नई दिल्ली/भारत   131
अक्सर आपने लोगों को कहते सुना होगा। “सच को आंच नहीं” !भारतवर्ष में सालों से जो झूठ मडा गया। भारतीयों को Arya (आर्य) और द्रविड़ की झूठी कहानियां बता कर उन्हें सत्य से भ्रमित रखा गया। आज तक भारत में सभी ने एक ही बात किताबों में पड़ी और एक ही बात किताबों में सुनी। Arya बाहर से आये थे। उन्होंने भारत के मूलनिवासियों पर हमला किया और यही बस गए। यही नहीं फैलाया तो यह भी गया कि आर्यो ने मूलनिवासियों को अपना हज़ारों सालों से दास बना कर रखा। भारत का इतिहास दोबारा लिखा जायेगा ? भारत का अब इतिहास बदलने जा रहा है। अब भारत के इतिहास को दोबारा से लिखने की आवश्यकता है। सन 2015 में अरमेन्द्र नाथ के निर्देशन में खुदाई हुई थी। हरियाणा राज्य के राखीगढ़ी के अंदर एक नरकंकाल मिला था। नर कंकाल एक खेत के अंदर खुदाई करते समय मिला था। यह नर कंकाल लगभग 2500 BCE पुराना बताया जा रहा है। यानी आज से 4500 वर्ष पुराना है। हज़ार से ज़्यादा लेब में भेजा गया सैंपल यह नर कंकाल जो पुरातत्त्व विशेषज्ञ को मिला था, वो किसी स्री का कंकाल था। जब पुरातत्त्व विशेषज्ञों ने इसपर लगातार शोध किया और इसके डीएनए सैंपल को दुनिया भर की 1000+ लिबोरिटी में भेजा गया डीएनए जाँच के हेतु। लगभग तीन सालों तक चले इस शोध और डीएनए रिपोर्ट से यह सामने निकलकर आया। उस प्राप्त नरकंकाल का डीएनए, प्राचीन आर्यन डीएनए रिपोर्ट से मेल नहीं खाता है। खुदाई से प्राप्त नरकंकाल में भारतीय जीन मौजूद है। नाकि प्राचीन Arya जीन। 10,000 सालों से भारतीयों का एक ही जीन 10,000- 12,000 सालों से भारतीय लोगो का मूलभूत एक ही जीन है। वो बात अलग है भारत में विदेशियों के आते रहने की वजह से जीन में कुछ बदलाव ज़रूर आये है, किन्तु जीन का आंकलन मूलभूत जीन से ही किया जाता है। इसके अलावा 120 सैंपल लिए गए। हर एक सैंपल को 1000+ लैब में भेजा गया। 2,65,000 मार्कअप मिला जिसमे पाया गया समय-समय पर जीन में मिलावट हुई। इस मिलावट की मात्रा कम है। लेकिन भारतीयों का मूलभूत जीन एक ही पाया गया है। भारत में बहुत ज़्यादा डाइवर्सिटी थी। जो की यूरोप, अमेरिका, साउथ अफ्रीका से भी ज़्यादा है। भारत में Arya (आर्य) कभी आये ही नहीं इस रिपोर्ट के बाद एक और बड़ा खुलासा हो गया है कि, अफगानिस्तान से लेकर अंडमान निकोबार तक सबका जीन एक ही है। कोई Arya (आर्य) नहीं है कोई द्रविड़ नहीं है और ना ही कोई आदिवासी है। इन सभी का जीन एक ही है। द्रविड़ ही आर्य है और आर्य ही द्रविड़ है। यानी कि, भारत पर आज से 2500 BCE पहले किसी ने हमला नहीं किया था और उस वक़्त तक कोई भी भारत नहीं आया था। नरकंकाल पर किसी भी तरह के चोट के निशान नहीं है। पुरातत्त्व विशेषज्ञों का मानना है, इस स्त्री की मौत बाढ़ की वजह से हुई होगी। पुरातत्व विशेषज्ञ बसंत शिंदे ने कहा है अध्ययन के लिए जेनेटिक डाटा और पुरातात्विक डाटा को मिलकर अध्ययन किया गया है। – भारत के लोगो ने खुद ही खेती करना, शिकार करना एवं पशुपालन करना सीखा था। साथ ही भारत के लोगो ने अपनी सभ्यता को खुद ही विकसित किया है। भारत में बाहर से आकर भारतीयों को किसी ने कुछ नहीं सिखाया। प्राचीन भारत के विषय में कहा गया कि, भारत में लोग ईस्ट, वेस्ट एवं नार्थ एशिया से आकर भारत में बस गए थे और उन्ही लोगो ने उन्नत सभ्यता का विकास किया जो कि गलत है। जीवन के शुरुआत से लेकर पहले शहरी निर्माण तक की उन्नति व विकास भारतीयों ने खुद किया है। जीवन जीने के बेहतरीन तरीके की खोज भारतीयों की देन है ना कि विदेशियों की। साउथ एशिया का भारतीय समूह पूरी तरह से स्वतंत्र था। यह किसी भी देश के लोगो पर निर्भर नहीं था। इन्होने 7000 BCE से लेकर उन्नत हड़प्पन सभ्यता तक तरक्की की। भारत में बाहर से कोई आता तो अपनी सभ्यता और कल्चर लेकर साथ में ज़रूर आता जैसा की अक्सर होता रहा है। लेकिन भारतीय कल्चर सभ्यता में बाहरी प्रभाव देखने को नहीं मिलता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया पुरातत्व विशेषज्ञ मानते है, प्राचीन भारत में पहले लोग नक्शा बनाते थे, नक़्शे के अनुसार ही शहर बसाते थे। नक़्शे में बनाई गयी गलिया हवा के समान्तर और सटीक होती थी। आज के समय में बिना जीपीएस सिस्टम उपयोग किये ऐसी सटीक गलिया नहीं बनाई जा सकती है । माना जा रहा है राखीगढ़ी के नीचे पूरा का पूरा शहर होने की सम्भावना है। खुदाई के दौरान मिले सामान कई नरकंकाल के अलावा भी खुदाई में प्राचीन भारत की सभ्यता के बहुत सारे सामान मिले है। जो आज के समय में लोगो को अचंभित करके रख देंगे। रॉक और पिल्लर, पाल्म लीव्स, प्लेट्स, पत्थरो की दीवारे, मिट्टी की टेबल, हथियार, पॉटरीज,गहने, मूर्ति, प्राचीन पेंटिंग इत्यादि। नुकिले हथियार, तलवार एवं पुराने ज़माने के पत्थर इत्यादि। खुदाई के दौरान मिटटी के बर्तन, मिटटी के पॉट भी मिले जिसको बजने पर मेटल के बर्तनो जैसी ध्वनि सुनाई देती है। राखीगढ़ी में खुदाई करते समय आगी जलने वाले भट्टे भी मिले है जो अत्याधुनिक है। ऐसे भट्टे भारत में आज तक कभी नहीं देखे गए। इन्ही भट्टों पर मिटटी को तपाकर इतने शानदार मजबूत बर्तन बनाये जाते थे। जिनसे मेटल के बर्तनो जैसी आवाज़े आती थी। यह भट्टे बहुत ही आधुनिक थे, उसके अंदर चैम्बर बने हुए है, अलग अलग चैम्बर में अलग-अलग तापमान पर बर्तन पकाते थे। जिससे मिटटी के बर्तनो को सही आकार एवं मजबूती मिलती थी। इन भट्टियों को नाम दिया है प्रिस्कत भट्टी। अन्टोलॉजिस्ट केनेज़िंड ने बताया की अभी तक जितने भी भारत में कंकाल मिले है, और जो अभी के सारे भारतीय है उनके जीन में कोई फर्क नहीं है। अब सोचने वाली बात यह है कि, ऐसी बातें समाज में बिना सबूत और आधार के क्यों फैलाई गयी। आर्य बाहर से आये थे। ऐसा करने के पीछे कारण क्या रहा होगा ? कई सालों से भारत में जो नफरत का बीज बोया गया था। उसकी फसल का फायदा अंग्रेजो से लेकर भारत के नेताओं एवं बुद्धिजीवियों ने खूब उठाया। इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने पर बहुत लोगो की रोजी रोटी आने वाले समय में बंद हो जायेगी। आईये हम विस्तार से इसके बारे में बताते है फ़्रिएद्रिच मैक्स मुल्लर का जन्म जर्मनी में हुआ था, बाद में इंग्लैंड जा बसे। ऑक्सफ़ोर्ड में इंग्लिश भाषा के स्कॉलर होने की वजह से उन्होंने 1884 में आर्यन शब्द की एक थ्योरी दी। जिसमे उन्होंने आर्यन वंश, भाषा, और आर्यन रेस के बारे में बताया। उनकी इस बात पर पहले जर्मन ने फिर अंग्रेजो ने भी हवा देना शुरू कर दिया। यही सब बातें भारत में भी फैलाई गयी बिना सत्य जाने कि, किन सबूतों के आधार पर उन्होंने ऐसी विचार धारा फैलाई। सबसे मजेदार बात इसमें यह थी कि, एक अंग्रेजी भाषा के स्कॉलर ने इतिहास के बारे में इतना सब कहा कैसे ? यानी रोमांटिक नॉवेल लिखने वाला इतना ज्ञान दे गया। लेखकों की कल्पना शक्ति भी कमाल की होती है न ? यानी हम ऑक्सफ़ोर्ड से इंग्लिश पढ़ेंगे तो, शायद हम भी इतिहास के फिलोस्पर हो जाएंगे और शायद लोग हमे भी परमज्ञानी मान ले क्योंकि कभी कभी काल्पनिक बातें भी सच लगने लगती है । भारत में Arya (आर्य) शब्द का उपयोग भारत के प्राचीन इतिहास पर नज़र डाले तो, भारत के वैदिक काल से ही Arya (आर्य) शब्द का उपयोग किया जा रहा है। आर्य एक संस्कृत शब्द है। जिसका वास्तविक अर्थ होता है- ‘श्रेष्ठ, सच्चा, प्रिय, सज्जन इत्यादि’। वेदों में Arya किसे कहा गया है ? ऋग्वेद के अनुसार आर्य वो होते है। “आर्य सर्वा समाससेवा सदैवा प्रियदर्शिनः” जो समाज में समानता से सेवा करते है, वो सदैव ही समाज के लिए प्रिये होते है। इन्ही को वेदों में आर्य कहा गया है। अर्थात वेदों में आर्य का अर्थ जाति सूचक बिलकुल भी नहीं है। “प्रजा आर्य ज्योतिरागृह” (ऋग्वेद VII. 33.17) अर्थात आर्यों के बच्चें सदैव प्रकाश की राह पर चलते है। ऐसे ही Arya (आर्य) शब्द का उपयोग 66 बार ऋग्वेद में किया गया है, किन्तु किसी श्लोक में आर्य रेस जैसी बातों का उपयोग नहीं किया गया। भारत में हड़प्पा सभ्यता की खोज भारत में हड़प्पा सभ्यता की खोज 1921 में हुई। इसके ठीक एक साल बाद 1922 में मोहनजोदड़ो को भी खोज लिया गया। अब ध्यान देने की बात यह है। मैक्स मुल्लर ने भारत को लेकर आर्यन invasion थ्योरी 1884 में दी थी। और इसके बाद से मैक्स मुल्लर की थ्योरी को ख़त्म नहीं किया गया। इसके विपरीत और भी तरह की भ्रांतिया समाज में फैलाई गयी। निराधार तर्क पेश किये गए। आर्यों को लेकर भारत में फैलाई गई गलत जानकारी भारत में लोगों को बाँटने हेतु जितने प्रयास किये जाने थे। वो सभी किये गए। जात, नसल, क्षेत्र, धर्म, भाषा, रंग-रूप के नाम पर हर तरीके से देश के लोगो को आपस में बांटा गया फिर लड़वाया गया। लेकिन सत्य नहीं बताया गया। बिना ठोस जानकारी और प्रमाण के यह अनुमान लगा लिया गया कि, Arya बाहर से आये थे और इतिहास की किताबों में बहुत गर्व से लिखा गया। अगर सत्य पता नहीं था तो इसका यह अर्थ था कि, आप झूठ को जनता के सामने परोसोगे। उनसे यह सारी बातें छिपाओगे कि, मैक्स मुल्लर जैसे लोग पुरातत्त्ववेत्ता, इतिहास कार नहीं थे। यह केवल नावेल लिखने वाले राइटर थे। जो ऑक्सफ़ोर्ड से इंग्लिश स्कॉलर मात्र थे। भारत में अधिकतर लोगो को यह बात भी नहीं पता होगी। क्योंकि भारतीयों लोगो को इतिहास के बारे में कुछ भी सही नहीं बताया गया था। अब भी कुछ लोग सत्य को मानना नहीं चाहते दुःख इस बात का है कि, आज भी लोग इन स्वार्थी लोगो के प्रपंच समझ नहीं पाते है। उनका ब्रैनवॉश इस हद तक किया गया है कि, अगर आज आप पुरे सबूतों और तथ्यों के आधार पर इतिहास बताने की कोशिश करेंगे । वो लोग यह बात नहीं मानेंगे। उनके लिए सत्य वही है। जो एक इंग्लिश स्कॉलर ने इनको इतिहास के रूप में बताया था। ना कि वो जो आज के दुनियाभर के पुरातत्व विशेषज्ञ कह रहे है। यह ठीक वैसा ही है एक ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी का इंग्लिश टीचर एमबीबीएस का पाठ पढ़ा रहा हो, और एमबीबीएस डॉक्टर बोल रहे हो यह गलत बता रहा है, लोग एमबीबीएस से कह रहे हो तुम कुछ नहीं जानते हो वो ऑक्सफ़ोर्ड का स्कॉलर है उसे ज़्यादा पता है। द्वेष भावना ही सर्वोपरी जब किसी के प्रति द्वेष मन में घर कर जाता है फिर उसे कितना भी समझा लो, हज़ारों सबूत दे दो। उनके लिए यह सब माईने नहीं रखते । इसके बहुत से निजी कारण हो सकते है। इसलिए सत्य उनके लिए वही होगा जिसको वो स्वीकार करेंगे । राखीगढ़ी के डीएनए टेस्ट पर अध्ययन करने में विश्व की सहायक संस्थाए Department of Archaeology, Deccan College Post-Graduate and Research Institute, Pune 411006, India Department of Genetics, and Harvard Medical School, Boston, MA 02115, USA Howard Hughes Medical Institute, Harvard Medical School, Boston, MA 02115, USA Broad Institute of Harvard and MIT, Cambridge, MA 02142, USA Birbal Sahni Institute of Palaeosciences, Lucknow 226007, India Amity Institute of Biotechnology, Amity University, Noida 201313, India CSIR-Centre for Cellular and Molecular Biology, Hyderabad 500 007, India Max Planck Institute for Evolutionary Anthropology, Leipzig 04103, Germany Department of Human Evolutionary Biology, Harvard University, Cambridge, MA 02138, USA Present address: Department of Anthropology, University of California, Santa Cruz, Santa Cruz, CA 95064, USA Department of Human Evolutionary Biology, Harvard University, Cambridge, MA 02138, USA Max Planck-Harvard Research Center for the Archaeoscience of the Ancient Mediterranean, Cambridge, MA 02138, USA Department of Biomolecular Engineering, University of California and Santa Cruz, Santa Cruz, CA 95064, USA । साभार :- गूगल बाबा ...


Leave a comment