नई दिल्ली / मध्यप्रदेश   246
तुझसे था पहले का नाता कोई , यूँ ही नहीं दिल लुभाता कोई जीवन के बाद भी रिश्तों का निर्वहन -आलेख : रवीन्द्र वाजपेयी चाची जी 85 पार कर चुकी थीं | संघर्षपूर्ण जीवन के बाद जब इंसान के आराम के दिन आते हैं तभी बीमारी का पिटारा भी साथ हो लेता है | पता चला वे अस्पताल में भर्ती हैं और मुझे याद कर रही हैं | शाम को मैं पत्नी के साथ उन्हें देखने गया तो बोलीं दिव्या ( मेरी बेटी ) के बेटे को नहीं लाये | मैं लगातार कह रही हूँ कि उसे देखने की इच्छा है लेकिन सब कह देते हैं वो चंडीगढ़ में है | मैंने उनके पास जाकर कहा कि जी यही सच है | और फिर उन्हें खुश करने के लिए कह दिया खबर भेज दी है , जल्दी आ जाएगा | दैवयोग से वे स्वस्थ होकर घर लौट आईं लेकिन बीमारी धीरे - धीरे शरीर को क्षीण करती जा रही थी | बेटे - बहू , पोते - पोती सभी हरसंभव सेवा में जुटे थे | वैसे उनसे मेरा कोई पारिवारिक रिश्ता नहीं था | वे कायस्थ और हम ब्राह्मण लेकिन खून के रिश्ते हों तभी निभते हैं , ये सोचना गलत है | उनसे नाता 1956 में तब जुड़ा जब हमारा परिवार नागपुर से जबलपुर आया | साठिया कुआ मोहल्ले में जो मकान किराये पर पिता जी ने लिया वह पहली मंजिल पर था जिसके नीचे यही कायस्थ परिवार रहता था | इस तरह नये शहर में पहला परिचय उन्हीं से हुआ | धीरे - धीरे मेरी माता जी और चाची जी में बहिन जैसा रिश्ता बन गया | मेरी छोटी बहिन ( अब स्व. ) कुछ समय ग्वालियर में मेरी बड़ी मौसी जी के पास रही | उसी दौरान रक्षाबन्धन आया और तब चाची जी ने मुझे बुलाकर अपनी बेटी से राखी बंधवाकर रिश्ते को और मजबूत कर दिया | उनके पति रक्षा संस्थान में कार्यरत थे और वे स्वयं एक निजी स्कूल में शिक्षिका थीं | हम दो भाई एक बहिन की तरह उनके परिवार में भी दो पुत्र और एक मुझे राखी बांधने वाली बेटी थी | सब कुछ ठीक चल रहा था | हम लोग ग्रीष्म अवकाश में ग्वालियर गये हुए थे | एक दिन पिता जी का पत्र आया जिसमें चाची जी पर हुए वज्राघात का समाचार था | उनके पति अचानक चल बसे | मुझे उस समय तक इतनी दुनियादारी नहीं आती थी | इसलिए उस घटना की गम्भीरता को नहीं समझ सका किन्तु जब जबलपुर लौटे और चाची जी को देखा तब इतना तो लगा कि उनका जीवन पूरी तरह बदल चुका था | तीन छोटे बच्चे और प्रायवेट स्कूल की मामूली नौकरी | पति की पेंशन भी उस जमाने में बहुत ही कम थी | और यहीं से उनकी संघर्ष यात्रा शुरू हुई | चूँकि वे और मेरी माता जी एक दूसरे के बेहद निकट थीं इसलिए उनमें भी हमें माँ ही नजर आती थी | समय के साथ हम सब बड़े हो गये | उनके दोनों पुत्र भी नौकरी में आ गये | बेटी भी शिक्षिका बन गयी | सबके यथा समय विवाह भी हो गये | फिर जब साठिया कुआ छोड़ने का मन बना तब हम दोनों ने एक नई आवासीय कालोनी में अगल - बगल प्लाट खरीदे | मेरा घर तो बन गया किन्तु वे नहीं बनवा सकीं | इस तरह 27 साल बाद पड़ोस छूटा लेकिन रिश्तों में वही गहराई और मिठास बनी रही | बाद में हमारे वर्तमान निवास वाली कॉलोनी विकसित हो रही थी तब हम दोनों ने वहां भी आमने - सामने प्लाट खरीदे | यहाँ उनका घर पहले बन गया जबकि मैं कई बरस बाद इस जगह रहने आ सका | जब माँ और चाची जी फिर एक ही मोहल्ले में साथ हुईं तो वे बोलीं चलो आख़िरी समय तो साथ - साथ कटेगा | एक दिन तबियत कुछ ज्यादा बिगड़ने पर अपने पूरे परिवार के सामने माता जी से बोलीं सुनो , मेरे मरने पर मुंह में गंगाजल तुम ही डालोगी | माता जी ने उनसे कहा कि इस तरह की बात क्यों बोल रही हो तब उन्होंने केवल ये कहा , मेरी इच्छा है | 2013 में मेरे नाती दिव्यांश का जन्म हुआ जिसे देखकर वे भी बहुत खुश थीं | कुछ समय बाद बेटी अपने घर चंडीगढ़ चली गई | और उसी के बाद वे गम्भीर रूप से अस्वस्थ होकर अस्पताल में भर्ती होने पर उस नाती को देखने की जिद करने लगीं | हालांकि ठीक होकर वे घर तो आ गईं किन्तु मैं जब भी मिलता तब वे दिव्या के बेटे से मिलवाने की जिद करतीं और मैं शीघ्र मिलवाने का आश्वासन देकर लौट आता | कुछ महीने बाद नाती का अन्नप्राशन था | उसे लेकर बेटी , दामाद , समधी , समधिन भी आये | जिस दिन घर में पूजन एवं कथा थी उसके दो दिन पहले से चाची जी गम्भीर हो गईं | डाक्टरों ने घर पर ही सेवा करने कहकर संकेत दे दिया | उनकी चेतना धीरे - धीरे कमजोर हो रही थी | अचानक मेरा नाम लेकर बोलीं उसे बुलाओ और मैं पहुंचा तो फिर वही फरमाइश कि दिव्या का बेटा आ गया तो उसे मेरे पास लाओ | मैं उनके अचेतन मन से निकली इच्छा को समझकर तुरंत घर लौटा और दिव्या से कहा ऐसा लगता है चाची जी की अंतिम इच्छा इस बच्चे को देखने की है | इसलिए देर मत करो | बेटी तत्काल छह माह के अपने पुत्र को लेकर गई और उनके पास जाकर कहा लो दादी मैं आ गयी | वे आँखें खोलते हुई धीमी आवाज में बोलीं , मैं तो कहती थी कि ये आ गया लेकिन कोई बुलाता ही नहीं था | कुछ देर बच्चे को निहारकर फिर अचेतन हो गईं | दिव्या बहुत भरे मन से लौट आई | रात भर जैसे - तैसे बीती | उनकी एक पोती खुद भी डॉक्टर हो गई थी | अतः जो किया जा सकता था , किया जाता रहा | मैंनें रात को पंडित जी को फोन पर स्थिति समझाते हुए सुबह जल्दी आकर अन्नप्राशन विधान एवं कथा सम्पन्न करवाने का निवेदन कर दिया था | अगले दिन धार्मिक अनुष्ठान के बीच मैं उनकी जानकारी लेता रहा | कथा सम्पन्न होने पर पंडित जी सहित सभी सम्मानीय रिश्तेदारों द्वारा भोजन करने के उपरान्त परिवारजनों ने भी भोजन प्रसाद ग्रहण किया | और इतने में ही वह खबर आ गई जिसकी आशंका थी | दिव्यांश ने जीवन में खीर के तौर पर पहली बार अन्न चखा था | सभी इस संस्कार के बाद उसे दुलार रहे थे लेकिन महीनों से उसकी प्रतीक्षा कर रहीं चाची जी चली गईं | दिव्यांश को देखने की उनकी इच्छा तो बीती रात ही पूरी हो चुकी थी किन्तु उसके जीवन के इस महत्वपूर्ण मांगलिक कार्य के सम्पन्न होने तक उनका बना रहना भी इच्छा मृत्यु का उदाहरण नहीं तो और क्या था ? दूसरे दिन उनका अंतिम संस्कार हुआ | मेरी माँ का दुःख हम सभी समझ सकते थे | हमारे घर से चाची जी का घर 100 फीट से भी कम दूर नहीं है लेकिन माँ चलने में असमर्थ थीं और उतनी दूर उन्हें कार से ले जाना पड़ा | ज्योंहीं वे पहुंचकर सिसकने लगीं त्योंही परिजनों ने गंगाजल का पात्र उनके हाथ में देकर कहा अम्मा का आदेश था कि उनके मुंह में गंगाजल आप ही डालेंगी | माता जी उनसे कुछ छोटी थीं लेकिन छः दशक से भी ज्यादा की अंतरंगता के बाद इस तरह उन्हें विदा करते हुए उनके हाथ कांप रहे थे | चाची जी का अपना भरा पूरा परिवार है किन्तु मुंह में गंगा जल डालने की जिम्मेदारी माता जी को सौंपकर वे दिखा गईं कि रिश्ते जीवन के साथ ही नहीं , जीवन के बाद भी किस तरह निभाए जाते हैं | दोनों परिवारों के बीच स्नेह बन्धन यथावत है | चाची जी के नहीं रहने के बाद भी उनके परिजन पिता जी और माता जी के पास आकर सम्मान देते रहते हैं | हर भाई दूज और राखी पर मैं बहिन के घर जाना नहीं भूलता | लेकिन रह - रहकर मेरे मन में दो बातें उठती रहती हैं कि चाची जी ने माता जी को ही गंगा जल पिलाने का वह दायित्व सौंपा और दिव्यांश को देखने की इच्छा तथा फिर उसके अन्नप्राशन के विधि - विधान से पूर्ण होने होने तक ये संसार नहीं त्यागा | वैज्ञानिक दृष्टि से देखने पर इसमें कुछ भी असमान्य नहीं है लेकिन भावनात्मक दृष्टि से देखने पर लगता है कि इंसान को केवल साँसें ही नहीं अपितु रिश्ते भी जीने की शक्ति देते हैं | माता जी कहने को केवल उनकी पड़ोसी थीं जिनसे निकट सम्बन्ध बन जाना अनोखी बात नहीं थी | ऐसे अनगिनत उदाहरण मिल जायेंगे किन्तु उनके हाथों से गंगा जल ग्रहण करने की उनकी इच्छा और फिर दिव्यांश को देखने तक उनका जीवित बने रहना महज संयोग नहीं हो सकता | ऐसा लगता है इस तरह के सम्बन्ध पिछले जन्मों से जुड़े होते हैं | जिन्हें केवल महसूस करते हुए जिया और निभाया जा सकता है | अत्यंत विषम परिस्थितियों में उन्होंने जिस साहस और स्वाभिमान के साथ ज़िन्दगी गुजारी उसे मैंने निकट से देखा था | इसलिए मेरी पीढ़ी तक से उनका लगाव समझ में आता है | लेकिन जीवन के अंतिम क्षणों में और दो पीढ़ी बाद के नन्हें से बच्चे को देखकर ही प्राण त्यागने की उनकी इच्छाशक्ति के पीछे पिछले किसी जन्म का कोई सम्बन्ध था या कुछ और ये मैं आज तक नहीं समझ सका | आज जब खून के रिश्तों में दरारें आते देर नहीं लगतीं तब इस तरह के सम्बन्ध कैसे बनते और पीढ़ी दर पीढ़ी निभते हैं ये जाते - जाते चाची जी सिखा गईं | ...


Leave a comment