कश्मीर/पुणे   300
निर्वासित कहानीकार अवतार कृष्ण राज़दान ( क्रमांक-14) -अग्निशेखर पिछले वर्ष मैंने एक मुद्दत के बाद वरिष्ठ कश्मीरी कहानीकार अवतार कृष्ण राज़दान को फोन लगाया ... "हैलो,अवतार जी,क्षमा करें मैं बहुत व्यस्त रहा ।इसलिए कई बार कहकर भी नहीं आ सका। परसों अवश्य आऊंगा.. इंटरव्यू लेने...प्लीज़.." " छोड़ो, मेरा इंटरव्यू लेकर क्या करना है ..यहाँ किसको सुनाओगे मैं एक अदना सा निर्वासित लेखक क्या सोचता हूँ, क्या लिखता हूँ .. कश्मीर से कैसे भागा...छोड़ो..हमारी कौन सुनता है .." मैंने विलंब के लिए एकबार फिर क्षमा याचना की।लगा ,कहीं उन्हें यह न लगा हो कि वह चूँकि दिव्यांग हैं इसलिए वह वरीयता क्रम में जानबूझकर टलते गए हैं,जो कि सत्य नहीं था । उनसे मेरा मिलना सच में मेरी व्यस्तताओं के चलते बार बार टल रहा था । उन्हें सहसा जैसे कुछ याद आया मुझे बताने के लिए ।बोले, " क्या कहा, परसों आओगे ?.. अब तो बिलकुल नहीं आओगे." " जी !" मैंने कहा," मैं इसबार पक्का आऊंगा ।आप ऐसा न कहें । आप कहें तो आज ही आता हूँ ।" मैंने विनम्रता के साथ कहा।मुझे लगा अब वह इच्छुक नहीं हैं ।शायद आहत हैं । बोले,"यह विचार छोड़िए । अब तुम नहीं पहुँच सकते हैं मेरे पास। मैं अब जम्मू में नहीं...पुणे के एक वृद्धाश्रम में पड़ा हूँ ।" वह सहजता से बोले । मेरे पाँव तले की ज़मीन खिसक गई।अवाक् रह गया मैं। वह एक लंबी सी सांस छोड़कर धीरे से बोले, "शेखर जी, अब जम्मू लौटना नहीं होगा..अब यहीं पुणे से... " मैं अवाक् था । " ऐसा न कहें अवतार जी। आप दीर्घायु हों.. " मैं उनसे ये शब्द कहना चाहते हुए भी नहीं कह पाया।इतनी ग्लानि से भर गया । मैंने क्या सोचा था उनके बारे में ; और कैसे पानी फिर गया। मैंने और क्षमा ने योजना बनाई थी कि हम "हिमा कौल कलानिधि" के तत्वावधान में एक सार्वजनिक समारोह में जम्मू-कश्मीर में निर्वासित जीवन जी रहे वरिष्ठ कश्मीरी कहानीकार अवतार कृष्ण राज़दान (दिव्यांग) और सुपरिचित सितारवादक सुश्री सरजा रैना (दिव्यांग) को उनके योगदान के लिए " हिमाकौल स्मृति सम्मान " से सम्मानित करेंगे।उनके कृतित्व पर पत्र पढ़वाएंगे। तभी उनका फोन कट गया या काट दिया उन्होंने, कह नहीं सकता।मैं देर तक उनके बारे में सोचता रहा ।मन में ठान लिया कि अगले ही सप्ताह पुणे जाऊंगा उनसे मिलने और वहीं वृद्धाश्रम में ही उन्हें एक कीमती कश्मीरी शाॅल ओढाऊंगा , उन्हें फूलमाला पहनाऊंगा। साक्षात्कार भी लूंगा । यदि दुर्भाग्य से कथाकार अवतार कृष्ण राज़दान शारीरिक दृष्टि से दिव्यांग न होते तो वह स्नेहवश स्वयं मुझसे कई बार मिलने आए होते।यहाँ जम्मू के स्थानीय साहित्यकारों के अलावा वह कश्मीरी निर्वासित लेखकों, कवियों, कलाकारों की गतिविधियों में नियमित भागीदारी भी करते होते। मैं पुणे की यात्रा में बार बार उनके बारे में सोचता रहा।महत्वपूर्ण बात यह थी कि मैंने उन्हें पुणे आने की कोई सूचना नहीं दी थी।मैं उन्हें अपने आने की आकस्मिक प्रसन्नता देना चाहता था। अवतार कृष्ण राज़दान पिछले लगभग छह दशकों से कश्मीरी और हिंदी दोनों भाषाओं में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति बनाए हुए हैं । यह इनकी जिजीविषा ही है कि इन्होंने अपनी शारीरिक विकलांगता को ठेंगाकर बताकर कुछ कर गुज़रने की ठान ली और आज एक सम्मानित संघर्षचेतासाहित्यकार की उनकी छवि सब के लिए एक प्रेरणा है। 'आतंकबीज' , 'अर्श से फर्श तक' , ' एल.बी.डब्ल्यू ' सहित इनके चार कहानी-संग्रह और सत्तर के दशक में लिखी शोधपरक पुस्तक ' कश्मीरी ललित कलाएं : उद्भव और विकास ' चर्चित रही है । इस पुस्तक की तैयारी व लेखन में अवतार कृष्ण राज़दान ने कश्मीर की संस्कृति के ऐतिहासिक और सामाजिक पहलुओं के अध्ययन में दो ढ़ाई साल लगाए। हर रोज़ सुबह अपने घर से व्हीलचेयर से पांच-छह किलोमीटर दूर रिसर्च-लाइब्रेरी जाकर दिनभर वहां पुस्तकें खंगालते,पढ़ते, नोट्स लेते और शाम को भारी यातायात से बचते बचाते घर लौट आते। यह लेखक अवतार कृष्ण राज़दान का स्नेह है कि वह कश्मीरी निर्वासितोंं के संघर्ष में मेरी गतिविधियों की खबर रखते रहे।एकबार फोन पर बताया भी, "मैं देखना चाहता हूँ हमारे जनांदोलन का नेतृत्व एक लेखक-कार्यकर्ता कैसे करता हूँ .." वह मुझसे फोन पर यदा कदा बातचीत करते रहते । हालचाल पूछते। हालात पर टिप्पणी करते और कभी कभी किसी स्थिति पर व्यंगबाण भी छोड़ते । पिछले वर्ष एकबार पूछा था, "आजकल क्या लिख रहे हो? क्या करते हो? मैंने विस्तार से उन्हें अपनी एक योजना बताई थी, "मैं कश्मीर से सामूहिक निर्वासन के बाद इधर लिखे गए साहित्य पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा हूँ । प्रतिनिधि जलावतन कश्मीरी, उर्दू,हिंदी,अंग्रेज़ी के साहित्यकारों के साक्षात्कार रिकार्ड कर रहा हूँ ।उनके अनुभव, संघर्ष, विचार , सपने तथा उनकी दृष्टि में आए बदलाव लिपिबद्ध करना चाहता हूँ ।" पुणे में मेरे अनेक मराठी,हिंदी और निर्वासित कश्मीरी लेखक मित्र हैं ।मैंने प्रसिद्ध कश्मीरी नाटककार और चिंतक अमर मालमोही के सुपुत्र रवि रोहित भट्ट को साथ चलने को कहा। वह वृद्धाश्रम पुणे से बाहर था।रवि रोहित भट्ट काफी उत्साहित था कहानीकार अवतार कृष्ण राज़दान से मिलने के लिए ।रवि रोहित भट्ट ने एक फलविक्रेता के पास कार रोकी।उसने ढेर सारे फल खरीदे-केले,संतरे, सेब ,अंगूर । "आश्रम वालों को पता चलना चाहिए कि उनके बीच एक लेखक रहता है और हम उनके प्रशंसक आए हैं " मैं उसकी भावना से अभिभूत था। अवतार कृष्ण राज़दान को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था ।मैं उनके सामने हाथ जोड़े खड़ा था।उनके चेहरे पर अपार स्नेह और विस्मय तैर आया था। " तो तुम आ ही गये .." उनके बोल भी स्नेह भीगे थे। वृद्धाश्रम में हर कोई चकित था। वह हाॅल में एक खिडक़ी के किनारे पलंग पर उस दिव्यांग बुज़ुर्ग को अपने जैसा कोई सामान्य बेसहारा समझ रहे थे। हमने एक कर्मचारी को उन्हें फल देने को कहा। मैंने अवतार कृष्ण राज़दान से रवि रोहित भट्ट का परिचय कराते हुए जब यह कहा कि यह अमर मालमोही के बेटे हैं तो बहुत ही खुश हुए। पांच -दस मिनट की औपचारिक बातचीत के बाद मैंने जब उन्हें सम्मान स्वरूप शाॅल ओढाया और उन्हें फूलमाला पहनाई तो उनके चेहरे के भाव देखने लायक थे। " आप यहाँ पुणे कैसे पहुँचे" मैंने जिज्ञासा प्रकट की। " यह मेरी व्यथा कथा है। नब्बे में कश्मीर छोड़कर माँ को साथ लेकर जम्मू पहुँचा ,वहां किसी के पास रहा। फिर बहन का लड़का दिल्ली ले गया।" उन्होंने एक आह भरी। फिर कहा,"वहाँ दिलशाद गार्डन में उनके पास लगभग छह मास बिताकर फिर वापस जम्मू आया। त्रिकुटानगर में कोई छह साल एक शेड के नीचे गुज़ारे। फिर घर बनाया। भाई के बच्चे बड़े होकर इधर उधर चले गए..जम्मू से अब ठोकरें खाकर अब पुणे के इस आश्रम में हूँ .." उन्होंने बिना रुके अपनी दारुण कथा सुनाई। " आपसे आज यदि कोई पूछे कश्मीर से क्यों और कैसे निकले थे तो क्या बताएंगे उसको ?" मैंने पूछा । वह यादों में खो से गये और कांपते से शब्दों में कहने लगे ," " आज तीस साल के बाद यदि आपसे कोई पूछे कश्मीर से क्यों और कैसे निकले थे तो कैसे याद करेंगे उस दिन को ?" मैंने पूछा । वह यादों में खो से गये और कांपते से शब्दों में कहने लगे ," रात के कोई एक बजे का समय था..कोई कहानी लिख चुकने के बाद अभी सोने के लिए लिहाफ ओढी ही थी कि सामने वाली मस्जिद से असमय और सहसा 'नाराए तदबीर..अल्लाहो अकबर" के गगनभेदी नारे गूँजने लगे थे।मैं घबरा गया ।क्या बात थी, मैं आशंकित हुआ।बाहर सन्नाटा था। अंधेरा था ही गली मुहल्ले में ।मैं धीरे से रेंगता हुआ सड़क की तरफ खुलने वाली खिड़की के पास गया।नारे कुछ देर के लिए थम गये ..थोड़ी देर के बाद फिर शुरू हुए। " कमरे में ही माँ लेटी थी।वह बेचारी भी हड़बड़ाकर जाग गयी ..क्या बात है ..य..ह..अब नारों का रुख हमारी ओर मुड गया था ..' ऐ काफिरो, ऐ जाबिरो! कश्मीर हमारा छोड़ दो !.. माँ पूछ रही थी यह क्या कह रहे हैं .. मैंने उसे दबी जुबान में समझाया कि हमे कश्मीर छोडकर जाने को कह रहे हैं .." वह बोलते बोलते कुछ क्षण के लिए रुक गये ।मैंने पूछा," माँ कांप गयी होंगी..." वह बोले,"नहीं ।वह बोलीं,ये लोग मस्जिद से हमें कश्मीर खाली करने को कहने वाले कौन होते हैं ! यदि ऐसी कोई बात होगी तो रेडियो पर बताएँगे।" "फिर ?" मैंने आगे जानने को उत्सुक था। " उसके बाद नारों का एक और दौर शुरू हुआ ।मैं अब पूरी तरह घबरा गया । माँ ने भी सीना पीटते हुए कहा..कोई बड़ी आफत है..पता नहीं सुबह होगी भी कि नहीं .." " और रात कटने के बाद दूसरी सुबह क्या किया आपने ?" मैंने पूछा। " मैं देखा पड़ोस के सब हिंदू बीबी बच्चे लेकर नंगे पाँव ही भागने के लिए बस अड्डे पहुँच गए थे।मैं शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति क्या करता... दस दिन तक अकेला पड़ा रहा घर में ..रोज़ रात को आक्रामकता के साथ नारे गुंजाये जाते।बल्कि अब नये नये नारे भी जोडे गए थे। एक दिन किसी तरह सथू बरबरशाह मुहल्ले से मेरा भतीजा आया और हम दोनों को एक तिपहिए में बिठाकर घर ले गया। उसके मुहल्ले में अभी पचास-साठ घर थे हिंदुओं के, उसने बताया था।" " आखिर जम्मू कब चले आए ?" मैंने पूछा । " वह मुहल्ला भी एक एक कर हिंदुओं से खाली हो रहा था।पंडितों की चुन चुनकर हत्याएँ हो रही थीं।और एक दिन हवाई जहाज़ की दो टिकटों का इंतज़ाम करके भतीजा मुझे और मेरी बूढी माँ को एअरपोर्ट ले गया।और हम किसी तरह भाग गये।जहाज़ जम्मू में न उतर सका, सीधे दिल्ली पहुँचा। यहां ढाई बजे तक इंतजार किया।इस दौरान वहां हम दहशतज़दा माँ-बेटे ने जिसे भी अपनी दास्तान सुनाई उन्हें हम झूठे लगते।फिर वहां से दूसरे जहाज़ में जम्मू आए।" " जम्मू में कहाँ रहे ?" मैंने पूछा। " यहाँ त्रिकुटानगर में एक मित्र ने कहला भेजा था कि उनके घर ठहरना।वहाँ पहुँचने पर देखा वहां उसके कई रिश्तेदार पहले से ही ठूंसे पडे थे और हर रोज़ कश्मीर से कोई न कोई आकर ठुंस रहा था।मैं शारीरिक रूप से विकलांग शख्स परेशान था।इसी बीच मेरी बहन का लड़का कश्मीर से सामान लदी ट्रक लिए मुझसे वहां मिलने आया और उसी समय हम दोनों माँ बेटों को ट्रक में सामान के साथ लादकर रातों रात दिल्ली ले गया" " वहाँ से जम्मू क्यों आए ?" मैंने जानना चाहा । " वहाँ दिलशाद गार्डन में छह महीने रहा।मेरा दुर्भाग्य कि मेरी बहन को कैंसर हो गया ।वापस जम्मू आया भाइयों के साथ।त्रिकुटानगर में किराए पर मोटरगाडी के शेड के नीचे छह साल बिताकर हमने भी 1996-97 में छोटी सी कुटिया बनाई थी।" वह रुके।लेकिन सहसा उन्हें ऐसा लगा जैसे कुछ कहने से रह गया ।बोले,"कालांतर में बच्चे बड़े होकर रोज़गार की तलाश में जम्मू से बाहर दूसरे राज्यों में जाने लगे।कुछ विदेश चले गए।मेरा घर भी खाली हो गया और मैं क्या करता अब जीवन के अंतिम दिनों में यहाँ हज़ारों किलोमीटर दूर पुणे के इस वृद्धाश्रम में अजनबी जीवन जी रहा हूँ ।" उन्होंने मुझे आंकती नज़रों से देखा। मैंने एक और बात छेड़ी," आपको क्या लगता है कि पूरे भारत में लेखक बिरादरी और बुद्धिजीवी इतने बड़े निर्वासन पर चुप क्यों रहे ? " " वे चुप नहीं रहे,बल्कि हमें लेकर प्रोपेगंडा ..दुष्प्रचार किया गया..उनके प्रति सहानुभूति दर्शायी जिन्होंने हमें बेदखल किया ।" वह छूटते ही बोले। " एक लेखक के नाते यह निर्वासन क्या है आपके लिए ?" मैंने उनके निष्कर्ष जानने चाहे। "अभिशाप है ..अभिशाप है यह..बहुत तकलीफें उठाईं..विशेष कर हम लेखकों और कलाकारों ने ।हमें जो अपना वातावरण कश्मीर में मुहय्या था वो दूसरी जगहों में कहाँ मिलता . " उन्होंने एक आह भरते कहा : "हमें एक नई राह चुननी थी..मैं इस जलावतनी और जीनोसाइड पर हिंदी में कहानियां लिखना शुरु किया ..और क्या करता .. चार संग्रहों में हैं कहानियां .. आजकल अंग्रेज़ी में इस वृद्धाश्रम के जीवन पर पुस्तक लिख रहा हूँ ..मय डेज़ इन स्वीट होम " " आप तो फिर भी कश्मीरी से हिंदी में आ गए, लेकिन ऐसे कश्मीरी कवि और लेखक हैं जो ऐसा नहीं कर सके...जैसे कथाकार हृदय कौल भारती और नाटककार अमर मालमोही आदि" मैंने टिप्पणी की। " हाँ,यह एक अस्तित्व-मूलक लेखकीय संकट है... किसी रचनाकार से उसकी भाषा का पाठक परिवार छूट जाना।इसका कोई उपाय खोजना पडेगा ।यह हमसे ज्यादा अब उस नयी पीढ़ी का संकट है जो जलावतनी में मातृभाषा कश्मीरी में लिख रहे हैं ।" मैंने बात भविष्य की तरफ मोड दी । वह बोले ,"हमारा अस्तित्व और अस्मिता दोनों खतरे में हैं।हम पृथ्वी से गायब हो जाने की कगार पर पहुँच गए हैं ।यही हालत रही तो दस-बीस साल बाद कोई कश्मीरी पंडित नहीं मिलने वाला ।हम करें तो करें क्या ! " हम कहीं के नहीं रहे..हमारा अब कश्मीर में क्या है ..ज़मीनें थीं,गयीं..मंदिर क्षतिग्रस्त ..मकान अगर हैं तो टूटे फूटे..वीरान..विनाशलीला है यह..हम वापसी की बात करते हैं तो वहां एतराज़ होता है . " " आपको अपने और अपने लोगों की जलावतनी के पीछे मुख्य वजह क्या लगती है?" मैंने उनकी राय जाननी चाही । वह तपाक से बोले ,"घर में गली में बाज़ार और दफ्तर में कहीं भी मार डाले जाने या अगवा किए जाने का डर ,उस डर के पीछे का एजेंडा..एक बात साफ बोलूंगा कि 100% सब मुसलमान उनके साथ थे, हमारे साथ होते तो हमें निकलने कहाँ देते..!..कहीं कहीं झूठ बोलकर धोखे में रख रहे थे । वे हमें सुरक्षा बलों के आगे ढाल की तरह भी इस्तेमाल करना चाहते थे . किया भी कहीं कहीं..हर कोई जानता था कि आगे क्या होने वाला है .." " कश्मीर को किन किन रूपों में याद करते हैं?" मेरे इस प्रश्न पर वह मुझे ऐसे देखने लगे जैसे कह रहे हों कि यह भी कोई पूछने की बात है ? " निर्वासन में मैं मातृभूमि कश्मीर के किस रूप को याद नहीं करता हूँ .." वह बेधती नज़रों से देखते रहे । " कहा तो आज भी जा रहा है कि कश्मीर में कश्मीरियत बरकरार है.." उन्होंने मेरी बात काटते हुए उत्तेजना के साथ कहा," कश्मीरियत की बात करते हैं ..हुँह...कहाँ है वो कश्मीरियत..कहाँ है..बताइए.." "पुणे के इस अनाथालय में.." मेरे मुंह से निकला । उन्होंने बोलना जारी रखा,"कश्मीरियत ज़िंदा है शेष भारत में ..जहाँ जहाँ कश्मीरी पंडित पहुँचे । यहाँ मैं स्वर्गीय बाला साहब ठाकरे का ज़िक्र करूँगा ..अगर वह हमारे अभागे बच्चों को प्रोफैशनल कालेजों में पढ़ने के लिए सीटें बढ़ाकर नहीं देते तो कैंपों में बच्चे हमारे चोर, अपराधी, भिखारी और जेबकतरे बन गए होते।हमने कठिन संघर्ष किया..संघर्ष सीखा है... मुझे ही देखिए ,संघर्ष की बदौलत आज जीवित हूँ..पुणे पहुँच गया हूँ और किताब लिख रहा हूँ ।" समय बहुत हो चुका था। मैंने निकट भविष्य में एकबार फिर आने की बात की और मन न करते हुए भी उनसे विदा ली। और मैं गया भी अगले ही महीने।इसबार उनसे विस्तार से और बातें कीं । ## ...


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