नई दिल्ली /तक्षशिला/नालंदा   16593
मैं सैनिक बच्चों के मध्यवर्गीय संस्कारों के स्कूल केन्द्रीय विद्यालय का पढ़ा हूं। इसलिए तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालय का नाम बचपन से सुनता आया हूं। स्कूल के दिनों से हम हर रोज सुबह स्कूल की प्रार्थना सभा में विद्यालय गीत गाते थे-'भारत का स्वर्णिम गौरव केंद्रीय विद्यालय लाएगा- तक्षशिला, नालंदा का इतिहास लौट कर आएगा।' स्कूल में पहली से 12वीं तक यानी बारह साल पढ़ा। उसके बाद कई और साल बीत गए। लेकिन इस देश में तक्षशिला, नालंदा का इतिहास लौट कर नहीं आया। पर गीत तो सिर्फ गाने गुनगुनाने के लिए होते हैं। खैर काफी बाद में इन दोनों विश्वविद्यालयों के बारे में पढ़ा तो हैरत चकित रह गया। मुझे पता चला कि पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के रावलपिण्डी जिले में स्थित तक्षशिला, दुनिया का पहला विश्वविद्यालय था, जो ईसा मसीह के जन्म से कोई सात सौ साल पहले बना था। यानी महात्मा बुद्ध के जन्म से भी पहले। बाद में यह कई सदियों तक हिन्दू और बौद्ध दोनों के लिये शिक्षा का महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया। भारत में पहली बार राष्ट्रवाद का सपना देखने वाले चाणक्य यही के आचार्य थे। जबकि वह पाटलिपुत्र यानी आधुनिक पटना के निवासी थे। तब देश भर के छात्र पढ़ने के लिये तक्षशिला जाते थे। पहली बार कश्मीर से कन्याकुमारी तक के सम्पूर्ण भारत पर राज करने वाला उनका योग्य शिष्य चन्द्रगुप्त मौर्य भी तक्षशिला का छात्र था। आज के प्रगतिशील इसे कोरी काल्पित कथा बता कर हवा में उड़ा देते। वह तो भला हो पुराविद् सर जॉन मार्शल का जिसने 1912 से 1929 के बीच तक्षशिला की पुरातात्विक खुदाई कर विश्वविद्यालय के खोए हुए अवशेष बाहर निकाल दिए। इससे पता चला कि उस जमाने में जब पूरी दुनिया जहालत के अंधकार के डूबी थी तब तक्षशिला में कोई दस हज़ार छात्रों के रहने और पढ़ाई की सुविधाएं थीं। कोई दो हजार शिक्षक थे। विश्वविद्यालय में सैकड़ों आवास थे। पढ़ाई के लिए बड़ी कक्षाएं, सभागृह और पुस्तकालय थे। जातक कथाओं और विदेशी पर्यटकों के लेख से पता चलता है कि यहां दुनिया का पहला मेडिकल कालेज था। तक्षशिला 'आयुर्वेद विज्ञान' का सबसे बड़ा केन्द्र था, जहां मेडिकल के छात्र मस्तिष्क के भीतर तथा अंतड़ियों के अंदर तक का ऑपरेशन बड़ी आसानी से कर लेते थे। अनेक असाध्य रोगों के इलाज सरल और सुलभ जड़ी बूटियों से करते थे। उन्हें तमाम दुर्लभ जड़ी-बूटियों का भी उन्हें ज्ञान था। इस जगह को 1980 से यूनेस्को की विश्व विरासत लिस्ट में शामिल कर लिया। इस्लाम के जाहिल आक्रान्ताओं ने छठी सदी में इस विश्वविद्यालय को नेस्तनाबूद कर दिया क्योंकि उनके हिसाब से किताब सिर्फ एक थी। इसी तरह 5वीं सदी में बिहार से 56 मील दूर दक्षिण पूर्व में नालंदा एक बड़ा अंतर्राष्ट्रीय आवासीय विश्वविद्यालय था। यह विश्वविद्यालय अगले पाँच दशकों तक शैक्षिक व सांस्कृतिक गतिविधियों का अंतर्राष्ट्रीय केन्द्र रहा। यहां भी करीब 12 हजार छात्र और तीन हजार शिक्षक हुआ करते थे। दसवीं सदी में एक बेवकूफ किस्म के आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने इसे आग के हवाले कर दिया था। कहते हैं इसके पुस्तकालय में इतनी किताबें थी कि लगातार तीन महीने तक धूं-धूं करके जलती रहीं। ताम्रपत्रों पर लिखी ये किताबें और अभिलेख अगर आज होते तो भारत में शोध और अनुसंधान की कुछ और ही तस्वीर होती। जितने आविष्कार दुनिया में हुए उनमें अधिकांश के आधारभूत सूत्र इन किताबों में थे। चाहे वह विज्ञान की किताब हो, भौतिक शास्‍त्र की या फिर चिकित्सा या गणित की। खैर, भारत से तक्षशिला और नालंदा का नामोनिशान मिट गया। हमने कभी दूसरा तक्षशिला-नालंदा बनाने की कोशिश भी नहीं की। ले दे के हिन्दू और मुस्लिम विश्वविद्यालय बनाए जो धार्मिक संकीर्णीता के कैदी बन कर रह गए। एक जेएनयू बनाया गया उसका हाल सबके सामने है। जहां पढ़ाई कम और मूर्खतापूण हरकतें ज्यादा होती है। जॉन्स हापकिंस यूनिवर्सिटी के कैम्पस में घूमते वक्त न जाने क्यों मुझे तक्षशिला-नालंदा के ऐतिहासिक परिसर याद आ गए। मैंने तक्षशिला नालंदा के अवशेष तो नहीं देखे लेकिन जॉन्स हापकिंस कैम्पस देखकर मैं अंदाजा लगा सकता हूं कि इनके कैम्पस कैसे रहे होंगे। अमेरिका में जान्स हापकिंस जैसे लोगों ने इतिहास को पत्थरों में ढाल कर नया इतिहास रच गए। जॉन्स हापकिंस अमेरिका के बड़े उद्योगपति थे। वे निसंतान मरे और उन्होंने 1876 में अपनी सारी दौलत वह इस विश्वविद्यालय के नाम कर गए। यह अमेरिका को एक बड़ा तोहफा था। सुबह और शाम हमारी कक्षाएं लगती थीं। विश्व विख्यात प्रोफेसर बड़ी-बड़ी हॉलनुमा कक्षाओं में हमें पढ़ाते थे। कक्षा से लौटते वक्त मेरी नजर चार्ल्‍स कामन्स के सामने ही जॉन्स हापकिंस की प्रतिमा पर पड़ी। प्रतिमा के एक तरफ महिला और दूसरी तरफ एक पुरुष छात्र को बैठा दिखाया गया हैं। विश्वविद्यालय के पहले प्रेसिडेंट डेनियल कोट का मशहूर सूत्र वाक्य है-‘सत्य बोलिए क्योंकि सत्य आपको मुक्त करता है।’ खिड़की से देखता हूं नीचे सड़क पर सन्नाटा पसरा है। सूनी सड़क पर एक अंतहीन मौन। सोचता हूं यही कैम्पस में कहीं हापकिंस की कब्र भी होनी चाहिए। अगर होती तो वहां हिन्दुस्तान की तरफ से श्रद्धा के दो फूल जरूर चढ़ा देता। जारी ...


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