गाज़ीपुर/उत्तर प्रदेश   183
अब न रहे वो पीने वाले अब न रही वो मधुशाला... मल्ल शिरोमणि स्व मंगला राय के कुछ संस्मरण। मैंने सुना था कि उनके पास दारा सिंह का फिल्मो में काम करने हेतू प्रस्ताव आया था उस समय पहलवानी से सेवानिवृत्त होने के बाद की आर्थिक कठिनाईयों से बचने हेतु किन्तु उसे अपने अभिभावकों (प्रमुख रूप से अपने चाचा स्व राधा राय जी )के नाराजगी के भय से ठुकरा दिया क्योंकि सिनेमा और पहलवान एक नदी के दो किनारे मानें जाते थे उस समय ।तस्वीरो को देख के नई पीढ़ी शायद आश्चर्य करें कि ऐसे भी इंसान सही में होते थे क्या? आगे पढें मंगला राय के भतीजे श्री तारकेश्वर राय जी के शब्दों में- मेरा यह संस्मरण पिछले साल काका की मूर्ति अनावरण के अवसर पर प्रकाशित स्मारिका में छपा था ! मूर्ति का अनावरण मेरे गाँव में माननीय सांसद वीरेन्द्र सिंह मस्त ने माननीय मनोज सिन्हा जी सांसद और माननीया अलका राय विधायक की उपस्थिति में किया था ! - - - मंगला काका - - मुझसे अनुरोध किया गया है कि काका के बारे में कुछ लिखूं ! उनके बारे में इतना कुछ लिखा जा चुका है कि सब विकिपीडिया पर उपलब्ध है ! नहीं उपलब्ध है तो उनके व्यक्तिगत संस्मरण जो मात्र हम लोगों की ही अमूल्य निधियां हैं ! उनकी मल्ल कला के बारे में भी मुझे बहुत कुछ ज्ञात था परन्तु वह सब पिताजी द्वारा बताया हुआ था ! इस बारे में मैंने सन 1950 में ही जब मैं दर्जा छह का विद्यार्थी था तो अपने पिताजी ( जो उनकी प्रत्येक बड़ी कुश्ती के प्रत्यक्षदर्शी थे ) द्वारा सुनकर एक बड़ा लेख भूमिहार ब्राह्मण स्कूल ( अब झारखंडे महादेव स्कूल ) की पत्रिका में लिखा था ! उसमें उनकी सभी कुश्तियों का प्रथम्दृश्या वर्णन था ! परन्तु अब उसकी याद नहीं है ! हाँ उनके साथ बिताये अमूल्य समय की स्मृतियाँ हैं सो भी उम्र के साथ धुंधली पड़ती जा रही हैं ! मैं दर्जा नौ में था ( सन 1953 )! काका की प्रसिद्द पहलवान ग़ुलाम गौस पर विजय वाली अंतिम कुश्ती बनारस में ईश्वरगंगी के पोखरे पर हो चुकी थी और वे सदा के लिए गाँव आ गए थे ! गर्मी की छुट्टियों में प्रत्येक दोपहर और शाम को मेरी उनके साथ शतरंज की बाजी होती थी ! दोपहर में उनके दुवार की खम्भिया में और शाम को काशी के बेदा पर ! मैं उस समय नौसिखुवा ही ( काका ने ही सिखाया था ) परन्तु कुछ दिन बाद ही इतना सीख गया था कि उनको चुनौती तो नहीं पर खेल का आनंद देने लगा था ! बाद में जब मैं काशी विश्वविद्यालय गया और छात्रावास में भी शतरंज खेलने लगा तो गाँव आने पर उनको कड़ी टक्कर देने लगा ! परन्तु मुझे यह कहते हुए किचित भी संकोच नही कि मैं उनसे कभी भी जीत नहीं सका ! पुराने लोग जो कहते हैं कि स्वस्थ देह में ही स्वस्थ मष्तिष्क होता है सो झूठ नहीं! ऐसे ही उनका संगीत प्रेम भी था ! खेलते समय वे कुछ न कुछ गुनगुनाया करते थे ! उनकी एक ठुमरी मुझे आज तक याद है ! “ मुरलिया कौने गुमान भरी ! रूख तोर जानत जड़ पहिचानत, जंगल की लकड़ी ” ! गला भी कमाल का ! अनेक कलावन्तों से भी उनका व्यक्तिगत परिचय था ! मुझे याद है प्रसिद्द पद्मश्री ( कालांतर में पद्मविभूषण ) सिद्धेश्वरी देवी उनके गदा की पूजा में जोगा आई थीं ! उनके साथ प्रसिद्द तबलावादक पंडित अनोखे लाल मिश्र संगत कर रहे थे ! ऐसे ही शिवमूर्ती बहन की शादी हुई तो प्रसिद्ध नर्तक पद्मश्री शंभू महाराज नेवता पर आये थे ! हाँ, एक बात और ! उनका भतीजा होने का लाभ अपने सेवाकाल में मैंने अक्सर लिया ! आजमगढ़ में सुखदेव पहलवान और गोरखपुर में ब्रह्मदेव पहलवान के अखाड़े पर मैं जाया करता था और कर्मचारियों में मेरी प्रतिष्ठा बढ़ती थी ! ये दोनों प्रसिद्द पहलवान मेरे गाँव पर महीनों रह कर रियाज़ कर चुके थे ! स्मृतियाँ समाप्त नहीं होंगी ! धीरे धीरे याद आती हैं ! इसलिए विदा (यह उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन से सेवानिवृत्त सहायक महाप्रबंधक आदरणीय Tarkeshwar Rai के संस्मरण हैं) ...


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