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ड्रैगन की पूँछ भाग 1 - चीन और विश्व लेख : प्रवीण शुक्ल सांप को अगर आप को कंट्रोल करना है तो आप उसकी पूंछ की तरफ से उसको पकड़ते है, पूंछ पकड़ कर आप उसे उठा लेते हैं। सांप का ही एक रिश्तेदार है, ड्रैगन, आजकल ड्रैगन को भी काबू में करने के लिए पूँछ उठाई जा रही है। ड्रैगन यानी चीन कोविड वायरस जैसे जैविक हथियार बनाने की कोशिश में था और दुनिया में रही है कि वुहान में उसकी एक ऐसी ही लैब से यह वायरस निकला हैं।अमरीकी सेक्रेटरी आफ स्टेट माइक पॉमपियो ने तो खुल कर चीन पर यह इल्जाम लगा रहे हैं और इजरायल जाकर सात देशों को अपने पक्ष में भी कर लिया। चीन की बढ़ती ताकत ने जियोपोलिटिकल अलाइनमेंट बदल दिया हैं, पहले हम रूस की तरफ थे पर अब धीरे धीरे अमरीकी खेमे की तरफ बढ़ रहे हैं, तेजी से दुनिया मे दो टीमें बन रही हैं टीम अ: अमरीका, भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान, ब्राजील, ब्रिटेन और कनाडा मिलकर चीन की बढ़त पर दबाव बना रहे हैं तो वही 'शंघाई ' के टीम च : चीन रूस सेंट्रल एशिया के रूसी प्रभाव वाले मुल्क जिनमें कजाकिस्तान प्रमुख है, चीन,पाकिस्तान और बैकडोर से ईरान और नार्थ कोरिया भी शामिल हैं। रूस के आमंत्रण पर भारत भी नाममात्र के लिए इसमे शामिल हैं। यूरोप अभी चीन पर कुछ ज्यादा ही निर्भर हैं इस लिए यूरोपीय संघ अभी इस अलाइनमेंट से दूरी बनाए हुए हैं मगर यूरोप के टीम ताकतवर मुल्क जर्मनी फ्रांस और इटली कल कहां खड़े होंगे यह कोई बड़ी पहेली नही हैं। ड्रैगन की पूंछ को कहां कहां से उठाया : 1) साउथ चाइना समुद्र: चीन जबरदस्ती 95% साउथ चाइना समुद्र पर अपना अधिकार जमा रहा हैं तो 'टीम अ' इसमे विएतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस का भी 50%से ज्यादा हिस्सा मानता हैं। अगर चीन से सम्भावित जंग हुई तो यह इसी इलाके में होगी, आज यह कोल्ड वॉर का सबसे प्रमुख थियेटर हैं। 2) हांगकांग : हांगकांग को जब अंग्रेजों ने व्होद था तब एक देश और दो संविधान के तहत चीन ने हांगकांग और ब्रिटेन से वादा किया था। पिछले साल तो एक छोटा सा कानून चीन ने बदला था तो इतना बवाल हुआ था अब इस वर्ष चीन ने हांगकांग के संविधान को खत्म करने का बिल लाया हैं अब क्या होगा सोचिये ? 3) ताइवान : इतिहास में ताइवान जापानियों के पास था बाद में ब्रिटिश सेना ने इसे जीत कर चीन में मिला दिया। फिर जब कम्युनिस्ट सत्ता में आये तो चियांग काई शेक वाले राष्ट्रवादी दल को चीन से भगा दिया गया जो बाद में यूरोप और अमरीकी चटरचस्य में ताइवान में सेटल जो गए। चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता हैं तो ताइवान अपने को नही मानता। इस वर्ष ताइवान में चीन विरोधी ताइवानी नेशनलिस्ट नेता चुनाव जीती हैं अब चीन परेशान हैं। अभी विश्व स्वास्थ्य संगठन की बैठक में ताइवान को अलग सीट देने की चर्चा पर चीन उखड़ गए था। 4)विनिवेश -डिसइन्वेस्टमेंट: कोविड के बाद से बड़ी अमरीकी और यूरोपीय कम्पनियों ने सारी मैन्युफैक्चरिंग चीन में करने की अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना शुरू कर दिया हैं। यह कंपनियां अपने निवेश जैसे फैक्ट्रियां रिसर्च सेंटर आदि को भारत वियतनाम जैसे मुल्कों में डायवर्सिफाई करना चाहती हैं यानी सारे सेब चीन की टोकरी में ना रख करके अब इन सेबों को भारत, चीन, मलेशिया, थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे मुल्कों में बांटा जाएगा। 5) साइनो अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार विवाद : विश्व का प्रमुख बाजार अमरीका हैं, तो इस बाजार की डिमांड का सामान बड़ी मात्रा में चीन में बनता हैं जिससे अमरीका को चीन से करीब करोड़ का व्यापार घाटा होता हैं। 2018 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन को बड़ा झटका देते हुए पहले सोलर पैनल फिर स्टील और उसके बाद मई 2019 में 200 अरब डॉलर के उत्पादों पर आयात शुल्क ढाई गुना तक बढ़ा दिया. इसके चलते अमेरिका में चीनी सामान की कीमत में 10 से 25 फीसदी तक का उछाल आ गया था। चीन अपनी लेबर को जबरदस्ती सस्ती सैलरी और इंडस्ट्री को छुपकर सब्सिडी देकर अपना सामान सस्ते में बना कर दुनिया भर में पटकता था अब ट्रम्प ने जिस तरह से इन सस्ते सामानों पर टैक्स बढ़ोतरी कर इन महंगा कर दिया हैं उससे चीन दुखी हैं। 2019 में ही अमरीका ने कहा था वो करीब एक हजार करोड़ के चीनी सामानों पर टैक्स बढ़ाएगा। सोचिये 2020 में अमरीका क्या करेगा ?? 6) क्षेत्रीय विवाद : चीन अपने पड़ोसियों भारत जापान विएतनाम रूस को सामरिक रूप से घेरने की कोशिश करता रहता हैं। उसने विएतनाम से पार्सल द्वीप, जापान का सेनकाकू द्वीप, भारत का अक्साई चिन, गिलगित बाल्टिस्तान के शाक्षघाम घाटी समेत काराकोरम का बड़ा हिस्सा चीन के पास हैं। अस्ट्रिलिया के बीफ और बारले पर अत्यधिक टैक्स वृद्धि और वहां बढ़ती चीनी आबादी और इन्वेस्टमेंट आदि प्रमुख विवाद हैं। यह सब देश टीम अ बनाकर चीन की विस्तारवादी नीति को रोकने की कोशिश में हैं। (शेष अगले अंक में) ...


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