उत्तरप्रदेश / मथुरा।
राजा मान सिंह और अकबर __________________________________________ कृष्ण जन्मभूमि- बहुत कम लोगों को जानकारी है कि अकबर अपने राज्य में मंदिर तुड़वाता तो था किंतु मंदिर बनवाने की इजाजत नहीं देता था। संत तुलसीदासजी को भी हनुमान मंदिर बनाने की इजाजत नहीं मिली थी। जब तुलसीदासजी ने वाराणसी के महल की परिधि में हनुमान मंदिर बना लिया तो उसे भी तोड़े जाने के आदेश अकबर ने जारी कर दिए थे। वह तो राजा मानसिंह और टोडरमल के हस्तक्षेप तथा वाराणसी महाराज द्वारा यह कहने पर कि मैंने अपने स्वयं के पूजन के लिए मंदिर बनवाया है, वह भी महल के अंदर तब कहीं जाकर मंदिर टूटने से बचा। बाबर के समय पहली बार राम जन्मभूमि का मंदिर तोड़ा गया था। उसके मरते ही हुमायूं के राज्यकाल में हिन्दुओं ने अयोध्या से मुसलमानों को मार भगाया और राम जन्मभूमि पर बॉकी द्वारा बनी मस्जिद तोड़ डाली और पुन: उसी मसाले से एक मंदिर बना डाला। अकबर का एक सेनापति था हुसैन खां तुकड़िया। कांतगोला और लखनऊ उसकी जागीर में थे। यह मुगल नहीं अफगान था। इसने सुना कि बादशाह बाबर ने सन् 1528 में काफिरों के देवता राम का मंदिर तुड़वा दिया था, जिसे हुमायूं के भारत से भागते समय सन् 1540 में मैनपुरी के चौहानों ने पुन: बनवा डाला है। तब हुसैन खां तुकड़िया ने अकबर को खबर भिजवाई कि मैं जिहाद पर जा रहा हूं। हुसैन ने अयोध्या पर आक्रमण कर फिर से मंदिर तुड़वा दिया। मंदिर के टूटने की खबर फैलते ही हिन्दुओं ने बगावत कर दी। राजा मानसिंह और टोडरमल अपनी सेना के साथ अलीकुली खां खानजमा का सामना कर रहे थे। ये भी सेनाओं के साथ अयोध्या पहुंचे। वहां हुसैन खां तुकड़िया पुन: मस्जिद तामीर कर चुका था। एक ओर हुसैन खां की फौजें थीं, दूसरी ओर हजारों हथियारबंद हिन्दू मरने-मारने पर आमादा थे। बीच में थी मा‍नसिंह और टोडरमल की फौजें। आगरे में अकबर के पास अयोध्या के तनाव की खबरें पहुंचीं। उसने मध्य का रास्ता निकाला। मस्जिद के सामने हिन्दुओं को एक चबूतरा बनाने की इजाजत मिल गई, जहां वे पूजन-अर्चन कर सकें। तब राम चबूतरे का निर्माण हुआ और मानसिंह के बीच-बचाव से एक भीषण रक्तपात टल गया। मथुरा के मंदिरों के टूटने और बनने का सिलसिला भी कई बार चला। सन् 1018 में महमूद गजनवी ने मथुरा के समस्त मंदिर तुड़वा दिए थे, लेकिन उसके लौटते ही मंदिर बन गए। सन् 1192 में पृथ्वीराज चौहान की पराजय के साथ भारत में मुसलमानी राज्य स्थाई रूप से जम गया। उत्तर भारत में मंदिर टूटने लगे और फिर बनवाए न जा सके। उनके स्थान पर मकबरे-मस्जिदें बना दी गईं। 350 वर्ष तक हिन्दू मंदिर विहीन मथुरा में जीवन बिताता रहा। सन् 1555 में आदिलशाह सूर के सेनापति हेमचन्द्र भार्गव ने दिल्ली-आगरा व आसपास का इलाका जीत अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। उसने यज्ञ कर विक्रमादित्य की उपाधि धारण की और दिल्ली में हिन्दू राज्य की स्थापना की। दुर्भाग्य से हेमू भार्गव का राज्य मात्र एक वर्ष तक ही रहा किंतु इस एक वर्ष में ही आसपास के जाट और यादवों ने मिलकर मथुरा की एक-एक मस्जिद तोड़ डाली। मथुरा खंडहरों का शहर बन गया, किंतु 1556 में अकबर का राज्य स्थापित होने पर नए मंदिर नहीं बन सके। मथुरा के चौबे की हवेली के पास ही खंडहर था, भगवान कृष्ण की जन्मभूमि का। यह पूरा इलाका कटरा केशवदेव कहलाता था। हिन्दू तीर्थयात्री आते थे। श्रद्धालुओं को प्रतिदिन खंडहर की परिक्रमा-पूजा करते देख चौबे अपनी हवेली में बैठ आंसू बहाता रहा। लेकिन असहाय चौबे कर ही क्या सकता था। राज्य अकबर का, सेना अकबर की, शहर कोतवाल और काजी अकबर के। जब किसी नए स्थान पर ही मंदिर बनाने की अनुमति नहीं थी तो केशवदेव मंदिर पर बनी मस्जिद के खंडहर पर मंदिर कौन बनाने देता। इन्हीं दिनों राजा मा‍नसिंह बंगाल विजय कर लौटे। अभी तक बाबर, हुमायूं और अकबर भी संपूर्ण बंगाल नहीं जीत सके थे। आगरे में धूमधाम से मानसिंह का स्वागत हुआ। अकबर ने मानसिंह से कहा- जीत के इस मौके पर जो मांगना है, मांग लो। अकबर मन ही मन बंगाल, बिहार और उड़ीसा की सूबेदारी मानसिंह को देने का निश्चय कर चुका था, लेकिन मानसिंह ने अपनी जागीर के लिए मांगा मथुरा और वृंदावन के हिन्दू तीर्थों को। अकबर इस निष्ठावान हिन्दू की श्रद्धा देख प्रभावित हुआ। उसने मथुरा-वृंदावन के तीर्थ तुरंत मानसिंह को जागीर में दे दिए, साथ ही बंगाल, बिहार, उड़ीसा का नाम बदलकर वीर मानसिंह भूमि कर दिया। वर्तमान में परगना वीरभूमि, परगना मानभूमि और परगना सिंहभूमि के रूप में ये क्षेत्र पुकारे जाते हैं। रेकॉर्ड में यही नाम दर्ज हैं। मथुरा-वृंदावन के मानसिंह की जागीर में शामिल होते ही वहां से मुगल सैनिक हटा लिए गए, किंतु न्यायाधीश के पद पर काजी डटा रहा। अकबर ने शेख अब्दुल नबी को सदर उल्सदूर (प्रधान धर्माचार्य) के पद पर नियुक्त किया था। यही व्यक्ति न्याय, इस्लाम और धार्मिक स्थानों का कार्य देखता था और मस्जिदों-मकबरों और मुल्ला-मौलवियों को दान-दक्षिणा देता था। मथुरा की प्रशासन व्यवस्था आमेर कछवाहा सैनिकों के हाथ में आते ही मथुरा के हिन्दुओं का साहस लौट आया। कटरा केशवदेव के चौबे ने कृष्ण जन्मभूमि के खंडहर से पत्‍थर-ईंटें चुनकर एक चबूतरा बना डाला। उस काल में तब मंदिर बनाने पर रोक थी तो मूर्तियां कौन बनाता? कृष्ण की मूर्ति नहीं थी, सो चौबे ने जल्दी-जल्दी में शिव की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा कर डाली। गुलामी के बीते 350 वर्षों में यह मथुरा का पहला हिन्दू मंदिर था, सो दर्शनार्थियों की भीड़ उमड़ पड़ी। शहर काजी को पता लगा तो उसने चौबे को अपनी इजलास में तलब किया। लेकिन चौबे को फुर्सत कहां? वह तो दिन-रात पूजन-अर्चन और आते-जाते दर्शनार्थियों की व्यवस्था में लगा था। चबूतरे पर दीवार और गुंबद निर्माण का काम जोरों से चल रहा था। उत्साहित दर्शनार्थी रुपयों के ढेर न्योछावर कर रहे थे। न धन की कमी थी, न जन की। नि:शुल्क मजदूरी देने वाले श्रमिकों की कतारें लगी थीं। शहर में मुसलमान सैनिक थे नहीं और कछवाह सैनिक आमेर के बाहर प्रथम हिन्दू मंदिर का निर्माण देख पुलक रहे थे। आगरे से एक-दो जत्थे धर्मांध मुस्लिम सैनिकों के आए भी, लेकिन जोश से भरे हजारों दर्शनार्थियों के बदले तेवर देख चुपचाप खिसक लिए। खबर मिलते ही सदर उल्सदूर और देशी-विदेशी मुस्लिम सरदारों ने सीकरी के दरबार में अकबर को जा घेरा और कुफ्र की सीनाजोरी को कुचलने की मांग करने लगे। दरबार और हरम में पक्ष और विपक्ष में दो दल हो गए। समस्त मुस्लिम सरदार एक ओर तथा हिन्दू सरदार दूसरी ओर हो गए। हरम की मुसलमान बेगमें मंदिर तोड़ने की बात कर रही थीं तो हिन्दू बेगमों और सरदारों का कहना था कि पहले वहां कृष्ण जन्मभूमि का मंदिर था इसलिए जो बन गया, सो बन गया। उसे नहीं तोड़ना चाहिए। मुस्लिम सरदारों और शेख अब्दुल नबी सदर का कहना था कि राज्य मुसलमानी है इसलिए इस्लामी राज्य में मंदिर का बनना कुफ्र है। वहां मंदिर को तोड़कर मस्जिद बना दी गई थी। वह जैसी भी हालत में है, उस स्थान पर मंदिर का बनना इस्लाम के खिलाफ है। अकबर दुविधा में फंसा था। भारत का हिन्दू प्रतिरोध तो समाप्त हो चुका था, लेकिन उसके परिवार के मिर्जा और भारतीय अफगान सिर उठा रहे थे। गुजरात के मिर्जा अब्दुल्ला, जैनपुर चुनार के अलीकुली खां, खानजमां और बहादुर खां, मालवा-कड़ा के आसफ खां, बंगाल के अफगान दाऊद खां और काबुल का उसका भाई मिर्जा हकीम मानसिंह और टोडरमल की तलवारों से ही झुकाए जा सकते थे। वह राजपूतों को दुश्मन बनाना नहीं चाहता था और न देशी-विदेशी मुसलमानों को नाराज करना चाहता था। इस कारण उसने सदर से कहा, यह धार्मिक मामला है और आप उसके प्रमुख हैं, जैसा चाहें वैसा करें। मैं हस्तक्षेप नहीं करूंगा। शेख अब्दुल नबी सदर ने फरमान जारी किया कि बिना इजाजत बन रहे मथुरा के मंदिर को तोड़ दिया जाए, साथ ही दो हजार मुगल सैनिक मथुरा रवाना कर दिए। आगरा से उड़ी खबर मथुरा पहुंची, अब मंदिर तोड़ दिया जाएगा...! आग की तरह खबर गांवों में फैल गई। मथुरा के चहुंओर बसा 'अजगर' फुफकार उठा। अ से अहीर, ज से जाट, ग से गड़रिए और र से राजपूत सिर पर कफन बांधकर मथुरा पर उमड़ पड़े। जन्मभूमि परिसर और मथुरा की गलियां भर गईं। जैनों, अग्रवालों, कायस्थों ने धन की थैलियां खोल दीं। मथुरा का हर हिन्दू घर रसोड़ा बन गया। हिन्दू देवियां रात-दिन पूड़ी-साग बनातीं और उनके मरद हाथ जोड़-जोड़ मिन्नतें कर बाहर से आए धर्मयोद्धाओं को खिलाते। वणिकों की गाड़ियां घर-घर आटा बांटती फिरतीं। सारा मथुरा उत्सव नगर बन गया था। मुगल दस्ता मथुरा पहुंचा तो गली-मोहल्लों में खचाखच भरे हथियारबंद हिन्दुओं को देख सहम गया। तब घूमकर मुगल घुड़सवार जन्मभूमि पहुंचे। वहां भी हिन्दू जनता अटी पड़ी थी। मुगलों को जन्मभूमि की ओर जाते देख मथुरा के कछवाहा सैनिक भी घोड़ों पर बैठ उसी ओर चल दिए। कछवाहा सैनिकों को देख मुगलों की हिम्मत बंधी। मुगल सरदार ने ऊंची आवाज में परिसर में खड़े हिन्दुओं से कहा- 'आप लोग यह जगह खाली कर दीजिए, यहां बिना इजाजत काम हो रहा है, नहीं तो खून-खराबा हो जाएगा। लेकिन कोई टस से मस नहीं हुआ। ये तो मौत को गले लगाने आए थे, कौन हटता, कौन मां का दूध लजाता? तब मुगलों ने तलवारें सूंत लीं। परिसर में खड़े हिन्दू भी गेती-फावड़े, लाठी-बल्लम, पत्थर-ईंट जो भी मिला, लेकर सन्नद्ध हो गए। मुगल घुड़सवार हमला करें, उसके पूर्व ही कछवाहा सैनिक तलवारें खींच मुगलों और जनता के बीच आ गए। कछवाहा सरदार ने मुगल सालार से कहा- '‍मियां! एक भी हिन्दू को हाथ लगाने की ‍हिम्मत की तो तुम्हारी यहीं कब्रें बना दी जाएंगी।' इस बदली परिस्थिति में मुगल चकरा गए। जनता से तो जैसे-तैसे भिड़ लेते, लेकिन शाही कछवाहा सैनिकों से पार पाना कठिन है। सारी जनता इनके साथ है। गनीमत इसी में है कि लौट चला जाए। और बागें मुड़ गईं, मुगल जैसे आए थे, वैसे ही लौट चले। आगरा जाकर मुगल सालार ने जनता की और कछवाहा सैनिकों की बगावत की बात नमक-मिर्च लगाकर अकबर को सुनाई। सदर और मुसलमान सरदारों ने भी दबाव डाला, लेकिन महाविनाश की आशंका से अकबर चुप्पी साध गया। उधर मेवाड़ में महाराणा प्रताप एक के बाद एक मुगल किले छीनते जा रहे थे। चित्तौड़, अजमेर और मांडलगढ़ को छोड़ सभी जगह से मुगल खदेड़ दिए गए। अकबर ने सोचा कि 50 हजार कछवाहे सैनिक महाराणा प्रताप से मिल गए तो फिर मेरी सल्तनत का क्या होगा? आखिरकार यह तय हुआ कि चौबे को आगरा बुलाया जाए और पूछताछ की जाए। दरबार के राजा बीरबल और अबुल फजल आगरा भेजे गए। वे अपनी ओर से विश्वास दिलाकर उस ब्राह्मण को लेकर आगरा आए और दरबार में निवेदन किया कि थोड़ी बेअदबी जरूर हुई है लेकिन अपने देवता के जन्मस्थान पर मंदिर बनाना कोई अपराध नहीं है। अब तो ब्राह्मण (चौबे) राजधानी आगरे में आ चुका था। उसकी समर्थक हिन्दू प्रजा और हिन्दू कछवाहे तो यहां थे नहीं, तो सदर के हुक्म से वह जेल में डाल दिया गया। अब दरबार में रोज बहस होती, उस ब्राह्मण के साथ क्या किया जाए। मुसलमान मृत्युदंड पर अड़े थे और और हिन्दू जुर्माना लेकर तथा बेइज्जत कर शहर में घुमाकर छोड़ देने का कह रहे थे। मानसिंह सारी बहस को चुपचाप सुन रहा था। मानसिंह की अंगारा उगलती आंखें और चुप्पी उसके मन का संकल्प बता रहे थे। अकबर को सामने टूटकर बिखरता मुगल साम्राज्य दिख रहा था। अकबर ने मानसिंह और टोडरमल को अलग से बुलाया और कहा- 'राजा साहब! मथुरा में मंदिर को तोड़ने की आज्ञा तो मैं नहीं दूंगा और वृंदावन में अगर आप चाहें तो और मंदिर बनवा सकते हैं, उसमें मैं हस्तक्षेप नहीं करूंगा।' इधर सदर अब्दुल नबी व कट्टर मुल्ला-मौलवियों को अलग से बुलाकर कहा- 'मथुरा-वृंदावन अब मानसिंह की अमलदारी में है। वहां मुगल हुकूमत नहीं है, सो आप वहां के लिए कुछ मत कहिए। ब्राह्मण आपके कब्जे में हैं, उसके लिए जो भी चाहे फैसला करें।' अगले दिन शेख सदर ने ब्राह्मण का कत्ल करवा दिया। ब्राह्मण के कत्ल की खबर फैलते ही हिन्दू दरबारी सीकरी के तालाब पर जा पहुंचे। पुन: बहस छिड़ गई। फाजिल बदायूंनी हत्या को उचित ठहरा रहा था तो अकबर ने डांटकर उसे दरबार से भगा दिया, फिर जीवनपर्यंत बदायूंनी दरबार में नहीं आया। बादशाह के गुरु शेख मुबारक ने कहा कि सारी इमामत और निर्णय के अधिकार अकबर के पास होने चाहिए। उनके ऐसा कहने पर शेख सदर के सारे अधिकार छीन उन्हें ‍मस्जिद में बैठा दिया गया, किंतु हिन्दू शांत नहीं हुए। मानसिंह के सैनिक शेख अब्दुल नबी सदर की मस्जिद के चारों ओर चक्कर काटने लगे और कट्टर मुस्लिम सैनिक भी सदर की प्राणरक्षा के लिए मस्जिद में जमा होने लगे। दिन-पर-दिन आग भड़कती ही गई। मुगल साम्राज्य को बचाने के लिए अकबर ने शेख अब्दुल नबी को एक रात चुपचाप सीकरी बुलवाया और कहा- 'मुगल तख्त और आपकी जान की सलामती इसी में है कि आप चुपचाप हज के बहाने मक्के चले जाओ और फिर लौटकर भारत मत आना।' (मुहम्मद हुसैन आजाद कृत 'अकबर के दरबारी') अकबर ने सदर को बहुत सा धन और मखदूम-उलमुल्क के साथ हज रवाना किया और वृंदावन में 4 मंदिर बनाने की इजाजत दे दी। सबसे पहले गोपीनाथ का मंदिर फिर मदनमोहन का मंदिर और 1590 में गोविंददेव के मंदिर बने। सबसे अंत में जुगलकिशोर का मंदिर 1627 में जहांगीर के काल में पूर्ण हुआ। (स्मिथ पृष्ठ 479) मक्का में शेख का मन नहीं लगा और उसकी मौत उसे भारत खींच लाई। वह जहाज में बैठ खम्भात आया। यहां हालात बदले हुए थे। शेख सीधे अकबर के दरबार में पहुंचा। जो अकबर कभी इनके जूते उठाकर पहनने के लिए देता था, अकबर को कभी इसने एक डंडा मारा था और बादशाह ने उसे प्रसाद समझकर ग्रहण किया था, उसी अकबर ने इसे दरबार में देखते ही कसकर मुंह पर एक घूंसा मारा। सदर ने चुपचाप इतना ही कहा- 'जहांपनाह! मुझे छुरी से ही क्यों नहीं मार डालते।' टोडरमल भी खार खाए बैठा था। मक्का जाते समय इसे खजाने से 70 हजार रुपया दिया गया था। टोडरमल ने उस रुपए का हिसाब मांगा। फैसला होने तक ये अबुल फजल की निगरानी में रखे गए। मानसिंह के सैनिक अबुल फजल की हवेली के चक्कर काटने लगे। अकबर ने संके‍त किया- 'भले मानस! राजपूत इसके खून के प्यासे हैं। कहीं ऐसा न हो कि इसके साथ मैं और मेरी सल्तनत भी तबाह हो जाए।' ...और एक रात शेख अब्दुल नबी सदर को कोई अबुल फजल की हवेली से उठा ले गया। दूसरे दिन आगरावासियों ने देखा कि मुनारों के मैदान में इस्लाम के धर्माचार्य शेख की लाश लावारिस पड़ी है। दूर कुछ कछवाये घुड़सवार चक्कर लगा रहे थे, डर के मारे कोई लाश के पास जा नहीं रहा था। (मुहम्मद हुसैन आजाद कृत अकबर के दरबारी पृष्ठ 299) इस घटना से यह बात साफ हो जाती है कि अकबर हिन्दुओं के प्रति उदार नहीं था। वह पहले नंबर का स्वार्थी था। जब हिन्दुओं को कुचलना था, गुलाम बनाना था, तब अपने देशवासियों, मुगलों का सहयोग लिया और जब सिर उठा रहे मुगलों, अपने भाई-बंदों को मरवाना था, तब राजपूतों का सहयोग लिया। बदले में उन्हें मंदिर बनवाने की इजाजत दी, जजिया हटाया, तीर्थों पर कर हटाया। जेसुइट मिशन का पादरी मोंसरात के मुताबिक, अकबर बड़ा धूर्त था, उसके मन की थाह कोई नहीं ले सकता था। जब उसे किसी से काम निकालना होता था, तब उसकी प्रशंसा-खुशामद सभी कर लेता था और काम निकलने के बाद ऐसा मुंह फेरता, मानो जानता ही नहीं। गोआ के पादरियों से भी उसने यही व्यवहार किया था।साभार...


नई दिल्ली / प्रयागराज।
चर्च में फ़ादर के साथ #क्रिश्चियनिटी_और_हिंदुत्व पर धार्मिक बहस... क्रिश्चियनिटी के गाल पर हिंदुत्व का थपेड़ा...जरूर पढ़ें...🙏 अभी कुछ महीने पहले ही नई यूनिट में ट्रान्सफर आया हूँ, चूँकि पिछली यूनिट में कई लोगों ने मेरी छवि एक साम्प्रदायिक कट्टर हिन्दू की बना दी थी और कुछ लोगों ने मुझे इस्लाम और क्रिश्चियनिटी विरोधी बता दिया था...सो इस यूनिट में मैं काफ़ी शांत रहता था, किसी भी धर्म पर मैं कोई भी बात नहीं करता था। मेरे साथ एक सीनियर हैं, जो 4 साल पहले हिंदू से क्रिश्चियन में कन्वर्ट हुए हैं, वो दिन-रात क्रिश्चियनिटी की प्रशंसा करते रहते और हिंदुत्व को गालियाँ देते रहते थे, चूँकि उन्हें मेरे बारे में कोई जानकारी नहीं थी और ना ही उन्होंने मेरी हिस्ट्री पढ़ी थी। सो कल रविवार को बातों ही बातों में उन्होंने मुझे क्रिश्चियनिटी में कन्वर्ट होने का ऑफ़र दे दिया और क्रिश्चियनिटी के फ़ायदे बताने लगे। मैं कई दिनों से ऐसे मौके की तलाश में था, क्योंकि मेरे दिमाग में क्रिश्चियन कन्वर्जन वाले मुद्दे को लेकर बड़ा फ़ितूर चल रहा था, मैं उसके ज्ञान का लेवल जानता था, मैं जानता था कि उसे क्रिश्चियनिटी और बाईबल में कुछ भी नहीं आता है, इसलिए मैंने उससे बहस करना जायज़ नहीं समझा। मैं बाईबल को लेकर बड़े क्रिश्चियन फादर से बहस करना चाहता था, सो मैंने उनका ऑफ़र स्वीकार कर लिया। अगले दिन शाम को मैं अपने आठ जूनियर और उस सीनियर के साथ चर्च पहुँच गया.. वहाँ कुछ परिवार भी हिन्दू से क्रिश्चियन कन्वर्जन के लिए आये हुए थे.. और धर्म परिवर्तन कराने के लिए गोवा के किसी चर्च के फादर बुलाये गए थे। चर्च में प्रेयर हुई, फिर उन्होंने क्रिश्चियनिटी और परमेश्वर पर लेक्चर दिया और होली वाटर के साथ धर्मान्तरण की प्रक्रिया शुरू की। मैंने अपने सीनियर से कहा कि वो फ़ादर से रिक्वेस्ट करें कि सबसे पहले मुझे कन्वर्ट करें। फिर फ़ादर ने मुझे बुलाया और बोला.. "जीसस ने अशोक को अपनी शरण में बुलाया है, मैं अशोक का क्रिश्चियनिटी में स्वागत करता हूँ"... मैंने फ़ादर से कहा कि मुझे कन्वर्ट करने से पहले क्रिश्चियन और हिन्दू को कम्पेयर करते हुए उसके मेरिट और डिमेरिट बतायें। मैं कन्वर्ट होने से पहले बाईबल पर आपके साथ चर्चा करना चाहता हूँ, कृपया मुझे आधे घण्टे का समय दें और मेरे कुछ प्रश्नों का उत्तर दें। फ़ादर को मेरे बारे में कोई जानकारी नहीं थी और उन्हें अंदाजा भी नही था कि मैं यहाँ अपना लक्ष्य पूरा करने आया हूँ और उन्हें पता ही नहीं था कि मैं अपना काम, अपने प्लान के मुताबिक़ कर रहा हूँ। उस फ़ादर को इस बात का अंदेशा भी नही था कि आज वो कितनी बड़ी आफ़त में फ़ंसने वाले हैं, सो फ़ादर बाईबल पर चर्चा करने के लिए तैयार हो गए। मैंने पूंंछा- फ़ादर क्रिश्चियनिटी हिंदुत्व से किस तरह बेहतर है.. परमेश्वर और बाइबिल में से कौन सत्य है.. अगर बाइबिल और यीशु में से एक चुनना हो तो किसको चुनें ?? अब फ़ादर ने क्रिश्चियनिटी की प्रसंशा और हिंदुत्व की बुराइयाँ करनी शुरू की और कहा:- 1. यीशु ही एक मात्र परमेश्वर है और होली बाईबल ही दुनिया में मात्र एक पवित्र क़िताब है। बाईबल में लिखा एक-एक वाक्य सत्य है, वह परमेश्वर का आदेश है। परमेश्वर ने ही पृथ्वी बनाई है। 2. क्रिश्चियनिटी में ज्ञान है, जबकि हिन्दुओं की किताबों में केवल अंधविश्वास है। 3. क्रिश्चियनिटी में समानता है..जातिगत-भेदभाव नहीं है, जबकि हिंदुओं में जाति-प्रथा है। 4. क्रिश्चियनिटी में महिलाओं को पुरुषों के बराबर सम्मान है, जबकि हिन्दुओं में लेडीज़ का रेस्पेक्ट नहीं है, हिन्दू धर्म में लेडीज़ के साथ सेक्सुअल हरासमेंट ज़्यादा है। 5. क्रिश्चियन कभी भी किसी को धर्म के नाम पर नहीं मारते, जबकि हिन्दू धर्म के नाम पर लोगों को मारते हैं, बलात्कार करते हैं, हिन्दू बहुत अत्याचारी होते हैं। 6. हिंदुओ में नंगे बाबा घूमते हैं, सबसे बेशर्म धर्म है हिन्दू। अब मैंने बोलना शुरू किया कि फ़ादर मैं आपको बताना चाहता हूँ कि.... 1. जैसा आपने कहा कि परमेश्वर ने पृथ्वी बनाई है और बाईबल में एक-एक वाक्य सत्य लिखा है और वह पवित्र है... तो बाईबल के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति ईसा मसीह के जन्म से 4004 वर्ष पहले हुई, अर्थात बाइबिल के अनुसार अभी तक पृथ्वी की उम्र 6024 वर्ष हुई... जबकि साइंस के अनुसार (कॉस्मोलॉजी) पृथ्वी 4.8 बिलियन वर्ष की है, जो बाइबिल में बताये हुए वर्ष से बहुत ज़्यादा है। आप भी जानते हो कि साइंस ही सत्य है... अर्थात बाईबल का पहला अध्याय ही बाईबल को झूंठा घोषित कर रहा है, मतलब बाईबल एक फ़िक्शन बुक है... जो मात्र झूंठी कहानियों का संकलन है... जब बाइबिल ही असत्य है तो आपके परमेश्वर का कोई अस्तित्व ही नहीं बचता। 2. आपने कहा कि क्रिश्चियनिटी में ज्ञान है... तो आपको बता दूँ कि क्रिश्चियनिटी में ज्ञान नाम का कोई शब्द नहीं है, याद करो.. जब #ब्रूनो ने कहा था कि "पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा लगाती है" तो चर्च ने ब्रूनो को, "बाईबल को झूंठा" साबित करने के आरोप में जिन्दा जला दिया था और #गैलीलियो को इसलिए अंधा कर दिया गया.. क्योंकि उसने कहा था "पृथ्वी के आलावा और भी ग्रह हैं" जो बाईबल के विरुद्ध था। अब आता हूँ हिंदुत्व पर.... तो फ़ादर हिंदुत्व के अनुसार, पृथ्वी की उम्र ब्रह्मा के एक दिन और एक रात के बराबर है, जो लगभग 1.97 बिलियन वर्ष है, जो साइंस के बताये हुए समय के बराबर है और साइंस के अनुसार ग्रह-नक्षत्र-तारे और उनका परिभ्रमण हिन्दुओं के ज्योतिष-विज्ञान पर आधारित है, हिन्दू ग्रंथो के अनुसार 9 ग्रहों की जीवन-गाथा वैदिक काल में ही बता दी गयी थी। ऐसे ज्ञान देने वाले संतो को हिन्दुओं ने भगवान के समान पूजा है, ना कि जिन्दा जलाया या अंधा किया... केवल हिन्दू धर्म ही ऐसा है, जो ज्ञान और गुरू को भगवान से भी ज़्यादा पूज्य मानता है, जैसे... "गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवोमहेश्वरः गुरुर्साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्रीगुरूवे नमः।। और फ़ादर दुनिया में केवल हिन्दू ही ऐसा है, जो कण-कण में ईश्वर देखता है और ख़ुद को #अह्म_ब्रह्मस्मि बोल सकता है, इतनी आज़ादी केवल हिन्दू धर्म में ही हैं। 3. आपने कहा कि 'क्रिश्चियनिटी में समानता है जातिगत भेदभाव नहीं है... तो आपको बता दूँ कि क्रिश्चियनिटी पहली शताब्दी में तीन भागों में बंटी हुई थी.... जैसे:- Jewish Christianity, Pauline Christianity, Gnostic Christianity... जो एक दूसरे के घोर विरोधी थे, उनके मत भी अलग अलग थे। फिर क्रिश्चियनिटी Protestant, Catholic Eastern Orthodoxy, Lutherans में विभाजित हुई.. जो एक दूसरे के दुश्मन थे, जिनमें कुछ लोगों को मानना था कि "यीशु" फिर जिन्दा हुए थे.. तो कुछ का मानना है कि यीशु फिर जिन्दा नहीं हुए... और कुछ ईसाई मतों का मानना है कि "यीशु को सूली पर लटकाया ही नहीं गया" आज ईसाईयत हज़ार से ज़्यादा भागों में बटी हुई है, जो पूर्णतः रंग-भेद (श्वेत-अश्वेत ) और जातिगत आधारित है... आज भी पूरे विश्व में कनवर्टेड क्रिश्चियन की सिर्फ़ कनवर्टेड से ही शादी होती है। आज भी अश्वेत क्रिश्चियन को ग़ुलाम समझा जाता है। भेद-भाव में ईसाई सबसे आगे हैं... हैम के वंशज के नाम पर अश्वेतों को ग़ुलाम बना रखा है। 4. आपने कहा कि क्रिश्चियनिटी में महिलाओं को पुरुष के बराबर अधिकार है... तो बाईबल के प्रथम अध्याय में एक ही अपराध के लिये परमेश्वर ने ईव को आदम से ज्यादा दण्ड क्यों दिया ?? ईव के पेट को दर्द और बच्चे जनने का श्राप क्यों दिया, आदम को ये दर्द क्यों नही दिया ?? अर्थात आपका परमेश्वर भी महिलाओं को पुरुषों के समान नहीं समझता... आपके ही बाईबल में #लूत ने अपनी ही दोनों बेटियों का बलात्कार किया और #इब्राहीम ने अपनी पत्नी को, अपनी बहन बनाकर मिस्र के फिरौन (राजा) को सैक्स के लिए दिया। आपकी ही क्रिश्चियनिटी ने, पोप के कहने पर अब तक 50 लाख से ज़्यादा बेक़सूर महिलाओं को जिन्दा जला दिया। ये सारी रिपोर्ट आपकी ही बीबीसी न्यूज़ में दी हुई हैं। आपकी ही ईसाईयत में 17वीं शताब्दी तक महिलाओं को चर्च में बोलने का अधिकार नहीं था, महिलाओं की जगह प्रेयर गाने के लिए भी 15 साल से छोटे लड़को को नपुंसक बना दिया जाता था, उनके अंडकोष निकाल दिए जाते थे, महिलाओं की जगह उन बच्चों से प्रेयर करायी जाती थी। बीबीसी के सर्वे के अनुसार, सभी धर्मों के धार्मिक गुरुओं में सेक्सुअल केस में सबसे ज़्यादा "पोप और नन" ही एड्स से मरे हैं, जो ईसाई ही हैं। फ़ादर क्या यही क्रिश्चियनिटी में नारी सम्मान है ?? अब आपको हिंदुत्व में बताऊँ.... दुनियाँ में केवल हिन्दू ही है, जो कहता है:- "यत्र नारियन्ति पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता" अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है, वहीं देवताओं का निवास होता है। 5. फ़ादर आपने कहा कि क्रिश्चियन धर्म के नाम पर किसी को नहीं मारते... तो आपको बता दूँ ... एक लड़का #हिटलर जो कैथोलिक परिवार में जन्मा, उसने जीवन भर चर्च को फॉलो किया... उसने अपनी आत्मकथा "MEIN KAMPF" में लिखा... "वो परमेश्वर को मानता है और परमेश्वर के आदेश से ही उसने 10 लाख यहूदियों को मारा है" हिटलर ने हर बार कहा कि वो क्रिश्चियन है। चूँकि हिटलर द्वितीय विश्वयुद्ध का कारण था, जिसमें सारे ईसाई देश एक-दूसरे के विरुद्ध थे, इसलिए आपके चर्च और पादरियों ने उसे कैथोलिक से निकाल कर Atheist (नास्तिक) में डाल दिया। फ़ादर मैं इस्लाम का हितैषी नही हूँ... लेकिन आपको बता दूँ, क्रिश्चियनों ने सन् 1096 में #Crusade_War धर्म के आधार पर ही शुरू किया था, जिसमें पहला हमला क्रिश्चियन समुदाय ने मुसलमानों पर किया, जिसमें लाखों मासूम मारे गए। फ़ादर #आयरिश_आर्मी का इतिहास पढ़ो.. किस तरह कैथोलिकों ने धर्म के नाम पर क़त्ले-आम किया, जो आज के ISIS से भी ज़्यादा भयानक था। धर्म के नाम पर क़त्ले-आम करने में क्रिश्चियन मुसलमानों के समान ही हैं... वहीं आपने हिन्दुओं को बदनाम किया, तो आपको बता दूँ कि.. "हिन्दुओं ने कभी भी दूसरे धर्म वालों को मारने के लिए पहले हथियार नहीं उठाया है, बल्कि अपनी रक्षा के लिए हथियार उठाया है। 6. फ़ादर आपने कहा कि हिन्दुओं में नंगे बाबा घूमते हैं "हिन्दू बेशर्म" हैं... तो फ़ादर आपको याद दिला दूँ कि बाइबिल के अनुसार यीशु ने प्रकाशित वाक्य (Revelation) में कहा है कि "Nudity is Best Purity" अर्थात नग्नता सबसे शुद्ध है... यीशु कहता है कि मेरे प्रेरितों, अगर मुझसे मिलना है तो एक छोटे बच्चे की तरह नग्न होकर मुझसे मिलो, क्योंकि नग्नता में कोई लालच नहीं होता। फ़ादर याद करो... #यूहन्ना का वचन 20:11-25 और #लूका के वचन 24:13-43 क्या कहते हो, इस नग्नता के बारे में ?? फ़ादर ईसाईयत में सबसे बड़ी प्रथा #Bapistism है, जो बाईबल के अनुसार येरूसलम की "यरदन नदी" में नग्न होकर ली जाती थी। अभी इस वर्ष फ़रवरी में ही न्यूजीलैंड के 1800 लोगों ने, जिसमे 1000 महिलाएं थी, ने पूर्णतः नग्न होकर बपिस्टिसम लिया और आप कहते हो कि हिन्दू बेशर्म है। अब चर्च के सभी लोग मुझ पर भड़क चुके थे और ग़ुस्से में कह रहे थे... आप यहाँ क्रिश्चियनिटी में कन्वर्ट होने नहीं आये हो, आप फ़ादर से बहस करने आये हो, परमेश्वर आपको माफ नहीं करेगा। 😁 मैंने फ़ादर से कहा कि यीशु ने कहा है "मेरे प्रेरितों, मेरा प्रचार-प्रसार करो" अब जब आप यीशु का प्रचार करोगे तो आपसे प्रश्न भी पूछे जाएँगे... आपको ज़बाब देना होगा, मैं यीशु के सामने बैठा हुआ हूँ और वालंटियर क्रिश्चियन बनने आया हूँ । मुझे आप सिर्फ़ ज्ञान के सामर्थ्य पर क्रिश्चियन बना सकते है, धन के लालच में नहीं... अब फ़ादर ख़ामोश बैठा हुआ था, शायद सोच रहा होगा कि आज किससे पाला पड़ गया... मैंने फिर कहा... फ़ादर आप यीशु के साथ गद्दारी नहीं कर सकते "आप यहाँ सिद्ध करके दिखाओ कि ईसाईयत हिंदुत्व से बेहतर कैसे है" ?? मैंने फिर फ़ादर से कहा कि फ़ादर ज़वाब दो... आज आपसे ही ज़वाब चाहिए, क्योंकि आपके ये 30 ईसाई इतने सामर्थ्यवान नहीं है कि ये हिन्दू के प्रश्नों का ज़वाब दे सकें। फ़ादर अभी भी शांत था, मैंने कहा... फ़ादर अभी तो मैंने #शास्त्र खोले भी नहीं है, शास्त्रों के ज्ञान के सामने आपकी बाइबिल कहीं टिकती भी नहीं है। अब फ़ादर ने काफ़ी सोच समझकर रवीश स्टाइल में मुझसे पूंछा.. "आप किस #जाति से हो" ?? मैंने भी #चाणक्य स्टाइल में ज़वाब दे दिया... "मैं सेवार्थ शुद्र, आर्थिक वैश्य, रक्षण में क्षत्रिय और ज्ञान में ब्राह्मण हूँ। और हाँ फ़ादर मैं कर्मणा "फ़ौजी" हूँ और जाति से "हिन्दू" !!! अब चर्च में बहुत शोर हो चुका था, मेरे जूनियर बहुत खुश थे, बाकी सभी ईसाई मुझ पर नाराज़ थे, लेकिन करते भी क्या ?? मैनें उनकी ही हर बात को काटने के लिए बाईबल को आधार बना रखा था और हर बात पर बाईबल को ही ख़ारिज कर रहा था। मैंने फ़ादर से कहा... मेरे ऊपर ये जाति वाला मंत्र ना फूँके, आप सिर्फ़ मेरे सवालों का ज़वाब दें। अब मैंने उन परिवारों को जो कन्वर्ट होने के लिए आये थे, से कहा... "क्या आप लोगों को पता है कि #वेटिकन_सिटी एक हिन्दू से क्रिश्चियन कन्वर्ट करने के लिए मिनिमम 2 लाख रुपये देती है, जिसमें से आपको 1 लाख या 50 हज़ार दिया जाता है, बाकी में 20 से 30 हज़ार तक आपको कन्वर्ट करने के लिए चर्च लेकर आने वाले आदमी को दिया जाता है, बाकी का 1 लाख चर्च रखता है। जब आप कन्वर्ट हो जाते हो, तब आपको परमेश्वर के नाम से डराया जाता है, फिर आपको हर संडे चर्च आना पड़ता है और हर महीने अपनी पॉकेट मनी या फिक्स डिपाजिट चर्च को डिपॉजिट करना पड़ता है... आपको 1 लाख देकर चर्च आपसे कम से कम, दस लाख वसूल करता है, अगर आपके पास पैसा नहीं होता तो आपको #परमेश्वर के नाम से डराकर आपकी जमीन किसी क्रिस्चियन ट्रस्ट के नाम पर डोनेट (दान) करा ली जाती है! अब आप मेरे सीनियर को ही देख लो, इन्होंने कन्वर्ट होने के लिए 1 लाख लिया था, लेकिन 4 साल से हर महीने 15 हज़ार चर्च को डिपाजिट कर रहे हैं, अभी भी वक्त है सोंच लो... आप सभी को बता दूँ कि एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में धार्मिक आधार पर सबसे ज़्यादा जमीन क्रिश्चियन ट्रस्टों पर हैं, जिन्हें आप जैसे मासूम कन्वर्ट होने वालों से परमेश्वर के नाम पर डराकर हड़प लिया गया है। अब मेरा इतना कहते ही सारे क्रिश्चियन भड़क चुके थे, तभी यहाँ के पादरी ने गोवा वाले फ़ादर से कहा कि 11बज चुके हैं, चर्च को बन्द करने का टाइम है... मैंने फ़ादर से कहा कि आपने मेरे सवालों का ज़वाब नहीं दिया, मैं आपसे बाईबल पर चर्चा करने आया था.. आप जो पैसे लेकर कन्वर्ट करते हो, वो बाईबल में सख्त मना है... याद करो गेहजी, यहूदा इस्तविकों का हस्र.. जिसनें धर्म में लालच किया। जिस तरह परमेश्वर ने उन्हें मारा, ठीक उसी तरह आपका ही परमेश्वर आपको मारेगा, आप में से किसी भी क्रिश्चियन को, जो पैसे लेकर कन्वर्ट हुआ, फ़िरदौस (यीशु का राज्य) में प्रवेश नहीं मिलेगा। अब चर्च बंद होने का समय हो चुका था, मैंने जाते-जाते फ़ादर को "थ्री इडियट" स्टाइल में कहा... फ़ादर फिर से बाईबल पढ़ो-समझों और जहाँ समझ ना आये तो मुझे फ़ोन करके पूंछ लेना, क्योंकि मैं अपने कमज़ोर स्टूडेंट का हाथ कभी नहीं छोड़ता! और आते-आते मैं सारे क्रिश्चियनों को बोल आया ककि "मेरे क्रिश्चियन भाइयों, अपने वेटिकन वाले चचाओं को बता दो कि भारत से ईसाईयत का बोरिया-बिस्तर उठाने का समय आ गया है, उन्हें बोल दो, अब भारत में हिन्दू जाग चुका है, अब हिन्दू ने भी शस्त्र के साथ, शास्त्र उठा लिया है, जितना जल्दी हो यहाँ से कट लो"......💪 जय हिन्द जय भारत...🇮🇳 जय श्री राम🚩 रवि प्रकाश मिश्रा जी...


नई दिल्ली ।
#गांधी_बनाम_मार्क्स बात नयी नहीं है बस संदर्भ नया है। बात तब की है जब 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की घोषड़ा के बाद गांधी जी गिरफ्तार कर जेल में डाल दिए गए थे। गांधी जी एक अच्छे स्कॉलर भी थे। पढ़ने में उनकी बहुत रूचि थी, बस क्या पढ़ना ये वह स्वयं तय करते थे। इसलिए इन्होंने कभी मार्क्स को पढ़ने की जरूरत नहीं समझी थी। लेकिन जेल के दौरान उनके इर्द-गिर्द जमा तमाम कॉमरेडों ने गांधी जी से मार्क्स को पढ़ने का आग्रह किया। शायद उन्हें इस बात का एहसास हो कि गांधी जी अगर मार्क्स के सिद्धांतों को सही कह दें तो भारत में साम्यवाद के विस्तार का रास्ता खुल जायेगा। गांधीजी ने उनकी बात का मान रखते हुए मार्क्स को पढ़ना स्वीकार कर लिया। जेल से छूटने के बाद जिन्होंने गांधी जी को आग्रह किया था वे बेचैन थे। उन्होंने गांधी जी से पूछा कि आपकी क्या राय है मार्क्स के सिद्धांतों पर। गांधी जी सत्य के पुजारी थे सो बिना किसी लाग-लपेट के साफ-साफ कहा, "मार्क्स को मानव मन की कोई समझ नहीं थी"। साथ ही यह भी कहा कि मेरे पास वक्त होता तो इससे बेहतर ग्रन्थ लिखता। गांधी जी के इस जवाब ने जिस तरह वामपंथियों को ख़ारिज किया लगभग उसी तरह समाज ने भी। आज जब इस बात का विश्लेषण करता हूँ तो अनेक बिंदु ध्यान में आते हैं-- - मार्क्स का पूरा सिद्धांत केवल अर्थ केंद्रित है जबकि गांधी जी समाज को सभ्यता, संस्कृति, मानवीय समझ, उसकी संवेदना की दृष्टि से देखते थे। - मार्क्स का अर्थशास्त्र मशीन केंद्रित है जिसमें मानव एक मजदूर है जबकि गांधी के अर्थशास्त्र में मानव और उसकी संवेदना केंद्र बिंदु है। - मशीनी अर्थशास्त्र में मनुष्य की मौजूदगी उसके श्रमिक होने तक है लेकिन मानवीय अर्थशास्त्र में मनुष्य श्रमहीन होने की स्थिति में भी प्रासंगिक रहता है। - मार्क्स का धर्म,सभ्यता,संस्कृति से कोई वास्ता नहीं था जबकि गांधी धर्म, सभ्यता, संस्कृति के बिना किसी मनुष्य की कल्पना ही नहीं करते थे। आज का दुर्भाग्य यह है कि देश ही नहीं दुनियां भर में खुद को गांधीवादी कहने वाले तमाम चेहरे दरअसल अपनी राजनैतिक ज़मीन खोकर भंगी बने मार्क्सवादी ही हैं। उनके अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र का चेहरा तो मार्क्स वाला है लेकिन उन्होंने मास्क गांधी जी का लगा रखा है। यह उनके पराजय और द्वन्द का प्रतीक है। जिसमें वे बार बार बेनकाब होते हैं। भारतीय समाज के स्वधर्म की जीत है। 🙏🙏#रूपेश@पाण्डेय...


नई दिल्ली ।
(जो लोग साहित्य में रुचि रखते हैं, उन्हें अभिषेक कश्यप का नाम बताने की ज़रूरत नहीं है। हम एक-दूसरे को जानते हैं। अलबत्ता, कभी उनकी विचारधारा जानने की कोशिश मैंने नहीं की। मेरे लिए बस इतना पर्याप्त है कि वे सोचने-विचारने वाले नेक इनसान हैं। बीते दिनों फेसबुक पर उन्होंने एक पोस्ट की, जिसे देखकर मैंने एक टिप्पणी की। इस टिप्पणी के जवाब में अभिषेक जी ने एक पोस्ट अलग से लिखी। कल उनकी पोस्ट पर मेरी निगाह पड़ी तो मुझे भी जवाब देने की ज़रूरत लगी। इस चर्चा में आपका स्वागत है। बात जैसी भी हो, जितने भी तेवर में हो, कोई परेशानी नहीं, पर ईर्ष्या-द्वेष को परे रखने की कोशिश करेंगे तो अच्छा रहेगा।) ----- अभिषेक कश्यप की पोस्ट April 9 at 12:33 PM फेसबुक मित्रों के लिये एक सूचना : ----------------------------------------- फेसबुक की दुनिया के जाने/अनजाने मित्रो ! मुझे निम्न लोग FB मित्रता संदेश न भेजें और ऐसे लोग अगर मित्रता सूची में अब भी रह गए हैं तो अविलम्ब दूर हो जाएँ/मेरी सूची से निकल लें. 1. अंधभगत/ ज़ोंबी. 2. दिमागी दिवालियेपन के शिकार वे लोग, जिनके लिए व्यंग्य/हास्यबोध का मतलब फूहड़ता है. 3.जो अपनी मां-बहन को भी रात में गाली दे सकते हैं और सुबह 'जय श्री राम' के नारे लगाते हैं. 4.जिनके लिए गोदी जी या कोई व्यक्ति विशेष ही देश है, भगवान है. 5.जिनकी नजर में विपक्ष को सवाल पूछना ही नहीं चाहिये, सिर्फ सरकार की जय-जयकार करनी चाहिए. 6. जिन्हें ज्ञान TV/व्हाट्सएप्प और XJP के IT सेल से मिलता है और जिन्हें अंधविश्वास, गो मल-मूत्र आदि की महिमा पर भरोसा है. 7.जो अनर्गल प्रलाप करते हैं. जिनके लिए धर्म या जातिवादी गौरव लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान से सर्वोपरि है। 8. असहमति जताने का मतलब जिनके लिए कुतर्क और गाली-गलौज़ करना है़. 9.जाहिल हिन्दू, जाहिल मुसलमान, अन्य अंध-धर्मावलंबी कथित पढ़े-लिखे अर्थात् ‘कुपढ़ जाहिल’ भी मुझे रिक्वेस्ट न भेजें और जो मित्रता सूची में बाकी बचे रह गए हैं, तुरंत निकल लें. 10.जिन्हें लगता है कि थाली-ताली पीट कर और दीया जला कर कोरोना या किसी बीमारी का इलाज किया जा सकता है और ऐसा नहीं करता, वह गलत है. 11.जातिवादी लोग, जो सोचते हैं कि ब्राह्मण, राजपूत या कोई भी जाति/धर्म श्रेष्ठ है. 12.सिर्फ विज्ञान सम्मत दृष्टि रखनेवाले तार्किक और विचारवान लोगों का स्वागत है, जिनकी प्रथम आस्था देश के संविधान में है और जो सभ्य नागरिक समाज के निर्माण में अपना बौद्धिक योगदान देना चाहते हैं. सधन्यवाद ----मेरी टिप्पणी (सन्त समीर)---- बात विचारणीय है, पर मेरी क्या हैसियत होगी अभिषेक जी? मैं मोदी जी को जूते भी दिखाता रहता हूँ और कुछ अच्छा लग जाए तो माला भी पहना देता हूँ। मुझे 'जय श्रीराम' और 'लाल सलाम', दोनों में हद दर्जे के कुढ़मग़ज़ और समझदार मिल जाते हैं। गाय, गोबर, गोमूत्र को धार्मिक आस्था के तौर पर परले दर्जे का उल्लुआपा भले मानूँ, पर इनकी कई उपयोगिताएँ भी मैं साफ़-साफ़ महसूस करता हूँ। थाली पीटकर और दीया जलाकर कोई कोरोना भगाए तो यह मूर्खता नहीं, महामूर्खता है, पर कोई एकजुटता या जज़्बा ज़ाहिर करने के लिए करे, तो इसे वैसे ही समझता हूँ, जैसे कि लोग दूसरे पर्व-त्योहार वग़ैरह मनाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में आए दिन मोमबत्ती जलाने की जो परम्परा शुरू हुई है, वह दीया जलाने से कहीं ज़्यादा बुरी लगती है। देश के संविधान में भी बहुत ज़्यादा आस्था नहीं व्यक्त कर पाता, क्योंकि यह काम का कम, 'चूँ-चूँ का मुरब्बा' ज़्यादा लगता है। यह कैसा संविधान, जो एकदम स्पष्ट केस को भी दस साल लटका दे और इतने दिनों में दुर्दान्त अपराधी पीड़ित से ज़्यादा नेक नज़र आने लगे। बाक़ी बातें तो ख़ैर आपकी ठीक ही हैं। ----अभिषेक जी की जवाबी पोस्ट---- मेरा जवाब...कुछ बातें, जो मेरे ध्यान में न रहीं हों, वाद-विवाद-संवाद की स्वस्थ परम्परा के तहत आप मित्रगण भी इसमें जोड़ सकते हैं - संत समीर जी, आपसे परिचित हूं, इसलिए आपके ‘वैचारिक द्वैध’ को ले कर अचरज में हूं। आप कहते हैं-‘‘मैं मोदी जी को जूते भी दिखाता रहता हूं और कुछ अच्छा लगे तो माला भी पहना देता हूं।’’ इससे तो यही लगता है कि आप मौजूदा राजनैतिक परिदृश्य को संपूर्णता में नहीं, टुकड़े-टुकड़े में देखने के आदी हो चले हैं। यहां मैं आपकी या किसी व्यक्ति विशेष की बात नहीं कर रहा लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि ऐसी ‘मध्यमार्गी प्रवृत्ति’ का राजनैतिक अवसरवाद और सत्ता के लाभ-लोभ से गहरा संबंध रहा है। हमारे कई समाजवादी नेता इसके शिकार हुए और अंतत: उन्हें दक्षिणपंथ की शरण में ‘निर्वाण’ की प्राप्ति हुई है। यह तो कुछ ऐसा ही हुआ कि मैं गांधी और गोडसे, दोनों के साथ हूं। गांधी की हत्या के लिए मैं गोडसे (गोडसेवादियों) को जूते दिखाऊंगा लेकिन माला भी पहनाऊंगा ! अपने घनघोर राजनैतिक अवसरवाद के एजेंडे पर चलते हुए दक्षिणपंथी सत्ता यही तो कर रही है। वह ‘गोडसे भक्त साध्वी’ को टिकट दे कर संसद पहुंचाती है फिर जब साध्वी गोडसे को सरेआम नायक की उपाधि से विभूषित करती है तो साहेब उन्हें ‘दिल से माफ न करने’ का मैलोड्रामा रचते हैं। कोई भी इसमें निहित मंशा को आसानी से पहचान सकता है। जिस तरह गांधी और गोडसे, साथ-साथ नहीं चल सकते, उसी तरह ‘जूते दिखाने और माला पहनने’ की प्रवृत्ति को वही समझा जाएगा, ऊपर जिसकी मैंने चर्चा की। आपने लिखा है-‘‘जय श्री राम’ और ‘लाल सलाम’, दोनों में हद दर्जे के कुढ़मगज़ मिल जाएंगे।’’ दिक्कत यही है। जब आप विचार और दृष्टि की समग्रता की बजाय व्यक्ति पर केंद्रित हो कर देखेंगे/परखने लगेंगे तो निश्चय ही विचलन के शिकार होंगे। गाय, गोबर, गोमूत्र की पारंपरिक उपयोगिताएं हम सब जानते हैं लेकिन जब आप गोबर से उपले बनाने की बजाए उसे ‘पौष्टिक आहार’ मानने लगेंगे या बिना किसी वैज्ञानिक/चिकित्सकीय प्रमाण के गोमूत्र को किसी वायरस की शर्तिया दवा मान लेंगे तो ‘उपयोगिता का यह आग्रह’ सनक, जहालत या फिर प्रोपगेंडा ही माना जाएगा। जब वैश्विक महामारी से रोज़ दुनिया भर में हजारों की तादाद में लोग मर रहे हों, जब राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन से देश के करोड़ों बेरोजगार, बदहाल, निर्धन नागरिकों के रोजगार छिन गए हों, वे भूखे-प्यासे सैकड़ों-हजारों मील का सफर तय करने को मजबूर कर दिए गए हों, एक वक्त की रोटी के लिए तरस रहे हों, भूखे मरने की आशंका से ग्रस्त हों...तब ज़ज़्बे की नहीं, करूणा की जरूरत होती है। ऐसे कठिन समय में थाली-घंटेबाजी या दीये जला कर ख़ुशी मनाना...आपके शब्दों में कहें तो एकजुटता और ज़ज़्बा जाहिर करना एक मनुष्य-विरोधी कृत्य ही माना जाएगा! जैसा कि आपने कहा, ‘पर्व-त्योहार’…क्या यह पर्व-त्योहार मनाने का समय है ? जहां तक संविधान की बात है, हम सब जानते हैं, उन्होंने संविधान में संशोधन की गुंजाइश रखी और समय-समय पर इसमें बदलते समय के अनुरूप तमाम संशोधन होते रहे हैं। आगे भी होंगे। संविधान से संचालित लोकतांत्रिक व्यवस्था में गड़बड़ियों हो सकती हैं। दरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत और प्रभावी बनाने की है। इसके इतर जो अधिनायकवादी/फासीवादी शासन को लोकतांत्रिक व्यवस्था के विकल्प के रूप में देखते हैं, उन पर तरस ही खाया जा सकता है. -अभिषेक कश्यप -------------- -----मेरा जवाब (सन्त समीर)----- भाई अभिषेक जी! आपने शुरू में ही मेरे वैचारिक द्वैध पर अचरज जताया है। इससे बड़ा अचरज मुझे हो रहा है कि मेरी बातों में आपको आख़िर किस कोण से वैचारिक द्वैध दिखाई दे गया? अगर आपको लगता है कि किसी एक व्यक्ति, वर्ग या विचारधारा का पक्षधर होना वैचारिक स्पष्टता है, या कि किसी व्यक्ति के अच्छे गुणों को अच्छा कह देना और बुरे गुणों को बुरा कह देना वैचारिक द्वैध है, तो इस तरह की दृष्टि को मैं मानसिक बीमारी मानता हूँ। विचारधाराओं की ज़िद को भी मैं मानसिक बीमारी मानता हूँ। जितने भी दङ्गे-फ़साद हैं, सबके मूल में विचारधाराओं की ज़िद ही है। असल में जब हम किसी विचारधारा को मानने लगते हैं तो इसीलिए कि वह हमें सबसे बेहतर लगती है। ऊपर से हम कहें न कहें, पर भीतर की हमारी चाहत होती है कि इसी विचारधारा को दुनिया भर के सारे लोग मानें। यह भी कि सही मायने में इसी से विश्व-कल्याण होगा। असली दिक़्क़त यही है। विवाद और झगड़े यहीं से शुरू होते हैं। याद रखिए कि विचारधाराएँ हमारी-आपकी देन हैं, आसमानी नहीं। हमारे प्रगतिशील साथियों ने कुछ ऐसी स्थापनाएँ बनाने की कोशिश की हैं, जैसे कि एक ही आदमी में कुछ अच्छी और कुछ बुरी, दोनों तरह की बातें साथ-साथ नहीं रह सकतीं। और कि जैसे शोषक और शोषित, दोनों अलग-अलग रूप में आसमान से टपकाए गए हैं। याद रखिए, वैज्ञानिकता-वैज्ञानिकता रटने से ही कोई विचारधारा वैज्ञानिक नहीं हो जाती। आपने लिखा है कि मैं मौजूदा राजनैतिक परिदृश्य को सम्पूर्णता में नहीं, टुकड़े-टुकड़े में देखने का आदी हो चला हूँ, जबकि मुझे ठीक इसी का उलटा लगता है कि जब कोई एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति या विचारधारा में सिर्फ़ कोई एक ही पक्ष देख पाता है तो असल में चीज़ों को टुकड़े-टुकड़े में देखने का आदी तो वह है। यह कुछ वैसे ही है, जैसे हिन्दी फ़िल्मों के नायक और खलनायक। अच्छा पूरा अच्छा, और दुष्ट पूरा ही दुष्ट। अगर हम ऐसा मान लें कि इस दुनिया में कुछ ख़ास तरह के लोग पूरी तरह दुष्ट ही होते हैं और एक दूसरी तरह के लोग पूरी तरह अच्छे, तो इससे बड़ा नियतिवाद और कुछ नहीं है। आप कहते हैं कि ‘ऐसी (यानी मेरी तरह की) ‘मध्यमार्गी प्रवृत्ति’ का राजनैतिक अवसरवाद और सत्ता के लाभ-लोभ से गहरा सम्बन्ध रहा है।’ अब बात यह कि इसमें किस बात का मध्यमार्ग? असल में हमारी परेशानी यह है कि हम सीधे बात करने के बजाय पहले कुछ जुमले गढ़ते हैं, फिर बात आगे बढ़ाते हैं। मसलन, हम पहले ‘दक्षिणपन्थ’, ‘मध्यमार्ग’ टाइप के शब्दों को गाली के रूप में स्थापित करते हैं और फिर किसी पर इसे चस्पाँ कर देते हैं। ऐसा करके किसी को सिरे से ख़ारिज करना आसान हो जाता है। प्रकृति विचारधाराओं के हिसाब से नहीं चलती। मनुष्य के अलावा दुनिया का कोई जीव-जन्तु विचारधारा की बीमारी नहीं पालता। हमारे पास सोचने-विचारने वाला दिमाग़ है तो हम अपने अलग-अलग खाँचे बनाते हैं और भाँति-भाँति की विचारधाराएँ गढ़ते हैं। शरीर में एक भी संरचना प्रकृति ने ऐसी नहीं बनाई, जो विचारधाराओं के हिसाब से अलग-अलग हो। नींद में दिमाग़ शान्त हो जाता है तो विचारधाराओं का अता-पता नहीं होता। विचारधारा की ज़िद में खाने-पीने का तरीक़ा कितना भी अलग करने की कोशिश करें, पर हलक के नीचे उतरते ही आहार का पाचन सबका एक जैसा ही होता है। फिर मैं कह रहा हूँ विचारधारा कितनी भी अच्छी हो, अगर वह ज़िद के रूप में दिमाग़ पर सवार हो तो मानसिक बीमारी है। विचारधाराएँ जीवन को टुकड़े-टुकड़े में देखने की आदी बनाती हैं, जबकि इस संसार को समझना हो तो समग्रता की दृष्टि चाहिए। अब बात यह कि किसी समाजवादी नेता का निर्वाण दक्षिणपन्थ की शरण में हुआ तो यह समाजवादी जानें, इससे मेरा क्या लेना-देना? यों भी वादों में मेरा कोई विश्वास नहीं है। सच कहीं हो, उसे मैं नकार नहीं सकता और झूठ कहीं हो, उसे स्वाकीर नहीं सकता। ‘राजनैतिक अवसरवाद और सत्ता के लाभ-लोभ से गहरा सम्बन्ध’ कहकर आप क्या कहना चाहते हैं? अगर मेरे लिए कहना चाहते हों कि मैं मध्यमार्गी हूँ, इसलिए मैं भी ऐसा ही होऊँगा, तो पहली बात तो यह कि अध्यमार्गी-मध्यमार्गी होने में मेरा कोई भरोसा नहीं। दो टूक कहता और लिखता हूँ। आप तो बस इसकी शिनाख़्त फेसबुक जैसी चीज़ों से भी कर सकते हैं। कभी भी मेरी कोई पोस्ट किसी की चापलूसी में लिखी गई हो तो बताइए। कभी कोई सम्मान-पुरस्कार लेने की जुगत लगाई हो तो वह भी बताइए। यों, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई समाप्त करते-करते ही ऐसे काम कर गुज़रा हूँ कि लोगों ने सुझाव दिया कि फलाने-फलाने से कह दूँ तो दो-चार बड़े पुरस्कार मिल जाएँगे। वैश्वीकरण की बहस चलाने में थोड़ा नहीं, बहुत बड़ा योगदान रहा है मेरा और मेरे तमाम साथियों का। दस-बारह साल तक देश के तमाम अख़बारों को इस मुद्दे पर एक फ़ीचर एजेंसी चलाकर जाने कितनी समाग्री उपलब्ध करवा चुका हूँ। अपनी तारीफ़ करनी नहीं चाहिए, पर पहचान के लिए मर-मिट रही अपनी लेखक बिरादरी को देखिए और मुझे देखिए, फिर कहिए कि अवसरवाद क्या है? वह समय मुझे याद आ रहा है जब ‘नवभारत टाइम्स’ में छपे मेरे लेख ‘साहित्यकारों क तीर्थ में साहित्य का चकलाघर’ पर देश की संसद में हङ्गामा हुआ और कुछ ही दिन बाद ‘तोड़ना ही होगा सरकारी जुए का तिलिस्म’ पर उत्तर प्रदेश की विधानसभा में। लोग मेरा कूड़ा-कचरा कुछ भी छापने को तैयार थे, पर मैंने कुछ समय के लिए लिखना इसलिए बन्द कर दिया कि मुझे सेलीब्रिटी नहीं बनना। उम्र छोटी थी, पर मेरे कहने पर रामविलास शर्मा जैसे व्यक्ति ने अपने हाथ से हिन्दी के सवाल पर अपनी हैण्डराइटिङ्ग में लेख लिखकर भेजा, जबकि वे सार्वजनिक रूप से लिखना बन्द कर चुके थे। क्या यह अवसरवाद है कि मैं हर विचारधारा के व्यक्ति को एक मञ्च पर लाकर खड़ा कर सकता था। मुद्राराक्षस, अच्युतानन्द मिश्र, मन्नू भण्डारी, प्रो. रघुवंश, प्रभाष जोशी, रामबहादुर राय, प्रियदर्शन, नरेश मेहता...किसी ने कभी मुझे मना नहीं किया। कहानीकार दूधनाथ सिंह ने कहा कि वैसे तो मैं वहाँ जाना पसन्द नहीं करता, पर तुम कह रहे हो बेटा, तो मैं ज़रूर आऊँगा...और वे आए। प्रगतिशीलता की बीमारी का हाल समझने के लिए एक सच्ची घटना बताता हूँ। जैसे आपने लॉकडाउन की वजह से बदहाल हुए लोगों का ज़िक्र करते हुए ऐसे समय में थाली-घण्टेबाज़ी और दीये जलाने की लानत-मलामत की है, वैसे ही जब मक़बूल फ़िदा हुसैन का मामला उठा था तो मैंने भी समस्याओं के अम्बार के बरअक्स कला का धर्म याद दिलाने की कोशिश की थी तो प्रगतिशीलता के नामी धुरन्धरों ने मुझे दक्षिणपन्थी और न जाने क्या-क्या घोषित कर दिया। एक भलेमानुष पुरुषोत्तम अग्रवाल ने तो ‘हिन्दुस्तान’, ‘राष्ट्रीय सहारा’ और ‘पूर्वग्रह’ जैसी पत्र-पत्रिकाओं में मेरी लानत-मलामत करते हुए लेख ही लिख डाले। मज़ा यह कि किसी ने मुझे न तो कभी देखा था और न ही मेरी विचारधारा की पड़ताल की थी। इन महापुरुषों को पता ही नहीं था कि वे उस लड़के से उलझ रहे हैं, जो ख़ुद तब जनवादी लेखक सङ्घ का सदस्य था। ख़ैर, मेरे जवाबी लेख के बाद सन्नाटा खिंचा। इस घटना से मुझे समझ में आया कि प्रगतिशील तबक़ा नैरेटिव रचने में दक्षिणपन्थियों से ज़्यादा माहिर है और कुढ़मग़ज़ है। बिना जाँचे-परखे घर में बैठकर फ़तवे जारी करता है। इतिहासकार धर्मपाल से जुड़ी एक दूसरी घटना से भी प्रगतिशील सोच की वैज्ञानिकता का खोखलापन मुझे समझ में आया। पता नहीं किस खुन्दक में प्रगतिशील साथी इतिहासकार धर्मपाल को आज भी दक्षिणपन्थी घोषित करके उन्हें ख़ारिज करते रहते हैं? मैं धर्मपाल जी के साथ सेवाग्राम आश्रम में लम्बे समय तक रहता रहा हूँ। अच्छी तरह जानता हूँ कि धर्मपाल जी इञ्च भर भी वैसे नहीं थे, जैसा साम्यवादी भाई लोग कहते रहे हैं। आप किसी को नज़दीक से देखेंगे नहीं और मनगढ़न्त धारणाएँ बनाएँगे तो इसे परले दर्जे का उल्लुआपा न कहें तो क्या कहें? इसे मैं गाँवों में डायन कहकर मार दी जाने वाली महिलाओं की तरह देख रहा हूँ। पहले किसी को डायन कह-कहकर उसे सबकी नज़रों में ग़लत मनवा लो और फिर उसे मार देने में भी सबकी सहमति मिल ही जाएगी। याद आया कि एक बार ‘काजू भुने प्लेट के’ धुर मार्क्सवादी रचनाकार अदम गोण्डवी दिल्ली आए तो उनके भतीजे दिलीप जी का फ़ोन आया कि चाचाजी आए हैं और आपसे मिलना चाहते हैं। तब के हमारे सम्पादक गोविन्द सिंह जी थे। उनको पता चला कि तो उन्होंने कहा कि हम लोग भी अदम जी से मिलने चलेंगे, पर अदम जी ऐसे प्राणी थे कि ख़राब तबीयत के बादजूद ख़ुद ही मेरे दफ़्तर चले आए। मैंने उस समय उनका साक्षात्कार लिया, जो उनकी ज़िन्दगी का आख़िरी साक्षात्कार था। उन्होंने बातचीत में कहा—‘‘हम प्रगतिवादियों ने क्रान्ति के नाम पर बस यही उपलब्धि हासिल की कि एक-दूसरे की बीवियाँ बदल लीं।’’ इसे मैंने छापा। सङ्केत गहरे थे, जो आज भी महसूस किए जा सकते हैं। एक बात यह भी समझिए। अगर कोरोना प्रकरण में परम्परा में पहले से मौजूद दीया जलाना मूर्खता और अन्धविश्वास (हालाँकि मोदी जी ने साफ़ कहा कि यह एकजुटता दिखाने के लिए है) है, तो किसी हादसे पर एकजुटता दिखाने के लिए ही इण्डिया गेट पर मोमबत्ती जलाना क्या है? माना कि दीया जलाने से कोरोना भाग नहीं जाएगा, तो क्या मोमबत्ती जलाने से मरे लोग ज़िन्दा हो जाएँगे? ज़रूरी नहीं कि अन्धविश्वास सिर्फ़ दक्षिणपन्थी हरकतों में ही हों। ख़ैर... आपने लिखा है कि…‘‘ऐसे कठिन समय में थाली-घण्टेबाज़ी या दीये जलाकर ख़ुशी मनाना...आपके शब्दों में कहें तो एकजुटता और जज़्बा जाहिर करना एक मनुष्य-विरोधी कृत्य ही माना जाएगा!’’ आपकी इस भावना की क़द्र की जा सकती है, पर यह कहते हुए यह भी याद कीजिए कि इस कठिन समय में अपने घर में रहते हुए आपने कितनी बार हँसने-मुस्कराने की कोशिश की है। अगर लोगों की तकलीफ़ें देखकर आपके चेहरे से हँसी ग़ायब हो गई है और आप लोगों को मदद पहुँचाने के लिए भाग-दौड़ करने में लगे हैं तो मैं आपका अभिनन्दन करता हूँ कि आप अपनी भावना के हिसाब से चल रहे हैं, लेकिन जब बाहर मुश्किल में फँसे तमाम लोगों को रोना आ रहा है, तो ऐसे में अगर एक भी दिन आपके चेहरे पर हँसी आई, तो आपको ख़ुद को भी मनुष्य-विरोधी कृत्य वालों की जमात में शामिल करना पड़ेगा। मैं जब यह कह रहा हूँ तो अपने और अपने मुहल्ले के स्तर पर साथियों के साथ दवा, राशन वग़ैरह बाँटने के लिए तत्पर हूँ। यह भी याद कीजिए कि जितने लोगों ने थालियाँ पीटीं या दीये जलाए, वे सब क्या सचमुच मनुष्य-विरोधी लोग थे। फिर तो करोड़ों लोगों को देश-निकाला दे देना चाहिए। अगर मान लें कि लोग थालियाँ पीटकर या दीये जलाकर जश्न मना रहे थे, तो सवाल है कि आख़िर वे किस बात का जश्न मना रहे थे? यदि कुछ लोग ऐसा कर भी रहे थे, तो जो लोग सचमुच पूरी ईमानदारी से एकजुटता दिखाने के प्रतीक के तौर पर ही...और किसी पार्टी नहीं, बल्कि देश के प्रधानमन्त्री की अपील मानकर ऐसा कर रहे थे, उनके लिए क्या कहेंगे? असल में हम विचारधारा के वशीभूत बड़ी आसानी से चीज़ों के सरलीकरण के आदी हो गए हैं। अब बात यह अभिषेक जी कि इस पूरे प्रकरण में गान्धी और गोडसे का उदाहरण किस हिसाब से आपने दिया? इसका क्या तुक बनता है यहाँ? क्या आपको लगता है कि मैं गोडसे की जय-जयकार करने वाला व्यक्ति हूँ? गम्भीरता से सोचिए, क्या यह प्रसङ्गेतर और बचकाना उदाहरण नहीं लग रहा? मोदी जी की ही बात करें तो क्या वे गान्धी या गोडसे में से कोई एक माने जा सकते हैं? अगर ऐसा कोई मानता है तो यह यू. आर. अनन्तमूर्ति जैसे समझदार के बचकाने बयान जैसा ही है कि ‘अगर मोदी देश के प्रधानमन्त्री बन गए तो मैं देश छोड़ देना पसन्द करूँगा।’ दिल ज़रा बड़ा कीजिए और हर कहीं अच्छाई को अच्छाई और बुराई को बुराई के रूप में स्वीकार या अस्वीकार करने का माद्दा पैदा कीजिए। मैं नहीं कह रहा कि गान्धी और गोडसे, दोनों के बगल में एक साथ खड़े होइए, पर गान्धी को ज़रूर याद कीजिए, जो अँग्रेज़ों के ख़िलाफ़ पूरी ताक़त से लड़ाई लड़ते हैं, पर उनकी अच्छाई और सच्चाई के साथ खड़े होने में उन्हें कोई परेशानी नहीं है। गान्धी अँग्रेज़ों से नफ़रत ज़रा भी नहीं करते, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर उनके हक़ के लिए बात करते हैं। मैं राम को उस रूप में पसन्द करता हूँ, जो रावण के अन्याय के विरुद्ध युद्ध करते हैं, पर उसकी विद्वत्ता को पूरा सम्मान देते हुए आख़िरी समय में अपने छोटे भाई को उसके पास भेजते हैं कि जाओ लक्ष्मण, सम्मान के साथ रावण के सिर नहीं, पैरों की तरफ़ खड़े होना और उससे जीवन का ज़रूरी ज्ञान हासिल करना। राम के पूरे जीवन में नफ़रत नाम की चीज़ नहीं है। यहाँ ‘जय श्रीराम’ वालों का ज़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि ये राम के पुछैटे हैं और बिना नफ़रत के रह नहीं सकते। वैसे अपने घर में ही आप देखेंगे तो शायद हर कोई गान्धी और गोडसे, दोनों के साथ खड़ा दिखाई देगा। घर का कोई व्यक्ति जब ग़लत काम कर रहा होता है तो उस समय वह गोडसे की बिरादरी का ही होता है। हम उसकी निन्दा करते हैं, डाँटते-फटकारते हैं, पर जब वही कुछ अच्छा करता है तो उसे सिर-आँखों पर बैठाते हैं। घर वाला व्यवहार बाहर के लोगों के साथ क्या नहीं सम्भव है? मेरे हिसाब से चीज़ों को पन्थों और वादों में बाँटकर देखना वैज्ञानिक नहीं, घोर अवैज्ञानिक सोच है। विज्ञान में जब हम किसी पदार्थ या तत्त्व का अध्ययन करते हैं, तो उसके पक्ष या विपक्ष में नहीं होते। कितना भी ख़तरनाक ज़हर हो, हम उसके गुण-दोष दोनों देखते हैं। दक्षिणपन्थी भी आदमी ही होते हैं और वामपन्थी या कोई और पन्थी भी। खेल संस्कारों का है कि कौन कैसा व्यवहार करता है। भारतीयता के संस्कार ऐसे रहे हैं कि यहाँ एक राजा भी कब अपना सब कुछ त्याग कर फ़क़ीर हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। आजकल के दक्षिणपन्थी अगर तालिबानों से प्रतिस्पर्धा करना चाहते हैं तो यह भी एक अलग ढङ्ग का प्रायोजित संस्कारों का ही प्रतिफल है और भारतीयता की मूल धारा का नहीं है। यहीं पर यह भी सनद रहे कि वामपन्थ का प्रगतिशील चेहरा भी तालिबानी शक्ल से अलग नहीं है। दुनिया में जहाँ-जहाँ साम्यवादी सत्ताएँ क़ायम हुई हैं, उनके चेहरे ठीक से पहचानिए। दक्षिणपन्थ अगर उजड्ड दैहिक हिंसा का पाठ तैयार करता है, तो प्रगतिशील सोच प्रतिक्रियावादी वैचारिक हिंसा का। दक्षिणपन्थ और वामपन्थ, दोनों का उपजीव्य नफ़रत है, जबकि संसार की रचना इस हिसाब से नहीं हुई है। इस नफ़रत की मानसिकता की वजह से ही आधुनिक साहित्य का भी अधिकांश प्रतिक्रियावादी है, जिसमें लोककल्याण का तत्त्व बस छद्म आवरण जैसा है। जिस फासीवाद का आरोप दक्षिणपन्थियों पर मढ़ा जाता है, प्रगतिशील तबक़ा ख़ुद भी शातिराना ढङ्ग से उसी से ग्रस्त है। ‘साहेब के मेलोड्रामा’ रचने की बात का भी यहाँ कोई मतलब नहीं, पर आपने लिखा है तो यह भी याद कीजिए कि इक्का-दुक्का साम्यवादियों को छोड़कर बाक़ी सारे ताउम्र मेलोड्रामा ही रचते रहे। काँग्रेस के इतने लम्बे शासनकाल में नेहरू और राजीव गान्धी को ज़रा बख़्श दें तो इन्दिरा गान्धी से ज़्यादा मेलोड्रामा किसने रचा? नेहरू ने अगर गौरवशाली संस्थानों की नींव रखी तो इन्दिरा ने उन संस्थानों में भ्रष्टाचार की। किन-किन मोर्चों पर बात की जाय? जब आप कहते हैं---घनघोर राजनैतिक अवसरवाद के एजेण्डे पर चलते हुए दक्षिणपन्थी सत्ता यही तो कर रही है---तो इस पर भी ईमानदारी से ग़ौर कीजिए कि बाक़ी की सत्ताएँ क्या करती रही हैं। एक सम्भावनाशील देश को गर्त में ले जाने का काम किसने किया? दक्षिणपन्थी आख़िर कब सत्ता में आए? आपने संविधान के लिए लिखा है कि… ‘‘यह कोई जड़ धार्मिक ग्रन्थ नहीं। अँग्रेजों के औपनिवेशिक कानून ‘इण्डियन पीनल कोड’ इसका मुख्य आधार रहे हैं। लेकिन हमारे संविधान-निर्माता दूरद्रष्टा थे।’’ इस पैमाने पर देखें तो धर्मिक ग्रन्थ भी भला जड़ कैसे हो गए? क्या सिर्फ़ इसलिए कि आज के समय में वे अप्रासङ्गिक कहे जाते हैं। इस तरह से तो संविधान के कुछ हिस्से भी हर साल-दो साल पर एक-दो बार अप्रासङ्गिक होते दिखते हैं और उनमें बदलाव करना पड़ता है। माफ़ कीजिए, धार्मिक गर्न्थों की जड़ता पर हज़ारों वर्षों बाद हम इतनी आसानी से फ़तवे नहीं दे सकते। मनु, पाणिनि, पतञ्जलि, कणाद, गौतम, याज्ञवल्क्य को संविधान निर्माताओं से कम दूरदृष्टि वाला नहीं कह सकते। उनकी बनाई रीति-नीति पर यह देश सदियों तक क़ायम रहा, संसार में सबसे ज़्यादा समृद्ध रहा। समय के साथ रीति-नीति में बदलाव होते ही हैं और स्मृतियों की परम्परा इसीलिए चली। आधुनिक भगवाधारियों को समझ में न आए तो इसमें हमारे पूर्वजों का क्या अपराध? टिप्पणी मेरी थी तो गोबर, गोमूत्र का ज़िक्र भी मेरे सन्दर्भ में करना चाहिए था। दक्षिणपन्थ को आप जो समझें, सो समझें, पर उसे आप मेरे ऊपर नहीं थोप सकते। गोबर, गोमूत्र को मैं क्या समझता हूँ, इस पर कई दिनों पहले का मेरा ही वीडियो यूट्यूब पर देख सकते हैं। फेसबुक पर भी इस सन्दर्भ में बहुत पहले लिख चुका हूँ। यहाँ सफ़ाई देने की ज़रूरत नहीं, आपकी बात आप पर ही उलटी पड़ सकती है। कुल जमा दिक़्क़त बस इतनी है कि हम अपनी-अपनी विचारधाराओं के दड़बे में बन्द रहते हैं और बाहर की दुनिया देखना नहीं चाहते। खुली निगाहों से चीज़ों को देखें तो शायद सही-ग़लत बेहतर समझ में आएगा। बहरहाल, यह बात की बात है, इसलिए इसे व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप की तरह लेने की ज़रूरत नहीं है। ---सन्त समीर---...


नई दिल्ली/वाराणसी।
आपदा और युद्ध में विपक्ष का व्यवहार ही तय करता है राष्ट्र का भविष्य आज़ादी के बाद के भारत के इतिहास में अभी तक ऐसा वक्त कभी नहीं आया था जैसा इस समय है। आपदा और युद्ध में अब तक के इतिहास में सत्ता और समाज का व्यवहार हमेशा परस्पर सहयोगी का ही रहा है। आज भी है। 1962 में चीन युद्ध को छोड़कर विपक्ष का भी व्यवहार सहयोगी का ही रहा है। चीन युद्ध के समय ही केवल विपक्ष ने नेहरू की नीतियों की आलोचना की थी। उसे नेहरू की भूल का परिणाम बताया था। लेकिन तब भी विपक्ष देश के साथ था। विपक्ष का मोदी के नेतृत्व वाली राजग सरकार के साथ शत्रुता पूर्ण रवैया केवल #कोरोना संकट के समय ही नहीं है। बात पुलवामा के आतंकी हमले की हो या सर्जिकल स्ट्राइक की। विपक्ष का रवैया केवल मोदी विरोधी ही नहीं एक तरह से भारत विरोधी भी रहा है। सेना के अभियानों पर सवाल उठा कर विपक्ष ने उनका मनोबल तोड़ने का काम किया। आतंकवादी नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए की गयी नोटबंदी के समय भी यही रवैया था। कश्मीर से धारा 370 ख़त्म करने जैसे राष्ट्रिय हित के मसले को भी विपक्ष ने सांप्रदायिक मसले के रूप में परिभाषित कर सरकार की आलोचना की।।नागरिकता कानून अधिनियम में संसोधन को लेकर तो विपक्ष का रवैया पागल हाथियों जैसा रहा। संसद से लेकर सड़क तक विपक्ष ने देश के मुसलमानों को भड़काकर नो तांडव किया उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं हो सकती। यहां तक कि विपक्ष के एक वर्ग ने अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी #CAA को मुद्दा बनाकर देश को शर्मशार करने की कोशिश की। ये अलग बात है कि उन्हें न तो देश में और न ही विदेश में कहीं तवज्जो मिली। कोरोना संकट के समय जिस प्रकार का रवैया विपक्ष ने अपना रखा है वह केवल शर्मिंदा करने वाला नहीं बल्कि निहायत घटिया भी है। यह अलग बात है कि समाज जैसे हमेशा आपद्काल में सरकारों के साथ रहा है वैसे ही अब भी है तमाम भड़काने की कोशिशों के बावजूद। विपक्ष के इस रवैये से लगता है कि अब उनके लिए राष्ट्र प्रथम न होकर प्रधानमंत्री मोदी प्रथम हैं और वह उन्हें किसी भी सूरत में सफल प्रधानमंत्री के रूप में नहीं देखना चाहता। मसला चाहे तबलीगी ज़मात के दुर्व्यवहार पर पर्दा डालने का हो या फिर प्रधानमंत्री केअर फण्ड का, विपक्ष का रवैया राष्ट्रविरोधी-समाजविरोधी दिखाई दे रहा है। जब मैं विपक्ष कह रहा हूँ तो उसे आप, कांग्रेस, कम्युनिस्ट, नक्सली, सेक्युलर, कथित गाँधीवादी, विदेशी चंदे से चलने वाले NGO और इस्लामिस्ट, इन सबको एक में रखकर देखिये। विपक्ष का यह रवैया कोरोना के बाद के हालातों की ओर इसारा करते हैं। कोरोना का समय तो जैसे तैसे निकल जायेगा लेकिन राष्ट्र के विकास का मार्ग अवरुद्ध करने की विपक्ष की नीति देश को बहुत पीछे ले जा सकती है।...