नई दिल्   318
आप जानते हैं, गलती से, अपनी समझ से सिर्फ इतनी पुरानी तिथि नियत करने के बाद, जिसके विषय में मैक्समुलर का विश्वास था कि यूरोप के अड़ियल सोच के लोग इसे मानने को भी तैयार न होंगे, कहा था कि वेद का रचना काल कम से कम १२०० ख्रिष्टाब्द पूर्व से नीचे नहीं लाया जा सकता। वह बाद में लगातार सफाई देते हुए यह स्वीकार ने के कर रहे थे कि दूसरे राष्ट्रों के मामले में ऐसे ही परिवर्तनों के लिए हम जितनी अवधि रखते है, उससे यह बहुत कम है और इस तरह अपने कालनिर्धारण की आलोचना करने वालों से सहमति जताते हुए मैक्समूलर स्वयं अपने काल निर्धारण को गलत ठहराते रहे। फिर भी आक्रमण के पक्षधर उनके उस काल निर्धारण को अकाट्य मान उसे क्यों दुहराते रहे? क्योंकि संस्कृत केअधिकारी माने जाने वाले दूसरे सभी यूरोपीय विद्वान ऋग्वेद को कम से कम २००० या ढाई हजार साल ईसापूर्व मानते रहे। आश्चर्य है कि हमारे स्वनामधन्य मार्क्सवादी इतिहासकार भी जो प्राच्यवादी विद्वानों को अविश्वसनीय मानते थे, उनकी मखौल इसलिएउड़ाते रहे क्योंकि इनका रुख जेम्स मिल जैसे रुग्ण साम्राज्यवादियों जैसा नकारात्मक नहीं था। पर इतना ही काफी नहीं था। मैक्समूलर १२०० ईपू की लघु काल सीमा सुझाने पर लज्जित थे, भारतीय मार्क्सवादी इसे वैज्ञानिक आकलन मान कर जरूरत पड़ने पर पांच सात सौ साल पीछे एक आक्रमण हड़प्पा का ध्वंस कराने के लिए कर सकते थे और वेदों की रचना के लिए एक दूसरा और सभ्यता के प्रसार के लिए एक तीसरा आक्रमण करा सकते थे और वैदिक ऋचाओं का रचना काल सातवीं शताब्दी तक ला सकते थे। "वह (कोसंबी) १७५०, १५००, १२००, १०००, ६०० ईसापूर्व के आर्यों, आर्य प्रभावों, संपर्कों की बात करते हैं, उसके पीछे यह ध्वनि है कि पहले आक्रमणकारी जर्मन थे, दूसरे मध्येशियाई, तीसरे लघुएशियाई, जिनसे भारत का संपर्क बाद में भी बना रहा ।" (देखें, कोसंबी कल्पना से यथार्थ तक, राजकमल, पृ. २११; साथ ही देखें 'भगवतशरण उपाध्याय', प्राचीन भारत के इतिहासकार, सस्ता साहित्य मंडल, पृ. १०२)।इतिहास से लेकर वर्तमान तक की इतनी अधकचरी समझ अन्यत्र ढूंढ़े नहीं मिलेगी जैसी भारतीय कम्युनिस्टों और संघियों में मिलती है। अंतर केवल यह कि पहले नासमझी को वैज्ञानिक सोच कहते हैं, दूसरे उसे भारतीय संस्कृति कहते हैं। एक अन्य अन्तर यह कि कम्युनिस्टों को सेकुलरिज्म की आड़ में हुड़दंग मचाने का जितना अवसर मिला वह दूसरे को नसीब नहीं हुआ, पर जब भी जितना भी मिला है इन्होंने यह बोध कराने में संकोच नहीं किया है कि ये हर क्षेत्र में उन्हें पछाड़ सकते हैं, सिवाय वाग्मिता के। विषय से हट कर यह तुलना इसलिए जरूरी प्रतीत हुई कि जब मैं भारतीय कम्युनिस्टों और सेकुलरिस्टों की नासमझी को उजागर करता हूं तो संघ से जुड़े मेरे मित्रों को यह बदगुमानी न हो जाय कि भारतीय समाज और इतिहास के नाम पर उनके मौलिक उद्गारों का मैं समर्थन करता हूं। किसी अन्य का गलत होना आपके सही होने का प्रमाण नहीं। सही होने के लिए किसी भी विचार या निष्कर्ष को सभी उपलब्ध स्रोतों से परखना और उसकी अन्त:संगति और संभाव्यता या औचित्य परखते हुए आश्वस्त होना पड़ता है और फिर भी किसी नए घटक के सामने आने या छूट गए घटक के उजागर होने पर गलत सिद्ध होने के लिए तैयार रहना होता है। यही विशेषता विज्ञान को विज्ञान बनाती है और इसका अभाव मिथक और विश्वास को मिथक और विश्वास। हमने जिस बात पर बल देने के लिए यह भूमिका बांधी थी वह यह कि (१) वैदिक साहित्य का गहन अध्ययन करने वालों ने ऋग्वेद को कम से कम दो से ढाई हजार साल पुराना माना था। (२) ऋग्वेद के अनुवादक एच एच विल्सन ने वैदिक अन्त:साक्ष्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला था कि वैदिक समाज लगभग वैसा ही था जैसा यूनानियों ने सिकन्दर के आक्रमण के समय में भारत को पाया था। (३) उससे भी पहले भाषा, संस्कृति, विज्ञान, दर्शन और देवशास्त्र की साझी विरासत के आधार पर जनक समाज सभ्य और उन्नत सिद्ध हो रहा था। (४) आक्रमण की संभावनाओं पर विचार करते हुए पश्चिमी विद्वानों ने भी प्रदर्शनीय वस्तुपरकता दिखाते हुए कहा था कि ऋग्वेद जो ऐसे मामले में हमारा एकमात्र स्रोत है उससे किसी आक्रमण की पुष्टि नहीं होती। (५) चरवाही संस्कृति की विशेषता है कि वे किसी एक जानवर का पालन करते हैं। हाल यह कि भेड़ चराने वाले के रेवड़ मे बकरी, या इसके विपरीत नहीं होता। गोरू चराने वाले घोड़ों के जत्थे नहीं पाल सकते इसलिए किसी समाज में इनका और साथ ही दूसरे जानवरों का बाहुल्य पशुधन के मामले में समृद्धि का द्योतक तो है पर यह समाज कृषि, उद्योग और वाणिज्य में उन्नत हो सकता है। (६) जिस घोड़े पर सवार आक्रामकों की श्रेष् ...


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