नई दिल्ली।
यह कडवी सच्चाई है कि हम इसाईयो ओर मुस्लिम से वैचारिक धरातल पर बौद्धिक युद्ध के लिए बिल्कुल तैयार नही है । न ही इस क्षेत्र मे तैयारी की किसी भी हिनदू संगठन को रूचि है । मुझे इसाईयो की तैयारियो की जानकारी नही है ।इस लिए मै उस संदर्भ मे टिप्पणी नही करूंगा इस्लाम ने भारत मे हिन्दूओ से वैचारिक युद्ध की जो तैयारी कर रखी है उस की एक छोटी सी झलक पेश करूंगा । इस समय 39 इस्लामिक विश्व विद्यालय देश मे यूजीसी से मान्यताप्राप्त है। देश मे 87इसलामिक सूचना केंद्र कार्यरत है जोकि 28 भारतीय भाषाओ मै सप्ताह के सातो दिन चौबीसो घंटे गैर मुस्लिम को ईसलाम के बारे कोई सूचना उपलब्ध कराने जुटे हुए है। जमायत ईसलामी ने हिन्दूओ ग्रंथो की fault lines जानकारी देने के लिए दो दो घंटे की अवधि वाले 15 विडियोज तैयार करवाए है। देश मे 56 टी वी चैनल 12 भारतीय भाषाओ मे ईसलाम का प्रचार करने जूटे हुए है। अकेले जमायत इस्लामी द्वारा देश मे विभिन्न 27 भारतीय भाषाओ मे इस्लाम के प्रचार के लिए 219 पत्र पत्रिकाए प्रकाशित की जा रही है। सभी भारतीय भाषाओ मै इस्लामिक साहित्य के प्रकाशन के लिए एक दर्जन ट्रस्टो का गठन किया है।इस वर्ष देश मे 125 कुरान मैलो का आयोजन किया जा रहा है जिन 34 भारतीय भाषाओ मे दो करोड कुरान का मफत वितरण गैर मुस्लिम मे किया जाए गा। यह सिर्फ एक संगठन जमायत इसामी की तैयारियो की झलक मात्र है। अनय इस्लामिक संगठनो कै बारे मै बाद मै जानकारी उपलब्ध करवाई जाए गी।-मनमोहन शर्मा जी...


लखनऊ/गोरखपुर।
1985 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव हो रहे थे। तब मैं जनसत्ता, दिल्ली छोड़ कर नया-नया स्वतंत्र भारत, लखनऊ आया था। तत्कालीन सिंचाई मंत्री वीरबहादुर सिंह तब गोरखपुर में पनियरा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे थे। स्वतंत्र भारत के सर्वेसर्वा और मालिकान में से एक जयपुरिया ने मुझे बुलाया और बड़ी शालीनता से कहा कि , ' आप जनसता, दिल्ली से आए हैं, उस तरह की रिपोर्टिंग में वीरबहादुर के खिलाफ़ कुछ मत लिख दीजिएगा। वीरबहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री हैं। तो ज़रा ध्यान रखिएगा। हमारे पचास काम पड़ते हैं मुख्यमंत्री से।' खैर मैं गया पनियरा। फरवरी का महीना था । गुलाबी जाड़ा लिए हुए । पनियरा में वीरबहादुर ने विकास के इतने सारे काम कर दिए थे कि पूछिए मत। जहां पुलिया बननी चाहिए थी, वहां भी पुल बना दिया था। दिल्ली, लखनऊ के लिए सीधी बसें थीं। गांव-गांव बिजली के खभे। नहरें, ट्यूबवेल। उस धुर तराई और पिछड़े इलाके में विकास की रोशनी दूर से ही दिख जाती थी। और चुनाव में भी उन के अलावा किसी और का प्रचार कहीं नहीं दिखा। जब कि उम्मीदवार कई थे वहां से। वीरबहादुर सिंह के मुख्य प्रतिद्वंद्वी थे चौधरी चरण सिंह की पार्टी भारतीय क्रांति दल से दयाशंकर दुबे। दुबे जी से मेरी व्यक्तिगत मित्रता भी थी। उन को प्रचार में भी शून्य देख कर मुझे तकलीफ़ हुई। गोरखपुर शहर में उन के घर गया। लगातार दो दिन। वह नहीं मिले। जब कि वीरबहादुर सिंह रोज मिल जाते थे। खैर एक दिन एकदम सुबह पहुंचा दयाशंकर दुबे के घर। बताया गया कि हैं। उन के बैठके में मैं बठ गया। थोड़ी देर में वह आए। उन के चेहरे का भाव देख कर मैं समझ गया कि मेरा आना उन्हें बिलकुल अच्छा नहीं लगा है। तो भी मेरे पुराने मित्र थे। सो अपनी अकुलाहट नहीं छुपा पाया। और पूछ ही बैठा कि , ' अगर इसी तरह चुनाव लड़ना था तो क्या ज़रुरत थी यह चुनाव लड़ने की भी ? ' बताता चलूं कि गोरखपुर विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में दयाशंकर दुबे वीरबहादुर सिंह से बहुत सीनियर थे। और कल्पनाथ राय से भी पहले वह छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके थे। तब छात्र राजनीति का बहुत महत्व था और कि प्रतिष्ठा भी। लेकिन कुछ अहंकार और कुछ गलत फ़ैसलों के चलते दयाशंकर दुबे की यह गति बन गई थी। खैर , जब मैं एकाधिक बार उन के इस तरह चुनाव लड़ने की बात पर अपना अफ़सोस ज़ाहिर कर चुका तो वह थोड़ा असहज होते हुए भी कुछ सहज बनने की कोशिश करते हुए बोले कि , ' हुआ क्या कुछ बताओगे भी ! कि बस ऐसे ही डांटते रहोगे ? ' मैं ने उन्हें बताया कि , ' दो दिन से पनियरा घूम रहा हूं और आप का कहीं नामोनिशान नहीं है। न प्रचार गाडियां हैं, न पोस्टर, न बैनर। एकदम शून्य की स्थिति है।' तो वह धीरे से हंसे और बोले कि , ' देखो मैं पनियरा में वीरबहदुरा से क्या चुनाव लड़ूंगा ? पनियरा चुनाव में वीरबहदुरा से मेरा बाजना वैसे ही बाजना है जैसे बाघ से कोई बिलार बाज जाए ! तो क्या लड़ना ? ' ' फिर चुनाव लड़ने की ज़रुरत क्या थी? ' सुन कर दयाशंकर दुबे बोले, ' मैं तो दिल्ली गया था गोरखपुर शहर से कांग्रेस का टिकट मांगने। बड़ा उछल कूद के बाद भी जब गोरखपुर शहर से कांग्रेस का टिकट नहीं मिला तो घूमते-घामते चौधरी चरण सिंह से जा कर मिला और गोरखपुर शहर से उन की पार्टी का टिकट मांगा तो वह बोले कि गोरखपुर शहर से तो नहीं लेकिन जो पनियरा से लड़ो तो मैं तुम्हें अपना टिकट दे सकता हूं। तुम्हें चुनाव लड़ने का खर्चा, झंडा, पोस्टर, गाड़ी भी दूंगा और खुद आ कर एक बढ़िया लेक्चर भी दूंगा। तो मैं मान गया। और लड़ गया। यह सोच कर कि चलो इस में से कुछ आगे का खर्चा भी बचा लूंगा। ' मैं ने कहा कि , ' आप की एक भी गाड़ी दिखी नहीं क्षेत्र में।' तो वह बोले कि , ' कैसे दिखेगी? दो गाड़ी मिली है। एक पर खुद चढ़ रहा हूं दूसरी को टैक्सी में चलवा दिया है।' कह कर वह फ़िक्क से हंसे। मैं ने पूछा, ' और पोस्टर, बैनर? ' वह थोड़ा गंभीर हुए पर मुस्कुराए और उठ कर खड़े हो गए। धीरे से बोले, ' मेरे साथ आओ ! ' फिर वह भीतर के एक कमरे में ले गए। अजब नज़ारा था। एक कबाड़ी उन के पोस्टर तौल रहा था। उन्हों ने हाथ के इशारे से दिखाया और फिर मुझ से धीरे से बोले, ' यह रहा पोस्टर ! ' मैं अवाक रह गया। फिर वह मुझे ले कर बाहर के कमरे में आ गए। मै ने पूछा कि , ' यह क्या है? चुनाव के पहले ही पोस्टर तौलवा दे रहे हैं? ' वह बोले , ' अभी अच्छा भाव मिल जा रहा है। चुनाव बाद तो सभी बेचेंगे और भाव गिर जाएगा। ' मैं ने कहा , ' चिपकवाया क्यों नहीं? ' वह बोले , ' व्यर्थ में पोस्टर भी जाता, चिपकाने के लिए मज़दूरी देनी पड़ती, लेई बनवानी पड़ती। बड़ा झमेला है। और फिर वीरबहदुरा भी अपना मित्र है, वह भी अपने ढंग से मदद कर रहा है। ' कह कर वह मुसकुराए। मैं समझ गया। और उन से विदा ले कर चला आया। बाद के दिनों में जैसा कि जयपुरिया ने कहा था वीरबहादुर सिंह मुख्यमंत्री भी बने। और यही दयाशंकर दुबे उन के साथ-साथ घूमते देखे जाते थे। अब सोचिए कि जैसे वीरबहादुर सिंह के साथ दयाशंकर दुबे लड़े थे , इस बार के चुनाव में भी तमाम उम्मीदवार बिलार की तरह बाघ से लड़ने के लिए कांग्रेसी बजट के लिए मुंह बाए बैठे हैं । प्रियंका की आमद के बाद बजट का बढ़ना भी तय है । न्यूनतम तीस-पैतीस करोड़ तक का बजट है प्रति सीट । पचास करोड़ तक जा सकता है यह बजट । चुनाव का फ़ैसला चाहे जो हो , अगले पांच साल का खर्च तो निकल ही आएगा । हां , लेकिन जैसे दयाशंकर दुबे जो एक सच देख रहे थे और कह भी रहे थे बेलाग हो कर कि वीरबहदुरा से बाजना वैसे ही है जैसे किसी बाघ से बिलार बाज जाए ! जाने यह कांग्रेसी भी देख रहे हैं कि नहीं , यह जानना भी दिलचस्प है ।...


लखनऊ/गोरखपुर।
1985 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव हो रहे थे। तब मैं जनसत्ता, दिल्ली छोड़ कर नया-नया स्वतंत्र भारत, लखनऊ आया था। तत्कालीन सिंचाई मंत्री वीरबहादुर सिंह तब गोरखपुर में पनियरा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे थे। स्वतंत्र भारत के सर्वेसर्वा और मालिकान में से एक जयपुरिया ने मुझे बुलाया और बड़ी शालीनता से कहा कि , ' आप जनसता, दिल्ली से आए हैं, उस तरह की रिपोर्टिंग में वीरबहादुर के खिलाफ़ कुछ मत लिख दीजिएगा। वीरबहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री हैं। तो ज़रा ध्यान रखिएगा। हमारे पचास काम पड़ते हैं मुख्यमंत्री से।' खैर मैं गया पनियरा। फरवरी का महीना था । गुलाबी जाड़ा लिए हुए । पनियरा में वीरबहादुर ने विकास के इतने सारे काम कर दिए थे कि पूछिए मत। जहां पुलिया बननी चाहिए थी, वहां भी पुल बना दिया था। दिल्ली, लखनऊ के लिए सीधी बसें थीं। गांव-गांव बिजली के खभे। नहरें, ट्यूबवेल। उस धुर तराई और पिछड़े इलाके में विकास की रोशनी दूर से ही दिख जाती थी। और चुनाव में भी उन के अलावा किसी और का प्रचार कहीं नहीं दिखा। जब कि उम्मीदवार कई थे वहां से। वीरबहादुर सिंह के मुख्य प्रतिद्वंद्वी थे चौधरी चरण सिंह की पार्टी भारतीय क्रांति दल से दयाशंकर दुबे। दुबे जी से मेरी व्यक्तिगत मित्रता भी थी। उन को प्रचार में भी शून्य देख कर मुझे तकलीफ़ हुई। गोरखपुर शहर में उन के घर गया। लगातार दो दिन। वह नहीं मिले। जब कि वीरबहादुर सिंह रोज मिल जाते थे। खैर एक दिन एकदम सुबह पहुंचा दयाशंकर दुबे के घर। बताया गया कि हैं। उन के बैठके में मैं बठ गया। थोड़ी देर में वह आए। उन के चेहरे का भाव देख कर मैं समझ गया कि मेरा आना उन्हें बिलकुल अच्छा नहीं लगा है। तो भी मेरे पुराने मित्र थे। सो अपनी अकुलाहट नहीं छुपा पाया। और पूछ ही बैठा कि , ' अगर इसी तरह चुनाव लड़ना था तो क्या ज़रुरत थी यह चुनाव लड़ने की भी ? ' बताता चलूं कि गोरखपुर विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में दयाशंकर दुबे वीरबहादुर सिंह से बहुत सीनियर थे। और कल्पनाथ राय से भी पहले वह छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके थे। तब छात्र राजनीति का बहुत महत्व था और कि प्रतिष्ठा भी। लेकिन कुछ अहंकार और कुछ गलत फ़ैसलों के चलते दयाशंकर दुबे की यह गति बन गई थी। खैर , जब मैं एकाधिक बार उन के इस तरह चुनाव लड़ने की बात पर अपना अफ़सोस ज़ाहिर कर चुका तो वह थोड़ा असहज होते हुए भी कुछ सहज बनने की कोशिश करते हुए बोले कि , ' हुआ क्या कुछ बताओगे भी ! कि बस ऐसे ही डांटते रहोगे ? ' मैं ने उन्हें बताया कि , ' दो दिन से पनियरा घूम रहा हूं और आप का कहीं नामोनिशान नहीं है। न प्रचार गाडियां हैं, न पोस्टर, न बैनर। एकदम शून्य की स्थिति है।' तो वह धीरे से हंसे और बोले कि , ' देखो मैं पनियरा में वीरबहदुरा से क्या चुनाव लड़ूंगा ? पनियरा चुनाव में वीरबहदुरा से मेरा बाजना वैसे ही बाजना है जैसे बाघ से कोई बिलार बाज जाए ! तो क्या लड़ना ? ' ' फिर चुनाव लड़ने की ज़रुरत क्या थी? ' सुन कर दयाशंकर दुबे बोले, ' मैं तो दिल्ली गया था गोरखपुर शहर से कांग्रेस का टिकट मांगने। बड़ा उछल कूद के बाद भी जब गोरखपुर शहर से कांग्रेस का टिकट नहीं मिला तो घूमते-घामते चौधरी चरण सिंह से जा कर मिला और गोरखपुर शहर से उन की पार्टी का टिकट मांगा तो वह बोले कि गोरखपुर शहर से तो नहीं लेकिन जो पनियरा से लड़ो तो मैं तुम्हें अपना टिकट दे सकता हूं। तुम्हें चुनाव लड़ने का खर्चा, झंडा, पोस्टर, गाड़ी भी दूंगा और खुद आ कर एक बढ़िया लेक्चर भी दूंगा। तो मैं मान गया। और लड़ गया। यह सोच कर कि चलो इस में से कुछ आगे का खर्चा भी बचा लूंगा। ' मैं ने कहा कि , ' आप की एक भी गाड़ी दिखी नहीं क्षेत्र में।' तो वह बोले कि , ' कैसे दिखेगी? दो गाड़ी मिली है। एक पर खुद चढ़ रहा हूं दूसरी को टैक्सी में चलवा दिया है।' कह कर वह फ़िक्क से हंसे। मैं ने पूछा, ' और पोस्टर, बैनर? ' वह थोड़ा गंभीर हुए पर मुस्कुराए और उठ कर खड़े हो गए। धीरे से बोले, ' मेरे साथ आओ ! ' फिर वह भीतर के एक कमरे में ले गए। अजब नज़ारा था। एक कबाड़ी उन के पोस्टर तौल रहा था। उन्हों ने हाथ के इशारे से दिखाया और फिर मुझ से धीरे से बोले, ' यह रहा पोस्टर ! ' मैं अवाक रह गया। फिर वह मुझे ले कर बाहर के कमरे में आ गए। मै ने पूछा कि , ' यह क्या है? चुनाव के पहले ही पोस्टर तौलवा दे रहे हैं? ' वह बोले , ' अभी अच्छा भाव मिल जा रहा है। चुनाव बाद तो सभी बेचेंगे और भाव गिर जाएगा। ' मैं ने कहा , ' चिपकवाया क्यों नहीं? ' वह बोले , ' व्यर्थ में पोस्टर भी जाता, चिपकाने के लिए मज़दूरी देनी पड़ती, लेई बनवानी पड़ती। बड़ा झमेला है। और फिर वीरबहदुरा भी अपना मित्र है, वह भी अपने ढंग से मदद कर रहा है। ' कह कर वह मुसकुराए। मैं समझ गया। और उन से विदा ले कर चला आया। बाद के दिनों में जैसा कि जयपुरिया ने कहा था वीरबहादुर सिंह मुख्यमंत्री भी बने। और यही दयाशंकर दुबे उन के साथ-साथ घूमते देखे जाते थे। अब सोचिए कि जैसे वीरबहादुर सिंह के साथ दयाशंकर दुबे लड़े थे , इस बार के चुनाव में भी तमाम उम्मीदवार बिलार की तरह बाघ से लड़ने के लिए कांग्रेसी बजट के लिए मुंह बाए बैठे हैं । प्रियंका की आमद के बाद बजट का बढ़ना भी तय है । न्यूनतम तीस-पैतीस करोड़ तक का बजट है प्रति सीट । पचास करोड़ तक जा सकता है यह बजट । चुनाव का फ़ैसला चाहे जो हो , अगले पांच साल का खर्च तो निकल ही आएगा । हां , लेकिन जैसे दयाशंकर दुबे जो एक सच देख रहे थे और कह भी रहे थे बेलाग हो कर कि वीरबहदुरा से बाजना वैसे ही है जैसे किसी बाघ से बिलार बाज जाए ! जाने यह कांग्रेसी भी देख रहे हैं कि नहीं , यह जानना भी दिलचस्प है ।...


नई दिल्ली/जेएनयू।
#मन_की_बात #ममता_अधिग्रहित_बंगाल से जब JNU में अध्ययन हेतु JNU पहुंचे तो हमको वामपंथ पता ही नही था क्योंकि हम तो वैसे भी विज्ञान के विद्यार्थी थे लेकिन JNU में MA (अंतराष्ट्रीय संबंध) में एडमिशन मिल गया। मेरा दिल्ली जाना ही पहली बार हुआ और जब बाँदा स्टेशन से दिल्ली के लिए टिकट रिज़र्व करवाने गए तो उन्होंने हज़रत निज़ामुद्दीन का टिकट दे दिया (BNDA -NZM) टिकट मिलते ही उस टिकट काउंटर वाले को डांट लगाई की दिल्ली जाना है निज़ामुद्दीन नही।वे बोले टिकट यही तक का है। निज़ामुद्दीन से आप दिल्ली के लिए ट्रेन ले लीजियेगा। अब निज़ामुद्दीन से एक ऑटो में JNU पहुँचे तो पता चला कि आज शानिवार है और शनिवार की केंद्रीय विश्वविद्यालय बंद रहता है। पहली बार मालूम चला कि केंद्रीय संस्थान (बैंक को छोड़कर) साप्ताहिक दो दिन अवकाश रहता है। तो अब ठहरे कहाँ तो वापस निज़ामुद्दीन आये स्टेशन प्लेटफॉर्म में ही रुके रात वहीं काटी। अब सोमवार को जब JNU गए एडमिशन के लिए तो उधर देखा झुंड के झुंड में लड़के, लड़कियां बैच लगाए हुए हैं बैच में लिखा है SFI या AISA, AISF मैंने सोचा कि ये लोग JNU के स्टॉफ हैं। उसमे से एक मेरे पास आया और बोला "YOU ARE NEW COMMER" मुझे तो इंग्लिश आती नही थी तो मैने सर हिला दिया। मैंने अपने जीवन मे प्रथम बार देखा कि लड़कियाँ सिगरेट पी रही हैं, लड़के भी उसी झूंठी सिगरेट को पी रहे हैं। खैर मुझे दाल में कुछ काला तब लगा जब दबे कुचले किनारे एक काउंटर लगा था "ABVP वेलकम ऑल न्यू स्टूडेंट" वंदे मातरम। तो मैंने निश्चय किया कि किसी से कोई सहायता नही ली जाएगी। स्वयं एडमिशन प्रक्रिया पूरी की ( उस समय 12 फोलियो भरिए और अन्य फॉर्म भरिए हाँथ में दर्द हो जाये और 13 फ़ोटो चिपकाइये)। चलो एडमिशन लिया और अपने होमटाउन से एक मित्र का फोन न लिया वो उस समय लोदी कॉलोनी में UPSC की तैयारी हेतु रहते थे और 6 माह पहले ही दिल्ली आए थे। चले गए लोदी कॉलोनी उसके पास 3 दिन रुके लेकिन उसके मकान मालिक को समस्या उत्पन्न हुई और हम चले आये बाँदा अपने गृहनगर। मेरे सहपाठी की बड़ी बहन दिल्ली के संगम।बिहार में रहती थी तो उसको लेकर पुनः दिल्ली आए और एक सप्ताह संगम बिहार में रहे। JNU जाने के लिए संगम बिहार के जिहादी विश्वविद्यालय जामिया हमदर्द से (380 न कि बस से मुनिरका और मुनिरका से 615 बस न से JNU, चूंकि क्लासेज 9 बजे शुरू होती थी तो प्रातः 7 बजे संगम बिहार से चलते थे) प्रतिदिन जाते थे। School of International Studies में एक सप्ताह बाद वही आदमी/JNU का विद्यार्थी जो मुझे एडमिशन के समय बोला था "may i help you" SFI का एक्टिविस्ट व कार्डहोल्डर परिमल माया सुधाकर पुनः मिला गया और बोला "you are new student" मैंने बोला हां , कहाँ रहते हों -संग बिहार में, तब तो आपको आने जाने में समस्या होती होगी, मैंने कहाँ हां। उसमे बोला क्या आप मेरे हॉस्टल रूम में एडजेस्ट हो सकते मैंने कहा क्यों नही। उसने अपना रूम न बताया झेलम हॉस्टल रूम न 143, दरवाजे के ऊपर वेंटीलेटर है उसमे रूम key रखी हुई है। संगमबिहार गए उधर से बैग लेकर आ गए झेलम हॉस्टल और निश्चिंत हो गए कि अब ज्यादा दूर से आना नही पड़ेगा। शाम में देखा कि उस रूम में 6 अन्य नए स्टूडेंट हैं।मैंने कहाँ की इतने सारे लोग कैसे एक रूम उसने बोला कि ऐसे ही आपको एडजेस्ट करना है। परिमल माया सुधाकर जो स्वयं अपनें मित्र के साथ रहता था अपनें रूम में कभी कभार आता था। कुछ समय बाद वह SFI की मीटिंग में यूनियन "JNUSU" ऑफिस ले गया तो उधर वही लड़की जिसको प्रथम दिन एडमिशन गेट में देखा था (अनु------मौर्या, आज JNU में फैकल्टी एक कॉमरेड की पत्नी है -कसम से) सिगरेट पीते हुए समूह में वही लड़की पुनः उसी रूप में मीटिंग में , खैर धुवाँ भरे वातावरण में परिचय हुआ। खैर उस धुवाँ से मेरा सर दुख गाय और उधर उल्टि कर दिए। शाम 7 PM में वापस आवास आये और जब मेस में खाने गए तो मेस मैनेजर ने बोला कि रेजिस्टर में एंटी करिये। जब नाम।तभी नही तो मैनेजर बोला कि आप गेस्ट हैं।इएलिये आपको कूपन लेकर खाना होगा। उस दिन से रामसिंह का ढाबा जिंदाबाद। अब CPI-M का छात्र संगठन SFI-स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया के परिमल माया सुधाकर ने हम सभी नए विद्यार्थियों को "दास कैपिटल" व "कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो" पकड़ा दिया और बोले कल इस पर डिबेट करेगें। हम बोले ये डिबेट क्या होता है । हम तो साइंस पढ़े हैं, एल्गी/फनजाई (जूलॉजी, बॉटनी)। क्या था यहां बीमारी थी मेस में पब्लिक टॉक होती थी और हम पहली बार फारुख शेख को सतलज हॉस्टल मेस में गये सुनने गये। इसी बीच हमारे क्लेससमेट आनंद कुमार काशिव संघ की शाखा जाने लगे विवेकानंद शाखा जो कि JNU के सरस्वती पुरम पार्क में लगती थी। एक दिन हॉस्टल चेकिंग हुई तो सभी लोग जग गये थे और हमारा उसी दौरान आनंद के साथ शाखा जाना हुआ जब लौटे तो परिमल माया सुधाकर ने देख लिया। एक तो हम लोग "दास कैपिटल" व "कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो" पर पर डिबेट नही करते हैं लेकिन शाखा में जाते है। तो उन्होंने V I Lenin की "Imperialism the Highest Stage of Capitalism" पुस्तक दे दी कि अब इसको पढ़कर आना है। हम लोग पढ़ते ही नही थे क्योंकि मार्क्स, लेलिन हमारे पाठयक्रम में था ही।इसी दौरान एक बड़ी घटना घटी की JNU में संस्कृत SCHOOL होना चाहिए के लिए abvp संघर्ष कर रही थी। उधर सभी वामी संगठन encluding NSUI उसका पूरा विरोध, उसी में से एक थे बीजू कृष्णन जो कि SFI के बड़े नेता है (पिछले साल जो महाराष्ट्र में मोदी सरकार के खिलाफ एक बड़ा किसान आंदोलन हुआ था उसको पीछे वही बीजू कृष्णन थे/हैं) , उनका नियमित परिमल के रूम में आना जाना था। मुझसे परिचय हुआ तो बोले "वाजपेयी" हो फिर बोले की संस्कृत स्कूल jnu में नही खुलना चाहिए, अगर ये खुला तो यहां पर पोंगा पंडित आयेगें, हवन करेगें ,कथा करेगें तंत्र मंत्र करेगें। उसके लिए प्रोटेस्ट करना है कल दोपहर 2:30 pm एडमिनिस्ट्रेशन बिल्डिंग के सामने। उसी दिन सुबह परिमल ने पुनः देखा कि ये संघ की शाखा में नियमित जाते है तो उन्होंने बोल दिया कि आप लोग अपने रहने का कहीं और व्यवस्था कर लें। उसी दिन दोपहर में जब वे लोग हम।लोगो को प्रोटेस्ट डेमोस्ट्रेशन में ले गए, नारे लग रहे थे SFI MARCH ON मार्च ऑन,मार्च ऑन लेकिन उनका उच्चारण सुनाई दे रहा था SFI माँच ऑन माँच ऑन, हम नए हिंदी भाषी लोगो ने नारे लगाएं SFI माँ चो----माँ चो---, हमने सोचा ये कौन से नारे हैं जिसमे गालियाँ है और इनके नारे लग रहे है। हालांकि उन्होने कई बार टोंका की गाली मत दो, लेकिन हमसे जल्दी में गाली ही निकले। क्या है उस प्रोटेस्ट में sfi की महिला कार्यकर्ताएं भी थी तो उनको बुरा लग गया। रात्रि में हमसे कहा गया कि आप लोग कहीं और व्यवस्था कर लें, ये दूसरी बार बोला गया और हमको लगभग 6 माह हो गए थे परिमल के रूम में रहते। इसी बीच मेरे उस समय के क्लासमेट व मित्र प्रवीण (आजकल PMO में हैं) को माही हॉस्टल मिल गया तो उसने मुझे अपने हॉस्टल रूम शिफ्ट करवा लिया तो अब हम आ गए माही हॉस्टल प्रवीण व आशुतोष (रेलवे में बड़े पद में तैनात हैं) के साथ। उसी दौरान क्या हुआ कि SFI/AISA वालो ने स्वामी विवेकानंद की छबि SIS कॉमन रूम में लगी थी तो उसको SFI की लीडर अलबीना शकील ने फेक दिया की इनकी छबि यहां नही लग सकती और इस बात को लेकर ABVP वालों से झगड़ा हो गया और देखा कि दोपहर में ही SFI का पोस्टर आ गया। वॉटर कूलर में वह पोस्टर लगा हुआ था। मेरे एक मित्र ने मेस टेबल में बोला की बाजपेयी तुम तो बड़े नेता हो गए हो तुम्हारा नाम है उस पोस्टर में कि तुम लोगो ने SFI के लोगो को मारा है। तुम लोगो के लिए लिखा है ABVP's NEW GOONS। हम भी जाकर पढ़े।।उस दिन मुझे मालूम चला कि हम goons हैं। प्रोटेस्ट डेमो, वीमेन rights, आज़ादी, दलितो का शोषण उनकी इसमें स्थिति उसमे स्थिति, Smash Patriarchy, बेखौप आज़ादी, अल्पसंख्यककों की इसमें स्थिति उसमे स्थिति आदि आदि इतने नए शब्द जिनको मैंने पहली बार सुना-जाना हैं सभी लिख नही सकते। अब हमको लगा कि हम #कम्युनिस्ट_अधिग्रहित_टेरिटरी में आ गए है। लंबे समय तक #COT (#Communist_Occupied_Teritory) में रहने बाद सोचा की अब अच्छे दिन आएगें लेकिन क्या #ममता_अधिग्रहित_बंगाल (#मोब) में। क्रमशः जारी--------...


नई दिल्ली/जयपुर।
# आज की जरूरत है हंसता हुआ धर्म धर्म और भाषा को लेकर लिखा गया आदरणीय चिंतक भगवान सिंह जी का एक स्टेटस पढ़ा। उसके बाद उस पर आए विचार पढ़े। मैं किसी और लोक में चला गया। अनेकानेक विचार मस्तिष्क में तैरने लगे। मैं चुपचाप अपनी वाल पर लौटा और अपने विचार लिख डाले। आचार्य विनोवा भावे की एक किताब है - 'कुरआन सार'। इसकी भूमिका में वे लिखते हैं कि इसे पढ़ते हुए उनके नेत्र धुंधले हो जाते थे, इसलिए कि आंखें भर आती थीं। वे आयतें पढ़-पढ़ कर घंटों अश्रु विमोचन करते रहते थे। फिर कई प्रकार के प्रयत्न के बाद उसे पढ़ते और अनुवाद कार्य आगे बढ़ाते। और इससे ज्यादा विस्मयकारी यह है कि आचार्य विनोबा भावे ने अपनी पुस्तक में गिनी-चुनी आयतें ही रखी हैं। उन्होंने सम्पूर्ण पर क्यों नहीं लिखा, यह मैं आज तक समझ नहीं सका। मैंने कुरआन को तीन भाषाओँ में पढ़ा - हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी। कुरआन, शरिया और अहादिस की व्याख्या करते हुए मौलानाओं के अनेकानेक वीडियो देखे। मुझे प्रभावित किया सिर्फ आस्ट्रेलिया के 'इमाम ऑव पीस' मौलाना तौहीदी ने अथवा अल्लामा सैयद अब्दुल्ला तारिक़ ने। ये दोनों मुस्लिम विद्वान मुझे तर्कसंगत बातें करते दिखे हैं। शेष जोकर ही लगे हैं, जिन्हें न इल्म है, न इल्हाम। बस, भीड़ को धकेल रहे हैं एक ऐसे गड्ढे की तरफ जिसमें अल्लाहतआला की बताई कोई चीज़ नहीं है। बस, इनके स्वार्थ भरे हैं। ठीक यही हाल ईसाइयत का है। उसके पास तमाम हिंदू प्रतीक चुरा कर स्वयं को श्रेष्ठ बताने की सीनाजोरी के अलावा कुछ नहीं है। सच कहूं, तो मुझे कुरआन या बाइबल पढ़ते हुए कभी कोई ऎसी अनुभूति नहीं हुई, जैसी रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र पढ़ते या सुनते हुए होती है अथवा टीना टर्नर द्वारा गाया 'सर्वेषां स्वस्तिर्भवतु ...' सुनते हुए। स्नातम कौर की गाई नानकवाणी मेरा रोम-रोम खड़ा कर देती है। उनके स्वर में गुरु ग्रंथ साहब के भजन मुझे रुला देते हैं। उनका गाया 'मूल मंत्र' सुनते हुए मैं अभिभूत हो जाता हूं। मूजी संगीत कभी आपने सुना है? 'शिव शिव शिव शम्भो' सुनिए। सच, आप ठीक उस तरह थिरकने लगेंगे, जैसे मैं बैठे-बैठे आंखें बरसाते हुए थिरकता हूं। मुस्कराते हुए आंसू बहाने की कला भी सीख लेंगे। क्या आपने कभी नीना हेगल को सुना है - 'जय माता काली, जय दुर्गे' गाते हुए? क्या आपने 'श्री राधा माधव, श्री कुंजबिहारी' उच्चारते देवा प्रेमल का साक्षात किया है? कीजिए। एक बार मेरे कहने से करें, फिर आपका स्व नियंत्रण। सी सी व्हाइट का 'सोल कीर्तन' सुनिए। उनके सुर में 'हरे रामा हरे रामा हरे कृष्णा हरे कृष्णा' के साथ थिरकने से आपको संसार की कोई शक्ति नहीं रोक सकती। और ठीक यही ताकत उनके गाए 'द मा चैंट', 'राधे राधे' और 'रामायण आनंद' में है। पीएम नरेंद्र मोदी जब दूसरी बार रूस यात्रा पर गए थे, तब उनके एक कार्यक्रम में एक रूसी महिला कलाकार ने वैदिक ऋचाओं का सुमधुर गायन किया था। दुर्भाग्य मैं उसे सेव नहीं कर सका। जहां मिले सुनें। बहुत सारे हैं, कहां तक लिखूं। ओशो ने लिखा है - आज एक जीवंत धर्म की आवश्यकता है। मुस्कराते, खिलखिलाते, हंसते हुए धर्म की। एक ऐसे धर्म की, जो समाज को आनंदमय करता है, उसे बेड़ियों में नहीं जकड़ता। सोचता हूं - केवल सनातन ही ऐसा धर्म है। जीता-जागता। थिरकता। हंसता-मुस्कराता। खुशियां बिखेरता। सभी को स्वीकार करता, गले लगाता। विपरीत विचार को नकारता, किंतु आचार्य कह कर सम्मानित भी करता और अपने संग्रह में स्थान देता। पश्चिम की युवा पीढ़ी रेग्गे, पॉप, रॉक आदि पर थिरकती है। भारत की युवा पीढ़ी भी इसमें पीछे नहीं है। लेकिन सनातन के लिए जैसी दीवानगी वहां है, यहां की युवा पीढ़ी में उसका लेशमात्र नहीं है। मेरा स्वप्न है - काश, मैं सनातन की यह वैश्विक शक्ति भारत भूमि पर यहां की नई पीढ़ी के समक्ष कभी साक्षात उतार सकूं। इन सभी कलाकारों को बस, एक बार भारत भूमि पर इकट्ठा कर सकूं। परमात्मा मुझे यह शक्ति दे, यही प्रार्थना है। आओ, कहें - सदा विजयी हो सत्य, जो सनातन है। 🙏...