। मैं नहीं कह रहा कि गान्धी और गोडसे, दोनों के बगल में एक साथ खड़े होइए, पर गान्धी को ज़रूर याद कीजिए, जो अँग्रेज़ों के ख़िलाफ़ पूरी ताक़त से लड़ाई लड़ते हैं, पर उनकी अच्छाई और सच्चाई के साथ खड़े होने में उन्हें कोई परेशानी नहीं है। गान्धी अँग्रेज़ों से नफ़रत ज़रा भी नहीं करते, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर उनके हक़ के लिए बात करते हैं। मैं राम को उस रूप में पसन्द करता हूँ, जो रावण के अन्याय के विरुद्ध युद्ध करते हैं, पर उसकी विद्वत्ता को पूरा सम्मान देते हुए आख़िरी समय में अपने छोटे भाई को उसके पास भेजते हैं कि जाओ लक्ष्मण, सम्मान के साथ रावण के सिर नहीं, पैरों की तरफ़ खड़े होना और उससे जीवन का ज़रूरी ज्ञान हासिल करना। राम के पूरे जीवन में नफ़रत नाम की चीज़ नहीं है। यहाँ ‘जय श्रीराम’ वालों का ज़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि ये राम के पुछैटे हैं और बिना नफ़रत के रह नहीं सकते। वैसे अपने घर में ही आप देखेंगे तो शायद हर कोई गान्धी और गोडसे, दोनों के साथ खड़ा दिखाई देगा। घर का कोई व्यक्ति जब ग़लत काम कर रहा होता है तो उस समय वह गोडसे की बिरादरी का ही होता है। हम उसकी निन्दा करते हैं, डाँटते-फटकारते हैं, पर जब वही कुछ अच्छा करता है तो उसे सिर-आँखों पर बैठाते हैं। घर वाला व्यवहार बाहर के लोगों के साथ क्या नहीं सम्भव है? मेरे हिसाब से चीज़ों को पन्थों और वादों में बाँटकर देखना वैज्ञानिक नहीं, घोर अवैज्ञानिक सोच है। विज्ञान में जब हम किसी पदार्थ या तत्त्व का अध्ययन करते हैं, तो उसके पक्ष या विपक्ष में नहीं होते। कितना भी ख़तरनाक ज़हर हो, हम उसके गुण-दोष दोनों देखते हैं। दक्षिणपन्थी भी आदमी ही होते हैं और वामपन्थी या कोई और पन्थी भी। खेल संस्कारों का है कि कौन कैसा व्यवहार करता है। भारतीयता के संस्कार ऐसे रहे हैं कि यहाँ एक राजा भी कब अपना सब कुछ त्याग कर फ़क़ीर हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। आजकल के दक्षिणपन्थी अगर तालिबानों से प्रतिस्पर्धा करना चाहते हैं तो यह भी एक अलग ढङ्ग का प्रायोजित संस्कारों का ही प्रतिफल है और भारतीयता की मूल धारा का नहीं है। यहीं पर यह भी सनद रहे कि वामपन्थ का प्रगतिशील चेहरा भी तालिबानी शक्ल से अलग नहीं है। दुनिया में जहाँ-जहाँ साम्यवादी सत्ताएँ क़ायम हुई हैं, उनके चेहरे ठीक से पहचानिए। दक्षिणपन्थ अगर उजड्ड दैहिक हिंसा का पाठ तैयार करता है, तो प्रगतिशील सोच प्रतिक्रियावादी वैचारिक हिंसा का। दक्षिणपन्थ और वामपन्थ, दोनों का उपजीव्य नफ़रत है, जबकि संसार की रचना इस हिसाब से नहीं हुई है। इस नफ़रत की मानसिकता की वजह से ही आधुनिक साहित्य का भी अधिकांश प्रतिक्रियावादी है, जिसमें लोककल्याण का तत्त्व बस छद्म आवरण जैसा है। जिस फासीवाद का आरोप दक्षिणपन्थियों पर मढ़ा जाता है, प्रगतिशील तबक़ा ख़ुद भी शातिराना ढङ्ग से उसी से ग्रस्त है। ‘साहेब के मेलोड्रामा’ रचने की बात का भी यहाँ कोई मतलब नहीं, पर आपने लिखा है तो यह भी याद कीजिए कि इक्का-दुक्का साम्यवादियों को छोड़कर बाक़ी सारे ताउम्र मेलोड्रामा ही रचते रहे। काँग्रेस के इतने लम्बे शासनकाल में नेहरू और राजीव गान्धी को ज़रा बख़्श दें तो इन्दिरा गान्धी से ज़्यादा मेलोड्रामा किसने रचा? नेहरू ने अगर गौरवशाली संस्थानों की नींव रखी तो इन्दिरा ने उन संस्थानों में भ्रष्टाचार की। किन-किन मोर्चों पर बात की जाय? जब आप कहते हैं---घनघोर राजनैतिक अवसरवाद के एजेण्डे पर चलते हुए दक्षिणपन्थी सत्ता यही तो कर रही है---तो इस पर भी ईमानदारी से ग़ौर कीजिए कि बाक़ी की सत्ताएँ क्या करती रही हैं। एक सम्भावनाशील देश को गर्त में ले जाने का काम किसने किया? दक्षिणपन्थी आख़िर कब सत्ता में आए? आपने संविधान के लिए लिखा है कि… ‘‘यह कोई जड़ धार्मिक ग्रन्थ नहीं। अँग्रेजों के औपनिवेशिक कानून ‘इण्डियन पीनल कोड’ इसका मुख्य आधार रहे हैं। लेकिन हमारे संविधान-निर्माता दूरद्रष्टा थे।’’ इस पैमाने पर देखें तो धर्मिक ग्रन्थ भी भला जड़ कैसे हो गए? क्या सिर्फ़ इसलिए कि आज के समय में वे अप्रासङ्गिक कहे जाते हैं। इस तरह से तो संविधान के कुछ हिस्से भी हर साल-दो साल पर एक-दो बार अप्रासङ्गिक होते दिखते हैं और उनमें बदलाव करना पड़ता है। माफ़ कीजिए, धार्मिक गर्न्थों की जड़ता पर हज़ारों वर्षों बाद हम इतनी आसानी से फ़तवे नहीं दे सकते। मनु, पाणिनि, पतञ्जलि, कणाद, गौतम, याज्ञवल्क्य को संविधान निर्माताओं से कम दूरदृष्टि वाला नहीं कह सकते। उनकी बनाई रीति-नीति पर यह देश सदियों तक क़ायम रहा, संसार में सबसे ज़्यादा समृद्ध रहा। समय के साथ रीति-नीति में बदलाव होते ही हैं और स्मृतियों की परम्परा इसीलिए चली। आधुनिक भगवाधारियों को समझ में न आए तो इसमें हमारे पूर्वजों का क्या अपराध? टिप्पणी मेरी थी तो गोबर, गोमूत्र का ज़िक्र भी मेरे सन्दर्भ में करना चाहिए था। दक्षिणपन्थ को आप जो समझें, सो समझें, पर उसे आप मेरे ऊपर नहीं थोप सकते। गोबर, गोमूत्र को मैं क्या समझता हूँ, इस पर कई दिनों पहले का मेरा ही वीडियो यूट्यूब पर देख सकते हैं। फेसबुक पर भी इस सन्दर्भ में बहुत पहले लिख चुका हूँ। यहाँ सफ़ाई देने की ज़रूरत नहीं, आपकी बात आप पर ही उलटी पड़ सकती है। कुल जमा दिक़्क़त बस इतनी है कि हम अपनी-अपनी विचारधाराओं के दड़बे में बन्द रहते हैं और बाहर की दुनिया देखना नहीं चाहते। खुली निगाहों से चीज़ों को देखें तो शायद सही-ग़लत बेहतर समझ में आएगा। बहरहाल, यह बात की बात है, इसलिए इसे व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप की तरह लेने की ज़रूरत नहीं है। ---सन्त समीर--- ...


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