नई दिल्ली   16594
#गांधी_बनाम_मार्क्स बात नयी नहीं है बस संदर्भ नया है। बात तब की है जब 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की घोषड़ा के बाद गांधी जी गिरफ्तार कर जेल में डाल दिए गए थे। गांधी जी एक अच्छे स्कॉलर भी थे। पढ़ने में उनकी बहुत रूचि थी, बस क्या पढ़ना ये वह स्वयं तय करते थे। इसलिए इन्होंने कभी मार्क्स को पढ़ने की जरूरत नहीं समझी थी। लेकिन जेल के दौरान उनके इर्द-गिर्द जमा तमाम कॉमरेडों ने गांधी जी से मार्क्स को पढ़ने का आग्रह किया। शायद उन्हें इस बात का एहसास हो कि गांधी जी अगर मार्क्स के सिद्धांतों को सही कह दें तो भारत में साम्यवाद के विस्तार का रास्ता खुल जायेगा। गांधीजी ने उनकी बात का मान रखते हुए मार्क्स को पढ़ना स्वीकार कर लिया। जेल से छूटने के बाद जिन्होंने गांधी जी को आग्रह किया था वे बेचैन थे। उन्होंने गांधी जी से पूछा कि आपकी क्या राय है मार्क्स के सिद्धांतों पर। गांधी जी सत्य के पुजारी थे सो बिना किसी लाग-लपेट के साफ-साफ कहा, "मार्क्स को मानव मन की कोई समझ नहीं थी"। साथ ही यह भी कहा कि मेरे पास वक्त होता तो इससे बेहतर ग्रन्थ लिखता। गांधी जी के इस जवाब ने जिस तरह वामपंथियों को ख़ारिज किया लगभग उसी तरह समाज ने भी। आज जब इस बात का विश्लेषण करता हूँ तो अनेक बिंदु ध्यान में आते हैं-- - मार्क्स का पूरा सिद्धांत केवल अर्थ केंद्रित है जबकि गांधी जी समाज को सभ्यता, संस्कृति, मानवीय समझ, उसकी संवेदना की दृष्टि से देखते थे। - मार्क्स का अर्थशास्त्र मशीन केंद्रित है जिसमें मानव एक मजदूर है जबकि गांधी के अर्थशास्त्र में मानव और उसकी संवेदना केंद्र बिंदु है। - मशीनी अर्थशास्त्र में मनुष्य की मौजूदगी उसके श्रमिक होने तक है लेकिन मानवीय अर्थशास्त्र में मनुष्य श्रमहीन होने की स्थिति में भी प्रासंगिक रहता है। - मार्क्स का धर्म,सभ्यता,संस्कृति से कोई वास्ता नहीं था जबकि गांधी धर्म, सभ्यता, संस्कृति के बिना किसी मनुष्य की कल्पना ही नहीं करते थे। आज का दुर्भाग्य यह है कि देश ही नहीं दुनियां भर में खुद को गांधीवादी कहने वाले तमाम चेहरे दरअसल अपनी राजनैतिक ज़मीन खोकर भंगी बने मार्क्सवादी ही हैं। उनके अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र का चेहरा तो मार्क्स वाला है लेकिन उन्होंने मास्क गांधी जी का लगा रखा है। यह उनके पराजय और द्वन्द का प्रतीक है। जिसमें वे बार बार बेनकाब होते हैं। भारतीय समाज के स्वधर्म की जीत है। 🙏🙏#रूपेश@पाण्डेय ...


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  • कोरोना महामारी के कारण इस समय उतपन्न हुई आर्थिक मंदी का असर मात्र उद्योगजगत,परिवहन,पर्यटन तथा रोजमर्रा मजदूरों के लिए नही वरण क्रीड़ाक्षेत्र के विश्वव्यापी प्रतियोगिताओ पर भी हुआ है।आज के इस युग मे मशीन हो चली होमो सेपियंस को कुछ क्षण लिए कार्यविहीन करने की तरकीब ने भी अपनी जमीन से जुड़ाव को खो दिया है।यूरोप के लंदन में होने वाले विबिल्डन हो या पेरिस में होने वाले टेनिस का महासंग्राम फ्रेंच ओपेन से लेकर अमरीका के दुनिया के सबसे बड़ी बास्केटबॉल लीग MBL।अमेरिका के मानचित्र से आगे बढ़े तो और किसी भी तरह दृष्टि डाले तो माहौल एक जैसा ही मिलेगा चाहे कोई दुजा खेल ही क्यों न हो,विश्व की सबसे बड़ी लीग इंग्लिश प्रीमियम लीग हो या अन्य आईपीएल।सभी खेल संघो को हजारों करोड़ो का नुकसान जो हुआ सो हुआ।अब इस खेलो को खड़ा करने वाले लोग जो उत्प्रेरक है इससे जुड़कर वे सभी इससे कुछ पल के लिये इससे दूरी बना लेंगे।इस सोशल डिस्टेंसिंग के दौर में क्रीड़ाजगत और इससे जुड़े हुए खिलाड़ियों को अपने हितों की रक्षा करने में अल्प समय के लिके नयी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा साथ मे अपने प्रसंशको से सीधे संवाद न करके तकनीक का सहारा लेना पड़ेगा।इस समय पूरी दुनिया को ही सहारा मिलने के आस में सब जी रहे।समय की मांग है एक-दूसरे का सहारा बने।एक दूसरे के ही सहारे ही दुनिया का सहारा सम्भव है साथ मे सामाजिक दूरी का भी सामन्जस्य भी आवश्यक।


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