Maharashtra   15474
बांस के साथ खुद को तरासते थे वेणुपुत्र सुनील रूपेश पाण्डेय ईश्वर ने सुनील को एक शरीर दिया था जिसे वापस ले लिया | ईश्वर अपनी बनायी हर चीज को जरूरत आने पर वापस ले लेता है | वह शरीर हो या कि कुछ और | कुछ रहता है तो बस उस शरीर के द्वारा रचा गया, बुना गया और गढ़ा गया संसार | ईश्वर ने जो शरीर सुनील को दिया था उसे तरासा खुद सुनील ने था | ठीक वैसे ही जैसे एक कारीगर बहुत खूबसूरती से तरास कर बनाता है कोई मूरत | अपने मन, आत्मा और शरीर को एक साथ साध कर सुनील देशपांडे ने एक वृहद् संसार रच डाला | एक ऐसा संसार जिसके कारीगर भी वही थे और औजार भी | अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्त्ता के रूप में अपना सामजिक जीवन शुरू करने वाले सुनील देशपांडे का जीवन पूर्ण हुआ बांस के कारीगरों का जीवन अनुसंधान करने वाले "वेणुपुत्र" के रूप में | जिन्हे लोग प्यार से "बास पांडे" कहकर भी पुकारते थे | सुनील जी ने जो पढ़ा उसे ही जीया भी | उनकी पढ़ाई समाज कार्य में हुई थी तो वे ताउम्र सामाजिक कार्य में ही रमे रहे | ऐसा कम ही होता है कि हमने जो पढ़ा हो वो हमारे जीवन में काम ही आये | ऐसा तभी संभव होता है जब हम स्कूल की पढ़ाई को जीवन की पढ़ाई में साध लें | सुनील जी ने ऐसा ही किया | विद्यार्थी जीवन के बाद खुद को तरासने के लिए सुनील देशपांडे देशभर घूमे | जहाँ भी उन्हें लगा कि वहां से कुछ सीख सखते हैं, वहां गए | सामान्य वनवासी से लेकर समाज जीवन के बड़े दार्शनिकों तक से मुलाकात कर सुनील देशपांडे ने अंततः अपनी कुटिया वहां बनायी जहां सच्चे अर्थों में वे खुद को प्रस्तुत कर सकते थे | महाराष्ट्र के सर्वाधिक अकालग्रस्त क्षेत्र मेलघाट के छोटे से गाँव लवदा को उन्होंने अपनी कर्मभूमि के रूप में चुना | जिन दिनों सुनील जी ने लवदा में बसने का निर्णय किया उन दिनों (और आज भी) मेलघाट की चर्चा कुपोषित क्षेत्र के रूप में होती थी | समाचारों में मेलघाट को कुपोषित क्षेत्र के रूप में पुकारा जाना सुनील जी को विदर्भ ही नहीं महाराष्ट्र जैसे समृद्ध प्रदेश के माथे पर कलंक जैसा लगता था | वो अक्सर कहते हमारे जीने का हर साधन मुहैया करने वाले हरे-भरे वनों का क्षेत्र कुपोषित कैसे हो सकता है | मेलघाट का कुपोषण प्राकृतिक नहीं मानवीय है | उनके मन के इन भावों ने उन्हें मेलघाट जैसे सुदूर वनवासी क्षेत्र में बसने की शक्ति दी | जहां उन्होंने कोरकू समाज के साथ मिलकर, स्थानीय बांस कारीगरों को साथ लेकर, उन्हें नए ढंग से प्रशिक्षित कर के एक नया संसार गढ़ा | जिसका केंद्र बना, "सम्पूर्ण बांबू केंद्र" लवदा | जैसे रवींद्र शर्मा गुरूजी बताते थे कि एक कारीगर का घर ही उसका कारखाना भी होता था और उसका स्कूल भी | ठीक वैसे ही सम्पूर्ण बांबू केंद्र भी सुनील जी का घर भी था और कारखाना भी | वही उनके जीवन की साधना स्थली भी थी और वही जीवन का उत्सव भी | मेलघाट में अपनी दुनिया बसाने से पहले सुनील देशपांडे ने देशभर के अनेक उस्तादों से कारीगर समाज की जिंदगी का ककहरा सीखा | महेश शर्मा जी के साथ उन्होंने विशुनपुर में झारखण्ड के वनवासियों से सीखा तो चित्रकूट में उन्हें नानाजी देशमुख जैसे ऋषि का सानिध्य मिला | नागपुर के आर्किटेक्ट वीनू काले ने अपनी कारीगरी से सुनील देशपांडे को बांस कारीगरी की जिस दुनिया में उतारा उसे आदिलाबाद के महान दार्शनिक रवींद्र शर्मा गुरूजी ने अपने विचारों से तरासा | ऐसे महापुरुषों के सानिध्य में रहकर सुनील देशपांडे ने कारीगरी और कारीगर समाज को भारतीय व्यवस्थाओं के केंद्र में लाने का सार्थक प्रयास किया | इसके लिए उन्होंने सम्पूर्ण बांबू केंद्र के साथ "ग्राम ज्ञान पीठ" की स्थापना की | देवेंद्र भाई गुप्त, महेश शर्मा, रवींद्र शर्मा गुरूजी और वीनू काले के सानिध्य में सुनील देशपांडे ने राष्ट्रीय कारीगर पंचायत के माध्यम से बांस कारीगरों के साथ अन्य सभी कारीगर समज को साथ लाने के चुनौतीपूर्ण काम में भी वे लगे थे | हुनर खोज यात्रा और कारीगर मेला जैसी गतिविधियों के माध्यम से उन्होंने कारीगर समाज की एक नयी जमीन तैयार की | मेलघाट से निकलकर मुंबई के रास्ते दिल्ली तक सुनील देशपांडे ने कारीगरों के लिए जो संवाद स्थापित किया उसका ही परिणाम है कि पिछले कुछ वर्षों से सत्ता के गलियारों में कारीगर समाज की चर्चा शुरू हुई है | उनका लक्ष्य था कि कारीगरों और कारीगरी के लिए एक अलग कारीगर मंत्रालय बने | जिसके लिए वे लगातार प्रयासरत थे | ऐसे सुनील देशपांडे का जाना भारत के वृहत्तर कारीगर समाज के लिए अपूरणीय क्षति है | ...


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