नई दिल्ली / मध्यप्रदेश/जबलपुर   256
उस दौर में कॉफ़ी हॉउस शहर का मूड तय किया करता था अब न वे बुद्धिजीवी रहे और न वह सेंटर टेबिल -आलेख : रवीन्द्र वाजपेयी दो - तीन दिन पहले व्हाट्स एप पर मेरे द्वारा चलाए जा रहे स्वच्छता अभियान के दौरान कागज पर टाईप किये हुए एक चार्ट को देखकर उसे पढ़ने का प्रयास किया तो आश्चर्य हुआ कि उसमें जबलपुर शहर के विभिन्न क्षेत्रों में चल रहे इंडियन कॉफी हॉउस के मोबाईल नम्बर के साथ सूचना थी कि 19 मई से उनके द्वारा पार्सल की होम डिलीवरी शुरू की जा रही है | शायद लम्बे लॉक डाउन के कारण हो रहे नुकसान की भरपाई के लिए उन्हें होम डिलीवरी शुरू करने पर मजबूर होना पड़ा | अभी कुछ दिन पहले ही मित्रवर Lakshmikant Sharma के एक फेसबुक पोस्ट में उन्होंने कॉफी हॉउस प्रबन्धन के मुखिया ओ.के. राजगोपाल का दर्द बयाँ करते हुए बताया कि इस सहकारी संस्था द्वारा मप्र और छत्तीसगढ में संचालित 81 और देश भर में 142 कॉफ़ी हॉउस बंद रहने से भारी नुकसान हो रहा है | इंडियन कॉफ़ी हॉउस का नाम आते ही एक पूरा अतीत मानस पटल पर उभर आता है | सत्तर - अस्सी के हलचलों से भरे हुए उन दशकों में जब जबलपुर की राजनीति के समानांतर छात्र राजनीति ने भी अपने पाँव मजबूती से जमा लिए थे , इंडियन कॉफ़ी हॉउस में ही शहर और जिले का मूड तय होता था | छात्र नेताओं के साथ राजनीतिक पार्टियों के लोग , प्राध्यापक , लेखक , पत्रकार , श्रमिक नेता और इन सबके अलावा कुछ अघोरी किस्म के लोग सुबह से रात तक इसकी कुर्सियों पर नजर आया करते थे | शहर के बीचों - बीच वाले करमचन्द चौक के कॉफ़ी हॉउस में घुसते ही जो सेंटर टेबिल थी वह बुद्धिजीवियों के उच्च सदन जैसी थी जिसकी बगल से गुजरते हम जैसे नए - नवेले वहां आसीन अनजाने व्यक्ति को भी अभिवादन करते हुए किसी दूर वाली टेबिल पर जाकर बैठते थे | वह सेंटर टेबिल थी ही ऐसी जगह जिस पर बैठे वरिष्ठजन संयुक्त परिवारों के बुजुर्गों की तरह हर आने - जाने वाले पर नजर रखते थे | उस टेबिल पर रखीं एश ट्रे से धुंआ भी बिना रुके निकलता रहता था | कॉफ़ी हॉउस से मेरा भावनात्मक लगाव इसलिए था क्योंकि मैंने छुरी - कांटे का प्रयोग करते हुए डोसा खाने और फिल्टर कॉफ़ी की शुरुवात यहीं से की थी | उस समय करमचन्द चौक के अलावा कैंट (सदर) में दूसरा कॉफ़ी हाउस था जिसका हॉल किसी राजमहल के भोजन कक्ष का एहसास करवाता है | कालान्तर में शहर के विभिन्न हिस्सों में उसकी शाखाएं खुलती चली गईं और अच्छा व्यवसाय भी कर रही हैं | लेकिन मैं जिस दौर के इंडियन कॉफ़ी हॉउस की बात कर रहा हूँ उसमें सही मायनों में भारत के बहुलतावादी समाज का असली रूप नजर आता था | कोलकाता के जिस भद्रलोक की बात करते हुए दुनिया भर में कहीं भी रहने वाला आम बंगाली आत्मगौरव की अनुभूति से भर उठता है , वही एहसास बेरोजगारी के उन दिनों में दो - तीन मित्रों को महज 4 - 5 रूपये खर्च करने के बाद हो जाता था | और यदि केवल कॉफ़ी में निबट आये तो पैसे बच भी जाते थे | दरअसल वहां चारों तरफ जो विभूतयां बैठा करती थीं उनके सामने आना - जाना ही अपने आप में महत्वपूर्ण था | उस दौर में बुद्धिजीवी ही नहीं सार्वजानिक संपर्कों में रूचि रखने वाले अनेक रईस लोग भी वहां आया करते थे | पुलिस के गुप्तचर विभाग का भी कोई न कोई करमचन्द चौक कॉफ़ी हॉउस में किसी कोने में हर समय बैठा होता था क्योंकि शहर का माहौल तो वहीं से बनता - बिगड़ता था | कुछ दूर स्थित मालवीय चौक छात्र नेता से राष्ट्रीय स्तर के नेता बने शरद यादव का अड्डा था | इसलिए भी उस कॉफ़ी हॉउस में चैतन्यता महसूस होती थी | वैसे दक्षिण भारतीय व्यंजनों के कुछ और छोटे कैफे भी शहर में थे लेकिन कॉफ़ी हॉउस का माहौल ही उसकी ख़ूबसूरती थी | उसका आकर्षण इतना जबरदस्त था कि जबलपुर से बाहर जाने पर यदि कहीं कॉफ़ी हॉउस का बोर्ड दिख जाता तो बिना कॉफ़ी पीने की इच्छा के भी वहां जाए बिना नहीं रहते | 1977 में मैं अपने दो मित्रों के साथ कश्मीर गया | श्रीनगर का लाल चौक उन दिनों देर रात तक गुलजार रहता था | वहां शर्मा जी के वैष्णों होटल में हम लोग रात का भोजन करते क्योंकि दिन तो घूमने में गुजरता था | लेकिन जिस गेस्ट हॉउस में ठहरे उसमें नाश्ता घिसा - पिटा बटर टोस्ट और चाय ही थी | एक रात लौटते समय लालचौक पर पहली मंजिल में इंडियन कॉफ़ी हॉउस का साइन बोर्ड दिख गया | उसे देखकर मानों मन की मुराद पूरी हो गई और जब तक श्रीनगर में रुके सुबह का नाश्ता कॉफ़ी हॉउस में ही हुआ | उस दौर के नेता भी किसी सितारा होटल के बजाय कॉफ़ी हॉउस में बैठना पसंद करते थे | मैंने सुन रखा था कि दिल्ली के कनाट प्लेस के कॉफ़ी हॉउस में दिग्गज नेताओं की बैठक थी | मैं भी एक दो बार वहां गया किन्तु संयोगवश नेताओं में से कोई नजर नहीं आया | एक दौर था जब देश की वामपंथी और समाजवादी राजनीतिक धारा इंडियन कॉफ़ी हॉउस से ही बहती थी | यहाँ बैठने वाले साधारण व्यक्ति या मुझ जैसे छात्र में भी बौद्धिक श्रेष्ठता का भाव सहज रूप से उत्पन्न हो जाता था | इस संस्थान के छोटे- बड़े कर्मचारी ही इसके मालिक होते हैं क्योंकि यह सहकारिता के आधार पर संचालित है | हर जगह एक सा फर्नीचर , साधारण किस्म के कप प्लेट , वेटर्स का अत्यंत मृदु व्यवहार , ताजी खाद्य सामग्री , हमेशा एक सा स्वाद और सबसे बड़ी बात उस ज़माने में ये थी कि जेब खाली होने पर भी वहां घंटों बैठा जा सकता था | एक टेबिल यूँ तो चार व्यक्तियों के लिए थी लेकिन संख्या बढ़ने पर टेबिल से टेबिल सटाकर क्षमता बढ़ाने की स्थायी सुविधा होती थी | एक तरह से इंडियन कॉफ़ी हॉउस उस समय एक अड्डा हुआ करता था लोगों से मिलने - जुलने , बतियाने और सामाजिक निकटता बढ़ाने का | कुछ ऐसे भी लोग उसमें आया करते थे जो अकेले ही होते और एक कॉफ़ी पीकर चले जाते | वहीं कुछ का समय तय होता जब वे मित्रमंडली सहित वहां आते और निश्चित समय तक बैठकर लौट जाते | जबकि कुछ ऐसे कॉफ़ी हॉउस प्रेमी भी रहे जो सुबह उसका दरवाजा खुलने से पहले ही आकर बाहर खड़े हो जाते | शहर के अनेक लोगों का पता ठिकाना c/o कॉफ़ी हाउस होता था | नियमित आने वालों के लिए लोग वहां सन्देश भी छोड़ जाते थे | इस प्रकार उस दौर का इंडियन कॉफ़ी हॉउस साधारण और असाधारण दोनों किस्म के लोगों के लिए प्रतिष्ठा का प्रतीक चिन्ह हुआ करता था | उसकी सादगी में ही उसकी संपन्नता झलकती थी | फर्श पर साधारण जूट मैट और बेहद सादी क्रॉकरी तथा फर्नीचर उसकी प्रतिष्ठा में आड़े नहीं आये क्योंकि उनका उपयोग करने वालों में नामी - गिरामी हस्तियाँ जो होती थीं | लेकिन बीते एक डेढ़ दशक में कॉफ़ी हॉउस अपने उस परम्परागत स्वरूप और पहिचान को बरक़रार नहीं रख सके | कुछ में होटल भी साथ जुड़ गये | दक्षिण भारतीय के अलावा भी वहां अन्य व्यंजन उपलब्ध हैं , थाली सिस्टम भी आ गया | अधिकतर कॉफ़ी हाउसों में अब पहले जैसा बौद्धिक समागम कभी - कभार ही दिखता है | हालांकि ऐसे अनेक मित्र हैं जो आज भी कॉफ़ी हॉउस जाये बिना नहीं रह सकते | मैं भी करमचंद चौक वाले कॉफ़ी हॉउस में यदा - कदा चला जाता हूँ लेकिन उसका पूरा आकार - प्रकार ही उलट - पुलट हो गया | यद्यपि अब वहाँ परिवार सहित आने वाले बेतहाशा बढ़ गये हैं लेकिन जिस सेंटर टेबिल का जिक्र मैंने किया वह इतिहास बन गयी है | कैंट ( सदर ) वाले कॉफी हॉउस में भले ही ज्यादा बदलाव नहीं हुआ लेकिन अब वह रेस्टारेंट ज्यादा लगने लगा है | जिस वजह से वहां होने वाला एहसास भी गुम होकर रह गया | शायद बदलते समय की जरूरतों और व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा के कारण कॉफ़ी हॉउस में भी बदलाव हुए , लेकिन जिस तरह बीते जमाने की सुपर हिट ब्लैक एंड व्हाईट क्लासिक फिल्म को रंगीन बनाकर दोबारा प्रदर्शित किये जाने पर भी वह अपने दौर के दर्शकों तक को नहीं खींच सकीं , वही मुझे कॉफ़ी हॉउस के मौजदा स्वरूप को देखकर प्रतीत होता है | यद्यपि आज भी वहां का स्वाद और कर्मचारियों का संस्कार अपरिवर्तित है किन्तु अड्डेबाजी वाला वातावारण और उसकी रौनक बने रहने वाली शख्सियतें उस ज़माने जैसी तो नहीं दिखतीं | बावजूद इसके अनेक बुद्धिजीवी आज भी वहां जाने का मोह नहीं छोड़ सके लेकिन अब इन्डियन कॉफ़ी हॉउस शहर की हवा का रुख तय नहीं करता | और यही कमी कम से कम मैं तो महसूस करता हूँ। ...


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