उत्तरप्रदेश /वाराणसी   249
#रिज़वाना की मौत और गिद्धों का मौन #शमीम_नोमानी प्रगतिशील नारीवादी पत्रकार रिज़वाना तबस्सुम अब नहीं रहीं। सोमवार को उनके आत्महत्या की खबर से लोग स्तब्ध रह गए। एक जिम्मेदार शहरी के साथ प्रगतिशील विचार की होने के बावजूद रिज़वाना का यूं आत्महत्या करना समझ से परे है। आत्महत्या जैसी कोशिशें बेहद तकलीफदेह और अकेलेपन की स्थिति का नतीज़ा होती हैं। रिज़वाना किसी तकलीफ से गुज़र रही थी यह किसी को खबर भी नहीं हुईं। दुःखद यह कि वह अपनी निजी जिंदगी में इतनी अकेली थीं कि किसी से अपना दुःख भी साझा नहीं कर पायीं। उनके सुसाइड नोट से साफ है कि रिज़वाना को छेड़ने और परेशान करने वाला सपा का स्थानीय नेता शमीम नोमानी था। पुलिस ने रिजवाना के पिता की तहरीर पर आरोपी को गिरप्तार कर लिया है।हालांकि आरोपी इसे अपने खिलाफ साजिश बता रहा है ,परन्तु 25 वर्षीय युवा पत्रकार रिजवाना की आत्महत्या एक बड़ा सवाल खड़े कर रही है कि मीडिया और खासकर द प्रिंट वायर जैसी वामपंथी वेबसाइट व न्यूज एजेंसी के लिए काम करने वाली रिजवाना के साथ ऐसा क्या हुआ जो वे अपनी जिंदगी गंवाने के निर्णय ले बैठीं ! आज की पत्रकारिता औऱ राजनीति का घालमेल इतना जानलेवा क्यों होता जा रहा है और सबसे बढ़कर सेकुलर पत्रकार चैनल व बुद्धिजीवियों का वामी धड़ा अपने लोगों के मामलों में चुप्पी क्यों साध लेता है। जबकि वास्तव में पत्रकारिता जगत को इसे संज्ञान में लेना चाहिए कि एक युवा पत्रकार एक छुटभैये सपाई शमीम नोमानी जैसों के हाथ का शिकार कैसे बन गयी ? उसे न्याय दिलाने के लिए प्रगतिशील समूह को चुप रहने की जगह आगे आना चाहिए। ...


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