नई दिल्ली   324
आपातकाल के कैदी मेरे पिता के. विश्वदेव राव #Emergency उन दिनों (1976-77) दिल्ली की तिहाड़ जेल के वार्ड सत्रह में पिताजी नजरबन्द थे| जार्ज फर्नांडिस तथा 23 अन्य के साथ। सी.बी.आई. की चार्जशीट में लगी धाराओं के अनुसार उन्हें सजाये-मौत देने की मांग की गई थी। यह मेरे जन्म (22 मार्च 1978) के चन्द महीनों पहले का वृत्तांत है। अपने अग्रज सुदेव और दीदी विनीता तथा माँ सुधा से विवरण सुनता आया था। पुलिसिया आकलन में बड़ौदा डाइनामाईट केस के सभी अभियुक्तों का इन्दिरा गाँधी के सर्वाधिक खतरनाक शत्रुओं में शुमार था। हालांकि तमाम सच्चे झूठे प्रयासों के बावजूद सी.बी.आई. कोई प्रमाण नहीं जुटा पाई थी कि इन विद्रोहियों ने किसी प्रकार की प्राण-हानि पहुँचाई हो। बड़ौदा सेन्ट्रल जेल में पिताजी के साथ पाँच कैदी थे जिन्हें तन्हा कोठरी में बेड़ियों के साथ दो ताले लगाकर अलग-अलग बन्द किया जाता था। इन नब्बे वर्ग फिटवाली कोठरियों का निर्माण महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने 1876 में फांसी के सजायाफ्ता अपराधियों के लिए किया था। कुछ महीनों बाद इन कैदियों को बड़ौदा से दिल्ली के तिहाड़ जेल में ले जाया गया। वहाँ नौ राज्यों में गिरफ्तार किये गये डायनामाइट केस के अन्य अभियुक्तों को भी साथ रखा गया था। एक साहसी संवाददाता के नाते पिताजी ने अभिव्यक्ति की आज़ादी के दमन के विरूद्ध अभियान चलाया था। इंडियन फेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष (पुणे सम्मेलन, 1973 में) वे चुने गये थे। अतः प्रेस सेंसरशिप (25 जून 1975) लागू होते ही संघर्ष शुरू कर दिया था। फेडरेशन की राष्ट्रीय परिषद के बंगलूर अधिवेशन (फरवरी 1976) में इन्दिरा गाँधी शासन की तानाशाही की भर्त्सना वाला प्रस्ताव उन्होंने बहुमत से पारित कराया। इसके चन्द दिनों बाद ही (19 मार्च 1976) गुजरात पुलिस ने पिताजी को कैद कर लिया। और तभी अखबारी आज़ादी के अनन्य समर्थक टाइम्स ऑफ़ इंडिया के प्रधान संपादक शाम लाल तथा सम्पादक गिरिलाल जैन ने बड़ौदा जेल में पिताजी के निलम्बन का आदेश (अप्रैल 1976), फिर दिल्ली जेल में (अक्टूबर 1976) बरखास्तगी का आदेश भिजवा दिया। इतनी त्वरित गति से काम किया कि सत्ता पर सवार लोग प्रभावित हो गये थे। इस बीच हमारे परिवार पर क्या गुजरी यह दर्दभरी दास्तां है। मेरी माँ (डा. सुधा) का बड़ौदा मंडलीय रेलवे अस्पताल से पाकिस्तान के सीमावर्ती गाँधीधाम (कच्छ) रेगिस्तानी इलाके में तबादला कर दिया गया। वे राजपत्रित रेल अधिकारी थीं। परिवार बिखर गया। पिताजी ने जेल से ही स्वाधीनता सेनानी और संपादक रहे रेलमंत्री पंडित कमलापति त्रिपाठी को विरोध-पत्र लिखा कि अंग्रेजों ने भी कभी किसी स्वाद्दीनता सेनानी के परिवार को तंग नहीं किया, तो फिर कांग्रेस सरकार की ऐसी अमानवीय नीति क्यों? आखिर स्वयं त्रिपाठी जी तथा मेरे दादाजी (नेहरू के नेशनल हेरल्ड के संस्थापक-सम्पादक) स्व. के. रामा राव भी (1942) में जेल गये थे। उनके परिवार को ब्रिटिश राज ने कभी परेशान नहीं किया था। इस पर रेल मंत्री ने दिल्ली के एक पत्रकार-प्रतिनिधि मंडल से कहा कि वे असहाय थे। “ऊपर से आदेश आया था|” इतना सब होने के कुछ दिन पूर्व ही अचानक बड़ौदा के समाचारपत्रों में खबर छपी कि कर्नाटक पुलिस और सी.बी.आई पिताजी को सान्ताक्रूज (मुम्बई) थाने में, फिर बंगलूर की हिरासत में ले गई है। माँ ने सी.बी.आई. अधिकारियों से विरोध व्यक्त किया कि बिना परिवार को सूचित किये बड़ौदा जेल में न्यायिक हिरासत से बाहर पिताजी को कैसे ले गये? इस पर पुलिस का जवाब था, “सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायमूर्ति ए. एन. राय के निर्णय के अनुसार इमर्जेंसी में सरकार को किसी भी नागरिक की जान लेने का भी अधिकार है। इसके खिलाफ कहीं भी सुनवाई नहीं हो सकती है|” बंगलूर (मल्लीश्वरम्) पुलिस हिरासत में ठण्डी फर्श पर सुलाना, बिना कुर्सी दिये घंटों खड़ा रख कर सवाल-जवाब करना, रात को तेज रोशनी चेहरे पर डालकर जगाये रखना, इसपर भी कुछ न बताने पर हेलिकाप्टर (पंखे से लटकाना) बनाना आदि यातनायें दीं गईं। बडौदा के मुख्य दण्डाधिकारी और जिला जज ने जमानत की याचिका खारिज कर दी। बाद में पिताजी की अपील सुनकर गुजरात हाई कोर्ट ने जमानत पर रिहाई का आदेश दे दिया। तभी इन्दिरा गाँधी सरकार ने उन पर मीसा (आन्तरिक सुरक्षा कानून) के तहत नजरबन्दी का आदेश लागू कर दिया। तब तक कानून था कि यदि पुलिस साठ दिन में चार्जशीट नहीं दायर कर सकी तो जमानत अपने आप मिल जाती थी। इस प्रावधान को कांग्रेस सरकार ने संशोधित कर एक सौ बीस दिन कर दिया। इसके अलावा यह भी कानून बना दिया गया कि पुलिस के समक्ष दिया गया बयान भी सबूत माना जायेगा। अर्थात जबरन लिया गया वक्तव्य भी वैध बना दिया गया जो गुलाम भारत में भी नहीं था। जब जमानत मिलने पर भी जेल के अन्दर ही पिताजी को दुबारा गिरफ्तार कर दिल्ली रवाना कर दिया गया तो ये सारे अमानविक तथा अवैध संशोधन अपनी तीव्रता खो चुके थे। तब एक चुटकुला चल निकला था कि मीसा के मायने हैं मेइंटिनेन्स ऑफ़ इन्दिरा एण्ड संजय (इन्टर्नल सेक्युरिटि) एक्ट है। अन्याय की पराकाष्ठा तो तब हुई जब पिताजी के वकील को भी जेल में निरुद्ध कर दिया गया था। बड़ौदा जेल में पिताजी के साथ यादगार घटनायें हुई। माओ जेडोंग का निधन (9 सितम्बर 1976) हो गया था तो पिताजी ने अपने वार्ड में शोकसभा रखी। सभी कैदी शामिल हुए| जिसे श्री बाबूभाई जशभाई पटेल, जो 1977 में जनता पार्टी के मुख्य मंत्री बने, जनसंघ विधायक चिमनभाई शुक्ल जो राजकोट से लोकसभा में आये, सर्वोदयी प्रभुदास पटवारी जो 1977 में तमिलनाडु के राज्यपाल नियुक्त हुए, आदि ने संबोधित किया। सबने वन्दे मातरम भी गाया तो संगठन कांग्रेसियों ने केवल पहला छन्द ही गाया क्योंकि अगले में मूर्तिपूजा का भास था, जिस पर कुछ मुसलमान आपत्ति करते आये है। इस पर जनसंघ विधायक चिमनभाई शुक्ल ने आलोचना की कि इन कांग्रेसियों ने पहले भारत को बांटा और अब वन्दे मातरम को भी काट रहे हैं। बड़ौदा जेल में पिताजी को भोजन की कठिनाई तो होती थी क्योंकि वे प्याज-लहसुन तक का परहेज करते है। नाश्ते में उन्हें गुड़ और भुना चना मिलता था| जिसे वे चींटियों और चिड़ियों को खिला देते थें। लेकिन सबसे कष्टदायक बात थी कि पत्रकार को समाचारपत्र नही मिलते थे। पिताजी की दशा बिन पानी की मछली जैसी थी। मगर यह दुःख शीघ्र दूर हो गया जब एक युवक रोज पिताजी के लिए अखबारों का बण्डल पहुँचाता था| जिसे तरस खाकर जेलर साहब पिताजी के बैरक में पहुँचा देते थे। वह युवक था नरेन्द्र दामोदरदास मोदी, अधुना गुजरात के मुख्य मंत्री (आज भारत के प्रधानमंत्री)। उनकी कैद के प्रथम दिन से ही पिताजी की प्रतिरोधात्मक संकल्प शक्ति को तोड़ने की साजिश सी.बी.आई. रचती रही थी। आला पुलिस हाकिमों ने केन्द्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर पिताजी को जार्ज फर्नांडिस के विरूद्ध वादामाफ गवाह (एप्रूवर) बनाने का सतत यत्न किया था। एक दिन तो उनलोगों ने पिताजी को अल्टिमेटम दे डाला कि यदि वे सरकारी गवाह नही बनेंगे तो उनकी पत्नी (मेरी माँ) को भी सहअपराद्दी बनाकर बड़ौदा जेल में ले आयेंगे। पिताजी ने बाद में हम सबको बताया कि सी.बी.आई. की धमकी से वे हिल गये थे। तब मेरी बहन विनीता चार वर्ष की और भाई सुदेव तीन वर्ष के थे। दूसरे शनिवार को माँ बड़ौदा जेल भेंट करने आईं। उनसे पिताजी ने पूछा। माँ ने बेहिचक कहा कि, “जेल में खाना पकाऊँगी। यहीं रहेंगे। पर साथी (जार्ज फर्नांडिस) से गद्दारी नही करेंगे|” अगले दिन सी.बी.आई वाले जानने आये। पिताजी का जवाब तीन ही शब्दों में था, “लड़ेंगे. झुकेंगे नहीं”। फिर यातनाओं का सिलसिला ज्यादा लम्बाया। कैदी के रूप में पिताजी तथा उनके साथियों से बड़े अपमानजनक तरीके से बर्ताव किया गया था, खासकर जब उन्हें अदालत ले जाया जाता था। हथकड़ी और मोटी रस्सी से बांध कर आठ-आठ सिपाही लोग बख्तरबन्द गाड़ी में जेल से कोर्ट और वापस ले जाते थें। सैकड़ों सशस्त्र पुलिसवाले उनकी गाड़ी के आगे पीछे चलते थे। पिताजी की कलाई के साथ स्व. वीरेन जे. शाह को भी बाँधा जाता था। इस पर पिताजी ने व्यंग किया कि इन्दिरा गाँद्दी ने असली समाजवाद ला दिया है। श्री वीरेन शाह अरबपति, उद्योगपति (मकुन्द आयरन एण्ड स्टील के मालिक), भारतीय जनसंघ के सांसद और बाद में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल बने। अर्थात श्रमजीवी पत्रकार मेरे पिता तथा पूंजीपति वीरेन शाह का संग! सी.बी.आई. ने जब तीस हजारी कोर्ट (दिल्ली) के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्टेªट मोहम्मद शमीम (बाद में दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति तथा अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष) के सामने अभियुक्तों को पेश किया तो जार्ज फर्नांडिस ने एक लिखित बयान पढ़ा। उसमें एक वाक्य था, “हम सब लोगों की कलाइयों पर बंधी ये हथकड़ियाँ वस्तुतः भारत राष्ट्र पर लगी जंजीरें है”। ठीक उसी वक्त पिताजी और अन्य ने बाँहें उठा हथकड़ियाँ झनझनायी। इसे बी.बी.सी. के संवाददाता मार्क टल्ली ने विस्तार से प्रसारित किया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों का दस्ता कोर्ट आकर उनका “लाल सलाम” के नारे से अभिवादन करता था। तीस हजारी कोर्ट में अभियुक्तों से भेंट करने आने वालों में मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेई, मधु लिमये, राजनारायण, चन्द्रशेखर, भाकपा के ज्योतिर्मय बसु आदि थे। उसी दौर में बडौदा डायनामाइट केस के अभियुक्तों के बचाव में एक सलाहकार समिति गठित हुई थी। इसके अध्यक्ष थे वयोवृद्ध गाँधीवादी अस्सी-वर्षीय आचार्य जीवतराम भगवानदास कृपलानी। चन्द्रभानु गुप्त कोशाध्यक्ष थे। अन्य सदस्य थे न्यायमूर्ति वी.एम. तारकुण्डे, सोली सोराबजी, अशोक देसाई आदि लब्धप्रतिष्ठित विधि विशेषज्ञ। एक युवा वकील दम्पति भी थे - स्वराज कौशल तथा सुषमा स्वराज अचानक एक रात (18 जनवरी 1977) आकाशवाणी पर प्रधानमंत्री की घोषणा हुई कि मार्च में छठी लोकसभा का चुनाव आयोजित होगा। मीसा बन्दी सब रिहा हो गये। मगर डायनामाइट केस के सभी 25 अभियुक्त जेल में ही रहे। पिताजी बताते हैं कि तिहाड़ जेल में कैद जनसंघ के सुंदर सिंह भण्डारी (बाद में बिहार और गुजरात के राज्यपाल) ने बताया था कि ये सारे मीसाबन्दी रिटर्न टिकट लेकर जेल के बाहर जा रहे हैं। चुनाव के बाद वे सब फिर कैद कर लिये जायेंगे। भण्डारी जी का कथन था कि “डायनामाइट केस के आप कैदी तो तभी रिहा होंगे जब इन्दिरा गाँधी खुद चुनाव हार जायें|” मार्च के प्रथम सप्ताह (9 मार्च, मेरे दादाजी की सोलहवीं पुण्यतिथि पर) मेरी माँ दोनों बच्चों (मेरी पाँच-वर्षीया दीदी और चार-वर्षीय भाई) के साथ पिताजी से भेंट करने गाँधीधाम से दिल्ली तिहाड़ जेल गईं। रूंधे गले से माँ ने पिताजी को बताया कि शायद यह आखिरी मुलाकात है क्योंकि इन्दिरा गाँधी चुनाव जीत रहीं हैं और फिर जार्ज फर्नांडिस तथा पिताजी को फाँसी हो जाएगी। ये दोनों व्यक्ति नम्बर एक और दो पर नामित अभियुक्त थे। पिताजी हँसे और बोले कि कांग्रेस का सूपड़ा हिन्दी-भाषी प्रदेशों में साफ हो रहा है। राज नारायण जी रायबरेली से जीतने जा रहे हैं। जनता पार्टी की सरकार बनेगी। जेल के भीतर पिताजी को लोकमानस की सही सूचना थी बजाय बाहर रहकर माँ को, क्योंकि मीडिया पर सेंसर चालू था। फिर चुनाव परिणाम आये। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। उनकी काबीना का प्रथम निर्णय था कि बड़ौदा डायनामाइट केस वापस ले लिया जाय। इसमें गृहमंत्री चरण सिंह, वित्त मंत्री एच.एम. पटेल, कानून मंत्री शान्ति भूषण तथा विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अहम भूमिका थी। केस वापस हुआ और जार्ज फर्नांडिस ने मंत्री पद की शपथ ली। सभी लोग (22 मार्च 1977 को) तिहाड़ जेल से रिहा कर दिये गये। मगर किस्सा अभी बाकी था। कांग्रेस पार्टी के सांसदों और वकीलों ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की कि मोरारजी देसाई काबीना का निर्णय अवैध करार दिया जाय और सार्वजनिक एवं राष्ट्रहित में डायनामाईट केस दुबारा चलाया जाय। हाईकोर्ट द्वारा इसे खारिज कर देने पर इन कांग्रेसी वकीलों ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दर्ज की। न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर तथा न्यायमूर्ति चेन्नप्पा रेड्डि की खण्ड पीठ ने सुनवाई की। बचाव के वकील थे जनता पार्टी के सांसद और वकील राम जेठमलानी। उनका तर्क था कि यदि इन्दिरा गाँद्दी, जो तब तक सत्ता पर लौट आई थीं, चाहें तो मुकदमा स्वयं खुलवा सकती हैं। अतः सर्वोच्च न्यायालय क्यों हस्तक्षेप करें| जजों की पीठ ने कांग्रेसी अपील खारिज कर दी। इमर्जेंसी की भूल के लिए जनता से बारम्बार क्षमा याचना करने वाली इन्दिरा गाँधी दुबारा हिम्मत नहीं जुटा सकी कि डायनामाइट केस खोल दें। अन्ततः पिताजी और सभी साथी मुक्त रहे। फिर टाइम्स ऑफ़ इण्डिया प्रबंधन ने पिताजी को लखनऊ ब्यूरो प्रमुख बनाकर (फरवरी 1978) मेरे जन्म के एक माह पूर्व) नियुक्त किया। मगर इसमें भी मोरारजी देसाई को हस्तक्षेप करना पड़ा। जनता पार्टी काबीना का महत्वपूर्ण निर्णय था कि जो भी लोग इम्मेर्जेंसी का विरोध करने पर बर्खास्त हुये हैं उन्हें बकाया वेतन के साथ पुनर्नियुक्त कर दिया जाय। प्रधानमंत्री ने टाइम्स ऑफ़ इण्डिया के चेयरमैन अशोक जैन को खुद आदेश दिया कि काबीना के इस निर्णय के तहत पिताजी को सवेतन वापस लिया जाय। अतः टाइम्स ऑफ़ इण्डिया जो आम तौर पर भारत के श्रम कानून की खिल्ली उड़ाता रहता है, को मानना पड़ा। वह केन्द्रीय सरकार के निर्णय की अवहेलना करने से सहमा। और तब पिताजी लखनऊ में संवाददाता के रूप में कार्यरत हो गये (फरवरी 1978)। हमारें परिवार की यह गाथा है। ...


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