जम्मू/कश्मीर   105
स्मृतिहीन भारतीय लोगो! आज ज्येष्ठ मास की निर्जला एकादशी है। आज जन्मतिथि है उस व्यक्तित्व की जिसने अन्तिम बार पूरे भारतीय वाङ्मय को समग्रता से एकत्र करके उसे सदा के लिए प्रामाणिक रूप से संरक्षित कर दिया। आज उसी महानतम आचार्य के जन्म की तिथि है, और वो आचार्य हैं 'महामाहेश्वराचार्य अभिनवगुप्त' जिन्हें हमारी परम्परा सम्मान से "अभिनवगुप्तपाद" कहती है। उनके इस नाम के पीछे भी एक रोचक कहानी है, जिसे आगे कहा जायेगा। वास्तव में आचार्य अभिनवगुप्त ही एकमात्र ऐसे आचार्य हैं जिन्होंने भारतीयता के प्रत्येक आंतरिक आयामों की उच्छिन्न परम्परा के बीच के अवकाश (स्थान) को भरा है, उसे लोकानुकूल रूप से तर्कपूर्ण ढंग से व्याख्यायित किया है, उनमें शोधन किया है, नवीन,मौलिक उद्भावनाएँ दी हैं,और बिखराव को समेट कर एक सूत्र में उपस्थापित किया है, और भारत को एक विश्वविजयी दर्शन दिया है। आचार्य अभिनवगुप्त ने समग्र भारतीय दर्शन, साहित्य-शास्त्र, नाट्य-शास्त्र, संगीत, साधनाविधि जैसे सभी ऐसे विषय जिनसे किसी संस्कृति का निर्माण व परिचालन होता है ,उन सब पर अपनी विशद लेखनी चलाई है। भारतीय ज्ञान परम्परा में यदि सदियों से कोई ऊहापोह या विवाद चला आ रहा हो और फिर यदि आचार्य अभिनवगुपउसपर अपना मत रख दिया है,तो वह विवाद सद्यः ही समाप्त होकर एक सामरस्यपूर्ण 'अभिनवसिद्धांत' को प्राप्त हो जाता है। ख़ैर यह एक परिचयात्मक आलेख ही है कोई शोध-पत्र नहीं। लगभग 7 वीं शताब्दी में काश्मीर के राजा ललितादित्य ने कन्नौज (तत्कालीन कान्यकुब्ज) पर विजय पाई और वहां से धुरन्धर विद्वान और शैवागम के आचार्य अत्रिगुप्त को अपने राज्य कश्मीर में ले आये, वहां वितस्ता नदी के तट पर भगवान शीतांशुमौलिन (शिव) का अतिविशाल मन्दिर बनवाया तथा अत्रिगुप्त को विद्याप्रसार के कार्य मे नियुक्त किया, उन्हीं आचार्य की पीढ़ी में लगभग 950 ईस्वी में आचार्य अभिनवगुप्त का जन्म हुआ, यह भारतीय ज्ञानपरम्परा के क्षेत्र में एक महनीया घटना थी। आचार्य अभिनवगुप्त के पिता का नाम श्री नृसिंहगुप्त /चुखुलुक और माता का नाम विमला/विमलकला था, वो एक योगिनी थीं (तंत्र में 16वीं कला को विमलकला कहते हैं) अतः आचार्य अभिनवगुप्त को उनके यशस्वी टीकाकार जयरथ ने "योगिनीभू" कहा है। व्याकरण उनके घर की विद्या थी,जिसमे आचार्य अभिनवगुप्त पारंगत थे उन्होंने व्याकरणिक कोटियों का उपयोग अपने दार्शनिक सिद्धांतों को समझाने के लिए किया है जो कि तर्क प्रणाली में एक अद्भुत महत्ता रखता है। आचार्य अभिनवगुप्त ने 50 से अधिक ग्रन्थ रचे। उन्होंने जो भी टीकाएँ लिखीं, वो अपने आप मे एक स्वतंत्र ग्रन्थ बन गए। उन्होंने समस्त 64 आगमों को एक-वाक्यता प्रदान करते हुए, उनमें सामरस्य करते हुए एक विशालकाय ग्रन्थ "तंत्रालोक" की रचना की, जिसे 'अशेषआगमोपनिषद' कहा जाता है,यह विशालकाय ग्रन्थ भारत की सम्पूर्ण साधनात्मक प्रक्रियाओं को अपने में समेटे हुए एक समुद्र की तरह लहराता है, ये हमारा दुर्भाग्य है कि हम इस समुद्र का अवगाहन नहीं करते हैं। तंत्रालोक में भारतीय साधना, रहस्य, कला सिद्धान्त ,दर्शन आदि का अत्यंत सहज विवेचन है। काश्मीर शैवदर्शन जिसे त्रिक या प्रत्यभिज्ञा दर्शन भी कहते हैं, वे उसके प्रतिष्ठापक आचार्य हैं। दार्शनिक प्रतिपादन में आचार्य अभिनव भारत के ही नहीं बल्कि विश्व के महानतम दार्शनिकों में अग्रगण्य हैं। रस सिद्धांत पर उनके मत की कीर्तिपताका को भला कौन नहीं जानता। इस बात पर काव्यप्रकाश के टीकाकार मणिक्यचन्द्र का बहुत सुन्दर पद्य भी मिलता है। साहित्य,दर्शन,संगीत,वास्तु के महानतम आचार्यों ने उन्हें अपने अपने ग्रन्थ में तत् तत् शास्त्रों का ज्ञाता मानकर उन्हें नमन किया है। आज हम जिस नाट्यशास्त्र को लेकर विश्व मे अपने कलात्मक प्रयोग और उनकी दार्शनिकता को लेकर स्वयं को गौरवान्वित अनुभूत करते हैं,उसका श्रेय आचार्य अभिनवगुप्त को है, क्योंकि नाट्यशास्त्र को हम जिस के द्वारा समझ पाते हैं, वह आचार्य अभिनवगुप्त की 'अभिनव-भारती' टीका ही है, उसमें आचार्य ने भारतीय संस्कृति के साहित्यिक और कलात्मक पक्षों को मूल रूप में हमारे सामने रख दिया है, उन्होंने नाट्यशास्त्र की व्याख्या में जो 600 वर्ष का बीच का रिक्त स्थान था, उसकी भी पूरी भरपायी उन उन पुराने आचार्यों के मत के साथ करके, हमें शोध की सहजता और भारतीय परम्परा के इतिहास की भी रक्षा की है। भारत में गीता के जो रहस्यात्मक व्याख्यान की परम्परा चली वह आचार्य ने ही प्रारम्भ की, उन्होंने दुराग्रहों का खंडन किया और सर्वसमावेशी सामरस्य का स्थापन किया। उन्होंने विभिन्न गुरुओं से जाकर विद्या का अध्ययन किया था,लगभग 20 गुरुओं का नाम उन्होंने उल्लिखित किया है। इस बात पर भी उनका एक बहुत सुन्दर पद्य है। कश्मीर भारत का शारदा-पीठ रहा है, भारतीय ज्ञान परम्परा के पचासों उद्भट विद्वान वहां से निकले हैं। कश्मीर की परम्परा आचार्य अभिनव को "दक्षिणामूर्ति" (ज्ञान का देवता/शिव का एक रूप) मानती है। दक्षिण के विद्वान् मधुराज योगिन ने उनका जो पेन पोर्टेट बनाया है, उसके पद्य सुनकर उनकी भव्यता का पता चलता है। उन्होंने कश्मीर के बीरू नामक स्थान पर अपने भैरवस्तोत्र को गाते हुए 72 वर्ष की आयु में हज़ारों शिष्यों को जिस गुफा के द्वार पर रोककर अंदर जाकर समाधि ली थी,वह आज भी है,किन्तु उसपर कुछ बुरे लोगों ने कब्जा कर रखा है, जिसकी तसावीर कुछ वर्ष पूर्व आईं थीं। आज भारतीयों से वह गुफा अपने प्रत्यभिज्ञान की मांग करती है। आज बार बार कश्मीरियत शब्द आता है, सच्ची कश्मीरियत देखनी हो तो वह कश्मीर के बारे में कहे गए उनके मनोरम पद्यों में देखिए, उन्हें अपने कश्मीरी होने का बड़ा आनन्द है, और वो उसकी प्रशंसा भी करते हैं। यह आलेख मात्र कुछ बिंदुओं के परिचय के रूप में आज के दिन के लिए था, मैं इन सभी बिंदुओं पर लाइव सीरीज करने की सोच रहा हूँ। एक बात और मैं किसी और से शिकायत क्या करूँ, पर कश्मीरी-ब्राह्मण जो बड़े बड़े पदों पर रहे उन्होंने अपनी सन्ततियों को आचार्य अभिनवगुप्त के नाम से परिचित नहीं करवाया ,शैवदर्शन के बारे में नहीं बताया। ख़ैर समय आएगा,,, अंत मे मेरा एक पद्य- भेदसिद्धान्तजीमूतविध्वंसनविचक्षणम्। भजेsभिनवगुप्ताख्यं विमर्शानन्दबोधकम् ।। आनन्दबोधपर्याय शैवज्ञानमहार्णसे। खेचरीसंधृताङ्कायाभिनवगुरवे नमः।। भेद-सिद्धान्त रूपी पर्वत को विध्वंस करने में विशेष रूप से प्रवीण, विमर्श यानि चेतना के होने की सतत अनुभूति के आनन्द का हम सबको (अपनी विद्वता के माध्यम से) बोध कराने वाले अभिनवगुप्त नाम से ख्यात गुरु का मैं भजन करता हूँ। (भेद-सिद्धान्त- द्वैत-विचार/ इस चराचर को एक ही परम चेतना का विकास ना मानना) आनन्द-बोध (आने पूर्णस्वरूप के ज्ञान की रसात्मक अनुभूति) के पर्याय, शैव-दर्शन/आगमशास्त्र के महान समुद्र, खेचरी शक्ति को अपनी गोद में लेकर आनन्द मगन रहने वाले आचार्य अभिनवगुप्त गुरु को नमन है। नोट- (यहां खेचरी शक्ति कहा गया है ना कि खेचरी मुद्रा) खेचरी शक्ति:- दार्शनिक शब्दावली में जो विमर्श शक्ति है उसे तांत्रिक शब्दावली में खेचरी कहते हैं। यहां भाव यह हैं कि आचार्य अभिनवगुप्त चेतना के लिए आधार बनते हुए परमशिव रूप को प्राप्त हैं। --सर्वेश त्रिपाठी ...


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